23/03/2026: शेयर बाज़ार, रुपया लुढ़का | तेल की दिक्कत दिखनी शुरु | जंग के 24वें दिन मोदी का संसद में बयान | युद्धविराम की आहट, पर ईरान ने ट्रंप के दावे को फेक न्यूज़ बताया | बंगाल में एसआईआर |
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फलक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
मोदी की पर्सनल डिप्लोमेसी पर सवाल: वेस्ट एशिया युद्ध में भारत को नुकसान का खतरा
10 साल में 11 एयरलाइंस बंद: वित्तीय संकट और विमानों की कमी बनी वजह
गुजरात में ईंधन दहशत: लंबी कतारें, कई पेट्रोल पंप अस्थायी रूप से बंद
रुपया 94.03 पर पहुँचा: डॉलर के मुकाबले अब तक का सबसे निचला स्तर
शेयर बाजार में भारी गिरावट: कुछ मिनटों में 13.5 लाख करोड़ रुपये डूबे
ट्रंप का अल्टीमेटम: होर्मुज नहीं खुला तो ईरान का पावर ग्रिड तबाह
युद्ध का 24वां दिन: खाड़ी देशों पर मिसाइल हमले, लेबनान में भारी तबाही
इजरायल की टारगेटेड किलिंग रणनीति: ईरान के शीर्ष नेतृत्व पर लगातार हमले
बंगाल में वोटर लिस्ट विवाद: SIR में 1.2 करोड़ नाम जांच के दायरे में
असम में भाजपा को बड़ा झटका: कैबिनेट मंत्री नंदिता गार्लोसा कांग्रेस में शामिल
पश्चिम एशिया संकट लंबा चलेगा: पीएम मोदी ने देश को तैयार रहने को कहा
ट्रांस अमेंडमेंट बिल 2026 के खिलाफ देशभर में ट्रांस समुदाय का विरोध
ईरान जंग का 24वां दिन
इधर ट्रंप ने युद्ध विराम की बात की, उधर ईरान ने ट्रंप के दावे को कहा, फेक न्यूज़
क्या खत्म होगी जंग या यह सिर्फ बाज़ार को शांत करने की चाल है? मध्यस्थता करवाने वाले देशों में पाकिस्तान का नाम
ईरान जंग के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा दावा किया है. उन्होंने कहा है कि ईरान के साथ ‘शांति वार्ता’ में बड़ी प्रगति हुई है और समझौते के करीब 15 अहम बिंदुओं पर सहमति बन गई है. इस दावे के साथ ही ट्रंप ने ईरानी पावर प्लांट्स और ऊर्जा ठिकानों पर होने वाले हमलों को फिलहाल 5 दिनों के लिए टाल दिया है. हालांकि, ईरान ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए इसे ट्रंप की एक ‘राजनैतिक चाल’ बताया है.
न्यूयॉर्क टाइम्स, सीएनएन और एक्सियोस की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने पत्रकारों और सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि उनके दूत, जारेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ, ईरान के साथ “बहुत मज़बूत बातचीत” कर रहे हैं. ट्रंप का दावा है कि ईरान परमाणु हथियारों का मोह छोड़ने, यूरेनियम का भंडार सौंपने और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए राजी हो गया है. ट्रंप ने कहा, “ईरान समझौता करना चाहता है और हम भी. अगर ऐसा होता है, तो यह ईरान के लिए खुद को फिर से खड़ा करने का एक शानदार मौका होगा.”
लेकिन ईरान की ओर से प्रतिक्रिया बिल्कुल उलट आई है. ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालीबाफ़ ने सोशल मीडिया पर कहा कि अमेरिका के साथ “कोई बातचीत नहीं हुई है.” उन्होंने ट्रंप पर आरोप लगाया कि वे उस “दलदल” से निकलने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें अमेरिका और इस्राइल फंस चुके हैं. ईरानी विदेश मंत्रालय ने भी किसी भी सीधी बातचीत से इनकार किया है, हालांकि उन्होंने माना कि कुछ तीसरे देश संदेशों का आदान-प्रदान कर रहे हैं.
एक्सियोस के रिपोर्टर बराक राविद की रिपोर्ट के अनुसार, मिस्र, पाकिस्तान और तुर्की जैसे देश इस समय मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि ये देश पाकिस्तान के इस्लामाबाद में एक बड़ी बैठक आयोजित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें ट्रंप की टीम और ईरानी अधिकारी शामिल हो सकें. खबर है कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू से भी इस संभावित समझौते पर चर्चा की है.
इस खबर का वैश्विक बाज़ारों पर ज़बरदस्त असर पड़ा. 28 फरवरी से शुरू हुई इस जंग की वजह से तेल और गैस की कीमतें 50 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ चुकी थीं, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा संकट पैदा हो गया था. ट्रंप के ‘सकारात्मक’ बयान के बाद कच्चे तेल की कीमतें, जो दिन में 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई थीं, अचानक 7 प्रतिशत गिरकर 99 डॉलर के नीचे आ गईं. अमेरिकी शेयर बाज़ारों में भी इस उम्मीद से उछाल देखा गया कि शायद अब जंग थम जाए.
लेकिन, ज़मीनी हकीकत अब भी बहुत डरावनी है. न्यूयॉर्क टाइम्स और सीएनएन की रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस संघर्ष में अब तक 2,000 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं. अकेले ईरान में 1,300 से ज़्यादा और लेबनान में 1,000 से ज़्यादा नागरिकों की जान गई है. दूसरी ओर, इस्राइल के डिमोना शहर और परमाणु केंद्र के पास ईरानी मिसाइलें गिरने से वहां भी भारी नुकसान हुआ है. इस्राइल के रक्षा मंत्री ने सेना को लेबनान में और अंदर तक घुसने और हमलों को तेज़ करने के आदेश दिए हैं, जिससे लंबी जंग का खतरा बना हुआ है.
