22/01/2026: हर चौथा इंसान भूख़ा | अडानी के समन | पेय जल में भारत सबसे पिछड़ों में | औरंगजेब और मोदी जी | उमर खालिद की बिल्लियां | उड़ीसा हेट क्राइम | दावोस, जेलेंस्की और ट्रंप | बांग्लादेश अड़ा
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियाँ
अमीरी की नई ऊंचाई: दुनिया के 1% लोगों के पास 43% दौलत, ऑक्सफैम का खुलासा.
पानी का संकट: भारत सुरक्षित पेयजल में 122 में से 120वें स्थान पर.
अडानी पर शिकंजा: US SEC ने मांगा ईमेल से नोटिस भेजने का अधिकार.
नफ़रत की आग: ओडिशा और उत्तराखंड में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े.
चीन कनेक्शन: भारत हटा सकता है चीनी कंपनियों से बैन.
ट्रंप का टैरिफ: US का दावा- भारत ने रोका रूसी तेल का आयात.
जेल डायरी: उमर खालिद बोले- “मैं जेल में भी आज़ाद हूँ.”
औरंगजेब और नरेन्द्र मोदी. भारत के मंदिर
दुनिया का हर चौथा व्यक्ति भूख और खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहा है
दुनिया में अरबपतियों की दौलत आज तक के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गई है. इतिहास में पहली बार, दुनिया भर में अरबपतियों की संख्या 3,000 के पार हो गई है. ‘द वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह खुलासा ऑक्सफैम की नई रिपोर्ट ‘रेसिस्टिंग द रूल ऑफ द रिच’ में हुआ है, जिसे दावोस में जारी किया गया.
रिपोर्ट बताती है कि जहाँ दुनिया का हर चौथा व्यक्ति भूख और खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहा है, वहीं सबसे अमीर 1% लोगों के पास सबसे गरीब 50% लोगों की तुलना में औसतन 8,251 गुना अधिक संपत्ति है. मानवता का सबसे गरीब आधा हिस्सा दुनिया की कुल संपत्ति का सिर्फ 0.52% रखता है, जबकि शीर्ष 1% के पास लगभग आधा, यानी 43.8% हिस्सा है. ऑक्सफैम का कहना है कि यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी व्यवस्था है, जहाँ सरकारें अधिकारों और आज़ादी के बजाय दौलत की रक्षा को चुन रही हैं.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि न केवल अरबपतियों की दौलत बढ़ी है, बल्कि उनकी राजनीतिक ताक़त भी बढ़ी है. नवंबर 2024 में डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव के बाद से अरबपतियों की संपत्ति पिछले पांच वर्षों की औसत दर से तीन गुना तेज़ी से बढ़ी है. दूसरी ओर, गरीबी कम करने की रफ़्तार रुक गई है. 2022 में दुनिया की लगभग आधी आबादी (48%) गरीबी में जी रही थी.
ऑक्सफैम नोट करता है कि दुनिया भर में तानाशाही का उदय सीधे तौर पर आय की असमानता से जुड़ा है. 136 देशों के डेटा से पुष्टि होती है कि जैसे-जैसे आर्थिक संसाधन असमान रूप से बंटते हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक शक्ति भी कुछ हाथों में सिमट जाती है. अमीर लोग राजनीति को खरीदकर, लॉबिंग करके और सीधे संस्थानों तक पहुँच बनाकर अपनी ताक़त बढ़ाते हैं. जब लोग इस व्यवस्था के खिलाफ बोलते हैं, तो सरकारें दमन का रास्ता अपनाती हैं.
भारत के संदर्भ में भी यह मुद्दा गंभीर है. ‘वर्ल्ड इनइक्वालिटी’ (विश्व विषमता) रिपोर्ट ने भारत को दुनिया के सबसे असमान देशों में से एक बताया है, जिसका ऑक्सफैम ने भी समर्थन किया है. रिपोर्ट सुझाव देती है कि इस खाई को पाटने का एक सीधा तरीका ‘कराधान’ है. अगर 100,000 से कम अति-धनवान लोगों पर सिर्फ 3% का ग्लोबल टैक्स लगाया जाए, तो सालाना 750 बिलियन डॉलर जुटाए जा सकते हैं. दिलचस्प बात यह है कि दुनिया भर के करीब 400 करोड़पतियों और अरबपतियों ने खुद पत्र लिखकर मांग की है कि उन पर टैक्स बढ़ाया जाए ताकि समाज को बचाया जा सके.
सुरक्षित पेयजल के मामले में भारत 122 देशों में 120वें स्थान पर: एक शर्मनाक हकीकत
काउंटरकरेंट्स में प्रकाशित डॉ. रंजन सोलोमन के लेख के अनुसार, सुरक्षित पेयजल तक पहुँच के मामले में भारत 122 देशों की सूची में 120वें स्थान पर है. केवल दो देश भारत से बदतर स्थिति में हैं. यह आँकड़ा किसी तकनीकी रिपोर्ट का हिस्सा भर नहीं है, बल्कि यह शासन की बुनियादी विफलता का प्रमाण है.
रिपोर्ट बताती है कि भारत के 70% सतही जल स्रोत सीवेज, औद्योगिक कचरे और कृषि अपशिष्ट से दूषित हैं. भूजल भी फ्लोराइड, आर्सेनिक और नाइट्रेट जैसे हानिकारक तत्वों से भरा हुआ है. एक सर्वे में पाया गया कि केवल 2% भारतीय घरों को स्थानीय आपूर्ति से पीने योग्य पानी मिलता है, जबकि 65% लोग आरओ या फिल्टर का उपयोग करते हैं. हर साल अनुमानित 2,00,000 लोग सुरक्षित पानी न मिलने के कारण मर जाते हैं.
ग्रामीण और शहरी भारत के बीच की खाई भी गहरी है. ग्रामीण क्षेत्र 85% आपूर्ति के लिए भूजल पर निर्भर हैं, जो तेजी से सूख रहा है. वहीं, शहरी इलाके सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण से जूझ रहे हैं. जल जीवन मिशन जैसी सरकारी पहलों के बावजूद, प्रगति धीमी है. लेख सवाल उठाता है कि जब देश को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताया जा रहा है, तो लोग जहरीला पानी पीने को क्यों मजबूर हैं?
यह जल संकट स्वास्थ्य, शिक्षा और उत्पादकता को सीधे प्रभावित करता है. डायरिया, टाइफाइड और हैजा जैसी बीमारियाँ बच्चों के विकास को रोक रही हैं. लेखक का कहना है कि 120वीं रैंकिंग कोई अपमान नहीं, बल्कि एक निदान है. जब तक हर नागरिक को नल से साफ पानी नहीं मिलता, तब तक “महान राष्ट्र” होने का दावा खोखला है.
अडानी को अमरीकी समन नहीं पहुंचाए मोदी सरकार ने, अब ईमेल से भेजने का विकल्प
भारत द्वारा समन जारी करने के अधिकार को चुनौती देने के बाद, अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (एसईसी) ने राजनयिक चैनलों को दरकिनार करते हुए एक संघीय अदालत का दरवाजा खटखटाया है. द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, एसईसी ने बुधवार (21 जनवरी) को न्यूयॉर्क की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में अर्जी दी है कि उसे गौतम अडानी और सागर अडानी को उनके अमेरिकी वकीलों और ईमेल के जरिए नोटिस भेजने की अनुमति दी जाए.
एसईसी ने कोर्ट से साफ कहा, “एसईसी को उम्मीद नहीं है कि हेग कन्वेंशन के जरिए यह काम पूरा हो पाएगा.” यह कदम एसईसी की 14 महीने की उस कोशिश में एक बड़ा बदलाव है, जिसके तहत वह 750 मिलियन डॉलर के बॉन्ड ऑफरिंग में कथित रिश्वतखोरी के आरोपों को लेकर अडानी को नोटिस देने की कोशिश कर रहा था.
भारत के कानून और न्याय मंत्रालय ने नवंबर 2024 में एसईसी के अनुरोध को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह मामला एसईसी के आंतरिक नियमों (रूल 5(बी)) के तहत कवर नहीं होता. एसईसी ने अपनी ताजा फाइलिंग में इस आपत्ति को “बेबुनियाद” बताया है और कहा है कि भारतीय मंत्रालय यह सुझाव दे रहा है कि एसईसी के पास कार्रवाई करने का अधिकार ही नहीं है.
यह दूसरी बार है जब भारत ने दस्तावेजों को तामील करने से मना किया है. इससे पहले अप्रैल 2025 में मुहर और हस्ताक्षर न होने का हवाला देकर अनुरोध लौटा दिया गया था. अब एसईसी ने दलील दी है कि अडानी के वकीलों (हेकर फिंक एलएलपी और अन्य) और उनके बिजनेस ईमेल पर नोटिस भेजना काफी होगा, क्योंकि प्रतिवादी पहले से ही इस मुकदमे के बारे में जानते हैं और अपनी प्रतिक्रिया तैयार कर रहे हैं. अडानी समूह ने पहले इन आरोपों को निराधार बताया था.
