25/02/2026: नेतन्याहू ने भाई बताया, जीनोसाइड पर चुप रहे मोदी | अनिल अंबानी का बंगला जब्त | बिल गेट्स ने एप्सटीन मेल और रूसी महिलाओं से संबंध को लेकर माफ़ी मांगी | फ्रेंच लेखक की गोरखपुर जेल डायरी
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
इजरायल दौरा: पीएम मोदी ने ट्रंप की गाजा शांति योजना का समर्थन किया; नेतन्याहू ने उन्हें ‘भाई’ बताया.
ईडी कार्रवाई: अनिल अंबानी का मुंबई स्थित 3,716 करोड़ रुपये का आवास ‘अबोड’ जब्त.
आईटी संकट: एआई के डर से भारतीय आईटी कंपनियों का 47 अरब डॉलर का वैल्यूएशन साफ.
कैंपस विवाद: पंजाब की सीटी यूनिवर्सिटी में रमज़ान में भोजन की मांग पर विवाद, वीसी का इस्तीफा.
अंतर्राष्ट्रीय सम्मान: मणिपुरी फिल्म ‘बूंग’ ने जीता बाफ्टा में बेस्ट फैमिली फिल्म का अवार्ड.
जातिगत भेदभाव: ऑस्ट्रेलिया में भी जातिवाद और गोरखपुर जेल में कैदियों के साथ भेदभाव की रिपोर्ट्स.
हाथी-इंसान संघर्ष: जंगल कटने से मध्य भारत में हाथियों के हमले बढ़े, ‘हाथी आपातकाल’ जैसी स्थिति.
राजनीतिक आरोप: रोहित पवार का दावा- मंत्री से संबंधों के चलते विमानन कंपनी को बचाया जा रहा है.
नेतन्याहू ने बताया ‘भाई’, मोदी ने किया ट्रंप की गाजा शांति योजना का समर्थन
इजरायल के दो दिवसीय दौरे पर पहुंचे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (25 फरवरी, 2026) को इजरायली संसद ‘नेसेट’ को संबोधित किया. ‘हारेत्ज़’ की रिपोर्ट के मुताबिक, अपने संबोधन में पीएम मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की गाजा शांति योजना का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि यह योजना “पूरे क्षेत्र के लोगों के लिए एक न्यायपूर्ण और स्थायी शांति का वादा करती है, जिसमें फिलिस्तीन का मुद्दा भी शामिल है.” मोदी ने 7 अक्टूबर, 2023 के हमास हमलों को याद करते हुए कहा कि भारत इस दुख की घड़ी में मजबूती से इजरायल के साथ खड़ा है. उन्होंने जोर देकर कहा, “आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए निरंतर और समन्वित वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता है.”
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पीएम मोदी का स्वागत “एक भाई” के रूप में किया और दोनों देशों के बीच “जबरदस्त गठबंधन”की सराहना की. नेतन्याहू ने कहा कि भारत इजरायल का समर्थन इसलिए करता है क्योंकि वह समझता है कि इजरायल “बर्बरता के खिलाफ एक सुरक्षात्मक दीवार” के रूप में काम कर रहा है. नेतन्याहू और उनकी पत्नी सारा ने बेन-गुरियन हवाई अड्डे पर पीएम मोदी का स्वागत किया—यह एक ऐसा सम्मान है जो हाल ही में केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दिया गया था.
‘हारेत्ज़’ की रिपोर्ट में एक दिलचस्प राजनीतिक घटनाक्रम का भी जिक्र है. पीएम मोदी का संबोधन इजरायल के सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रहे राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया. नेसेट के स्पीकर अमीर ओहाना ने सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष इसाक अमित को इस कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया था, जो कि आमतौर पर परंपरा रही है. इसके विरोध में इजरायल के अधिकांश विपक्षी दलों ने केवल मोदी के भाषण में भाग लिया, लेकिन स्पीकर ओहाना और पीएम नेतन्याहू के भाषण के दौरान सदन से बाहर चले गए. वहीं, अरब पार्टी ‘हदश-ताल’ ने इस पूरे कार्यक्रम का बहिष्कार किया.
पीएम मोदी ने अपने भाषण में ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे’ (आईएमईसी) का भी जिक्र किया, जो क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण रुका हुआ है. उन्होंने रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और क्वांटम टेक्नोलॉजी में साझेदारी को और गहरा करने की बात कही. मोदी ने यह भी बताया कि जब वे 2006 में पहली बार इजरायल आए थे तब वहां कुछ ही योग केंद्र थे, लेकिन आज लगभग हर मोहल्ले में योग केंद्र मौजूद हैं.
रक्षा सौदे, पाकिस्तान से तनाव, ‘संतुलन’ कूटनीति
‘अल जज़ीरा’ की लाइव रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इजरायल दौरे का मुख्य उद्देश्य व्यापारिक समझौतों को पक्का करना और इजरायली हथियारों की खरीद करना है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में द्विपक्षीय व्यापार 3.9 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था, जिसमें रक्षा क्षेत्र की हिस्सेदारी सबसे अधिक है. भारत, इजरायल का सबसे बड़ा हथियार खरीदार है.
भारत की अशोका यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर उदय चंद्रा ने ‘अल जज़ीरा’ से बातचीत में बताया कि इस दौरे के पीछे रणनीतिक कारण हैं. चंद्रा ने विश्लेषण करते हुए कहा, “पिछले साल मई में पाकिस्तान के साथ भारत का एक अल्पकालिक युद्ध हुआ था, जो योजना के मुताबिक नहीं रहा. भारत विशेष रूप से इजरायली एयर डिफेंस सिस्टम (वायु रक्षा प्रणाली) में रुचि रखता है, क्योंकि पिछली बार यहीं पर बड़ी खामियां पाई गई थीं.” (नोट: रिपोर्ट में यह संदर्भ फरवरी 2026 के समय के अनुसार दिया गया है).
प्रोफेसर चंद्रा ने यह भी कहा कि मोदी का यह दौरा नेतन्याहू सरकार के प्रति एकजुटता का एक “बहुत ही सार्वजनिक संकेत” है. भले ही गाजा में चल रहे युद्ध और वहां 72,000 से अधिक लोगों की मौत के कारण भारत में वामपंथी दलों (जैसे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) द्वारा इस दौरे का विरोध किया जा रहा है, लेकिन मोदी सरकार अपनी प्राथमिकताओं को लेकर स्पष्ट है. चंद्रा के अनुसार, यह रिश्ता व्यावहारिकता पर आधारित है और भारत खाड़ी क्षेत्र में ईरान और अन्य देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पिछले साल इजरायल के धुर दक्षिणपंथी वित्त मंत्री बेजेल स्मोट्रिच की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने एक निवेश समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. उस समय भारतीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साइबर सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया था. पीएम मोदी ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि “गाजा शांति पहल” क्षेत्र के लिए एक रास्ता दिखाती है और भारत बातचीत और शांति के पक्ष में दुनिया के साथ है.
