26/02/2026: मोदी को मेडल, पर भारत की साख? | अदालतों में भ्रष्टाचार है ही नहीं | हिमंता को नोटिस | सीजी में हिरासत में 66 मौतें | नेता ने कंबल छीने, लोगों ने संबल दिया | कार्टूनों पर कर्फ्यू?
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
मोदी इन इज़राइल: ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ का ऐलान, लेकिन चुनावी टाइमिंग पर उठे गंभीर सवाल.
एनसीईआरटी बैन: कक्षा 8 की किताब में न्यायपालिका भ्रष्टाचार के ज़िक्र पर पीएम मोदी खफा, एससी की रोक.
असम राजनीति: सीएम हिमंता को हेट स्पीच और ‘मिया’ टिप्पणी पर हाई कोर्ट का नोटिस.
युद्ध तकनीक: स्टारलिंक बंद होने से रूसी सेना का कम्युनिकेशन ठप, कबूतरों की याद आई.
अमेरिका-ईरान: ट्रम्प के सलाहकार चाहते हैं कि इज़राइल पहले ईरान पर हमला करे ताकि अमेरिका को बहाना मिले.
सामाजिक आघात: राजस्थान में पूर्व सांसद ने वापस लिए कंबल, तेलंगाना में मंदिर विवाद में बच्ची की जान गई.
सेहत: अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फ़ूड से युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और सोचने की क्षमता पर बुरा असर.
‘मोदी के इज़राइल दौरे ने भारत को शर्मिंदा किया’
‘द वायर’ में प्रकाशित और ‘हारेत्ज़’ के लिए मानवाधिकार वकील ईते मैक द्वारा लिखे गए एक लेख में यह तर्क दिया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इज़राइल यात्रा के दौरान खुद को और भारत को अपमानित किया है. लेखक का कहना है कि मोदी ने एक वैश्विक शक्ति के नेता की तरह नहीं, बल्कि एक छोटे देश के नेता की तरह व्यवहार किया जो एहसान पाने के लिए बेताब था.
लेख के अनुसार, मोदी की यात्रा का समय संदिग्ध था क्योंकि यह चुनावों से ठीक पहले हुई और ऐसे समय में जब दुनिया के नेता नेतन्याहू से दूरी बना रहे हैं. नेतन्याहू ने मोदी का इस्तेमाल अपने चुनाव प्रचार के लिए एक ‘प्रॉप’ की तरह किया. नेतन्याहू के कार्यालय ने इसे एक आधिकारिक राजकीय यात्रा के बजाय ‘निजी यात्रा’ के रूप में पेश किया.लेखक बताते हैं कि मोदी को दिया गया “नेसेट मेडल” पूरी तरह से मनगढ़ंत था, क्योंकि ऐसा कोई सम्मान इज़राइली कानून में मौजूद ही नहीं है. मोदी ने एक ऐसी संसद (नेसेट) को संबोधित किया जो अब केवल नेतन्याहू की कठपुतली बनकर रह गई है. लेखक का निष्कर्ष है कि मोदी शायद राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ अपने तनावपूर्ण संबंधों को सुधारने के लिए नेतन्याहू की मदद मांगने वहां गए थे, लेकिन इस प्रक्रिया में उन्होंने भारत की गरिमा को कम किया.
‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ का ऐलान; पीएम मोदी ने गाज़ा शांति पहल का समर्थन किया
हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुवार (26 फरवरी, 2026) को भारत और इज़राइल ने अपने पुराने और परखे हुए संबंधों को ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर पर पहुँचा दिया है. दोनों देशों ने जल्द ही एक ‘परस्पर लाभकारी’ मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने पर भी सहमति जताई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दौरान गाज़ा शांति पहल का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि मानवता को कभी भी संघर्ष का शिकार नहीं बनना चाहिए.
पीएम मोदी और उनके इज़राइली समकक्ष बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हुई बातचीत के बाद, दोनों पक्षों ने व्यापार, कृषि, ऊर्जा, साइबर स्पेस और डिजिटल भुगतान जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए. भारत और इज़राइल ने प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के ढांचे के तहत सैन्य हार्डवेयर के संयुक्त विकास और संयुक्त उत्पादन की दिशा में काम करके अपनी रक्षा साझेदारी को और गहरा करने का संकल्प लिया.
मीडिया को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि भारत के सुरक्षा हित पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता से जुड़े हैं. उन्होंने कहा, “भारत का रुख स्पष्ट है: मानवता को कभी भी संघर्ष का शिकार नहीं बनना चाहिए. गाज़ा शांति योजना के माध्यम से शांति का एक रास्ता बनाया गया है. भारत ने इन प्रयासों का पूर्ण समर्थन किया है.” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में भी भारत सभी देशों के साथ बातचीत और सहयोग जारी रखेगा.
पीएम मोदी बुधवार को दो दिवसीय यात्रा पर इज़राइल पहुंचे थे, जो नौ वर्षों में उनकी दूसरी यात्रा है. आतंकवाद के मुद्दे पर पीएम ने कहा कि भारत और इज़राइल का एक ही मत है कि दुनिया में आतंकवाद के लिए कोई जगह नहीं है. उन्होंने कहा, “हमारा रिश्ता गहरे विश्वास, साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं की मजबूत नींव पर टिका है.”
