25/03/2026: ईरान ने ट्रंप का प्रस्ताव ठुकराया| वोटर लिस्ट विवाद | नौकरशाही में खाली पद | महिला वकीलों की चुनौती | ममता vs EC | चीन एक्टिव | ईरान युद्ध बहस | फरसा बाबा सच | ट्रांसजेंडर पर इस्तीफे
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फलक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
सीवर सफाई में मौतें जारी: 2025 में 120 से अधिक जानें गईं, आंकड़े कम करके दिखाने का आरोप
पूर्व आईएएस कन्नन गोपीनाथन: 6.5 साल से लंबित इस्तीफा ‘उत्पीड़न’, चुनाव लड़ने के अधिकार में बाधा
अनुच्छेद 326 पर कुरैशी की चेतावनी: वोट का अधिकार प्रशासनिक देरी का शिकार नहीं
चुनाव आयोग से पहले शुभेंदु का दावा: बंगाल में 79 लाख ‘फर्जी’ मतदाता हटे, भाजपा को 177 सीटों की भविष्यवाणी
बंगाल में वोटर लिस्ट पर संकट: 15 दिन शेष, ममता ने EC-BJP पर अधिकार छीनने का आरोप लगाया
हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता: होर्मुज संकट के बीच भारत के पास समुद्री हलचल तेज
नौकरशाही में भारी कमी: IAS के 1300, IPS के 505 और IFS के 1000 से अधिक पद खाली
महिला वकीलों की कठिन राह: 80% ने पेशे को पुरुषों से ज्यादा चुनौतीपूर्ण बताया
POCSO केस में हाईकोर्ट का रुख: आरोप तय होने से पहले दोष का अनुमान लागू नहीं
ईरान युद्ध पर आकार पटेल: भारत की विदेश नीति पर उठे सवाल
मथुरा में ‘फरसा बाबा’ की मौत: गौ-तस्करी का नैरेटिव झूठा, ट्रक हादसा निकला कारण
ट्रांसजेंडर बिल : सुप्रीम कोर्ट पैनल ने केंद्र से विधेयक वापस लेने को कहा
चुनाव आयोग की पुष्टि के पहले ही शुभेंदु का दावा, बंगाल में 79 लाख ‘फर्जी’ मतदाता हटाए; भाजपा की 177 से अधिक सीटों पर जीत की भविष्यवाणी भी
‘पीटीआई’ की खबर के अनुसार, भाजपा के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी ने बुधवार को दावा किया कि राज्य की मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान लगभग 79 लाख “फर्जी” नाम हटा दिए गए हैं. हैरत इस बात की है कि जब चुनाव आयोग ने अभी तक पूरक सूची में शामिल मतदाताओं की कुल संख्या या हटाए गए नामों के आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, तो बीजेपी नेता अधिकारी के पास 79 लाख का आंकड़ा कहां से आया? इतना ही नहीं, अधिकारी ने बड़े भरोसे के साथ यह भविष्यवाणी भी की कि 79 लाख नाम हटाने से अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को 177 से अधिक सीटें जीतने में मदद मिलेगी.
पूर्बा मेदिनीपुर जिले में पार्टी कार्यकर्ताओं की एक बैठक को संबोधित करते हुए, अधिकारी ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस सत्ता में बने रहने के लिए हमेशा ‘फर्जी मतदाताओं’ पर निर्भर रही है. उन्होंने कहा कि इन प्रविष्टियों को खत्म करने के लिए ही ‘एसआईआ’र प्रक्रिया शुरू की गई थी, जो भाजपा को चुनाव जीतने में मदद करेगी.
रूपकों के जरिए कटाक्ष
मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया को समझाने के लिए भाजपा नेता ने भोजन के समय के रूपकों का उपयोग करते हुए कहा: “नाश्ते के समय 58 लाख नाम हटाए गए, लंच के दौरान 7 लाख और शाम की चाय के समय 14 लाख और नाम चले गए. डिनर अभी परोसा जाना बाकी है.” विधानसभा में विपक्ष के नेता अधिकारी का इशारा उन 58 लाख नामों की ओर था जो ‘एसआईआर’ अभ्यास के गणना चरण के बाद हटाए गए थे, और अतिरिक्त सात लाख नाम कथित तौर पर 28 फरवरी को मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन के दौरान हटाए गए.
अधिकारी ने आगे दावा किया कि सोमवार को प्रकाशित पहली पूरक सूची में जिन 32 लाख मतदाताओं का निर्णय किया गया था, उनमें से 14 लाख नाम हटा दिए गए हैं. उन्होंने कहा कि 79 लाख फर्जी वोटरों में से 90 प्रतिशत तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में मतदान करते थे. इसीलिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ‘एसआईआर’ प्रक्रिया का विरोध कर रही थीं और इसे रोकने के लिए उन्होंने भारत के सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. इस चुनाव को “राष्ट्रवादी और सनातनी सरकार” स्थापित करने की लड़ाई बताते हुए अधिकारी ने कहा, “अगर उन्हें मुस्लिम बूथों पर 100 में से 99 वोट मिलते हैं, तो हमें सनातनी बूथों पर 100 में से 100 क्यों नहीं मिलने चाहिए?”
बंगाल: 15 दिन शेष लेकिन मतदाता सूची पर कोई स्पष्टता नहीं; चुनाव आयोग और भाजपा ‘जनता के अधिकार’ छीन रहे हैं: ममता
बंगाल की अंतिम मतदाता सूची पर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है, जबकि दूसरे चरण के मतदान के लिए नामांकन बंद होने में केवल 15 दिन शेष हैं. 23 अप्रैल को पहले चरण में मतदान होने वाली 152 विधानसभा सीटों के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 6 अप्रैल है. वहीं, शेष 142 विधानसभा सीटों पर 29 अप्रैल को मतदान होगा और इनके लिए नामांकन 9 अप्रैल तक जमा किए जाने हैं.
‘द टेलीग्राफ’ ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार को, पूरक सूची अपलोड होने से कुछ घंटे पहले, चुनाव आयोग के सूत्रों ने कहा था कि ‘निर्णय प्रक्रिया’ (अडजुडिकेशन) के तहत चिह्नित 60.06 लाख मतदाताओं में से न्यायिक अधिकारियों ने लगभग 29 लाख मतदाताओं को मंजूरी दे दी है. हालांकि, 36 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बाद भी आयोग ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इन 29 लाख मामलों में से कितने मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं.
उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया था कि जिन मतदाताओं के नाम ‘निर्णय प्रक्रिया’ (अडजुडिकेशन) के बाद हटाए गए हैं, वे प्रत्येक जिले में स्थापित अपीलीय न्यायाधिकरणों का दरवाजा खटखटा सकते हैं. हालांकि, इन न्यायाधिकरणों ने अभी काम करना शुरू नहीं किया है.
इस बीच उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी में अपनी पहली चुनावी रैली में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आयोग और भाजपा पर संविधान की अनदेखी करने का आरोप लगाया. ममता ने कहा, “चुनाव आयोग और भाजपा सरकार संविधान का पालन नहीं कर रहे हैं. वे वोट देने के अधिकार को छीनने की कोशिश कर रहे हैं. कल वे एनआरसी लाकर नागरिकता छीन लेंगे.”