हेट क्राइम
ओडिशा में पादरी को पीटा, जूतों की माला पहनाई, चेहरे पर सिंदूर लगाकर गांव में घुमाया
ओडिशा के ढेंकानाल जिले के एक गांव में एक पादरी के साथ मारपीट करने और उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की घटना सामने आई है. पुलिस ने इस मामले में परजंग गांव के नौ लोगों को हिरासत में लिया है. हालांकि, यह घटना 4 जनवरी को हुई थी, लेकिन पादरी की पत्नी द्वारा ढेंकानाल के एसपी अभिनव सोनकर के पास शिकायत दर्ज कराने के बाद 13 जनवरी को परजंग थाने में मामला दर्ज किया गया.
शिकायत के अनुसार, पादरी बिपिन नायक को कथित तौर पर 4 जनवरी को परजंग में कृष्ण नायक के आवास पर उनके परिवार के अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करने के लिए आमंत्रित किया गया था. जब घर में प्रार्थना चल रही थी, तभी लाठियों से लैस 20 से 30 लोगों की गुस्साई भीड़ घर में घुस गई. उन्होंने कथित तौर पर पादरी और वहां मौजूद अन्य लोगों के साथ मारपीट की और उन्हें बुरी तरह अपमानित किया।
बीके राउत की रिपोर्ट के अनुसार, शिकायत में यह भी कहा गया है कि ग्रामीणों ने उनके चेहरे पर सिंदूर लगा दिया और उन्हें जूतों की माला पहनाई. उन्हें गांव में घुमाया गया और एक मंदिर के सामने झुकने के लिए मजबूर किया गया, साथ ही उन्हें नाले का पानी पीने के लिए भी विवश किया गया. पादरी की पत्नी ने गांव में जबरन धर्मांतरण के आरोपों का खंडन किया है.
शिकायत के आधार पर, परजंग पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है. पुलिस ने बुधवार को चार ग्रामीणों को और आज पांच अन्य ग्रामीणों को हिरासत में लिया.
एसपी सोनकर ने कहा कि जांच जारी है और इस संबंध में और भी गिरफ्तारियां हो सकती हैं. नायक, जो एक ईसाई पादरी हैं, अंगुल जिले के छेंडीपदा क्षेत्र के रहने वाले हैं. वह अपनी पत्नी के साथ पिछले आठ वर्षों से परजंग क्षेत्र के कंदरसिंघा गांव में रह रहे हैं.
ओडिशा में सांप्रदायिक हमलों का सिलसिला, विपक्ष ने भाजपा सरकार के ‘इकोसिस्टम’ को ठहराया जिम्मेदार
पिछले 19 महीनों में ओडिशा के आधा दर्जन शहरों में सांप्रदायिक घटनाओं के कारण कर्फ्यू और इंटरनेट शटडाउन की नौबत आई है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 14 जनवरी को बालासोर में एक मुस्लिम युवक को कथित ‘गौ रक्षकों’ ने पीट-पीटकर मार डाला. इससे कुछ हफ्ते पहले संबलपुर में ज्वेल शेख नाम के एक युवक की हत्या कर दी गई थी.
विपक्ष ने इसे “जंगल राज” करार दिया है और आरोप लगाया है कि जून 2024 में भाजपा की पहली पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने के बाद राज्य में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा है. पुलिस पर आरोप है कि वह इन मामलों को ‘हेट क्राइम’ मानने से इनकार करती रही है. बालासोर मामले में शुरुआती एफआईआर में मारपीट का ज़िक्र तक नहीं था, जबकि वीडियो में भीड़ को पीड़ित से ‘जय श्री राम’ के नारे लगवाते देखा गया.
मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने हाल ही में कटक हिंसा के बाद शांति की अपील की थी. हालांकि, विपक्ष का कहना है कि सत्ता में बैठे कुछ लोगों द्वारा समर्थित एक ‘इकोसिस्टम’ ऐसे अपराधों को बढ़ावा दे रहा है. ईसाई समुदाय के खिलाफ भी हमले बढ़े हैं; दिसंबर 2024 में दो आदिवासी महिलाओं को धर्मांतरण के आरोप में पेड़ से बांधकर पीटा गया था. रिपोर्ट के मुताबिक, एनसीआरबी (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) का डेटा दिखाता है कि 2019 में राज्य में सांप्रदायिक घटनाओं की संख्या शून्य थी, जो 2023 में बढ़कर 44 हो गई.
उत्तराखंड में मुसलमानों पर हमलों का बढ़ता सिलसिला, फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में पुलिस और प्रशासन पर गंभीर सवाल
उत्तराखंड में हाल के महीनों में हुई हिंसा को लेकर एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) की एक फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट सामने आई है. रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में खासतौर पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया गया है और कई मामलों में पुलिस की निष्क्रियता और प्रशासन की पक्षपाती भूमिका देखने को मिली है.
रिपोर्ट के अनुसार, उत्तरकाशी, श्रीनगर, गौचर, काशीपुर, हरिद्वार, नैनीताल, देहरादून, ऊधम सिंह नगर, हल्द्वानी और वन गुर्जर इलाकों में हिंसा की घटनाएं दर्ज की गईं. इन घटनाओं में मुस्लिमों के घर, दुकानें और धार्मिक स्थल सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए.
रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसा की घटनाओं में आगज़नी, पथराव, तोड़फोड़, धमकियां और जबरन पलायन जैसे मामले सामने आए. कई बार यह हिंसा हिंदुत्व संगठनों की रैलियों या मुस्लिम पहचान से जुड़ी अफवाहों के बाद भड़की. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई जगहों पर पुलिस मौजूद होने के बावजूद हिंसा नहीं रोकी गई. कई मामलों में एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई या फिर चुनिंदा लोगों के ख़िलाफ़ ही कार्रवाई की गई.
पीड़ितों का आरोप है कि मुस्लिम लोगों पर “कानून व्यवस्था बनाए रखने” के नाम पर कार्रवाई की गई, जबकि नफरत भरे भाषण देने वाले लोगों पर कोई सख़्त कदम नहीं उठाया गया, जबकि उनके भाषणों के वीडियो सबूत मौजूद थे. रिपोर्ट के मुताबिक, सांप्रदायिक तनाव के बाद मुस्लिमों पर ज़्यादा संख्या में प्रतिबंधात्मक धाराएं लगाई गईं, जबकि हिंदुत्व से जुड़े संगठनों के कार्यक्रमों पर ऐसी रोक नहीं लगी. इसे रिपोर्ट में भेदभावपूर्ण पुलिसिंग बताया गया है.
इसके अलावा, प्रशासन की ओर से सामूहिक सजा जैसी कार्रवाइयों का भी जिक्र किया गया है. इनमें बिना नोटिस मकान गिराने की धमकी, संपत्तियां सील करना और बेदखली जैसे कदम शामिल हैं. रिपोर्ट कहती है कि ऐसे कदम संविधान में दिए गए अधिकारों के खिलाफ हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हिंसा का असर सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी पड़ा है. कई मुस्लिम परिवार डर के कारण अपने घर छोड़कर चले गए. महिलाओं, बच्चों और दिहाड़ी मज़दूरों को सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ. कई जगहों पर बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई.
रिपोर्ट ने उत्तराखंड की स्थिति को देशभर में बढ़ रही उस प्रवृत्ति से जोड़ा है, जहां प्रशासनिक ताकत का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है. इसमें चेतावनी दी गई है कि अगर इस पर रोक नहीं लगी तो हालात और बिगड़ सकते हैं.
अंत में रिपोर्ट में मांग की गई है कि इन घटनाओं की स्वतंत्र न्यायिक जांच हो, नफरत फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए और संविधान के तहत सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए.
आंध्र प्रदेश में चोरी के आरोप में पश्चिम बंगाल के प्रवासी मजदूर की पीट-पीटकर हत्या
आंध्र प्रदेश के कोमरलु में बुधवार को चोरी के आरोप में पश्चिम बंगाल के एक मुस्लिम प्रवासी मजदूर की भीड़ द्वारा कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या (लिंचिंग) कर दी गई.
मंजूर आलम लस्कर, जो दक्षिण 24 परगना जिले के मगराहट पश्चिम क्षेत्र के रंगीलाबाद गांव का निवासी था, कोमरलु में एक ज़री इकाई में काम कर रहा था. मंजूर के परिवार ने आरोप लगाया है कि अपराधियों के एक समूह ने चोरी का आरोप लगाकर उसे पीट-पीटकर मार डाला.
कोलकाता से सुभेन्दु मैती की रिपोर्ट के अनुसार, परिवार ने दावा किया कि उन्हें मंगलवार को एक अज्ञात नंबर से फिरौती के लिए फोन आया था, जिसमें 25,000 रुपये की मांग की गई थी और पैसे न देने पर उसे जान से मारने की धमकी दी गई थी. बताया जा रहा है कि परिवार ने ऑनलाइन पेमेंट के जरिए 6,000 रुपये ट्रांसफर भी किए थे, लेकिन अगले दिन उन्हें मंजूर की मौत की सूचना मिली.