इस मौके पर पीएम मोदी ने ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’, क्वांटम और क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्रों में सहयोग को नई गति देने के लिए एक भारत-इज़राइल महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी साझेदारी की स्थापना की भी घोषणा की. उन्होंने खुशी जताई कि इज़राइल में यूपीआई के उपयोग के लिए एक समझौता हो गया है. इसके अलावा, दोनों देशों ने ‘इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (आईएमईसी) और I2U2 (भारत-इज़राइल-यूएई-यूएसए) के ढांचे के तहत सहयोग पर भी चर्चा की.
इज़राइल यात्रा पर घिरती सरकार: गाज़ा संकट, व्यापार और विदेश नीति पर बड़े सवाल
‘टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इज़राइल यात्रा और वहां के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ उनकी मुलाकात पर विस्तृत चर्चा की गई. कार्यक्रम में बताया गया कि इज़राइल की संसद में नेतन्याहू ने मोदी को “भाई” कहकर संबोधित किया और उन्हें एक फिटनेस टेस्ट मेडल भी प्रदान किया. अपने भाषण में उन्होंने भारत और इज़राइल की दोस्ती को बेहद खास बताया और कहा कि दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ एक मज़बूत दीवार की तरह खड़े हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में भारत में बसे यहूदियों को लेकर “मातृभूमि” और “पितृभूमि” की बात कही. इस बयान को लेकर भारत में विपक्षी दलों ने आलोचना की और इसे लेकर राजनीतिक बहस शुरू हो गई. कार्यक्रम में इस बात पर चिंता जताई गई कि ऐसे संवेदनशील समय में इस तरह की शब्दावली और प्रतीकात्मकता क्या संदेश देती है.
कार्यक्रम में गाज़ा युद्ध की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए. चर्चा के दौरान बताया गया कि गाज़ा में अब तक 75,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. इनमें 25,000 से ज़्यादा बच्चे शामिल बताए गए, जिनमें 1,054 बच्चे एक साल से कम उम्र के थे. करीब 249 पत्रकारों के मारे जाने और कई डॉक्टरों तथा हेल्थ केयर वर्कर्स की मौत का भी उल्लेख किया गया.
यह भी रेखांकित किया गया कि संयुक्त राष्ट्र में युद्धविराम प्रस्तावों पर भारत ने कई मौकों पर मतदान नहीं किया. इसे लेकर विदेश नीति के रुख पर सवाल उठाए गए और पूछा गया कि क्या भारत को अधिक संतुलित और तटस्थ भूमिका अपनानी चाहिए थी.
आर्थिक पहलुओं पर चर्चा करते हुए बताया गया कि मध्यपूर्व में लगभग 90 लाख भारतीय काम करते हैं, जबकि इज़राइल में करीब 32,000 भारतीय हैं. व्यापार के आंकड़ों के अनुसार मध्यपूर्व के साथ भारत का व्यापार लगभग 108.59 बिलियन डॉलर है, जबकि इज़राइल के साथ यह करीब 7.5 बिलियन डॉलर के आसपास बताया गया. इन आंकड़ों के आधार पर कार्यक्रम में यह सवाल उठाया गया कि भारत के दीर्घकालिक हित किस क्षेत्र से अधिक जुड़े हुए हैं.
चर्चा में उद्योगपति गौतम अडानी के इज़राइल में निवेश, विशेष रूप से हाइफा पोर्ट और रक्षा क्षेत्र में भागीदारी का जिक्र किया गया. अमेरिका के साथ ट्रेड डील, टैरिफ दरों और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के बयानों को भी संदर्भित किया गया. रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव और वेनेजुएला से तेल आयात की नई पहल को भी व्यापक भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में जोड़ा गया. कार्यक्रम में यह चिंता व्यक्त की गई कि गाज़ा में जारी हिंसा और भारी जनहानि के बीच भारत का सार्वजनिक रूप से इज़राइल के साथ खड़ा होना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किस तरह देखा जाएगा.
हेट स्पीच के लिए हिमंता को नोटिस
हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, गुवाहाटी हाई कोर्ट ने गुरुवार (26 फरवरी, 2026) को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को कथित हेट स्पीच (नफरत भरे भाषण) के मामले में नोटिस जारी किया है. मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने यह कार्रवाई उन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की, जिनमें मुसलमानों को निशाना बनाने वाले बयानों के लिए सीएम के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी. सीएम सरमा अक्सर मुसलमानों को ‘मिया’ समुदाय कहकर संबोधित करते हैं.
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ‘मिया’ असम में बंगाली भाषी या बंगाली मूल के मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक अपमानजनक शब्द है. मुख्यमंत्री ने रिकॉर्ड पर कहा है कि इस शब्द का अर्थ “अवैध प्रवासी” है. याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस पार्टी, असमिया विद्वान हिरेन गोहेन और सीपीआई (एम) शामिल हैं.
