26/12/2025: लोकतंत्र का जीनोसाइड, केंचुआ की विश्वसनीयता | बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले को लेकर भारत चिंतित | अरावली में अवैध खनन | बिहार का रोपवे | संघ, कम्युनिस्ट, सेवा दल के सौ साल
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल
अर्थशास्त्री परकाला प्रभाकर ने वोटर लिस्ट से नाम हटाने को लोकतंत्र का रक्तहीन नरसंहार बताया.
उन्नाव रेप केस में कुलदीप सेंगर की सजा निलंबित करने पर सवाल
बांग्लादेश में हिंदू युवक की लिंचिंग पर भारत ने जताई गंभीर चिंता, वीजा सेवाएं प्रभावित.
राजस्थान में अवैध खनन के सात हजार मामले, अरावली क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित.
वर्ष 2025 में विदेश नीति के सामने कई चुनौतियां, अमेरिका और रूस के साथ रिश्तों में तनाव.
आईटी कंपनी के सीईओ और सहकर्मियों ने महिला मैनेजर के साथ किया सामूहिक दुष्कर्म.
असम के कार्बी आंगलोंग में जमीन विवाद को लेकर हिंसा और आगजनी
गुजरात के सौ युवा म्यांमार में साइबर गुलाम बने, सरकार से मदद की गुहार.
आरएसएस के सौ साल पूरे, सेवा दल और वामपंथी दल क्यों पिछड़ गए.
रवि जोशी : क्या केंचुआ अब भी भरोसेमंद है?
क्या भारत का चुनाव आयोग अब भी विश्वसनीय है? संक्षेप में उत्तर है—नहीं. भारत निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और अखंडता को खत्म करने की प्रक्रिया तब शुरू हुई, जब मोदी सरकार ने ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकालावधि) अधिनियम, 2023’ विधेयक पेश किया. इस कानून के माध्यम से मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली तीन सदस्यीय चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाकर उनके स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया गया.
यह विधेयक 23 दिसंबर, 2023 को लोकसभा द्वारा पारित किया गया और एक सप्ताह के भीतर राष्ट्रपति ने इसे अपनी स्वीकृति दे दी. यहीं से गिरावट की शुरुआत हुई. आश्चर्य की बात यह है कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, जो इस बहिष्करण आदेश से सीधे प्रभावित थे, उन्होंने इस मामले को तब नहीं उठाया जब इसकी संवैधानिकता को तुरंत चुनौती दी गई थी. इस नई चयन समिति द्वारा नियुक्त पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (फरवरी 2025 में) थे. जैसा कि हमने ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के तर्कों का खंडन करने वाली उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में देखा है, उन्होंने एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संवैधानिक पदाधिकारी के बजाय भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता की तरह व्यवहार किया है.
निर्वाचन आयोग की अनियमितताओं के अधिकांश खुलासे राहुल गांधी द्वारा 7 अगस्त, 28 सितंबर और 5 नवंबर को आयोजित तीन प्रेस कॉन्फ्रेंस और योगेंद्र यादव द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक दो महीने पहले आयोग द्वारा किए गए ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) पर उठाए गए 10 सवालों से हुए हैं. उनके मुख्य तर्कों का संक्षिप्त विवरण यहां दिया गया है.
बेंगलुरु के महादेवपुरा में अनियमितताओं पर चर्चा करते हुए गांधी ने पांच महत्वपूर्ण बिंदु रखे: (1) डुप्लिकेट मतदाताओं के 11,965 मामले; (2) फर्जी पतों के 40,009 मामले; (3) एक ही पते से पंजीकृत बल्क मतदाताओं के 10,452 मामले; (4) 4,132 अमान्य फोटो और अंत में, (5) फॉर्म 6 (जो पहली बार के मतदाताओं के लिए है) के दुरुपयोग के 33,692 मामले, जिसके माध्यम से कई बुजुर्गों—कुछ 90 वर्ष से अधिक आयु के—ने अपना नाम दर्ज कराया. निष्कर्ष यह था कि भाजपा, जो बेंगलुरु सेंट्रल के सात विधानसभा क्षेत्रों में पीछे चल रही थी, महादेवपुरा लोकसभा क्षेत्र में 1,00,570 फर्जी मतदाताओं के कारण जीत गई.
इसी तरह, गांधी ने हरियाणा विधानसभा चुनावों में बड़े पैमाने पर मतदाता धोखाधड़ी का आरोप लगाया और निर्वाचन आयोग पर मतदाता सूची में हेरफेर करने के लिए भाजपा के साथ मिलीभगत करने का आरोप लगाते हुए जवाबदेही की मांग की.
‘एच फाइल्स’ प्रेस कॉन्फ्रेंस के मुख्य आरोप: व्यापक मतदाता धोखाधड़ी : हरियाणा के कुल मतदाताओं का 12.5% — लगभग 25 लाख वोट, यानी हर 8 में से 1 वोट — फर्जी था या उसमें हेरफेर की गई थी. डुप्लिकेट और फर्जी प्रविष्टियां : मतदाता पहचान पत्र में एक ही फोटो का बार-बार इस्तेमाल, एक से अधिक राज्यों में पंजीकरण और फर्जी पहचान के सबूत मिले. यहां तक कि एक वोटर आईडी में कथित तौर पर ब्राज़ीलियाई मॉडल की फोटो का इस्तेमाल किया गया था. चुनावी प्रभाव: रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस आठ सीटें केवल 22,000 वोटों से और कुल मिलाकर 1.18 लाख वोटों के अंतर से हार गई. इससे संकेत मिलता है कि फर्जी वोटों ने परिणामों को पलट दिया होगा. व्यवस्थित हेरफेर: गांधी ने निर्वाचन आयोग पर दोषियों को बचाने का आरोप लगाया और दावा किया कि यह हेरफेर आकस्मिक नहीं, बल्कि व्यवस्थित और जानबूझकर की गई थी. केंद्रीकृत डिजिटल छेड़छाड़: हरियाणा और कर्नाटक के मामले डेटा केंद्रों या सॉफ्टवेयर के माध्यम से मतदाता सूचियों में हेरफेर के उपयोग का संकेत देते हैं.
