24/01/2026: अडानी को समन स्याही और सील में अटके | अमर्त्य सेन के एसआईआर पर सवाल | बांग्ला भाषी मुस्लिमों पर यूएन के सवाल | बांग्लादेश वर्ल्ड कप से बाहर | यूक्रेन पर हमला | ईरान का भविष्य
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
यूएन की चिंता: संयुक्त राष्ट्र समिति ने असम में बंगाली मुस्लिमों के साथ भेदभाव पर भारत से जवाब मांगा. सरकार ने पर्याप्त जानकारी नहीं दी.
अडानी समन लौटाया: भारत सरकार ने ‘स्याही वाले हस्ताक्षर’ न होने पर अडानी के लिए आया अमेरिकी कोर्ट का समन दो बार लौटा दिया.
जनगणना 2027: भारत की पहली डिजिटल जनगणना होगी. पहली बार जाति की गिनती भी की जाएगी.
रूसी तेल और अमेरिका: भारत द्वारा रूसी तेल का आयात घटाने पर अमेरिका 25% टैरिफ हटाने पर विचार कर रहा है.
टी20 वर्ल्ड कप: सुरक्षा कारणों से बांग्लादेश के मना करने पर आईसीसी ने स्कॉटलैंड को शामिल किया. पाकिस्तान ने बांग्लादेश का साथ दिया.
मणिपुर तनाव: कुकी पत्नी से मिलने गए मैतेई व्यक्ति की हत्या. इम्फाल में फिर भड़के विरोध प्रदर्शन.
डिजिटल अरेस्ट स्कैम: 14 करोड़ की ठगी में पुजारी और एमबीए गिरफ्तार. तार कंबोडिया से जुड़े.
हिमंता का बयान: असम सीएम ने कहा, मिया मुस्लिमों को ‘काबू’ में रखने के लिए सख्ती जारी रहेगी.
चीन में कार्रवाई: चीन की सेना में बड़ी उथल-पुथल. दो शीर्ष जनरलों पर भ्रष्टाचार की जांच शुरू.
व्हाइट हाउस की गलती: ग्रीनलैंड में पेंग्विन के साथ ट्रंप की एआई फोटो पोस्ट की. सोशल मीडिया पर उड़ा मजाक.
यूएन समिति ने असम में बांग्ला भाषी मुस्लिमों के साथ भेदभाव पर चिंता जताई, भारत से जवाब मांगे
संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (सीईआरडी) ने असम में बंगाली भाषी मुसलमानों के साथ किए जा रहे व्यवहार पर गंभीर चिंता व्यक्त की है. समिति ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) प्रक्रिया के दौरान कथित नस्लीय भेदभाव, जबरन बेदखली, घृणा भाषण (हेट स्पीच) और कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग का हवाला दिया है.
“मकतूब मीडिया” की रिपोर्ट के अनुसार, जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि को 19 जनवरी, 2026 को लिखे एक पत्र में, सीईआरडी ने कहा कि उसे भारत सरकार द्वारा दी गई “जानकारी की कमी” पर खेद है. यह जानकारी 12 मई, 2025 को भेजे गए एक पिछले पत्र के जवाब में मांगी गई थी, जिसमें पूर्वोत्तर के राज्य में इस समुदाय द्वारा सामना किए जा रहे कथित मानवाधिकार उल्लंघनों पर स्पष्टीकरण मांगा गया था. सीईआरडी ने कहा कि सरकार का जवाब अधिकांश आरोपों का पर्याप्त रूप से समाधान करने में विफल रहा.
इसके अलावा, समिति ने जिन प्रमुख मुद्दों पर चिंता जताई, उनमें शामिल है-एनआरसी से बाहर होना. उसका कहना है कि प्रक्रियात्मक और प्रशासनिक खामियों, दस्तावेजों को प्राप्त करने में कठिनाइयों और “गैर-मूल निवासी” के रूप में वर्गीकरण के कारण बंगाली भाषी मुसलमानों को अंतिम एनआरसी सूची से बाहर रखा गया. समिति ने नोट किया कि इस शब्द की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है.
दूसरा है-सत्यापन मानक. समिति ने कड़े सत्यापन मानकों और विदेशी न्यायाधिकरण की कार्यवाही के निलंबन पर भी चिंता जताई, जिसने कथित तौर पर “संदिग्ध मतदाताओं” को अपनी स्थिति को चुनौती देने से रोक दिया. तीसरा-जबरन बेदखली. समिति ने कई जिलों में बिना पर्याप्त आवास या मुआवजे के व्यवस्थित रूप से की गई जबरन बेदखली की रिपोर्टों का हवाला दिया, जिससे बंगाली भाषी मुस्लिम परिवार असंगत रूप से प्रभावित हुए हैं. चौथा-हिंसा और हेट स्पीच. असम में विशेष रूप से 2024 के राष्ट्रीय चुनावों के दौरान बढ़ते घृणा भाषण और हिंसा भड़काने की घटनाओं के साथ-साथ पुलिस द्वारा अत्यधिक और घातक बल प्रयोग और नागरिकों व संगठित समूहों द्वारा हिंसक हमलों के आरोपों पर भी चेतावनी दी गई.
समिति ने केंद्र सरकार से असम में बंगाली भाषी मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय करने का आव्हान किया है. साथ ही, भारत की आगामी आवधिक रिपोर्टों की प्रस्तुति के दौरान इन चिंताओं को दूर करने के लिए उठाए गए कदमों पर विस्तृत जानकारी मांगी है. समिति ने कन्वेंशन के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए रचनात्मक संवाद जारी रखने की अपनी इच्छा दोहराई है.
असम सरकार ‘मिया’ मुसलमानों को परेशान करना जारी रखेगी, वरना सिर पर चढ़कर नाचेंगे: हिमंता
न तो कोई लिहाज है, न किसी तरह का संकोच. असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने खुलकर कहा है कि उनकी सरकार ‘मिया’ (असम के पूर्वी बंगाल मूल के मुसलमान) समुदाय को परेशान करना जारी रखेगी.
विधानसभा चुनाव से पहले असम में चल रहे मतदाता सूची संशोधन अभ्यास में गड़बड़ियों के विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए मुख्यमंत्री ने शनिवार को कहा कि इस संशोधन को लेकर कोई विवाद नहीं है. उन्होंने सवाल किया कि क्या किसी हिंदू या स्वदेशी असमिया मुस्लिम को कोई नोटिस दिया गया है? मनोज आनंद की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने दोहराया, “हम ‘मियाओं’ को परेशान करना जारी रखेंगे, सिर्फ उन्हें काबू में रखने के लिए. अगर हम ऐसा नहीं करते हैं, तो वे हमारे सिर पर नाचेंगे.”