बाद में, सिलीगुड़ी में एक चुनावी रैली में उन्होंने सवाल उठाया, “मुझे बताया गया है कि विचाराधीन 27 लाख मतदाताओं में से 8 लाख नाम पहली पूरक सूची से हटा दिए गए हैं. लेकिन वह सूची कहाँ है? अब तक सरकारी कार्यालयों में उस सूची की हार्ड कॉपी क्यों नहीं लगाई गई है? मैं उस सूची के प्रदर्शित होने के बाद ही जानकारी का सत्यापन कर सकती हूँ.”
2025 में सफाई कर्मचारियों की 120 से अधिक मौतें: आंकड़ों को कम करके दिखाने का आरोप, सीवर में मौतें ‘राष्ट्रीय शर्म’
सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन (एसकेए) ने सीवर और सेप्टिक टैंकों में सफाई कर्मियों की लगातार हो रही मौतों पर गंभीर चिंता जताई है और सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है.
गज़ाला अहमद की रिपोर्ट के मुताबिक, एसकेए के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन ने इस स्थिति को “राष्ट्रीय शर्म” बताया. उन्होंने आरोप लगाया कि बार-बार के वादों के बावजूद, पूरे भारत में हाथ से मैला ढोने और खतरनाक सीवर सफाई का काम जारी है. विल्सन ने कहा, “हम हर कुछ दिनों में जान गंवा रहे हैं. ये दुर्घटनाएं नहीं हैं, ये ऐसी मौतें हैं जिन्हें रोका जा सकता था.” उन्होंने सुरक्षा उपायों और जवाबदेही को लागू करने में “व्यवस्थागत विफलता” की ओर इशारा किया.
विल्सन ने बताया कि अकेले 2025 में 120 से अधिक मौतें दर्ज की गईं, जो आधिकारिक आंकड़ों से काफी अधिक हैं. उन्होंने आगे कहा, “सरकार जो रिपोर्ट करती है और जो हम जमीन पर देखते हैं, उसके बीच भारी अंतर है. इन नंबरों को कम करके क्यों दिखाया जा रहा है?”
संगठन ने आज, 25 मार्च को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन और धरना आयोजित किया. “हमें मारना बंद करो” के बैनर तले आयोजित इस प्रदर्शन में कई राज्यों के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें वे कर्मचारी भी शामिल थे जो खतरनाक सीवर सफाई के दौरान बच गए थे, और उन लोगों के रिश्तेदार भी जिन्होंने ऐसी स्थितियों में अपनी जान गंवा दी थी. विल्सन ने कहा कि 2026 के शुरुआती कुछ महीनों में ही दर्जनों मौतें दर्ज की जा चुकी हैं.
पूर्व आईएएस कन्नन गोपीनाथन: ‘साढ़े 6 साल से इस्तीफा लंबित रखना शुद्ध उत्पीड़न’, देरी चुनाव लड़ने के अधिकार से रोक रही है
पूर्व आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन, जिन्होंने अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के विरोध में सिविल सेवा से इस्तीफा दे दिया था, ने बुधवार को सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके इस्तीफे की प्रक्रिया को पूरा करने की अपील की. गोपीनाथन का कहना है कि उनका इस्तीफा साढ़े छह साल से अधिक समय से लंबित है.
2019 में इस्तीफा देने वाले गोपीनाथन ने कहा कि इस देरी के कारण वे न तो अन्य पेशेवर अवसरों का लाभ उठा पा रहे हैं और न ही केरल में चुनाव लड़ पा रहे हैं.
उन्होंने सेवा से इस्तीफा इसलिए दिया था ताकि वे जम्मू-कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त किए जाने के बाद वहां के लोगों पर थोपे गए “आभासी आपातकाल” के खिलाफ खुलकर बोल सकें. वह अक्टूबर 2025 में कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए थे, लेकिन तकनीकी रूप से वे अभी भी सेवा में बने हुए हैं क्योंकि उनका इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है.
प्रधानमंत्री को संबोधित एक पोस्ट में गोपीनाथन ने आरोप लगाया कि लंबे समय तक की गई यह देरी “शुद्ध उत्पीड़न” के समान है. मोदी को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “आपकी सरकार ने साढ़े छह (6.5) साल से मेरे इस्तीफे की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है. न वेतन मिल रहा है और न ही कार्यमुक्ति. इसने मुझे पेशेवर रूप से आगे बढ़ने से रोक दिया है और मुझे केरल में चुनाव लड़ने से भी वंचित कर दिया है.”
उन्होंने आगे तर्क दिया कि यह स्थिति उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन करती है. उन्होंने कहा, “इस्तीफा देने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने के मेरे अधिकार को रोकना दयनीय और ओछापन है, चाहे मेरी राजनीतिक स्थिति जो भी हो.” उन्होंने सरकार से इस पर तुरंत कार्रवाई करने का आग्रह किया.
‘मकतूब’ से बात करते हुए, गोपीनाथन ने कहा कि इस्तीफा देना उनका “मौलिक अधिकार” है, और इससे इनकार करना “बंधुआ मजदूरी” के समान होगा. उनकी पोस्ट के बाद, कई आलोचकों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की, जिनमें से कुछ ने आरोप लगाया कि सरकार असहमति जताने वालों को निशाना बना रही है.
कुरैशी: अनुच्छेद 326 कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि एक संवैधानिक वादा है
भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी का तर्क है कि संविधान का अनुच्छेद 326 हर पात्र नागरिक को मतदान का अधिकार देता है. चुनाव आयोग का यह कर्तव्य है कि वह पात्रता की पुष्टि करे, लेकिन सत्यापन में होने वाली प्रशासनिक देरी किसी नागरिक के मौलिक अधिकार को छीनने का आधार नहीं बननी चाहिए. यदि किसी नागरिक ने समय सीमा के भीतर आवेदन किया है और वह अयोग्य नहीं पाया गया है, तो केवल जांच लंबित होने के कारण उसे सूची से बाहर करना असंवैधानिक है.
कुरैशी का कहना है कि दशकों से भारतीय चुनाव आयोग का दर्शन रहा है कि “कोई भी मतदाता पीछे न छूटे.” आयोग ने दुर्गम क्षेत्रों में एक-एक मतदाता के लिए बूथ बनाकर इस सिद्धांत को सिद्ध किया है. लेकिन वर्तमान में, लगभग 60 लाख मतदाताओं के नाम ‘निर्णय प्रक्रिया’ (अडजुडिकेशन) के अधीन होने के कारण यह परंपरा संकट में दिख रही है. समय की कमी के कारण इन सभी मामलों का निस्तारण चुनाव से पहले होना असंभव सा लगता है.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने आपराधिक न्यायशास्त्र का उदाहरण देते हुए लिखा है कि जैसे “नौ गुनहगार छूट जाएं पर एक निर्दोष को सजा न मिले”, वैसे ही चुनावी लोकतंत्र में “समावेश की गलती निष्कासन की गलती से बेहतर है.” यदि किसी अयोग्य व्यक्ति का नाम सूची में रह जाता है, तो उसे बाद में सुधारा जा सकता है, लेकिन यदि एक पात्र नागरिक को वोट देने से रोक दिया गया, तो वह नुकसान अपूरणीय और अंतिम है.
