23/01/2026: मोदी राज में रुपये की दुर्गति जारी | अडानी के शेयर भी गिरे | मुस्लिमों का भारत में ख़ैरख़्वाह कौन? | एसआईआर के कारण मौतें | टैक्स्टाइल उद्योग पर गहरी मार | ट्रंप कनाडा मुंहजोरी जारी
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
रुपये की दुर्दशा: डॉलर के मुकाबले 92 के करीब पहुँचा रुपया, विदेशी निवेश में भारी कमी.
अडानी क्रैश: अमेरिकी एजेंसी की सख्ती के बाद अडानी ग्रुप के शेयर 13% तक टूटे.
सियासी ध्रुवीकरण: श्रवण गर्ग की चेतावनी- विपक्ष से दूर हो रहा मुसलमान, लोकतंत्र के लिए खतरा.
नौकरियों पर संकट: अमेरिकी टैरिफ से भारतीय कपड़ा उद्योग बेहाल, सरकार से मांगी मदद.
शिंदे की विदाई?: बीएमसी में बीजेपी और उद्धव ठाकरे के गठबंधन की अटकलें तेज़.
बंगाल का दर्द: ममता का दावा- मतदाता सूची के डर से 110 लोगों ने की आत्महत्या.
ट्रंप का वार: कनाडा को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ से बाहर किया, पीएम कार्नी को दी चेतावनी.
डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 92 पहुंचा
डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की गिरावट लगातार जारी है. शुक्रवार को रुपये ने छह महीनों में अपनी सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट दर्ज की. विदेशी पूंजी की सतत निकासी और आयातकों द्वारा हेजिंग ने मुद्रा में कम विश्वास को उजागर किया, जिसके चलते यह डॉलर के मुकाबले लगभग ₹92 के ऐतिहासिक निचले स्तर तक गिर गया.
“द वायर” के अनुसार, बाजार में रुपया प्रति डॉलर ₹91.9650 के निचले स्तर तक फिसल गया और अंततः डॉलर के मुकाबले ₹91.96 पर बंद हुआ. अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) में गिरावट ने उस रुझान को उलट दिया है, जो 1990 के दशक से दिखाई दे रहा था. हाल के दिनों में, आरबीआई इस राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण आंकड़े को संभालने के लिए लगातार डॉलर बेच रहा है, लेकिन ऐसा लगता है कि इस गिरावट को रोकना मुश्किल था.
डॉलर के मुकाबले रुपये का यह खराब प्रदर्शन ऐसे समय में हो रहा है जब अन्य समकक्ष एशियाई मुद्राओं में वास्तव में सुधार हुआ है और उन्होंने कुछ बढ़त हासिल की है.
विश्लेषकों ने संकेत दिया है कि यह केवल अमेरिका द्वारा भारत पर दुनिया में सबसे अधिक टैरिफ (शुल्क) लगाने जैसा ‘बाहरी दबाव’ नहीं है, बल्कि इसके अन्य कारण भी हैं. मैक्लाई फाइनेंशियल सर्विसेज के उपाध्यक्ष कुणाल कुरानी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, “यह काफी हद तक वैसा ही है जैसा हमने 2025 के अधिकांश समय में देखा था. व्यापक संकेतों के बावजूद रुपया दबाव में बना हुआ है.”
भारतीय शेयर बाजार भी दबाव में हैं क्योंकि विदेशी निवेशक पिछले कुछ समय से लगातार बिकवाली कर रहे हैं. इसने आरबीआई की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है, और रुपये को मजबूती देने का उसका अभियान बहुत सफल नहीं हो पा रहा है. समाचार एजेंसियों के अनुसार, इस सप्ताह निफ्टी 50 इंडेक्स में 2.5% की गिरावट आई, जबकि नए साल के पहले महीने में भारतीय इक्विटी से विदेशी निकासी लगभग $3.5 बिलियन रही.
अमेरिकी एसईसी द्वारा समन जारी करने के बाद अडानी समूह के शेयरों में 13% तक की गिरावट
‘पीटीआई’ के अनुसार, अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों में शुक्रवार को 13 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई. यह गिरावट उन खबरों के बीच आई है, जिनमें कहा गया है कि अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (एसईसी) ने कथित धोखाधड़ी और 265 मिलियन डॉलर के रिश्वत मामले में गौतम अडानी और सागर अडानी को समन जारी करने के लिए अदालत से अनुमति मांगी है.
बीएसई पर समूह की प्रमुख कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज का शेयर 9.38 प्रतिशत गिरकर 1,891.60 रुपये, अडानी पावर 8.84 प्रतिशत गिरकर 128.35 रुपये, अडानी पोर्ट्स 7.81 प्रतिशत गिरकर 1,303.35 रुपये और अडानी टोटल गैस 7.55 प्रतिशत गिरकर 507 रुपये पर आ गया. 30 शेयरों वाले सेंसेक्स सूचकांक में अडानी पोर्ट्स सबसे ज्यादा नुकसान उठाने वाला शेयर रहा.
वहीं, अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड के शेयर 13.20 प्रतिशत टूटकर 785 रुपये पर बंद हुए. कंपनी ने दिसंबर तिमाही 2025 के लिए 5 करोड़ रुपये का समेकित शुद्ध लाभ दर्ज किया है. यह पिछले वित्तीय वर्ष की इसी तिमाही में दर्ज किए गए 474 करोड़ रुपये के शुद्ध लाभ की तुलना में साल-दर-साल 99 प्रतिशत की भारी गिरावट है. अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड (एईएसएल) के शेयरों में शेयर बाजार पर 10.57 प्रतिशत की गिरावट आई और यह 827.20 रुपये पर आ गया. इसी बीच, 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 769.67 अंक गिरकर 81,537.70 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 241.25 अंक टूटकर 25,048.65 पर आ गया.
खबरों के मुताबिक, अमेरिकी एसईसी ने ब्रुकलिन, न्यूयॉर्क की एक अदालत को बताया कि वह समन भेजने में भारतीय अधिकारियों से सहायता प्राप्त करने में असमर्थ रहा है. इसके बाद, नियामक ने गौतम अडानी और सागर अडानी को ईमेल के जरिए नोटिस भेजने की अनुमति मांगी है. यह मुकदमा नवंबर 2024 में दायर किया गया था, जिसमें गौतम अडानी और सागर अडानी पर अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड से संबंधित झूठे और भ्रामक बयान देकर अमेरिकी प्रतिभूति कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था. हालांकि, अडानी समूह ने सौर ऊर्जा अनुबंधों के लिए अनुकूल शर्तें प्राप्त करने हेतु रिश्वत देने के आरोपों को खारिज कर दिया है. समूह का कहना है कि अमेरिकी अभियोजकों के आरोप निराधार हैं और समूह सभी कानूनों का पालन कर रहा है.
