21/03/2026: ट्रंप कंफ्यूज़| 50 लाख टन कार्बन| भारत में संकट| सूरत से पलायन| वाराणसी और पुणे के मुसलमान| दो कश्मीरियों के खोए साल| हिमंता की संपत्ति| सबसे बड़ा घुसपैठिया| गौरैया
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फलक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
डोनाल्ड ट्रम्प के ईरान पर विरोधाभासी संदेश—युद्ध खत्म करने और प्रतिबंधों में ढील की बात, लेकिन सैनिकों की तैनाती भी बढ़ेगी.
वाराणसी में तुरंत ऐक्शन, पुणे में सन्नाटा, 14-14 मुसलमानों के मामलों में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल.
यूपी में इफ्तार के बाद मंदिर के पास जलधारा में मांस फेंकने के आरोप में चार लोग गिरफ्तार.
उत्तराखंड में कचरे के ढेर से ग्लेशियर तक जिंदा गौरैया—कठिन हालात में भी अनुकूलन की मिसाल.
ईरान युद्ध का असर—सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री संकट में, मिलों में हफ्ते में दो दिन बंदी और मजदूरों का पलायन शुरू.
राहुल गांधी की चेतावनी—रुपये की गिरावट और महंगाई से आम आदमी की थाली पर पड़ेगा असर.
दिल्ली कोर्ट का बड़ा फैसला, यूएपीए केस में दो कश्मीरी युवक बरी, 7 साल जेल के बाद उठे सवाल.
मुख्य चुनाव आयुक्त चयन विवाद—सुप्रीम कोर्ट में ‘हितों के टकराव’ के चलते सीजेआई ने खुद को सुनवाई से अलग किया.
यूएनआई का दफ्तर सील, दिल्ली पुलिस की कार्रवाई से प्रेस फ्रीडम पर सवाल.
हिमंता विस्वा सरमा और उनकी पत्नी की संपत्ति 5 साल में दोगुनी.
फिजिक्स वाला के शिक्षक की जातिवादी टिप्पणी पर बवाल, वीडियो वायरल होने के बाद सस्पेंड.
ममता बनर्जी का पीएम पर हमला, एसआईआर विवाद में कहा “मोदी सबसे बड़े घुसपैठिया”.
ईरान युद्ध 22वां दिन
ईरान पर ट्रंप के विरोधाभासी संदेश; युद्ध को ‘खत्म’ करने और प्रतिबंधों में ढील देने की बात, लेकिन और अधिक सैनिकों की तैनाती
“द इंडियन एक्सप्रेस” के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान युद्ध के बारे में विरोधाभासी संकेतों की झड़ी लगा दी है, जिससे इस संघर्ष की दिशा और उनके प्रशासन की रणनीति पर और भी सवाल खड़े हो गए हैं. शुक्रवार को कुछ ही घंटों के भीतर, ट्रंप ने कहा कि वह युद्ध को समाप्त करने पर विचार कर रहे हैं, वहीं उनके प्रशासन ने पुष्टि की कि वह मध्य-पूर्व में और अधिक सैनिक भेज रहा है. साथ ही, वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभाव को कम करने के प्रयास में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने दशकों में पहली बार कुछ ईरानी तेल पर से प्रतिबंध हटा दिए हैं—जिससे उस दबाव में कमी आई है जिसे वाशिंगटन पारंपरिक रूप से ‘लेवरेज’ (दबाव बनाने के साधन) के रूप में इस्तेमाल करता रहा है.
होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने के लिए समन्वय: ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, जापान और दक्षिण कोरिया सहित 20 से अधिक देशों ने कहा है कि वे होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के प्रयासों में योगदान देंगे. शनिवार को इन देशों के नेताओं के एक संयुक्त बयान में इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को बंद करने के ईरान के फैसले की निंदा की गई.
इस बीच, तस्नीम समाचार एजेंसी ने बताया कि शनिवार को नतांज स्थित ईरान के परमाणु संवर्धन केंद्र पर इज़राइल और अमेरिका द्वारा हमला किया गया. बाद में, ईरान के सरकारी मीडिया ने कहा कि देश की सेना ने इज़राइल के बेन गुरियन हवाई अड्डे पर ईंधन टैंकों को निशाना बनाया है. वहीं, रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, वाशिंगटन द्वारा ऊर्जा संकट को कम करने के लिए अस्थायी रूप से प्रतिबंध हटाने के बाद भारतीय और एशियाई रिफाइनर फिर से ईरानी तेल खरीदने की योजना बना रहे हैं.
परमाणु सामग्री को जब्त करने की अमेरिकी योजना
सीबीएस न्यूज़ ने कई स्रोतों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि ट्रंप प्रशासन ईरान की परमाणु सामग्री को सुरक्षित करने या उसे वहां से निकालने की रणनीतियों पर काम कर रहा है. कथित तौर पर ईरान के पास 60 प्रतिशत तक संवर्धित 450 किलोग्राम यूरेनियम मौजूद है. इसके विपरीत, पिछले सप्ताह जब यह पूछा गया कि क्या अमेरिका इस सामग्री को जब्त करने के लिए कदम उठाएगा, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया कि यह व्हाइट हाउस की सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं है. ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के उस प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया, जिसमें परमाणु सामग्री को मॉस्को स्थानांतरित करने की बात कही गई थी.
5 प्रमुख घटनाक्रम
1. तेहरान में इजरायली हमलों की नई लहर: इजरायली सेना ने कहा है कि वह तेहरान में ठिकानों पर हमले कर रही है. शनिवार को ईरानी राजधानी के कई हिस्सों, मध्य शहर इस्फ़हान और तेहरान के पश्चिम में स्थित करज में धमाकों की खबरें मिलीं.
2. ईरानी तेल पर से प्रतिबंध हटाए गए: समाचार एजेंसी एपी के अनुसार, आसमान छूती कीमतों पर अंकुश लगाने के प्रयास में अमेरिका ने शनिवार को समुद्र में टैंकरों पर फंसे ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंधों को 19 अप्रैल तक के लिए रोक दिया है.