लक्षित मताधिकार का हनन : कर्नाटक में मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया अल्पसंख्यकों और पिछड़ी जातियों पर केंद्रित थी, जिससे जाति-आधारित मतदाता दमन की चिंताएं पैदा हुईं.
एक-दूसरे पर आरोप: राज्य के आधार पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ने एक-दूसरे पर हेरफेर के आरोप लगाए हैं.
जांच के घेरे में निर्वाचन आयोग: सभी मामलों में, निर्वाचन आयोग को या तो निष्क्रियता या पारदर्शिता की कमी के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है. आयोग किसी भी आरोप का संतोषजनक उत्तर देने में विफल रहा है, बल्कि इसके बजाय उसने बार-बार यह मांग की कि गांधी हलफनामा) दें या लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में सुझाई गई समय-सीमा के भीतर शिकायतें दर्ज करें.
राजनीतिक कार्यकर्ता और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने बिहार में निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण के पीछे की पारदर्शिता, वैधता और मंशा को चुनौती देते हुए 10 तीखे सवाल उठाए थे. उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया हाशिए पर रहने वाले समुदायों को लक्षित करने वाला एक व्यापक मताधिकार-उन्मूलन अभियान था.
योगेंद्र यादव द्वारा उठाए गए मुख्य सवाल: 1. मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटाए जाने के खिलाफ क्या सुरक्षा उपाय हैं? 2. नए नाम जोड़ने के बजाय नाम हटाने को प्राथमिकता क्यों दी गई? 3. फील्ड सत्यापन का काम निजी एजेंसियों को क्यों दिया गया?
हटाए गए मतदाताओं का जनसांख्यिकीय विवरण क्या है?
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए सहमत हो गया, लेकिन उसने इस अभ्यास पर रोक नहीं लगाई. यादव की याचिका पर, अदालत ने सुझाव दिया कि पुन: सत्यापन के लिए आधार कार्ड और वोटर आईडी दोनों को स्वीकार किया जाए.
मुख्य अंतर: बिहार का मामला निवारक और व्यवस्थित है, जिसमें अपारदर्शी मानदंडों के साथ राज्यव्यापी पुनरीक्षण संशोधन शामिल है. कर्नाटक का मामला प्रतिक्रियात्मक और स्थानीयकृत था, जो विशिष्ट जिलों में पाए गए फर्जी विलोपन फॉर्मों के कारण शुरू हुआ था. बिहार का विवाद कानूनी और प्रक्रियात्मक वैधता पर केंद्रित था, जबकि कर्नाटक का मामला आपराधिक छेड़छाड़ और जातिगत लक्ष्यीकरण पर केंद्रित था.
दोनों मामले क्या उजागर करते हैं: भारत की मतदाता सूची प्रबंधन प्रणाली की कमजोरियां. पारदर्शी ऑडिट ट्रेल, स्वतंत्र निगरानी और कानूनी सुरक्षा उपायों की आवश्यकता. मतदाता सत्यापन का ‘चुनावी इंजीनियरिंग’ के हथियार के रूप में राजनीतिकरण.
2020 और 2025 के चुनावों के बीच 91 निर्वाचन क्षेत्रों में सत्ता परिवर्तन (पार्टी नियंत्रण में बदलाव) देखा गया. 11 सीटों पर, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी, जो परिणामों पर संभावित प्रभाव का संकेत देती है. इन 91 सीटों में से, भाजपा और जनता दल (यूनाइटेड) सहित उसके सहयोगियों ने 75 सीटें जीतीं, जिससे विपक्ष के गढ़ों में बड़ी बढ़त हासिल हुई. इस बीच, राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने केवल 15 सीटें जीतीं, जबकि 2020 में उसके पास रही 71 सीटों पर उसे भारी नुकसान हुआ.
चुनावी निष्पक्षता पर प्रभाव: ये मामले फॉर्म 7 (नाम हटाने के लिए उपयोग किया जाने वाला), डुप्लिकेट पहचान सॉफ्टवेयर और अंतर-राज्य समन्वय की मजबूती पर सवाल उठाते हैं. यदि सुधार और पारदर्शिता के उपाय नहीं अपनाए गए, तो निर्वाचन आयोग का राजनीतिकरण सार्वजनिक विश्वास को गंभीर रूप से कमजोर कर देगा.
निर्णायक प्रहार: कर्नाटक सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल के निष्कर्षों ने ‘आलंद मतदाता अनियमितता घोटाले’ में भाजपा विधायक सुभाष गुट्टेदार द्वारा कथित रूप से की गई धोखाधड़ी के चौंकाने वाले विवरण उजागर किए हैं. गुट्टेदार के खिलाफ 12 दिसंबर को बेंगलुरु में चार्जशीट दाखिल की गई थी.