लेखक के अनुसार, मतदाता सूची दशकों के निरंतर अपडेट और सुधार का परिणाम होती है. इस संचित प्रयास को कुछ ही हफ्तों या महीनों में फिर से तैयार करने की कोशिश करना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि इसमें बड़े पैमाने पर पात्र लोगों के छूट जाने का जोखिम है.
‘द टेलीग्राफ’ में प्रकाशित अपने लेख में वह वर्तमान गतिरोध को दूर करने के लिए दो विकल्प सुझाते हैं: (एक)- चुनाव जनवरी 2025 की मौजूदा वैध मतदाता सूची के आधार पर कराए जाएं. (दो)- जिन नागरिकों के आवेदन लंबित हैं, उन्हें वर्तमान चुनाव के लिए अस्थाई रूप से मतदान की अनुमति दी जाए और अंतिम निर्णय बाद में होता रहे.
कुलमिलाकर, कुरैशी का मानना है कि अनुच्छेद 326 कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि एक संवैधानिक वादा है. व्यवस्था की सुविधा के नाम पर नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की बलि नहीं दी जा सकती. सिस्टम की विफलता का बोझ व्यक्ति पर नहीं डाला जाना चाहिए.
पश्चिमी असम के कोकराझार में तनाव: गोमांस के शक में अल्पसंख्यक समुदाय के घरों में तोड़फोड़, 7 गिरफ्तार
पश्चिमी असम के कोकराझार में बुधवार को उस समय तनाव फैल गया, जब कुछ शरारती तत्वों ने अल्पसंख्यक समुदाय के घरों में तोड़फोड़ की. यह घटना तब हुई जब कुछ हिंदू निवासियों ने कथित तौर पर एक व्यक्ति के आंगन में बीफ (गोमांस) मिलने का दावा किया. पुलिस ने कहा कि घटना सामने आने के तुरंत बाद उन्होंने 7 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया है.
मनोज आनंद की रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना सलाकाटी पुलिस चौकी के अंतर्गत आने वाले एक गांव में हुई. पुलिस ने बताया कि नंबर 3 नयाशारा गांव में एक निवासी के घर के आंगन में संदिग्ध बीफ मिलने के बाद भीड़ ने अल्पसंख्यक समुदाय के कई घरों पर हमला कर दिया. यह घटना जंगल की आग की तरह फैल गई, जिससे दोनों समुदायों के बीच भारी तनाव पैदा हो गया.
जैसे ही घटना की खबर फैली, भीड़ जमा होने लगी और उन्होंने कई घरों में तोड़फोड़ की. स्थिति तब और बिगड़ गई जब गुस्सैल भीड़ ने गांव के अल्पसंख्यक निवासियों की काफी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया. स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि यह हमला पुलिस की मौजूदगी में हुआ, जो भीड़ को हिंसा करने से रोकने में विफल रही. अधिकारियों ने बताया कि स्थिति अभी भी तनावपूर्ण है, लेकिन वर्तमान में नियंत्रण में है. शांति बनाए रखने और किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोकने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं.
पानी में ड्रैगन: जब दुनिया का ध्यान होर्मुज पर है, चीन ने भारत के पास बढ़ाया अपना अभियान
चीन इस तथ्य का लाभ उठा रहा है कि दुनिया का अधिकांश ध्यान ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ के आसपास के तनाव पर केंद्रित है. यह देखकर उसने चुपचाप भारत के बहुत करीब के जलक्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ा दी है. अब उसका एक तीसरा “अनुसंधान” पोत हिंद महासागर क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है, जो हिंद महासागर और अरब सागर में सक्रिय उसके जहाजों के छोटे लेकिन बढ़ते बेड़े में शामिल हो गया है.
परन बालकृष्णन के अनुसार, चीन का यह नवीनतम जहाज, शी यान 6, सुंडा जलडमरूमध्य के माध्यम से हिंद महासागर में दाखिल हुआ, जो जावा और सुमात्रा के बीच एक संकरा और नेविगेशन के लिए कठिन समुद्री मार्ग है. इस जहाज ने अपना गंतव्य मालदीव की राजधानी माले घोषित किया है, जो हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में सक्रिय चीनी जहाजों के लिए एक नियमित ‘पोर्ट ऑफ कॉल’ (ठहराव स्थल) बन गया है.
यह अकेला नहीं है. दो अन्य चीनी “अनुसंधान” जहाज पहले से ही इन जलक्षेत्रों में सक्रिय हैं: एक- दा यांग हाओ, जो फरवरी के अंत में आया था और तब से पश्चिम की ओर बढ़ते हुए अफ्रीका के करीब पहुंच गया है. दूसरा- दा यांग यी हाओ, जो पहली बार दिसंबर में आया था और तब से भारत, पाकिस्तान और अफ्रीकी तट के बीच हिंद महासागर और अरब सागर में निरंतर आवाजाही कर रहा है.
कागजों पर ये जहाज वैज्ञानिक कार्यों में लगे हुए हैं, लेकिन व्यवहार में इनकी क्षमताओं ने भारतीय सुरक्षा योजनाकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है और वे निरंतर निगरानी में हैं. ‘शी यान’ श्रेणी के जहाज समुद्र तल की मैपिंग पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि ‘दा यांग’ श्रेणी उप-सतह की स्थितियों का अध्ययन करती है और खनिजों की खोज करती है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया जा रहा है, उनमें से कई भारत के पनडुब्बी संचालन मार्गों के करीब स्थित हैं. यह अंतर बहुत मायने रखता है. समुद्र तल की आकृति का अध्ययन करके, ‘शी यान’ जहाज अत्यंत विस्तृत पानी के नीचे के नक्शे बनाने में मदद कर सकते हैं. ‘दा यांग’ जहाज इससे एक कदम आगे जाते हैं, वे ड्रिलिंग करते हैं और गहराई में छिपी चीजों का विश्लेषण करते हैं. इस तरह के डेटा का स्पष्ट रूप से दोहरा उपयोग मूल्य है: पनडुब्बी युद्ध में, पानी के नीचे के इलाके को समझने से संभावित छिपने के स्थानों, नेविगेशन गलियारों और निगरानी के ‘ब्लाइंड ज़ोन’ की पहचान करना कहीं अधिक आसान हो जाता है.
भारत के आसपास इन जहाजों की चीनी तैनाती नई नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में इसमें तेजी आई है. वर्तमान पैटर्न का पता 2022 से लगाया जा सकता है, जब चीनी ट्रैकिंग जहाज युआन वांग 5 श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर रुका था. यह बंदरगाह अपने आप में एक संवेदनशील मुद्दा है—श्रीलंका द्वारा कर्ज न चुका पाने के कारण इसे 99 वर्षों के लिए एक चीनी कंपनी को पट्टे पर दिया गया है—जिससे बीजिंग को प्रमुख हिंद महासागर शिपिंग लेन के साथ एक रणनीतिक पकड़ मिल गई है.