मोदी के नेतृत्व में भारत का झुकाव इज़राइल की ओर: रणनीतिक और कूटनीतिक बदलाव
स्वतंत्रता के बाद भारत ने पारंपरिक रूप से फिलिस्तीनियों के मुद्दों का समर्थन किया है, लेकिन ‘द वायर’ के लिए क्रिस्टोफ जैफ्रेलॉट लिखते हैं कि 1990 के दशक में शुरू हुई नई दिल्ली और तेल अवीव के बीच की घनिष्ठता ने 2014 के बाद से खासी गति पकड़ ली है. मोदी सरकार बिना खुले तौर पर कहे, आज इज़राइल के पक्ष में खड़ी है. प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल यात्रा ने इस प्रक्रिया को और मजबूत किया है. ऐतिहासिक रूप से भारत ने इज़राइल राज्य के निर्माण का विरोध किया था, लेकिन 1950 में इसे मान्यता दी. 2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी ने इस रिश्ते की रूपरेखा बदल दी. 2017 में तेल अवीव जाने वाले वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने.
जैफ्रेलॉट विश्लेषण करते हैं कि 2014 से 2023 के बीच, भारत ने फिलिस्तीनी हितों से पूरी तरह किनारा किए बिना इज़राइल के करीब जाकर अपने राष्ट्रीय हितों को साधा है. इसमें इज़राइली नागरिक और सैन्य तकनीकों तक पहुंच शामिल है. मोदी के नेतृत्व में कृषि और जल प्रबंधन के अलावा, विशेष रूप से रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है. अदाणी समूह ने हाइफा बंदरगाह के अधिग्रहण और एलबिट सिस्टम्स के साथ मिलकर ड्रोन निर्माण (हर्मिस 900) के जरिए इस रिश्ते को गहरा किया है. अक्टूबर 2023 के हमलों के बाद, भारत ने संयुक्त राष्ट्र में गाजा में संघर्ष विराम के लिए हुए मतदान से शुरुआत में परहेज किया, जो भारत की पारंपरिक स्थिति से एक बदलाव था. हालांकि बाद में भारत ने संघर्ष विराम के पक्ष में मतदान भी किया.
वहीं, ‘द हिंदू’ की रिपोर्टर दिव्यांशी बिहानी बताती हैं कि पीएम मोदी फरवरी 2026 में इज़राइल के दौरे पर पहुंचे हैं. यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब भारत ने हाल ही में वेस्ट बैंक में इज़राइल की कार्रवाइयों की आलोचना करने वाले संयुक्त राष्ट्र के बयान पर हस्ताक्षर किए हैं. रक्षा सहयोग इस साझेदारी का आधार है. 2014 से 2024 के बीच इज़राइल के कुल हथियार निर्यात का 38% हिस्सा भारत आया है. इसके अलावा, गाजा संघर्ष के बाद फिलिस्तीनी श्रमिकों की जगह लेने के लिए भारत से बड़ी संख्या में श्रमिकों को इज़राइल भेजा गया है. अक्टूबर 2024 तक इज़राइल में लगभग 32,000 भारतीय श्रमिक थे. द्विपक्षीय व्यापार 2022-23 में 10.7 बिलियन डॉलर के शिखर पर था, हालांकि युद्ध और व्यापार मार्ग की समस्याओं के कारण इसमें गिरावट आई है.
अनिल अंबानी का 17 मंज़िला आवास ईडी ने जब्त किया, मूल्य ₹3,716.83 करोड़
मुंबई के पॉश पाली हिल इलाके में स्थित अनिल अंबानी का 17 मंज़िला आवास, जिसकी कीमत ₹3,716.83 करोड़ है, को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बुधवार को रिलायंस कम्युनिकेशंस से जुड़े कथित बैंक धोखाधड़ी मामलों में जब्त कर लिया. जांच एजेंसी ने कहा कि अनिल अंबानी के रिलायंस समूह से जुड़े जब्त की गईं कुल परिसंपत्तियों का मूल्य अब लगभग ₹15,700 करोड़ हो गया है.
‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस’ के मुताबिक, यह अस्थायी अटैचमेंट आदेश धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत 66 मीटर ऊँची (216 फुट) लग्ज़री संपत्ति पर जारी किया गया. एजेंसी ने बयान में कहा, “ईडी ने रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड बैंक धोखाधड़ी मामले में अनिल अंबानी की पाली हिल स्थित आवासीय संपत्ति ‘अबोड’ को अस्थायी रूप से जब्त किया है.”
एजेंसी ने बताया कि उसने सीबीआई की एफआईआर के आधार पर रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड (आरकॉम), अनिल अंबानी और अन्य के खिलाफ जाँच शुरू की थी. आरकॉम और उसकी समूह कंपनियों ने घरेलू और विदेशी ऋणदाताओं से ऋण लिया था, जिनमें से कुल ₹40,185 करोड़ बकाया है.
एजेंसी ने कहा, “ईडी की जाँच से पता चला है कि अन्य परिसंपत्तियों के साथ-साथ पाली हिल की संपत्ति को राइज़ ई ट्रस्ट में शामिल किया गया था — यह अनिल अंबानी के परिवार का निजी ट्रस्ट है. ऐसा इस तरह दिखाने के लिए किया गया कि अनिल अंबानी इसमें शामिल नहीं हैं.”
रमज़ान में सहरी और इफ़्तार की मांग, कश्मीरी छात्रों के आरोप पर सीटी यूनिवर्सिटी के कुलपति का इस्तीफ़ा
पंजाब की सीटी यूनिवर्सिटी के कुलपति ने मंगलवार को इस्तीफ़ा दे दिया. यह कदम उस समय उठाया गया जब कश्मीरी छात्रों के एक समूह ने रमज़ान के दौरान विश्वविद्यालय के मेस में सहरी और इफ़्तार की व्यवस्था की माँग पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाया.
‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, विश्वविद्यालय के चांसलर और चेयरमैन चरणजीत सिंह चन्नी ने पुष्टि की कि कुलपति नितिन टंडन का इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिया गया है ताकि कैंपस में सामान्य स्थिति बहाल हो सके. उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय ने आंतरिक जाँच शुरू कर दी है और स्थानीय प्रशासन स्थिति पर नज़र रख रहा है. छात्रों के अनुसार, उन्होंने प्रशासन से रोज़ा रखने वालों के लिए मेस में सहरी और इफ़्तार की व्यवस्था करने का अनुरोध किया था. छात्रों का आरोप है कि जब उनकी मांग पर ध्यान नहीं दिया गया तो टकराव हुआ, जिसके दौरान कुलपति ने “गाली-गलौज की, अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं और दाख़िला रद्द करने की धमकी दी.”
यह घटना राजनीतिक रूप से भी चर्चा में आई जब इत्तिज़ा मुफ़्ती, मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की बेटी, ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से कार्रवाई करने की अपील की. उन्होंने ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए सवाल उठाया कि क्या राज्य सरकार “कश्मीरी मुस्लिम छात्रों को गाली देने और डराने-धमकाने का समर्थन करती है, सिर्फ़ इसलिए कि उन्होंने रमज़ान में इफ़्तार और सहरी के लिए भोजन की मांग की.” मुफ़्ती ने एक वीडियो भी साझा किया जिसमें कथित तौर पर कुलपति छात्रों को कैंपस खाली करने और उनके दाख़िले रद्द करने की धमकी देते हुए दिखाई दे रहे हैं.
मतदाताओं के नाम हटाने पर विवाद; महुआ मोइत्रा और ईसी के पर्यवेक्षक आईएएस मुरुगन के बीच शब्दों की जंग
टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और विशेष निर्वाचक सूची पर्यवेक्षक (एसईआरओ) आईएएस अधिकारी सी. एस. मुरुगन के बीच मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए माइक्रो-ऑब्ज़र्वर्स के कथित इस्तेमाल को लेकर विवाद छिड़ गया है. यह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन माना जा रहा है.