सरमा ने कहा, “मैंने पहले भी कहा है कि हम उन्हें परेशान करते रहेंगे. इसमें छिपाने जैसा कुछ नहीं है. उन्हें यह समझना चाहिए कि असमिया लोग कहीं न कहीं विरोध कर रहे हैं. अगर हम उन्हें टोकना (उकसाना) बंद कर देंगे, तो वे सोचेंगे कि असमिया लोग हार गए हैं.”
मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया, “इसलिए, उन्हें मतदाता सूची संशोधन के कुछ नोटिस दिए जाएंगे, कुछ बेदखली के नोटिस दिए जाएंगे और कुछ बॉर्डर पुलिस की ओर से नोटिस दिए जाएंगे.”
अडानी समन
स्याही वाले हस्ताक्षर और मुहर न होने पर विधि मंत्रालय ने दो बार लौटाया अमेरिकी अनुरोध
भारत के विधि और न्याय मंत्रालय ने तकनीकी और कानूनी आपत्तियों का हवाला देते हुए अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (एसईसी) द्वारा गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी को जारी समन को औपचारिक रूप से तामील करने से दो बार इनकार कर दिया है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में दायर दस्तावेज बताते हैं कि भारत सरकार ने ‘स्याही वाले हस्ताक्षर’ और ‘आधिकारिक मुहर’ की कमी को मुख्य कारण बताते हुए पिछले साल इन नोटिसों को स्वीकार करने से मना कर दिया था. इस गतिरोध के बाद, एसईसी ने अब अमेरिकी अदालत से ईमेल के जरिए समन भेजने की अनुमति मांगी है.
मामले की गंभीरता को बढ़ाते हुए एसईसी ने नवंबर 2024 में एक शिकायत दर्ज की थी. इसमें आरोप लगाया गया था कि अडानी समूह ने सितंबर 2021 में अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड की ऋण पेशकश के दौरान जानबूझकर या लापरवाही से झूठे और भ्रामक दावे किए, जिससे अमेरिकी प्रतिभूति कानूनों के धोखाधड़ी-रोधी प्रावधानों का उल्लंघन हुआ. इन आरोपों और अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा रिश्वतखोरी के मामले में अभियोग के बाद समूह ने 600 मिलियन डॉलर का बॉन्ड जारी करने की योजना वापस ले ली थी. अडानी समूह ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है.
अदालती दस्तावेजों के अनुसार, एसईसी ने फरवरी 2025 में ‘हेग कन्वेंशन’ के तहत भारत के विधि मंत्रालय से सहायता का औपचारिक अनुरोध किया था. यह अंतरराष्ट्रीय कानून अदालतों को डाक या निजी एजेंटों के बजाय आधिकारिक सरकारी चैनलों के माध्यम से दस्तावेज भेजने की अनुमति देता है. हालांकि, उस समय विधि मंत्रालय ने यह कहते हुए सेवा देने से इनकार कर दिया कि फॉरवर्डिंग लेटर और मॉडल फॉर्म पर हस्ताक्षर और मुहर नहीं थी. मंत्रालय ने अपने जवाब में लिखा, “...यह देखा गया है कि अग्रेषण पत्र पर कोई मुहर और हस्ताक्षर नहीं हैं... इसलिए, विभाग दस्तावेजों की प्रमाणिकता की पुष्टि करने में असमर्थ है.”
एसईसी ने उसी महीने बाद में दस्तावेजों को फिर से जमा किया और तर्क दिया कि ‘हेग कन्वेंशन’ के तहत ऐसी औपचारिकताओं की आवश्यकता नहीं है. लेकिन दिसंबर में, विधि मंत्रालय ने अमेरिकी कानून का हवाला देते हुए फिर से समन की तामील को खारिज कर दिया. मंत्रालय ने तर्क दिया कि एसईसी के नियमों (विशेष रूप से रूल 5(बी) के तहत ‘समन’ जारी करना उनके प्रवर्तन उपकरणों की सूची में शामिल नहीं है. मंत्रालय का कहना था कि नियम केवल प्रशासनिक कार्यवाही या आपराधिक अभियोजन की बात करते हैं, समन की नहीं.
एसईसी ने न्यूयॉर्क कोर्ट में जवाब देते हुए कहा कि भारत का यह रुख ‘हेग कन्वेंशन’ के आधार पर सही नहीं है, क्योंकि कन्वेंशन केवल सेवा की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है, न कि एसईसी के अधिकार क्षेत्र को. इस खबर का असर शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखा. अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों में 3.3% से 14.6% तक की गिरावट दर्ज की गई, जिससे बाजार पूंजीकरण में लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
जनगणना 2027:
पहले चरण में पूछे जाएंगे 33 सवाल, पहली बार जाति की गिनती और डिजिटल पोर्टल का इस्तेमाल
भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त ने जनगणना 2027 के पहले चरण के लिए प्रश्नावली को अंतिम रूप दे दिया है, जिसमें नागरिकों से कुल 33 सवाल पूछे जाएंगे. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, यह भारत की पहली ‘डिजिटल जनगणना’ होगी. साथ ही, यह ऐतिहासिक रूप से पहली बार होगा जब आधिकारिक तौर पर जाति की गिनती भी की जाएगी. सरकार ने नागरिकों को एक विशेष पोर्टल के माध्यम से अपनी जानकारी स्वयं भरने की सुविधा भी देने का फैसला किया है.
गुरुवार (22 जनवरी, 2026) को जारी अधिसूचना के मुताबिक, जनगणना का पहला चरण ‘मकान सूचीकरण और आवास गणना’ 1 अप्रैल से 30 सितंबर, 2026 के बीच आयोजित किया जाएगा. वर्ष 2021 की जनगणना, जो कोविड-19 महामारी के कारण टल गई थी, के लिए 31 सवाल तय किए गए थे, लेकिन नई अधिसूचना में इन्हें बढ़ाकर 33 कर दिया गया है. एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि पहले घर के फर्श, दीवार और छत की सामग्री को एक ही श्रेणी में रखा जाता था, लेकिन अब सटीक डेटा के लिए इसे तीन अलग-अलग सवालों में विभाजित किया गया है.