इस बीच, मगराहट की स्थानीय टीएमसी इकाई ने आरोप लगाया है कि कोमरलु में भाजपा कार्यकर्ता और समर्थक मंजूर की मौत में शामिल थे. यह हत्या एक अन्य बंगाली प्रवासी मजदूर, मुर्शिदाबाद के बेलडांगा निवासी अलाउद्दीन शेख की पड़ोसी राज्य झारखंड में हुई हत्या के कुछ ही दिनों बाद हुई है. अलाउद्दीन की हत्या बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में की गई थी. उस घटना के विरोध में स्थानीय लोगों ने बेलडांगा में रेलवे ट्रैक और राष्ट्रीय राजमार्ग-12 को जाम कर दिया था, जिससे भारी व्यवधान पैदा हुआ था.
चीन से मुकाबला करने के लिए भारत को चीन की ही ज़रूरत: एफडीआई नियमों में ढील
भारत सरकार चीनी कंपनियों के लिए सरकारी ठेकों की बोली लगाने पर लगी रोक को हटाने की तैयारी कर रही है. हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त मंत्रालय 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद लगाए गए इन प्रतिबंधों को खत्म करने जा रहा है. उस समय नियमों के तहत चीनी बोलीदाताओं को भारतीय सरकारी समिति के साथ पंजीकरण करना और सुरक्षा मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया गया था. रॉयटर्स के अनुसार, इसके चलते चीन को 700-750 बिलियन डॉलर के ठेकों से हाथ धोना पड़ा था.
दिलचस्प बात यह है कि जब रिश्ते बेहतर थे, तब भी भारत में चीन का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) कम ही था (2000-2021 के बीच 1% से भी कम). डेंटन्स लिंक लीगल के पार्टनर संतोष पाई ने ‘द हिंदू’ को बताया कि चीनी निवेश अक्सर टैक्स हैवन देशों के जरिए ‘अप्रत्यक्ष’ रूप से आता था, जिस पर 2020 के ‘प्रेस नोट 3’ ने पूरी तरह रोक लगा दी थी.
अब वित्त मंत्रालय के 2023-24 के आर्थिक सर्वेक्षण में सुझाव दिया गया है कि चीन से एफडीआई बढ़ने से भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन में हिस्सेदारी बढ़ाने और निर्यात को धक्का देने में मदद मिल सकती है. अमेरिका और यूरोप अब चीन से सीधे आयात कम कर रहे हैं. 2016 में अमेरिका के स्मार्टफोन आयात में चीन की हिस्सेदारी 60% थी, जो अब घटकर 22% रह गई है. भारत इसका फायदा उठा रहा है, लेकिन रिपोर्ट का तर्क है कि बिना चीनी पुर्जों और कंपनियों के सहयोग के, भारत के लिए ग्लोबल सप्लाई चेन को अपनी ओर खींचना मुश्किल होगा.
हालांकि, आँकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में भारत में चीनी एफडीआई का स्टॉक गिरा है और भारत चीनी निवेशकों की प्राथमिकता सूची में 19 पायदान नीचे खिसक गया है. संतोष पाई का कहना है कि 2020 के प्रतिबंधों ने निवेश के लिए एक अप्रत्याशित माहौल बना दिया था, जिसे अब सुधारा जा सकता है.
ट्रंप के टैरिफ के बाद भारत ने रूसी तेल खरीदना बंद किया: अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी का दावा
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने दावा किया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मॉस्को से तेल खरीदने वाले देशों पर 25% टैरिफ लगाने के बाद भारत ने रूस से तेल खरीदना “बंद” कर दिया है. हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, फॉक्स बिजनेस से बात करते हुए बेसेंट ने कहा, “भारत ने यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद रूसी तेल खरीदना शुरू किया था, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा 25% टैरिफ लगाने के बाद भारत पीछे हट गया है और खरीदारी रोक दी है.”
गौरतलब है कि ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगाया है, जिसमें रूसी तेल की खरीद के लिए 25% शामिल है. भारत ने पहले अमेरिकी कार्रवाई को “अनुचित और तर्कहीन” बताया था और कहा था कि उसकी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हित से तय होती है.
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के डेटा के मुताबिक, रिलायंस इंडस्ट्रीज और सरकारी रिफाइनरियों द्वारा आयात घटाने के बाद दिसंबर में भारत रूसी जीवाश्म ईंधन के खरीदारों में तीसरे स्थान पर खिसक गया है. बेसेंट ने यह भी कहा कि सीनेटर लिंडसे ग्राहम एक बिल ला रहे हैं जिसमें रूसी तेल की री-सेलिंग पर 500% टैरिफ का प्रस्ताव है. उन्होंने यूरोप पर भी निशाना साधते हुए कहा कि वे अभी भी रूसी तेल खरीदकर अपने खिलाफ ही युद्ध की फंडिंग कर रहे हैं.
ट्रंप के “बोर्ड ऑफ पीस” के हस्ताक्षर समारोह में भारत नहीं, चीन, यूके और जर्मनी ने भी दूरी बनाई
भारत उन देशों में शामिल था जो गुरुवार को दावोस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा उनके “बोर्ड ऑफ पीस” (शांति बोर्ड) के अनावरण के समय उपस्थित नहीं थे. इस पहल का उद्देश्य गाजा में स्थायी शांति लाने की दिशा में काम करना और संभवतः वैश्विक संघर्षों को हल करना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन कई वैश्विक नेताओं में शामिल थे, जिन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस बोर्ड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है. इस बोर्ड की घोषणा इज़राइल और हमास के बीच गाजा पट्टी में युद्धविराम समझौते के दूसरे चरण के तहत की गई थी.
‘पीटीआई’ के अनुसार, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, चीन, जर्मनी और कई अन्य प्रमुख देशों ने भी ट्रंप के “बोर्ड ऑफ पीस” के हस्ताक्षर समारोह से दूरी बनाए रखी. ट्रंप ने इस समारोह की मेजबानी स्विस पर्वतीय रिसॉर्ट (दावोस) में वार्षिक विश्व आर्थिक मंच के इतर की थी. मामले से परिचित लोगों ने बताया कि पीएम मोदी को ट्रंप के निमंत्रण के बारे में पूछे जाने पर भारत ने अभी इस पर कोई फैसला नहीं लिया है. पता चला है कि नई दिल्ली विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रही है क्योंकि इस पहल में संवेदनशील मुद्दे शामिल हैं.
भारत लंबे समय से फिलिस्तीन मुद्दे के “दो-राष्ट्र समाधान” पर जोर देता रहा है, जिसमें इज़राइल और फिलिस्तीन मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर शांति और सुरक्षा के साथ साथ-साथ रहें. “बोर्ड ऑफ पीस” में शामिल होने वाले देशों में अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, कजाकिस्तान, मोरक्को, पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और वियतनाम शामिल हैं. जर्मनी, इटली, पराग्वे, रूस, स्लोवेनिया, तुर्की और यूक्रेन सहित कई देशों ने इस निमंत्रण पर अभी तक कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई है.
वाशिंगटन द्वारा ट्रंप के “बोर्ड ऑफ पीस” (शांति बोर्ड) को गाजा और उससे आगे शांति और स्थिरता लाने के लिए एक नए अंतरराष्ट्रीय निकाय के रूप में पेश किया जा रहा है, जिससे ये अटकलें तेज हो गई हैं कि यह संयुक्त राष्ट्र के लिए एक चुनौती बन सकता है. मूल रूप से, इस नए निकाय को गाजा के शासन की देखरेख और पुनर्विकास के लिए फंडिंग (वित्तपोषण) के समन्वय का काम सौंपा जाना था, क्योंकि दो साल के इजरायली सैन्य हमले के दौरान यह क्षेत्र पूरी तरह तबाह हो गया है.
हालांकि, बोर्ड का “चार्टर” (घोषणापत्र) कहता है कि यह “एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो स्थिरता को बढ़ावा देने, भरोसेमंद और कानूनी शासन को बहाल करने और संघर्ष से प्रभावित या खतरे वाले क्षेत्रों में स्थायी शांति सुरक्षित करने का प्रयास करता है.” इसमें यह भी कहा गया है कि टिकाऊ शांति के लिए व्यावहारिक निर्णय, सामान्य समझ (कॉमन सेंस) वाले समाधान और उन दृष्टिकोणों व संस्थानों को छोड़ने के साहस की आवश्यकता है जो अक्सर विफल रहे हैं.
बोर्ड के शीर्ष स्तर में ट्रंप के नेतृत्व में “विशेष रूप से” राष्ट्राध्यक्ष शामिल होंगे. वाशिंगटन ने पहले ही घोषणा कर दी है कि “बोर्ड ऑफ पीस” ट्रंप की 20-सूत्रीय योजना को पूरा करने में अनिवार्य भूमिका निभाएगा, जिसमें रणनीतिक देखरेख प्रदान करना, अंतरराष्ट्रीय संसाधनों को जुटाना और जवाबदेही सुनिश्चित करना शामिल है, क्योंकि “गाजा संघर्ष से शांति और विकास की ओर बढ़ रहा है.”