3. परमाणु सामग्री जब्त करने की योजना: सीबीएस न्यूज़ की रिपोर्ट है कि ट्रंप प्रशासन ईरान की परमाणु सामग्री को कब्जे में लेने या उसे बाहर निकालने के तरीकों पर विचार कर रहा है.
4. युद्ध के लिए भारी फंडिंग की मांग: अमेरिकी रक्षा विभाग राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के युद्ध प्रयासों को जारी रखने के लिए कांग्रेस से 200 अरब डॉलर की मांग कर रहा है. अधिकारियों का कहना है कि इस संघर्ष के अंत की कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं है.
5. हताहतों की बढ़ती संख्या: ईरानी रेड क्रिसेंट का कहना है कि ईरान में मारे गए 1,444 से अधिक लोगों में कम से कम 204 बच्चे शामिल हैं. वहीं, लेबनान पर इजरायली हमलों में 118 बच्चों सहित 1,000 से अधिक लोग मारे गए हैं.
ईरान जापानी जहाजों को होर्मुज से गुजरने देगा: ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने जापानी मीडिया को बताया कि तेहरान होर्मुज जलडमरूमध्य से जापान से जुड़े जहाजों को गुजरने देने के लिए तैयार है.
अमेरिका-ईरान युद्ध के मात्र 14 दिनों में 50 लाख टन CO2 का उत्सर्जन
एक नए विश्लेषण के अनुसार, ईरान पर अमेरिका-इजरायल का युद्ध जलवायु के लिए एक आपदा है. यह युद्ध दुनिया के ‘कार्बन बजट’ को 84 देशों के संयुक्त उत्सर्जन से भी अधिक तेजी से खत्म कर रहा है.
जहाँ युद्धक विमान, ड्रोन और मिसाइलें हजारों लोगों की जान ले रहे हैं और बुनियादी ढांचे को नष्ट कर मध्य-पूर्व को एक विशाल “पर्यावरणीय बलि क्षेत्र” में बदल रहे हैं, वहीं जलवायु लागत के पहले विश्लेषण में पाया गया है कि इस संघर्ष के शुरुआती 14 दिनों में ही 50 लाख टन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ है.
‘द गार्डियन’ के साथ विशेष रूप से साझा किया गया यह विश्लेषण, जीवाश्म ईंधन बुनियादी ढांचे, सैन्य अड्डों, नागरिक क्षेत्रों और समुद्र में जहाजों पर हमलों से होने वाले विनाशकारी पर्यावरणीय नुकसान की रिपोर्टिंग में एक और गंभीर कड़ी जोड़ता है.
क्लाइमेट एंड कम्युनिटी इंस्टीट्यूट के अनुसंधान निदेशक और विश्लेषण के सह-लेखक पैट्रिक बिगर ने कहा, “हर मिसाइल हमला एक अधिक गर्म और अधिक अस्थिर ग्रह की ओर बढ़ाया गया एक और कदम है, और इससे कोई भी सुरक्षित नहीं होता. रिफाइनरी में लगी हर आग और टैंकर पर हुआ हर हमला इस बात की याद दिलाता है कि जीवाश्म ईंधन पर आधारित भू-राजनीति एक रहने योग्य ग्रह के साथ मेल नहीं खाती.”
अनुमानित कार्बन लागत में नष्ट हुई इमारतें सबसे बड़ा तत्व हैं. ईरानी रेड क्रिसेंट की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 20,000 नागरिक इमारतें क्षतिग्रस्त हुई हैं. विश्लेषण का अनुमान है कि इस क्षेत्र से कुल उत्सर्जन 24 लाख टन हुआ है.
ईंधन दूसरा सबसे बड़ा तत्व है. अमेरिकी भारी बमवर्षक विमानों ने ईरान पर छापेमारी के लिए इंग्लैंड के पश्चिम जैसे सुदूर क्षेत्रों से उड़ान भरी. अनुमान है कि शुरुआती 14 दिनों में विमानों और सहायक जहाजों द्वारा 15 करोड़ से 27 करोड़ लीटर ईंधन की खपत की गई, जिससे कुल 5.29 लाख टन CO2 उत्सर्जन हुआ.
तेहरान के ऊपर छाए काले बादल और “काली बारिश” युद्ध की सबसे चौंकाने वाली छवियों में से एक रही है. इज़राइल द्वारा शहर के चारों ओर चार प्रमुख ईंधन भंडारण डिपो पर बमबारी के बाद लाखों लीटर ईंधन जल गया. अनुमान है कि इस हमले और इसी तरह के अन्य हमलों में 25 लाख से 59 लाख बैरल तेल जल गया, जिससे 18.8 लाख का उत्सर्जन हुआ.
शुरुआती 14 दिनों में अमेरिका ने 4 विमान और ईरान ने 28 विमान, 21 नौसैनिक जहाज और लगभग 300 मिसाइल लॉन्चर खो दिए. इस साजो-सामान के नष्ट होने से 1.72 लाख टन का उत्सर्जन हुआ. इसके अलावा, हजारों मिसाइलों, ड्रोनों और इंटरसेप्टर्स के उपयोग ने भी अपना योगदान (लगभग 55 हजार) दिया.
कुल मिलाकर, यदि यह दर जारी रही, तो यह एक वर्ष में 13.1 करोड़ टन के बराबर होगा—जो कि कुवैत जैसी जीवाश्म ईंधन-प्रधान अर्थव्यवस्था के वार्षिक उत्सर्जन के बराबर है. यह दुनिया के सबसे कम उत्सर्जन करने वाले 84 देशों के संयुक्त उत्सर्जन के भी बराबर है.
घाना के ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधन विश्वविद्यालय के प्रमुख लेखक फ्रेड ओटू-लार्बी ने कहा, “दो हफ्तों में आइसलैंड के वार्षिक उत्सर्जन के बराबर कार्बन जलाना कुछ ऐसा है जिसे हम वास्तव में बर्दाश्त नहीं कर सकते.”
पैट्रिक बिगर ने चेतावनी दी कि यह युद्ध सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि जीवाश्म ईंधन की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के लिए है—और इसकी कीमत ईरानी नागरिक और दुनिया भर के कामकाजी वर्ग के समुदाय चुका रहे हैं.