जनगणना का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण ‘जनसंख्या गणना’ फरवरी 2027 में होगा, जिसमें जाति से जुड़े आंकड़े जुटाए जाएंगे. हालांकि, दूसरे चरण के सवालों की सूची अभी जारी नहीं की गई है. पहले चरण में पूछे जाने वाले प्रमुख सवालों में शामिल हैं:
मकान नंबर और घर की स्थिति.
घर के मुखिया का नाम, लिंग और क्या वे अनुसूचित जाति/जनजाति या अन्य श्रेणी से हैं.
पीने के पानी का मुख्य स्रोत और उसकी उपलब्धता.
शौचालय की सुविधा (सुलभता, प्रकार और जल निकासी).
रसोई में एलपीजी/पीएनजी कनेक्शन और खाना पकाने का मुख्य ईंधन.
घर में मौजूद संपत्ति जैसे रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट, लैपटॉप, और वाहन (साइकिल से लेकर कार तक).
परिवार में मुख्य रूप से खाया जाने वाला अनाज.
इस विशाल कवायद के लिए देश भर में लगभग 30 लाख फील्ड कर्मचारी तैनात किए जाएंगे, जिनमें प्रगणक और पर्यवेक्षक शामिल होंगे. ये कर्मचारी अपने निजी मोबाइल फोन का उपयोग करके डेटा एकत्र करेंगे, जिसके लिए उन्हें उचित मानदेय दिया जाएगा. जनगणना 2027 की तैयारी के तौर पर नवंबर 2025 में देश के चुनिंदा इलाकों में एक ‘प्री-टेस्ट’ भी किया गया था.
रूसी तेल आयात घटने पर अमेरिका ने दिए संकेत, भारत को 25% टैरिफ से मिल सकती है राहत
‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार (23 जनवरी, 2026) को स्पष्ट संकेत दिया कि भारत द्वारा रूसी तेल के आयात में भारी कटौती के बाद, अमेरिका भारत पर लगाए गए अतिरिक्त 25% टैरिफ को हटाने पर विचार कर सकता है. यह बयान दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान ‘पोलिटिको’ को दिए एक साक्षात्कार में बेसेंट ने कहा, “भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी तेल की खरीद ध्वस्त हो गई है. यह एक सफलता है. हालांकि टैरिफ अभी भी लागू हैं—रूसी तेल के कारण 25% टैरिफ अभी भी हैं—लेकिन मुझे लगता है कि उन्हें हटाने का एक रास्ता मौजूद है.”
इस मामले की पृष्ठभूमि अगस्त में शुरू हुई थी, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से रूसी कच्चे तेल के आयात पर नाराजगी जताते हुए भारतीय सामानों पर टैरिफ को दोगुना कर 50% कर दिया था. इसमें विशेष रूप से रूसी तेल आयात के जवाब में लगाया गया 25% का लेवी शामिल था. रॉयटर्स द्वारा उद्धृत व्यापार आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर में भारत का रूसी तेल आयात दो साल के निचले स्तर पर आ गया, जबकि ओपेक देशों से तेल आयात 11 महीने के उच्च स्तर पर पहुँच गया. बेसेंट का यह बयान ट्रंप की उस चेतावनी के बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर भारत ने रूसी तेल की खरीद कम नहीं की तो टैरिफ और बढ़ाए जा सकते हैं.
टी20 वर्ल्ड कप:
आईसीसी ने बांग्लादेश को बाहर कर स्कॉटलैंड को शामिल किया, पाकिस्तान कर सकता है बहिष्कार
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने आधिकारिक तौर पर भारत में होने वाले आगामी टी20 विश्व कप के लिए बांग्लादेश की जगह स्कॉटलैंड को शामिल कर लिया है. स्वरूप स्वामीनाथन के अनुसार, आईसीसी ने यह कड़ा कदम तब उठाया जब बांग्लादेशी दल ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए भारत की यात्रा करने से इनकार कर दिया. हालांकि, आईसीसी ने आश्वासन दिया था कि भारत में ‘बांग्लादेश की राष्ट्रीय टीम, अधिकारियों या समर्थकों के लिए कोई विश्वसनीय या सत्यापन योग्य सुरक्षा खतरा’ नहीं है.
बांग्लादेश चाहता था कि उनके मैचों को श्रीलंका स्थानांतरित कर दिया जाए. उन्होंने अपने ग्रुप को आयरलैंड के साथ बदलने का सुझाव भी दिया था, लेकिन आईसीसी अपने फैसले पर अडिग रही.
बांग्लादेश के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए
इस बीच पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) एकमात्र ऐसा बोर्ड है, जो बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) का समर्थन कर रहा है. शनिवार को भी, जब आईसीसी ने बांग्लादेश की जगह स्कॉटलैंड को शामिल करने का फैसला किया, तब भी पीसीबी, बांग्लादेश के साथ खड़ा रहा.
‘एक्सप्रेस न्यूज़’ के अनुसार, पाकिस्तान में एक कार्यक्रम के इतर पीसीबी प्रमुख मोहसिन नकवी ने कहा कि वे बीसीबी के साथ हैं. उन्होंने मीडिया से कहा, “बांग्लादेश के साथ उचित व्यवहार नहीं किया जा रहा है. उन्हें हर हाल में विश्व कप खिलाया जाना चाहिए, क्योंकि वे एक बड़े हितधारक हैं और उनके साथ अन्याय नहीं होना चाहिए.” क्या पाकिस्तान भी विश्व कप का बहिष्कार करेगा, इस पर नकवी ने कहा कि अगर पाकिस्तान सरकार खेलने के खिलाफ फैसला लेती है, तो वे उनकी सलाह मानेंगे. उन्होंने कहा, “अगर सरकार हमसे बहिष्कार करने के लिए कहती है, तो फिर आईसीसी 22वीं टीम की तलाश करे. फैसला सरकार का होगा और हम प्रधानमंत्री के आने का इंतजार कर रहे हैं, हम उनके साथ इस मामले पर चर्चा करेंगे और फिर निर्णय लेंगे.”
बंगाल में एसआईआर जल्दबाजी में किया गया, इससे लोकतांत्रिक भागीदारी खतरे में पड़ सकती है: अमर्त्य सेन
नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पर गहरी चिंता व्यक्त की है. उन्होंने चेताते हुए कहा कि ‘एसआईआर’ “अनुचित जल्दबाजी” में किया जा रहा है और इससे लोकतांत्रिक भागीदारी खतरे में पड़ सकती है, खासकर जब कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.