बंगाल में एसआईआर के कारण रोजाना 3-4 लोग आत्महत्या कर रहे, अब तक 110 मौतें: ममता
‘टीएनआईई’ के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुक्रवार को दावा किया कि मतदाता सूची के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर पैदा हुई चिंता के कारण राज्य में हर दिन तीन से चार लोग आत्महत्या कर रहे हैं.
कुल मौतों की संख्या 110 से अधिक बताते हुए, मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि इन मौतों की जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग और भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को लेनी चाहिए, जो कथित तौर पर एसआईआर के कारण हुए तनाव और घबराहट की वजह से हुई हैं. 40 से 45 अन्य लोग अस्पतालों में अपनी जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं. इतने सालों के बाद, अब हमें यह साबित करना होगा कि क्या हम इस देश के नागरिक हैं?
उन्होंने कहा, “लोगों के अधिकार छीने जा रहे हैं और लोकतंत्र को कुचला जा रहा है.” उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा कि क्या बोस (सुभाष चंद्र) जीवित होते तो उन्हें भी ‘तार्किक विसंगति’ के नाम पर एसआईआर की सुनवाई के लिए बुलाया जाता और “उनकी भारतीय नागरिकता पर सवाल उठाया जाता.”
उल्लेखनीय है कि राज्य में कुल 7.6 करोड़ मतदाताओं में से, चुनाव आयोग ने लगभग 1.66 करोड़ मतदाताओं की “प्रामाणिकता” पर भी संदेह जताया है, जिन्हें अपने दस्तावेजों को फिर से सत्यापित करने के लिए सुनवाई के लिए बुलाया गया है. यह देखते हुए कि बंगाली अपने उपनाम (सरनेम) अलग-अलग तरीकों से लिखते हैं—अपना उदाहरण देते हुए कि उनका उपनाम ‘बनर्जी’ और ‘बंद्योपाध्याय’ दोनों तरह से लिखा जाता है—बनर्जी ने हैरानी जताई कि “एसआईआर अभ्यास करने वालों को यह बात क्यों नहीं पता है.” मुख्यमंत्री ने कहा, “ऐसे ही नामों के बेमेल होने के कारण 1.38 करोड़ लोगों को नोटिस दिया गया है.”
मोदी युग में ‘राज्य’ किस तरह मुस्लिम रोजी रोटी पर प्रहार करता है
‘द वायर’ में अंग्रेजी में प्रकाशित हर्षमंदर का यह लेख “हाउ द स्टेट एसेल्स मुस्लिम लाइवलीहुड्स इन द मोदी एरा” (मोदी युग में राज्य कैसे मुस्लिम आजीविका पर प्रहार करता है) भारत में अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर मुसलमानों की आर्थिक स्थिति और उनके रोजगार के साधनों पर हो रहे हमलों का एक विस्तृत और आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है. लेख का मुख्य तर्क यह है कि पिछले एक दशक में भारतीय राज्य (स्टेट) और सत्ताधारी विचारधारा से प्रेरित संगठनों ने मिलकर मुस्लिम समुदाय को व्यवस्थित रूप से आर्थिक रूप से हाशिए पर धकेलने का प्रयास किया है. यहां इस लेख का हिंदी में सारांश दिया गया है:
लेख की शुरुआत इस विचार से होती है कि सांप्रदायिक हिंसा अब केवल शारीरिक हमलों या दंगों तक सीमित नहीं रह गई है. अब इसका एक नया और खतरनाक रूप ‘आर्थिक बहिष्कार’ के रूप में सामने आया है. लेख के अनुसार, विभिन्न दक्षिणपंथी समूहों द्वारा खुलेआम हिंदू समाज से अपील की जाती है कि वे मुस्लिम दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और कारीगरों से सामान न खरीदें. इसे “आर्थिक जिहाद” जैसे भ्रामक शब्दों से जोड़कर प्रचारित किया जाता है, जिसका उद्देश्य मुस्लिम व्यापारियों की आय के स्रोतों को सुखा देना है.
लेख में हाल के वर्षों में उभरी ‘बुलडोजर संस्कृति’ पर कड़ा प्रहार किया गया है. उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों के उदाहरण देते हुए इसमें बताया गया है कि कैसे ‘अतिक्रमण हटाने’ के नाम पर चुनिंदा तरीके से मुस्लिम संपत्तियों को निशाना बनाया गया. तर्क है कि जब किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार की दुकान या छोटा कारखाना बिना किसी कानूनी नोटिस के ढहा दिया जाता है, तो केवल एक इमारत नहीं गिरती, बल्कि उस परिवार की पीढ़ियों की मेहनत और आजीविका का एकमात्र साधन नष्ट हो जाता है. यह प्रक्रिया कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए एक प्रकार की “सामूहिक सजा” बन गई है.
मुस्लिम समुदाय ऐतिहासिक रूप से कुछ विशेष व्यवसायों से जुड़ा रहा है, जैसे मांस का व्यापार, चमड़ा उद्योग और हस्तशिल्प. लेख के अनुसार, राज्य ने ऐसे कानून और नियम बनाए हैं, जिन्होंने इन उद्योगों को भारी चोट पहुँचाई है. गायों की रक्षा के नाम पर बनाए गए कड़े कानूनों और ‘गौ-रक्षकों’ की हिंसा ने मांस और चमड़ा उद्योग को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है. इससे न केवल मुस्लिम व्यापारी, बल्कि इस श्रृंखला से जुड़े दलित और अन्य समुदाय भी प्रभावित हुए हैं.
हाल के दिनों में हलाल उत्पादों पर प्रतिबंध या विवाद पैदा करने की कोशिशों को भी लेख में एक सोची-समझी रणनीति बताया गया है, ताकि मुस्लिम व्यवसायों को मुख्यधारा के बाजार से बाहर किया जा सके.
लेख में दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा मंदिरों के आसपास या धार्मिक मेलों (जैसे कर्नाटक के मंदिर मेले) में मुस्लिम दुकानदारों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की घटनाओं का उल्लेख है. दशकों से चले आ रहे इन साझा सांस्कृतिक और आर्थिक स्थानों से मुसलमानों को बाहर निकालना उनके सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार का एक स्पष्ट उदाहरण है. लेख कहता है कि राज्य अक्सर ऐसी गतिविधियों पर मौन रहकर या उन्हें संरक्षण देकर अपनी सहमति देता है.
इसमें लेख उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में कांवड़ यात्रा के दौरान दुकानदारों को अपनी पहचान (नाम) उजागर करने वाले आदेशों का भी विश्लेषण किया गया है. लेख का तर्क है कि इस तरह के आदेशों का एकमात्र उद्देश्य ग्राहकों को यह बताना था कि वे किस दुकान से सामान खरीद रहे हैं, ताकि धर्म के आधार पर भेदभाव को संस्थागत रूप दिया जा सके. यह सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (व्यवसाय की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) का उल्लंघन है.