सुभेन्दु मैती की रिपोर्ट के मुताबिक, बिना किसी का नाम लिए मुरुगन ने ‘एक्स’ पर अपनी पोस्ट में लिखा, “मेरे पास उतनी बंदूकें नहीं हैं जितनी तस्वीर में दिखाई गई हैं. हालांकि, मुझे तमिलनाडु में पुलिस सेवा के दौरान साढ़े चार साल की ट्रेनिंग में विभिन्न प्रकार की बंदूकें चलाने का प्रशिक्षण मिला और मैंने उन्हें कानूनी और प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया.” यह पोस्ट टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा पर पलटवार माना जा रहा है.
मोइत्रा ने 18 फरवरी को एक्स पर लिखा था, “कृपया अपने रोल ऑब्ज़र्वर सी. मुरुगन आईएएस 2007, डिप्टी चेयरपर्सन टी बोर्ड को नियंत्रित करें, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करते हुए गुप्त व्हाट्सएप ग्रुप्स पर माइक्रो ऑब्ज़र्वर्स को गलत निर्देश जारी कर रहे हैं.”
महुआ मोइत्रा ने अपनी पोस्ट में ‘क्विक गन मुरुगन’ नामक लोकप्रिय सिनेमा किरदार की तस्वीर भी साझा की थी. यह पोस्ट उस समय लिखी गई थी, जब टीएमसी प्रतिनिधियों ने 18 फरवरी को पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) मनोज अग्रवाल के कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई थी.
इससे पहले टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए माइक्रो-ऑब्ज़र्वर्स का इस्तेमाल कर रहा है. अभिषेक ने लगाया आरोप कि मुरुगन व्हाट्सएप के ज़रिए माइक्रो-ऑब्ज़र्वर्स को मतदाता सूची से नाम हटाने के निर्देश दे रहे थे और उन्होंने अपने ‘एक्स’ पेज पर उन संदेशों के स्क्रीनशॉट साझा किए. उनकी पोस्ट के अनुसार, “और भी चिंताजनक यह है कि विशेष रोल ऑब्ज़र्वर सी. मुरुगन ने जन्म प्रमाणपत्रों की स्वीकार्यता को लेकर सीधे माइक्रो-ऑब्ज़र्वर्स को व्हाट्सएप ग्रुप में निर्देश दिए, ताकि नाम हटाने की संख्या बढ़ाई जा सके. क्या मुझे चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश की याद दिलानी चाहिए कि माइक्रो-ऑब्ज़र्वर्स की भूमिका केवल सहायक की होनी चाहिए? फिर वैधानिक प्रक्रिया को क्यों दरकिनार किया जा रहा है और किसके निर्देश पर?”
बिल गेट्स ने दो रूसी महिलाओं के साथ संबंध स्वीकारा, एप्स्टीन से जुड़े रिश्तों की जिम्मेदारी ली
गेट्स फाउंडेशन के प्रवक्ता ने मंगलवार को ‘रॉयटर्स’ को दिए एक लिखित बयान में बताया कि बिल गेट्स ने कर्मचारियों के साथ टाउन हॉल बैठक में यौन अपराधी जेफरी एप्स्टीन से जुड़े रिश्तों पर अपने कामों की जिम्मेदारी ली.
यह बयान वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के जवाब में आया, जिसमें कहा गया था कि गेट्स ने टाउन हॉल में कर्मचारियों से एप्स्टीन से जुड़े रिश्तों के लिए माफी मांगी. अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजे) द्वारा जारी दस्तावेज़ों से संकेत मिलता है कि गेट्स और एप्स्टीन जेल की सज़ा पूरी होने के बाद कई बार मिले थे और माइक्रोसॉफ़्ट संस्थापक की परोपकारी गतिविधियों को बढ़ाने पर चर्चा की थी.
जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, गेट्स ने कर्मचारियों से कहा कि एप्स्टीन के साथ समय बिताना और फाउंडेशन के अधिकारियों को उससे मिलवाना एक बड़ी गलती थी. उन्होंने कहा, “मैं उन लोगों से माफी माँगता हूँ जिन्हें मेरी गलती के कारण इसमें घसीटा गया.”
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गेट्स ने स्वीकार किया कि उनके दो रूसी महिलाओं के साथ संबंध थे, जिनके बारे में बाद में एप्स्टीन को पता चला, लेकिन उनका एप्स्टीन के पीड़ितों से कोई संबंध नहीं था. गेट्स ने कहा, “मैंने कोई अवैध काम नहीं किया. मैंने कोई अवैध चीज़ नहीं देखी. ”
न्याय विभाग द्वारा जारी दस्तावेज़ों में गेट्स की कुछ महिलाओं के साथ तस्वीरें भी शामिल थीं, जिनके चेहरे छिपाए गए थे. गेट्स ने पहले कहा था कि एप्स्टीन के साथ उनका रिश्ता केवल परोपकारी चर्चाओं तक सीमित था और उससे मिलना एक गलती थी.
जर्नल के अनुसार, गेट्स ने फाउंडेशन के कर्मचारियों से कहा कि ये तस्वीरें एप्स्टीन ने उनसे अपनी सहायिकाओं के साथ बैठकों के बाद खिंचवाने को कहा था. उन्होंने जोड़ा, “स्पष्ट कर दूँ कि मैंने कभी पीड़ितों या उसके आसपास की महिलाओं के साथ समय नहीं बिताया. ”
पिछले हफ्ते गेट्स ने भारत के एआई इम्पैक्ट समिट से भी अपनी निर्धारित मुख्य भाषण से कुछ घंटे पहले ही नाम वापस ले लिया था.
‘एआई’ की आशंकाओं से भारत की आईटी दिग्गज कंपनियां हिलीं, 47 अरब डॉलर का वैल्यूएशन मिटा
“द टेलीग्राफ” में परन बालाकृष्णन की रिपोर्ट बताती है कि ‘एआई’ के बढ़ते इस्तेमाल से भारतीय आईटी सेक्टर के भविष्य को लेकर गंभीर आशंकाएँ हैं, जिससे निवेशकों का भरोसा हिल गया है और कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई है. आईटी उद्योग पर ‘एआई’ के असर को लेकर गहरी चिंता पैदा हो गई है. हाल ही में शेयर बाज़ार में आई भारी गिरावट के चलते करीब 47 अरब डॉलर (लगभग ₹4.53 लाख करोड़) का मूल्यांकन (वैल्यूएशन) मिट गया. इसकी वजह यह आशंका है कि तेज़ी से विकसित हो रहे ‘एआई’ टूल्स वैश्विक ग्राहकों द्वारा आउटसोर्स किए जाने वाले काम की मात्रा को नाटकीय रूप से कम कर सकते हैं.
इस हफ्ते दबाव और बढ़ गया जब ब्रोकरेज फर्म जेफ़रीज़ ने एक नकारात्मक रिपोर्ट जारी की. इसमें चेतावनी दी गई कि इन्फोसिस, टीसीएस, एचसीएल, एलटीआई माइंडट्री, एम्फ़ैसिस और हेक्सावेयर टेक्नोलॉजीज़ जैसी छह प्रमुख कंपनियाँ एआई की तेज़ी से बढ़ती क्षमताओं से प्रभावित हो सकती हैं. जेफ़रीज़ ने अनुमान लगाया कि इन कंपनियों के शेयरों में 33 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है.