92 वर्षीय अर्थशास्त्री को खुद भी सुनवाई के लिए नोटिस दिया गया था, क्योंकि “गणना फॉर्म के अनुसार उनकी और उनकी माँ की उम्र का अंतर 15 वर्ष से कम पाया गया था.” बोस्टन से ‘पीटीआई’ को दिए एक साक्षात्कार में, उन्होंने मतदाता सूची संशोधन के लोकतांत्रिक मूल्य और उन परिस्थितियों पर विचार किया जिनमें यह मतदान के अधिकारों को मजबूत कर सकता है.
उन्होंने जोर देकर कहा कि इस तरह का अभ्यास पूरी सावधानी और पर्याप्त समय के साथ किया जाना चाहिए, जो उनके अनुसार बंगाल के मामले में “नदारद” है.
सेन ने कहा, “पर्याप्त समय के साथ सावधानीपूर्वक की गई मतदाता सूची की गहन समीक्षा एक अच्छी लोकतांत्रिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इस समय पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं हो रहा है.”
उन्होंने आगे कहा, “एसआईआर बहुत जल्दबाजी में किया जा रहा है, जिससे मताधिकार रखने वाले लोगों के पास आगामी विधानसभा चुनावों में अपने वोट के अधिकार को साबित करने के लिए दस्तावेज जमा करने का पर्याप्त अवसर नहीं है. यह मतदाताओं के साथ अन्याय है और भारतीय लोकतंत्र के प्रति अनुचित है. “
‘मुझे अपने दोस्तों से थोड़ी मदद मिली, लेकिन दूसरों का क्या?’
बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान अपने स्वयं के अनुभव का हवाला देते हुए, सेन ने कहा कि समय का दबाव चुनाव अधिकारियों में भी साफ दिखाई दे रहा था.
उन्होंने कहा, “कभी-कभी खुद चुनाव आयोग के अधिकारियों के पास भी पर्याप्त समय की कमी लगती है. जब उन्होंने शांतिनिकेतन में मेरे गृह निर्वाचन क्षेत्र से वोट देने के मेरे अधिकार पर सवाल उठाया—जहां से मैंने पहले भी वोट दिया है और जहां मेरा नाम, पता और अन्य विवरण आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज हैं—तो उन्होंने मुझसे मेरी दिवंगत माँ की मेरी जन्म तिथि के समय की उम्र के बारे में सवाल किया. जबकि मेरी माँ भी एक मतदाता थीं और उनका विवरण, मेरे विवरण की तरह, उनके अपने आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज था.”
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ने उन दस्तावेजी चुनौतियों का भी वर्णन किया, जिनका उन्हें सामना करना पड़ा. उन्होंने नोट किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में पैदा हुए कई भारतीयों के लिए ये मुश्किलें आम हैं.
उन्होंने कहा, “ग्रामीण भारत में पैदा हुए कई भारतीय नागरिकों की तरह (मेरा जन्म तत्कालीन शांतिनिकेतन गाँव में हुआ था), मेरे पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है, और मेरी वोट देने की पात्रता के लिए मेरी ओर से और कागजी कार्रवाई पेश करने की आवश्यकता थी. “
हालांकि उनके लिए यह मुद्दा अंततः हल हो गया, लेकिन सेन ने उन नागरिकों के लिए चिंता व्यक्त की जिनके पास ऐसी सहायता उपलब्ध नहीं है.
उन्होंने कहा, “भले ही मैं खुशी-खुशी (बीटल्स बैंड की तरह) कह सकता था—’ओह, मुझे अपने दोस्तों से थोड़ी मदद मिल गई’—लेकिन मुझे उन लोगों की चिंता हुई जिनके पास इतने वफादार दोस्त नहीं हैं. मेरे दोस्तों ने दुर्जेय चुनाव आयोग (ईसी) के कठोर दरवाजों को पार करने में मेरी मदद की.”
‘ईसी को ऐसी दोषपूर्ण व्यवस्था पर जोर नहीं देना चाहिए’
यह पूछे जाने पर कि क्या ‘एसआईआर’ से पश्चिम बंगाल में किसी राजनीतिक दल को फायदा हो सकता है, सेन ने कहा कि वह इसका कोई निश्चित आकलन नहीं दे सकते. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक अखंडता सर्वोपरि रहनी चाहिए.
उन्होंने कहा, “मैं चुनाव विशेषज्ञ नहीं हूँ, इसलिए मैं इस सवाल का जवाब निश्चितता के साथ नहीं दे सकता. मुझे उन लोगों ने बताया है जो इसके बारे में अधिक जानते हैं, कि गणना में कमी से बीजेपी को फायदा होगा.”
“मुझे नहीं पता कि यह सच है या नहीं, लेकिन असली बात यह है कि चुनाव आयोग को ऐसी दोषपूर्ण व्यवस्था पर अड़े नहीं रहना चाहिए और हमारे गौरवशाली लोकतंत्र को एक अनावश्यक गलती करने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए, चाहे फायदा किसी का भी हो.”
समाज के उन वर्गों के बारे में पूछे जाने पर जो एसआईआर के दौरान बाहर होने के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं, सेन ने गरीब नागरिकों द्वारा सामना किए जाने वाले ढांचागत नुकसानों की ओर इशारा किया.
सेन ने कहा, “इसका स्पष्ट उत्तर वंचित और गरीब लोग होंगे. नई मतदाता सूची में शामिल होने के लिए आवश्यक दस्तावेज अक्सर समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए प्राप्त करना कठिन होता है. नए मतदाता सूची में शामिल होने के लिए विशेष दस्तावेजों को प्राप्त करने और दिखाने की आवश्यकता में जो वर्ग-भेद दिखाई दे सकता है, वह गरीब और बेसहारा लोगों के खिलाफ काम करेगा.”
कुकी-बहुल इलाके में पत्नी से मिलने गए मैतेई व्यक्ति की हत्या, घाटी में उग्र प्रदर्शन
मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में बुधवार रात (21 जनवरी, 2026) एक दिल दहला देने वाली घटना में 29 वर्षीय व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई, जिसके बाद राज्य में एक बार फिर जातीय तनाव चरम पर है. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, मृतक की पहचान मयंगलाम्बम ऋषिकांत सिंह के रूप में हुई है, जो मैतेई समुदाय से थे और काकचिंग जिले के निवासी थे. वह चुराचांदपुर में अपनी पत्नी से मिलने गए थे, जो कुकी-जो समुदाय से ताल्लुक रखती हैं. दो विरोधी समुदायों के बीच विवाह और उसके बाद हुई इस हत्या ने राज्य की स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है.
सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि सिंह पिछले दो साल से नेपाल में काम कर रहे थे और 19 दिसंबर को मिजोरम के रास्ते अपनी पत्नी से मिलने आए थे. वह ईसाई धर्म अपनाने को भी तैयार थे ताकि चर्च में शादी हो सके. बुधवार शाम को चार नकाबपोश लोग एक काली एसयूवी में उनके घर आए और पति-पत्नी को ले गए. बाद में पत्नी को छोड़ दिया गया, लेकिन सिंह को थोड़ा आगे ले जाकर गोली मार दी गई. हत्यारों ने घटना का वीडियो बनाकर वायरल कर दिया, जिसमें सिंह को घुटनों के बल बैठकर जान की भीख मांगते हुए देखा जा सकता है.
पुलिस को संदेह है कि इस हत्या के पीछे ‘यूनाइटेड कुकी नेशनल आर्मी’ का हाथ हो सकता है, जो हेंगलेप सब-डिविजन में सक्रिय है. हालांकि, कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन ने घटना में अपनी किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया है और कहा है कि उन्हें मृतक के आने की कोई जानकारी नहीं थी.
इस नृशंस हत्या के विरोध में मैतेई बहुल इंफाल घाटी में जगह-जगह प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. काकचिंग जिले में लोगों ने ‘इंडो-म्यांमार सुग्नू रोड’ को जाम कर न्याय की मांग की. राज्य के प्रमुख नागरिक संगठन ‘कोकोमी’ ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि 60,000 सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद हिंसा नहीं रुक रही है, जो सरकार की विफलता है. विरोध स्वरूप संगठनों ने रविवार को 18 घंटे के बंद और गणतंत्र दिवस समारोह के बहिष्कार का आह्वान किया है. गौरतलब है कि राज्य में फरवरी 2025 से राष्ट्रपति शासन लागू है.
14 करोड़ की ‘डिजिटल अरेस्ट’ ठगी में पुजारी, ट्यूटर, एमबीए गिरफ्तार, तार नेपाल-कंबोडिया से
दिल्ली पुलिस ने 14 करोड़ रुपये से अधिक के ‘डिजिटल अरेस्ट’ घोटाले का पर्दाफाश करते हुए 5 और लोगों को गिरफ्तार किया है. यह गिरोह कंबोडिया और नेपाल से संचालित एक अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का हिस्सा है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, गिरफ्तार किए गए आरोपियों की पृष्ठभूमि चौंकाने वाली है—इनमें वाराणसी के घाटों पर पूजा कराने वाला एक पुजारी, एक एमबीए ग्रेजुएट, एक ट्यूटर और एनजीओ संचालक शामिल हैं.
पुलिस के अनुसार, यह मामला जीके-2 (ग्रेटर कैलाश-2) के निवासी एक बुजुर्ग दंपति, ओम तनेजा (81) और इंदिरा तनेजा (77) से जुड़ा है. 24 दिसंबर 2025 से 9 जनवरी 2026 के बीच जालसाजों ने खुद को ट्राई (टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया) और पुलिस अधिकारी बताकर उन्हें डराया. उन्होंने दावा किया कि इंदिरा का मोबाइल नंबर मुंबई में एक मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सामने आया है. इसके बाद आरबीआई द्वारा सत्यापन के बहाने पीड़ितों को ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर 14.85 करोड़ रुपये अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करवा लिए गए.
जांच में जुटी पुलिस टीम ने जब मनी ट्रेल को फॉलो किया, तो कई राज्यों में छापेमारी की गई. गिरफ्तार आरोपियों की पहचान इस प्रकार हुई है:
अरुण तिवारी (45): वाराणसी में एनजीओ चलाने वाला डेटा एंट्री ऑपरेटर.
प्रद्युमन तिवारी (44): वाराणसी में निजी पूजा पाठ कराने वाला पुजारी.
भूपेंद्र कुमार मिश्रा (37): एमबीए की डिग्री रखने वाला व्यक्ति.
आदेश कुमार सिंह (36): ट्यूटर जो बच्चों को कोचिंग देता था.
शर्मा उर्फ नील (27): अहमदाबाद का बीकॉम पास युवक.
इससे पहले पुलिस ने वडोदरा से दिव्यांग पटेल (चार्टर्ड अकाउंटेंट का छात्र) और न्यूजीलैंड से आईटी डिप्लोमा धारक कृतिक को भी गिरफ्तार किया था. पुलिस का कहना है कि ये सभी आरोपी ‘म्यूल अकाउंट्स’ (किराये के बैंक खाते) उपलब्ध कराने और ठगी की रकम को इधर-उधर करने का काम करते थे, जबकि इनके आका विदेश में बैठकर निर्देश दे रहे थे. डीसीपी विनीत कुमार ने इसे एक गंभीर और संगठित अपराध बताते हुए कहा कि पुलिस सिंडिकेट की पूरी चेन का पता लगाने की कोशिश कर रही है.
यदि चीन के साथ ट्रेड डील की तो कनाडा पर 100% टैरिफ लगा देंगे, ट्रंप की कार्नी को धमकी
‘रॉयटर्स’ की खबर है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को कहा कि यदि कनाडा, चीन के साथ कोई व्यापार समझौता करता है, तो वे उस पर 100% टैरिफ लगा देंगे. साथ ही, उन्होंने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को चेतावनी दी कि ऐसा कोई भी समझौता उनके देश को खतरे में डाल देगा.
ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा, “चीन कनाडा को जिंदा खा जाएगा, उसे पूरी तरह निगल जाएगा, जिससे वहां के व्यवसाय, सामाजिक ताना-बाना और सामान्य जनजीवन सब नष्ट हो जाएगा. यदि कनाडा, चीन के साथ कोई डील करता है, तो अमेरिका आने वाले सभी कनाडाई सामानों और उत्पादों पर तुरंत 100% टैरिफ लगा दिया जाएगा.”
कार्नी ने अपनी हालिया चीन यात्रा के दौरान इस एशियाई महाशक्ति को एक “विश्वसनीय और भरोसेमंद भागीदार” बताया था और दावोस में यूरोपीय नेताओं को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (चीन) से निवेश लेने के लिए प्रोत्साहित किया था. ट्रंप ने संकेत दिया कि चीन, अमेरिका के टैरिफ से बचने के लिए कनाडा का इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा. उन्होंने कहा, “अगर कार्नी को लगता है कि वे कनाडा को चीन के लिए एक ‘ड्रॉप ऑफ पोर्ट’ (माल उतारने का ठिकाना) बना देंगे ताकि वहां से सामान अमेरिका भेजा जा सके, तो यह उनकी बहुत बड़ी भूल है.”