समुद्री विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी सर्वेक्षण जहाज अक्सर एक ही स्थान पर बार-बार लौटते हैं, जिससे धीरे-धीरे समुद्र तल और उप-सतह पर्यावरण की एक अत्यंत विस्तृत और परत-दर-परत तस्वीर तैयार हो जाती है. अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत, देश समुद्र तल की खोज के लिए ‘इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी’ में आवेदन कर सकते हैं. चीन ने इस ढांचे का व्यापक उपयोग किया है और अब वह प्रशांत और हिंद महासागरों में लगभग 50 अनुसंधान जहाजों का संचालन करता है. अमेरिका के पास भी इसी आकार का बेड़ा है. इसके विपरीत, भारत के पास लगभग 10 से 12 अनुसंधान जहाजों का बहुत छोटा बेड़ा है. एक संरचनात्मक अंतर यह भी है कि भारतीय जहाज काफी हद तक नागरिक वैज्ञानिक निकायों जैसे ‘राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान’ और ‘पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय’ द्वारा संचालित होते हैं, जबकि चीनी जहाजों को व्यापक रूप से उनकी नौसेना के साथ घनिष्ठ संबंध रखने वाले के रूप में देखा जाता है, जो उनकी रणनीतिक भूमिका के बारे में चिंताओं को पुख्ता करता है. नई दिल्ली अब इस अंतर को पाटने की कोशिश कर रही है. इसकी सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में मत्स्य 6000 शामिल है, जो तीन सदस्यों के चालक दल के साथ 6,000 मीटर की गहराई तक गोता लगाने में सक्षम एक गहरे समुद्र की पनडुब्बी है.
आईएएस के 1,300, आईपीएस के 505 से अधिक पद खाली; आईएफ़एस के भी 1 हजार : सरकार ने लोकसभा को बताया
लोकसभा को बुधवार को सूचित किया गया कि भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के 1,300 और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के 505 पद खाली पड़े हैं. यही हाल भारतीय वन सेवा (आईएफ़एस) का है, जहां वर्तमान में 1,029 पद खाली हैं, जबकि स्वीकृत संख्या 3,193 है.
‘द टेलीग्राफ’ की खबर के अनुसार, केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने एक लिखित उत्तर में कहा कि आईएएस के कुल 6,877 स्वीकृत पदों में से 5,577 अधिकारी कार्यरत हैं. उन्होंने बताया कि आईपीएस अधिकारियों की स्वीकृत संख्या 5,099 है, जिसके मुकाबले 4,594 अधिकारी पद पर हैं.
सिंह ने स्पष्ट किया कि आईएएस पदों को सरकार द्वारा जारी आरक्षण दिशानिर्देशों के अनुसार भरा जाता है. उन्होंने कहा, “2012 से, प्रत्येक वर्ष सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से कुल 180 उम्मीदवारों को आईएएस में भर्ती किया गया है, जिनमें से 4 प्रतिशत सीटें बेंचमार्क विकलांगता वाले उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं.”
उन्होंने बताया कि वर्तमान में भारतीय प्रशासनिक सेवा में कोई बैकलॉग रिक्ति (पिछली खाली सीटें) नहीं है. इसके अतिरिक्त, 1 जनवरी, 2025 तक भारतीय पुलिस सेवा में भी कोई बैकलॉग आरक्षित पद नहीं है.
मंत्री ने उल्लेख किया कि पिछले पांच वर्षों (2020 से 2024) के दौरान आईएएस में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से 245, अनुसूचित जाति (एससी) से 135 और अनुसूचित जनजाति (एसटी) से 67 उम्मीदवारों को नियुक्त किया गया है. आईपीएस में इसी अवधि के दौरान ओबीसी से 255, एससी से 141 और एसटी से 71 व्यक्तियों को नियुक्त किया गया है.
80% से अधिक महिला वकीलों की पेशेवर यात्रा पुरुष साथियों की तुलना में कठिन: SCBA सर्वे
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने हाल ही में “भारत में महिला कानूनी पेशेवरों की आवाज़ का दस्तावेजीकरण” शीर्षक से एक व्यापक राष्ट्रीय सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की है. 2,604 महिला वकीलों की प्रतिक्रियाओं पर आधारित इस रिपोर्ट को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने 22 मार्च, 2026 को बेंगलुरु में प्रस्तुत किया. यह रिपोर्ट कानूनी पेशे में महिलाओं द्वारा सामना किए जा रहे गहरे संरचनात्मक और सामाजिक अवरोधों को उजागर करती है.
‘लाइव लॉ’ में अमीषा श्रीवास्तव की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वेक्षण का सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि 81.3% महिला वकीलों का मानना है कि उनकी पेशेवर यात्रा पुरुष साथियों की तुलना में कहीं अधिक कठिन रही है. जबकि 41.1% ने इसे “बहुत अधिक कठिन” बताया है. लगभग 63.7% महिलाओं ने स्वीकार किया कि करियर के किसी न किसी पड़ाव पर इस पेशे के चुनौतीपूर्ण माहौल ने उन्हें हतोत्साहित किया.
रिपोर्ट के अनुसार, 16.1% उत्तरदाताओं ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना किया है. चिंताजनक बात यह है कि शिकायत करने वाली 57% महिलाओं को ‘बैकलैश’ या सूक्ष्म प्रतिशोध का सामना करना पड़ा. इसके अतिरिक्त, 72.3% महिलाओं ने माना कि उनके जेंडर ने उन्हें पेशेवर नेटवर्किंग करने से रोका, जो वकालत में आगे बढ़ने के लिए एक अनिवार्य घटक है.
सर्वेक्षण में पाया गया कि वरिष्ठ पदनाम और सरकारी पैनल की नियुक्तियाँ पुरुषों के लिए बहुत आसान हैं. सुप्रीम कोर्ट स्तर पर महिला ‘वरिष्ठ अधिवक्ताओं’ की संख्या मात्र 0.4% है. नेतृत्व के मामले में भी स्थिति निराशाजनक है; 64.7% महिलाओं का मानना है कि उन्हें ‘बार’ के नेतृत्व में समान अवसर नहीं मिलते, यही कारण है कि भविष्य के लक्ष्यों में केवल 8.5% महिलाओं ने बार नेतृत्व में रुचि दिखाई.
बुनियादी ढांचा और वित्तीय बाधाएँ: आर्थिक और भौतिक संसाधनों की कमी एक बड़ी बाधा है. लगभग 83.1% उत्तरदाता पहली पीढ़ी की वकील हैं, जिनके पास पहले से बना-बनाया पेशेवर नेटवर्क नहीं है. केवल 19% के पास न्यायालय के पास कार्यालय हैं, और 12% के पास कोई दफ्तर ही नहीं है. इसके अलावा, 75% के पास कानूनी डेटाबेस और 56% के पास स्थिर इंटरनेट जैसे बुनियादी संसाधनों की कमी है.
सर्वेक्षण में शामिल 71.5% महिलाओं ने कहा कि वैवाहिक स्थिति और घरेलू जिम्मेदारियों ने उनके करियर को प्रभावित किया है. मातृत्व के बाद काम पर लौटने में कठिनाई और प्रसव के कारण अदालती मामलों को स्थगित कराने में आने वाली समस्याएँ आम हैं. इसी कारण 47.5% उत्तरदाता अपनी बेटियों के लिए वकालत के बजाय न्यायपालिका को प्राथमिकता देती हैं, क्योंकि वहां अधिक स्थिरता और सुरक्षा है.