आर्थिक हमलों का प्रभाव केवल धन की कमी तक सीमित नहीं है. लेख यह रेखांकित करता है कि कैसे यह पूरी प्रक्रिया मुस्लिम समुदाय के भीतर एक गहरा मनोवैज्ञानिक डर पैदा कर रही है. जब किसी व्यक्ति को पता चलता है कि उसकी धार्मिक पहचान उसके रोजगार में बाधा है, तो वह समाज से कटने लगता है. इससे ‘घेटोइजेशन’ यानी एक विशेष इलाके में सिमट कर रहने की प्रवृत्ति बढ़ती है, जो अंततः देश के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करती है.
लेख का सबसे गंभीर आरोप यह है कि भारतीय राज्य अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से पीछे हट गया है. संविधान के अनुसार राज्य का कर्तव्य है कि वह हर नागरिक की आजीविका की रक्षा करे, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो. लेकिन लेख के अनुसार, वर्तमान प्रशासन न केवल इन आर्थिक हमलों को रोकने में विफल रहा है, बल्कि कई मामलों में वह अपनी मशीनरी (पुलिस और नगर निगम) के माध्यम से इसमें सक्रिय भागीदार बन गया है.
कुलमिलाकर, लेख यह निष्कर्ष निकालता है कि मुस्लिम समुदाय की आजीविका पर ये हमले अचानक हुई घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक बड़ी विचारधारा का हिस्सा हैं जो अल्पसंख्यकों को ‘दोयम दर्जे का नागरिक’ बनाना चाहती है. यह चेतावनी देता है कि यदि देश की एक बड़ी आबादी को आर्थिक रूप से पंगु बना दिया गया, तो भारत का ‘विश्व गुरु’ बनने या 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता. समावेशी विकास के बिना किसी भी राष्ट्र की प्रगति अधूरी है.
हर्षमंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हैं
हरकारा डीपडाइव
श्रवण गर्ग : मुसलमानों का मोहभंग और लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी
इस देश में एक नई और खतरनाक सियासत ने जन्म लिया है—जहाँ मुस्लिम समाज न सिर्फ़ सत्ता से, बल्कि विपक्ष से भी दूरी बनाता नज़र आ रहा है. वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ हरकारा डीप डाइव की एक गंभीर बातचीत.
आज की सियासत में क्या मुसलमान अकेला पड़ गया है? क्या विपक्ष की चुप्पी और सत्ता पक्ष के हमलों ने मुस्लिम समाज को एक नई और अलग राह चुनने पर मजबूर कर दिया है? हरकारा डीप डाइव के ताज़ा एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने इन सवालों पर संजीदा और चिंताजनक तस्वीर पेश की है.
उनका मानना है कि भारत एक नए किस्म के “ध्रुवीकरण” की तरफ़ बढ़ रहा है, जो सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, बल्कि धार्मिक और हिंसा से भरा हो सकता है. श्रवण गर्ग कहते हैं कि विपक्ष हमेशा से यह मानकर चलता रहा कि बीजेपी को हराने के लिए मुसलमानों के पास उनके अलावा कोई चारा नहीं है. लेकिन अब यह सोच बदल रही है. बिहार, बंगाल, केरल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में मुस्लिम समाज अब विपक्ष की “टूल” बनने को तैयार नहीं है. ओवैसी फैक्टर का उदाहरण देते हुए गर्ग ने कहा कि बिहार चुनावों में ओवैसी की पार्टी को कांग्रेस जितनी ही सीटें मिलना इस बात का सबूत है कि मुसलमान अब अपनी अलग राजनीतिक पहचान ढूँढ रहा है.
उनका कहना है कि विपक्ष “माइनॉरिटी अपीज़मेंट” (अल्पसंख्यक तुष्टिकरण) के आरोप से बचने के लिए मुसलमानों के मुद्दों पर खुलकर बोलने से डरता है. इस “गिल्टी कॉन्शसनेस” ने मुसलमानों के मन में विपक्ष के प्रति तिरस्कार पैदा कर दिया है.
बातचीत में एक और खतरनाक पहलू पर रोशनी डाली गई—मुस्लिम रेडिकलिज़्म का बढ़ना. श्रवण गर्ग चेतावनी देते हैं कि जिस तरह हिंदू कट्टरवाद बढ़ रहा है (जैसे हरिद्वार संसद में मुसलमानों के नरसंहार की बातें या बुलडोज़र राजनीति), वैसे ही उसके जवाब में मुस्लिम समाज के अंदर से भी एक “पॉलिटिकल फंडामेंटलिज़्म” उभर रहा है. यह “बॉटम-टॉप” मूवमेंट है, जो वार्ड और म्युनिसिपैलिटी लेवल से शुरू होकर ऊपर तक जा रहा है. लाल किले की घटना का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें पढ़े-लिखे, हाई-प्रोफाइल मुसलमानों का शामिल होना एक नए किस्म के खतरे का संकेत है. डर यह है कि जैसे-जैसे मुस्लिम कट्टरवाद बढ़ेगा, वैसे-वैसे हिंदू सेक्युलर आवाज़ें और भी चुप होती जाएँगी.नश्रवण गर्ग का विश्लेषण है कि भारत में एक “नया पार्टीशन” हो रहा है—जो ज़मीन का नहीं, बल्कि मनों का है. एक तरफ़ बीजेपी मुसलमानों से कहती है कि वो मेनस्ट्रीम में नहीं हैं, और दूसरी तरफ़ विपक्ष उन्हें मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स से अलग कर रहा है. आने वाले 2027 के यूपी चुनाव या बंगाल और केरल के चुनावों में अगर मुसलमानों ने विपक्ष का साथ छोड़ दिया, तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को होगा. लेकिन लंबा नुकसान देश के लोकतांत्रिक ढांचे और शांति को होगा.
अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ छोड़ा
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अमेरिका की 78 साल पुरानी प्रतिबद्धता को समाप्त करने की घोषणा के एक साल बाद, अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से अपनी वापसी को अंतिम रूप दे दिया है. लेकिन यह पूरी तरह से नाता टूटना नहीं है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार, अमेरिका पर वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसी का 130 मिलियन डॉलर (13 करोड़ डॉलर) से अधिक का बकाया है. ‘एपी’ के अनुसार, ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने अभी भी कुछ मुद्दों को पूरी तरह नहीं सुलझाया है, जैसे कि अन्य देशों के डेटा तक पहुंच खोना, जो अमेरिका को किसी नई महामारी की शुरुआती चेतावनी दे सकता था.
जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून विशेषज्ञ लॉरेंस गोस्टिन ने कहा कि इस वापसी से नए संक्रमणों (आउटब्रेक्स) के प्रति वैश्विक प्रतिक्रिया को नुकसान होगा और यह नई चुनौतियों के खिलाफ टीके और दवाएं विकसित करने की अमेरिकी वैज्ञानिकों और फार्मास्युटिकल कंपनियों की क्षमता को भी बाधित करेगा.
उत्तराखंड-हिमाचल के ऊँचाई वाले क्षेत्रों में साल की पहली बर्फबारी, मैदानों में बारिश; ऑरेंज अलर्ट
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश के उच्च ऊँचाई वाले क्षेत्रों के अलावा श्रीनगर समेत जम्मू-कश्मीर के मैदानी इलाकों में शुक्रवार को साल की पहली बर्फबारी हुई, जिससे लंबे समय से चला आ रहा सूखा दौर समाप्त हो गया और शीत लहर तेज हो गई.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, उत्तराखंड की राजधानी देहरादून सहित अधिकांश निचले और मैदानी इलाकों में सुबह से ही लगातार बारिश हो रही है. ताजा बर्फबारी ने बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, औली, मसूरी, चकराता, धनोल्टी और उत्तरकाशी को सफेद चादर से ढक दिया है. नैनीताल और मुक्तेश्वर में भी बर्फबारी की खबर है.
मौसम विभाग ने राज्य के लिए ‘ऑरेंज अलर्ट’ जारी किया है, जिसमें पहाड़ों में और अधिक बर्फबारी और निचले इलाकों में बारिश की भविष्यवाणी की गई है. कुछ स्थानों पर तेज हवाओं के साथ ओलावृष्टि का भी अनुमान है.
हरप्रीत बाजवा की रिपोर्ट है कि हिमाचल प्रदेश में भी व्यापक बर्फबारी दर्ज की गई, जो इस सीजन की पहली बड़ी बर्फबारी है. शिमला, किन्नौर, मनाली, नारकंडा, खड़ापत्थर, कुफरी, सराहन, चौपाल, तकलेच और रामपुर के निवासियों की सुबह ताजा बर्फबारी के साथ हुई, जो सुबह भर जारी रही. अब तक बर्फबारी मुख्य रूप से लाहौल-स्पीति के ऊंचे इलाकों और चंबा के कुछ हिस्सों तक ही सीमित थी. इस ताजा बर्फबारी ने उन किसानों और सेब बागवानों को बड़ी राहत दी है जो लंबे समय से सूखे की स्थिति के कारण भारी तनाव में थे.
अहमदाबाद दुर्घटना; अमेरिकी व्हिसलब्लोअर का दावा, एआई बोइंग-787 में इलेक्ट्रिकल विफलताओं का लंबा इतिहास
अमेरिका स्थित एक ‘विमानन सुरक्षा वकालत समूह’ ने 12 जून को अहमदाबाद के पास दुर्घटनाग्रस्त हुए एयर इंडिया बोइंग 787-8 विमान के सुरक्षा इतिहास पर नए सवाल खड़े किए हैं. समूह का दावा है कि इस विमान में सेवा के 10 से अधिक वर्षों के दौरान इंजीनियरिंग, निर्माण, गुणवत्ता और रखरखाव संबंधी समस्याएं लगातार बनी हुई थीं.
12 जनवरी को अमेरिकी सीनेट की जांच संबंधी स्थायी उपसमिति को एक व्हिसलब्लोअर रिपोर्ट के रूप में सौंपी गई इन दलीलों ने भारत की सबसे घातक विमान दुर्घटनाओं में से एक की चल रही जांच में एक नया और विवादास्पद आयाम जोड़ दिया है.
‘टीएनआईई’ के अनुसार, यह रिपोर्ट दाखिल करने वाले ‘फाउंडेशन फॉर एविएशन सेफ्टी’ ने आरोप लगाया है कि इस विमान ने अपने 11 साल के परिचालन के दौरान बार-बार इलेक्ट्रिकल सिस्टम (विद्युत प्रणाली) की विफलताओं का सामना किया है. समूह के अनुसार, आंतरिक रिकॉर्ड और रखरखाव डेटा बिजली वितरण, एवियोनिक्स और अन्य महत्वपूर्ण विद्युत घटकों को प्रभावित करने वाली तकनीकी समस्याओं के एक पैटर्न की ओर इशारा करते हैं. संगठन का दावा है कि ये मुद्दे इक्का-दुक्का घटनाएं नहीं थे, बल्कि कमियों के एक व्यापक और लंबे समय से चले आ रहे सिलसिले का हिस्सा थे, जिसमें डिजाइन से जुड़ी खामियों के साथ-साथ गुणवत्ता नियंत्रण और रखरखाव प्रथाओं में चूक शामिल थी. व्हिसलब्लोअर रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस विमान में विद्युत संबंधी गड़बड़ियों की कई घटनाएं हुई थीं, जिनमें अचानक बिजली कट जाना, सर्किट से जुड़े दोष और पुर्जों का अत्यधिक गर्म होना शामिल था. इसमें धुएं या गैस की गंध और सॉफ्टवेयर से जुड़ी उन खामियों का भी जिक्र है, जिन्हें ठीक करने के लिए बार-बार प्रयास करने पड़े थे. विशेष चिंता जताते हुए, समूह ने विमान के पावर डिस्ट्रीब्यूशन पैनल में से एक में लगी गंभीर आग की घटना पर प्रकाश डाला है, जो कथित तौर पर दुर्घटना से कई साल पहले हुई थी, जिसके बाद एक प्रमुख हिस्से को बदला गया था. वकालत समूह का तर्क है कि इस तरह की घटनाएं सामान्य टूट-फूट के बजाय ‘सिस्टम’ की कमियों की ओर इशारा करती हैं.
ये दावे आधिकारिक जांच के शुरुआती रुख के विपरीत हैं, जो मुख्य रूप से टेकऑफ़ के कुछ क्षणों बाद कॉकपिट की गतिविधियों पर केंद्रित रही है. भारतीय अधिकारियों के प्रारंभिक निष्कर्षों ने संकेत दिया था कि प्रस्थान के तुरंत बाद, फ्यूल कंट्रोल स्विच की हलचल के चलते दोनों इंजनों ने अपनी शक्ति खो दी थी, जिससे पायलट की गलती या प्रक्रियात्मक चूक की अटकलें शुरू हो गई थीं. सुरक्षा समूह का तर्क है कि इस बात पर जोर देने से गहरे तकनीकी कारकों की अनदेखी होने का जोखिम है. उनका सुझाव है कि पुरानी विद्युत समस्याओं ने दुर्घटना का कारण बनने वाली घटनाओं की कड़ी में भूमिका निभाई होगी.