अमेरिकी खतरा: ट्रंप कमजोरी पर झपटते हैं, लेकिन ताकत के सामने पीछे हट जाते हैं
न्यूयॉर्क टाइम्स में निकोलस क्रिस्टोफ लिखते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप कमजोरी पर झपटते हैं, लेकिन ताकत के सामने पीछे हट जाते हैं. यूरोप की मौजूदा मुसीबत का कारण यही है कि वे पुतिन और ट्रंप दोनों के प्रति बहुत लंबे समय तक नरम रहे. ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जा करने और नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) को खत्म करने की धमकी दे रहे थे, लेकिन जब यूरोपीय नेताओं ने कड़ा रुख अपनाया, तो दावोस में ट्रंप को थोड़ा पीछे हटना पड़ा.
लेखक लिखते हैं, “शायद ट्रंप की ग्रीनलैंड की मांगों के झटके ने आखिरकार दुनिया के नेताओं को ‘अमेरिकी खतरे’ के प्रति जगा दिया है.” बेल्जियम के प्रधानमंत्री और पोलैंड के डोनाल्ड टस्क ने अब तुष्टीकरण को कमजोरी बताया है. सबसे प्रभावशाली जवाब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की ओर से आया, जिन्होंने दावोस में कहा, “जब नियम अब आपकी रक्षा नहीं करते, तो आपको अपनी रक्षा खुद करनी होगी.”
विडंबना यह है कि ट्रंप राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर ग्रीनलैंड मांग रहे हैं, लेकिन उनकी हरकतों से सबसे ज्यादा फायदा पुतिन को हो रहा है, जो नाटो का विनाश चाहते हैं. क्रिस्टोफ एक अमेरिकी के रूप में दर्द के साथ लिखते हैं, “दुनिया के नेताओं से मेरी अपील है: अमेरिका को खुश करने की कोशिश न करें.”
दावोस में ज़ेलेंस्की: ट्रंप ने यूरोप की कमजोरी को बेनकाब किया
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने दावोस में अपने संबोधन की शुरुआत यूरोपीय नेताओं को फटकार लगाते हुए की. एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, ज़ेलेंस्की ने कहा कि यूरोपीय देश रूस को दंडित करने या महाद्वीप की रक्षा करने के लिए ‘हार्ड पावर’ का उपयोग करने में झिझक रहे हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने यूरोप को जो “वेक-अप कॉल” (चेतावनी) दी है, वह बहुत पहले मिल जानी चाहिए थी.
ज़ेलेंस्की ने कहा, “अगर यूरोप एक वैश्विक ताकत के रूप में नहीं देखा गया, तो वह हमेशा प्रतिक्रिया ही देता रह जाएगा.” उन्होंने घोषणा की कि अमेरिका, यूक्रेन और रूस के अधिकारी शुक्रवार और शनिवार को अबू धाबी में त्रिपक्षीय वार्ता करेंगे. यह बयान राष्ट्रपति ट्रंप के साथ उनकी एक घंटे की मुलाकात के बाद आया, जिसे दोनों ने “बहुत अच्छा” बताया.
ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर मॉस्को जाकर पुतिन से मिलने वाले हैं. ज़ेलेंस्की ने ‘ग्राउंडहॉग डे’ फिल्म का हवाला देते हुए कहा कि एक साल बीत गया है लेकिन कुछ नहीं बदला. उन्होंने यूरोपीय नेताओं से कहा, “बौद्धिक चर्चाओं से युद्ध नहीं रुकते. हमें कार्रवाई की जरूरत है.”
उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में “हिम-सूखे” का संकट; बर्फ की सफेद चादर इस बार नदारद
केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री जैसे उच्च-ऊंचाई वाले तीर्थस्थलों और नैनीताल व अल्मोड़ा जैसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर सर्दियों की पहचान मानी जाने वाली बर्फ की पारंपरिक सफेद चादर इस बार नदारद है. बर्फबारी और सर्दियों की महत्वपूर्ण बारिश के लगभग पूर्ण अभाव ने स्थानीय निवासियों और पर्यटकों को उलझन में डाल दिया है. इस घटना ने मौसम विज्ञानियों और भूवैज्ञानिकों को भी गहरी चिंता में डाल दिया है.
वर्ष 2025 का समापन नवंबर और दिसंबर में बिना किसी महत्वपूर्ण वर्षा के हो गया. अब जबकि जनवरी 2026 भी खत्म होने को है, इस सीजन की पहली बड़ी बर्फबारी की उम्मीद तेजी से धुंधली पड़ती जा रही है, जो इस क्षेत्र के स्थापित जलवायु चक्र में एक नाटकीय व्यवधान का संकेत है.
हिंदू कुश-हिमालय (एचकेएच) क्षेत्र में इस अभूतपूर्व “हिम-सूखे” का सीधा कारण तेजी से बढ़ते जलवायु परिवर्तन को माना जा रहा है. देहरादून स्थित ‘वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी’ (डब्ल्यूआईएचजी) के शोध ग्लेशियरों के स्वास्थ्य की एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं, जिसमें उत्तराखंड के महत्वपूर्ण ग्लेशियरों में पिघलने की खतरनाक दर देखी गई है.
डब्ल्यूआईएचजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता ने वर्षा के समय में दशकों से आ रहे महत्वपूर्ण बदलावों पर जोर दिया. डॉ. मेहता ने ‘नरेंद्र सेठी’ को बताया, “पिछले 15 से 20 वर्षों में बर्फबारी के पैटर्न में बड़ा बदलाव आया है. पहले, अधिकांश बर्फ दिसंबर-जनवरी में गिरती थी और वह बर्फ अधिक घनी और शुष्क होती थी. अब, वर्षा देरी से यानी फरवरी और अप्रैल के बीच हो रही है, और इस बर्फ में पानी की मात्रा अधिक होती है, जिसके कारण यह तेजी से पिघल जाती है.”
समय का यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है. सीजन के अंत में होने वाली बर्फबारी, जब वातावरण का तापमान पहले से ही बढ़ रहा होता है, उसके परिणामस्वरूप बर्फ की परत का प्रभावी संचय नहीं हो पाता है.
तेजी से पिघलने का अर्थ है कि ग्लेशियरों को पर्याप्त पुनर्भरण (रिचार्ज) नहीं मिल पा रहा है, जिससे उनके द्रव्यमान में भारी कमी आ रही है. यह खुलासा गंगोत्री ग्लेशियर को लेकर मौजूदा चिंताओं को और बढ़ा देता है, जिसके बारे में पहले से ही ज्ञात है कि यह लगभग 19 मीटर प्रति वर्ष की चिंताजनक दर से पीछे खिसक रहा है.
डॉ. मेहता ने ऐतिहासिक आंकड़ों का हवाला देते हुए इस गंभीरता को और रेखांकित किया: “हम जोशीमठ जैसे क्षेत्रों में 4 से 5 फीट बर्फबारी दर्ज करते थे, लेकिन अब एक फीट भी दुर्लभ है.”
हिंदू कुश-हिमालय का अध्ययन इन स्थानीय अवलोकनों की पुष्टि करता है, जिससे पता चलता है कि विश्लेषण किए गए 17 वर्षों के दौरान पूरे क्षेत्र में बर्फ की चादर (स्नो कवर) की अवधि सालाना औसतन 0.6 से 1.5 दिन कम हो रही है. यह रुझान दर्शाता है कि सर्दियां न केवल गर्म होती जा रही हैं, बल्कि मापने योग्य रूप से छोटी और कम प्रभावशाली भी हो रही हैं. वर्तमान में सबसे तेज़ पिघलाव 3,000 से 6,000 मीटर के बीच की ऊँचाई पर देखा जा रहा है.
डब्ल्यूआईएचजी के पूर्व वैज्ञानिक और हिमनद विज्ञानी (ग्लेशियोलॉजिस्ट) डॉ. डी.पी. डोभाल, जिन्होंने उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में हिमालयी ग्लेशियरों पर व्यापक शोध किया है, ने इस संकट को तेजी से बढ़ती जलवायु अस्थिरता से जोड़ा है. डॉ. डोभाल ने समझाया, “हिमालय को अक्सर ‘तीसरा ध्रुव’ (थर्ड पोल) कहा जाता है, क्योंकि आर्कटिक और अंटार्कटिक के बाहर बर्फ का सबसे बड़ा भंडार यहीं है. नेपाल सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में 16,000 से अधिक ग्लेशियर हैं, और उनका स्वास्थ्य पूरी तरह से निरंतर होने वाली बर्फबारी पर निर्भर है. “
डॉ. डोभाल ने उल्लेख किया कि बर्फ की चादर में गिरावट लगभग 10 से 15 साल पहले स्पष्ट रूप से शुरू हुई थी, जिससे बर्फ से ढके क्षेत्र में मापने योग्य कमी आई है. वर्तमान परिदृश्य केवल पर्यटकों के लिए निराशा की बात नहीं है; बल्कि यह जल सुरक्षा और पर्वतीय स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा पैदा करता है.