फिलहाल, पूरी दुनिया की नज़रें शुक्रवार की उस डेडलाइन पर टिकी हैं जो ट्रंप ने तय की है. अगर तब तक बातचीत में कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता, तो ऊर्जा ठिकानों पर हमलों का खतरा फिर से बढ़ जाएगा. ट्रंप का कहना है कि इस समझौते से इस्राइल को भी “गारंटीशुदा शांति” मिलेगी, लेकिन अभी के लिए तेहरान और वाशिंगटन के बीच दावों और इनकार का दौर जारी है.
टॉकिंग न्यूज में निधीश त्यागी ने ‘हरकारा’ पर आज ट्रंप के युद्धविराम के एलान, बाज़ार, ईरान के इंकार की तो बात की ही, साथ ही इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते अंतर, इजरायल की टारगेटेड किलिंग (हत्याओं) की बात की. और ये भी कि कैसे पूरी बिसात बदलती दिखाई दे रही है.
ट्रंप का ईरान को अल्टीमेटम: होर्मुज खुला नहीं तो बिजली संयंत्र होंगे तबाह, गहराया वैश्विक ऊर्जा संकट
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध के 24वें दिन तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इससे पहले ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी थी कि यदि उसने अगले 48 घंटों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य को सभी जहाजों के लिए पूरी तरह से नहीं खोला, तो ईरान के बिजली नेटवर्क को ‘नेस्तनाबूद’ कर दिया जाएगा. यह समय सीमा सोमवार रात 23:44 GMT (भारतीय समयानुसार मंगलवार सुबह) समाप्त हो रही है.
जवाब में, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने एक कड़ा बयान जारी करते हुए कहा है कि यदि ट्रंप ने उनके पावर ग्रिड को निशाना बनाया, तो ईरान इजरायल के बिजली संयंत्रों और खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को बिजली आपूर्ति करने वाले केंद्रों पर हमला करेगा. ईरान ने पहले खाड़ी देशों के ‘डिसैलिनेशन प्लांट्स’ (खारे पानी को मीठा बनाने वाले संयंत्र) को निशाना बनाने की धमकी दी थी, लेकिन सोमवार को उसने स्पष्ट किया कि वह केवल ‘बिजली के बदले बिजली’ की रणनीति अपनाएगा. हालांकि, ईरान के रक्षा परिषद ने चेतावनी दी है कि यदि हमला हुआ, तो वे पूरे खाड़ी क्षेत्र में समुद्री सुरंगें बिछा देंगे, जिससे पूरा क्षेत्र लंबे समय के लिए बंद हो जाएगा.
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने इस स्थिति को बेहद खतरनाक बताया है. उनके अनुसार, मौजूदा ऊर्जा संकट 1970 के दशक के दो बड़े तेल संकटों और 2022 के यूक्रेन युद्ध के संयुक्त प्रभाव से भी अधिक गंभीर है. वर्तमान में तेल और गैस की आपूर्ति में प्रतिदिन 11 मिलियन बैरल की कमी देखी जा रही है. इस बीच, न्यूयॉर्क टाइम्स और रॉयटर्स की रिपोर्टें संकेत दे रही हैं कि ईरान के सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई हमले में घायल होने के बाद अलग-थलग पड़ गए हैं और किसी भी संदेश का जवाब नहीं दे रहे हैं.
खाड़ी देशों पर मिसाइल हमले जारी
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध सोमवार को 24वें दिन में प्रवेश कर गया, जिससे पूरे मध्य पूर्व में असुरक्षा का माहौल है. अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, खाड़ी देशों पर ईरान के हमले जारी हैं. सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि रियाद की ओर दो बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं, जिनमें से एक को मार गिराया गया जबकि दूसरी निर्जन क्षेत्र में गिरी. आईआरजीसी ने दावा किया है कि उन्होंने सऊदी अरब में प्रिंस सुल्तान एयरबेस को निशाना बनाया है.
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में भी अबू धाबी की ओर आने वाली मिसाइल को एयर डिफेंस सिस्टम ने बीच में ही नष्ट कर दिया, जिसके मलबे से एक भारतीय नागरिक को मामूली चोटें आईं. कतर के क्षेत्रीय जल क्षेत्र में एक तकनीकी खराबी के कारण एक हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें चार कतरी और तीन तुर्की सैन्यकर्मियों की मौत हो गई. कुवैत ने ईरान द्वारा हवाई क्षेत्र के उल्लंघन और हवाई अड्डों पर हमलों के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (आईसीएओ) में आधिकारिक विरोध दर्ज कराया है.
युद्ध का मानवीय पक्ष बेहद डरावना होता जा रहा है. लेबनानी अधिकारियों के अनुसार, 2 मार्च से अब तक इजरायली हमलों में 1,029 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें 100 से अधिक बच्चे शामिल हैं. इराक में भी अब तक 60 लोगों की जान जा चुकी है. इजरायल के भीतर, डिमोना और अराद शहरों पर हुए ईरानी हमलों में घायलों की संख्या 180 तक पहुंच गई है. आर्थिक मोर्चे पर, युद्ध के कारण पैदा हुए तनाव ने वैश्विक बाजारों को हिला दिया है, जिससे चीन और हांगकांग के शेयर बाजारों में एक साल की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने इस आर्थिक संकट पर चर्चा के लिए आपातकालीन बैठक बुलाई है.
इजरायल की सेना और खुफिया एजेंसियां इस युद्ध में ‘टारगेटेड किलिंग’ को एक मुख्य हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स के डेविड एम. हाफिंगर की रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल ने ईरान के सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह अस्थिर करने के लिए उसके शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया है. मंगलवार को ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी की एक सेफ हाउस में हत्या कर दी गई, जिसे इजरायल ने अपनी खुफिया क्षमता का बड़ा प्रदर्शन बताया है.