रिपोर्ट ने कानूनी पेशे को अधिक समावेशी बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुधारों की आवश्यकता बताई है. मसलन, उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में महिला न्यायाधीशों और पैनल काउंसिल में महिलाओं के लिए अनिवार्य न्यूनतम प्रतिनिधित्व की मांग की गई है. शुरुआती स्तर की वकीलों के लिए वित्तीय सहायता, मातृत्व संरक्षण योजनाएं और अदालतों में बाल देखभाल की सुविधा होना चाहिए. यौन उत्पीड़न रोकथाम (पॉश) नियमों का कड़ाई से क्रियान्वयन और शिकायतों के निवारण के लिए एक निष्पक्ष प्रणाली और पहली पीढ़ी की वकीलों के लिए एक औपचारिक मार्गदर्शन कार्यक्रम होना चाहिए.
यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि 1923 के बाद से महिलाओं को बार में प्रवेश तो मिल गया है, लेकिन ‘समान अवसर’ आज भी एक दूर का सपना है. करियर की शुरुआत में तनाव और बर्नआउट (84%) की उच्च दर इस पेशे की कठिन परिस्थितियों का प्रमाण है.
पीड़ितों का असामान्य आचरण; आरोप तय होने से पूर्व पॉक्सो का अनुमान लागू नहीं: हाईकोर्ट ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को राहत क्यों दी
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आज बुधवार को नाबालिगों के कथित यौन शोषण के मामले में पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज मामले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य को अग्रिम जमानत दे दी. न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की पीठ ने 22 पृष्ठों के अपने विस्तृत आदेश में नाबालिग पीड़ितों के उस ‘असामान्य’ व्यवहार पर सवाल उठाया, जिसमें उन्होंने कथित अपराध के बारे में अपने स्वाभाविक अभिभावकों (माता-पिता) के बजाय एक अजनबी व्यक्ति, यानी प्रथम सूचना देने वाले (आशुतोष ब्रह्मचारी) को बताया.
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
‘लाइव लॉ’ के लिए स्पर्श उपाध्याय के अनुसार, पीठ ने राज्य सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 29 के तहत आरोपियों के खिलाफ दोष का वैधानिक अनुमान माना जाना चाहिए. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी से पहले के चरण में, यानी आरोप तय होने से पहले, इस अनुमान का प्रयोग नहीं किया जा सकता. अदालत ने राज्य की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें अग्रिम जमानत याचिका की विचारणीयता को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि आवेदकों को पहले सत्र न्यायालय जाना चाहिए था.
पीड़ितों द्वारा प्रथम सूचना देने वाले को विश्वास में लेने का जो कारण बताया गया है, वह यह है कि सूचना देने वाला आवेदक नंबर 1 (शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद) के पास जाया करता था, उन्हें माला पहनाता था और उनके पैर छूता था, इसलिए अपराध की जानकारी देने के लिए वह सही व्यक्ति था. पीड़ितों द्वारा दिया गया उपरोक्त तर्क भी असामान्य प्रतीत होता है और मानव आचरण के सामान्य व्यवहार के अनुरूप नहीं है,” पीठ ने कहा.
विशेष परिस्थितियों का उल्लेख
न्यायमूर्ति सिन्हा ने कहा कि चूंकि प्राथमिकी (एफआईआर) प्रयागराज के विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो)/अपर सत्र न्यायाधीश के विशिष्ट निर्देशों पर बीएनएस की धारा 173(4) के तहत दायर एक आवेदन पर दर्ज की गई थी, इसलिए उच्च न्यायालय का सीधे दरवाजा खटखटाने के लिए “विशेष/असाधारण परिस्थितियाँ” मौजूद थीं.
तथ्यों में विसंगति
तथ्यों की जांच करते हुए, उच्च न्यायालय ने एक और बड़ी विसंगति की ओर इशारा किया: पीड़ितों ने कथित तौर पर 18 जनवरी, 2026 को प्रथम सूचना देने वाले को घटना की जानकारी दी थी, फिर भी पुलिस को इसकी सूचना छह दिन बाद दी गई. जब इस देरी के बारे में पूछताछ की गई, तो सूचना देने वाले ने दावा किया कि वह “पूजा/यज्ञ” में व्यस्त था. हालांकि, अदालत ने गौर किया कि इससे पहले, 21 जनवरी को सूचना देने वाले ने बीएनएस की धारा 109 और अन्य धाराओं के तहत एक कथित घटना से संबंधित एक अलग आवेदन दायर किया था.
घटना का स्थान और समय: जहाँ प्राथमिकी में कहा गया था कि घटनाएँ जनवरी 2025 और फरवरी 2026 के बीच प्रयागराज के महाकुंभ और माघ मेले में हुईं, वहीं एक पीड़ित ने बाद में दावा किया कि हमला जून 2024 में मध्यप्रदेश के एक आश्रम में हुआ था. पीड़ितों की स्थिति: शैक्षिक प्रमाणपत्रों से पता चला कि पीड़ित हरदोई के संस्थागत छात्र थे, न कि आश्रम के निवासी. चिकित्सीय परीक्षण: मेडिकल जांच में पीड़ितों पर कोई बाहरी चोट नहीं पाई गई, और डॉक्टर ने केवल एक अनिर्णायक राय दी कि यौन हमले से “इन्कार नहीं किया जा सकता”.
शंकराचार्य पद पर विवाद
कार्यवाही के दौरान, अतिरिक्त महाधिवक्ता और प्रथम सूचना देने वाले ने आवेदक की साख का कड़ा विरोध किया. उन्होंने 796 पृष्ठों का एक खंडपीठ का निर्णय और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पेश करते हुए तर्क दिया कि ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य होने का उनका दावा विवादित है. इस तर्क को खारिज करते हुए, उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसका काम यह तय करना नहीं है कि आवेदक नंबर 1 (स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद) असली शंकराचार्य हैं या ज्योतिषपीठ के विवादित शंकराचार्य.
नियमों का उल्लंघन, एफआईआर के बाद बयान, न्यूज़ चैनलों ने पीड़ितों का इंटरव्यू लिया
पीठ ने इस तथ्य पर कड़ी आपत्ति जताई कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पीड़ितों के बयान दर्ज किए गए और विभिन्न हिंदी समाचार चैनलों द्वारा उनका साक्षात्कार लिया गया, जो “पॉक्सो और किशोर न्याय अधिनियम की स्थापित प्रक्रिया का उल्लंघन” है.
अदालत ने यह भी जोड़ा कि जिस दिन सूचना देने वाले को पीड़ितों से अपराध की जानकारी मिली और जिस दिन मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर संगम में स्नान को लेकर आवेदक नंबर 1 और प्रशासन के बीच विवाद हुआ, वह तारीख एक ही है (यानी 18.01.2026). इसलिए, इन तथ्यों की “अधिक सावधानी और सतर्कता के साथ जांच” किए जाने की आवश्यकता है.
