26/08/2025: आयुष्मान योजना फेल ? | बेटे को क्या बताए मुस्लिम पिता | मोदी की डिग्री प्राइवेट ही रहेगी| अडानी का जो कर्ज आप चुकाएंगे | संविधान सुधारने का असली मक़सद | बिहार मतदाता सूची में और धांधलियाँ
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल
आज की सुर्खियां
बेटे को कहा पाकिस्तानी. पिता ने जवाब में थमाया संविधान.
आयुष्मान भारत योजना फेल. मरीज़ परेशान. अस्पताल बेहाल.
अस्पतालों का हज़ारों करोड़ का भुगतान अटका. सेवाएं हो रहीं बंद.
बिहार वोटर लिस्ट में बड़ा फ़र्ज़ीवाड़ा. एक घर के पते पर सैकड़ों वोटर.
वोटर लिस्ट से हटे 65 लाख नामों पर चुनाव आयोग करेगा अनिवार्य सुनवाई.
पटना में दो बच्चों की मौत पर बवाल. वीवीआईपी कार के शीशे तोड़े.
मोदी की डिग्री निजी जानकारी. दिल्ली हाईकोर्ट ने जांच का आदेश रद्द किया.
चुनाव-विश्लेषक संजय कुमार को सुप्रीम कोर्ट से गिरफ्तारी से राहत.
डीके शिवकुमार ने विधानसभा में गाया संघ का गीत. अटकलें तेज़.
सलवा जुडूम पर अमित शाह की टिप्पणी. 18 पूर्व जजों ने की आलोचना.
अमेरिका से तनाव के बीच. भारत ने वाशिंगटन में नई लॉबिंग फर्म रखी.
कमलनाथ सरकार क्यों गिरी. दिग्विजय और कमलनाथ में फिर बहस छिड़ी.
असम: एनआरसी लिस्ट की दोबारा जांच पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस.
अहमदाबाद से मोदी का ट्रंप को जवाब. हम अपनी ताकत बढ़ाते रहेंगे.
वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग का दावा. सरकार का असली मकसद विपक्ष को खत्म करना है.
वंतारा पर लगे आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बनाई एसआईटी.
एमपी में ऑनर किलिंग. दलित युवक को ऊंची जाति की पत्नी के परिवार ने मार डाला.
अडानी का बढ़ता कर्ज़. भारतीय सरकारी बैंकों पर बढ़ा जोखिम.
प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को सुप्रीम कोर्ट से राहत. ट्रायल पर रोक.
तमिलनाडु सरकार ने विरोध के बाद ओएनजीसी के हाइड्रोकार्बन प्रोजेक्ट को रद्द किया.
लेखिका बानू मुश्ताक़ को दशहरा में बुलाने पर बीजेपी का विरोध.
अरुंधति रॉय की नई किताब. जब भगोड़े की तरह बीता था जीवन.
एक मुस्लिम पिता कैसे दे अपने बेटे के सवालों का जवाब, ‘मैं सिर्फ़ संविधान से दे सकता हूँ”
पत्रकार वली अहमद ने द इंडियन एक्सप्रेस में ये महत्वपूर्ण लेख लिखा है. जो पूरा ही पढ़ा जाना चाहिए
कुछ तारीख़ें डर और असुरक्षा की भावना को बार-बार जगाती हैं. 26/11 एक ऐसी ही तारीख़ है, लेकिन मेरे लिए एक और 26/11 की याद है जो दर्द की एक निजी स्मृति बनी हुई है - एक नागरिक और एक पिता के रूप में. 26 नवंबर, 2018 को मेरा छह साल का बेटा रोते हुए घर आया क्योंकि दोस्तों के साथ एक खेल में उसे "खलनायक" बना दिया गया था. उसे यह भूमिका इसलिए दी गई क्योंकि वह एक मुसलमान था. उसे पाकिस्तानी और भारत का दुश्मन भी कहा गया. एक अभिभावक के तौर पर, मैं उसे सांप्रदायिकता के इस पहले अनुभव के लिए कैसे तैयार करता. एक मुस्लिम अभिभावक होने के नाते एक अतिरिक्त परत जुड़ जाती है. जब मेरे बेटे ने पूछा कि उसे पाकिस्तानी क्यों कहा गया, तो मेरे पास कोई जवाब नहीं था. मैं एक बच्चे को ऐसी दुनिया के लिए कैसे तैयार करूं जहां उसकी पहचान उसके धर्म या उसके खाने से की जाएगी?
आज की पीढ़ी प्रतिस्पर्धी धार्मिकता और दिखावटी राष्ट्रवाद के कॉकटेल पर बड़ी हो रही है. वे ऐसी बातचीतें डिनर टेबल पर और दोस्तों के बीच सुनते हैं. इन असहज समयों में, क्या मुझे उसे कट्टरता को नज़रअंदाज़ करने के लिए कहना चाहिए, या उसे यह समझाना चाहिए कि संविधान हमारे देश में सभी के लिए समानता की गारंटी देता है? जवाब स्पष्ट रूप से दूसरा है, लेकिन वह सच्चाई रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कितनी उतर पाती है? एक पिता के रूप में, मैंने उसके सवालों का जवाब देने का एक ही तरीक़ा चुना है. मैंने उसे भारत के संविधान की एक प्रति सौंपी है. यह उसे एक नागरिक के रूप में उसके अधिकारों और ज़िम्मेदारियों को समझने के लिए तैयार करेगा जो इस देश में किसी भी अन्य व्यक्ति के समान है. यह उसे सिखाएगा कि वह अपने धर्म के बारे में रक्षात्मक न हो, और वह जो है, उसके लिए बेशर्म हो. एक पिता के रूप में, यह सबसे अच्छा ताबीज़ है जो मैं उसे दे सकता हूं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उसका मन "भय रहित हो और सिर ऊंचा रखा हो".
नीति विश्लेषण
आयुष्मान? मरीज़ परेशान, अस्पताल बेहाल
मुंबई में रहने वाली लेखिका-अभिनेत्री-निर्देशक दिव्या उन्नी के लिए 29 जुलाई 2025 की सुबह एक बुरे सपने की तरह थी. उनके पिता की तबीयत अचानक बिगड़ गई. उनके पास प्राइवेट हेल्थ इंश्योरेंस के साथ-साथ केंद्र सरकार की मुफ्त इलाज वाली योजना आयुष्मान भारत - प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY) का कार्ड भी था. दिव्या ने पहले सरकारी योजना का रास्ता चुना. उन्होंने महाराष्ट्र में इस योजना से जुड़े सूचीबद्ध अस्पतालों की लिस्ट निकाली और एक के बाद एक आठ अस्पतालों को फोन किया. लेकिन जो हुआ, उसने इस योजना की जमीनी हकीकत का पर्दाफाश कर दिया. इंडिया स्पेंड के लिए चारू बहरी ने बेहतरीन रिपोर्ताज लिखा है.