अदालत में वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी, चंदर उदय सिंह और मीनाक्षी अरोड़ा ने तर्क दिया कि सरमा ने असम में मुसलमानों के खिलाफ उकसाने वाले और धमकी भरे बयान दिए हैं. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा किए गए एक वीडियो (जो अब हटा दिया गया है) का हवाला दिया, जिसमें मुख्यमंत्री को प्रतीकात्मक रूप से टोपी पहनने वाले लोगों पर गोली चलाते हुए दिखाया गया था. वकीलों ने कोर्ट को मतदाताओं की सूची में हेरफेर करने की कथित योजनाओं, वोटिंग अधिकारों को सीमित करने की धमकी और समुदाय के आर्थिक बहिष्कार के आह्वान के बारे में भी बताया.
अधिवक्ता सिंघवी ने तर्क दिया कि सरमा के बार-बार दिए गए बयान “उकसावे की आदतन प्रवृत्ति” को दर्शाते हैं और राज्य के प्रमुख के रूप में उनके कर्तव्यों के अनुरूप नहीं हैं. मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि मुख्यमंत्री ने छात्रों को अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा स्थापित संस्थानों में न जाने के लिए हतोत्साहित किया था. वकीलों ने कहा कि ऐसी टिप्पणियां संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं और कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं.
अदालत ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उद्धृत बयान “विभाजनकारी प्रवृत्ति” दिखाते प्रतीत होते हैं, लेकिन कहा कि वह निष्कर्ष निकालने से पहले सभी पक्षों की दलीलों की जांच करेगी. अगली सुनवाई 21 अप्रैल को तय की गई है.
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, किताब से हटाया जाएगा
एनसीईआरटी की कक्षा 8 की नई किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े अध्याय को लेकर विवाद गहरा गया है. इस मामले में अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सख्त रुख अपनाया है, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी कड़े कदम उठाए हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पीएम मोदी ने कैबिनेट बैठक में साफ तौर पर कहा कि इस मामले में किसी न किसी की जवाबदेही तय की जानी चाहिए.
पीएम मोदी ने ‘सेवा तीर्थ’ (नवनिर्मित पीएमओ) में आयोजित कैबिनेट बैठक के दौरान यह मुद्दा उठाया. सरकारी सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री इस पूरे प्रकरण से बेहद नाखुश और नाराज थे. उन्होंने सवाल किया कि कक्षा 8 के छात्रों को ऐसी चीजें क्यों पढ़ाई जा रही हैं और पाठ्यपुस्तकों की सामग्री की निगरानी कौन कर रहा है? शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने समझाने की कोशिश की, लेकिन पीएम मोदी इस बात पर अड़े रहे कि जो हुआ है, उसके लिए किसी को जिम्मेदार ठहराया जाना जरूरी है.
दूसरी तरफ, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने गुरुवार को झारखंड में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि वे इस घटना से “बेहद दुखी” हैं. उन्होंने कहा, “हम न्यायपालिका का सर्वोच्च सम्मान करते हैं. जैसे ही यह मामला मेरे संज्ञान में आया, मैंने तुरंत एनसीईआरटी को किताब वापस लेने का निर्देश दिया ताकि यह आगे वितरित न हो सके.” प्रधान ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार या विभाग का न्यायपालिका का अनादर करने का कोई इरादा नहीं था और इस अध्याय को तैयार करने में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए गुरुवार को किताब के प्रकाशन और वितरण पर पूरी तरह रोक लगा दी. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने इसे “न्यायपालिका की गरिमा को कम करने और उसे अपमानित करने का सोचा-समझा कदम” बताया. कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह “न्यायपालिका पर चलाई गई गोली” जैसा है जिससे संस्था लहूलुहान हो रही है. कोर्ट ने एनसीईआरटी के निदेशक और स्कूल शिक्षा सचिव को अवमानना नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.
यह विवाद तब शुरू हुआ जब 25 फरवरी को इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया कि कक्षा 8 की समाज विज्ञान की नई किताब ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ में “न्यायपालिका की भूमिका” वाले अध्याय में एक हिस्सा “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” पर है. इसमें न्यायिक प्रणाली की चुनौतियों के रूप में भ्रष्टाचार और मुकदमों के भारी बैकलॉग का जिक्र किया गया था.
भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि भारतीय न्यायपालिका जैसी स्वतंत्र और सम्मानजनक संस्था पूरी दुनिया में दूसरी नहीं है और पार्टी उसका पूरा सम्मान करती है.
पूर्व भाजपा सांसद ने मुस्लिम महिलाओं से वापस लिए कंबल, तो हिंदुओं ने दिखाया भाईचारा
राजस्थान के टोंक जिले के एक गांव में पूर्व भाजपा सांसद सुखबीर सिंह जौनपुरिया द्वारा मुस्लिम महिलाओं से बांटे गए कंबल वापस लेने की घटना ने तूल पकड़ लिया है. लेकिन इस कड़वाहट के बीच गांव के हिंदू पड़ोसियों ने सांप्रदायिक सौहार्द की एक शानदार मिसाल पेश की है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टर हम्जा खान की रिपोर्ट के मुताबिक, टोंक के करेड़ा बुजुर्ग गांव के हिंदू निवासियों ने जौनपुरिया की इस हरकत की कड़ी निंदा की है और पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में खड़े हो गए हैं.