एसआईटी ने पाया कि वास्तविक मतदाताओं की जानकारी के बिना मतदाता सूची से उनके नाम हटाने की कोशिश में निर्वाचन आयोग के ‘नेशनल वोटर्स सर्विस पोर्टल’ की खामियों का इस्तेमाल किया गया था. एसआईटी रिपोर्ट के अनुसार, “किसी भी मोबाइल नंबर और उस पर भेजे गए ओटीपी का उपयोग पोर्टल में खाता बनाने के लिए किया जा सकता था. बाद में लॉग-इन करने के लिए केवल पासवर्ड की आवश्यकता होती थी और दोबारा ओटीपी भेजने की जरूरत नहीं पड़ती थी. भाजपा विधायक ने अपने प्रतिद्वंद्वी को वोट देने वाले संभावित मतदाताओं को लक्षित करने और उनके नाम हटाने के लिए कलबुर्गी में अकरम पाशा द्वारा संचालित एक कॉल-सेंटर जैसी फर्म की सेवाएं लीं.
“विधायक ने पश्चिम बंगाल के बापी आद्या से मोबाइल नंबर और उन पर आने वाले ओटीपी खरीदे, जो ‘ओटीपी बाजार’ नामक वेबसाइट चलाता था. इस वेबसाइट का अमेरिका स्थित ‘एसएमएस एक्टिवेट’ नामक वेबसाइट के साथ गठजोड़ था. यह वेबसाइट रैंडम तरीके से एक मोबाइल नंबर उपलब्ध कराती थी, जिसका उपयोग करके लेनदेन किया जा सकता था, और एक निश्चित कीमत पर उस नंबर पर भेजा गया ओटीपी प्रदान करती थी. यह संदेह है कि इस वेबसाइट ने डिजिटल छद्मवेश, पहचान की चोरी और अन्य साइबर अपराधों में भी दूसरों की मदद की होगी.”
हालांकि, निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि उसने अब पोर्टल पर ई-सत्यापन प्रणाली और ‘डबल ऑथेंटिकेशन’ शुरू कर दिया है, लेकिन यह गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद किया गया—और आयोग ने अभी तक कर्नाटक के जांचकर्ताओं द्वारा मांगी गई महत्वपूर्ण जानकारी साझा नहीं की है.
कुल मिलाकर, ये व्यवस्थित खामियां हमारी चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर संदेह पैदा करती हैं. निर्वाचन आयोग जनता के प्रति पारदर्शी और जवाबदेह होने से इनकार कर रहा है, जिससे वह मतदाताओं की नज़र में संदिग्ध बन गया है.
केबिनेट सचिवालय में संयुक्त सचिव के पद से सेवानिवृत्त रवि जोशी का यह लेख “द वायर” में प्रकाशित हुआ है
हरकारा डीपडाइव
परकाला प्रभाकर: लोकतंत्र का रक्तहीन नरसंहार
क्या भारत में सरकार अब यह तय कर रही है कि कौन मतदाता रहेगा और कौन नहीं? हरकारा डीप डाइव के नवीनतम एपिसोड में अर्थशास्त्री और नीति विशेषज्ञ डॉ. परकाला प्रभाकर ने ‘सोशल इम्पैक्ट रजिस्ट्री’ (एसआईआर) और वोटर लिस्ट से बड़े पैमाने पर हटाए जा रहे नामों को लेकर एक डरावनी तस्वीर पेश की है.
डॉ. प्रभाकर इसे “ब्लडलेस पॉलिटिकल जेनोसाइड” (रक्तहीन राजनीतिक नरसंहार) करार देते हैं. उनका तर्क है कि जब किसी नागरिक से उसका वोट देने का अधिकार छीन लिया जाता है, तो वह देश में मौजूद होते हुए भी राजनीतिक रूप से ‘अदृश्य’ हो जाता है. उनका कहना है कि आज़ादी के बाद भारत का सिद्धांत यह था कि जो भी सीमाओं के भीतर रहता है, वह मतदाता है. लेकिन अब चुपचाप इसे बदलकर जाति, धर्म और पहचान के आधार पर तय किया जा रहा है कि कौन ‘हमारा’ है और कौन नहीं.
बातचीत में आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि बिहार में SIR और वोटर लिस्ट की गड़बड़ियों ने लगभग 75 सीटों के नतीजों को प्रभावित किया. उत्तर प्रदेश में करीब 3 करोड़, तमिलनाडु में 97 लाख और केरल में 21 लाख लोगों के नाम ख़तरे में हैं.
डॉ. प्रभाकर ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर भी तीखे सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि “डिजिटल इंडिया” के दौर में आयोग को अंतिम मतदान प्रतिशत जारी करने में 11 दिन क्यों लगे? और शुरुआती आंकड़ों व अंतिम आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर (कहीं-कहीं 10-12%) क्यों आया? उन्होंने अफ़सोस जताया कि आज चुनाव आयोग निष्पक्ष संस्था के बजाय सत्ताधारी दल के एक ‘मोर्चे’ की तरह काम कर रहा है.