कुछ अस्पतालों ने फोन नहीं उठाया. कुछ ने कहा कि वे इस योजना के तहत सिर्फ कुछ खास बीमारियों का ही इलाज करते हैं, जिनका दिव्या के पिता की हालत से कोई लेना-देना नहीं था. कई अस्पतालों ने तो साफ कह दिया कि वे अब इस योजना का हिस्सा ही नहीं हैं. एक अस्पताल ने उन्हें पिता के सारे दस्तावेज़ लेकर अस्पताल आने को कहा, जहां योजना के डॉक्टर पहले यह जांच करेंगे कि मरीज भर्ती होने लायक है भी या नहीं. अगर मंजूरी मिलती भी, तो उन्हें अपने पिता को राशन कार्ड के साथ पेश करना पड़ता. दिव्या ने इंडियास्पेंड को बताया, "यह एक लंबी प्रक्रिया थी और हमारे पास इतना वक्त नहीं था. मेरे पिता को तुरंत इलाज की जरूरत थी." आखिरकार, उन्होंने अपने पिता को एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया और प्राइवेट इंश्योरेंस का इस्तेमाल किया. दिव्या का यह अनुभव इस योजना पर गंभीर सवाल खड़े करता है, खासकर इमरजेंसी की स्थिति में.
इंडियास्पेंड ने जब उन अस्पतालों से संपर्क करने की कोशिश की, तो हकीकत और भी साफ हो गई. प्लेटिनम अस्पताल ने माना कि वे योजना के तहत सिर्फ एंजियोप्लास्टी और बाईपास सर्जरी ही करते हैं. ज्यूपिटर अस्पताल सिर्फ रेडिएशन ऑन्कोलॉजी और पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी के लिए ही योजना से जुड़ा है. एक अन्य अस्पताल ने कहा कि वह अब सूचीबद्ध ही नहीं है. यह साफ है कि योजना को लेकर जागरूकता की भारी कमी, सेवाओं को लेकर अस्पष्टता और जेब से होने वाले खर्चों ने मरीजों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. वहीं दूसरी तरफ, अस्पतालों का करोड़ों का भुगतान महीनों से अटका पड़ा है, जिससे वे भी बेहाल हैं.
मरीजों का संघर्ष: अधूरी जानकारी और इलाज के लिए पैसे की मांग
दिव्या का मामला तो अस्पताल पहुंचने से पहले का है, लेकिन जो लोग इलाज के लिए पहुंच भी जाते हैं, उनकी मुश्किलें कम नहीं हैं. एसोसिएशन फॉर सोशली एप्लीकेबल रिसर्च (ASAR) और सेंटर फॉर हेल्थ इक्विटी, लॉ एंड पॉलिसी (C-HELP) के एक अध्ययन के मुताबिक, इस योजना से जुड़ी सबसे बड़ी शिकायत "अस्पताल की खराब सेवा" और "इलाज के लिए पैसे की मांग" है. अक्टूबर 2018 से मार्च 2022 के बीच दर्ज हुई 1.10 लाख शिकायतों में से चार में से तीन शिकायतें इलाज के लिए पैसे मांगे जाने की थीं. जागरूकता की कमी इसका सबसे बड़ा कारण है. 2021 में उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर में हुए एक सर्वे से पता चला कि शहरी इलाकों में सिर्फ 9% और ग्रामीण इलाकों में 19% संभावित लाभार्थियों को ही योजना के फायदों के बारे में पता था.
अस्पतालों का दर्द: महीनों से अटका करोड़ों का भुगतान
यह कहानी का सिर्फ एक पहलू है. दूसरा पहलू निजी अस्पतालों का है, जो इस योजना की रीढ़ हैं, लेकिन खुद आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. हरियाणा में, योजना से जुड़े 650 निजी अस्पतालों ने 8 अगस्त 2025 से सेवाएं बंद कर दीं, क्योंकि सरकार पर उनका करीब 490 करोड़ रुपये का बकाया था. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के अध्यक्ष दिलीप भानुशाली कहते हैं, "नियम के मुताबिक भुगतान 15 दिनों में हो जाना चाहिए, लेकिन अस्पताल महीनों तक इंतजार करते रहते हैं. छोटे और मध्यम अस्पताल बिना पैसों के कैसे चलेंगे." यह सिर्फ हरियाणा की कहानी नहीं है. जम्मू-कश्मीर से लेकर नागालैंड और रांची से लेकर असम तक, हर जगह अस्पताल भुगतान में देरी से परेशान हैं. एक आरटीआई के जवाब में मिली जानकारी के मुताबिक, फरवरी 2025 तक देशभर के अस्पतालों का 12,161 करोड़ रुपये बकाया था. कई बार तो ऐसा भी होता है कि भर्ती के समय मंजूर किए गए क्लेम का भुगतान बाद में बिना किसी ठोस कारण के खारिज कर दिया जाता है, जिससे अस्पतालों पर दोहरी मार पड़ती है.
समस्या की जड़: बढ़ता दायरा और घटता बजट
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या की जड़ योजना के बढ़ते दायरे और उसके लिए अपर्याप्त बजट में है. यह योजना मूल रूप से देश की 40% गरीब आबादी के लिए बनाई गई थी, लेकिन केंद्र और कई राज्य सरकारों ने इसमें और भी लोगों को जोड़ दिया है. महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों ने अपनी 80% से ज्यादा आबादी को इसके दायरे में ला दिया है. लेकिन इसके लिए बजट नहीं बढ़ाया गया. भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का केवल 1.8% स्वास्थ्य पर खर्च करता है, जबकि 2025 तक इसे 2.5% करने का लक्ष्य था. विशेषज्ञों के मुताबिक, आयुष्मान भारत जैसी योजना की सफलता के लिए स्वास्थ्य बजट को जीडीपी का 5% करना होगा. थाईलैंड, जो सरकारी स्वास्थ्य बीमा में एक मिसाल है, कोविड से पहले ही अपनी जीडीपी का 3.2% इस पर खर्च कर रहा था.
आगे का रास्ता: बजट बढ़ाना और जागरूकता फैलाना
विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को तुरंत योजना के लिए बजट आवंटन बढ़ाना चाहिए, ताकि अस्पतालों को समय पर भुगतान हो सके और इलाज की दरें भी व्यावहारिक बनाई जा सकें. कम दरों की वजह से ही बड़े और हाई-एंड अस्पताल इस योजना से दूर रहते हैं. इसके अलावा, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने भी जागरूकता फैलाने के लिए एक समर्पित सेल बनाने की सिफारिश की है. आरोग्य मित्रों, आशा कार्यकर्ताओं और एनजीओ की मदद से लोगों तक सही जानकारी पहुंचाना बेहद जरूरी है. कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि "सह-भुगतान" (Co-payment) का विकल्प दिया जा सकता है, जिसमें खर्च का एक हिस्सा सरकार और एक हिस्सा मरीज उठाए. इससे बेहतर इलाज और बड़े अस्पतालों को योजना से जोड़ने में मदद मिल सकती है.
मुख्य बातें
मरीजों की परेशानी: योजना के बारे में जागरूकता की भारी कमी है. कौन सा अस्पताल कौन सा इलाज देता है, यह स्पष्ट नहीं है, जिससे इमरजेंसी में मरीज भटकते हैं. मुफ्त इलाज के बावजूद पैसे मांगने की शिकायतें आम हैं.