ईरान युद्ध: गुजरात के उद्योगों पर भारी संकट, सूरत से पलायन शुरू, टेक्सटाइल इकाइयों में सप्ताह में दो दिन की बंदी
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और बाधित आपूर्ति श्रृंखला ने सूरत की टेक्सटाइल मिलों को परिचालन में कटौती करने पर मजबूर कर दिया है, जिससे श्रमिकों के सामने संकट खड़ा हो गया है. विशेष रूप से, खाड़ी देशों में बंदरगाहों के बंद होने से मोरबी के सिरेमिक निर्यात पर भी बुरा असर पड़ा है.
दिलीप सिंह क्षत्रिय की रिपोर्ट है कि सूरत का टेक्सटाइल हब इस संकट के केंद्र में है, जहाँ बढ़ती इनपुट लागत और टूटी हुई आपूर्ति श्रृंखला मिलों को आंशिक बंदी की ओर धकेल रही है. जैसे-जैसे वैश्विक अस्थिरता कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर ले जा रही है, इस लागत का सीधा असर सूरत के कपड़ा क्षेत्र पर पड़ा है. धागे से लेकर कोयले तक हर कच्चा माल महंगा हो गया है. इसके परिणामस्वरूप, ‘साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन’ ने पुष्टि की है कि कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला गंभीर रूप से बाधित हो गई है, जिससे उत्पादन करना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है.
दबाव अब कड़े फैसलों में बदल रहा है. धागे की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और प्रसंस्करण के लिए महत्वपूर्ण कोयला महंगा और दुर्लभ होता जा रहा है. मिल संचालक अब घटते स्टॉक की समस्या से जूझ रहे हैं—उनके पास केवल 10 से 20 दिनों का कोयला स्टॉक बचा है. यदि खपत इसी गति से जारी रही, तो ऊर्जा संकट अब केवल एक चेतावनी नहीं बल्कि एक आसन्न वास्तविकता बन जाएगा.
लागत और आपूर्ति के दोहरे दबाव का सामना कर रहे इस उद्योग ने अब ‘सर्वाइवल मोड’ अपना लिया है. एक बड़े कदम के तहत, टेक्सटाइल प्रोसेसर्स ने हर हफ्ते दो दिन काम बंद रखने का फैसला किया है. इस कदम का उद्देश्य नुकसान को कम करना और संसाधनों को बचाना है. यह गुजरात के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक इंजनों में से एक में गहरे संकट का संकेत है.
प्रभाव का पैमाना बहुत बड़ा है क्योंकि सूरत में लगभग 400 से 500 टेक्सटाइल मिलें हैं, जिनमें से प्रत्येक हजारों आजीविकाओं से जुड़ी है. साथ ही मांग में कमी आने से यह संकट और गहरा हो गया है. ‘साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन’ (एसजीपीए) के अध्यक्ष जीतू वखारिया ने जमीनी हकीकत बयां करते हुए कहा, “ग्रे कपड़े की कीमत में वृद्धि के कारण, मार्केट पार्टियाँ वर्तमान में मिलों को प्रसंस्करण के लिए माल नहीं दे रही हैं. ऐसी स्थिति में मिलों को चलाना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा साबित हो रहा है. हम अगले सप्ताह से सप्ताह में दो दिन मिलों को बंद रखने का निर्णय लेने के लिए मजबूर हुए हैं.”
इस फैसले की मानवीय कीमत भी चुकानी पड़ रही है. लगभग 3 लाख श्रमिक सीधे तौर पर इन मिलों पर निर्भर हैं. जैसे-जैसे परिचालन कम हो रहा है, वेतन पर सीधा असर पड़ रहा है, जिससे पूरे शहर में श्रम अनिश्चितता की एक नई लहर पैदा हो गई है. काम के घटते अवसरों के कारण श्रमिकों का पलायन शुरू हो गया है. हजारों श्रमिक रोजाना सूरत छोड़कर अपने गृहनगर जा रहे हैं. डर यह है कि यदि स्थिति बनी रही, तो मांग लौटने पर उद्योग को श्रमिकों की भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है, जो सूरत की आर्थिक रिकवरी के लिए एक बड़ा झटका होगा.
साथ ही, इस संकट की लहरें टेक्सटाइल से आगे बढ़कर गुजरात की सिरेमिक राजधानी मोरबी तक पहुँच गई हैं. उन्हीं भू-राजनीतिक तनावों ने यहाँ भी अपनी पकड़ मजबूत कर ली है. गैस की कमी के कारण पहले ही 450 से अधिक सिरेमिक इकाइयाँ बंद होने के कगार पर थीं, और अब चल रहे संघर्ष ने निर्यात मार्गों को अवरुद्ध कर दिया है. दुबई, ओमान, शारजाह, कतर और कुवैत जैसे क्षेत्रों के प्रमुख बंदरगाहों पर व्यवधान के कारण मोरबी की टाइलों से लदे कंटेनर बीच रास्ते में फंसे हुए हैं, जिससे उद्योग का नकदी प्रवाह और निर्यात की गति थम गई है.
अतः, जो उभरकर सामने आ रहा है वह केवल एक क्षेत्र की सुस्ती नहीं है, बल्कि पूरे गुजरात में एक बड़ा औद्योगिक संकट है, जहाँ वैश्विक युद्ध का तनाव स्थानीय उत्पादन की वास्तविकताओं से टकरा रहा है. राज्य की विनिर्माण अर्थव्यवस्था की इस समय अभूतपूर्व दबाव में परीक्षा हो रही है.
‘मोदी सरकार के पास न तो कोई दिशा है और न ही रणनीति’: राहुल गांधी ने महंगाई की चेतावनी दी
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने शनिवार को ‘एक्स’ पर अपनी नवीनतम पोस्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर कई चिंताएं जताईं. उन्होंने उल्लेख किया कि डॉलर के मुकाबले रुपये का कमजोर होना और 100 की ओर बढ़ना, साथ ही औद्योगिक ईंधन की कीमतों में भारी उछाल केवल आंकड़े नहीं हैं; ये आने वाली महंगाई के स्पष्ट संकेत हैं.