डॉ. डोभाल ने चेतावनी देते हुए कहा, “छोटे ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, शेष हिमनद बर्फ में दरारें पड़ रही हैं. इस अस्थिरता ने अब हिमस्खलन (एवलान्च) के खतरे को बढ़ा दिया है.”
1984 सिख विरोधी दंगों के मामले में साज़िश के आरोप से सज्जन कुमार बरी, अन्य मामलों में सज़ा बरक़रार
दिल्ली की एक अदालत ने गुरुवार, 22 जनवरी 2026 को 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले में पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को बरी कर दिया. यह मामला दिल्ली के जनकपुरी और विकासपुरी इलाकों में हिंसा भड़काने से जुड़ा था. विशेष जज दिग्विनय सिंह ने मौखिक आदेश में सज्जन कुमार को दोषमुक्त किया, जबकि विस्तृत आदेश बाद में जारी किया जाएगा.
इससे पहले अगस्त 2023 में अदालत ने उन पर दंगा भड़काने और दुश्मनी फैलाने के आरोप तय किए थे, लेकिन हत्या और आपराधिक साज़िश के आरोपों से मुक्त कर दिया था. यह मामला 2015 में दर्ज दो एफआईआर से जुड़ा था, जिनमें नवंबर 1984 में जनकपुरी में सोहन सिंह और उनके दामाद अवतार सिंह की हत्या, और विकासपुरी में गुरचरण सिंह को ज़िंदा जलाने का आरोप शामिल था.
हालांकि, सज्जन कुमार इस समय जेल में ही हैं. उन्हें फरवरी 2025 में सरस्वती विहार इलाके में 1984 के दंगों के दौरान जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या के मामले में उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई थी. दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले भी उन्हें पालम कॉलोनी में पांच लोगों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया था. नानावटी आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 1984 के दंगों में दिल्ली में 2,733 लोगों की मौत हुई थी और 587 एफआईआर दर्ज की गई थीं, जिनमें से अधिकतर मामलों में या तो केस बंद हो गए या आरोपी बरी हो गए.सज्जन कुमार की उम्रकैद की सज़ा के ख़िलाफ़ अपील फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.
कर्नाटक सरकार की नई पहल: छात्राओं को मुफ्त में मिलेंगे मेंस्ट्रुअल कप, सेहत और पर्यावरण दोनों को फायदा
कर्नाटक सरकार ने 7 जनवरी को एक बड़ी योजना की घोषणा की है, जिसके तहत राज्य की 10 लाख से ज़्यादा छात्राओं को मुफ्त में मेंस्ट्रुअल कप दिए जाएंगे. यह योजना कक्षा 9 से 12 तक की छात्राओं के लिए होगी और अगले शैक्षणिक सत्र से लागू की जाएगी. इसके साथ ही सैनिटरी पैड भी उपलब्ध रहेंगे.
सरकार का कहना है कि मेंस्ट्रुअल कप दोबारा इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जिससे हर साल लाखों पैड कचरे में जाने से बचेंगे और सरकार को करीब 16 करोड़ रुपये की बचत होगी. इस फैसले के साथ कर्नाटक देश का पहला राज्य बन गया है जिसने राज्य स्तर पर मेंस्ट्रुअल कप को अपनाने की पहल की है.
कुछ महीने पहले ही कर्नाटक सरकार ने पीरियड लीव लागू की थी. अब मेंस्ट्रुअल कप को बढ़ावा देकर सरकार ने माहवारी से जुड़े सामाजिक टैबू को तोड़ने और लड़कियों को सशक्त बनाने की दिशा में एक और कदम उठाया है.
मेंस्ट्रुअल कप न केवल सस्ते और पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं, बल्कि ये ज़्यादा आरामदायक भी होते हैं. एक कप पैड से तीन गुना ज्यादा रक्त रोक सकता है, जिससे बार-बार बदलने की ज़रुरत नहीं पड़ती और रिसाव का डर भी कम होता है.
द स्क्रॉल की रिपोर्ट में आसन की संस्थापक इरा गुहा लिखती हैं कि ‘आसन’ ने 2021 से 2025 के बीच 1 लाख से ज़्यादा मुफ्त मेंस्ट्रुअल कप बांटे हैं, जिनमें से आधे से ज़्यादा ग्रामीण कर्नाटक की महिलाओं और लड़कियों को दिए गए. अनुभव में सामने आया कि इससे पैसों की बचत हुई, स्कूल-कॉलेज में उपस्थिति बढ़ी, त्वचा संक्रमण कम हुए और पीरियड्स से जुड़ा तनाव भी घटा. अगर यह योजना सही तरीके से लागू होती है, तो यह लाखों छात्राओं की ज़िंदगी आसान बना सकती है. इससे न सिर्फ पढ़ाई में सुधार होगा, बल्कि भारत के दूसरे राज्यों के लिए भी यह एक मिसाल बनेगी.
जम्मू-कश्मीर में सेना का वाहन गहरी खाई में गिरा, 10 जवानों की मौत, 11 घायल
जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में गुरुवार को सेना का एक बख्तरबंद वाहन सड़क से फिसलकर 200 फीट गहरी खाई में गिर गया, जिससे सेना के 10 जवानों की मौत हो गई और 11 अन्य घायल हो गए.
सेना की जम्मू स्थित ‘व्हाइट नाइट कॉर्प्स’ के अनुसार, एक ऑपरेशन के लिए सैनिकों को ले जा रहा सेना का वाहन डोडा के सामान्य क्षेत्र में खराब मौसम के दौरान दुर्गम रास्तों से गुजरते समय सड़क से फिसल गया.
अधिकारियों ने बताया कि 21 कर्मियों को ले जा रहा यह बख्तरबंद वाहन भद्रवाह-चंबा मार्ग पर 9000 फीट की ऊंचाई पर स्थित ‘खन्नी टॉप’ के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया. दुर्घटना के तुरंत बाद, घायल सैनिकों को बाहर निकालने के लिए सेना, पुलिस और स्थानीय निवासियों द्वारा बचाव अभियान शुरू किया गया.
फ़ैयाज़ वानी के मुताबिक, गंभीर रूप से घायल सैनिकों को विशेष उपचार के लिए हवाई मार्ग (एयरलिफ्ट) से उधमपुर सैन्य अस्पताल ले जाया गया है. खाई में गिरने के बाद सेना का वाहन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था.
भोजशाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने बसंत पंचमी पर हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों को पूजा और नमाज की अनुमति दी
सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर में शुक्रवार को बसंत पंचमी के अवसर पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदू प्रार्थनाओं की अनुमति दे दी है. साथ ही, उसी दिन दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक मुसलमानों को नमाज अदा करने की अनुमति भी दी गई है. शीर्ष अदालत ने गुरुवार को यह निर्देश भी दिया कि नमाज के लिए आने वाले मुस्लिम समुदाय के व्यक्तियों की सूची जिला प्रशासन को सौंपी जाए.
‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस और पीटीआई’ की खबर है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पांचोली की पीठ ने जिला प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का आदेश दिया, ताकि कोई अप्रिय घटना न हो. पीठ ने कहा, “हम दोनों पक्षों से आपसी सम्मान, सहिष्णुता बनाए रखने और स्थानीय प्रशासन के साथ सहयोग करने की अपील करते हैं.” हिंदू और मुस्लिम समूहों ने 23 जनवरी को भोजशाला परिसर में धार्मिक गतिविधियों के लिए अनुमति मांगी थी. 23 जनवरी को शुक्रवार है और इसी दिन बसंत पंचमी के अवसर पर सरस्वती पूजा भी आयोजित की जाएगी.
यह मंदिर-मस्जिद परिसर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित 11वीं शताब्दी का एक स्मारक है, जिसे हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के लिए महत्वपूर्ण पूजा स्थल माना जाता है. हिंदू भोजशाला को वाग्देवी (देवी सरस्वती) को समर्पित मंदिर मानते हैं, जबकि मुस्लिम इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद कहते हैं.
7 अप्रैल 2003 को एएसआई द्वारा की गई एक व्यवस्था के तहत, हिंदू मंगलवार को भोजशाला परिसर में पूजा करते हैं और मुस्लिम शुक्रवार को परिसर में ‘नमाज’ अदा करते हैं.
शीर्ष अदालत ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें बसंत पंचमी पर हिंदुओं को पूजा करने के विशेष अधिकार देने की मांग की गई थी. अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन के माध्यम से दायर इस याचिका में कहा गया था कि एएसआई का 2003 का आदेश उन स्थितियों का समाधान नहीं करता है, जहां बसंत पंचमी और शुक्रवार की नमाज एक ही दिन पड़ जाती है. उन्होंने बसंत पंचमी के दिन हिंदुओं के लिए पूरे दिन विशेष और निर्बाध पूजा अधिकारों की मांग की थी. मस्जिद समिति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने कहा कि शुक्रवार की नमाज दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच होती है, और उसके बाद परिसर खाली किया जा सकता है. केंद्र और एएसआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने अदालत को आश्वासन दिया कि जिला प्रशासन कानून-व्यवस्था की स्थिति का पूरा ध्यान रखेगा.