पिछले कुछ दिनों में अमेरिका और उसके उत्तरी पड़ोसी (कनाडा) के बीच तनाव काफी बढ़ गया है. ट्रंप ने गुरुवार को कनाडा को अपने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पहल में शामिल होने का निमंत्रण वापस ले लिया था, जिसका उद्देश्य वैश्विक संघर्षों को सुलझाना है. ट्रंप का यह हृदय-परिवर्तन कार्नी के दावोस (विश्व आर्थिक मंच) में दिए गए उस भाषण के बाद आया, जिसमें उन्होंने खुले तौर पर उन शक्तिशाली देशों की आलोचना की थी जो आर्थिक एकीकरण को हथियार के रूप में और टैरिफ को दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं.
‘बदलाव अपरिहार्य है’: ईरान के लिए आगे की राह क्या है?
ईरान में व्यापक विरोध प्रदर्शन भले ही थम गए हों, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यदि शासन में बदलाव नहीं हुए और अमेरिका के साथ प्रतिबंध हटाने को लेकर कोई समझौता नहीं हुआ, तो देश को भविष्य में और अधिक अशांति का सामना करना पड़ सकता है. ‘अल जजीरा’ की वर्जीनिया पिएत्रोमार्ची की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनों के बाद हजारों गिरफ्तारियां हुई हैं और कथित तौर पर समर्थकों की संपत्ति जब्त कर उन पर “आतंकवाद” के आरोप लगाए गए हैं. सत्ता ने फिलहाल नियंत्रण वापस पा लिया है, लेकिन सतह के नीचे असंतोष की आग अभी भी सुलग रही है.
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के ईरान प्रोजेक्ट डायरेक्टर अली वैज़ कहते हैं, “यह यथास्थिति टिकाऊ नहीं है. सिस्टम एक चक्कर में फंस गया है और अगर इसने बदलने से इनकार किया तो यह केवल नीचे की ओर ही जाएगा.”
दिसंबर के अंत में मुद्रा के पतन को लेकर शुरू हुए प्रदर्शन जल्द ही इस्लामी गणराज्य को उखाड़ फेंकने के आह्वान में बदल गए थे. ईरानी सरकारी मीडिया का दावा है कि इन प्रदर्शनों में 3,117 लोग मारे गए, जिनमें सुरक्षाकर्मी भी शामिल हैं. वहीं, अमेरिका स्थित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि मरने वालों की संख्या 4,500 से अधिक है.
ईरान अभी दोराहे पर खड़ा है. दशकों के प्रतिबंधों, कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार के कारण ईरानी रियाल की कीमत रसातल में जा चुकी है और तेल राजस्व सिकुड़ गया है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के अनुसार, पिछले साल मुद्रास्फीति 42% से अधिक थी. इसके अलावा, बिजली कटौती और पानी की भारी कमी ने आम नागरिकों का जीवन नरक बना दिया है. प्रतिबंधों से राहत पाने के लिए ईरान को डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन के साथ एक समझौते की आवश्यकता है. लेकिन इसके लिए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई को अपनी विदेश नीति के मुख्य स्तंभों—परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल और क्षेत्रीय सहयोगियों के नेटवर्क—पर समझौता करना होगा.
जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स के फेलो हलीरेज़ा अज़ीज़ी का कहना है कि इज़राइल के साथ युद्ध और हिज़बुल्लाह के नेतृत्व के खात्मे के बाद ईरान अपनी रणनीति बदल रहा है. अब ध्यान इराक में छोटे समूहों के साथ काम करने और यमन में हौथियों पर अधिक निर्भर रहने पर है.
ट्रम्प ने हाल ही में दावोस में संकेत दिया कि “ईरान बात करना चाहता है, और हम बात करेंगे,” लेकिन साथ ही अमेरिका मध्य पूर्व में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा रहा है. विश्लेषकों का मानना है कि खामेनेई के बाद वह इस्लामी गणराज्य नहीं रहेगा जिसे हम आज जानते हैं. अज़ीज़ी के अनुसार, “बदलाव अपरिहार्य है, चाहे वह शासन परिवर्तन के रूप में हो या सोवियत शैली के रूपांतरण के रूप में.”
अबू धाबी में अमेरिका के साथ पहली त्रिपक्षीय वार्ता के कुछ ही घंटों बाद यूक्रेन पर रूस का इस साल का सबसे बड़ा हवाई हमला
कीव, मॉस्को और वाशिंगटन के वार्ताकारों द्वारा अबू धाबी में युद्ध शुरू होने के बाद अपनी तरह की पहली ज्ञात त्रिपक्षीय बैठक आयोजित करने के कुछ ही घंटों बाद, रूस ने यूक्रेन पर इस साल का सबसे बड़ा हवाई हमला किया. ‘सीएनएन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय अधिकारियों ने शनिवार को पुष्टि की कि दो दिनों तक चली यह गुप्त वार्ता शुक्रवार और शनिवार को संयुक्त अरब अमीरात में संपन्न हुई.
यूक्रेनी प्रतिनिधिमंडल और रूसी सरकारी मीडिया ‘आरआईए नोवोस्ती’ ने पुष्टि की है कि वार्ता समाप्त हो चुकी है, हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इस बातचीत में कोई प्रगति हुई या नहीं. वार्ता के इन दो दौर के बीच, रूस ने यूक्रेन की राजधानी कीव और अन्य शहरों को निशाना बनाते हुए 370 से अधिक ड्रोन और 21 मिसाइलें दागीं. कीव के मेयर विटाली क्लिट्स्को के अनुसार, हमलों में कम से कम एक व्यक्ति की मौत हुई और चार घायल हो गए. कड़ाके की ठंड (-12 डिग्री सेल्सियस) के बीच लगभग 6,000 अपार्टमेंट ब्लॉकों की हीटिंग और पानी की आपूर्ति ठप हो गई है. खार्किव में भी एक प्रसूति अस्पताल और विस्थापितों के छात्रावास को नुकसान पहुंचा है.