इससे पहले 28 फरवरी को युद्ध के पहले ही दिन एक हमले में सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई और उनके कई सैन्य कमांडरों की मौत हो गई थी. इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने कहा है कि उन्होंने सेना को ‘ऑक्टोपस का सिर बार-बार काटने’ का आदेश दिया है. हालांकि, कुछ विशेषज्ञ जैसे पूर्व खुफिया प्रमुख डैनी सिट्रिनोविज़ चेतावनी देते हैं कि ‘सिर काटने’ की इस रणनीति की अपनी सीमाएं हैं. उनका मानना है कि ईरान का नेतृत्व तंत्र काफी गहरा है और एक नेता के जाने पर दूसरा उसकी जगह ले लेता है, जैसा कि खामेनेई के बाद उनके बेटे मुजतबा के आने से हुआ.
सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान के भीतर स्थिति काफी तनावपूर्ण है. सोमवार को भारी हवाई हमलों के बाद राजधानी के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों में बिजली पूरी तरह गुल हो गई. ट्रंप की समय सीमा नजदीक आने के कारण घबराए हुए लोग पेट्रोल पंपों पर ईंधन का स्टॉक करने के लिए लंबी कतारों में खड़े देखे जा रहे हैं. सीएनएन के मुताबिक, युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक ईरान और लेबनान में हजारों लोग मारे जा चुके हैं और दुनिया भर के कई शहरों में युद्ध विरोधी प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. इजरायल का दावा है कि उसने ईरान की 92% बैलिस्टिक मिसाइलों को बीच में ही रोक लिया है, लेकिन कुछ मिसाइलों के डिमोना (परमाणु केंद्र के पास) गिरने से इजरायली सुरक्षा तंत्र पर भी सवाल उठ रहे हैं.
विश्लेषण
आकार पटेल: मैं चाहता हूँ कि ईरान जीते
मैं चाहता हूँ कि ईरान जीते. जीत का मतलब क्या है? ईरान इसे इस तरह देखता है: संयुक्त राज्य अमेरिका को ईरान पर लगे अपने दशकों पुराने प्रतिबंधों को हटाना होगा; उसे अरब देशों में अपने सैन्य ठिकानों को खत्म करना होगा; इस्राइल को लेबनान पर अपना कब्ज़ा खत्म करना होगा; और ईरान को उस नुकसान का मुआवज़ा मिलना चाहिए जो उसने इन सालों में और इस जंग में झेले हैं.
हालाँकि अमेरिकी और इस्राइली बमबारी में एक हज़ार से ज़्यादा ईरानी पहले ही मारे जा चुके हैं और अभी और भी मरेंगे, लेकिन अगर ईरान इन चीज़ों को हासिल करने में कामयाब रहता है, तो यह उसकी पूरी जीत होगी.
मैं क्यों चाहता हूँ कि ईरान जीते? सबसे बुनियादी बात तो यह है कि दो परमाणु हथियारों से लैस विरोधियों, इस्राइल और अमेरिका के खिलाफ लड़ाई में वह कमज़ोर पक्ष है. सैन्य रूप से वह उनसे कमज़ोर है, हाँ, लेकिन वह बेबस नहीं है, जैसा कि दुनिया ने 28 फरवरी से देखा है. उसमें ज़्यादातर दूसरे देशों की तुलना में कहीं ज़्यादा मज़बूत इरादे हैं. ईरान का साथ देने की एक और स्वाभाविक वजह यह है कि वह हमारी ही तरह एक ऐसा देश है जिसे ‘पश्चिम’ कहे जाने वाले देशों ने कुचला है. इस वजह से भी मेरी उनके साथ एकजुटता है.
गहराई से देखें तो यहूदी देश इस्राइल और अमेरिका उपनिवेशवादी हैं जो खुद को ज़बरदस्ती ऐसी दुनिया पर थोप रहे हैं जो उन्हें नहीं चाहती. उनके और उनके कामों का विरोध होना चाहिए. ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध उसे दुनिया की बैंकिंग व्यवस्था से अलग-थलग कर देते हैं, जिससे दुनिया के साथ व्यापार करना मुश्किल हो जाता है और इनका मकसद न केवल ईरानी राज्य को कमज़ोर करना है बल्कि ईरानियों को गरीब बनाए रखना है. ये संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध नहीं हैं, बल्कि अमेरिका द्वारा एकतरफा थोपे गए हैं, जो अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल उन देशों को परेशान करने के लिए करता है जिन्हें वह पसंद नहीं करता, जैसा कि हम वेनेज़ुएला और क्यूबा के मामले में भी देख रहे हैं.
ईरान की उन्हें हटाने की मांग जायज़ है. मैं चाहता हूँ कि वे हटें और इसके लिए ईरान का जीतना ज़रूरी है.
बहरीन, कुवैत, इराक, यूएई, जॉर्डन और सऊदी अरब में अमेरिका के सैन्य ठिकाने हैं. उसके पास वहाँ इतने सारे सैनिक और हथियार क्यों हैं? अमेरिका नाम के अलावा हर तरह से एक साम्राज्य चलाता है. अमेरिकी सेना को दुनिया को धमकाना नहीं चाहिए और उसे अपनी मातृभूमि पर ध्यान देना चाहिए. ईरान ने यह बहस शुरू कर दी है.