इस जंग में हम किसके साथ; ताकत या इंसाफ?
ईरान और इजरायल-अमेरिका गठबंधन के बीच जारी युद्ध अब अपने 25वें दिन में प्रवेश कर चुका है. इस संकट पर ‘हरकारा’ के खास कार्यक्रम ‘टॉकिंग न्यूज़’ में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी से बात करते हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता और लेखक आकार पटेल ने एक विवादास्पद लेकिन तर्कपूर्ण पक्ष रखा. पटेल का मानना है कि इस युद्ध में ईरान की जीत वैश्विक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय नियमों की बहाली के लिए आवश्यक है.
आकार पटेल ने कहा कि यह युद्ध दो परमाणु संपन्न देशों (अमेरिका और इजरायल) द्वारा एक छोटे राष्ट्र को कुचलने की कोशिश है. उन्होंने ओबामा के दौर की ‘ईरान न्यूक्लियर डील’ का जिक्र करते हुए कहा कि ट्रंप ने बिना किसी कारण के इस समझौते को तोड़ा और बातचीत के दौरान ही ईरान पर बमबारी शुरू की, जो सरासर ‘धोखा’ है.
भारत के रुख पर कड़ा प्रहार करते हुए पटेल ने कहा कि 40 साल पहले भारत रंगभेद के खिलाफ खड़ा होता था, लेकिन आज हम एक ‘अपार्थाइड स्टेट’ (इजरायल) के साथ खड़े हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि भारत सरकार की नीति राष्ट्रीय हित के बजाय घरेलू नफरत की राजनीति से प्रेरित है. उन्होंने कहा, “इजरायल के पास ऐसी कोई मिसाइल या तकनीक नहीं है जो हम कहीं और से नहीं ले सकते, फिर भी हम उनके साथ खड़े हैं.”
इस युद्ध के आर्थिक परिणामों पर चेतावनी देते हुए पटेल ने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आएगा. भारत की 4% जीडीपी खाड़ी से आने वाली ऊर्जा और रेमिटेंस पर टिकी है. यदि खाड़ी के देशों में अस्थिरता बढ़ती है, तो वहां काम करने वाले एक करोड़ भारतीयों का भविष्य संकट में पड़ जाएगा.
आकार पटेल ने ट्रंप को एक ‘मूर्ख’ राष्ट्रपति करार देते हुए कहा कि उन्होंने एक ऐसा युद्ध शुरू किया है जिसका कोई स्पष्ट मकसद नहीं है. उन्होंने भविष्यवाणी की कि यदि ईरान होर्मुज को बंद रखने में सफल रहा, तो अमेरिका को घुटने टेकने पड़ेंगे और यह ईरान की नैतिक और राजनीतिक जीत होगी.
मथुरा में ‘फरसा बाबा’ की मौत पर फैलाया गया गौ-तस्करी का नैरेटिव,ट्रक से हुई मौत
ऑल्ट न्यूज़ के अनुसार, उत्तर प्रदेश के मथुरा में ‘फरसा बाबा’ के नाम से मशहूर चंद्रशेखर दास की मौत एक सड़क हादसे में हुई, लेकिन इस घटना के बाद फैली अफवाहों ने इलाके में हिंसा को जन्म दे दिया.
घटना के बाद कुछ हिंदुत्व संगठनों में गुस्सा देखने को मिला. लोगों ने मथुरा और वृंदावन के गौ-रक्षकों से चट्टा इलाके में जुटने की अपील की और ट्रक ड्राइवर के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की.
हालात तब बिगड़ गए जब प्रदर्शनकारियों ने हाईवे जाम कर दिया और पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया. इस हिंसा में कई पुलिसकर्मी घायल हुए और पुलिस वाहनों को नुकसान पहुंचा..
अब मथुरा पुलिस ने साफ किया कि यह घटना एक दुर्घटना थी और घने कोहरे के कारण ट्रक चालक को ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था. पुलिस ने सोशल मीडिया पर फैल रही गौ-तस्करी या हत्या से जुड़ी खबरों को पूरी तरह भ्रामक बताया.
मथुरा पुलिस ने ‘एक्स’ पर लिखा- “आज प्रातः थाना कोसीकलां क्षेत्र के अंतर्गत घने कोहरे के कारण हुई एक सड़क दुर्घटना में चंद्रशेखर उर्फ फरसा बाबा की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु हो गई. जाँच में स्पष्ट हुआ है कि जिस कंटेनर को उन्होंने रोका था, उसमें किराने का सामान लदा था और पीछे से टक्कर मारने वाले ट्रक में तार जा रहे थे. अतः गौकशी या गोवंश तस्करी से संबंधित सोशल मीडिया पर चल रही खबरें पूर्णतः भ्रामक और असत्य हैं.”
चंद्रशेखर दास, जिन्हें ‘फरसा वाले बाबा’ कहा जाता था, खुद को गौ-रक्षक बताते थे और संदिग्ध वाहनों को रोककर जांच करते थे. अब कानून-व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ घटनाएं नहीं, बल्कि वो फेक नैरेटिव है जो हर रोज लोगों को डर के साये में जीने को मजबूर करता है.
कार्टून | राजेन्द्र धोड़पकर

ईरान ने ट्रंप के युद्धविराम प्रस्ताव को ठुकराया, इधर इज़राइल ने हमले तेज़ करने का दिया आदेश
ईरान ने बुधवार को सार्वजनिक रूप से राष्ट्रपति ट्रंप के युद्धविराम (सीज़फायर) के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी सैन्य प्रवक्ता और सरकारी मीडिया ने ज़ोर देकर कहा है कि यह युद्ध केवल तेहरान की शर्तों पर ही समाप्त होगा. हालांकि, निजी तौर पर ईरानी अधिकारी बातचीत के लिए खुले होने के संकेत दे रहे हैं, लेकिन इसी बीच इज़राइल ने अपने सैन्य अभियान को और तेज़ कर दिया है. इज़राइली अधिकारियों के मुताबिक, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के हथियार उद्योग को तबाह करने के लिए 48 घंटे के विशेष अभियान का आदेश दिया है. इज़राइल को डर है कि कहीं ट्रंप अपनी योजना के तहत युद्ध को उनके लक्ष्यों (बैलिस्टिक मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना) के पूरा होने से पहले ही न रुकवा दें.
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तान के माध्यम से ईरान तक पहुँचाए गए ट्रंप के 15-सूत्रीय शांति प्रस्ताव को ईरान के सरकारी चैनल ‘प्रेस टीवी’ ने एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से खारिज कर दिया. अधिकारी ने कहा कि तेहरान ट्रंप को युद्ध खत्म करने का समय तय नहीं करने देगा. इसके बजाय, ईरान ने अपनी शर्तें रखी हैं, जिनमें युद्ध के नुकसान का मुआवज़ा और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान की संप्रभुता को मान्यता देना शामिल है. उधर वाशिंगटन से भी मिले-जुले संकेत मिल रहे हैं. पेंटागन ने मध्य पूर्व में 2,000 और सैनिकों की तैनाती का आदेश दिया है, जिससे इस क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़कर लगभग 7,000 हो गई है. ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़ेर क़ाल़ीबाफ़ ने चेतावनी दी है कि वे अमेरिकी गतिविधियों पर नज़र रखे हुए हैं और उनकी ज़मीन की रक्षा के संकल्प को न आज़माया जाए.