टी20: बांग्लादेश का भारत में खेलने से इनकार, टूर्नामेंट से बाहर करने की चेतावनी का असर नहीं
बांग्लादेश ने 2026 टी20 विश्व कप पर अपना रुख कड़ा कर लिया है. उसने जोर देकर फिर कहा है कि वह भारत में अपने मैच नहीं खेलेगा और इसके बजाय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) पर अपने मैच श्रीलंका स्थानांतरित करने का दबाव बनाएगा. यह स्थिति तब है जब आईसीसी ने कल कहा था कि उसे भारत में ही अपने मैच खेलने होंगे और चेतावनी दी गई है कि ऐसा न करने पर उसे टूर्नामेंट से बाहर कर किसी दूसरी टीम को शामिल किया जा सकता है.
“द टेलीग्राफ” के अनुसार, ढाका में बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी), वरिष्ठ खिलाड़ियों और सरकार के खेल सलाहकार के बीच हुई एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद अधिकारियों ने कहा कि इस महीने की शुरुआत में लिए गए रुख में कोई बदलाव नहीं आया है. बैठक के बाद बीसीबी अध्यक्ष अमिनुल इस्लाम ने कहा, “हम श्रीलंका में खेलने की अपनी योजना के साथ वापस आईसीसी के पास जाएंगे. उन्होंने हमें 24 घंटे का अल्टीमेटम जरूर दिया है, लेकिन एक वैश्विक संस्था वास्तव में ऐसा नहीं कर सकती. आईसीसी विश्व कप देखने वाले 20 करोड़ लोगों को खो देगी. यह उनका नुकसान होगा. आईसीसी श्रीलंका को सह-मेजबान कह रही है, जबकि वे सह-मेजबान नहीं हैं. यह एक हाइब्रिड मॉडल है. आईसीसी की बैठक में मैंने जो कुछ बातें सुनीं, वे चौंकाने वाली थीं.”
सरकारी खेल सलाहकार आसिफ नजरूल ने रेखांकित किया कि भारत की यात्रा न करने का निर्णय उच्चतम स्तर पर लिया गया है. उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि आईसीसी हमें श्रीलंका में खेलने का अवसर देगी. यह हमारी सरकार है, जिसने भारत न जाने का फैसला किया है.”
विश्लेषण
औरंगज़ेब बनाम मोदी: मंदिर विध्वंस, सत्ता और पाखंड की राजनीति
अरुण श्रीवास्तव
सुनो दोस्तों, आज की कहानी जुड़ी है इतिहास के पन्नों और आज की हक़ीक़त से. एक तरफ़ मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब है और दूसरी तरफ़ आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.
जहाँ औरंगज़ेब को मंदिर तोड़ने के लिए बदनाम किया जाता है, वहीं इतिहासकार मानते हैं कि उसने दर्जन भर या ज़्यादा से ज़्यादा सोलह मंदिरों को तुड़वाया होगा. लेकिन भगवा रंग में रंगे कट्टरपंथी इस गिनती को हज़ारों में बताते हैं. इसके बिल्कुल उलट, खुद को ‘हिंदू हृदय सम्राट’ कहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी कॉरिडोर बनाने के लिए 40 से 50 प्राचीन मंदिरों को तुड़वा दिया. इनमें से कुछ तो समुद्रगुप्त के ज़माने के थे और शिल्पकला का बेहतरीन नमूना थे.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, यानी आरएसएस जो खुद को हिंदू धर्म और हिंदुत्व का ठेकेदार मानता है, कहता है कि 17वीं सदी का औरंगज़ेब भारत के “ethos” यानी मूल-भावना से मेल नहीं खाता. अगर यही तर्क लगाया जाए, तो आरएसएस को मोदी पर भी यही सवाल उठाना चाहिए. क्या मोदी भारत की मूल-भावना और धार्मिक नैतिकता का पालन कर रहे हैं?
चलो ज़रा औरंगज़ेब की बात करते हैं. उसने मंदिर क्यों तोड़े? इसके पीछे कई वजह थीं—धार्मिक कट्टरता, राजनीति, विद्रोह को कुचलना और पैसा ज़ब्त करना. लेकिन उसका रवैया हमेशा हिंदू-विरोधी नहीं था. उसने हिंदुओं को नौकरियां दीं, कई मंदिरों को छोड़ा और कुछ को ग्रांट्स भी दीं. अक्सर वही मंदिर तोड़े गए जो विद्रोहियों के अड्डे बन गए थे. मतलब यह सिर्फ़ धार्मिक नफ़रत नहीं, बल्कि एक पेचीदा राजनीति थी.
दूसरी तरफ़ मोदी हैं, जिन्होंने वाराणसी, जो उनका संसदीय क्षेत्र है, वहाँ टूरिज़्म बढ़ाने और सुंदरता के नाम पर मंदिर और सांस्कृतिक धरोहरें तुड़वा दीं. 2019 में शुरू हुए काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का मक़सद मंदिर को सीधे गंगा से जोड़ना था. इस चक्कर में क़रीब 300 से 400 पुराने घर और मंदिर ज़मींदोज़ कर दिए गए. अगर मुग़लों ने अपनी शाही ताक़त दिखाने के लिए मंदिर तोड़े, तो क्या मोदी के एक्शन्स को हम उनकी पर्सनल ताक़त दिखाने और क्रोनी कैपिटलिज़्म का चेहरा बनने की कोशिश मानें?
प्रोफ़ेसर रिचर्ड ईटन जैसे इतिहासकार बताते हैं कि औरंगज़ेब के 49 साल के राज में पक्के तौर पर 14 मंदिर तोड़े गए. उन्होंने 12वीं से 18वीं सदी के बीच ऐसे 80 मामले ढूँढे हैं. ईटन यह भी याद दिलाते हैं कि मंदिर तोड़ना सिर्फ़ मुस्लिम शासकों का काम नहीं था; 7वीं सदी से हिंदू राजा भी दुश्मन राजाओं की सत्ता गिराने के लिए उनके मंदिरों को लूटते और तोड़ते रहे हैं.
राइट-विंग वालों की कहानियों में शोर है कि औरंगज़ेब ने 30 से 60 हज़ार मंदिर तोड़े. लेकिन हैरानी की बात है कि यही लोग मोदी राज में वाराणसी में तोड़े गए मंदिरों पर एकदम खामोश हैं.
जब वाराणसी में तोड़-फोड़ चल रही थी, तो घरों के अंदर छिपे कई प्राचीन छोटे मंदिर मिले. सबसे शॉकिंग बात यह है कि सीएम योगी आदित्यनाथ और अफ़सरों को सब पता था, फिर भी उन्होंने इन्हें बचाने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की. बनारस मंदिरों का शहर है, प्रशासन को इसकी अहमियत न पता हो, यह नामुमकिन है.
वहाँ के रहने वाले लोग कहते हैं कि तोड़-फोड़ में कई मूर्तियाँ गंगा में फेंक दी गईं. योगी ने कहा यह सब एआई से बनी झूठी वीडियो हैं ताकि उनकी सरकार बदनाम हो. यह सिर्फ़ ज़िम्मेदारी से भागने का बहाना था. सच तो यह है कि प्रशासन की मंज़ूरी के बाद ही मंदिर तोड़े गए. कुछ बचाए गए, पर ज़्यादातर कॉरिडोर के लिए हटा दिए गए.
मार्च 2025 में आरएसएस नेता सुनील आंबेकर ने कहा कि औरंगज़ेब आज “रेलेवेंट” नहीं है और दत्तात्रेय होसबोले ने कहा वो भारतीय मूल्यों के ख़िलाफ़ है. पर मोदी किस कैटेगरी में आते हैं, यह किसी ने साफ़ नहीं किया. आरएसएस औरंगज़ेब की तुलना दारा शिकोह से करता है जो भाईचारा चाहते थे. पर मोदी तो दारा शिकोह के आदर्शों से कोसों दूर हैं. उनके ग्यारह साल के राज ने समाज में दरार गहरी की है और मुसलमानों को निशाना बनाया है. आरएसएस कहता है कि वो औपनिवेशिक मानसिकता नहीं चाहता है, पर यह तर्क अब खोखला लगता है.
आरएसएस ज्ञानवापी और मथुरा माँगता है ताकि विरासत बचा सके. तो क्या वो वाराणसी कॉरिडोर में तोड़े गए मंदिरों को भी वापस माँगेगा? उनकी चुप्पी बताती है कि जवाब ‘नहीं’ है.