भारतीय आईटी सेक्टर का पारंपरिक बिज़नेस मॉडल — एप्लिकेशन डेवलपमेंट, मेंटेनेंस और टेस्टिंग जैसी सेवाएँ— अब ऑटोमेशन और एआई के कारण सिकुड़ सकता है. पिछले कुछ हफ्तों में आईटी कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली हुई और इंडस्ट्री के वैल्यूएशन में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई.
हेट क्राइम
उत्तराखंड में मंदिर के पास खाली ज़मीन पर नमाज़ पढ़ने पर बुज़ुर्ग मुस्लिम व्यक्ति पर हमला
रुद्रपुर से ‘पीटीआई’ की खबर है कि एक बुज़ुर्ग मुस्लिम व्यक्ति पर कुछ लोगों ने कथित रूप से हमला किया और उसे धार्मिक नारे लगाने के लिए मजबूर किया, जब उसने एक मंदिर के सामने खाली ज़मीन पर नमाज़ अदा की. इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. वीडियो में आरोपी व्यक्ति को डंडों से पीटते और गालियाँ देते हुए दिखाई दे रहे हैं.
पुलिस ने मंगलवार को बताया कि शाहिद, जो रेशम बाड़ी क्षेत्र का निवासी है, ने रमज़ान के महीने में जगतपुरा स्थित अत्रिया मंदिर के पास नमाज़ अदा की थी. शाहिद ने कहा कि वह कई दिनों से मंदिर के पास काम कर रहा था और स्पष्ट किया कि जिस ज़मीन पर उसने नमाज़ पढ़ी, वह मंदिर से काफी दूर है.
मंदिर प्रबंधक अरविंद शर्मा ने कहा कि मंदिर की ज़मीन पर किसी अन्य धर्म से जुड़ी गतिविधियाँ बर्दाश्त नहीं की जाएँगी, चाहे इसके लिए मामला दर्ज ही क्यों न हो.
पुलिस मौके पर पहुँची और दोनों समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील की. शाहिद को चिकित्सीय परीक्षण के लिए भेजा गया और पुलिस ने कहा कि शिकायत के आधार पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी.
घटना की जानकारी मिलने के बाद मुस्लिम समुदाय के सदस्य शाहिद को लेकर स्थानीय पुलिस स्टेशन पहुँचे और शिकायत दर्ज कराई. उन्होंने दावा किया कि आरोपियों में से एक हत्या का दोषी है जो वर्तमान में पैरोल पर बाहर है.
ऑस्ट्रेलिया में भी भारतीय दलित, मुस्लिम, सिख और तमिलों के साथ जातिगत भेदभाव
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के बीच जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव की समस्या गंभीर बताई गई है. ‘पेरियार अंबेडकर थॉट्स सर्किल ऑफ ऑस्ट्रेलिया’ (पीएटीसीए) ने 22 जनवरी 2026 को न्यू साउथ वेल्स (एनएसडब्ल्यू) संसद की कानून और सुरक्षा समिति को अपनी 14 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दलित, बहुजन, आदिवासी, मुस्लिम, ईसाई, सिख, तमिल और अन्य दक्षिण एशियाई समुदायों के लोग ऑस्ट्रेलिया में भी जातिगत भेदभाव झेल रहे हैं. यह खबर द मूकनायक में प्रकाशित हुई है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह समस्या सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि ऑस्ट्रेलिया में भी इन समुदायों के लोग सामाजिक बहिष्कार, अपमान और भेदभाव का सामना कर रहे हैं. पीएटीसीए के अनुसार, कई लोगों को सामुदायिक कार्यक्रमों से बाहर रखा जाता है, नौकरी और व्यापार में भेदभाव किया जाता है और उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जो लोग इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं, उन्हें चुप कराने या उनकी बातों को झुठलाने की कोशिश की जाती है.
पीएटीसीए ने स्कूलों में भी जातिगत भेदभाव का मुद्दा उठाया है. रिपोर्ट के मुताबिक़, कुछ विशेष धार्मिक शिक्षा कार्यक्रमों में बच्चों को जाति आधारित ऊँच-नीच सिखाई जा रही है. रिपोर्ट में कहा गया कि न्यू साउथ वेल्स में जाति को कानूनी रूप से स्पष्ट मान्यता नहीं मिलने के कारण शिक्षा और सामाजिक जीवन में जाति आधारित बहिष्कार जारी है.
रिपोर्ट में ऑस्ट्रेलियाई मानवाधिकार आयोग के उस बयान का भी हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि जातिगत भेदभाव नस्लवाद का एक रूप है और यह शिक्षा, रोज़गार और सार्वजनिक जीवन में लोगों को प्रभावित करता है. पीएटीसीए के अनुसार, नौकरी, प्रमोशन और कार्यस्थल पर भी जाति के आधार पर भेदभाव हो रहा है. पीएटीसीए ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ‘हिंदुत्व’ और ‘ब्राह्मणवाद’ की विचारधारा से प्रेरित कुछ लोग और संगठन दक्षिणपंथी हिंदू उग्रवाद फैला रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, ये संगठन खुद को सांस्कृतिक, शैक्षिक या चैरिटी संस्था बताते हैं, लेकिन स्कूलों, सामुदायिक कार्यक्रमों और धार्मिक आयोजनों के जरिए जातिवादी विचारधारा फैलाते हैं और कुछ मामलों में सरकारी फंडिंग भी प्राप्त करते हैं.
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ऑस्ट्रेलिया में पैदा हुए या बड़े हुए दूसरी पीढ़ी के युवाओं को खास तौर पर निशाना बनाया जा रहा है. उन्हें सांस्कृतिक कक्षाओं, धार्मिक शिक्षा, युवा शिविरों और ऑनलाइन माध्यमों के जरिए जोड़ा जा रहा है और यह बताया जा रहा है कि उनकी पहचान खतरे में है. पीएटीसीए का कहना है कि पीड़ित लोग नफरत, बहिष्कार और अपमान का सामना कर रहे हैं, जिससे उनमें डर और हीन भावना पैदा हो रही है. कई लोग खुलकर शिकायत करने से भी डरते हैं और उनके बच्चे भी इस डर और कलंक के माहौल में बड़े हो रहे हैं.
पीएटीसीए ने सरकार से कई मांगें की हैं, जिनमें दक्षिणपंथी हिंदू उग्रवाद को आधिकारिक तौर पर उग्रवाद के रूप में मान्यता देना, जाति आधारित विचारधारा को खतरे के आकलन में शामिल करना, संदिग्ध संगठनों को सरकारी फंडिंग रोकना, स्कूलों की धार्मिक शिक्षा की जांच करना और एनएसडब्ल्यू के भेदभाव-रोधी कानूनों में जाति को भी संरक्षित श्रेणी में शामिल करना शामिल है. यह रिपोर्ट एनएसडब्ल्यू संसद में चल रही उस जांच का हिस्सा है, जो नवंबर 2025 में हुई एक नव-नाजी रैली के बाद शुरू की गई थी. इस जांच में यहूदी और मुस्लिम संगठनों ने भी अपने समुदायों के ख़िलाफ़ बढ़ते भेदभाव की जानकारी दी है. समिति अप्रैल 2026 तक अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश करेगी.