यह एयर इंडिया विमान अहमदाबाद हवाई अड्डे से एक निर्धारित अंतरराष्ट्रीय उड़ान के दौरान टेकऑफ़ के कुछ सेकंड बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें सवार सभी यात्रियों और चालक दल के सदस्यों की मृत्यु हो गई थी. इस त्रासदी की जांच भारत के ‘विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो’ (एएआईबी) द्वारा वैश्विक विमानन नियमों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की सहायता से की जा रही है. हालांकि, आधिकारिक जांच अभी जारी है, लेकिन इस व्हिसलब्लोअर रिपोर्ट के सामने आने से विमान के परिचालन इतिहास और बोइंग 787 ड्रीमलाइनर बेड़े के व्यापक सुरक्षा रिकॉर्ड की बारीकी से जांच तेज हो गई है. मगर, जैसे-जैसे जांचकर्ता उड़ान के अंतिम क्षणों की कड़ियों को जोड़ रहे हैं, व्हिसलब्लोअर के दावों ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि विमान के डिजाइन, रखरखाव के इतिहास और नियामक निगरानी के बारे में सवाल बहस के केंद्र में बने रहेंगे.
अब दूषित पेयजल से इंदौर के महू छावनी क्षेत्र में पीलिया का प्रकोप, कई बच्चे अस्पताल में भर्ती
भागीरथपुरा में दूषित पानी से जुड़ी डायरिया की बीमारी से 20 से अधिक लोगों (मीडिया रिपोर्ट्स में 27 की संख्या है) की जान जाने के कुछ ही हफ्तों बाद, अब इंदौर जिले के ही महू छावनी क्षेत्र के कई इलाकों में दूषित पेयजल के कारण पीलिया फैलने की खबर है.
“द न्यू इंडियन एक्सप्रेस” के अनुसार, महू के दो दर्जन से अधिक निवासी, जिनमें ज्यादातर बच्चे हैं, कथित तौर पर पीलिया से पीड़ित हैं. आशंका जताई जा रही है कि यह दूषित पेयजल के कारण हुआ है. इनमें से लगभग दस बच्चों को रेड क्रॉस सोसाइटी अस्पताल और मध्य भारत अस्पताल सहित विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया है.
चंदर मार्ग और मोती महल के बीच के कई इलाकों से मामले सामने आए हैं. मोती महल क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित लग रहा है, जहां निवासी मटमैले और दुर्गंधयुक्त पानी की आपूर्ति की शिकायत कर रहे हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि दूषित पानी के कारण बीमारियाँ बढ़ गई हैं, खासकर स्कूल जाने वाले बच्चों में.
यद्यपि अधिकारी दावा कर रहे हैं कि वर्तमान में नौ से अधिक लोग (ज्यादातर बच्चे) अस्पतालों में भर्ती नहीं हैं, लेकिन निवासियों का कहना है कि मामलों की वास्तविक संख्या अधिक हो सकती है, क्योंकि कई बच्चों का इलाज निजी स्वास्थ्य केंद्रों में चल रहा है.
इंदौर कलेक्टर आशीष सिंह वर्मा ने कहा कि कई बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए शुक्रवार से विस्तृत स्वास्थ्य सर्वेक्षण शुरू किया जाएगा. सर्वे के जरिए उन मरीजों की ट्रैकिंग की जाएगी, जिन्हें दस्त और उल्टी की शिकायत है.
पूर्व मंत्री और स्थानीय भाजपा विधायक उषा ठाकुर ने भी प्रभावित इलाकों का दौरा किया और इस समस्या के लिए जल आपूर्ति व्यवस्था (लेआउट) को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा, “इन इलाकों की मुख्य समस्या यह है कि पेयजल के कनेक्शन नालियों के बीच से गुजरते हैं, जिससे उनमें नाली का पानी मिलने और दूषित होने का खतरा रहता है. महू छावनी बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ने इस समस्या के मूल कारण को दूर करने का वादा किया है. तब तक हम परिवारों को सलाह दे रहे हैं कि वे पीने के पानी को इस्तेमाल करने से पहले बाल्टी में फिटकरी डालकर साफ करें.”
हरियाणा में पेड़ों पर संकट: कमजोर कानूनों और प्रशासनिक लापरवाही से तेजी से कट रहे पेड़
हरियाणा के पानीपत जिले में 19 अक्टूबर 2022 को एक रिहायशी कॉलोनी की दीवार के पास खड़े दर्जनों पेड़ों को कुल्हाड़ी और सीढ़ी की मदद से काट दिया गया. रोमिता सालूजा द्वारा लिखी गई आर्टिकल 14 की रिपोर्ट के मुताबिक़ काटे गए पेड़ों में ताइवान रेन ट्री, पीपल, शहतूत, पोंगामिया और सप्तपर्णी जैसे कई पुराने पेड़ शामिल थे.
इन पेड़ों को एक रियल एस्टेट कंपनी के प्रोजेक्ट के लिए हटाया गया. स्थानीय निवासी जगदीश कालरा ने जब यह देखा तो उन्होंने जिला प्रशासन से शिकायत की, लेकिन ज़िम्मेदारी एक विभाग से दूसरे विभाग पर टलती रही. अंत में उन्हें राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा. मामला अब भी लंबित है.
यह इस तरह का पहला मामला नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार, हरियाणा में पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई है, लेकिन इसके बावजूद राज्य में पेड़ों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कानून नहीं है. दिल्ली के विपरीत, जहां एक पेड़ काटने के लिए भी अनुमति ज़रूरी होती है, हरियाणा में अधिकतर जिलों में पेड़ काटने पर कोई सख़्त पाबन्दी नहीं है. राज्य में सिर्फ 3.6% वन क्षेत्र है, जो देश में सबसे कम है. इसके बावजूद अगस्त 2025 में सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर जंगल की परिभाषा और सीमित कर दी, जिससे कई हरित क्षेत्र कानूनी सुरक्षा से बाहर हो गए.
हरियाणा में अब भी 1900 के ब्रिटिश काल के पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट (पीएलपीए) के तहत ही पेड़ों की सुरक्षा की जाती है, जो केवल 22 में से 10 जिलों पर लागू है. बाकी जिलों में पेड़ों को काटने के लिए किसी अनुमति की ज़रुरत नहीं होती. विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानूनी खालीपन का फायदा उठाकर लोग धड़ल्ले से पेड़ काट रहे हैं. पर्यावरण कार्यकर्ता प्रेम मोहन गौर के अनुसार, हरियाणा में एक भी मज़बूत कानून नहीं है जो पेड़ों को बचा सके. जुर्माना इतना कम है कि लोग आसानी से नियम तोड़ देते हैं.