सोमवार को वायरल हुए एक वीडियो में जौनपुरिया को एक बुजुर्ग महिला, शकूरन बानो, को वहां से जाने के लिए कहते हुए देखा गया. शकूरन बानो ने बताया, “जैसे ही उन्होंने कंबल छीने, मैं तुरंत वहां से उठ गई. मुझे बहुत बुरा लगा. कोई जरूरी नहीं था कि हमें कंबल ही दिलवाना है, हम तो बुलाने पर गए थे.” शकूरन बताती हैं कि रमजान का रोजा होने के बावजूद वह अन्य महिलाओं के साथ वहां गई थीं.
इस घटना के बाद गांव में भारी आक्रोश है. सरपंच बीना देवी चौधरी के पति हनुमान चौधरी बताते हैं, “मुसलमानों से ज्यादा गुस्सा हिंदुओं में है. हमारे गांव में दीवाली, होली या ईद, हम सब साथ मनाते हैं. जौनपुरिया ने यहां का भाईचारा खराब करने की कोशिश की है.” ग्रामीणों ने विरोध स्वरूप अगले ही दिन जौनपुरिया का पुतला भी फूंका.
घटना के समय मौके पर मौजूद कुछ लोगों ने जौनपुरिया को टोकते हुए कहा था, “आप कंबल वापस ले रहे हैं... लोकतंत्र में सब बराबर हैं.” इस पर जौनपुरिया ने जवाब दिया, “क्या ये सरकारी कंबल हैं?”
पीड़ित शकूरन के बेटे हनीफ, जो लोहार का काम करते हैं, कहते हैं, “इज्जत तो खराब हो गई. उन्हें हमें इस तरह अपमानित नहीं करना चाहिए था.” लेकिन उन्हें इस बात का सुकून है कि पूरा गांव, विशेषकर उनके हिंदू पड़ोसी, उनके साथ खड़े हैं. पड़ोसियों ने शकूरन से कहा कि गांव की एक बुजुर्ग के साथ ऐसा होना गलत है.
वहीं, अपनी सफाई में जौनपुरिया ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि यह उनका निजी कार्यक्रम था और उन्होंने अपनी पार्टी की करीब 200 महिला कार्यकर्ताओं की सूची बनाई थी. उन्होंने दावा किया कि उन्हें संदेह (वहम) हुआ कि ‘गलत लोग’ आ गए हैं, इसलिए उन्होंने नाम पूछे. उन्होंने तर्क दिया कि अगर वे इन महिलाओं को कंबल दे देते तो उनकी पार्टी के कार्यकर्ता नाराज हो जाते. जौनपुरिया ने यह भी दावा किया कि वे टोंक में एक रसोई चलाते हैं जहां हिंदू-मुस्लिम सभी खाना खाते हैं और वे भेदभाव नहीं करते.
गौरतलब है कि जौनपुरिया 2020 में कोरोना काल के दौरान भी सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने मिट्टी में नहाते हुए और शंख बजाते हुए वीडियो जारी कर दावा किया था कि इससे कोविड नहीं होगा, हालांकि बाद में वे खुद पॉजिटिव पाए गए थे. फिलहाल, इस घटना के बाद शकूरन को कांग्रेस अल्पसंख्यक सेल और अन्य नेताओं की तरफ से कंबल भिजवाए गए हैं, जिन्हें उन्होंने संदूक में रख दिया है क्योंकि अब सर्दियां जा रही हैं.
शर्टलेस प्रोटेस्ट विवाद:
हिमाचल पुलिस ने दिल्ली पुलिस की टीम को हिरासत में लिया, अपहरण का आरोप
‘द वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश पुलिस और दिल्ली पुलिस के बीच एक बड़ा टकराव देखने को मिला है. हिमाचल पुलिस ने आरोप लगाया है कि दिल्ली पुलिस की एक टीम ने शिमला जिले से तीन व्यक्तियों का अपहरण किया. यह मामला दिल्ली में ‘एआई इम्पैक्ट समिट’ के दौरान इंडियन यूथ कांग्रेस द्वारा आयोजित ‘शर्टलेस प्रोटेस्ट’ (बिना शर्ट के प्रदर्शन) से जुड़ा है.
बुधवार (25 फरवरी) की देर रात, चंडीगढ़-शिमला राजमार्ग पर शोघी पुलिस चौकी पर हिमाचल पुलिस ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के करीब 15 कर्मियों को रोक लिया और उन्हें हिरासत में ले लिया. हिमाचल पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि दिल्ली पुलिस की टीम ने अदालत की अनुमति और स्थानीय पुलिस को सूचित किए बिना आरोपियों को हिरासत में लिया और उन्हें दिल्ली ले जाने की कोशिश की.
दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनकी टीम ने संदिग्धों को हिरासत में लिया था और ट्रांजिट रिमांड हासिल करने के लिए उन्हें शिमला की एक स्थानीय अदालत में पेश करने की कोशिश की थी. लेकिन अदालत का स्टाफ उपलब्ध न होने के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी. दिल्ली पुलिस का आरोप है कि स्थानीय पुलिस ने उनके अधिकारियों को घंटों तक बंधक बनाए रखा.