‘टीएनआईई’ के अनुसार, उन्होंने आगे कहा कि भले ही सरकार इसे ‘सामान्य’ कहे, लेकिन वास्तविकता अलग है. उन्होंने लिखा, “मोदी सरकार के पास न तो कोई दिशा है और न ही कोई रणनीति, बस खोखली बयानबाजी है. सवाल यह नहीं है कि सरकार क्या कह रही है, सवाल यह है कि आपकी थाली में क्या बचा है.”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि वर्तमान स्थिति बनी रहती है, तो उत्पादन और परिवहन और महंगे हो जाएंगे, रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाएंगी और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) पर सबसे बुरी मार पड़ेगी.
उन्होंने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, “एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेशक) का पैसा और भी तेजी से बाहर निकलेगा, जिससे शेयर बाजार पर और दबाव पड़ेगा. दूसरे शब्दों में, हर परिवार की जेब पर इसका सीधा और गहरा असर पड़ना तय है. और यह बस कुछ समय की बात है, चुनावों के बाद पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में भी बढ़ोतरी की जाएगी.”
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की चिंताओं के गहराने के कारण, शुक्रवार को रुपया चार साल से अधिक समय की अपनी सबसे बड़ी गिरावट के साथ 93.71 पर बंद हुआ, जो 82 पैसे या लगभग 0.95 प्रतिशत की गिरावट है.
14-14 मुसलमानों के दो मामले; एक में तुरंत ऐक्शन, तो दूसरे में ‘शून्य’, क्योंकि...?
वाराणसी में गंगा नदी के बीचों-बीच नाव पर कथित तौर पर रोजा इफ्तार पार्टी आयोजित करने, मांसाहारी भोजन करने और हड्डियां नदी में फेंकने की शिकायत मिलने पर पुलिस इतनी फुर्ती से कार्रवाई करती है कि सभी 14 आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता है, और ईद के दो दिन पहले अदालत से 14 दिनों की न्यायिक रिमांड भी मंजूर हो जाती है. वहीं, इसके उलट महाराष्ट्र के पुणे जिले के सासवड पुलिस स्टेशन में एक बड़ी भीड़ द्वारा इफ्तार सभा के दौरान 14 मुस्लिम पुरुषों पर कथित सामूहिक हमले के संबंध में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज होने के एक सप्ताह बाद भी अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है. दरअसल, वाराणसी के मामले में शिकायतकर्ता भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के शहर प्रमुख रजत जायसवाल हैं और उन्होंने ही एफआईआर दर्ज कराई थी, जबकि पुणे के केस में हिंसा के शिकार 14 पीड़ित शिकायतकर्ता हैं. दिलचस्प यह है कि उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र, दोनों ही राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, लेकिन “कार्रवाई” के मामले में पुलिस का रवैया सवालों के घेरे में है. सबसे बड़ा सवाल- “क्या शिकायतकर्ता का चेहरा देखकर ऐक्शन लिया जा रहा है?”
सासवड के एसएचओ कुमार कदम ने ‘ऑल्ट न्यूज़’ को बताया, “जांच चल रही है. हमारे पास कुछ संदिग्ध हैं, लेकिन खबर है कि वे इलाके से भाग गए हैं. हमें बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि ग्रामीण सहयोग नहीं कर रहे हैं.”
पुणे के बोपदेव घाट पर इफ्तार के दौरान 13 मार्च की शाम लगभग 6:30 बजे, पुणे के पास सासवड रोड पर स्थित बोपदेव घाट के किनारे कुछ मुस्लिम युवक अपना रोजा खोलने (इफ्तार) के लिए इकट्ठा हुए थे. इसी दौरान 50 से 150 लोगों की एक भीड़ ने उन पर हमला कर दिया.
पीड़ितों के अनुसार, हमलावरों ने चिल्लाते हुए कहा, “मुसलमान यहाँ नहीं बैठ सकते” और “क्या यह तुम्हारे बाप की जागीर है?” भीड़ ने युवकों को बेरहमी से पीटा. एक पीड़ित (अमीन) के सिर पर लोहे की रॉड से हमला किया गया, जिससे उसे 14 टांके आए और वह दो दिनों तक आईसीयू में रहा. अन्य युवकों को भी गंभीर चोटें आईं. हमलावरों ने उनके कपड़े फाड़ दिए, उनकी टोपियां उतार दीं और उन्हें दोबारा ‘पठानी कुर्ता’ पहनकर वहां न आने की धमकी दी. पीड़ितों का आरोप है कि उनका मोबाइल फोन और अन्य सामान भी छीन लिया गया. घटना के बाद पीड़ितों ने 112 पर कॉल किया, लेकिन एफआईआर देर रात दर्ज की गई.
पीड़ितों का आरोप है कि उन्होंने कुछ हमलावरों की पहचान कर पुलिस को उनकी तस्वीरें भी दी थीं, लेकिन कथित तौर पर किसी “अज्ञात दबाव” के कारण उन्हें छोड़ दिया गया. पुलिस का कहना है कि उस सुनसान इलाके में लगे सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे थे, जिससे साक्ष्य जुटाने में मुश्किल हो रही है.
यूपी: इफ्तार के बाद मंदिर के पास जलधारा में मांस के अवशेष फेंकने के आरोप में चार गिरफ्तार
उत्तरप्रदेश के श्रावस्ती जिले में शुक्रवार को एक आश्रम के मंदिर के पास स्थित जलधारा में कथित तौर पर मांस के अवशेष फेंकने के आरोप में चार व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया है.
‘स्क्रॉल’ की रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना सिरसिया इलाके के सोनपथरी आश्रम मंदिर के पास हुई. क्षेत्राधिकारी (सीओ) सतीश कुमार शर्मा ने बताया कि आश्रम के प्रमुख हरि शरणानंद द्वारा गुरुवार को एक शिकायत दर्ज कराई गई थी. शिकायतकर्ता का आरोप है कि मंगलवार को मंदिर के बगल में स्थित ताजे पानी की जलधारा के पास एक इफ्तार पार्टी का आयोजन किया गया था.
क्षेत्राधिकारी ने बताया कि इफ्तार के दौरान मांस परोसा गया था. शर्मा के अनुसार, पार्टी के बाद आयोजकों ने कथित तौर पर बचा हुआ भोजन उसी जलधारा में फेंक दिया, जिसका पानी आश्रम द्वारा खाना पकाने, पीने और मूर्तियों के अभिषेक (धोने) के लिए उपयोग किया जाता है.