रिपोर्ट बताती है कि अकेले 2024 में हरियाणा में 12 हेक्टेयर से ज़्यादा पेड़ कटे, जिससे क़रीब 6,000 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित हुआ. पिछले 25 वर्षों में राज्य 440 हेक्टेयर से अधिक हरित क्षेत्र खो चुका है. पानीपत, फरीदाबाद, गुरुग्राम, पंचकूला और भिवानी जैसे शहरों में बड़ी संख्या में पेड़ काटे गए, कई बार बिजली की तारों, निर्माण कार्य या “धूप आने” जैसे बहानों से.
कई मामलों में लोगों ने आरोप लगाया कि पेड़ काटने की अनुमति पैसे लेकर दी जाती है. फरीदाबाद के एक वकील ने बताया कि उनसे पेड़ कटवाने के लिए रिश्वत मांगी गई. वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि नियमों का पालन न होने से जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ा है. छिपकलियां, सांप, पक्षी और कीड़े तेजी से गायब हो रहे हैं.
एनजीटी ने 2022 में हरियाणा सरकार को गैर-वन क्षेत्रों में पेड़ काटने पर रोक लगाने के लिए नीति बनाने को कहा था. अक्टूबर 2025 में ट्रिब्यूनल ने यह भी आदेश दिया कि बिना वन विभाग की अनुमति कोई पेड़ नहीं काटा जाएगा, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका पालन नहीं हो रहा है.
इस बीच, राज्य सरकार ने 2025 में जंगल की नई परिभाषा तय की, जिसमें कम घनत्व वाले और छोटे जंगलों को “वन” की श्रेणी से बाहर कर दिया गया. पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे 79% प्राकृतिक क्षेत्र रियल एस्टेट और खनन के लिए खुल जाएंगे.
पर्यावरण विशेषज्ञ का कहना है कि हरियाणा जैसे सूखे राज्य में पेड़ बेहद ज़रूरी हैं, लेकिन यहां विकास के नाम पर हरियाली खत्म की जा रही है. वहीं, पर्यावरण कार्यकर्ता नीलम अहलूवालिया का कहना है कि यह नीति राज्य की पारिस्थितिकी के लिए विनाशकारी साबित होगी.
आज स्थिति यह है कि जो लोग पेड़ बचाने की कोशिश करते हैं, उन्हें ही परेशान किया जाता है. कानून कमज़ोर हैं, प्रशासन उदासीन है और पेड़ काटना एक सामान्य काम बनता जा रहा है.
एल्गार परिषद केस में बॉम्बे हाईकोर्ट से सागर गोरखे और रमेश गाइचोर को जमानत
बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार, 23 जनवरी को 2018 के एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार किए गए सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं सागर गोरखे और रमेश गाइचोर को ज़मानत दे दी. दोनों को 2 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था और तब से वे जेल में बंद थे. जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस एस.सी. चांडक की डिवीजन बेंच ने विशेष एनआईए अदालत के फरवरी 2022 के आदेश के ख़िलाफ़ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए उन्हें राहत दी. दोनों को एक-एक लाख रुपये के बॉन्ड पर ज़मानत दी गई है और हर महीने के पहले सोमवार को एनआईए कार्यालय में हाजिरी लगाने का आदेश दिया गया है.
गोरखे और गाइचोर एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार किए गए 16 लोगों में शामिल थे. इस मामले में झारखंड के जेसुइट पादरी और सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टैन स्वामी की 2021 में जेल में ही मौत हो गई थी. अब इस केस में केवल मानवाधिकार वकील सुरेंद्र गाडलिंग ही जेल में हैं. अन्य आरोपियों में से महेश राउत और ज्योति जगताप को अंतरिम ज़मानत मिल चुकी है, जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हनी बाबू को पिछले महीने ज़मानत मिली थी. गोरखे और गाइचोर का संबंध कबीर कला मंच से रहा है, जिसे पहले कांग्रेस सरकार ने माओवादी संगठनों से जुड़ा बताया था. दोनों पर यूएपीए के तहत गंभीर आरोप लगाए गए थे.
हालांकि एनआईए ने इस मामले में चार्जशीट दाखिल कर दी है, लेकिन अब तक सुनवाई शुरू नहीं हुई है. अदालत में अब तक इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी आरोपियों को नहीं सौंपे गए हैं. मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह मामला दिखाता है कि कैसे यूएपीए जैसे कड़े कानूनों के तहत लोगों को सालों तक जेल में रखा जाता है, जबकि मुकदमे आगे नहीं बढ़ते. गोरखे और गाइचोर की रिहाई को लंबे समय से चल रही इस कानूनी लड़ाई में एक अहम राहत माना जा रहा है.
बीएमसी में बीजेपी और शिवसेना (यूबीटी) के गठबंधन की अटकलें तेज़, शिंदे को किनारे करने की तैयारी?
बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी), जो एशिया की सबसे अमीर नगरपालिका मानी जाती है, में सत्ता के समीकरण तेज़ी से बदलते नज़र आ रहे हैं. ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ में सुधीर सूर्यवंशी की रिपोर्ट बताती है कि बीजेपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के बीच एक चौंकाने वाला गठबंधन हो सकता है. इसका मुख्य उद्देश्य महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को किनारे करना है, जो कथित तौर पर बीजेपी पर मुंबई के मेयर पद और प्रमुख नागरिक समितियों की अध्यक्षता देने के लिए दबाव बना रहे हैं.
यह सियासी चर्चा तब और तेज हो गई जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के प्रमुख राज ठाकरे ने दिवंगत बाल ठाकरे की 100वीं जयंती के अवसर पर सोशल मीडिया पर एक महत्वपूर्ण पोस्ट साझा किया. इस पोस्ट ने बीजेपी, शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस के एक साथ आने की संभावनाओं को हवा दे दी है. राज ठाकरे ने अपने पोस्ट में राजनीतिक “लचीलेपन” का संकेत देते हुए लिखा: “जब बालासाहेब को भी राजनीति में कभी-कभी लचीला रुख अपनाना पड़ा, तो भी मराठी मानुष के प्रति उनका प्रेम रत्ती भर भी कम नहीं हुआ; इसके विपरीत, वह और मजबूत हुआ. यही संस्कार हममें भी हैं. मैं आज फिर वचन देता हूँ: अगर मुझे इस पूरी तरह से बदल चुकी राजनीति में कभी थोड़ा लचीला रुख अपनाना भी पड़ा, तो वह कभी भी मेरे व्यक्तिगत लाभ या स्वार्थ के लिए नहीं होगा.”
बीएमसी के चुनावी गणित ने किसी भी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया है. 227 सदस्यीय सदन में बीजेपी 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जबकि शिवसेना (यूबीटी) 66 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर है. एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को 29 सीटें और कांग्रेस को 21 सीटें मिली हैं. सत्ता के लिए 114 का जादुई आँकड़ा चाहिए, जिसे कोई भी अकेले छूने की स्थिति में नहीं है. ऐसे में गठबंधन अपरिहार्य है. रिपोर्ट के अनुसार, शिंदे गुट की “ब्लैकमेलिंग” जैसी रणनीति से तंग आकर बीजेपी अब अपने पुराने सहयोगी (उद्धव गुट) की ओर देख सकती है, जिससे राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ आ सकता है.