अस्पतालों का संकट: देशभर में निजी अस्पतालों का सरकार पर 12,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया है. महीनों तक भुगतान न होने के कारण अस्पताल योजना के तहत सेवाएं बंद करने को मजबूर हो रहे हैं.
भंडाफोड़: योजना का दायरा तो बढ़ाया जा रहा है, लेकिन उसके अनुपात में बजट नहीं बढ़ाया गया. भारत का स्वास्थ्य पर खर्च (जीडीपी का 1.8%) निर्धारित लक्ष्यों से बहुत कम है, जो इस संकट का मूल कारण है.
समाधान: योजना को सफल बनाने के लिए स्वास्थ्य बजट में भारी बढ़ोतरी, अस्पतालों को समय पर भुगतान, जागरूकता अभियान चलाना और इलाज की दरों को व्यावहारिक बनाना बेहद जरूरी है.
बिहार मतदाता सूची में गड़बड़ी
ज़मीनी पड़ताल में चुनाव आयोग के दावों पर सवाल
भारत की चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता उसकी मतदाता सूचियों की प्रामाणिकता पर निर्भर करती है. बिहार में चुनाव आयोग द्वारा किया गया विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभ्यास, जिसका उद्देश्य 7.9 करोड़ मतदाताओं की पात्रता को सत्यापित करना था, इस लक्ष्य को पूरा करने में विफल रहा है. द वायर के लिए रवि नायर, आयुष जोशी, रौनक सारस्वत और साची हेगड़े द्वारा की गई एक ज़मीनी जांच में बिहार में जारी की गई ड्राफ़्ट मतदाता सूचियों में परेशान करने वाली गड़बड़ियां सामने आई हैं, जो आयोग की सत्यापन विधियों पर गंभीर सवाल उठाती हैं. मतदाता सूचियों के विश्लेषण से पता चला कि पांच निर्वाचन क्षेत्रों में, 1,50,000 मतदाता सिर्फ़ 1200-1300 घरों में केंद्रित हैं. हमने चार निर्वाचन क्षेत्रों - मधुबन, हरसिद्धि, कटिहार और पूर्णिया - में 14 ऐसे मामलों की जांच की, जहां एक ही पते पर सैकड़ों मतदाता पंजीकृत थे.
जांच में पाया गया कि कई मामलों में, एक पते पर सूचीबद्ध अधिकांश लोग वास्तव में कहीं और रह रहे थे. कटिहार के एक घर में 100 से ज़्यादा मतदाता पंजीकृत थे, जिसमें विभिन्न धर्मों और जातियों के लोग शामिल थे, जो उस क्षेत्र की सामाजिक वास्तविकताओं के विपरीत था. पूर्णिया में, एक मंदिर के पते पर 153 मतदाता पंजीकृत थे. मधुबन के एक गांव में, एक पक्के घर के पते पर 274 मतदाता दर्ज थे, जबकि वहां सिर्फ़ एक परिवार रहता था. एक अन्य मामले में, एक ही पते (मकान नंबर 129) पर 389 लोग पंजीकृत थे, जो एक प्रशासनिक शॉर्टकट के कारण हुआ था; पिछले 15 वर्षों में हर नए मतदाता को उसी घर के नंबर के तहत जोड़ दिया गया. कई बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) ने बताया कि उन्हें सिर्फ़ मृत या स्थानांतरित हो चुके लोगों के नाम हटाने के निर्देश थे, न कि पते ठीक करने के. एक बीएलओ ने दावा किया कि इस तरह की अनियमितताओं की रिपोर्ट ज़िला स्तर के अधिकारियों को 2010-11 से दी जा रही है, लेकिन चुनाव आयोग ने उन पर कोई कार्रवाई नहीं की है. ये निष्कर्ष चुनाव आयोग द्वारा अपने मसौदा मतदाता सूची बनाने के लिए पूरी तरह से घर-घर जाकर सत्यापन करने में विफलता का सुझाव देते हैं और बिहार में आगामी चुनावों की शुचिता पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं.
बिहार में वोटर लिस्ट से हटाए गए नामों पर होगी अनिवार्य सुनवाई: चुनाव आयोग
भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने कहा है कि बिहार में जिन मतदाताओं के नाम ड्राफ़्ट वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं, उन्हें अनिवार्य सुनवाई का मौका मिलेगा. यह उन लोगों के लिए है जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार, 11 दस्तावेज़ों के अभाव में आधार कार्ड जमा करके अपने नाम हटाने को चुनौती दे रहे हैं. एक वरिष्ठ चुनाव आयोग अधिकारी ने द हिंदू को बताया कि अंतिम सूची में नाम शामिल करने या बाहर करने का फ़ैसला इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफ़िसर (ईआरओ) लेंगे. यह मामला सीधे तौर पर 65 लाख लोगों के वोट देने के अधिकार से जुड़ा है. चुनाव आयोग की प्रक्रिया यह तय करेगी कि क्या इन लोगों को आगामी चुनावों में मताधिकार मिल पाएगा या नहीं. यह आधार कार्ड की भूमिका और नागरिकता के प्रमाण को लेकर चल रही बड़ी बहस का भी हिस्सा है.
1 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ़्ट सूची में 65 लाख लोगों के नाम बाहर कर दिए गए थे, जो जुलाई 2025 की वोटर लिस्ट में शामिल थे. इसके पीछे मौत, पलायन और नामों का दोहराव जैसे कारण बताए गए. पिछले हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को निर्देश दिया था कि वे अपने बूथ लेवल एजेंट्स (BLAs) के ज़रिए मतदाताओं की मदद करें ताकि वे स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) नोटिफ़िकेशन में बताए गए 11 दस्तावेज़ों में से कोई एक या फिर आधार कार्ड के साथ ज़रूरी फ़ॉर्म जमा कर सकें.
आयोग के अधिकारी ने बताया कि अगर किसी व्यक्ति का नाम सूची से बाहर रखा जाता है, तो ईआरओ एक "स्पीकिंग ऑर्डर" जारी करेगा, जिसमें फ़ैसले के कारणों का स्पष्ट उल्लेख होगा. स्पीकिंग ऑर्डर एक ऐसा आदेश होता है जिसमें अधिकारी सबूतों, तथ्यों और लागू कानूनों का हवाला देते हुए अपने निर्णय के पीछे के तर्क को साफ़ तौर पर बताता है. इससे यह सुनिश्चित होता है कि फ़ैसला मनमाना नहीं है और तर्क पर आधारित है. 24 जून को जारी SIR आदेश के अनुसार, ईआरओ के पास सभी दावों की जांच करने, स्वतः संज्ञान लेकर जांच करने और किसी भी मतदाता को नोटिस जारी करने का अधिकार है.
इस बीच, भाजपा नेता अमित मालवीय ने रविवार को ज़ोर देकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा है कि सिर्फ़ आधार कार्ड ही वोटिंग अधिकार पाने के लिए एक वैध दस्तावेज़ हो सकता है. मालवीय ने कहा, "आधार केवल पहचान और निवास का प्रमाण है, यह नागरिकता साबित नहीं करता है." उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहीं भी यह सुझाव नहीं दिया कि इसे SIR के लिए एक वैध दस्तावेज़ के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, क्योंकि आधार अधिनियम खुद कहता है कि यह नागरिकता का प्रमाण नहीं है.