इस्राइल आज वही है जो 40 साल पहले दक्षिण अफ्रीका था, लेकिन उससे भी बदतर. यह एक रंगभेदी देश है (यह उन लाखों लोगों को नियंत्रित करता है जिनके पास न वोट है और न अधिकार) जो कई मानवाधिकार संगठनों के अनुसार नरसंहार का दोषी है, जिसमें वह संगठन भी शामिल है जिसका मैं प्रतिनिधित्व करता हूँ, और यहाँ तक कि इस्राइल के अंदर के संगठन भी ऐसा कहते हैं. उसने मिडिल ईस्ट को डराने के लिए अपनी सैन्य शक्ति और लगभग असीमित अमेरिकी हथियारों और फंडिंग का इस्तेमाल किया है और इसे खत्म होना चाहिए. ईरान की जीत इसे सुलझाने में बहुत मददगार होगी.
प्रतिबंधों की वजह से ईरान को पिछले सालों में सैकड़ों अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है और जब से उस पर जंग थोपी गई है, उसे और भी नुकसान पहुँचा है. ईरान मुआवज़े का हकदार है और यह उसे अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा दिया जाना चाहिए.
यही वे कारण हैं जिनकी वजह से मैं चाहता हूँ कि ईरान जीते. मुझे ऐसा क्यों लगता है कि ईरान की जीत मुमकिन है और शायद इसकी पूरी संभावना भी है? इसका जवाब बेशक यह है कि दिखावे के बावजूद, इस जंग पर उसी का नियंत्रण है. अमेरिका और इस्राइल, ईरान और उसकी आबादी को भयानक सज़ा दे सकते हैं, और उन्होंने दी भी है—स्कूली लड़कियों की हत्या करके और बुनियादी ढांचे पर हमला करके. उन्होंने ईरानी नेताओं की हत्या की है और संभावना है कि वे और भी नेताओं को मारेंगे. लेकिन वे शासन बदलने में नाकाम रहे हैं, जो इस युद्ध का लक्ष्य था. ईरान का इस्लामिक गणराज्य अभी भी कायम है.
ईरान का जवाब सटीक और सीमित है: वह समुद्र के रास्ते मिडिल ईस्ट से तेल, गैस या किसी भी सामान को बाहर निकलने या अंदर आने नहीं देगा. पानी पर उसका नियंत्रण जितनी उसकी हिंसा की ताकत पर आधारित है, उतनी ही हिंसा की धमकी पर भी है, जिसने असल में व्यापारिक जहाजों को हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पार करने की कोशिश करने से रोका है.
ईरान का जवाब नपा-तुला है और उसका अपना तेल अभी बहाया जा सकता है. और उसमें अमेरिकी ठिकानों और उन देशों पर हमला करने की कुछ क्षमता बची हुई है जो इन ठिकानों की मेज़बानी करते हैं, जैसा कि हमने देखा है. जीतने के लिए उसे बस इन दो चीज़ों की ज़रूरत है.
जब तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फारस की खाड़ी में जहाजों की आवाजाही पर नियंत्रण नहीं कर लेते, तब तक कच्चे तेल और गैस की कीमत बढ़ती रहेगी, जैसा कि जंग शुरू होने के बाद से हो रहा है. अमेरिकी आज पेट्रोल और डीज़ल के लिए ज़्यादा कीमत चुका रहे हैं और जैसे-जैसे जंग जारी रहेगी, वे और भी ज़्यादा चुकाएंगे.
दुर्भाग्य से, पूरी दुनिया भी इस समस्या की बंधक बनी हुई है और भुगतेगी, लेकिन अब तक दुनिया ने असली अपराधियों, असली खलनायकों, अमेरिका और इस्राइल से अपनी जंग खत्म करने को नहीं कहा है. ऐसा इसलिए है क्योंकि वे उनसे डरते हैं और यही कारण है कि मैं चाहता हूँ कि ईरान जीते.
यहाँ से आगे, अमेरिका को संघर्ष की स्थिति को बदलने के लिए कुछ नाटकीय करने की ज़रूरत है, जो अभी ईरान के पक्ष में है. हत्याओं और अंधाधुंध बमबारी ने काम नहीं किया है. उम्मीद की जाती है कि अमेरिका कोई समझौता करे और अपनी हिंसा को खत्म करे और ईरान की कम से कम दो मांगों को मान ले: भविष्य में हिंसा न होने की गारंटी और प्रतिबंधों को स्थायी रूप से हटाना. इस्राइल से मुझे कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि उसने पिछले सालों में दिखाया है कि वह जो चाहता है वह बिना सोचे-समझे किया गया अंतहीन विनाश है.
मैं चाहता हूँ कि ईरान जीते, और ऐसा होने के लिए अमेरिका को हारने की ज़रूरत नहीं है. उसे बस सही काम करना है.
पश्चिम एशिया संकट का असर लंबा होगा, भारत को तैयार रहने की जरुरत-पीएम
स्क्रोल के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को लोकसभा में कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का असर लंबे समय तक महसूस किया जाएगा और भारत को इसके लिए तैयार रहना चाहिए. उन्होंने देशवासियों से एकजुट रहने की अपील भी की.
प्रधानमंत्री ने यह बयान ऐसे समय में दिया है जब युद्ध के कारण ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है. अमेरिका और इज़राइल के हमलों के जवाब में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अधिकांश अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए बंद कर दिया है. इसी समुद्री मार्ग से वैश्विक पेट्रोलियम आपूर्ति का लगभग 20% वहन होता है.
अब इसका प्रभाव भारत के एलपीजी आपूर्ति पर दिखने लगा है. भारत अपनी करीब 60% एलपीजी जरूरत आयात करता है, जिसमें अधिकांश आपूर्ति खाड़ी देशों से होती है. आपूर्ति में बाधा के चलते कई जगहों पर रसोई गैस की किल्लत देखी जा रही है, कुछ रेस्तोराँ अस्थायी रूप से बंद हो गए हैं और गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें लग रही हैं.
प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए आयात करता है. सरकार लगातार प्रयास कर रही है कि इसका असर आम नागरिकों पर न पड़े.” उन्होंने बताया कि घरेलू एलपीजी उत्पादन को प्राथमिकता दी जा रही है ताकि आपूर्ति सुचारु बनी रहे.