आरएसएस यह मुद्दा कभी नहीं उठाएगा क्योंकि इससे उनका अपना प्लान ख़तरे में पड़ जाएगा. मोदी के ज़रिए उन्होंने संस्थाओं पर क़ब्ज़ा कर लिया है. जुलाई 2024 में सरकारी कर्मचारियों पर आरएसएस जॉइन करने का बैन हटा दिया गया. मीडिया, कोर्ट, पुलिस सब दबाए जा चुके हैं. सिर्फ़ सच्चे आध्यात्मिक साधुओं ने इसका विरोध किया है. आरएसएस “गोदी संतों” को नहीं बना पाया.
यह लड़ाई कुंभ मेले के दौरान और तेज़ हो गई जहाँ 60 श्रद्धालुओं की मौत हो गई. जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन की कमी निकाली, तो योगी उनके पीछे पड़ गए. 18 जनवरी को उनका रथ रोका गया और 19 को उन्हें ज़लील करके सबूत माँगा गया कि वो शंकराचार्य हैं भी या नहीं. इस दौरान आरएसएस बिल्कुल चुप रहा.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की बेइज़्ज़ती करके आरएसएस और योगी ने साफ़ कर दिया कि उनके लिए पारंपरिक हिंदू सत्ता की कोई वैल्यू नहीं है. मोदी राज में हिंदू रस्में अब हिंदुत्व के ऑर्डर्स पर चलती हैं. असली साधुओं को हटाना हिंदू राष्ट्र के प्लान का हिस्सा है. वाराणसी में पुराने निशान मिटाना इसी रणनीति का हिस्सा है.
प्रशासन कहता है विकास ज़रूरी है, पर मणिकर्णिका कॉरिडोर प्रोजेक्ट में जब एक मढ़ी हटाई गई तो विवाद हो गया. अहिल्याबाई होल्कर, जो बड़ी शिव-भक्त थीं, उनके परिवार और पाल समाज ने विरोध किया. अजीब बात है कि 1658 में औरंगज़ेब ने एक फ़रमान जारी किया था—जो आज भी बीएचयू (बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी) में रखा है—कि मंदिरों और ब्राह्मणों की रक्षा की जाए.
कॉरिडोर बनाते वक़्त क़रीब 286 शिवलिंग उखाड़े गए, जिनमें से सिर्फ़ 146 मिले. सरकार कहती है यह ‘रेनोवेशन’ है और मूर्तियाँ सुरक्षित हैं, लेकिन विरोध करने वालों पर एफआईआर कर दी गई ताकि उन्हें चुप कराया जा सके.
मंदिर तोड़ने का काम मोदी के गुजरात सीएम रहते वक़्त भी हुआ था. 2008 में गांधीनगर में “अतिक्रमण” के नाम पर 80 मंदिर तोड़े गए थे. महंत राजेंद्र प्रसाद तिवारी ने सही पूछा था कि लोकतंत्र में ऐसा कैसे हो सकता है? औरंगज़ेब तो तानाशाह था, पर आज के हुक्मरान तो चुने हुए हैं. फिर भी, दोनों के बर्ताव में कोई फ़र्क़ नहीं है.
यह लेख काउंटर करंट्स से साभार लिया गया है.
जेल की आवाज़ें: कैद में उम्मीदें जिद्दी बन जाती हैं , कहते हैं उमर खालिद
जब सुप्रीम कोर्ट ने जमानत खारिज की तब से जेल पहले से अधिक भीड़ भरी और अराजक हो गई है, जिसने तनहाई के लिए जंग को और तीखा बना दिया.
कैद के दौरान, मैं संगीत, पढ़ने और जानवरों की देखभाल में सुकून पाता हूँ; ये छोटी-छोटी दिनचर्याएँ मुझमें उम्मीद और मानसिक मजबूती बनाए रखने में मदद करती हैं.
इस बार अंतरिम जमानत के बाद जब मैं तिहाड़ लौटा तो वहाँ बहुत कुछ बदल चुका था. हमारे बैरक में लगभग पचास और बंदियों को रखा गया था, जबकि यह जगह पहले ही क्षमता से अधिक भर चुकी थी. इसका अर्थ यह हुआ कि पहले से भी कम सन्नाटा था. सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत खारिज किए जाने के बाद यह शांति की कमी और ज़्यादा खटकी. जब मैं अभी भी फैसले के बाद मीडिया के तूफ़ान से उबरने की कोशिश कर रहा था, तो अब टीवी समाचार और अखबारों पर लगातार रिपोर्टिंग के कारण मुझे पहचानने वालों की संख्या भी बढ़ गई थी. अब हर कोई कुछ देर मुझसे बात करना चाहता है—आखिर क्यों? जिज्ञासा से या किसी तरह के विस्मय से, कह पाना कठिन है.
मेरी कोठरी भी अब अलग सी महसूस हो रही है. जब अंतरिम जमानत के बाद मैं घर गया था, तो कहीं न कहीं अभी भी उम्मीद थी कि शायद फैसला हमारे पक्ष में होगा. इसलिए मैं अपनी सारी किताबें, नोट्स, चिट्ठियाँ, तस्वीरें और कार्ड, सब कुछ बाँध कर अपने साथ घर ले गया था. अब जब जमानत खारिज हो चुकी है और कम-से-कम अगले साल तक यहाँ से निकलने की कोई संभावना नहीं है, तो अपनी कोठरी में जो जगह मैंने बनाई थी वह एक खाली स्लेट सी लगने लगी है. शायद यह अच्छी बात है. आखिरकार यह एक नया आरम्भ है.
फैसला आने के बाद पहले कुछ दिनों का सामना करना हमेशा मुश्किल होता है. वास्तव में, जिस दिन मुझे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जमानत देने से इनकार कर दिया गया था, मैं 2022 में वापस लौट गया था जब निचली अदालत में पहली बार मेरी जमानत खारिज कर दी गई थी. अचानक आई इस खबर ने मेरे साहस को लगभग वैसी ही चोट पहुंचाई.
लेकिन यहाँ पाँच साल से अधिक समय बिताने के बाद, तीन अलग-अलग अदालतों द्वारा पाँच बार मेरी जमानत खारिज किए जाने के बाद, मुझे बेचारगी की भावना से पीछे हटने की लगभग आदत हो गई है. हालाँकि, मौसम उदासी को और बढ़ा देता है. मैं अपनी शॉल और गर्म कपड़ों की कई परतों में लिपटे सो रहा हूं, क्योंकि रात में मेरी कोठरी में लोहे के जंगलो से घुस कर आने वाली तेज हवाओं के कारण बिस्तर के रूप में इस्तेमाल सीमेंट के स्लैब पर सोना वास्तव में मुश्किल हो जाता है.
सुबह अभी भी ठीक है, जब हमें घूमने दिया जाता है और धूप निकलती है. लेकिन दोपहर 3 बजे के बाद, जब लॉकअप में लौटने का समय फिर से आता है-तभी दिमाग सुन्न सा होने लगता है. मेरा मन एक अथाह अंधेरे में घूमना शुरू कर देता है और मुझे आश्चर्य होने लगता है कि क्या मैं कभी एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में बाहर कदम रख पाऊंगा? और क्या होता है, तब भी जब जमानत हमारे रास्ते में आती है? जिन लोगों को अदालत द्वारा जमानत दी गई है, उन पर लगाए गए प्रतिबंध इतने कठोर हैं कि बाहर का जीवन शायद उतना ही बाधित रहेगा, उनकी स्वतंत्रता उतनी ही सीमित रहेगी, जितनी जेल के भीतर है. जाहिर है कि इस अंधेरे से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा.
इस बार की एक चुनौती है- टेलीविजन मेरे हाथ से निकल गया है और वह हताश कर रहा है. चूंकि इन दिनों टीवी पर आने वाली अधिकांश फिल्में काफी विषाक्त हैं, खबरें और भी अधिक हैं. मेरी उम्मीद टिकी हैं सीमित गाने वाले रेडियो पर, जिस पर मैं गाने सुन सकता हूँ. कारावास के दौरान संगीत और मौन मेरे निरंतर साथी रहे हैं. उम्मीद है, मैं जल्द ही अपने लिए एक और रेडियो लेने की कोशिश करूंगा-एक फैंसी नहीं, सिर्फ गानों वाला.
मुझे तिहाड़ के जानवरों ने भी बहुत संभाला है. मैं दो बिल्लियों-शिल्पा और श्यामलाल को खाना खिलाता हूँ. आखिरकार, शिल्पा ने दो बच्चे दिए, जिनका नाम मैंने ब्लैक पैंथर और स्टुअर्ट लिटिल रखा. उनकी हर दिन की शरारतों को देखना और उनके साथ पार्टी करना मनोरंजक और दिल को छू लेने वाला दोनों है. इससे मुझे यह भी एहसास होता है कि मुझे साथ बंदी मनुष्यों की संगति की तुलना में उनकी संगति में अधिक समय बिताना पसंद आने लगा है.