यह नागरिकता का सवाल तब और अहम हो जाता है जब पिछले हफ़्ते केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए यह नहीं बताया कि भारत में नागरिकता साबित करने के लिए "वैध दस्तावेज़ों की श्रेणियां" क्या हैं. मंत्रालय ने कहा कि नागरिकता, नागरिकता अधिनियम, 1955 और उसके नियमों से शासित होती है. गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने स्वीकार्य दस्तावेज़ों को बताए बिना कहा कि नागरिकता "जन्म से (धारा 3), वंश से (धारा 4), पंजीकरण से (धारा 5), देशीयकरण से (धारा 6) या क्षेत्र के समावेश से (धारा 7) हासिल की जा सकती है." अब ईआरओ की सुनवाई यह तय करेगी कि इन 65 लाख लोगों में से कितने लोग अंतिम वोटर लिस्ट में जगह बना पाते हैं.
पटना में दो बच्चों की मौत पर बवाल, भीड़ ने वीवीआईपी कार के शीशे तोड़े
सोमवार शाम को पटना का अटल पथ जनाक्रोश का केंद्र बन गया. दो बच्चों की मौत के विरोध में एक बड़ी भीड़ व्यस्त सड़क पर जमा हो गई और गाड़ियों को निशाना बनाने लगी. इन बच्चों के शव 15 अगस्त को एक खड़ी कार के अंदर मिले थे. भीड़ ने एक वीवीआईपी कार और एक पुलिस एस्कॉर्ट वाहन को क्षतिग्रस्त कर दिया. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि ड्राइवर के तेज़ी से भागने से पहले वीवीआईपी कार की खिड़कियां तोड़ दी गईं. ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी और अंगरक्षक पैदल ही मौके से भाग गए. घटना का एक वीडियो अब व्यापक रूप से प्रसारित हो रहा है. विरोध प्रदर्शन के कारण भारी ट्रैफ़िक जाम लग गया, और राजीव नगर क्रॉसिंग कुछ समय के लिए पूरी तरह से अवरुद्ध हो गई. यह गुस्सा भाई-बहन दीपक कुमार (5) और लक्ष्मी कुमारी (7) के शव इंद्रपुरी इलाके की रोड नंबर 15 पर खड़ी एक कार के अंदर पाए जाने से उपजा है. बच्चे स्वतंत्रता दिवस पर दोपहर करीब 12.30 बजे ट्यूशन के लिए निकले थे, लेकिन घर नहीं लौटे. उनकी मां किरण देवी ने कहा, "उनके हाथ पर गला घोंटने और चोट के निशान थे. पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही है. हम न्याय की मांग करते हैं." उन्होंने पुलिस पर "मामले को दबाने" का आरोप लगाते हुए कहा कि उनके बच्चों की हत्या की गई है. पाटलिपुत्र के अतिरिक्त थानाध्यक्ष विशाल कुमार ने कहा कि जांच जारी है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकला है, इसलिए फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) रिपोर्ट का इंतज़ार किया जा रहा है.
मोदी की डिग्री पब्लिक के लिए प्राइवेट मामला है
दिल्ली हाईकोर्ट ने सीआईसी का आदेश रद्द किया
दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार (25 अगस्त, 2025) को केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के 2016 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक आरटीआई कार्यकर्ता को दिल्ली विश्वविद्यालय के 1978 के बीए रिकॉर्ड (जिस वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्नातक किया था) की जांच करने की अनुमति दी गई थी.
यह आदेश दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) द्वारा दायर उस अपील पर आया, जो सीआईसी के 21 दिसंबर, 2016 के आदेश के खिलाफ की गई थी. कोर्ट ने सुनवाई की पहली तारीख, 24 जनवरी, 2017 को ही सीआईसी के आदेश पर रोक लगा दी थी.
हाईकोर्ट ने कहा कि यूनिवर्सिटी के पास छात्रों की डिग्री संबंधी जानकारी "व्यक्तिगत जानकारी" के रूप में रहती है, यह निजता के अधिकार के तहत संरक्षित है. चूंकि प्रधानमंत्री की शैक्षिक योग्यता कानूनन सार्वजनिक पद पर नियुक्ति के लिए अनिवार्य नहीं है, इसलिए इसे सार्वजनिक हित के नाम पर उजागर करने का कोई ठोस कारण नहीं है.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से पेश हुए, ने हालांकि, कहा, “विश्वविद्यालय को अपना रिकॉर्ड कोर्ट को दिखाने पर कोई आपत्ति नहीं है. 1978 की स्नातक (बैचलर ऑफ आर्ट्स) की एक डिग्री है."
दिल्ली विश्वविद्यालय ने सीआईसी के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी कि केवल "जिज्ञासा" के चलते निजी डिग्री रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने माना कि "कोई सार्वजनिक पदाधिकारी हो, तब भी उसकी अकादमिक जानकारी उसकी निजी जानकारी मानी जाती है, और बिना किसी बड़े सार्वजनिक हित के उसे साझा नही किया जा सकता. आरटीआई कार्यकर्ता के वकील ने फैसले पर सवाल उठाया, लेकिन कोर्ट ने निजता को ज्यादा अहम माना.
संजय कुमार को गिरफ्तारी से सुरक्षा मिली
सोमवार (25 अगस्त, 2025) को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ईसीआई) द्वारा दर्ज दो एफआईआर के मामले में चुनाव-विश्लेषक संजय कुमार को गिरफ़्तारी से सुरक्षा प्रदान कर दी. चुनाव आयोग ने उन पर महाराष्ट्र की मतदाता सूची से जुड़ी ग़लत जानकारी सोशल मीडिया पर फैलाने का आरोप लगाया था.
सीजेआई बी.आर. गवई और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने वरिष्ठ वकील विवेक तन्खा और वकील सुमीर सोढ़ी की इस दलील पर गौर किया कि चुनाव-विश्लेषक द्वारा सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज की गई है.
क्या डीके शिवकुमार ने आरएसएस का गीत गाकर कांग्रेस हाईकमान को कोई संदेश दिया?
कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने विधानसभा में आरएसएस का गान "नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि" गाकर राज्य की सियासत में हलचल पैदा कर दी है. हालांकि, जब इस पर भाजपा विधायकों की तरफ से तीव्र प्रतिक्रिया की गई तो शिवकुमार ने बाद में सफाई दी कि वे पैदायशी कांग्रेसी हैं. एक नेता के बतौर मुझे अपने विरोधियों और मित्रों का पता होना चाहिए. मैंने उनके (भाजपा-संघ) के बारे में अध्ययन किया है. भाजपा से हाथ मिलाने का सवाल ही पैदा नहीं होता. मैं कांग्रेस का ही नेतृत्व करूंगा. मेरा जन्म कांग्रेस में हुआ है.