दूसरी ओर, हिमाचल पुलिस का कहना है कि दिल्ली की टीम को अदालत परिसर न छोड़ने के लिए कहा गया था, फिर भी वे शाम 7:30 बजे वहां से निकल गए. इसके बाद उन्हें शोघी बैरियर पर रोका गया. शिमला पुलिस ने एक बयान जारी कर कहा कि चिरगांव पुलिस स्टेशन में अपहरण की एक एफआईआर दर्ज की गई है. आरोप है कि सादे कपड़ों में आए 15-20 लोगों ने एक रिसॉर्ट से तीन मेहमानों को जबरन उठाया, उनकी कार और सीसीटीवी की डीवीआर भी बिना किसी रसीद के ले गए.
दिल्ली पुलिस के एसीपी विक्रम ने बताया, “मुझे नहीं पता कि हिमाचल पुलिस ने हमें किस हैसियत से हिरासत में लिया. तीन संदिग्धों में से दो सीधे तौर पर शर्टलेस विरोध में शामिल थे, जबकि एक साजिश में शामिल था.” इससे पहले दिल्ली पुलिस ने भारत मंडपम में विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में आईवाईसी अध्यक्ष उदय भानु चिब सहित आठ लोगों को गिरफ्तार किया था.
पुणे से कोलकाता तक: राजनीतिक कार्टूनिस्टों का आरोप, ऑनलाइन रीच कम की जा रही है
न्यूज़लॉन्ड्री के प्रतीक गोयल की रिपोर्ट के अनुसार, भारत भर के राजनीतिक कार्टूनिस्टों का कहना है कि अस्पष्ट कानूनी अनुरोधों का हवाला देकर सोशल मीडिया पर उनके काम को प्रतिबंधित किया जा रहा है. पिछले कुछ महीनों में, कम से कम तीन कार्टूनिस्टों और एक प्रकाशन को ‘हरियाणा पुलिस’ या केंद्रीय अधिकारियों के अनुरोध पर प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है, लेकिन यह नहीं बताया गया कि किस विशिष्ट कानून का उल्लंघन हुआ है.
पुणे के कार्टूनिस्ट गौरव सर्जेराव का इंस्टाग्राम अकाउंट, जिस पर उन्होंने पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रम्प का एक व्यंग्यात्मक कार्टून पोस्ट किया था, भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया. उन्हें बताया गया कि यह कार्रवाई “हरियाणा कानून प्रवर्तन” की शिकायत पर की गई है. सर्जेराव का कहना है, “मेरे कार्टून में कोई नफरत या अश्लीलता नहीं थी, यह सिर्फ व्यंग्य था.”
इसी तरह, कोलकाता के दो चित्रकारों (बॉब और बॉबी) की सात रील्स को भी भारत में ब्लॉक कर दिया गया. वरिष्ठ कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य ने भी बताया कि सरकार की आलोचना करने वाले कार्टूनों की रीच कम कर दी जाती है. आईटी अधिनियम की धारा 69A के तहत सरकार को ऑनलाइन सामग्री ब्लॉक करने का अधिकार है, लेकिन इन मामलों में पारदर्शिता की भारी कमी देखी गई है.
मस्क द्वारा स्टारलिंक बंद करने के बाद रूसी सेना का संपर्क टूटा: ‘अब सिर्फ कबूतर बचे हैं’
पोलिटिको की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्पेसएक्स द्वारा रूसी सेना के लिए स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट टर्मिनलों को बंद करने के फैसले ने यूक्रेन में रूसी मोर्चे पर भारी अफरातफरी मचा दी है. यूक्रेनी टोही इकाई द्वारा इंटरसेप्ट किए गए रेडियो संदेशों से पता चला है कि रूसी सैनिक अपनी कमान के साथ समन्वय करने में असमर्थ हो गए हैं.
एक रूसी सैनिक को यह कहते हुए सुना गया, “अब हमारे पास केवल रेडियो, केबल और कबूतर बचे हैं.” रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेसएक्स ने 4 फरवरी से स्टारलिंक टर्मिनलों के सत्यापन की आवश्यकता शुरू की थी, जिससे असत्यापित रूसी इकाइयों का एक्सेस ब्लॉक हो गया. इसका असर यह हुआ कि रूसी तोपखाने और ड्रोन हमलों में भारी कमी आई.
यूक्रेनी ‘बुरेवी ब्रिगेड’ के एक ड्रोन ऑपरेटर, जिसका कॉल साइन ‘मस्टैंग’ है, ने बताया, “जिस दिन स्टारलिंक बंद हुआ, रूसी पक्ष की ओर से तोपखाने और मोर्टार फायर में भारी गिरावट देखी गई. उनके लिए अपनी इकाइयों के बीच समन्वय करना मुश्किल हो गया है.” इस संचार व्यवधान का फायदा उठाते हुए यूक्रेनी सेना ने दक्षिण-पूर्व में लगभग 77 वर्ग मील क्षेत्र पर फिर से कब्जा कर लिया है.
ट्रम्प के सलाहकार चाहते हैं कि अमेरिका से पहले इज़राइल ईरान पर हमला करे
पोलिटिको के लिए दशा बर्न्स और नहल टूसी की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के वरिष्ठ सलाहकार निजी तौर पर यह तर्क दे रहे हैं कि अमेरिका द्वारा ईरान पर हमला करने से पहले इज़राइल को ईरान पर हमला करना चाहिए. सलाहकारों का मानना है कि यदि इज़राइल पहले हमला करता है और ईरान जवाबी कार्रवाई करता है, तो इससे अमेरिकी मतदाताओं के बीच युद्ध के लिए समर्थन जुटाना आसान होगा.