यह एक ही समय में अजीब और दिलचस्प है कि जिन लोगों पर बाहर से विभिन्न अपराधों का आरोप लगाया जा सकता है, वे अपना समय जेल के अंदर बिल्लियों से लेकर पक्षियों और यहां तक कि छिपकलियों और चींटियों तक कई जानवरों को खिलाने में कैसे बिताते हैं! यहाँ एक प्रचलित अंधविश्वास है कि जानवरों को खिलाने से पुण्य (सवाब) मिलता है, जिससे जेल से आज़ादी मिल जाती है. यही कारण है कि बैरकों के फर्श पर रोटी या चीनी के छोटे-छोटे टुकड़े बिखरे हुए मिलना आम बात है, ताकि चींटियों को अच्छी तरह से खिलाया जा सके. हमारे बैरकों में सफाईकर्मी अक्सर शिकायत करते हैं, लेकिन कैदियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता. एक बार, एक कैदी, जो कुछ हफ्तों से हमारी बैरक में एक पेड़ को पानी पिला रहा था, उसे जमानत मिल गई. अगले दिन, जब वह चला गया, तो तीन अन्य लोगों ने पेड़ को पानी देने का काम संभाल लिया, इस उम्मीद में कि उनकी भी रिहाई हो जाएगी. आप देखिए, आशा कितनी जिद्दी होती है, यहां तक कि कैद में भी.
मैं फिर से अपने पढने की तरफ वापस जाने की योजना बना रहा हूं, भले ही जमानत अस्वीकृति से मैं थोडा हताश हुआ हूँ. मेरे दिमाग में पहले से ही किताबों की एक सूची है, जिन पर मुझे ध्यान देना चाहिए. इस समय स्वतंत्रता का इंतजार पहले से कहीं अधिक लंबा लगता है. इसलिए, मुझे खुद को सहेज कर रखने के लिए जो कुछ भी कर सकता हूँ, वह करना चाहिए. विशेष रूप से एक ऐसे वातावरण में, जहां मेरे खिलाफ लगाए गए आरोपों के बारे में जनता की धारणा में संदेह निश्चितता में बदल गया है. मेरे लिए मुख्यधारा के मीडिया के विमर्श में सक्रिय शब्द अब “राष्ट्र-विरोधी” नहीं है; यह “आतंकवादी” है.
जो लोग सरकार के बयान पर विश्वास करते हैं, वे मुझे कैसे समझते हैं, मैं इसे बदल नहीं सकता. लेकिन मैं वास्तव में चाहता हूं कि जो लोग मेरे साथ एकजुटता व्यक्त करें, वे समझें कि मैं उस प्रताड़ितता को अस्वीकार करता हूं जिसके साथ मुझे अक्सर दूसरों द्वारा पहचाना जाता है. इस अंतहीन प्रतीक्षा में वास्तव में पीड़ा है, लेकिन इस पीड़ा में एक सुंदरता भी है. मुझे जिस चीज का सामना करना पड़ रहा है, उसके बावजूद मैं जहां भी हूं, वहां संतुष्ट हूं, क्योंकि यह जानने में सुंदरता है कि यह अकेले मेरे बारे में नहीं है. मेरा कारावास केवल एक व्यक्ति के रूप में मुझे निशाना बनाने के लिए नहीं है; यह मेरे साथी- साथियों को एक सबक सिखाने के लिए है कि जो कोई भी शक्तियों से असहज सवाल पूछने की हिम्मत करता है, उसे बिना किसी राहत के जबरन चुप करा दिया जाता है. इसलिए, यह लड़ाई जो मैं भी लड़ रहा हूं, एक व्यक्ति के रूप में मुझसे बड़ी है। यही कारण है कि जो लोग मेरी बातों पर विश्वास करते हैं, वे इस मामले में मेरे और दूसरों के बारे में जिस भाषा में बात करते हैं, उसे बदलने की जरूरत है. हमारी लड़ाई एक दृष्टि के लिए है-हमारे समाज में एक ऐसे समय के लिए जब कुछ लोग दूसरों की तुलना में अधिक समान नहीं होंगे. यह दृढ़ विश्वास ही इस दर्द को सहनीय बनाता है. यह लगभग ईसा मसीह या भगत सिंह जैसा है. दोनों ने उत्पीड़ितों के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया और यह जानने में सुंदरता है कि यह वह कौम है जिसका मैं एक हिस्सा हूं, एक इतिहास में जो भविष्य के लिए लिखा जाएगा.
यही कारण है कि मैं हर दिन भगत सिंह की पंक्तियों को देखता हूं जो मैंने अपनी जेल की दीवार पर उकेरी हैंः
“राख का हर छोटा अणु मेरी गर्मी के साथ गति में है
मैं इतना पागल हूँ कि जेल में भी आज़ाद हूँ.”
जैसा कि अपेक्षा प्रियदर्शिनी को बताया गया था, आउट्लुक अंग्रेजी में छपे लेख का पंकज चतुर्वेदी द्वारा अनुवाद
98वें ऑस्कर: रयान कूगलर की ‘सिनर्स’ ने 16 नामांकनों के साथ रचा इतिहास
रयान कूगलर की वैम्पायर एपिक फिल्म “सिनर्स” ने गुरुवार को 98वें अकादमी पुरस्कारों (ऑस्कर) में सर्वाधिक 16 नामांकन हासिल कर सभी फिल्मों को पीछे छोड़ दिया और ऑस्कर इतिहास में सबसे ज्यादा नामांकन पाने का रिकॉर्ड बना दिया.
‘एपी’ के मुताबिक, एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज के मतदाताओं ने “सिनर्स” पर अब तक के सबसे अधिक नामांकन बरसाए. फिल्म ने “ऑल अबाउट ईव”, “टाइटैनिक” और “ला ला लैंड” द्वारा बनाए गए 14 नामांकनों के रिकॉर्ड को तोड़ दिया. सर्वश्रेष्ठ फिल्म के साथ-साथ कूगलर को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए नामांकित किया गया है. वहीं, फिल्म में दोहरी भूमिका निभाने वाले स्टार माइकल बी. जॉर्डन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में अपना पहला ऑस्कर नामांकन मिला.
नामांकनों से पहले सबसे पसंदीदा मानी जा रही पॉल थॉमस एंडरसन की पिता-पुत्री की क्रांतिकारी गाथा “वन बैटल आफ्टर अनदर” 13 नामांकनों के साथ दूसरे स्थान पर रही. इसके चार अभिनेताओं—लियोनार्डो डिकैप्रियो, टेयाना टेलर, बेनिसियो डेल टोरो और सीन पेन—को नामांकित किया गया, हालांकि नई कलाकार चेस इन्फिनिटी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री की दौड़ से बाहर रह गईं.
इन दो शीर्ष नामांकित फिल्मों के माध्यम से, फिल्म अकादमी ने दो मौलिक अमेरिकी महाकाव्यों का पूरा समर्थन किया है, जो देश के एक कठिन दौर से जुड़ते हैं. कूगलर की जिम क्रो-युग (Jim Crow-era) पर आधारित यह फिल्म—अकादमी की पसंद बनने वाली दुर्लभ हॉरर फिल्मों में से एक—अश्वेत जीवन के एक पौराणिक रूपक को पेश करती है. वहीं, “वन बैटल आफ्टर अनदर” में एक अनियंत्रित पुलिस तंत्र के बीच विद्रोह की सोई हुई भावना के पुनरुत्थान को दिखाया गया है.
दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों ही वार्नर ब्रदर्स की फिल्में हैं. नेटफ्लिक्स को बेचे जाने की विवादित प्रक्रिया के बीच, इस 102 साल पुराने स्टूडियो ने ऑस्कर नामांकनों की अपनी अब तक की सबसे शानदार सुबह देखी. चूंकि वार्नर ब्रदर्स का भविष्य—जिसे नेटफ्लिक्स 72 अरब डॉलर में खरीद रहा है—पैरामाउंट स्काईडांस की चुनौती के बीच अधर में लटका हुआ है, ऐसे में हॉलीवुड फिल्म उद्योग के इतिहास के संभावित रूप से सबसे बड़े बदलाव के लिए तैयार हो रहा है.
इस वर्ष, ऑस्कर ‘कास्टिंग’ के लिए एक नई श्रेणी की शुरुआत कर रहा है. 98वें अकादमी पुरस्कार 15 मार्च को लॉस एंजिल्स के डॉल्बी थिएटर में आयोजित किए जाएंगे. इस वर्ष, कोनन ओ’ब्रायन मेजबान (होस्ट) के रूप में वापसी करेंगे.
‘होमबाउंड’ अंतिम सूची में जगह नहीं बना पाई
इस बीच भारत की आधिकारिक ऑस्कर प्रविष्टि ‘होमबाउंड’ ‘सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म’ की ट्रॉफी की दौड़ में अंतिम सूची में जगह बनाने में विफल रही. नीरज घेवन द्वारा निर्देशित इस सामाजिक ड्रामा फिल्म में ईशान खट्टर, विशाल जेठवा और जान्हवी कपूर मुख्य भूमिकाओं में हैं. अगस्त 2025 में कोलकाता में ‘फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया’ के अध्यक्ष फिरदौसुल हसन ने इसे ऑस्कर के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुने जाने की घोषणा की थी.
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