सबसे महत्वपूर्ण बात जो इस चर्चा से निकली, वह यह कि लोकतंत्र को बचाने के लिए अब राजनीतिक दलों के भरोसे नहीं बैठा जा सकता. डॉ. प्रभाकर का मानना है कि ज़्यादातर विपक्षी पार्टियां ख़ुद आंतरिक रूप से अलोकतांत्रिक हैं. इसलिए, किसान आंदोलन या सीएए-एनआरसी विरोध प्रदर्शनों की तर्ज़ पर सिविल सोसाइटी और आम नागरिकों को ही अब अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरना होगा. यह लड़ाई सिर्फ़ एक चुनाव की नहीं, बल्कि रिपब्लिक के भविष्य की है.
बलात्कारी कुलदीप सिंह सेंगर की सजा का निलंबन कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण
दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा उन्नाव बलात्कार मामले में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबित करने का आदेश कानूनी और नैतिक रूप से विवादित है. न्यायालय ने ‘लोक सेवक’ शब्द की संकीर्ण व्याख्या करते हुए अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज किया है.
अदालत का तर्क है कि एक मौजूदा विधायक आईपीसी की धारा 21 के तहत “लोक सेवक” नहीं है. इस आधार पर कोर्ट ने पोक्सो अधिनियम की धारा 5(सी) और आईपीसी की धारा 376(2) को लागू करने से इनकार कर दिया, जो लोक सेवक द्वारा किए गए बलात्कार को ‘गंभीर श्रेणी’ का अपराध मानती हैं. परिणामस्वरूप, सेंगर को मिली ‘प्राकृतिक जीवन तक कारावास’ की सजा को निलंबित कर दिया गया.
“लाइव लॉ” में मनु सेबेस्टियन ने लिखा है कि यह व्याख्या तकनीकी रूप से सही लग सकती है, लेकिन यह बुनियादी न्याय के सिद्धांतों को नजरअंदाज करती है. यदि धारा 5(सी) को हटा भी दिया जाए, तब भी सेंगर पोक्सो की धारा 4 के तहत नाबालिग के साथ मर्मभेदी यौन हमले का दोषी है, जो स्वयं आजीवन कारावास से दंडनीय है.
मामले की असाधारण पृष्ठभूमि 2017 का यह मामला कोई सामान्य मुकदमा नहीं था. पीड़िता को न्याय के लिए मुख्यमंत्री आवास के बाहर आत्मदाह जैसा अतिवादी कदम उठाना पड़ा था. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी टिप्पणी की थी कि सरकारी मशीनरी और अधिकारी सीधे तौर पर सेंगर के प्रभाव में थे.
इस केस में सत्ता के दुरुपयोग का स्पष्ट पैटर्न दिखा. पीड़िता के पिता को संदिग्ध परिस्थितियों में जेल भेजा गया, जहां पुलिस हिरासत में उनकी मृत्यु हो गई. साक्ष्यों को प्रभावित करने के लिए पीड़िता के परिवार को निरंतर निशाना बनाया गया. दिसंबर 2019 में ट्रायल कोर्ट ने स्पष्ट रूप से दर्ज किया था कि पीड़िता को चुप कराने के लिए उसके परिवार को व्यवस्थित रूप से प्रताड़ित किया गया. ऐसी संवेदनशील पृष्ठभूमि को दरकिनार कर सजा निलंबित करना न्यायिक विवेक पर प्रश्न खड़ा करता है.
निश्चित अवधि की सजा में यह सामान्य हो सकता है, लेकिन आजीवन कारावास के मामलों में यह एक दुर्लभ अपवाद होना चाहिए. छोटूलाल यादव बनाम झारखंड राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सजा तभी निलंबित होनी चाहिए, जब ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई ‘अत्यंत गंभीर या स्पष्ट त्रुटि’ हो.
सेंगर के मामले में, केवल धारा 5(सी) की तकनीकी अनुपयुक्तता पूर्ण बरी होने का आधार नहीं बन सकती. उच्च न्यायालय ने यह विचार नहीं किया कि धारा 5(सी) हटने के बाद भी धारा 4 के तहत दोषसिद्धि पूरी तरह बरकरार रहती है.
अदालत ने इस तर्क को भी महत्व नहीं दिया कि आरोपी के बाहर आने से पीड़िता और उसके परिवार को खतरा हो सकता है. रिकॉर्ड में डराने-धमकाने और हिंसा का लंबा इतिहास दर्ज है. कोर्ट ने इसे यह कहकर खारिज कर दिया कि किसी को इस धारणा पर जेल में नहीं रखा जा सकता कि पुलिस अपना काम ठीक से नहीं करेगी.
कुलमिलाकर, दिल्ली उच्च न्यायालय का यह आदेश एक ‘अति-तकनीकी’ दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो अपराध की विभीषिका और सत्ता के दुरुपयोग को हाशिए पर धकेलता है. यह निर्णय उन मामलों में न्याय की उम्मीद को कमजोर करता है, जहां आरोपी राजनीतिक रूप से शक्तिशाली हो और पीड़ित पक्ष के दमन का इतिहास रहा हो.
उन्नाव पीडिता बोली, हम डरने वाले नहीं हैं, उन्होंने अभी औरत को दुर्गावतार में नहीं देखा है
इस बीच उन्नाव बलात्कार पीड़िता ने शुक्रवार को कहा कि वह दोषी कुलदीप सिंह सेंगर की आजीवन कारावास की सजा निलंबित होने से डरेगी नहीं और उसे सुप्रीम कोर्ट पर अटूट भरोसा है, जहां वह न्याय के लिए जाने की योजना बना रही है.