सूत्रों के मुताबिक, यह एक राजनीतिक गणित है. अमेरिकी जनता, विशेषकर रिपब्लिकन, ईरान में सत्ता परिवर्तन तो चाहते हैं लेकिन इसके लिए अमेरिकी जान का जोखिम नहीं उठाना चाहते. अगर अमेरिका या उसके सहयोगी पर पहले हमला होता है, तो युद्ध को सही ठहराना आसान होगा. व्हाइट हाउस में चर्चा है कि “हम उन पर बमबारी करने जा रहे हैं.”
हालांकि, अंतिम परिदृश्य संयुक्त अमेरिका-इज़राइल ऑपरेशन का हो सकता है. सैन्य विकल्पों में ईरान के परमाणु स्थलों, बैलिस्टिक मिसाइल बुनियादी ढांचे और यहां तक कि ईरानी सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को निशाना बनाने वाला “डिकैपिटेशन स्ट्राइक” (शीर्ष नेतृत्व को खत्म करना) भी शामिल है. ट्रम्प प्रशासन ने क्षेत्र में अपनी मारक क्षमता बढ़ाते हुए दो विमानवाहक पोत और दर्जनों लड़ाकू विमान तैनात किए हैं.
एपस्टीन के साथ संबंध: वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अध्यक्ष बोर्गे ब्रेंडे का भी इस्तीफा
‘रॉयटर्स’ के अनुसार, विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम) के अध्यक्ष और सीईओ बोर्गे ब्रेंडे ने गुरुवार को अपने पद से हटने की घोषणा की. यह फैसला उन खुलासों के कुछ हफ्तों बाद आया है, जब फोरम ने यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन के साथ उनके संबंधों की एक स्वतंत्र जांच शुरू की थी.
ब्रेंडे, जो 2017 में फोरम के अध्यक्ष बने थे, ने अमेरिकी न्याय विभाग के उन खुलासों के बाद एक बयान में अपने निर्णय की घोषणा की, जिनसे पता चला था कि उन्होंने एपस्टीन के साथ तीन ‘बिजनेस डिनर’ किए थे और ईमेल तथा टेक्स्ट मैसेज के माध्यम से भी उस बदनाम फाइनेंसर के साथ संपर्क में थे.”
उन्होंने कहा कि गहन विचार-विमर्श के बाद, मैंने विश्व आर्थिक मंच के अध्यक्ष और सीईओ के पद से हटने का निर्णय लिया है. यहां मेरा साढ़े आठ साल का कार्यकाल बेहद सुखद और फलदायी रहा है. लेकिन नॉर्वे के पूर्व विदेश मंत्री ब्रेंडे ने (अपने बयान में) एपस्टीन का कोई उल्लेख नहीं किया.
केरल हाईकोर्ट ने ‘द केरला स्टोरी 2-गोज़ बियॉन्ड’ की रिलीज़ पर रोक लगाई
केरल हाईकोर्ट ने गुरुवार को फिल्म ‘द केरला स्टोरी 2 — गोज़ बियॉन्ड’ की रिलीज़ पर रोक लगा दी और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) को इसके प्रमाणन पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया.
न्यायमूर्ति बेचु कुरियन थॉमस ने यह अंतरिम आदेश उन याचिकाओं पर दिया जिनमें सीबीएफसी द्वारा दिए गए प्रमाणन को चुनौती दी गई थी. अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया प्रमाणन देते समय सीबीएफसी द्वारा उचित विचार नहीं किया गया और बोर्ड को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिकाओं पर दो सप्ताह के भीतर निर्णय ले. अदालत ने आदेश दिया कि जब तक सीबीएफसी नया आदेश पारित नहीं करता, फिल्म रिलीज़ नहीं की जाएगी.
‘द टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, याचिकाकर्ताओं का कहना था कि फिल्म केरल को गलत तरीके से प्रस्तुत करती है और इसकी रिलीज़ से साम्प्रदायिक मतभेद भड़क सकते हैं. अदालत ने कहा कि सामान्यतः वह फिल्मों की रिलीज़ में हस्तक्षेप करने से बचती है, लेकिन जब किसी सामग्री में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की वास्तविक संभावना हो, तब हस्तक्षेप करना आवश्यक हो जाता है.
पिछली सुनवाई के दौरान, न्यायाधीश ने संकेत दिया था कि रिलीज़ को याचिकाओं पर विचार किए जाने तक रोका जा सकता है. अदालत ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाई गई चिंताएं वास्तविक थीं और विचार की आवश्यकता थी, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि फिल्म को ‘सच्ची घटनाओं से प्रेरित’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था और इसमें केरल से कोई संबंध न होने के बावजूद राज्य का नाम ले रखा था.
‘द केरल स्टोरी 2 — गोस बियॉन्ड’ विवादास्पद 2023 फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ का सीक्वल है, जिसमें केरल से महिलाओं की कथित भर्ती को इराक और सीरिया के इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) में दर्शाया गया था. एक याचिका, इसे हिंसा भड़काने में सक्षम बताते हुए टीज़र की समापन पंक्ति ‘अब सहेंगे नहीं… लड़ेंगे’ का विरोध करती है.