उन्होंने यह भी कहा कि भारत के पास 53 लाख टन से अधिक का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार है और रिफाइनरी क्षमता भी बढ़ाई गई है। सरकार खाड़ी क्षेत्र और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है ताकि ऊर्जा, गैस और उर्वरक की जरूरतें पूरी की जा सकें।
प्रधानमंत्री ने कहा कि कोविड-19 के दौरान जिस तरह देश ने एकजुट होकर चुनौतियों का सामना किया, उसी तरह इस स्थिति से निपटने के लिए भी तैयार रहना होगा. पश्चिम एशिया में स्थिति को देखते हुए भारत की चिंता ज्यादा है, क्योंकि वहां एक करोड़ से अधिक भारतीय रहते और काम करते हैं। साथ ही बड़ी संख्या में भारतीय समुद्री जहाजों पर काम करते हैं।
प्रधानमंत्री के अनुसार, संघर्ष शुरू होने के बाद से अब तक 3.75 लाख से अधिक भारतीय देश लौट चुके हैं. ईरान से करीब 1,000 भारतीय सुरक्षित वापस आए हैं, जिनमें 700 से अधिक मेडिकल छात्र शामिल हैं.
असम में भाजपा को बड़ा झटका: कैबिनेट मंत्री नंदिता गार्लोसा कांग्रेस में शामिल
मनोज आनंद की रिपोर्ट है कि असम में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को एक बड़ा झटका लगा है. पार्टी नेता और कैबिनेट मंत्री नंदिता गार्लोसा रविवार देर रात कांग्रेस में शामिल हो गईं. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने अंतिम क्षणों तक उनका मन बदलने की कोशिश की, मगर वह नहीं मानीं. गार्लोसा ने हाफलोंग सीट से चुनाव लड़ने के लिए अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया है. वह हाफलोंग से कांग्रेस उम्मीदवार निर्मल लांगथासा की उपस्थिति में पार्टी में शामिल हुईं. इस घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए कांग्रेस पार्टी ने एक बयान में कहा, “हमें यह घोषणा करते हुए बहुत खुशी हो रही है कि नंदिता गार्लोसा कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गई हैं. वह पिछले पांच वर्षों से ‘दिमा हसाओ’ की आवाज रही हैं और वह हमेशा अपने विश्वासों और सिद्धांतों के लिए खड़ी रही हैं. भाजपा में उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी, क्योंकि हिमंता बिस्वा सरमा की रुचि केवल आदिवासियों की जमीन बड़े कॉर्पोरेट घरानों को बेचने में है. कांग्रेस उन्हें हाफलोंग सीट से अपना उम्मीदवार घोषित करती है.”
एक ग्रे सन्नाटा; मोदी की पर्सनल डिप्लोमेसी से अब भारत को लाभ के बजाय नुकसान
“द टेलीग्राफ” में मुकुल केसवन का यह लेख भारत की वर्तमान विदेश नीति और अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष के संदर्भ में उसके संभावित परिणामों का एक तीखा और विस्तृत विश्लेषण है. वह इसकी शुरुआत में ही चेतावनी देते हैं कि ईरान पर अमेरिका और इजरायल द्वारा थोपा गया युद्ध भारत के लिए एक अस्तित्वगत संकट पैदा करेगा. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों (तेल और गैस) के लिए खाड़ी देशों पर बहुत अधिक निर्भर है.
ईरान द्वारा सामरिक मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने से वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होगी. अमीर देश (जैसे जापान और कोरिया) ऊँची बोलियाँ लगाकर तेल खरीद लेंगे, लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों को या तो अत्यधिक महँगा ईंधन खरीदना होगा या उसके बिना गुजारा करना होगा.
संकट केवल ईंधन तक सीमित नहीं है. भारत की कृषि का आधार ‘नाइट्रोजन उर्वरक’ है, जो खाड़ी से आने वाली प्राकृतिक गैस से बनता है. गैस की कमी का सीधा अर्थ है—बुवाई के समय खाद की किल्लत. केसवन के अनुसार, कूटनीति बीजों को नहीं उगा सकती; यदि खाद नहीं मिली, तो भारत में खाद्य सुरक्षा का गंभीर संकट पैदा हो जाएगा.
उनका तर्क है कि भारत सरकार की इजरायल के प्रति नीति केवल ‘रीयलपोलिटिक’ (व्यावहारिक राजनीति) नहीं है, बल्कि यह एक ‘वैचारिक मिलन’ है. भारत का सत्तारूढ़ दल (बीजेपी) इजरायल के उस मॉडल के प्रति आकर्षित है, जिसने फिलिस्तीनियों को मताधिकार से वंचित कर एक प्रकार का रंगभेद स्थापित किया है. हिंदुत्व की आकांक्षाएं भी इसी तरह के ढांचे की ओर हैं.
व्यक्तिगत संबंध बनाम राष्ट्रीय हित: प्रधानमंत्री मोदी की ‘पर्सनल डिप्लोमेसी’ (जैसे वैश्विक नेताओं के साथ घनिष्ठता) अब भारत की प्रतिष्ठा को लाभ के बजाय नुकसान पहुँचा रही है. इजरायल के प्रति “अटूट एकजुटता” के बयानों ने भारत को एक ऐसे युद्ध में अमेरिका-इजरायल का मूक भागीदार बना दिया है, जो खुद भारत की अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकता है.