“पीटीआई” से बात करते हुए पीड़िता ने कहा कि वह दिल्ली उच्च न्यायालय के बाहर यह सवाल उठाने के लिए विरोध प्रदर्शन करने गई थी कि देशभर की महिलाओं को क्या संदेश दिया जा रहा है. उन्होंने कहा, “ये सवाल पूछना मेरा और जनता का अधिकार है. हर जज एक जैसा नहीं होता.”
उन्होंने कहा कि जमानत के आदेश ने उनके परिवार की सुरक्षा और आजीविका को खतरे में डाल दिया है. उन्होंने सवाल किया, “इस आदेश ने मुझे और मेरे जैसी कई महिलाओं को पिंजरे में कैद कर दिया है. यह मेरे परिवार के लिए खतरा है. मेरे पति की नौकरी भी चली गई है. अब हमें क्या करना चाहिए?”
पीड़िता ने कहा कि वह इस आदेश को चुनौती देंगी. उन्होंने कहा, “हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे. मुझे उस पर अटूट भरोसा है. सुप्रीम कोर्ट ने मुझे पहले भी न्याय दिया है और मुझे विश्वास है कि वह दोबारा ऐसा ही करेगा.” यह घोषणा करते हुए कि डर उसे खामोश नहीं कर पाएगा, पीड़िता ने आगे कहा, “उन्होंने सोचा था कि हम चुप रहेंगे और डरे हुए रहेंगे. उन्होंने एक महिला को उसके दुर्गा अवतार में नहीं देखा है. हम डरेंगे नहीं.”
छत्तीसगढ़: ईसाई महिला के दफन का विरोध, परिवार को हिंदू धर्म में ‘पुनर्वापसी’ के लिए मजबूर किया
एजाज कैसर की रिपोर्ट है कि छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के बोरई गांव में एक मृत महिला के शव को दफनाने के मुद्दे पर ग्रामीणों के विरोध के बाद, उसके परिवार को कथित तौर पर हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करने और “पुनर्वापसी” के लिए मजबूर होना पड़ा. यह घटना कांकेर जिले के अंतागढ़ ब्लॉक के आमाबेड़ा गांव में ‘ईसाई दफन’ को लेकर भड़की सांप्रदायिक हिंसा के कुछ ही दिनों बाद सामने आई है.
ग्रामीणों का दावा है कि मृतक महिला पुनिया साहू (65) ने कथित तौर पर ईसाई धर्म अपना लिया था और वह चर्च की प्रार्थनाओं में शामिल होती थी. जब परिवार अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहा था, तब ग्रामीणों ने ईसाई पद्धति से दफन किए जाने का विरोध शुरू कर दिया.
जब परिवार शव को दूसरे कब्रिस्तान ले जाने लगा, तो ग्रामीणों ने फिर से विरोध किया और मांग की कि परिवार हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करे. दफन के लिए खोदी गई जमीन को वापस मिट्टी से भर दिया गया और परिवार ने डेढ़ दिन तक शव की सुरक्षा की.
अंततः जब परिवार हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करने के लिए सहमत हो गया, तब जाकर शव का अंतिम संस्कार करने दिया गया. चूंकि गुरुवार को क्रिसमस का दिन था और क्षेत्र में तनाव व्याप्त था, इसलिए स्थिति को बिगड़ने से रोकने के लिए जिला प्रशासन और पुलिस तुरंत सक्रिय हो गई.
धमतरी जिले के पुलिस अधीक्षक सूरज सिंह परिहार ने ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया, “सभी विवाद सुलझा लिए गए हैं और ‘समाज प्रमुखों’ की सहमति से आज सुबह (शुक्रवार) हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार दफन प्रक्रिया संपन्न हुई.”
दीपू दास लिंचिंग: भारत ने बांग्लादेश में हिंदू युवक की हत्या की निंदा की, ‘गंभीर चिंता का विषय’
भारत ने बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की बर्बर हत्या की कड़े शब्दों में निंदा की है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इसे “गंभीर चिंता का विषय” बताते हुए अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाने की मांग की है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 30 वर्षीय गारमेंट फैक्ट्री कर्मचारी दीपू दास की पिछले हफ़्ते ढाका से क़रीब 100 किमी दूर मैमनसिंह में भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी. सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक विचलित करने वाले वीडियो में भीड़ को इस बर्बरता का जश्न मनाते देखा गया, जहाँ दीपू के नग्न शव को पेड़ से बांधकर जला दिया गया था.
मीडिया ब्रीफ़िंग के दौरान रणधीर जायसवाल ने कहा, “बांग्लादेश में हिंदुओं, ईसाइयों और बौद्धों सहित अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ लगातार हो रही हिंसा गंभीर चिंता का विषय है. हम मैमनसिंह में हिंदू युवक की नृशंस हत्या की निंदा करते हैं.” उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि स्वतंत्र स्रोतों ने मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा की 2,900 से अधिक घटनाओं का दस्तावेज़ीकरण किया है. भारत ने स्पष्ट किया कि इन घटनाओं को मीडिया की अतिशयोक्ति या महज़ राजनीतिक हिंसा बताकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता.
बांग्लादेश में फ़रवरी में होने वाले चुनावों के संदर्भ में भारत ने कहा कि वह वहां शांति, स्थिरता और निष्पक्ष व समावेशी चुनावों का पक्षधर है. इसी बीच, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के अध्यक्ष और ख़ालिदा जिया के बेटे तारिक़ रहमान 17 साल के निर्वासन के बाद गुरुवार को ढाका लौट आए हैं, जहाँ हज़ारों समर्थकों ने उनका स्वागत किया.