दरअसल, विधानसभा में 4 जून को बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में हुई भगदड़ की घटना पर चर्चा के दौरान जब विपक्ष के नेता आर. अशोक ने शिवकुमार की आरएसएस से पिछले जुड़ाव की बात की तो उन्होंने आरएसएस की प्रार्थना गाकर जवाब दिया. इसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. वीडियो के वायरल होने के बाद सवाल उठे कि क्या यह कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को किसी प्रकार का सूक्ष्म संदेश था, खासकर तब जब कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर अंदरूनी मतभेद और चर्चाएं चल रही हैं. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह शिवकुमार का राहुल गांधी सहित कांग्रेस नेतृत्व को यह संकेत हो सकता है कि अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला, तो वे भाजपा का रुख कर सकते हैं. वहीं भाजपा ने इस घटना का उपयोग कांग्रेस पर चुटकी लेने के लिए किया है. बहरहाल, इस घटनाक्रम पर सोशल मीडिया पर भी बहस हुई है और कई लोगों ने इसे कांग्रेस के भीतर समीकरणों और संभावित बदलाव के संदर्भ में चर्चा का विषय बनाया है. नागेश प्रभु ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है.
पूर्व जजों ने अमित शाह की सलवा जुडूम फैसले पर टिप्पणी की आलोचना की
18 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के एक समूह ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सुप्रीम कोर्ट के “सलवा जुडूम” फैसले पर की गई टिप्पणी के खिलाफ एक साझा बयान जारी किया है. उनका कहना है कि इस तरह की “पक्षपाती गलत व्याख्या” का “सुप्रीम कोर्ट के जजों पर गलत प्रभाव पड़ेगा और यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को हिला देगा.”
एक संक्षिप्त बयान, जिस पर हस्ताक्षरकर्ताओं में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश कुरियन जोसेफ, मदन बी. लोकुर और जे. चेलमेश्वर जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं, में यह भी कहा गया कि शाह की टिप्पणी दुर्भाग्यपूर्ण है और बेहतर होगा कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से परहेज किया जाए. कहा कि उपराष्ट्रपति पद का सम्मान करना ही बुद्धिमानी होगी. उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम फैसला स्पष्ट या परोक्ष रूप से नक्सलवाद या उसकी विचारधारा का समर्थन नहीं करता. उन्होंने कहा, उपराष्ट्रपति पद के लिए अभियान भले ही वैचारिक हो, लेकिन इसे शालीनता और गरिमा के साथ चलाया जा सकता है.
उल्लेखनीय है कि अमित शाह ने पिछले दिनों केरल में कहा था, “सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज सुदर्शन रेड्डी वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने नक्सलवाद की मदद की. उन्होंने सलवा जुडूम पर फैसला सुनाया. अगर सलवा जुडूम पर फैसला नहीं आता, तो नक्सली चरमपंथ 2020 तक खत्म हो गया होता.” याद रहे कि रेड्डी उपराष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवार हैं.
अमेरिका के साथ तनाव के बीच वाशिंगटन में भारत की नई लॉबिंग फर्म नियुक्त
अमेरिका के साथ तनावपूर्ण संबंधों के बीच, वॉशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने इस महीने की शुरुआत में तीन महीने के लॉबिंग प्रयासों के हिस्से के रूप में "मरकरी पब्लिक अफेयर्स" के साथ अनुबंध किया है. खास बात यह है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मौजूदा चीफ़ ऑफ़ स्टाफ सूज़ी वाइल्स, वर्ष 2022 से लेकर पिछले वर्ष 7 नवंबर तक मरकरी पब्लिक अफेयर्स में सह-अध्यक्ष रहीं, जिसके बाद उन्हें व्हाइट हाउस में उनके वर्तमान पद पर नियुक्त किया गया. अनुबंध के मुताबिक, "कंसल्टेंट भारतीय दूतावास को रणनीतिक सरकारी संबंध और संचार सेवाएं प्रदान करेगा. पूर्व रिपब्लिकन सीनेटर डेविड विटर ने मर्करी पब्लिक अफेयर्स की ओर से अनुबंध पर हस्ताक्षर किए, जो पहलगाम आतंकी हमले के कुछ दिन बाद हुआ था.
यह अनुबंध 15 अगस्त से प्रभावी है और 14 नवंबर तक चलेगा. भारतीय दूतावास लॉबिंग प्रयासों के लिए प्रति माह लगभग 75,000 डॉलर का भुगतान करेगा. मर्करी का शुल्क जोड़ने के बाद लॉबिंग का कुल खर्च लगभग 275,000 डॉलर प्रति माह हो गया है.
केशव पद्मनाभन के अनुसार, ये लॉबिंग प्रयास इसलिए बढ़ाए गए हैं, क्योंकि नई दिल्ली, अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को सुरक्षित रखना चाहती है. राजनीतिक संबंध फिलहाल तनावपूर्ण हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग निरंतर जारी है.
उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ महीनों से भारत और अमेरिका के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं, विशेष रूप से द्विपक्षीय व्यापार समझौते के तहत बातचीत के ठहराव के कारण. ट्रम्प ने हाल के हफ्तों में भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद पर भी आलोचना की है. अमेरिकी राष्ट्रपति ने 6 अगस्त को भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा की, जो 27 अगस्त से लागू होगा. ये अतिरिक्त शुल्क मौजूदा 25 प्रतिशत बेसलाइन शुल्क के ऊपर हैं, जिससे भारत से आयात पर कुल 50 प्रतिशत शुल्क होगा, जो किसी भी अमेरिकी व्यापारिक साझेदार के लिए सबसे अधिक है.
क्यों गिरी थी कमलनाथ की सरकार, दिग्विजय के इंटरव्यू से पांच साल बाद फिर बहस
लगभग साढ़े पांच साल बाद, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके 22 वफादार विधायकों ने पाला बदलते हुए मध्यप्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को गिरा दिया था, एक पॉडकास्ट इंटरव्यू ने इस बात पर फिर से बहस छेड़ दी है कि आखिर 15 महीने पुरानी उस सरकार के पतन की असली वजह क्या थी. यह बहस पूर्व मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री और वर्तमान राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह के एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ पॉडकास्ट इंटरव्यू के दौरान दिए गए बयानों के कारण शुरू हुई. इंटरव्यू में दिग्विजय सिंह ने कहा कि भले ही उन्होंने सरकार बचाने के लगातार प्रयास किए, लेकिन कांग्रेस सरकार का पतन कमलनाथ और सिंधिया के बीच निजी टकराव की वजह से हुआ. उन्होंने कहा, “यह कोई वैचारिक टकराव नहीं था, बल्कि व्यक्तित्वों का टकराव (नाथ और सिंधिया के बीच) था.”
सिंह ने यह भी कहा, “अक्सर कांग्रेस सरकार के 2020 में गिरने का जिम्मेदार मुझे ठहराया जाता है, लेकिन सच यह है कि मैंने सरकार बचाने के लिए लगातार काम किया. मैंने समय रहते इस तरह के संकट (सरकार गिरने) की आशंका के बारे में सावधान भी किया था.”