लेख में शशि थरूर जैसे विचारकों की आलोचना की गई है जो भारत की चुप्पी को ‘यथार्थवादी शासनकला’ कहते हैं. भारत की चुप्पी के पीछे तर्क दिया जाता है कि चीन से निपटने के लिए हमें अमेरिका की ‘कृपा’ चाहिए. चीन और भारत के रुख की तुलना करते हुए केसवन ने लिखा कि चीन ने जहाँ ईरान के हमलों की निंदा की, वहीं उसने अमेरिका-इजरायल की अवैध बमबारी को भी निशाने पर लिया. इसके विपरीत, भारत ने केवल पश्चिमी देशों के सुर में सुर मिलाया और ईरान पर हुए हमलों का जिक्र तक नहीं किया.
लेखक इस दावे को खारिज करते हैं कि अमेरिका का पक्ष लेने से भारत को कोई ठोस लाभ हुआ है. अतीत में ट्रंप के साथ करीबी के बावजूद, अमेरिका ने पाकिस्तान का पक्ष लिया और भारत पर भारी व्यापार शुल्क (टैरिफ) लगाए. भारत जो पहले रूसी तेल खरीदकर अपनी ‘रणनीतिक स्वतंत्रता’ का दावा करता था, अब उसी व्यापार को जारी रखने के लिए अमेरिकी छूट पर निर्भर है. अयातुल्ला खामेनेई की हत्या के बाद शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर करने को लेकर भारत की हिचकिचाहट ने उसकी कमजोर छवि को वैश्विक पटल पर उजागर किया.
वह सवाल उठाते हैं कि क्या भारत की नीति वास्तव में ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ है या यह केवल आत्मसमर्पण है? एक ओर भारत अमेरिका को खुश करने के लिए ईरान से दूरी बना रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन को शांत करने के लिए निवेश नियमों में ढील दे रहा है. भारत ने खुद को उन शक्तियों (अमेरिका और इजरायल) के साथ जोड़ा है, जिन्होंने मध्य पूर्व को अस्थिर कर दिया है. इजरायल गाजा और लेबनान में जो विनाश कर रहा है, उसका खामियाजा अंततः भारत जैसे उन देशों को भुगतना पड़ेगा जिनकी रसोई गैस और अनाज खाड़ी की स्थिरता पर टिके हैं.
लेख का निष्कर्ष यह है कि अमेरिका के पीछे आँख मूँदकर चलना कोई तर्कसंगत व्यवहार नहीं है. चुप्पी को ‘संयम’ या ‘शक्ति’ कहना एक भ्रम है. यदि भारत सरकार एक ऐसे अवैध युद्ध का मूक समर्थन करती है जो उसके अपने नागरिकों के चूल्हे और रोटी को खतरे में डालता है, तो यह ‘जिम्मेदार शासनकला’ नहीं बल्कि ‘आत्मघाती’ कदम है. अंग्रेजी में मुकुल केसवन का यह पूरा लेख यहां पढ़ा जा सकता है.
वित्तीय संकट और विमानों की कमी से पिछले एक दशक में 11 एयरलाइंस भारतीय विमानन बाजार से बाहर
सरकार ने सोमवार को संसद को बताया कि पिछले एक दशक में ग्यारह एयरलाइंस भारतीय विमानन बाजार से बाहर हो गई हैं. वित्तीय संकट, विमानों की कमी और आंतरिक मुद्दों को इसके पीछे मुख्य कारण बताया गया है.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में कहा कि यह क्षेत्र ‘डिरेगुलेटेड’ (विनियमित नहीं) है और एयरलाइंस वाणिज्यिक आधार पर चलती हैं, जबकि सरकार उद्योग में संतुलन बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित कर रही है.
उन्होंने कहा, “वर्ष 2016 से अब तक कुल 11 एयरलाइंस वित्तीय तनाव, विमानों की अनुपलब्धता और अन्य आंतरिक मुद्दों जैसे कारणों से बाजार से बाहर हो गई हैं. इसके अलावा, एयरएशिया (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड (अब एआईएक्स कनेक्ट प्राइवेट लिमिटेड) का एयर इंडिया एक्सप्रेस लिमिटेड के साथ विलय हो गया है, और टाटा एसआईए एयरलाइंस लिमिटेड (विस्तारा) का एयर इंडिया लिमिटेड में विलय हो गया है.” इस जवाब में उन एयरलाइंस के विवरण शामिल नहीं थे जिन्होंने परिचालन बंद कर दिया है. बयान में क्षेत्र में हो रहे एकीकरण की ओर भी संकेत किया गया.
गुजरात में ईंधन की किल्लत की दहशत; लंबी कतारें, प्रमुख शहरों में पेट्रोल पंप बंद
अहमदाबाद से दिलीप सिंह क्षत्रिय की रिपोर्ट है कि गुजरात में सोमवार को उस समय दहशत का माहौल बन गया जब प्रमुख शहरों में पेट्रोल पंप बंद होने और लंबी कतारों की खबरें फैल गईं. डीलरों और अधिकारियों द्वारा आपूर्ति सामान्य होने के दावों के बावजूद सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा.
सूरत से अहमदाबाद और वडोदरा से राजकोट तक, पूरे दिन कतारों में खड़े वाहनों और चिंतित यात्रियों के दृश्य छाए रहे. दिन भर में स्थिति तेजी से बिगड़ी, क्योंकि अपुष्ट संदेशों और आपूर्ति रुकने के डर से लोगों ने भारी मात्रा में ईंधन खरीदना शुरू कर दिया, जिससे पहले से ही दबाव झेल रहे रिटेल नेटवर्क पर बोझ और बढ़ गया.
जैसे-जैसे दबाव बढ़ा और सार्वजनिक चिंता गहरी हुई, राज्य सरकार ने बढ़ते असंतोष के बीच स्थिति को शांत करने के लिए देर से कदम उठाया. चुप्पी तोड़ते हुए, गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने कहा, “सरकार सभी पंपों पर पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह तैयार है. ईंधन की कोई कमी नहीं है, और केंद्र व राज्य दोनों सरकारें आपूर्ति की स्थिति पर पैनी नजर रख रही हैं.”