ग़ौरतलब है कि छात्र नेता शरीफ़ उस्मान हादी की मौत के बाद बांग्लादेश में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी और इसी दौरान ईशनिंदा के आरोप में दीपू दास की हत्या की गई. इस घटना के बाद दोनों देशों के राजनयिक संबंधों में तनाव बढ़ा है. सुरक्षा कारणों से भारत ने चटगांव में अपनी वीज़ा सेवाएं अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दी हैं, जिसके जवाब में बांग्लादेश उच्च आयोग ने भी नई दिल्ली में अपनी कांसुलर और वीज़ा सेवाएं “अस्थायी रूप से” रोक दी हैं.

राजस्थान में 7 वर्षों में अवैध खनन की 7,000 से अधिक एफआईआर; सिर्फ अरावली जिलों में 4,000 से ज्यादा मामले
पिछले सात वर्षों में राजस्थान में अवैध खनन, परिवहन, भंडारण आदि के संबंध में कुल 7,173 एफआईआर दर्ज की गई हैं, जिनमें से अकेले अरावली जिलों में 4,181 एफआईआर दर्ज हुई हैं. “द इंडियन एक्सप्रेस” में हमज़ा खान की रिपोर्ट है कि राज्य में अवैध खनन के 71,322 मामले दर्ज किए गए—इनमें बड़े और छोटे दोनों तरह के उल्लंघन शामिल हैं, जिनमें से कई का निपटारा पुलिस केस के बजाय चालान के माध्यम से किया जाता है. पिछले सात वर्षों के इन कुल मामलों में से 40,175 मामले अकेले अरावली जिलों से सामने आए हैं.
कांग्रेस के पांच साल के शासन और भाजपा सरकार के दो साल के आंकड़ों की तुलना करते हुए, भाजपा प्रवक्ता और पूर्व विधायक रामलाल शर्मा ने कहा, “राजस्थान सरकार और मुख्यमंत्री का स्पष्ट इरादा है कि अरावली में एक भी पत्थर को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा.” उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ने “पिछले दो वर्षों में अवैध खनन और खनन माफियाओं के खिलाफ” निर्णायक कार्रवाई की है.
शर्मा द्वारा साझा किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 15 दिसंबर 2018 से 14 दिसंबर 2023 के बीच अरावली जिलों में अवैध खनन के 29,209 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि शर्मा सरकार के पहले दो वर्षों (15 दिसंबर 2023 से 15 दिसंबर 2025 तक) में यह संख्या 10,966 रही. राजस्थान में अरावली बेल्ट के अंतर्गत 20 जिले आते हैं.
जहां कांग्रेस शासन के दौरान अरावली जिलों में अवैध खनन गतिविधियों के लिए 3,179 एफआईआर दर्ज की गई थीं, वहीं भाजपा सरकार के दो वर्षों में 1,002 एफआईआर दर्ज की गई हैं.
दर्ज मामलों और दर्ज एफआईआर के बीच अंतर पर खान एवं पेट्रोलियम विभाग के प्रमुख सचिव टी. रविकांत ने कहा, “दर्ज मामलों का अर्थ है वे सभी मामले जिनमें खनन विभाग ने नोटिस देकर, जुर्माना लगाकर आदि स्वयं कार्रवाई की—जो कि सजा का ही एक रूप है—जबकि एफआईआर केवल वे मामले हैं जो पुलिस स्टेशन में दर्ज किए गए हैं.” उन्होंने बताया कि दर्ज मामलों में अवैध खनन, परिवहन और भंडारण शामिल हैं, जिनमें से अधिकांश जुर्माना देकर सुलझने योग्य होते हैं, और हमला या चोरी होने की स्थिति में ही ये एफआईआर में बदलते हैं. उन्होंने कहा, “इसीलिए एफआईआर की संख्या कम है.”
इस साल की शुरुआत में विपक्ष के नेता टीकाराम जूली द्वारा विधानसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में सरकार ने कहा था कि 2024 में “खनन माफिया” द्वारा 311 अधिकारियों और कर्मचारियों पर 93 हमले किए गए थे.
कुल मिलाकर, पिछले सात वर्षों में राज्य में 637.16 करोड़ रुपये का जुर्माना वसूला गया है. इसमें से कांग्रेस शासन के दौरान अरावली जिलों से 231.75 करोड़ रुपये और वर्तमान भाजपा सरकार के तहत 136.78 करोड़ रुपये वसूले गए हैं. पिछले सात वर्षों में राज्य भर में अवैध खनन के लिए 3,736 लोगों को गिरफ्तार किया गया है; इसमें से अशोक गहलोत सरकार के दौरान अरावली जिलों से 1,415 और शर्मा सरकार के दौरान 300 लोग गिरफ्तार किए गए.
इसके अतिरिक्त, पिछले सात वर्षों में राज्य भर से 70,399 वाहन और मशीनें आदि जब्त की गई हैं. इनमें से कांग्रेस शासन के दौरान अरावली जिलों से 29,138 और भाजपा सरकार के तहत 10,616 वाहन जब्त किए गए.
पिछले कुछ दशकों से वैध और अवैध खनन तथा अन्य विकास गतिविधियों के कारण अरावली की पहाड़ियां पहले से ही भारी दबाव में हैं. ऐसे में, अरावली की नई परिभाषा ने राजस्थान और उसके बाहर व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है.