“मुसलमानों को अलग बैरक में रखा गया, तो निचली जातियों को शौचालय के पास”: फ्रांसीसी फिल्ममेकर ने गोरखपुर जेल का अनुभव साझा किया
फ्रांस के डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर वैलेंटिन हेनो ने अपनी नई किताब में दावा किया है कि गोरखपुर जेल में कैदियों को जाति और धर्म के आधार पर अलग-अलग रखा जाता था. उन्होंने बताया कि मुसलमान कैदियों को एक ही बैरक में रखा जाता था, जबकि निचली जातियों के लोगों को शौचालय के पास अंधेरे हिस्सों में रहने की जगह दी गयी थी. उन्होंने कहा कि जेल में उन्होंने साफ तौर पर देखा कि जेल जैसी जगह में भी जाती और धरम का असर था.
उन्होंने अपने अनुभवों और जेल में देखी गई घटनाओं को अपनी किताब “J’avais un rêve indien. Dans l’enfer de la prison de Gorakhpur” (मेरा एक भारतीय सपना था: गोरखपुर जेल का नरक) में लिखा है, जिसे 15 जनवरी 2026 को भारत में लॉन्च किया गया.
द ऑब्ज़र्वर पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक़ हेनो 2023 में भारत आए थे ताकि बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में दलित महिलाओं के संघर्ष पर डॉक्यूमेंट्री बना सकें. 10 अक्टूबर 2023 को वे गोरखपुर में अंबेडकर जन मोर्चा द्वारा आयोजित एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में मौजूद थे, जिसमें भूमिहीन दलितों, ओबीसी और मुसलमानों के ज़मीन अधिकार की मांग की जा रही थी. हेनो का कहना है कि वे सिर्फ प्रदर्शन को देख रहे थे, न तो फिल्म बना रहे थे और न ही उसमें हिस्सा ले रहे थे.
प्रदर्शन स्थल पर पहुंचने के बाद पुलिस ने उन्हें घेर लिया, होटल ले गई और गिरफ्तार कर लिया. उन पर विदेशी अधिनियम की धारा 14B के तहत बिज़नेस वीज़ा की शर्तों का उल्लंघन करने और प्रदर्शन को फंडिंग देने का आरोप लगाया गया, जिसे उन्होंने खारिज किया. इस मामले में दलित कार्यकर्ता सीमा गौतम के खिलाफ भी केस दर्ज हुआ. हेनो का कहना है कि उनकी गिरफ्तारी का मक़सद आंदोलन को बदनाम करना और विदेशी हस्तक्षेप की कहानी बनाना था.
हेनो ने एक महीना गोरखपुर जेल में गुज़ारा. उन्होंने बताया कि एक बैरक में क़रीब 200 क़ैदी थे, सभी को ज़मीन पर सोना पड़ता था और बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं. बाद में उन्हें मानसिक रूप से बीमार क़ैदियों वाली बैरक में रखा गया, जहां विदेशी होने के कारण उन्हें थोड़ी बेहतर सुविधा मिली.
हेनो को 10 नवंबर 2023 को ज़मानत मिल गई, लेकिन उनका वीज़ा रद्द कर दिया गया और उनके खिलाफ लुक-आउट सर्कुलर जारी हुआ. लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद वे 4 मई 2024 को भारत छोड़ सके. उन्होंने कहा कि इस अनुभव के बाद उनका भारत को देखने का नजरिया बदल गया है और अब वे देश को ज़्यादा वास्तविक और राजनीतिक रूप में देखते हैं.
हरकारा डीप डाइव: शुभ्रांशु चौधरी
माइनिंग के मुनाफे में बस्तर का आदिवासी कहां है?
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में पत्रकार और सीजीनेट ‘स्वरा’ के संस्थापक शुभ्रांशु चौधरी के साथ बस्तर और मध्य भारत में माइनिंग, आदिवासी अधिकार और नक्सलवाद के बाद के भविष्य पर गंभीर चर्चा हुई. सरकार का दावा है कि आने वाले समय में बस्तर नक्सल-मुक्त हो जाएगा. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसके बाद इस इलाके का विकास किस दिशा में जाएगा और क्या आदिवासी समाज को उसका वास्तविक लाभ मिलेगा.
शुभ्रांशु चौधरी ने बताया कि बस्तर और मध्य भारत में माइनिंग और माओवादी आंदोलन लगभग एक ही समय से, पिछले 60 साल से चल रहे हैं. इस दौरान खनिजों से देश और सरकार को भारी आर्थिक लाभ हुआ, लेकिन स्थानीय आदिवासियों की आय बहुत कम ही रही. कई ग्रामीण परिवारों की सालाना आय आज भी लगभग 75 हज़ार से डेढ़ लाख रुपये के बीच है, जबकि उन्हीं इलाकों से हजारों करोड़ रुपये की खनिज संपत्ति निकाली गई.
चर्चा में माइनिंग से होने वाली कमाई के बंटवारे का मुद्दा भी सामने आया. वर्तमान व्यवस्था में लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारों को टैक्स, रॉयल्टी और अन्य शुल्क के रूप में मिलता है. कंपनियों को लगभग 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा मिलता है. स्थानीय लोगों के लिए जिला खनिज फाउंडेशन के माध्यम से केवल लगभग 5 प्रतिशत राशि तय है, लेकिन यह पैसा भी सीधे लोगों तक नहीं पहुंचता. कई जगह यह फंड शहरों के सौंदर्यीकरण या अन्य सरकारी परियोजनाओं में खर्च हो जाता है, जबकि जिन गांवों से खनिज निकाला जाता है वहां बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी रहती है.
शुभ्रांशु ने यह भी बताया कि बस्तर में सुरक्षा पर हर साल हज़ारों करोड़ रुपये खर्च हुए. अनुमान के अनुसार करीब 60 हज़ार सुरक्षा बलों की तैनाती पर सालाना लगभग 4,000 से 8,000 करोड़ रुपये खर्च होते रहे. यह पैसा भी देश के करदाताओं का है, लेकिन इसके बावजूद स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में बड़ा बदलाव नहीं आया. उनका कहना था कि यदि यही संसाधन सीधे लोगों की आय बढ़ाने या विकास पर खर्च किए जाते, तो स्थिति अलग हो सकती थी.
माइनिंग से जुड़ा एक और बड़ा मुद्दा स्थानीय सहमति और अधिकारों का है. कानून के अनुसार आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा की सहमति ज़रूरी है, लेकिन कई मामलों में लोगों का आरोप है कि यह प्रक्रिया सही तरीके से नहीं होती. इससे लोगों में असंतोष पैदा होता है और कई बार संघर्ष और हिंसा की स्थिति बनती है. शुभ्रांशु चौधरी ने कहा कि अगर माइनिंग को शांतिपूर्ण और न्यायपूर्ण बनाना है, तो स्थानीय समुदाय को केवल मज़दूर नहीं बल्कि साझेदार और मालिक बनाना होगा.
उन्होंने सुझाव दिया कि माइनिंग के मुनाफे में स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी बढ़ाई जाए. यदि सरकार अपने हिस्से को कम करके स्थानीय समुदाय को ज़्यादा हिस्सा दे, तो इससे लोगों की आय बढ़ सकती है और संघर्ष कम हो सकता है. उन्होंने सहकारी मॉडल का उदाहरण भी दिया, जैसे अमूल ने किसानों को मालिक बनाकर डेयरी क्षेत्र में बड़ा बदलाव किया. उसी तरह महुआ, तेंदूपत्ता और अन्य वन उत्पादों के सहकारी मॉडल से भी आदिवासियों की आय बढ़ाई जा सकती है.