तनाव के शुरुआती संकेत सूरत और राजकोट में ही दिखने लगे थे, जहाँ कथित तौर पर तेल कंपनियों से ईंधन की आपूर्ति कम कर दी गई थी, जिससे डीलरों के स्टॉक में कमी आई और दैनिक संचालन में दिक्कतें शुरू हुईं. इन शहरों के कई पेट्रोल पंप बंद होने की कगार पर पहुँच गए, जिससे कुछ आउटलेट अस्थायी रूप से बंद हो गए और चालू पंपों पर लंबी कतारों की ‘चेन रिएक्शन’ शुरू हो गई.
अहमदाबाद में भी इसका असर दिखने लगा है, जहाँ कुछ चुनिंदा पंप बंद हो गए और बाकी जगहों पर भारी भीड़ देखी गई, जो शहरी आपूर्ति नेटवर्क पर बढ़ते दबाव की ओर इशारा करती है.
सूत्रों के संकेत मिल रहे हैं कि थोक ईंधन की कीमतों में ₹12 से ₹22 की बढ़ोतरी ने खरीद के तरीकों को बदल दिया है, जिससे औद्योगिक खरीदार अब सीधे कंपनी से खरीदने के बजाय खुदरा (रिटेल) पंपों की ओर रुख कर रहे हैं. इस बदलाव से सार्वजनिक ईंधन आउटलेट्स पर दबाव बढ़ रहा है, जिससे मांग और आपूर्ति का असंतुलन गहरा गया है. इस बीच, सौराष्ट्र और कच्छ के डीलर संघों ने पहले ही चिंता जताई है और स्थिर आपूर्ति के लिए तेल कंपनियों से औपचारिक संपर्क किया है. अकेले राजकोट में, प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं से जुड़े कम से कम सात पंप ‘ऑफलाइन’ (बंद) होने की खबर है, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है.
सूरत और तापी जिला पेट्रोलियम एसोसिएशन के संयुक्त सचिव अनिल देसाई ने कहा, “कंपनियों ने अतिरिक्त ग्राहकों को ईंधन की आपूर्ति करने से इनकार कर दिया है. उद्योगों को दी जाने वाली 2,000 से 5,000 लीटर की थोक आपूर्ति बंद कर दी गई है, और अब वह मात्रा छोटे खुदरा उपभोक्ताओं के बीच वितरित की जा रही है, जिसका सीधा असर स्थानीय उद्योगों पर पड़ेगा.”
फेडरेशन ऑफ गुजरात पेट्रोल-डीजल डीलर एसोसिएशन के सचिव धीमंत घेलानी ने सतर्क रुख अपनाते हुए कहा, “वास्तव में कोई कमी नहीं है. यह व्यवधान काफी हद तक छुट्टियों के कारण उत्पन्न एक अस्थायी आपूर्ति श्रृंखला की समस्या है. हमने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के साथ यह मामला उठाया है, और अगले आठ दिनों के भीतर स्थिति सामान्य होने की उम्मीद है.”
‘सेंचुरी’ में बस एक ‘छक्के’ की कसर; रुपया 50 पैसे लुढ़ककर 94.03 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 94 के स्तर को पार कर गया. क्रिकेट की भाषा में कहा जाए तो सेंचुरी में सिर्फ एक छक्के की कसर है. सोमवार को ग्रीनबैक (अमेरिकी डॉलर) के खिलाफ यह 50 पैसे टूटकर 94.03 (अनंतिम) के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ. वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी कोषों की निरंतर निकासी ने निवेशकों को बेचैन कर दिया है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, विदेशी मुद्रा व्यापारियों के अनुसार, मजबूत होते अमेरिकी डॉलर और घरेलू शेयर बाजारों में भारी गिरावट ने स्थानीय मुद्रा को और कमजोर कर दिया. अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में, रुपया 93.84 पर खुला और पूरे दिन इसमें गिरावट का दौर जारी रहा. अंततः यह पहली बार 94 के आंकड़े को पार करते हुए अपने पिछले बंद भाव से 50 पैसे गिरकर 94.03 (अंतिम) पर बंद हुआ.
इससे पहले शुक्रवार को भी रुपया 64 पैसे की भारी गिरावट के साथ 93.53 पर बंद हुआ था, जिससे इसने पहली बार 93 का स्तर पार किया था.
मिरए एसेट शेयरखान के शोध विश्लेषक अनुज चौधरी ने कहा, “रुपया नकारात्मक रुख के साथ कारोबार करेगा, क्योंकि बिगड़ते वैश्विक हालातों और भू-राजनीतिक तनाव के कारण रुपये पर दबाव बना रह सकता है. हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा समय-समय पर किए जाने वाले हस्तक्षेप से निचले स्तरों पर रुपये को सहारा मिल सकता है.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि डॉलर-रुपये की स्पॉट कीमत ₹93.60 से ₹94.40 के दायरे में रहने की संभावना है.
भारतीय शेयर बाजार में कोहराम; कुछ मिनटों में निवेशकों के 13.5 लाख करोड़ रुपये डूबे
अरशद खान की रिपोर्ट है कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने के कोई संकेत न मिलने के कारण सोमवार को भारत के शेयर बाजार में एक बार फिर भारी गिरावट आई. बीएसई सेंसेक्स 1,837 अंक या 2.46% गिरकर 72,696 पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 50 602 अंक या 2.6% की गिरावट के साथ 22,512 पर आ गया. विशेष रूप से, अप्रैल 2025 के बाद से यह बाजार का सबसे निचला बंद स्तर है.