‘पीटीआई’ की रिपोर्ट के अनुसार, शिकायत के आधार पर सिरसिया पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता की उन धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है, जो ‘शत्रुता और वैमनस्य को बढ़ावा देने’ से संबंधित हैं.
‘खोए हुए इन सालों का जवाब कौन देगा?’: दिल्ली की कोर्ट ने यूएपीए मामले में दो कश्मीरी युवकों को बरी किया
सात साल से अधिक समय के बाद, गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किए गए दो कश्मीरी युवकों को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने बरी कर दिया. अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को साबित करने में विफल रहा और दिल्ली पुलिस द्वारा आरोपियों से हथियार और गोला-बारूद बरामद करने के दावे पर “काफी संदेह” है.
‘द वायर’ की रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में गिरफ्तारी के वक्त परवेज राशिद और जमशेद जहूर पॉल की उम्र क्रमशः 24 और 19 साल थी. दोनों ने विचाराधीन कैदी के रूप में 2753 दिन जेल में बिताए. उनके खिलाफ आरोप अप्रैल 2022 में तय किए गए थे, और 2024 में भी दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था, जिससे उनकी हिरासत की अवधि बढ़ती गई.
अदालत ने माना कि आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता और आईएसआईएस से कथित संबंधों के आरोप सिद्ध नहीं हुए. अदालत ने कहा, “इन दस्तावेजों में एफआईआर नंबर का शामिल होना स्पष्ट रूप से गंभीर संदेह पैदा करता है.”
अदालत ने टिप्पणी की, “चाहे एफआईआर कथित बरामदगी से पहले दर्ज की गई थी या उसका नंबर बाद में जोड़ा गया था, दोनों ही स्थितियों में अभियोजन पक्ष के दावे की सत्यता संदिग्ध है.”
न्यायाधीश ने यह भी गौर किया कि जिस समय पिस्तौल और कारतूस बरामद किए गए थे, उस समय वहां मौजूद किसी भी व्यक्ति को गवाह के रूप में मुकदमे में शामिल नहीं किया गया था.
इस मामले में ‘एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स’ (एपीसीआर) ने आरोपियों का सहयोग किया था. एपीसीआर के राष्ट्रीय सचिव नदीम खान ने कहा कि हालांकि बरी होना एक जीत है, लेकिन नुकसान पहले ही हो चुका है. ‘आतंकवादी’ का ठप्पा तो हट गया है, लेकिन उनके जीवन के आठ साल चले गए. यह केवल एक कानूनी जीत नहीं है, बल्कि एक कड़वा सच है कि कैसे मनगढ़ंत आरोपों से जिंदगियां आसानी से बर्बाद कर दी जाती हैं.
सीजेआई ने सीईसी के चयन की सुनवाई से खुद को अलग किया, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने ‘हितों के टकराव’ का हवाला दिया
‘द टेलीग्राफ ब्यूरो’ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को संकेत दिया कि न तो मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत और न ही उनके भविष्य के उत्तराधिकारी उन याचिकाओं पर सुनवाई करेंगे, जिनमें 2023 के उस कानून को चुनौती दी गई है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों (ईसी) का चयन करने वाले पैनल से सीजेआई को हटा दिया गया था. यह निर्णय किसी भी स्पष्ट “हितों के टकराव” से बचने के लिए लिया गया है.
यह कथित “हितों का टकराव” इस तथ्य से उत्पन्न होता है कि यह पूरा मुद्दा सीजेआई को पैनल से बाहर किए जाने के इर्द-गिर्द घूमता है, और यदि वर्तमान मुख्य न्यायाधीश या उनके उत्तराधिकारी इस मामले को देखते हैं, तो इसकी आलोचना हो सकती है. सीजेआई कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान यह संकेत तब दिया, जब सीजेआई ने कहा कि वह “हितों के टकराव” से बचने के लिए खुद को इस मामले से अलग करना चाहते हैं.
केंद्र सरकार ने पिछले साल 17 फरवरी को ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त करने की प्रक्रिया पूरी की थी, जबकि उस समय ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाएँ लंबित थीं. इस कानून के माध्यम से मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के चयन पैनल से सीजेआई को बाहर करने की कोशिश की गई थी.
जनहित याचिका में 2023 के कानून को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि यह ‘अनूप बरनवाल मामले’ में पांच जजों की संविधान पीठ द्वारा दिए गए फैसले के विपरीत है. उस फैसले में सर्वोच्च अदालत ने आदेश दिया था कि सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, सीजेआई और विपक्ष के नेता शामिल होने चाहिए.
हालाँकि, एनडीए सरकार द्वारा लाए गए 2023 के कानून ने चयन पैनल में सीजेआई की जगह एक “कैबिनेट मंत्री” को शामिल कर दिया गया. इससे पहले, केंद्र सरकार ने सर्वोच्च अदालत में 2023 के कानून के तहत नियुक्तियों का बचाव करते हुए कहा था कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता समिति में किसी न्यायिक सदस्य की उपस्थिति पर निर्भर नहीं करती है. इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान पिछले साल से अब तक लगभग 15 बार स्थगन देखा गया है. शुक्रवार को जब मामला सुनवाई के लिए आया, तो सीजेआई कांत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की: “मुझ पर हितों के टकराव का आरोप लगेगा. यहाँ हितों का टकराव है.”
याचिकाकर्ता ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने हस्तक्षेप करते हुए कहा: “निजी तौर पर मुझे कोई समस्या नहीं है और कोई भी आप पर किसी बात का आरोप नहीं लगाएगा, लेकिन मेरे मन में भी ‘हितों के टकराव’ का यह पहलू था. इसलिए इसे ऐसी पीठ के सामने सूचीबद्ध किया जा सकता है जिसमें भविष्य का कोई सीजेआई शामिल न हो.”
इस सुझाव को स्वीकार करते हुए, सीजेआई ने निर्देश दिया कि मामले को 7 अप्रैल को दूसरी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए और संकेत दिया कि नई पीठ में वे न्यायाधीश शामिल होंगे जो भविष्य में सीजेआई का पद संभालने की कतार में नहीं हैं.