चर्चा में यह चिंता भी सामने आई कि नक्सलवाद खत्म होने के बाद सरकार के पास बस्तर के विकास का स्पष्ट और सार्वजनिक रोडमैप नज़र नहीं आता. न तो व्यापक संवाद दिखाई देता है और न ही ऐसी नीति, जिसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो. शुभ्रांशु चौधरी ने कहा कि यह बस्तर के लिए एक ऐतिहासिक मौका है. अगर इस समय सही आर्थिक और सामाजिक मॉडल नहीं अपनाया गया, तो असंतोष और संघर्ष फिर से पैदा हो सकते हैं.
जंगल घटने से मध्य भारत में हाथियों और इंसानों के बीच भिड़ंत बढ़ी
मध्य और पूर्वी भारत में जंगल कम होने और हाथियों के झुंड नए इलाकों में जाने की वजह से इंसानों और हाथियों के बीच टकराव तेज़ी से बढ़ रहा है. पिछले हफ्ते झारखंड के हज़ारीबाग़ में हाथियों के हमले में 8 लोगों और पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर में 1 व्यक्ति की मौत हुई. इससे पहले ओडिशा के ढेंकानाल जिले में एक हाथी के हमले में 3 महिलाओं की मौत और 3 लोग घायल हुए थे. झारखंड के पश्चिम सिंहभूम में भी हाल में लगभग दो दर्जन लोगों की मौत के बाद अधिकारियों ने “हाथी आपातकाल” घोषित किया था. यह रिपोर्ट इंडियन एक्सप्रेस से ली गयी है.
भारत में कुल 22,446 हाथियों में से 8% से भी कम हाथी ऐसे हैं, जो लगभग आधे इंसान-हाथी संघर्ष और मौतों के लिए ज़िम्मेदार हैं. ये ज़्यादातर ऐसे झुंड हैं जो जंगल खत्म होने के कारण अपने पुराने इलाकों से विस्थापित होकर खेतों और गांवों की ओर आ गए हैं.
दरअसल, दक्षिण बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे इलाकों में 1980 के दशक तक हाथियों की संख्या बहुत कम थी. लेकिन झारखंड (तब दक्षिण बिहार) और ओडिशा के जंगलों से हाथियों के झुंड यहां आने लगे. इसकी वजह लगातार सूखा, तेज़ी से बढ़ती खनन परियोजनाएं और बड़े बांध व जलाशयों का निर्माण था, जिससे उनके प्राकृतिक जंगल नष्ट हो गए.
सरकार की हाल की रिपोर्ट के अनुसार, खनन, सड़क-रेल जैसी परियोजनाओं और जंगलों के टुकड़ों में बंट जाने से हाथियों को नए इलाकों में जाना पड़ा, जिससे इंसानों के साथ संघर्ष बढ़ गया. अब सैकड़ों हाथी खेतों पर निर्भर हो गए हैं और फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे किसानों और हाथियों दोनों के लिए खतरा बढ़ रहा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट आगे और बढ़ सकता है. भारतीय विज्ञान संस्थान के पारिस्थितिकी वैज्ञानिक रमन सुकुमार के अनुसार, खेतों पर निर्भर झुंडों में अब नए बच्चे पैदा हो रहे हैं और इन नई पीढ़ियों को जंगल में भोजन ढूंढने का अनुभव नहीं है. वहीं, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक बिवाश पांडेव का कहना है कि जंगलों को फिर से ठीक होने में 20 से 40 साल लग सकते हैं, तब तक संघर्ष बढ़ने की आशंका है.
1980 के दशक में सूखे और खनन के कारण झारखंड और ओडिशा के जंगलों से हाथियों का पलायन शुरू हुआ. 1986 में झारखंड के दलमा क्षेत्र से हाथी पहली बार पश्चिम बंगाल पहुंचे और 1993 में 60 से ज़्यादा हाथी करीब 400 किमी चलकर कोलकाता के पास तक पहुंच गए. आज दक्षिण बंगाल के जंगलमहल इलाके में करीब 200 हाथी स्थायी रूप से रह रहे हैं और ज़्यादातर खेतों की फसल पर निर्भर हैं.
इसी तरह ओडिशा से हाथियों के झुंड छत्तीसगढ़ के सरगुजा, जशपुर और हसदेव अरण्य जंगलों तक पहुंच गए और वहां भी फसलों को नुकसान पहुंचाने लगे. बाद में ये झुंड मध्य प्रदेश के सीधी, शहडोल और अनूपपुर तक पहुंच गए. मध्य प्रदेश में 2016-17 में हाथियों से सालाना मौतें 10 से कम थीं, लेकिन 2020-21 तक यह संख्या 20 से ज़्यादा हो गई.
महाराष्ट्र में भी छत्तीसगढ़ के रास्ते हाथी गढ़चिरोली और चंद्रपुर तक पहुंच गए. 2019 से 2024 के बीच महाराष्ट्र में हाथियों के कारण कम से कम 9 लोगों की मौत हुई. विशेषज्ञों के अनुसार, मध्य भारत के ये इलाके हाथियों के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं हैं, क्योंकि यहां पानी और भोजन की कमी रहती है और जंगल पहले ही पशुओं की चराई से कमज़ोर हो चुके हैं. इसलिए हाथी अक्सर पानी और भोजन की तलाश में गांवों और खेतों में उतर आते हैं.
अजित पवार के भतीजे रोहित का आरोप, नागरिक उड्डयन मंत्री का विमान कंपनी से व्यावसायिक संबंध, इसलिए बचा रहे
बुधवार को एनसीपी (एसपी) विधायक रोहित पवार ने विमानन नियामक डीजीसीए पर हमला करते हुए दावा किया कि उसने पहले विमानन कंपनी वीएसआर वेंचर्स को “क्लीन चिट” देने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में स्वीकार किया कि कंपनी ने सुरक्षा मानकों का उल्लंघन किया था. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि टीडीपी के नेता, जिससे नागरिक उड्डयन मंत्री आते हैं, का वीएसआर वेंचर्स से व्यावसायिक संबंध है और वे कंपनी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “मैं नागरिक उड्डयन मंत्री नायडू के इस्तीफे पर जोर दूँगा और इसके लिए लगातार दबाव बनाऊँगा.”
वीएसआर वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड वह कंपनी है, जो लियरजेट 45 विमान (वीटी-एसएसके) का संचालन करती है. यह विमान 28 जनवरी को पुणे जिले के बारामती एयरस्ट्रिप के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार और चार अन्य लोगों की मौत हो गई थी.
‘पीटीआई’ के अनुसार, विधान भवन परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए पवार ने कहा कि 28 जनवरी को दोपहर 1.36 बजे डीजीसीए (नागरिक उड्डयन महानिदेशालय) द्वारा जारी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया था कि फरवरी 2025 में किए गए अंतिम नियामक ऑडिट के दौरान वीएसआर वेंचर्स के खिलाफ कोई “लेवल-1 निष्कर्ष” दर्ज नहीं किया गया था.
उन्होंने आरोप लगाया, “जब अजित पवार का शव अस्पताल ले जाया गया, उसी समय डीजीसीए ने रिपोर्ट जारी की. यह वीएसआर को क्लीन चिट देने का पहला प्रयास था.”