बुधवार को कुवैत अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के ईंधन टैंक पर ड्रोन हमला हुआ, जिससे वहां भीषण आग लग गई. सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने भी पूर्वी प्रांत में 32 ड्रोन और एक बैलिस्टिक मिसाइल को मार गिराने का दावा किया है, जहां देश की प्रमुख तेल सुविधाएँ स्थित हैं. बहरीन में भी ईरानी हमलों में हताहतों की खबर है. इस बीच, ईरान ने संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखकर कहा है कि ‘गैर-शत्रु’ जहाज़ (जो अमेरिका या इज़राइल के नहीं हैं) हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से सुरक्षित गुज़र सकते हैं, लेकिन शिपिंग विशेषज्ञों का मानना है कि बीमा कंपनियों और ऑपरेटरों के लिए जोखिम अभी भी बहुत अधिक है.
फिलीपींस ने राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल घोषित कर दिया है, जबकि श्रीलंका ने बिजली बचाने के लिए स्ट्रीट लाइटें बंद करने का आदेश दिया है. मानवीय क्षति का आंकड़ा भी डरावना होता जा रहा है. ईरान के राजदूत के अनुसार, युद्ध शुरू होने से अब तक कम से कम 1,348 नागरिक मारे जा चुके हैं, जबकि लेबनान में यह संख्या 1,100 के पार पहुँच गई है. लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि इज़राइली हमलों में भारी तबाही हुई है. इराक में भी तनाव चरम पर है, जहाँ अमेरिकी हमलों में 7 सैनिकों की मौत के बाद इराकी सरकार ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है. अमेरिका अपनी ‘82वीं एयरबोर्न डिवीजन’ के करीब 3,000 जवानों को भेजने की तैयारी में है, जो युद्ध के और लंबा खिंचने का संकेत है.
टाकिंग न्यूज विद निधीश में आप यहां युद्ध के 26वें दिन का ब्यौरा देख सकते हैं. और साथ ही उन सारे कारणों को भी समझ सकते हैं, जिससे साफ लगता है कि ईरान जंग हारता हुआ नही दिख रहा.
इज़राइली राजनीति में भूचाल: युद्ध के बीच अपनी कुर्सी बचाने की जद्दोजहद में जुटे नेतन्याहू
रॉयटर्स की रिपोर्टर मायान लुबेल के अनुसार, इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू युद्ध के मैदान के साथ-साथ अपनी घरेलू राजनीति में भी एक बड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं. नेतन्याहू इस समय राज्य के बजट को पारित कराने और समय से पहले चुनावों को रोकने की कोशिश में जुटे हैं, क्योंकि ओपिनियन पोल (सर्वेक्षण) संकेत दे रहे हैं कि वे चुनाव हार सकते हैं. युद्ध के शुरुआती दिनों में लगा था कि ईरान के खिलाफ आक्रामक रुख से उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी, लेकिन सर्वेक्षणों में उनकी लिकुड पार्टी अभी भी बहुमत से काफी दूर नज़र आ रही है. इज़राइली कानून के अनुसार, यदि 31 मार्च तक बजट पारित नहीं होता है, तो 90 दिनों के भीतर चुनाव कराने होंगे.
युद्ध की भारी कीमत इज़राइल की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रही है. वित्त मंत्रालय के अनुमान के अनुसार, ईरान के साथ युद्ध की वजह से इज़राइल को हर हफ्ते लगभग 1.6 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है. इसके अलावा, नेतन्याहू को अपने गठबंधन के भीतर कट्टरपंथी यहूदी दलों को खुश रखने के लिए भारी भरकम फंड आवंटित करने पड़ रहे हैं, ताकि वे बजट के पक्ष में वोट दें. विपक्ष का आरोप है कि नेतन्याहू देश के संसाधनों के न्यायसंगत वितरण के बजाय अपनी सरकार बचाने को प्राथमिकता दे रहे हैं. इसके साथ ही, नेतन्याहू पर चल रहा भ्रष्टाचार का मुकदमा भी उनकी मुश्किलें बढ़ा रहा है. वे राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग से माफ़ी (पार्डन) की अपील कर रहे हैं, जिसका इज़राइल की न्याय प्रणाली विरोध कर रही है.
ट्रांसजेंडर विधेयक के खिलाफ राष्ट्रीय परिषद की सदस्य कल्कि सुब्रमण्यम और ऋतुपर्णा नियोग का इस्तीफा
‘टीएनआईई’ के मुताबिक, राज्यसभा में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 के पारित होने के विरोध में राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद (एनसीटीपी) के दो सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया है. उनका कहना है कि यह कानून आत्म-पहचान और गरिमा के मौलिक अधिकारों को कमजोर करता है.
परिषद की दक्षिण क्षेत्र की प्रतिनिधि कल्कि सुब्रमण्यम और पूर्वोत्तर क्षेत्र की प्रतिनिधि ऋतुपर्णा नियोग ने केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री को अपना इस्तीफा सौंपा. उन्होंने इस्तीफे के पीछे समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ परामर्श की कमी और विधेयक की “बहिष्कारी प्रकृति” का हवाला दिया.
अपने इस्तीफे पत्र में कल्कि ने लिखा कि वह “ऐसी मेज पर सीट बरकरार नहीं रख सकतीं, जहां अस्तित्व से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मामले पर हमारी सामूहिक आवाज को खामोश कर दिया गया हो.” उन्होंने कहा कि उन्होंने दक्षिण भारत और पूरे देश में ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स समुदायों के साथ व्यापक संवाद किया था, जिसमें भारी आम सहमति पाई गई कि यह विधेयक प्रतिगामी है.
ऋतुपर्णा नियोग ने भी इसी तरह की चिंताएँ व्यक्त करते हुए कहा, “एक वैधानिक प्रतिनिधि के रूप में, मेरा प्राथमिक कर्तव्य सरकार को हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले कानूनों पर सलाह देना है. बिना किसी औपचारिक परामर्श के इस विधेयक को आगे बढ़ाने का निर्णय उस मूल उद्देश्य को ही कमजोर करता है जिसके लिए इस परिषद की स्थापना की गई थी.”
ट्रांसजेंडर बिल पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पैनल को आपत्ति, केंद्र से वापस लेने के लिए कहा
द हिन्दू के अनुसार, बुधवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पैनल ने केंद्र से ट्रांसजेंडर बिल वापस लेने को कहा, जो लैंगिक स्व-निर्धारण के अधिकार को हटाता है. समिति ने 2019 के कानून में किसी भी आगे के संशोधन से पहले व्यापक सामुदायिक परामर्श की भी मांग की है.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक सलाहकार समिति, जिसकी अध्यक्षता पूर्व दिल्ली हाई कोर्ट न्यायाधीश आशा मेनन कर रही हैं, ने भारत सरकार को एक प्रस्ताव भेजकर अनुरोध किया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को वापस लिया जाए, क्योंकि यह लैंगिक “स्व-पहचान” के अधिकार को नकारने का प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले के खिलाफ है.