एसआईआर पर ममता बनर्जी का तल्ख़ अंदाज़, पीएम मोदी को बताया “घुसपैठिया”
स्क्रोल के रिपोर्ट के अनुसार, ममता बनर्जी ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “सबसे बड़ा घुसपैठिया” बताया और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर केंद्र की सरकार से सवाल पूछा.उन्होंने कोलकाता में ईद की नमाज़ के बाद सरकार पर हमला करते हुए नागरिकों के वोटिंग अधिकार छीनने नहीं देने की बात कही.
उन्होंने कहा, “जब आप (मोदी) विदेश जाते हैं, तो नेताओं से हाथ मिलाते हैं और दोस्ती की बात करते हैं. यह आपका चुनाव है और मैं सभी देशों का सम्मान करती हूं. लेकिन जैसे ही आप भारत लौटते हैं, अचानक हिंदू-मुस्लिम की राजनीति शुरू हो जाती है और लोगों को घुसपैठिया कहा जाता है. “फिर आप नाम हटाने की बात करते हैं और लोगों को घुसपैठिया बताते हैं. मैं कहती हूं कि आप और आपकी सरकार ही सबसे बड़े घुसपैठिए हैं.”
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस लगातार आरोप लगा रही है कि मतदाता सूची के इस विशेष पुनरीक्षण में बड़ी संख्या में असली मतदाताओं खासकर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के नाम हटा दिए गए हैं.
चुनाव आयोग ने 28 फरवरी को पश्चिम बंगाल की अपडेटेड मतदाता सूची जारी की थी. इसके अनुसार 5.46 लाख नाम हटाए गए हैं, जबकि 60,06,675 मामलों को “संदिग्ध और लंबित” श्रेणी में रखा गया है.
आगे ममता बनर्जी ने कहा, “इस मुद्दे को लेकर मैंने कलकत्ता हाई कोर्ट, दिल्ली और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. मुझे उम्मीद है कि लोगों के अधिकारों की रक्षा होगी, अगर कोई साथ न दे, तो भी मैं बंगाल के लोगों के साथ खड़ी रहूंगी.”
समाचार एजेंसी यूएनआई के दफ्तर को दिल्ली पुलिस ने ज़बरन किया सील
दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार शाम देश की प्रमुख समाचार एजेंसियों में से एक यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) के 9, रफ़ी मार्ग स्थित कार्यालय को सील कर दिया.
बीबीसी रिपोर्ट के अनुसार, यह कार्रवाई कथित तौर पर सरकार द्वारा भूमि आवंटन की शर्तों के उल्लंघन के आरोप में की गई है.
दरअसल, केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के भूमि एवं विकास विभाग ने यूएनआई दफ्तर को दी गई जमीन का आवंटन रद्द कर दिया था. इस आदेश के खिलाफ यूएनआई ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की थी लेकिन कोर्ट ने सुनवाई के बाद एजेंसी की याचिका को रद्द करते हुए भूमि एवं विकास विभाग के पक्ष में फैसला सुनाया.
अदालत के इस आदेश के कुछ ही घंटों बाद शाम को दिल्ली पुलिस ने कुछ वकीलों और भारी दलबल के साथ यूएनआई के दफ्तर पहुंच गई और ज़बरन खाली कराकर सील कर दिया.
यूएनआई ने ‘एक्स’ पर लिखा, “देश की सबसे पुरानी और सबसे सम्मानित समाचार एजेंसियों में से एक, ‘यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया’ के दफ़्तर को सील करने से प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंताएँ खड़ी हो गई हैं.” एजेंसी ने बताया कि उनके कर्मचारियों को जबरन ऑफिस से बाहर निकाला गया और उनके निजी सामान तक लेने की अनुमति नहीं दी गई.
फिजिक्स वाला के शिक्षक की जातिवादी टिप्पणी पर बवाल, वीडियो वायरल होने के बाद सस्पेंड
फिजिक्स वाला के एक शिक्षक ने ऑनलाइन क्लास के दौरान दलित समुदाय के खिलाफ जातिवादी और अपमानजनक टिप्पणी की, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर लगातार बहस का मुद्दा बनता जा रहा है.
वीडियो में शिक्षक कह रहे हैं कि “यह बड़ी बात है कि मैं कुछ-कुछ रवि किशन जैसा दिखता हूं, अगर मैं चोर च%#$र जैसा दिखता तो मुश्किल हो जाती, कम से कम अब आप मुझे देखेंगे...” अब यह वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. फिजिक्स वाला ऐप अलख पांडे द्वारा निर्मित भारतीय एजुकेशनल प्लेटफॉर्म है, जो विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए किफायती ऑनलाइन कक्षाएं एवं लाइव क्लासेस आदि उपलब्ध कराता है.
द मूकनायक के रिपोर्ट के अनुसार,‘दलित वॉइस’ अकाउंट ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “एक शिक्षक ने कक्षा में मेहनतकश समुदाय का अपमान किया, यहां तक कि ‘चोर $%#री’ जैसा जातिवादी गाली का इस्तेमाल किया. यह उन लोगों में मौजूद पूर्वाग्रह को दर्शाता है.” वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक आक्रोश देखा गया. कई यूजर्स ने शिक्षक के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं. विरोध के बाद फिजिक्स वाला ने उस शिक्षक को सस्पेंड कर दिया है.
5 साल में दोगुनी हुई हिमंता बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी की संपत्ति
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, हिमंता बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा की कुल संपत्ति में पिछले पाँच वर्षों में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई है. 2021 में जहाँ उनकी संयुक्त संपत्ति 17.27 करोड़ रुपये थी, वहीं 2026 में यह बढ़कर 35.16 करोड़ रुपये हो गई है.
यह जानकारी उस हलफनामे से सामने आई है, जो मुख्यमंत्री ने जालुकबारी निर्वाचन क्षेत्र से नामांकन दाखिल करते समय प्रस्तुत किया है. हलफनामे के अनुसार, हिमंत बिस्वा सरमा के पास 2026 में केवल चल संपत्ति है, जिसकी कुल कीमत 2.36 करोड़ रुपये है. 2021 में यह 1.72 करोड़ रुपये थी. उन्होंने निर्वाचन आयोग को यह भी बताया कि उनके पास बॉन्ड, शेयर या म्यूचुअल फंड में कोई निवेश नहीं है.