नियामक की भूमिका पर सवाल उठाते हुए पवार ने कहा, “विमान योग्यता प्रमाणपत्र किसने जारी किए? विमान रखरखाव कौन देखता है? वायु सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? सारी जिम्मेदारी डीजीसीए की है. अगर वीएसआर दोषी है तो डीजीसीए भी दोषी है.”
पवार के अनुसार, केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री किन्जरापु राम मोहन नायडू ने 28 जनवरी को कहा था कि वीएसआर वेंचर्स द्वारा संचालित लियरजेट विमान में कोई सुरक्षा चिंता नहीं थी और सभी अनुमोदन डीजीसीए द्वारा गहन मूल्यांकन के बाद दिए गए थे.
उन्होंने कहा, “डीजीसीए ने पूरी तरह जांच की थी और वीएसआर वेंचर्स को सभी मंजूरी दी थी. इसका आकलन पिछले वर्ष किया गया था.”
हालाँकि, मंगलवार को जारी डीजीसीए की विशेष सुरक्षा ऑडिट रिपोर्ट का हवाला देते हुए पवार ने इसे कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की अपनी लगातार मांग का “आंशिक सफलता” बताया. गौरतलब है कि मंगलवार को कई अनुपालन चूकें पाए जाने के बाद डीजीसीए ने वीएसआर वेंचर्स के चार विमानों को ग्राउंड करने का निर्देश दिया है. बारामती दुर्घटना के बाद उसने वीएसआर वेंचर्स का विशेष सुरक्षा ऑडिट कराया था.
पवार ने कहा, “डीजीसीए की रिपोर्ट (मंगलवार को) कंपनी के खिलाफ मेरी मांग की आंशिक सफलता है. विशेष सुरक्षा ऑडिट में संगठन की विमान योग्यता, एयर सेफ्टी और फ्लाइट ऑपरेशंस से जुड़ी स्वीकृत प्रक्रियाओं में कई गैर-अनुपालन पाए गए. इसका मतलब है कि मेरी पहले की प्रेस कॉन्फ्रेंस और उठाए गए मुद्दों को अब डीजीसीए ने स्वीकार किया है.”
उन्होंने कहा, “अब यह कह रहा है कि अनुपालन अनुपालन नहीं किया गया, लेकिन हमने एक नेता खो दिया. वे उपमुख्यमंत्री थे. वे निश्चित रूप से मुख्यमंत्री बनते. लेकिन अब वे नहीं रहे.” पवार ने आरोप लगाया कि विमानन नियामक ने लगातार दबाव के बाद समस्याओं को स्वीकार किया, जबकि शुरुआत में उसने कंपनी को “बचाने की कोशिश” की थी.
उन्होंने कहा कि नवीनतम डीजीसीए रिपोर्ट ने भी वीएसआर वेंचर्स को “बच निकलने का रास्ता” दिया है. डीजीसीए ने गैर-अनुपालन और रखरखाव प्रक्रियाओं में खामियों को देखते हुए तुरंत विमानों को ग्राउंड करने का निर्णय लिया है. उन्होंने कहा, “इसका मतलब है कि डीजीसीए ने परोक्ष रूप से कहा है कि कंपनी अपने विमान बहाल कर सकती है और अपना व्यवसाय फिर से शुरू कर सकती है. वीएसआर के अन्य विमानों को उड़ान भरने की अनुमति क्यों है? वीएसआर से जुड़े सभी विमानों को ग्राउंड किया जाना चाहिए. ”उन्होंने मांग की कि वीएसआर वेंचर्स के मालिक पर मामला दर्ज किया जाए और डीजीसीए अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए.
पवार ने आगे आरोप लगाया कि एरो नामक एक कंपनी, जो महाराष्ट्र में विमानन संबंधी समन्वय देखती है, ने 28 जनवरी को विमान को उड़ान योग्य घोषित किया था और कहा था कि मौसम की स्थिति उड़ान के लिए उपयुक्त है. उन्होंने कहा, “उस कंपनी पर भी मामला दर्ज किया जाना चाहिए. एरो अधिकारियों और महाराष्ट्र सरकार के अधिकारियों का एक व्हाट्सएप समूह है जो वीआईपी मूवमेंट के समन्वय के लिए है. राज्य के अधिकारियों को भी जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए क्योंकि वे सभी जानते थे कि पवार 28 जनवरी की सुबह उड़ान भर रहे थे.”
एफआईआर से इनकार के बाद संदेह गहराया, किसी को बचाने की कोशिश कर रही सरकार
इस बीच रोहित पवार ने दावा किया कि मुंबई पुलिस ने विमान दुर्घटना के संबंध में एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया है. उन्होंने कहा कि इस इनकार ने दुर्घटना को लेकर संदेह और गहरा कर दिया है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार और प्रशासन किसी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक संदेश में रोहित पवार ने दावा किया, “अजितदादा की विमान दुर्घटना के संबंध में उचित कार्रवाई की प्रतीक्षा करते हुए, कल डीजीसीए की रिपोर्ट आई जिसमें कहा गया कि यह दुर्घटना वीएसआर कंपनी की लापरवाही के कारण हुई.” हालाँकि, इस संबंध में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है. उन्होंने बताया कि इसी कारण वे पार्टी एमएलसी अमोल मिटकरी, इदरीस नाइकवाड़ी और विधायक संदीप क्षीरसागर के साथ दक्षिण मुंबई के मरीन ड्राइव पुलिस स्टेशन गए और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज करने की मांग की.
ट्रंप का ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ 2026: भारत, आप्रवासन और टैरिफ पर कड़े संकेत
फरवरी 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ संबोधन में भारत से जुड़े कई अहम मुद्दों पर बात की. हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने एक बार फिर दावा किया कि उन्होंने मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष को समाप्त करवाया था. ट्रंप का कहना है कि उन्होंने दोनों देशों पर भारी टैरिफ (शुल्क) लगाने की धमकी देकर लाखों लोगों की जान बचाई और परमाणु युद्ध को रोका. हालांकि, भारत ने ट्रंप के इन दावों का लगातार खंडन किया है और प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं जून 2025 में फोन पर ट्रंप को यह स्पष्ट किया था कि उनका दावा गलत है.
ईरान के मुद्दे पर ट्रंप ने कूटनीति को प्राथमिकता देने की बात कही, लेकिन साथ ही चेतावनी दी कि वे ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देंगे. यह स्थिति भारत के लिए चिंताजनक हो सकती है क्योंकि पीएम मोदी उस वक्त इज़राइल की यात्रा पर थे जब अमेरिका क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा रहा था.
व्यापार के मोर्चे पर, ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके टैरिफ लगाने के अधिकार को खारिज करने के बावजूद, वे वैकल्पिक कानूनों का उपयोग करके टैरिफ जारी रखेंगे. इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है, जहां सौर उत्पादों के आयात पर अमेरिका ने हाल ही में 125% से अधिक का नया शुल्क लगाया है.