उन्होंने बताया, “मैं एक उद्योगपति से मिला, जिनके दोनों नेताओं (नाथ और सिंधिया) से अच्छे संबंध हैं, और उन्हें सरकार गिरने की संभावना के बारे में बताया. उस उद्योगपति के घर पर एक दोपहर भोज आयोजित किया गया, जिसमें हम तीनों (नाथ, सिंधिया और मैं) मौजूद थे. मैंने अपनी पूरी कोशिश की कि संकट टल जाए. ”
उस बैठक में ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से संबंधित कुछ मुद्दे उठाए गए थे। यह सहमति बनी थी कि उस क्षेत्र से जुड़े जो भी मुद्दे उठेंगे, उन्हें हमारी (मेरी और सिंधिया की) संयुक्त इच्छा-सूची के अनुसार निपटाया जाएगा. ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से संबंधित एक संयुक्त इच्छा-सूची, जिस पर मेरे और सिंधिया के हस्ताक्षर थे, अगले ही दिन सौंप दी गई थी, लेकिन उस इच्छा-सूची में उल्लिखित मुद्दों और चिंताओं को हल करने के लिए वास्तव में कुछ नहीं किया गया. यदि (मुख्यमंत्री के रूप में) नाथ ने उन मुद्दों को सुलझा दिया होता, तो शायद सरकार नहीं गिरती," दिग्विजय ने दावा किया.
इसके एक दिन बाद कमलनाथ ने दिग्विजय के बयानों पर प्रतिक्रिया देने के लिए “एक्स” की मदद ली और लिखा, "हाल ही में, 2020 में मध्यप्रदेश में मेरी नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार गिरने को लेकर बयानबाजी हुई है. मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि पुराने मामलों को उखाड़ने में कोई लाभ नहीं है. लेकिन यह सच है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के अलावा, ज्योतिरादित्य सिंधिया को लगता था कि सरकार दिग्विजय सिंह चला रहे हैं. इसी नाराज़गी में उन्होंने कांग्रेस विधायकों को तोड़कर हमारी सरकार गिरा दी.”
मजेदार यह है कि कांग्रेस के इन दो बड़े नेताओं के बयानों के बाद भाजपा को कांग्रेस सरकार गिराने में अपनी संलिप्तता से इनकार करने का मौका मिल गया. उसका कहना है कि अब तो कमलनाथ ने स्वीकार किया है कि उनके नेतृत्व वाली सरकार वास्तव में दिग्विजय सिंह द्वारा चलाई जा रही थी. दिग्विजय ने पहले राज्य को तबाह किया, फिर कांग्रेस को और आखिर में कमलनाथ के राजनीतिक करियर को.
एनआरसी सूची के पुनः सत्यापन पर केंद्र और असम सरकार को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
“द इकनॉमिक टाइम्स” के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार, असम सरकार, असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए नियुक्त अधिकारी और भारत के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी किए. यह कार्रवाई एनआरसी के पूर्व राज्य समन्वयक द्वारा दायर उस याचिका के बाद की गई, जिसमें मसौदा एनआरसी और एनआरसी की परिशिष्ट सूची का पुनः सत्यापन करने की मांग की गई थी. जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने इस पर संज्ञान लिया.
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के मसौदे और रजिस्टर की पूरक सूची, जिसे 2019 में असम में अपडेट किया गया था, में संशोधन के लिए एक रिट याचिका दायर की गई थी.
असम के नागरिकों की अद्यतन (अपडेटेड) एनआरसी 31 अगस्त, 2019 को जारी की गई थी, जिसमें 31,121,004 लोगों को शामिल किया गया था, जबकि 1,906,657 लोगों को इसके योग्य नहीं माना गया था. हालांकि, भारत के रजिस्ट्रार जनरल ने इसे अधिसूचित नहीं किया है. सुप्रीम कोर्ट की यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब असम में चुनाव होने में बस कुछ ही महीने बचे हैं. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा बहुसंख्यक असमिया समुदाय के वोटों को आकर्षित करने के लिए पहले से ही “अवैध अप्रवासी” और “बांग्लादेशी” का मुद्दा खड़ा कर रहे हैं. राज्य में विदेशी विरोधी आंदोलन में सबसे आगे रहने वाले अखिल असम छात्र संघ (एएएसयू) जैसे संगठनों ने पहले ही एनआरसी के मसौदे में खामियां निकालते हुए दावा किया था कि सीमावर्ती पूर्वोत्तर राज्य में रहने वाले संभावित ‘अवैध प्रवासियों’ का 19 लाख का आंकड़ा बहुत कम है.
मोदी ने ट्रम्प को अहमदाबाद से ललकारा, हम अपनी ताकत बढ़ाते रहेंगे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 अगस्त, 2025 को अहमदाबाद में एक रैली को संबोधित करते हुए, बढ़ते अमेरिकी टैरिफ़ के बीच किसानों, छोटे उद्यमियों और पशुपालकों को अटूट समर्थन का आश्वासन दिया. इन टैरिफ़ में 27 अगस्त से भारतीय सामानों पर लगने वाला 50% का भारी शुल्क भी शामिल है. मोदी ने कहा, "चाहे कितना भी दबाव आए, हम अपनी ताकत बढ़ाते रहेंगे," और इस बात पर ज़ोर दिया कि 'आत्मनिर्भर भारत' की जड़ें गुजरात में हैं. यह बयान अमेरिका द्वारा भारत की रियायती रूसी तेल खरीद की आलोचना के बाद आया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि इससे मॉस्को के यूक्रेन युद्ध को फंड मिल रहा है—एक ऐसा दावा जिसे भारत ख़ारिज करता है. पहले से ही 25% का अतिरिक्त टैरिफ़ संबंधों में तनाव पैदा कर चुका है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पलटवार करते हुए भारतीय तेल ख़रीदने पर अमेरिकी पाखंड पर सवाल उठाया. भारत इन टैरिफ़ को अन्यायपूर्ण मानता है और स्वतंत्र व्यापार नीति को प्राथमिकता देता है. प्रधानमंत्री कार्यालय वैश्विक व्यापार तनावों में घरेलू हितधारकों पर मोदी के फ़ोकस को रेखांकित करते हुए, इसके प्रभावों को कम करने के लिए घोषणाओं पर विचार कर रहा है.
हरकारा डीपडाइव
श्रवण गर्ग : असली मकसद भ्रष्टाचार से लड़ना नहीं, बल्कि बची-खुची डेमोक्रेसी को खत्म करना और विपक्ष का सफाया करके एक-दलीय शासन थोपना है
हरकारा डीप डाइव में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने निधीश त्यागी के साथ बातचीत में सरकार द्वारा लाए गए नए संविधान संशोधन प्रस्ताव पर गंभीर सवाल उठाए गए. यह प्रस्ताव भ्रष्टाचार के आरोप लगते ही नेताओं को बिना सज़ा के पद से हटाने का प्रावधान करता है. चर्चा में यह बात उठी कि इस बिल को इतनी जल्दबाजी में और बिना किसी बहस के क्यों लाया गया. यह कदम न्याय के उस बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है, जिसके तहत दोषी साबित होने तक हर व्यक्ति निर्दोष माना जाता है. यह भी कहा गया कि सरकार बिहार चुनाव में 'वोट चोरी' के आरोपों से ध्यान भटकाने के लिए यह कदम उठा रही है.
वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने इसे ध्यान भटकाने की कोशिश से कहीं ज्यादा खतरनाक बताया. उन्होंने कहा कि यह कोई 'डिस्ट्रैक्शन' नहीं, बल्कि देश को एक 'चुनी हुई तानाशाही' (elected autocracy) की तरफ धकेलने का सोचा-समझा प्रयास है. गर्ग ने सवाल उठाया कि जिस सरकार के पास बैसाखियों के सहारे साधारण बहुमत भी नहीं है, वो दो-तिहाई बहुमत से पास होने वाला संविधान संशोधन विधेयक क्यों लाई है. उनके मुताबिक, इसका असली मकसद भ्रष्टाचार से लड़ना नहीं, बल्कि बची-खुची डेमोक्रेसी को खत्म करना और विपक्ष का सफाया करके एक-दलीय शासन थोपना है.
श्रवण गर्ग ने सरकार के भ्रष्टाचार विरोधी दावे को पाखंड बताया. उन्होंने कहा कि 30 में से 12 मुख्यमंत्रियों पर आपराधिक मामले हैं और उनमें से ज्यादातर विपक्ष के हैं. जो भी भ्रष्ट नेता बीजेपी में शामिल हो जाता है, वो 'गंगा में नहाकर पवित्र' हो जाता है. उन्होंने ईडी के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत 5892 मामलों में सिर्फ 0.1% में सज़ा हुई है, जो दिखाता है कि एजेंसियों का इस्तेमाल सिर्फ विपक्ष को परेशान करने के लिए हो रहा है. अखिलेश यादव ने भी अमित शाह का ही उदाहरण दिया, जो खुद कहते हैं कि उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाया गया था.
विश्लेषण में यह बात सामने आई कि 2024 के चुनाव में बहुमत और विश्वसनीयता, दोनों खोने के बाद सरकार सत्ता में बने रहने के लिए अलोकतांत्रिक रास्ते अपना रही है. राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता और 'वोटर अधिकार यात्रा' जैसे आंदोलनों से घबराकर सरकार और ज्यादा प्रतिशोधी हो गई है. गर्ग ने साफ कहा कि सरकार का असली मकसद विपक्ष का सफाया करना है. यह लड़ाई अब सिर्फ एक बिल की नहीं, बल्कि विपक्ष के लिए लोकतंत्र को बचाने की आखिरी लड़ाई बन गई है, क्योंकि सरकार के पास सत्ता में बने रहने के लिए ऐसे कई 'प्लान बी' और 'प्लान सी' हो सकते हैं.
वंतारा पर लगे आरोपों की जांच के लिए एसआईटी
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गुजरात के जामनगर स्थित वंतारा वन्यजीव संरक्षण केंद्र के खिलाफ कथित अवैध वन्यजीव स्थानांतरण, हाथियों की अवैध कैद और अन्य आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का आदेश दिया है.
“लोकमत टाइम्स” के मुताबिक, न्यायाधीश पंकज मिश्रा और प्रसन्न बी. वराले की बेंच दो जनहित याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी, जिनमें वंतारा के खिलाफ व्यापक आरोप लगाए गए थे, साथ ही अधिकारियों और न्यायालयों पर भी संदेह जताया गया था. आम तौर पर, ऐसी याचिकाएं "दिशानिर्देश के तहत खारिज" की जाती हैं, लेकिन कोर्ट ने देखा कि अधिकारियों और न्यायालयों पर भी आक्षेप लगाए गए हैं. इसलिए एसआईटी गठित करने का फैसला किया. एसआईटी को अपनी रिपोर्ट 12 सितंबर तक प्रस्तुत करनी है और 15 सितंबर को याचिकाओं पर पुनः सुनवाई होगी.
हेट क्राइम
दलित युवक अपने गांव आया तो ऊंची जाति की पत्नी के परिवार ने मार डाला
मध्यप्रदेश में ऑनर किलिंग का मामला सामने आया है. “द इंडियन एक्सप्रेस” के अनुसार, 25 वर्षीय दलित युवक ओम प्रकाश बाथम ने इसी साल जनवरी में परिवार के विरोध के बावजूद शिवानी झा से विवाह किया था. शिवानी का परिवार ऊंची जाति से संबंध रखता है. शादी के महीनों बाद वह अपने गांव आया था, जहां पांच दिन पहले उसकी पत्नी के रिश्तेदारों ने हमला कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया था. रविवार को उसकी मृत्यु हो गई. पुलिस के अनुसार, शिवानी के पिता द्वारका प्रसाद झा ने रिश्तेदारों राजेश उर्फ राजू झा, उमा ओझा और संदीप शर्मा के साथ मिलकर इस हमले का नेतृत्व किया. वे ओम प्रकाश के घर में घुस गए, और उसे बाहर घसीटकर डंडों और लोहे की रॉड से बुरी तरह पीटा. इस दौरान बीच-बचाव करने की कोशिश कर रही शिवानी भी चोटिल हो गई.
अडानी समूह के 2.6 लाख करोड़ के कर्ज़ का आधा हिस्सा अब घरेलू संस्थानों पर
अडानी समूह के 2.6 लाख करोड़ रुपये के कुल कर्ज़ का आधा हिस्सा (50%) अब घरेलू बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर है. सिर्फ़ एक साल पहले यह आंकड़ा 40% था. दूसरे शब्दों में कहें तो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSU) और एनबीएफसी के ज़रिए भारतीय करदाता अडानी समूह का ज़्यादा बोझ उठा रहे हैं. जबकि विदेशी निवेशक धीरे-धीरे अपना निवेश कम कर रहे हैं. समूह का कुल कर्ज़ एक साल में 20% बढ़ गया. फिर भी डॉलर बॉन्ड में गिरावट आई और विदेशी बैंकों ने हाथ खींच लिए. इस खाली जगह को भारतीय कर्ज़दाताओं ने भरा. अकेले सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी 13% से बढ़कर 18% हो गई. पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि जब वैश्विक बाज़ार अडानी समूह को लेकर सतर्क हो रहे हैं और अपना जोखिम कम कर रहे हैं. तब भारत का वित्तीय सिस्टम इस साम्राज्य को सहारा देने के लिए पहले से कहीं ज़्यादा दबाव में है. आरबीआई द्वारा ब्याज दरों में कटौती और क्रेडिट रेटिंग अपग्रेड ने घरेलू कर्ज़दाताओं के लिए अडानी समूह में निवेश का रास्ता आसान बना दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने महमूदाबाद के खिलाफ ट्रायल पर रोक लगाई, कहा- लेख और सोशल मीडिया पोस्ट के लिए स्वतंत्र
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अशोका विश्वविद्यालय के संकाय सदस्य अली खान महमूदाबाद के खिलाफ उस मुकदमे पर रोक लगा दी, जो “ऑपरेशन सिंदूर” पर फेसबुक पोस्ट में की गई उनकी टिप्पणियों को लेकर दर्ज किया गया था.