वहीं उनकी पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा की संपत्ति में बड़ा इजाफा हुआ है. 2021 में उनकी कुल संपत्ति 16.19 करोड़ रुपये थी जो 2026 में बढ़कर 32.79 करोड़ रुपये हो गई है. इसमें चल और अचल दोनों तरह की संपत्तियाँ शामिल हैं. उनके पास 5.10 करोड़ रुपये के निवेश (शेयर आदि) और 1.77 करोड़ रुपये की जीवन बीमा पॉलिसी भी है.
आय के आंकड़ों पर नज़र डालें तो वित्त वर्ष 2024-25 में मुख्यमंत्री की आय 29.62 लाख रुपये रही, जबकि उनकी पत्नी की आय 4.19 करोड़ रुपये दर्ज की गई है. कैश और बैंक जमा की बात करें तो सरमा के पास 2.28 लाख रुपये नकद और करीब 68 लाख रुपये बैंक में हैं. वहीं उनकी पत्नी के पास 3.16 लाख रुपये नकद और लगभग 74.85 लाख रुपये बैंक में जमा हैं.
मुख्यमंत्री पर 95 लाख रुपये की देनदारी बाकी है, जबकि उनकी पत्नी पर 15.91 करोड़ रुपये के लोन दर्ज हैं. हलफनामे के मुताबिक, दोनों के पास कोई कृषि भूमि नहीं है, लेकिन उनकी पत्नी के नाम तीन गैर-कृषि संपत्तियाँ हैं, जिनकी कुल बाजार कीमत 19.25 करोड़ रुपये है.
रामचंद्र गुहा: पश्चिम एशिया में इंसानियत के खिलाफ लड़ाई; तीनों नेता दोषी
इतिहासकार रामचंद्र गुहा का मानना है कि पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष जिस तरह से अब तक आगे बढ़ा है, उसमें उन तीन पुरुषों के व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण भूमिका है, जिन्होंने इन देशों का नेतृत्व किया है या अभी भी कर रहे हैं. ‘द टेलीग्राफ’ में प्रकाशित अपने लेख में गुहा लिखते हैं कि महान समाजशास्त्री आंद्रे बेतेई, जिनका हाल ही में निधन हो गया, ने एक बार मुझे पत्र लिखकर कहा था: “आपको मानवीय मामलों के संचालन में ‘बुराई’ के स्थान पर थोड़ा और मनन करना चाहिए.” बेतेई का मानना था कि मैं गांधी जैसे सद्भावना वाले राजनेताओं के बारे में लिखने पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित करता हूँ. लेकिन इतिहास जितना नेक इरादे वाले लोगों से बना है, उतना ही — और अक्सर उससे भी कहीं अधिक — दुर्भावनापूर्ण इरादे वाले लोगों द्वारा बनाया और बिगाड़ा गया है. मुझे प्रोफेसर बेतेई की यह चेतावनी तब याद आई जब पश्चिम एशिया में वर्तमान संघर्ष शुरू हुआ. यह संघर्ष एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल को, तो दूसरी ओर ईरान को खड़ा करता है.
उन्होंने शुरुआत ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अली खामेनेई से की है और लिखा है कि उनके साहसी अंत के कारण कुछ लोग उन्हें ‘साम्राज्यवाद-विरोधी नायक’ मानते हैं, परंतु यह एक सतही दृष्टिकोण है. गुहा के अनुसार, खामेनेई के पास ईरान को समृद्ध बनाने के तीन विकल्प थे: पहला- लोकतांत्रिक मार्ग, जिसमें वे पादरियों के शासन को कम कर एक स्वतंत्र समाज और लैंगिक समानता को बढ़ावा दे सकते थे. दूसरा- सिंगापुर मॉडल, जिसमें वे बिना लोकतंत्र के केवल आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित कर सकते थे और तीसरा- दमन और विस्तारवाद. खामेनेई ने इसी तीसरे मार्ग को चुना. उन्होंने घरेलू स्तर पर जनता का दमन किया और विदेशों में (लेबनान, यमन, सीरिया) सशस्त्र समूहों को प्रायोजित कर अस्थिरता पैदा की. ईरान की समृद्ध सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत का लाभ उठाने के बजाय, उन्होंने इज़राइल के प्रति शत्रुता और ‘हठधर्मिता’ को प्राथमिकता दी.
इज़राइल के नेता बेंजामिन नेतन्याहू को गुहा खामेनेई से भी अधिक निर्मम बताते हैं. वे लिखते हैं कि नेतन्याहू की राजनीति के केंद्र में दो मुख्य बिंदु हैं: एक-कट्टरपंथी ज़ायनवाद और दूसरा भ्रष्टाचार व युद्ध. अपने पारिवारिक प्रभाव के कारण, नेतन्याहू ने वेस्ट बैंक में अवैध बस्तियों का विस्तार किया और फिलिस्तीनी राष्ट्र की हर संभावना को नष्ट कर दिया. यहाँ तक कि उन्होंने फिलिस्तीनी प्राधिकरण को कमजोर करने के लिए कभी हमास को भी बढ़ावा दिया था. नेतन्याहू का युद्ध प्रेम आंशिक रूप से उनके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों से बचने का एक तरीका है. हमास के हमले के बाद उनका प्रतिशोध इतना भयानक रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने उन्हें ‘युद्ध अपराधी’ माना है.
गुहा की नज़र में संघर्ष के तीसरे प्रमुख पात्र डोनाल्ड ट्रंप हैं. खामेनेई और नेतन्याहू के विपरीत, ट्रंप की कोई निश्चित विचारधारा नहीं है. उनके कार्य ‘अवसरवादिता’, अहंकार और लालच से प्रेरित हैं. ‘युद्ध-विरोधी’ होने का दावा करने के बावजूद, उन्होंने कई देशों पर बमबारी की और ईरान के खिलाफ बिना किसी ठोस उकसावे के बड़े सैन्य अभियान शुरू किए. गुहा अपने इस लेख में ट्रंप के ईरान पर हमले के पीछे कई अटकलें लगाते हैं—जैसे ओबामा से बड़ा दिखने की चाह, गाज़ा में रियल एस्टेट के अवसर, ईरान के तेल पर कब्ज़ा, या ‘एपस्टीन फाइलों’ से ध्यान भटकाना.