अबू धाबी में हुई इस उच्च-स्तरीय बैठक में रूस ने एक शीर्ष जासूस और सैन्य खुफिया प्रमुख को भेजा था, जबकि यूक्रेन का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ राजनयिकों ने किया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका की ओर से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दूत स्टीव विटकॉफ, ट्रम्प के दामाद जेरेड कुशनर और व्हाइट हाउस के सलाहकार जोश ग्रोनबाम शामिल थे. ट्रम्प प्रशासन यूक्रेन पर शांति समझौते के लिए दबाव डाल रहा है, लेकिन ‘क्षेत्र’ अभी भी मुख्य विवाद का विषय बना हुआ है. क्रेमलिन चाहता है कि यूक्रेन डोनबास क्षेत्र छोड़ दे, जिसे कीव ने बार-बार खारिज किया है.
यूक्रेन के मुख्य वार्ताकार रुस्तम उमेरोव ने सोशल मीडिया पर कहा कि बैठक का ध्यान “सम्मानजनक और स्थायी शांति” पर था, जबकि राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने कहा कि अभी निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी.
‘ट्रंप को माफी मांगनी चाहिए’: नाटो टिप्पणी पर दिग्गजों और शहीदों के परिजनों में भारी गुस्सा
अफगानिस्तान युद्ध में अपने दोनों पैर और एक हाथ गंवाने वाले ब्रिटिश सैनिक एंडी रीड ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से उनकी हालिया टिप्पणी के लिए माफी की मांग की है. ट्रम्प ने एक साक्षात्कार में दावा किया था कि अमेरिका के नाटो सहयोगियों ने अफगानिस्तान में केवल “कुछ सैनिक” भेजे थे और वे “फ्रंट लाइन से थोड़ा पीछे, थोड़ा दूर रहे”. ‘बीबीसी’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस बयान ने उन हजारों ब्रिटिश और कनाडाई सैनिकों और उनके परिवारों को गहरा आघात पहुँचाया है जिन्होंने इस संघर्ष में अपना खून बहाया.
एंडी रीड, जो हेलमंद प्रांत में एक आईईडी विस्फोट का शिकार हुए थे, कहते हैं, “मैं अमेरिकी सैनिकों के साथ काम कर रहा था. अगर वे फ्रंट लाइन पर थे और हम उनके बगल में खड़े थे, तो स्पष्ट रूप से हम भी फ्रंट लाइन पर थे.” उन्होंने ट्रम्प की टिप्पणी को “अपमानजनक और अनुचित” बताया. ब्रिटेन ने अफगानिस्तान में 457 सैनिकों को खोया है और अमेरिका के बाद वहां दूसरा सबसे बड़ा सैन्य दल तैनात किया था.
अल्स्टर यूनियनिस्ट पार्टी के राजनेता एंडी एलन, जिन्होंने 19 साल की उम्र में अफगानिस्तान में अपने पैर गंवा दिए थे, ने कहा कि वह व्हाइट हाउस को पत्र लिख रहे हैं. वहीं, बेन पार्किंसन, जिन्हें अफगानिस्तान में जीवित बचे सबसे गंभीर रूप से घायल ब्रिटिश सैनिक माना जाता है, की मां डायने डर्नी ने ट्रम्प के बयान को “एक बच्चे की बकवास” बताया. उन्होंने कहा, “मेरा बेटा उसी नाटो बल का हिस्सा था... यह कैसे स्वीकार्य हो सकता है?”
शहीद हुए सैनिकों के परिवार भी आहत हैं. 2012 में एक विस्फोट में मारे गए 19 वर्षीय क्रिस्टोफर की मां मोनिका ने कहा, “उन्हें (ट्रम्प को) एक वर्दी पहनाकर फ्रंट लाइन पर खड़ा कर देना चाहिए, बजाय इसके कि वे डेस्क के पीछे बैठकर कलम चलाएं.” कनाडाई सेना के दिग्गज माइकल अकपाटा ने भी कहा कि ट्रम्प की टिप्पणी कनाडा के बलिदान को छोटा करती है, जिसने उस युद्ध में 158 सैनिक खोए थे.
ट्रम्प के टैरिफ के खतरे के बीच भारत और यूरोपीय संघ ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के लिए तैयार
अगले सोमवार को भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन मुख्य अतिथि होंगे. इस दौरे का औपचारिक महत्व तो है ही, लेकिन मुख्य एजेंडा एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ मुक्त व्यापार वार्ताओं को आगे बढ़ाना है. ‘बीबीसी’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत और यूरोपीय संघ लगभग दो दशकों की कठिन बातचीत के बाद अब एक बड़े व्यापार समझौते के करीब हैं, जिसे दोनों पक्षों के नेताओं ने “मदर ऑफ ऑल डील्स” (सभी समझौतों की जननी) कहा है.
लंदन स्थित चैथम हाउस के चितिज वाजपेयी का कहना है कि मुख्य अतिथियों का चुनाव भारत की ओर से एक कूटनीतिक संदेश भी है—कि दिल्ली अपनी विदेश नीति में विविधता ला रहा है और वह “ट्रम्प प्रशासन की सनक का मोहताज नहीं है.” यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी व्यापार युद्ध की धमकियों को तेज कर दिया है.
संभावना है कि 27 जनवरी को दोनों पक्षों के बीच उच्च स्तरीय शिखर सम्मेलन में इस समझौते की घोषणा की जा सकती है. यह सौदा यूरोपीय संघ के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 2 अरब लोगों का एक मुक्त बाजार बनाएगा. वहीं भारत के लिए, यह सौदा जीएसपी लाभों को बहाल करेगा, जिससे भारतीय निर्यातकों को कम शुल्क का लाभ मिलेगा. जीटीआरआई के अजय श्रीवास्तव के अनुसार, यह सौदा भारतीय परिधान, फार्मा और स्टील जैसे क्षेत्रों को अमेरिकी टैरिफ के झटकों को झेलने में मदद करेगा.
हालांकि, अभी भी कुछ गहरी खाईयां बाकी हैं. यूरोप ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ यानी कार्बन टैक्स पर अड़ा है, जिसे भारत अपने छोटे उद्योगों के लिए हानिकारक मानता है. वहीं, भारत कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखना चाहता है. विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प की नीतियों और चीन पर निर्भरता कम करने की मजबूरी ने भारत और यूरोप को करीब ला दिया है.