अमेरिकी टैरिफ जारी रहे तो बाज़ार और नौकरियाँ हमेशा के लिए छिन जाएँगी: कपड़ा निर्यातकों की उपराष्ट्रपति को चेतावनी
अमेरिका द्वारा लगाए गए भारी-भरकम आयात शुल्क (टैरिफ) के चलते भारत का कपड़ा उद्योग संकट के दौर से गुजर रहा है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कपड़ा निर्यातकों ने उपराष्ट्रपति को लिखे एक पत्र में चेतावनी दी है कि यदि स्थिति का तत्काल समाधान नहीं किया गया, तो भारत को अपने सबसे बड़े निर्यात बाज़ार (अमेरिका) में “अपरिवर्तनीय क्षति” उठानी पड़ेगी.
अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (एईपीसी) ने बताया कि अमेरिका ने भारतीय आयातों पर 25% टैरिफ और तेल से जुड़े अतिरिक्त 25% जुर्माने का प्रावधान किया है. इसका सीधा असर ऑर्डर्स पर पड़ रहा है. तिरुपुर, जो सालाना लगभग 14,000 करोड़ रुपये के वस्त्र अमेरिका निर्यात करता है, वहाँ के निर्यातकों का कहना है कि अमेरिकी खरीदार अनिश्चितता और टैरिफ बढ़ने के डर से नए ऑर्डर रोक रहे हैं या रद्द कर रहे हैं. निर्यातकों ने पत्र में कहा, “कपड़ा उद्योग ने राष्ट्रीय हित में पहले ही काफी नुकसान उठाया है ताकि निर्यात और रोजगार बचा रहे. अब और झटका सहने की क्षमता नहीं बची है. 3 से 6 महीने की देरी भी इस रणनीतिक क्षेत्र को स्थायी नुकसान पहुँचा सकती है.”
निर्यातकों ने स्पष्ट किया कि बाज़ार में विविधता लाना कोई अल्पकालिक समाधान नहीं है, क्योंकि नए खरीदारों को जोड़ने और सप्लाई चेन बनाने में 2-3 साल का समय लगता है. एईपीसी ने चिंता जताई है कि अमेरिकी बाज़ार के अचानक बंद होने से बांग्लादेश, वियतनाम और चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को फायदा होगा, जिन्हें कम टैरिफ का लाभ मिलता है.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड (आईआईएफटी) की प्रोफेसर सुनीता राजू की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, भारत पर 50% टैरिफ लगने से अमेरिका में भारतीय टेक्सटाइल और अपैरल की मांग में 6.6 बिलियन डॉलर (लगभग 67.8%) की गिरावट आ सकती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि फाइबर और धागे के निर्यात पर प्रतिशत के हिसाब से सबसे बुरा असर पड़ेगा, लेकिन वास्तविक मूल्य के हिसाब से सिले-सिलाए कपड़ों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा, जो करीब 5.7 बिलियन डॉलर तक गिर सकता है.
यूक्रेन युद्ध खत्म करने के फॉर्मूले पर पुतिन के साथ ट्रंप के दूतों की मैराथन बैठक
‘एक्सियोस’ के बराक रविड की रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रयासों के तहत, उनके विशेष दूतों ने गुरुवार रात क्रेमलिन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ चार घंटे लंबी बैठक की. यह बैठक अबू धाबी में होने वाली महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय वार्ता से ठीक पहले हुई है.
व्हाइट हाउस के दूत और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर, स्टीव विटकॉफ और अधिकारी जोश ग्रुएनबॉम ने दावोस में यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की से मिलने के तुरंत बाद मॉस्को के लिए उड़ान भरी. पुतिन के सलाहकार यूरी उशाकोव ने संवाददाताओं को बताया कि यह बातचीत “रचनात्मक, ठोस और बहुत स्पष्ट” थी. उन्होंने कहा कि ट्रंप के दूतों ने रूसी राष्ट्रपति को यूक्रेन के साथ हुई अपनी बातचीत का ब्यौरा दिया.
बैठक का मुख्य मुद्दा पूर्वी यूक्रेन में ‘क्षेत्रीय नियंत्रण’ था. उशाकोव ने जोर देकर कहा कि डोनबास क्षेत्र को पूरी तरह से रूस को सौंपने की मांग—जिस पर कथित तौर पर ट्रंप और पुतिन के बीच पिछले अगस्त में सहमति बनी थी—को हल किए बिना दीर्घकालिक समझौते की कोई संभावना नहीं है. इसके अलावा, बातचीत में ग्रीनलैंड और ट्रंप के प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पर भी चर्चा हुई.
अब अगला चरण अबू धाबी में होगा, जहाँ कुशनर और विटकॉफ अमेरिका का प्रतिनिधित्व करेंगे. वहां वे यूक्रेन के मुख्य वार्ताकार रुस्तम उमेरोव और रूसी सेना के खुफिया प्रमुख एडमिरल इगोर कोस्त्युकोव के नेतृत्व वाली टीमों के साथ त्रिपक्षीय वार्ता करेंगे. यह दर्शाता है कि अमेरिका समझौते के लिए कूटनीतिक दबाव बढ़ा रहा है, हालाँकि क्षेत्रीय मुद्दों पर गतिरोध अब भी बरकरार है.
रूस, अमेरिका और यूक्रेन की वार्ता: उम्मीदें कम, दांव बहुत ऊँचे
‘बीबीसी’ की सारा रेन्सफोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, रूस के 2022 के पूर्ण आक्रमण के बाद पहली बार रूस, यूक्रेन और अमेरिका के वार्ताकार अबू धाबी में त्रिपक्षीय वार्ता के लिए आमने-सामने होंगे. संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रालय ने इसकी पुष्टि की है. दांव बहुत ऊँचे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत को देखते हुए उम्मीदें सीमित हैं.
डोनाल्ड ट्रंप एक शांति समझौते के लिए उतावले हैं और उन्होंने अपनी शैली में कहा है कि अगर दोनों पक्ष सहमत नहीं हुए तो यह “मूर्खतापूर्ण” होगा. यूक्रेन इस प्रक्रिया में इसलिए शामिल हो रहा है क्योंकि उसे शांति की सख्त ज़रूरत है और वह अमेरिका का समर्थन खोने का जोखिम नहीं उठा सकता. राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने दावोस में ट्रंप के साथ अपनी मुलाकात को “सकारात्मक” बताया और अधिक वायु रक्षा प्रणाली मिलने की उम्मीद जताई, लेकिन अबू धाबी वार्ता को लेकर वे सतर्क हैं. उन्होंने इसे केवल “एक कदम” बताया है.