गुहा का तर्क है कि इस संघर्ष में कोई भी पक्ष ‘नेक’ नहीं है. तीनों देशों के नेता हिंसा और पीड़ा पहुँचाने में सक्षम और इच्छुक हैं. उनका कहना है कि ईरान निर्दोष नहीं है, क्योंकि उसने भी दमन और हस्तक्षेप किया है. लेकिन, अमेरिका और इज़राइल का अपराध कहीं अधिक बड़ा है. इसका कारण यह है कि उनके पास विनाश के अत्यधिक शक्तिशाली हथियार हैं और वे इन हथियारों का उपयोग असुरक्षित और निर्दोष नागरिकों पर करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. अंततः, इन नेताओं के अहंकार और स्वार्थ ने न केवल लाखों लोगों को विस्थापित और मृत किया है, बल्कि शीत युद्ध के बाद के सबसे बड़े वैश्विक आर्थिक और मानवीय संकट को जन्म दिया है.
बहरहाल, गुहा का यह लेख इस बात की याद दिलाता है कि जब सत्ता और शक्तिशाली हथियार उन लोगों के हाथ में होते हैं जिनके पास नैतिक दिशा की कमी होती है, तो परिणाम पूरी मानवता के लिए विनाशकारी होते हैं. अंग्रेजी में पूरा लेख यहां पढ़ा जा सकता है.
कचरे के ढेर से ग्लेशियरों तक: उत्तराखंड में जहाँ इंसान संघर्ष करते हैं, वहाँ भी फल-फूल रही हैं गौरैया
चाहे व्यस्त शहर हों या शांत गाँव, उत्तराखंड की गौरैया जीवित रहने के लिए खुद को ढाल रही हैं. भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के एक अध्ययन में पाया गया है कि हिमालय की ऊंचाइयों पर रहने वाली गौरैया में विशेष जैविक लक्षण विकसित हुए हैं, जो उन्हें मैदानी इलाकों की तुलना में चरम स्थितियों का बेहतर सामना करने में मदद करते हैं.
नरेंद्र सेठी की रिपोर्ट के मुताबिक, डब्ल्यूआईआई के वैज्ञानिक डॉ. सुरेश कुमार और शोधकर्ता रेनू बाला के मार्गदर्शन में 2021 में शुरू हुए इस अध्ययन का उद्देश्य राज्य भर में गौरैया की आबादी, उनके पसंदीदा आवास और शारीरिक विशेषताओं का मानचित्रण करना था. ‘ट्रांजिट सर्वे’ और औसत गणना का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने पाया कि पक्षियों की जनसंख्या का घनत्व जिलों के अनुसार काफी भिन्न है.
आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड में देहरादून और चमोली जिलों में गौरैया की सबसे अधिक संख्या है, इसके बाद चंपावत और नैनीताल का स्थान है. इसके विपरीत, हरिद्वार में सबसे कम जनसंख्या दर्ज की गई. सबसे चौंकाने वाला तथ्य शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों का अंतर है: अध्ययन में पाया गया कि शहरों में गौरैया की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में लगभग दो-तिहाई कम है.
शोधकर्ता रेनू बाला ने बताया, “हमने उनके पसंदीदा सूक्ष्म-आवासों को वर्गीकृत किया है. दिलचस्प बात यह है कि कचरे के ढेर इस सूची में सबसे ऊपर हैं क्योंकि वे कीड़ों की निरंतर आपूर्ति प्रदान करते हैं. इसके बाद छोटी झाड़ियों वाले क्षेत्र, निजी बगीचे और स्थानीय किराने की दुकानें आती हैं, जहाँ बिखरा हुआ अनाज भोजन का एक आसान स्रोत बन जाता है.”
डब्ल्यूआईआई के अध्ययन का सबसे आकर्षक पहलू अलग-अलग ऊंचाइयों पर रहने वाली गौरैया—विशेष रूप से 3,000 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई पर रहने वाली—के बीच शारीरिक अंतर है.
पक्षी विशेषज्ञ प्रदीप सक्सेना के अनुसार, उच्च हिमालयी जलवायु और ऑक्सीजन की कमी वाले वातावरण में जीवित रहने के लिए इन गौरैया ने विशिष्ट शारीरिक लक्षण विकसित किए हैं. सक्सेना ने कहा, “मैदानी इलाकों की गौरैया में आमतौर पर हीमोग्लोबिन का स्तर 18 ग्राम प्रति डेसीलीटर होता है. हालांकि, ऊंचाई पर पाई जाने वाली गौरैया में यह स्तर 21 ग्राम प्रति डेसीलीटर तक होता है. रक्त की यह बढ़ी हुई सांद्रता उन्हें ‘हाइपोक्सिया’ (ऑक्सीजन की कमी) से बचाती है और यह सुनिश्चित करती है कि उन्हें पहाड़ों की विरल हवा में पर्याप्त ऑक्सीजन मिले.”
रक्त की संरचना के अलावा, इन पक्षियों ने ठंड से बचने के लिए शारीरिक सुरक्षा कवच भी विकसित किए हैं. ऊंचाई पर रहने वाली गौरैया के उड़ने वाले पंख लंबे होते हैं, और उनके सीने व पीठ के पंख अधिक घने होते हैं, जो जमा देने वाले तापमान में उन्हें जरूरी गर्माहट प्रदान करते हैं.
इन लचीले पक्षियों में से कुछ कड़ाके की ठंड से बचने के लिए सर्दियों के चरम पर निचले इलाकों में चले जाते हैं और मौसम बदलते ही फिर से ऊंची चोटियों पर लौट आते हैं.
जैसे-जैसे उत्तराखंड का शहरीकरण बढ़ रहा है, हरियाली और झाड़ियों वाले आवासों को संरक्षित करना यह सुनिश्चित करने की कुंजी हो सकता है कि ये ‘नन्ही पड़ोसी’ हमारे गांवों और शहरों, दोनों जगह चहचहाती रहें.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.