जस्टिस मेनन ने सामाजिक न्याय मंत्री वीरेंद्र कुमार को पत्र लिखकर पैनल के सदस्यों द्वारा पारित प्रस्ताव की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि यह संशोधन विधेयक “बहुत बड़ा झटका” है और अब तक ट्रांसजेंडर समुदाय को मुख्यधारा में लाने के प्रयासों के लिए “गंभीर पीछे हटना” साबित होगा.
यह विधेयक, जिसे सामाजिक न्याय मंत्री वीरेंद्र कुमार ने 13 मार्च को पेश किया था, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के “स्व-निर्धारित लैंगिक पहचान” के अधिकार को मान्यता देने वाले प्रावधान को हटाने, ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा को बदलने और ट्रांसजेंडर प्रमाणपत्र तथा पहचान पत्र प्राप्त करने के लिए मेडिकल बोर्ड की मंजूरी अनिवार्य करने का प्रस्ताव है. यह विधेयक मंगलवार (24 मार्च, 2026) को लोकसभा में ध्वनि मत से पारित हो गया था, हालांकि विपक्ष ने इसके विरोध में वॉकआउट भी किया था.
ज़ुबीन गर्ग के आख़िरी पल: ‘थके हुए थे, लाइफ़ जैकेट पहनने से किया था मना’ - सिंगापुर की अदालत में गवाहों के बयान
असमिया सुपरस्टार ज़ुबीन गर्ग की मौत के मामले में सिंगापुर की एक अदालत में चल रही कार्यवाही के दौरान उनके अंतिम क्षणों की दर्दनाक और विस्तृत जानकारी सामने आई है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस कोस्ट गार्ड के असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट डेविड लिम ने अदालत के सामने गवाही दी है कि ज़ुबीन ने नाव (यॉट) से पानी में कूदने से पहले शराब पी थी और लाइफ़ जैकेट पहनने से साफ़ इनकार कर दिया था. गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए पुलिस अधिकारी ने अदालत को बताया कि ज़ुबीन के व्यवहार में आत्महत्या जैसी कोई प्रवृत्ति नहीं देखी गई थी, और न ही मौत से पहले उन पर किसी तरह का दबाव डाला गया था या उनके साथ कोई ज़बरदस्ती की गई थी.
अदालत में हुई इस सुनवाई के दौरान यॉट के कप्तान के सहायक ने भी गवाही दी. उन्होंने बताया कि ज़ुबीन को किसी ने भी शराब पीने या पानी में उतरने के लिए मजबूर नहीं किया था. उन्होंने यह भी साफ़ किया कि यॉट पर मौजूद सभी लोगों को पहले ही ब्रीफ़िंग दी गई थी कि तैरने से पहले लाइफ़ जैकेट पहनना ज़रूरी है. ज़ुबीन उस समय ‘नॉर्थ ईस्ट इंडिया फ़ेस्टिवल’ के लिए सांस्कृतिक ब्रांड एंबेसडर के रूप में सिंगापुर गए हुए थे. उत्सव शुरू होने से पहले वे ‘असम एसोसिएशन सिंगापुर’ के सदस्यों द्वारा आयोजित एक यॉट ट्रिप पर गए थे, जहाँ तैरते समय वे बेहोश हो गए. उन्हें सिंगापुर जनरल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. सिंगापुर के अधिकारियों द्वारा जारी डेथ सर्टिफ़िकेट में मौत की वज़ह ‘डूबना’ बताई गई है.
सिंगापुर के कोरोनर (मौत की जाँच करने वाला अधिकारी) ने अपनी टिप्पणियों में बेहद महत्वपूर्ण तथ्य रखे हैं. ‘द स्ट्रेट्स टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, कोरोनर ने गौर किया कि अपनी आख़िरी बार की तैराकी से पहले ज़ुबीन काफ़ी थके हुए लग रहे थे. रिपोर्ट में बताया गया कि ज़ुबीन पहले लाइफ़ जैकेट पहनकर ही पानी में कूदे थे, लेकिन पानी के भीतर उन्होंने उसे उतार दिया क्योंकि वह उन्हें बहुत बड़ी लग रही थी. जब वे वापस यॉट पर आए, तो वे काफ़ी थके हुए दिख रहे थे. कोरोनर ने कहा कि यह साफ़ था कि ज़ुबीन उस छोटी सी तैराकी से ही बुरी तरह थक चुके थे, क्योंकि वे ख़ुद नाव पर नहीं चढ़ पा रहे थे और उन्हें मदद की ज़रूरत पड़ी थी.
इसके बावजूद, ज़ुबीन ने एक दूसरे व्यक्ति के साथ दोबारा पानी में जाने का फ़ैसला किया. इस बार जब उन्हें एक छोटी और सही नाप की लाइफ़ जैकेट देने की कोशिश की गई और उन्हें मनाने का प्रयास किया गया, तब भी उन्होंने उसे पहनने से मना कर दिया. कोरोनर के अनुसार, ज़ुबीन अपनी बात पर अड़े रहे और उन्होंने लाइफ़ जैकेट पहनने या किसी और को पहनाने की अनुमति नहीं दी. वीडियो सबूतों की समीक्षा करने के बाद कोरोनर ने बताया कि ज़ुबीन के तैरने का तरीक़ा किसी थके हुए व्यक्ति की तरह था, जिसे ‘डॉगी पैडलिंग’ जैसा कहा जा सकता है. यह साफ़ तौर पर थकान का संकेत था.
कोरोनर ने आगे बताया कि जब ज़ुबीन वापस नाव की तरफ़ मुड़े, तो उनकी रफ़्तार और धीमी हो गई और संभवतः वे पानी में ही बेहोश हो गए. उन्हें डूबता देख साथ में तैर रहे लोग तुरंत उनकी मदद के लिए पहुँचे और अपनी पूरी क्षमता से उन्हें बचाने की कोशिश की. कोरोनर ने यह भी साफ़ किया कि ज़ुबीन को फ़र्स्ट एड देने या उन्हें मुख्य भूमि (मेन लैंड) और फिर अस्पताल पहुँचाने में कोई देरी नहीं की गई थी.
दूसरी तरफ़, भारत में असम पुलिस ने इस मामले में एक अलग रुख़ अपनाया है. असम पुलिस ने चार लोगों के ख़िलाफ़ हत्या का मामला दर्ज किया है और दावा किया है कि ज़ुबीन को जानबूझकर ज़्यादा शराब पिलाई गई और फिर उन्हें तैरने के लिए उकसाया गया. यह मामला वर्तमान में गुवाहाटी की एक सत्र अदालत में चल रहा है. इस मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष फ़ास्ट-ट्रैक अदालत की घोषणा की गई है, जो रोज़ाना आधार पर इस मुक़दमे की सुनवाई करेगी. यह मामला अब दो अलग-अलग देशों की जाँच और उनके दावों के बीच उलझ गया है, जहाँ सिंगापुर की जाँच इसे एक दुखद दुर्घटना बता रही है, वहीं असम पुलिस इसमें साज़िश की बात कह रही है.
अपील :
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