सबसे बड़ी बाधा डोनबास क्षेत्र है. ज़ेलेंस्की का कहना है कि समझौते का 90% ढांचा तैयार हो सकता है, लेकिन अंतिम 10%—जो ज़मीन से जुड़ा है—सबसे कठिन है. रूस उस क्षेत्र की मांग कर रहा है जिसे वह युद्ध के मैदान में पूरी तरह नहीं जीत पाया, जबकि यूक्रेन के लिए यह एक “रेड लाइन” है जिसे उसके सैनिकों के खून से खींचा गया है.
रिपोर्ट में कीव की गंभीर स्थिति का भी वर्णन है. कड़ाके की ठंड में रूसी हमलों ने बिजली और पानी की आपूर्ति को ध्वस्त कर दिया है. मेयर विटाली क्लिट्स्को ने चेतावनी दी है कि स्थिति और खराब हो सकती है. इसके अलावा, अमेरिका से “सुरक्षा गारंटी” का मुद्दा भी पेचीदा है. ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के हालिया बयानों ने नाटो को कमजोर किया है, जिससे कीव में यह सवाल उठ रहा है कि क्या अगले संकट में अमेरिका पर भरोसा किया जा सकता है?
कनाडा अमेरिका की वजह से जीवित नहीं है: प्रधानमंत्री कार्नी ने ट्रंप को दिया करारा जवाब
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने गुरुवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस टिप्पणी पर कि “कनाडा संयुक्त राज्य अमेरिका की वजह से जीवित है,” पलटवार करते हुए कहा कि कनाडा अपने कनाडाई मूल्यों के कारण फलता-फूलता है.
‘एक्सप्रेस वीडियो सर्विस’ के मुताबिक, कार्नी ने दावोस से लौटने के बाद कहा कि कनाडा दुनिया को यह दिखा सकता है कि “भविष्य का निरंकुश” होना ज़रूरी नहीं है. दावोस में दिए गए उनके भाषण ने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा था.
विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम) में कार्नी ने ट्रंप का नाम लिए बिना छोटे देशों पर बड़ी शक्तियों द्वारा किए जाने वाले दबाव या ज़बरदस्ती की निंदा की थी. कनाडा वापस लौटने पर, कार्नी ने दावोस में दिए गए ट्रंप के बयानों का हवाला देते हुए उन्हें सीधा जवाब दिया. ट्रंप ने दरअसल कहा था कि “कनाडा को हमारा आभारी होना चाहिए. कनाडा संयुक्त राज्य अमेरिका की वजह से जीवित है.”
ट्रंप ने कनाडा को अमेरिका के नेतृत्व वाले ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने से रोका
इस बीच ‘डेक्कन क्रॉनिकल’ की खबर है कि ट्रुथ सोशल पर पोस्ट किए गए एक बयान में, ट्रंप ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में कनाडा का निमंत्रण वापस ले लिया और कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को सूचित किया कि उनका देश अब तक के “सबसे प्रतिष्ठित नेताओं के बोर्ड” में शामिल नहीं हो सकता.
ट्रुथ सोशल पर जारी एक बयान में, ट्रंप ने लिखा, “प्रिय प्रधानमंत्री कार्नी: कृपया इस पत्र को यह बताने का माध्यम मानें कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ कनाडा को शामिल होने के लिए दिया गया अपना निमंत्रण वापस ले रहा है. “हम एक ‘गोल्डन डोम’ (सुरक्षा कवच) बना रहे हैं, जो कनाडा की रक्षा करेगा. वैसे, कनाडा को हमसे बहुत कुछ मुफ्त में मिलता है. उन्हें इसके लिए आभारी होना चाहिए,” ट्रंप ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच के दौरान कहा था. “लेकिन वे नहीं हैं. मैंने कल आपके प्रधानमंत्री को देखा. वे उतने आभारी नहीं थे. कनाडा को हमारा आभारी होना चाहिए. कनाडा संयुक्त राज्य अमेरिका की वजह से जीवित है. मार्क, अगली बार अपना बयान देने से पहले यह याद रखना,” उन्होंने इस सप्ताह की शुरुआत में कार्नी द्वारा की गई टिप्पणियों का संदर्भ देते हुए कहा था.
टिकटॉक का अमेरिका में बने रहने के लिए ऐतिहासिक सौदा, चीन से अलग हुआ ऑपरेशन
वीडियो शेयरिंग ऐप टिकटॉक ने अमेरिका में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए एक बड़ा सौदा पूरा कर लिया है. ‘बीबीसी’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस सौदे के तहत टिकटॉक का अमेरिकी परिचालन अब एक नई कंपनी ‘टिकटॉक यूएसडीएस जॉइंट वेंचर एलएलसी’ के तहत काम करेगा, जो इसे इसके चीनी मालिक ‘बाइटडांस’ से काफी हद तक स्वतंत्र बनाता है. यह कदम वाशिंगटन और बीजिंग के बीच डेटा सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चले लंबे टकराव के बाद उठाया गया है.
समझौते के मुताबिक, बाइटडांस के पास अब अमेरिकी कारोबार में केवल 19.9% हिस्सेदारी रहेगी. बाकी स्वामित्व अमेरिकी और वैश्विक निवेशकों के पास होगा. इसमें ओरेकल, सिल्वर लेक और एमजीएक्स प्रत्येक 15% हिस्सेदारी रखेंगे. ओरेकल की भूमिका सबसे अहम होगी क्योंकि वह अमेरिकी यूज़र्स के डेटा को सुरक्षित करेगा और ऐप के पावरफुल ‘एल्गोरिदम’ की निगरानी करेगा. यह एल्गोरिदम अब केवल अमेरिकी डेटा पर प्रशिक्षित किया जाएगा.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने अपने पहले कार्यकाल में ऐप को बैन करने की कोशिश की थी, अब इस सौदे का श्रेय ले रहे हैं. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि वे “टिकटॉक को बचाने में मदद करके बहुत खुश हैं.” विशेषज्ञों का मानना है कि एल्गोरिदम के स्थानीयकरण से अमेरिकी यूज़र्स को अब वह कंटेंट शायद न दिखे जो ग्लोबल वर्जन पर दिखता है, और ऐप का अनुभव बदल सकता है.
नई कंपनी का बोर्ड सात सदस्यों का होगा, जिसमें बहुमत अमेरिकियों का होगा. एडम प्रेसर को इसका सीईओ नियुक्त किया गया है, जबकि टिकटॉक के ग्लोबल बॉस शो ज़ी च्यू भी बोर्ड में शामिल रहेंगे. यह सौदा जनवरी 2025 में लागू होने वाले संभावित प्रतिबंध से ठीक पहले हुआ है, जिससे 20 करोड़ अमेरिकी यूज़र्स को राहत मिली है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.