छत्तीसगढ़ में एक वर्ष के भीतर हिरासत में 66 मौतें
एजाज़ कैसर की रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान उस वक्त तीखी बहस हुई, जब उपमुख्यमंत्री (गृह) विजय शर्मा ने खुलासा किया कि जनवरी 2025 से 31 जनवरी 2026 के बीच 66 कैदियों की हिरासत में मौत हुई.”
गृहमंत्री ने सदन को बताया कि इन 66 मामलों में से 18 मामलों की न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के दिशा-निर्देशों के अनुसार जांच पूरी हो चुकी है, जबकि शेष 48 मामलों की जांच अभी जारी है.
सत्र के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दावा किया कि जीवन ठाकुर की हिरासत में हुई मौत चिकित्सकीय लापरवाही के कारण “हत्या” थी. जीवन ठाकुर एक प्रमुख आदिवासी नेता थे, जिनकी मौत कंडकेर जिला जेल से रायपुर स्थानांतरण के बाद हुई. इस मुद्दे को उठाते हुए बघेल ने मामले की जांच के लिए एक विधायी समिति गठित करने की मांग की और दावा किया कि हत्या, लूट और फिरौती जैसे घिनौने अपराधों में 35 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, हालांकि गृह मंत्री का कहना था कि वर्तमान भाजपा शासन में अपराध दर वास्तव में कम हुई है.
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स को मोटापे और युवा वयस्कों में मानसिक स्वास्थ्य की कमी से जोड़ा गया
नवीनतम वैश्विक रिपोर्ट में कहा गया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (यूपीएफ-अति प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ) के सेवन से न केवल मधुमेह, हृदय रोग और मोटापे जैसी बीमारियाँ जुड़ी हैं, बल्कि युवा वयस्कों में भावनात्मक और ज्ञानात्मक कार्यप्रणाली में कमी भी आ रही है. वाशिंगटन स्थित सैपियन लैब्स द्वारा ग्लोबल माइंड प्रोजेक्ट के तहत जारी ‘द ग्लोबल माइंड हेल्थ 2025’ रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में यूपीएफ का नियमित सेवन अन्य देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम है. यह 18-34 वर्ष आयु वर्ग के लोगों में 44% था, जो 55 वर्ष से अधिक आयु वालों के 11% से काफी अधिक है. रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि वैश्विक स्तर पर इंटरनेट-सक्षम युवा वयस्कों (18-34 वर्ष) में से 41% गंभीर मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. 55 वर्ष से अधिक आयु वालों की तुलना में अब युवा वयस्कों में दैनिक जीवन में उत्पादक रूप से कार्य करने की क्षमता में गंभीर कमी की रिपोर्ट करने की संभावना लगभग चार गुना अधिक है.
कविता बजेली-दत्त के मुताबिक, पब्लिक इंटरेस्ट में न्यूट्रिशन एडवोकेसी (एनएपीआई) के कन्वेनर डॉ. अरुण गुप्ता, जो साक्ष्य-आधारित पोषण नीति पर काम करने वाले थिंक टैंक से जुड़े हैं, के अनुसार, “भारत के लिए निहितार्थ गहन हैं. देश का जनसांख्यिकीय लाभ एक मानसिक रूप से लचीली, संज्ञानात्मक रूप से सक्षम युवा आबादी पर निर्भर करता है.”
“यह रिपोर्ट हमें अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स को केवल मोटापे का योगदानकर्ता न मानकर, हमारी युवा आबादी में ज्ञानात्मक और भावनात्मक कमी होने के संभावित कारण के रूप में पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करती है. जब आहार पैटर्न ध्यान, भावनात्मक नियंत्रण और मानसिक कल्याण को क्षीण करने लगें, तो मुद्दा व्यक्तिगत चुनाव का नहीं रह जाता; यह राष्ट्रीय मानव पूंजी का मामला बन जाता है. इसलिए, बच्चों और किशोरों के भोजन और पोषण पर्यावरण की रक्षा एक प्रकार से भारत के बौद्धिक और आर्थिक भविष्य में निवेश करना है,” उन्होंने जोड़ा.
अध्ययन के लिए, शोधकर्ताओं ने 2024 और 2025 में 85 देशों में यूपीएफ सेवन की जाँच की, जिसमें प्रतिवादी से “कई बार प्रतिदिन” से “दुर्लभ/कभी नहीं” तक पाँच श्रेणियों में से चुनने को कहा गया.
मंदिर में हर व्यक्ति से 100 रुपये मांगे, विवाद और मारपीट में दो महीने की बच्ची की मौत
‘द मूकनायक’ की रिपोर्ट के मुताबिक़ तेलंगाना के नागरकुर्नूल जिले के कुम्मेरा गांव में 18 फरवरी को मंदिर में दर्शन के दौरान एक पिछड़े वर्ग के परिवार के साथ मारपीट की गई. आरोप है कि मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर में कुछ लोगों ने परिवार से प्रति व्यक्ति 100 रुपये मांगे. परिवार ने कहा कि दर्शन मुफ्त होने चाहिए, तो उन्हें “नीची जाति” कहकर अपमानित किया गया और महिलाओं को बाल पकड़कर घसीटा गया.