पर्यावरण सचिव के तहत एक समिति द्वारा प्रस्तावित और 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुमोदित नई परिभाषा के अनुसार—कोई भी भू-आकृति जो स्थानीय धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक की ऊंचाई पर है, उसे उसकी ढलानों और आस-पास की भूमि के साथ अरावली पहाड़ियों का हिस्सा माना जाएगा. इससे यह डर पैदा हो गया है कि यह पहाड़ियों को खनन के लिए खोल देगा, हालांकि 20 नवंबर के आदेश के अनुसार, पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि विस्तृत अध्ययन होने तक किसी भी नए खनन पट्टे की अनुमति नहीं दी जाएगी.
विश्लेषण
भारतीय विदेश नीति के लिए फीकी पड़ती उम्मीदों का वर्ष
“द हिंदू” में सुहासिनी हैदर ने लिखा है कि वर्ष 2025 की शुरुआत भारतीय विदेश नीति के लिए काफी उम्मीदों भरी रही. साल 2024, जो राष्ट्रीय चुनावों और राजनीतिक पुनर्संयोजन के नाम रहा, उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय यात्राओं और बहुपक्षीय जुड़ाव के व्यस्त कैलेंडर के साथ सक्रिय कूटनीति फिर से शुरू करने की उम्मीद थी. अमेरिका के साथ संबंधों के ट्रम्प प्रशासन के दूसरे कार्यकाल में उसी तरह पुनर्गठित होने की उम्मीद थी, जैसा कि डोनाल्ड ट्रम्प के पहले कार्यकाल में रहा था. अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ जैसे भागीदारों के साथ लंबे समय से चल रही द्विपक्षीय व्यापार समझौते की वार्ताओं के भी सफल होने की संभावना दिख रही थी, जिन्हें साल के अंत तक पूरा करने की प्रतिबद्धता जताई गई थी.
भू-राजनीतिक विभाजन के दूसरी ओर, वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर वर्षों के गतिरोध के बाद चीन के साथ एक नया जुड़ाव आकार लेता हुआ दिखाई दे रहा था, विशेष रूप से मोदी की चीन यात्रा के बाद. रूस के साथ आर्थिक संबंध भी अपने चरम पर थे: रूस से भारत का तेल आयात बढ़कर 52 अरब डॉलर तक पहुँच गया था, और अमेरिका तथा यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों का दबाव भी कम हो गया था. क्षेत्रीय स्तर पर, सरकार ने पड़ोसी देशों के साथ बिगड़े संबंधों को सुधारने का प्रयास किया, जिसके तहत दिसंबर 2024 में विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने बांग्लादेश में यूनुस प्रशासन से मुलाकात की, विदेश मंत्री एस. जयशंकर को पाकिस्तान भेजा गया (अक्टूबर 2024), दुबई में तालिबान नेतृत्व के साथ चर्चा की गई (जनवरी 2025), और नेपाल, श्रीलंका एवं अन्य देशों की क्षेत्रीय यात्राओं की तैयारी की गई. बालाकोट एयरस्ट्राइक और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के पांच साल बाद, नई दिल्ली अपनी सुरक्षा स्थिति और पाकिस्तान से होने वाले आतंकवाद के प्रति अपनी निवारक क्षमता पर भी आत्मविश्वास प्रदर्शित कर रही थी.
सुहासिनी लिखती हैं कि 2025 की शुरुआत भारत के लिए बहुत उम्मीदों भरी थी, लेकिन साल बीतते-बीतते कई रणनीतिक और आर्थिक मोर्चों पर चुनौतियां खड़ी हो गईं. अमेरिका के साथ संबंधों में सुधार की उम्मीद थी, लेकिन ट्रम्प प्रशासन द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ (50% तक) ने भारतीय निर्यातकों, विशेषकर एमएसएमई क्षेत्र को संकट में डाल दिया. भारत की ‘निर्यात-आधारित विकास’ की रणनीति को वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं के कारण धक्का लगा. ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) भी समय पर पूरे नहीं हो पाए.
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से मिलने वाला सस्ता कच्चा तेल भारत की ऊर्जा जरूरतों का आधार था. लेकिन 2025 में नए प्रतिबंधों और अमेरिकी दबाव के कारण भारत को रूस से तेल आयात कम करने या बाहर निकलने पर विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा. इससे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और किफायती ऊर्जा की उपलब्धता पर सवाल खड़े हो गए. वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों की वापसी के बाद चीन के साथ संबंधों में सुधार की उम्मीद थी. हालांकि, विश्लेषण बताता है कि चीन ने इस प्रक्रिया का उपयोग अमेरिका के साथ भारत के जुड़ाव को कम करने के लिए किया. सीमा पर शांति के बावजूद रणनीतिक अविश्वास अभी भी बना हुआ है.
‘नेबरहुड फर्स्ट’ (पड़ोसी पहले) की नीति के तहत बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका के साथ संबंधों को सुधारने की कोशिश की गई. लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता और देशों के आंतरिक राजनीतिक बदलावों ने भारत को ‘एजेंडा-सेटिंग’ के बजाय ‘प्रतिक्रियात्मक कूटनीति’ तक सीमित कर दिया.