महज कुछ ही मिनटों में निवेशकों के 13.5 लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गए, क्योंकि बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण शुक्रवार के 428.76 लाख करोड़ रुपये से घटकर 415.21 लाख करोड़ रुपये रह गया. व्यापक बाजार को भी गंभीर नुकसान हुआ, जिसमें निफ्टी मिडकैप 100 और निफ्टी स्मॉलकैप 100 सूचकांकों में लगभग 4-4% की गिरावट आई. निफ्टी 500 की कंपनियों में से केवल 15 शेयर ही बढ़त के साथ बंद हो सके, जो इस बिकवाली की तीव्रता और व्यापकता को दर्शाता है.
बाजार में इस ताज़ा गिरावट का मुख्य कारण सप्ताहांत के दौरान भू-राजनीतिक तनाव का और बिगड़ना है. इसके कारण कच्चे तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आया है, जिससे ब्रेंट क्रूड 110-115 डॉलर प्रति बैरल के बीच कारोबार कर रहा है.
तेल की ऊंची कीमतों से आने वाले महीनों में मुद्रास्फीति (महंगाई) बढ़ने की आशंका है, जिससे मुद्रा की स्थिरता और कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ेगा और अंततः शेयर बाजार की धारणा प्रभावित होगी. भारतीय बाजार में गिरावट एशियाई बाजारों के रुझान के अनुरूप ही रही; सोमवार को जापान का निक्केई 225, चीन का शंघाई कंपोजिट और दक्षिण कोरिया का कोस्पी 4% से 7% के बीच लुढ़क गए.
वोटर लिस्ट या संदेह सूची?”: बंगाल में SIR के दौरान मुस्लिमों और महिलाओं के नाम ज्यादा काटे गए
आर्टिकल 14 के रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया सवालों के घेरे में है. वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद 1.2 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम या तो हटा दिए गए हैं या जांच के दायरे में रखे गए हैं. इनमें से लगभग 60 लाख से अधिक मामलों को “अंडर एडजुडिकेशन” यानी अंतिम निर्णय के लिए लंबित रखा गया है, जो किसी भी राज्य में सबसे ज्यादा है.
अधिकारियों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया में डेटा की गलतियां, अस्पष्ट नोटिस और तकनीकी खामियां सामने आई हैं. डिजिटाइजेशन और एआई सिस्टम की गड़बड़ी इसकी बड़ी वजह है. पुराने हस्तलिखित रिकॉर्ड को डिजिटल फॉर्म में बदलते समय कई त्रुटियां हुईं जैसे “पिता” शब्द “पता” बन गया, जिससे पहचान में गड़बड़ी दिख रही है.
26 वर्षीय अमृता प्रियदर्शिनी, जो पिछले सात साल से मतदान कर रही थीं, अचानक जांच के दायरे में आ गईं. उन्होंने पासपोर्ट और आधार समेत सभी दस्तावेज जमा किए, बावजूद उन्हें यह नहीं बताया गया कि समस्या क्या है.
सायंतनी उपाध्याय की रिपोर्ट के अनुसार, आंकड़ों से पता चलता है कि जिन जिलों में मुस्लिम आबादी अधिक है, वहां सबसे ज्यादा मतदाता जांच के दायरे में हैं. मुर्शिदाबाद, मालदा और नॉर्थ 24 परगना जैसे जिलों में लाखों वोटर अभी भी “अंडर एडजुडिकेशन” हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यह पैटर्न संयोग नहीं हो सकता.
रिपोर्ट के अनुसार, पुरुषों की तुलना में 7% अधिक महिलाओं के नाम हटाए गए हैं. ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं, जिनके पास सीमित दस्तावेज होते हैं, इस प्रक्रिया में ज्यादा प्रभावित हुई हैं. रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है.
ट्रांस अमेंडमेंट बिल 2026 के खिलाफ सड़कों पर ट्रांस समुदाय
द मूकनायक के रिपोर्ट के अनुसार, ट्रांसजेंडर समुदाय इन दिनों देशभर में ट्रांस अमेंडमेंट बिल 2026 के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहा है. समुदाय की मांग है कि इस विधेयक को तुरंत वापस लिया जाए क्योंकि यह उनकी पहचान, अधिकार और गरिमा पर चोट करता है.
विरोध का सबसे बड़ा कारण बिल में दी गई ट्रांसजेंडर की परिभाषा से है. उनका कहना है कि यह परिभाषा बेहद सीमित है और ट्रांस मेन, ट्रांस वीमेन, नॉन-बाइनरी और ख्वाजा सरा जैसी पहचानों को बाहर कर देती है. इसके बजाय, बिल केवल कुछ पारंपरिक समूहों हिजड़ा, किन्नर, अरावानी, जोगता, यूनुक और इंटरसेक्स लोगों तक ही सीमित रह जाता है, जो नालसा जजमेंट के सेक्शन 129 (2) का सीधा उल्लंघन है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों को ट्रांसजेंडर लोगों की स्व-चयनित जेंडर पहचान- मेल, फीमेल या थर्ड जेंडर को कानूनी मान्यता देने का आदेश दिया गया था.
मेडिकल परीक्षण की अनिवार्यता एवं निजता का हनन
गीता सुनील पिल्लई की रिपोर्ट अनुसार, बिल का एक और विवादित पहलू मेडिकल परीक्षण की अनिवार्यता भी है. दरसअल पहचान के लिए मेडिकल अथॉरिटी की जरूरत को समुदाय अपनी स्वतंत्रता पर हमला मानता है. इसमें अस्पतालों को ट्रांसजेंडर लोगों की सर्जरी से जुड़ी सारी जानकारी सरकार को देने का प्रावधान है, जो निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन बताया जा रहा है.
समुदाय की मांग है कि बिल को पूरी तरह वापस लिया जाए और सरकार 2014 के नालसा जजमेंट के निर्देशों का पालन करे. अगर नया बिल लाना है तो वह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुरूप हो एवं ट्रांस समुदाय से परामर्श के बाद तैयार किया जाए और संसदीय स्थायी समिति को भेजा जाए.
अपील :
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