परिवार चाकली (धोबी) समुदाय से है. बहुजन कार्यकर्ता डॉ. विशारदन महाराज का कहना है कि मामला सिर्फ 100 रुपये का नहीं था, बल्कि परिवार ने पहले बंधुआ मज़दूरी करने से मना किया था, उसी का बदला लिया गया.
शिकायत के मुताबिक, जब गणेश नाम के युवक को लोहे की रॉड से पीटा जा रहा था, तो उसकी पत्नी मौनिका, जो अनुसूचित जाति से हैं, ने अपने पति को बचाने के लिए अपनी दो महीने की बच्ची आरोपियों के पैरों में रख दी. आरोप है कि एस. मधु नाम के आरोपी ने बच्ची को लात मार दी. बच्ची गंभीर रूप से घायल हो गई और 21 फरवरी को अस्पताल में उसकी मौत हो गई. परिवार के कई अन्य लोगों की भी पिटाई की गई.
मामला बढ़ने और विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस ने तीन आरोपियों, यू. श्रीनिवास रेड्डी, एस. मधुसूदन रेड्डी और जी. श्रीकांत रेड्डी, को गिरफ्तार किया है. कुछ आरोपी अभी फरार बताए जा रहे हैं. शुरुआत में केस “संदिग्ध मौत” के तहत दर्ज हुआ था, लेकिन बाद में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की गंभीर धाराएं और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) कानून जोड़ा गया. चूंकि पीड़ितों में से एक अनुसूचित जाति से है, इसलिए जातिगत अत्याचार और हत्या के प्रयास की धाराएं भी लगाई गई हैं.
पीड़ित परिवार का कहना है कि वे अब अपने घर लौटने से डर रहे हैं. उन्हें डर है कि उन पर फिर हमला हो सकता है या उनका घर गिराया जा सकता है. आरोपियों में गांव का सरपंच भी शामिल बताया जा रहा है और कहा जा रहा है कि वे सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी से जुड़े हैं.
भारत में फ़र्ज़ी मुठभेड़ों और हिरासत में मौतों पर संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों की चिंता, स्वतंत्र जांच कराने की जरूरत बताई
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भारत सरकार से कहा है कि पुलिस द्वारा कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ों, हिरासत में यातना और संदिग्ध मौतों के मामलों की तुरंत स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए. साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुसार पुलिस व्यवस्था में बड़े सुधार करने की मांग की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि मुस्लिम, दलित और आदिवासी समुदायों पर इन कार्रवाइयों का असर अधिक पड़ा है. जेलों और थानों में भीड़भाड़ और खराब हालत से हालात और बिगड़ रहे हैं.
यह बयान संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिवेदक एलिस जिल एडवर्ड्स, जो यातना और अमानवीय व्यवहार पर काम करती हैं, और मॉरिस टिडबॉल-बिन्ज़, जो फ़र्ज़ी या मनमानी हत्याओं के मामलों पर निगरानी रखते हैं, ने जारी किया. यह खबर “मकतूब मीडिया” में प्रकाशित हुई है.
विशेषज्ञों ने कहा कि उनके पास विश्वसनीय जानकारी है कि पुलिस द्वारा ज़रूरत से ज़्यादा और कई बार जानलेवा बल का इस्तेमाल किया जा रहा है. खासकर उत्तर प्रदेश और असम में “एनकाउंटर” और “हाफ एनकाउंटर” जैसी कार्रवाइयों के नाम पर हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं. इसके अलावा हिरासत में मारपीट, बिजली के झटके देना, यौन हिंसा, मानसिक उत्पीड़न और इलाज से वंचित रखने जैसी शिकायतें भी मिली हैं.
उन्होंने कहा कि ये घटनाएं इक्का-दुक्का नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित समस्या की ओर इशारा करती हैं. अगर ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह जीवन के अधिकार, यातना पर पूर्ण प्रतिबंध और भेदभाव से सुरक्षा जैसे मूल मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है.
विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि “एनकाउंटर” और “हाफ एनकाउंटर” जैसे शब्द गैरकानूनी हिंसा को सामान्य बनाने का खतरा पैदा करते हैं और इससे लोगों का कानून व्यवस्था पर भरोसा कमज़ोर होता है.
विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि भारत ने अभी तक संयुक्त राष्ट्र के यातना विरोधी कन्वेंशन को मंजूरी नहीं दी है और देश के कानून में यातना को स्पष्ट अपराध के रूप में शामिल नहीं किया गया है. उन्होंने कहा कि हाल के कानूनी बदलावों से पुलिस की शक्तियां बढ़ी हैं, जबकि सुरक्षा उपाय कमज़ोर हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा थानों में सीसीटीवी लगाने और एनकाउंटर की जांच के दिशा-निर्देश भी कई जगह लागू नहीं किए जा रहे हैं.
सरकार की ज़िम्मेदारी है कि गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान हर व्यक्ति के जीवन और सम्मान की रक्षा करे, यातना को कानून में अपराध घोषित करे, शिकायतों की तुरंत और निष्पक्ष जांच करे, यातना से हासिल सबूतों को अदालत में स्वीकार न करे और पीड़ितों को मुआवजा और पुनर्वास दे. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि न्याय मांगने वाले पीड़ितों, उनके परिवारों, वकीलों, डॉक्टरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को परेशान और धमकाया जा रहा है.
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