आप्रवासन पर ट्रंप का रुख बेहद सख्त रहा. उन्होंने अवैध प्रवासियों और वीजा नियमों पर कड़ी कार्रवाई की बात दोहराई, जिसका सीधा असर भारतीय छात्रों और पेशेवरों पर पड़ा है. अपने भाषण में उन्होंने कैलिफोर्निया में एक दुर्घटना का जिक्र किया जिसमें भारतीय मूल के ट्रक ड्राइवर प्रताप सिंह शामिल थे, और इसे “खुली सीमाओं” का परिणाम बताया. ट्रंप प्रशासन की नीतियों के चलते भारतीय प्रवासियों के खिलाफ नफरती भाषणों में भी वृद्धि देखी गई है.
सेना और राजनीतिक प्रतिष्ठान के सुर अब पूरी तरह एक: जनरल अशोक के. मेहता
मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) अशोक के. मेहता अपने लेख में भारतीय सेना के बढ़ते राजनीतिकरण पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हैं. इंडिया केबल में मेहता लिखते हैं कि हाल के दिनों में सेना प्रमुख और सीडीएस जनरल अनिल चौहान पूरी तरह से सरकार की विचारधारा के अनुरूप बयान दे रहे हैं. जनरल चौहान ने हाल ही में देहरादून में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की चीन नीति और पंचशील समझौते की आलोचना की, जो कि सेवारत सैन्य अधिकारी के लिए अभूतपूर्व है. मेहता याद दिलाते हैं कि 1949 में नेहरू ने सेना को राजनीति से दूर रहने की सलाह दी थी, लेकिन पिछले एक दशक में राजनीति, आस्था और पेशेवर सैन्य धर्म के बीच की रेखा धुंधली हो गई है.
लेख में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ (संभवतः एक काल्पनिक/नाटकीय सैन्य घटना जिसका संदर्भ दिया गया है) का जिक्र है, जिसे सरकार और सेना ने अपनी बड़ी सफलता बताया, जबकि स्वतंत्र पर्यवेक्षकों और फ्रांसीसी वायु सेना प्रमुख ने इसमें भारत के तीन विमानों (राफेल, मिराज और सुखोई) के नुकसान की बात कही है. मेहता का कहना है कि इस ऑपरेशन का अत्यधिक राजनीतिकरण किया गया.
मेहता यह भी बताते हैं कि कैसे सेना में धार्मिक अनुष्ठानों का प्रदर्शन बढ़ा है. सेना प्रमुख द्वारा मंदिरों में जाना और आयुध की पूजा करना सेना की धर्मनिरपेक्ष साख को कमजोर कर रहा है. यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के प्रोफेसर रोनाल्ड क्रेब्स के सिद्धांत का हवाला देते हुए मेहता कहते हैं कि मोदी जैसे नेता “मृत सैनिकों से प्यार करते हैं लेकिन जीवित अधिकारियों पर भरोसा नहीं करते” और सेना को अपनी वफादारी के दायरे में बदलना चाहते हैं. सेवानिवृत्त होने के बाद भी अधिकारी चुप्पी साधे रहते हैं, जैसा कि जनरल नरवणे की किताब के मामले में देखा गया. लेखक का निष्कर्ष है कि सेना का राजनीतिकरण और परिचालन में हस्तक्षेप उसकी प्रभावशीलता को जोखिम में डाल रहा है.
बाफ्टा में ‘बूंग’ की जीत: मणिपुर की उम्मीदों और संघर्ष पर एक नई रोशनी
मणिपुर के लिए एक गर्व के क्षण में, लक्ष्मणप्रिया देवी द्वारा निर्देशित मणिपुरी फिल्म ‘बूंग’ ने ब्रिटिश एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन आर्ट्स (बाफ्टा) अवार्ड्स में ‘सर्वश्रेष्ठ बाल और पारिवारिक फिल्म’ का पुरस्कार जीता है. ‘द टेलीग्राफ’ की रिपोर्ट के अनुसार, यह जीत उस क्षेत्र के लिए आशा की किरण लेकर आई है जो मई 2023 से जातीय हिंसा और अशांति से जूझ रहा है.
पुरस्कार लेते समय अपने भाषण में लक्ष्मणप्रिया देवी ने कहा, “मैं इस अवसर का उपयोग मणिपुर में शांति की वापसी की प्रार्थना के लिए करना चाहती हूं.” उन्होंने अपनी फिल्म को अपनी मातृभूमि के लिए एक श्रद्धांजलि बताया, जिसे अक्सर अनदेखा किया जाता है. ‘बूंग’ एक स्कूली लड़के की कहानी है जो अपने लापता पिता को वापस लाने की उम्मीद में जातीय विभाजन और सीमाओं को पार करता है. फिल्म में फरहान अख्तर सह-निर्माता हैं.
रिपोर्ट में मणिपुर की जमीनी हकीकत का भी जिक्र है, जहां अफस्पा अभी भी लागू है और मैतेई व कुकी-जो समुदायों के बीच संघर्ष जारी है. मणिपुर स्टेट फिल्म डेवलपमेंट सोसाइटी के सचिव, बचासपातिमयुम सुनजू ने इसे मणिपुरी सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक क्षण बताया. उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि राज्य में हिंदी फिल्मों पर 2000 से प्रतिबंध लगा हुआ है, जिसे उग्रवादी समूहों ने लागू किया था. हालांकि, अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और कुछ आदिवासी क्षेत्रों में हिंदी फिल्मों की स्क्रीनिंग धीरे-धीरे हो रही है. यह जीत न केवल सिनेमाई है, बल्कि शांति के लिए गुहार लगा रहे लोगों की आवाज भी है.
ब्रिटेन के सबसे पुराने भारतीय रेस्तरां ‘वीरास्वामी’ को बचाने के लिए किंग चार्ल्स से गुहार
लंदन में स्थित ब्रिटेन के सबसे पुराने जीवित भारतीय रेस्तरां ‘वीरास्वामी’ को बंद होने से बचाने के लिए एक अभियान शुरू किया गया है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, रेस्तरां के समर्थक और मालिक बकिंघम पैलेस पहुंचे और किंग चार्ल्स से हस्तक्षेप की मांग की. 1926 में स्थापित यह ऐतिहासिक रेस्तरां रीजेंट स्ट्रीट पर अपने मूल स्थान पर स्थित है और इसने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी अपनी सेवाएं जारी रखी थीं.
क्राउन एस्टेट (जो शाही संपत्ति का प्रबंधन करता है) ने इमारत के नवीनीकरण की योजना बनाई है, जिसके चलते रेस्तरां का पट्टा नवीनीकृत नहीं किया जा रहा है. रेस्तरां के सह-मालिक रंजीत मथरानी ने इसे “अदूरदर्शी” निर्णय बताया और कहा कि वे 100 साल के इतिहास को बचाने की गुहार लगा रहे हैं. उनकी पत्नी और सह-मालिक नमिता पंजाबी ने याद दिलाया कि वीरास्वामी ने दो बार बकिंघम पैलेस में कैटरिंग की है, जिसमें 2017 में भारत की स्वतंत्रता के 70 साल का जश्न भी शामिल था.
रेस्तरां को बचाने के लिए 20,000 से अधिक लोगों ने याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें सेलिब्रिटी शेफ रेमंड ब्लैंक और मिशेल रॉक्स भी शामिल हैं. क्राउन एस्टेट का कहना है कि यह निर्णय हल्के में नहीं लिया गया है और वे इमारत को आधुनिक मानकों पर लाने के लिए बाध्य हैं. हालांकि, समर्थकों का कहना है कि यह केवल एक रेस्तरां नहीं, बल्कि भारत-ब्रिटिश सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.