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि महमूदाबाद के खिलाफ आरोप तय नहीं किए जाने चाहिए और उनके खिलाफ दायर आरोपपत्र पर संज्ञान नहीं लिया जाना चाहिए. यह आदेश अदालत ने उस समय पारित किया जब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू ने बेंच को बताया कि महमूदाबाद के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज हैं. उन्होंने कहा, "इनमें से एक मामले में हमने क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल कर दी है, जबकि दूसरे मामले में आरोपपत्र दाखिल किया गया है, क्योंकि वहां अपराध साबित हुए हैं. "
महमूदाबाद की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि यह घटनाक्रम दुर्भाग्यपूर्ण है और इस बात की ओर इशारा किया कि पहले विशेष जांच दल (एसआईटी) को अदालत के सामने जांच रिपोर्ट पेश करनी थी. सिब्बल ने कहा, "आप (प्रतिवादी) इस देश में सिर्फ लोगों का उत्पीड़न कर रहे हैं.”
“बार एंड बेंच” के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि एसआईटी को महमूदाबाद को दोबारा पूछताछ के लिए तलब करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे पहले ही जांच में सम्मिलित हो चुके हैं और उनके स्वामित्व वाले कुछ इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की भी जांच की जा चुकी है. कोर्ट ने एसआईटी को यह आदेश भी दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर जांच पूरी करे और यह भी स्पष्ट कर दिया कि यह जांच केवल महमूदाबाद द्वारा अपलोड की गई दो फ़ेसबुक पोस्ट्स की भाषा और सामग्री तक सीमित रहेगी. आगे यह भी स्पष्ट किया कि महमूदाबाद लेख और सोशल मीडिया पोस्ट लिखने के लिए स्वतंत्र हैं, बशर्ते कि वे अदालत में लंबित मामलों से संबंधित न हों.
हेडमास्टर से भी बात करवाई, लेकिन पुलिस नहीं मानी और बांग्लादेश ले जाकर छोड़ दिया
पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का रहने वाला 19 वर्षीय आमिर शेख, राजस्थान के भीलवाड़ा में काम पर जा रहा था रहे थे. पुलिस ने उसे रोका और पहचान पत्र दिखाने को कहा. उसने आधार कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र की प्रति पुलिस को दिखाई, लेकिन पुलिस ने उससे पूछा कि उसके पास वोटर आईडी क्यों नहीं है और उस पर "बांग्लादेशी" होने का आरोप लगाया.
आमिर ने बताया कि पुलिस ने उसके परिवार वालों को फोन किया, जिन्होंने कई दस्तावेज दिखाए और यहां तक कि उसके स्कूल के हेडमास्टर से भी पुलिस की बात करवाई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.
जल्द ही अधिकारियों ने उसे कथित तौर पर हवाई जहाज़ से बंगाल ले जाकर बंदूक की नोक पर बांग्लादेश की सीमा पार करवा दी. जब परिवार को इस बारे में पता चला और उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया, तो सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने कहा कि आमिर उसकी हिरासत में है और परिवार चुपचाप जाकर उसे ले आए. अनंत गुप्ता ने अपनी रिपोर्ट में पूरा ब्यौरा दिया है.
वाजपेयी की 100वीं जयंती, समिति में गडकरी नहीं
मोदी सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 100वीं जयंती मनाने के लिए एक "उच्च स्तरीय समिति" का गठन किया है. इस समिति में सिवाय नितिन गडकरी के भाजपा के सभी वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री सदस्य हैं. 23 सदस्यीय समिति में दो पूर्व राष्ट्रपति और एक पूर्व प्रधानमंत्री को भी बतौर सदस्य शामिल किया गया है.
तमिलनाडु सरकार ने हाइड्रोकार्बन कुओं की मंज़ूरी रद्द की
बढ़ते विरोध का सामना करते हुए, तमिलनाडु सरकार ने 24 अगस्त, 2025 को रामनाथपुरम ज़िले में ONGC के 20 तटवर्ती खोजपूर्ण हाइड्रोकार्बन कुओं के लिए दी गई पर्यावरणीय मंज़ूरी को रद्द कर दिया. 11 मार्च को राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) द्वारा जारी की गई यह परियोजना, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के पास 1,403 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई थी. इसमें प्रत्येक कुएं की लागत 33.75 करोड़ रुपये और गहराई 2,000-3,000 मीटर थी. मंत्री थंगम थेन्नारसु के अनुसार, मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के ऐसी परियोजनाओं के ख़िलाफ़ रुख के कारण 2026 के चुनावों के मद्देनज़र यह फ़ैसला वापस लिया गया. डीएमके के सहयोगियों, पीएमके, एएमएमके, किसानों और पर्यावरणविदों ने भूजल जोखिम, आजीविका के ख़तरों और प्रक्रियात्मक ख़ामियों का हवाला देते हुए इसका विरोध किया था. अगर राज्य लाइसेंस के बाद भी यह परियोजना आगे बढ़ती है, तो विरोध प्रदर्शन की आशंका है.
मैसूर दशहरा: लेखिका बानू मुश्ताक़ को बुलाने पर बीजेपी का विरोध कहा- हिंदुओं की भावनाओं से खिलवाड़
भाजपा नेताओं ने कर्नाटक सरकार के उस फ़ैसले का विरोध किया है जिसमें 2025 की अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार विजेता. लेखिका और कार्यकर्ता बानू मुश्ताक़ को मैसूर दशहरा समारोह का उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया गया है. यह समारोह 22 सितंबर से 2 अक्टूबर के बीच होना है. भाजपा नेता और उडुपी के विधायक यशपाल सुवर्णा ने कहा कि सिद्धारमैया सरकार ने एक ऐसे समुदाय की महिला को चुना है जो हिंदू धर्म में विश्वास नहीं करता. उनका इशारा बानू मुश्ताक़ के मुस्लिम होने की तरफ़ था. सुवर्णा ने आरोप लगाया कि ऐसा करके कांग्रेस "हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़" कर रही है. यह विरोध सिर्फ़ एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है. बीजेपी इस मुद्दे का इस्तेमाल कांग्रेस सरकार को 'हिंदू विरोधी' बताने और अपने राजनीतिक आधार को मज़बूत करने के लिए कर रही है. एक विश्व-प्रसिद्ध लेखिका के चयन पर उनकी धार्मिक पहचान को हावी कर विवाद खड़ा किया जा रहा है.
किताब
अरुंधति रॉय : जब भगोड़े की तरह बीता था जीवन
"मदर मैरी कम्स टू मी" में, अरुंधति रॉय 1962 के भारत-चीन युद्ध के बीच अपने माता-पिता के अलगाव के बाद के अपने अराजक शुरुआती जीवन को याद करती हैं. असम से कलकत्ता, फिर ऊटी के एक नम कॉटेज में भागते हुए, उनके परिवार को पुराने कानूनों के तहत बेदखली का सामना करना पड़ा, लेकिन वे जीत गए. उनकी माँ की बीमारियाँ, वित्तीय परेशानियाँ और गुस्सा अस्थिरता पैदा करते थे; रॉय और उनके भाई ने टीबी से संघर्ष किया, और केरल की नदियों और ग्रामीणों में सांत्वना पाई—जिसने "द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स" को प्रेरित किया. उनके शरीर पर पड़े निशान उनकी "जंगली, पिताहीन" जुझारूपन का प्रतीक थे. द गार्डियन में प्रकाशित किताब का एक अंश.
पाठकों से अपील :
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