चीन के शीर्ष जनरल झांग यूक्सिया समेत 2 जनरलों पर जांच शुरू, सेना में बड़ी उथल-पुथल
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में एक अभूतपूर्व घटनाक्रम के तहत, देश के शीर्ष सैन्य नेताओं झांग यूक्सिया और लियू जेनली के खिलाफ “गंभीर” अनुशासनात्मक उल्लंघन के संदेह में जांच शुरू की गई है. ‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार, चीनी रक्षा मंत्रालय ने शनिवार को इसकी पुष्टि की. झांग यूक्सिया केंद्रीय सैन्य आयोग के पहले उपाध्यक्ष हैं और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बाद सेना में सर्वोच्च रैंक वाले वर्दीधारी अधिकारी हैं. वहीं, लियू जेनली ज्वाइंट स्टाफ डिपार्टमेंट के प्रमुख हैं.
मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति द्वारा विचार-विमर्श के बाद जांच का निर्णय लिया गया. एक सूत्र ने बताया कि झांग पर भ्रष्टाचार और अपने करीबी सहयोगियों व परिवार के सदस्यों को नियंत्रित करने में विफल रहने का आरोप है. सूत्र के मुताबिक, झांग को सोमवार को औपचारिक रूप से हिरासत में लिया गया था.
यह कार्रवाई 2022 में बनी केंद्रीय सैन्य आयोग के लगभग पूर्ण सफाए का प्रतीक है. सात सदस्यीय इस शक्तिशाली निकाय में अब केवल झांग शेंगमिन ही एकमात्र वर्दीधारी अधिकारी बचे हैं. 75 वर्षीय झांग और 61 वर्षीय लियू, दोनों वियतनाम के खिलाफ युद्ध लड़ चुके ‘वार हीरो’ हैं और आयोग में युद्ध का अनुभव रखने वाले केवल यही दो सदस्य थे.
यह घटनाक्रम राष्ट्रपति शी जिनपिंग के व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का हिस्सा है. पिछले साल अनुशासनात्मक एजेंसियों ने 9,83,000 अधिकारियों को दंडित किया था. झांग यूक्सिया को शी जिनपिंग का बेहद करीबी माना जाता था और उन्होंने 2012 से सेना के आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. विश्लेषकों का मानना है कि पीएलए की 99वीं वर्षगांठ से ठीक पहले इतने बड़े स्तर पर शीर्ष जनरलों का गिरना चीनी सेना के भीतर गहरी उथल-पुथल का संकेत है.
व्हाइट हाउस ने ट्रंप और पेंग्विन की तस्वीर पोस्ट की, सोशल मीडिया में लोगों ने खूब मजे लिये
व्हाइट हाउस के फेसबुक पेज ने शुक्रवार को डोनाल्ड ट्रंप की एक पेंग्विन के साथ टहलते हुए तस्वीर पोस्ट की, और सोशल मीडिया ने बिल्कुल वैसी ही प्रतिक्रिया दी जिसकी उम्मीद थी, “यानी जमकर मजे लेकर.”
एआई द्वारा बनाई गई इस तस्वीर में अमेरिकी राष्ट्रपति को एक बर्फीले इलाके में एक पेंग्विन के साथ टहलते हुए दिखाया गया था, जिसने अमेरिकी झंडा थाम रखा था. साथ ही, पीछे के पहाड़ों पर ग्रीनलैंड का झंडा मजबूती से गड़ा हुआ था.
‘द टेलीग्राफ’ के अनुसार, तस्वीर का कैप्शन था, “पेंग्विन को अपनाएं.” जिसे इतने आत्मविश्वास के साथ पोस्ट किया गया था, जैसे कि पक्का पता हो कि इसकी तारीफ होगी. लेकिन इसके बजाय, यह पोस्ट हंसी का पात्र बन गई.
यह तस्वीर लंबे समय से चले आ रहे “नाइलिस्ट पेंग्विन” (शून्यवादी पेंग्विन) मीम से प्रेरित है, जो वर्नर हर्ज़ोग की 2007 की डॉक्यूमेंट्री ‘एनकाउंटर्स एट द एंड ऑफ द वर्ल्ड’ से लिया गया है. मूल क्लिप में, एक अकेला एडेली पेंग्विन अपनी कॉलोनी को छोड़कर अंटार्कटिका की गहराइयों की ओर चल देता है—जिसे बाद में इंटरनेट पर ‘व्यर्थ के दृढ़ संकल्प’ के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा.
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि पेंग्विन ग्रीनलैंड या उसके आस-पास कहीं नहीं जा रहा है. भूगोल की यही छोटी सी चूक इंटरनेट की सबसे पसंदीदा हिस्सा बन गई.
एक फेसबुक यूजर ने व्हाइट हाउस को बुनियादी जीव विज्ञान (बायोलॉजी) समझाते हुए शालीनता से टिप्पणी की, “मुझे नहीं लगता कि ग्रीनलैंड में पेंग्विन होते हैं.”
एक अन्य ने लिखा, “यही होता है जब आप व्हाइट हाउस सोशल मीडिया के एडमिन अधिकार स्टीफन मिलर को दे देते हैं.” (मिलर नीति विभाग के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ और होमलैंड सुरक्षा सलाहकार हैं).
इसके बाद भ्रम और बढ़ता गया. एक यूजर ने पूछा, “तो क्या अब हम अंटार्कटिका पर कब्जा करने जा रहे हैं?”—शायद वह मीम्स के जरिए अमेरिकी विदेश नीति को समझने की कोशिश कर रहा था. दूसरे ने सवाल किया, “अब आप पेंग्विन को ग्रीनलैंड डिपोर्ट (निर्वासित) कर रहे हैं?” एक और मजेदार कमेंट आया, “क्या ग्रीनलैंड ने अंटार्कटिका पर दावा किया है और अब हमें वह चाहिए?”
कुछ यूजर्स तो और भी आगे निकल गए. एक ने ट्रंप और जेफरी एपस्टीन की बात करते हुए एक जीआईएफ के साथ लिखा, “शर्त लगा लो कि यह पेंग्विन नाबालिग है.”
कुछ लोगों को पुरानी सुर्खियां याद आईं: “क्या आपने उस द्वीप पर टैरिफ (शुल्क) लगाने की कोशिश नहीं की थी जहाँ सिर्फ पेंग्विन रहते हैं?”
और फिर पर्यावरण का नजरिया भी सामने आया. आर्कटिक के वन्यजीवों के प्रति चिंतित होते हुए एक यूजर ने पूछा, “क्या वे पेंग्विन को ग्रीनलैंड के ईकोसिस्टम में शामिल करने की योजना बना रहे हैं?”
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.