हैदर का कहना है कि भारत ने शिखर सम्मेलनों की चमक-धमक और प्रतीकात्मक संकेतों पर बहुत अधिक भरोसा किया. वैश्विक राजनीति अब तेजी से ‘लेन-देन’ वाली होती जा रही है. केवल प्रतीकों के बजाय अब भारत को आर्थिक लचीलेपन, ऊर्जा विविधीकरण और पड़ोसियों के साथ वास्तविक विश्वास बहाली पर ध्यान देने की आवश्यकता है.
कुलमिलाकर, वर्ष 2025 भारतीय विदेश नीति के लिए एक सबक की तरह रहा है, जहां कूटनीतिक महत्वाकांक्षाओं और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई स्पष्ट रूप से दिखाई दी. भारत को अब अपनी नीतियों में और अधिक संस्थागत गहराई लाने की ज़रूरत है.
उदयपुर रेप केस: महिला सहकर्मी ने ही दिया था घर छोड़ने का प्रस्ताव, सीईओ और पति के साथ मिलकर दिया वारदात को अंजाम
उदयपुर में एक निजी आईटी कंपनी की महिला मैनेजर के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म मामले में चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं. ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, पीड़िता ने आरोप लगाया है कि पार्टी के बाद उसकी ही महिला सहकर्मी ने उसे घर छोड़ने की पेशकश की थी, जिसके बाद वह कार में सवार हुई जहाँ कंपनी का सीईओ और महिला सहकर्मी का पति पहले से मौजूद थे.
यह घटना पिछले शनिवार (20 दिसंबर) की रात की है. पुलिस ने इस मामले में आईटी फर्म के सीईओ, जो पार्टी का मेज़बान था, उसी कंपनी की एक महिला कर्मचारी और उसके पति को गिरफ़्तार कर लिया है.
पीड़िता की शिकायत के हवाले से न्यूज़ एजेंसी पीटीआई ने बताया कि उदयपुर स्थित इस आईटी फर्म के सीईओ ने एक होटल में जन्मदिन और साल के अंत की पार्टी आयोजित की थी. जब अन्य मेहमान चले गए, तो आरोपी महिला कर्मचारी ने पीड़िता को घर छोड़ने की बात कही. पीड़िता का आरोप है कि रास्ते में आरोपियों ने एक दुकान से सिगरेट जैसी कोई चीज़ ख़रीदी और उसे दी, जिसके सेवन के बाद वह बेहोश हो गई. वहीं, ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने पहले रिपोर्ट किया था कि आरोपियों ने ज़बरदस्ती उसे शराब पिलाई थी.
होश में आने पर पीड़िता ने ख़ुद को एक चलती कार में पाया, जहाँ तीनों आरोपियों ने उसके साथ कथित तौर पर मारपीट और यौन शोषण किया. पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा है कि उसे पूरी रात कार में बंधक बनाकर रखा गया और अगली सुबह उसके घर के पास छोड़ दिया गया. घटना के बाद गंभीर दर्द और कमज़ोरी महसूस होने पर उसने एक निजी अस्पताल में मेडिकल जांच कराई, जिसमें यौन उत्पीडन की पुष्टि हुई.
उदयपुर पुलिस अधीक्षक योगेश गोयल के अनुसार, तीनों आरोपियों को गुरुवार को गिरफ़्तार कर लिया गया और अदालत में पेश करने के बाद उन्हें चार दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है. ग़ौरतलब है कि ‘इंडिया टुडे’ की रिपोर्ट के मुताबिक़, जिस आईटी फर्म के सीईओ पर यह आरोप लगा है, उसने महिला-मित्रता (woman-friendliness) के मानकों पर ख़ुद को 5 में से 4.7 की रेटिंग दी हुई है.
असम का कार्बी आंगलोंग क्यों सुलग उठा: पुलिस तमाशबीन बनी रही और घर जलते रहे
असम के कार्बी आंगलोंग ज़िले में आदिवासी समूहों और ग़ैर-आदिवासी निवासियों के बीच भूमि विवाद को लेकर भड़की हिंसा ने उग्र रूप ले लिया है. स्क्रोल के लिए रोकिबुज़ ज़मान की रिपोर्ट के मुताबिक़, 24 दिसंबर की सुबह खेरोनी बाज़ार में भीड़ ने ग़ैर-आदिवासियों के घरों और दुकानों को आग के हवाले कर दिया, जबकि आरोप है कि पुलिस वहां मूकदर्शक बनी खड़ी रही.
58 वर्षीय कल्पना डे, जिनका घर और दुकान जला दिया गया, ने बताया कि भीड़ से बचने के लिए उन्हें झाड़ियों में छिपना पड़ा और कई लोगों को जान बचाने के लिए कोपिली नदी में कूदना पड़ा. यह हिंसा 22 दिसंबर को तब शुरू हुई जब पुलिस ने कार्बी आदिवासियों के एक विरोध प्रदर्शन को तितर-बितर किया. आदिवासी समूह चरागाहों पर ग़ैर-आदिवासी निवासियों (मुख्य रूप से बिहारी समुदाय) के कथित अवैध क़ब्ज़े का विरोध कर रहे थे.
अगले दो दिनों में, गुस्साए आदिवासी निवासियों ने भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के पुश्तैनी घर को जला दिया, दुकानों में लूटपाट की और अंततः खेरोनी बाज़ार में आगज़नी की. स्थानीय निवासियों का आरोप है कि पुलिस थाने से महज 600 मीटर की दूरी पर आगज़नी होती रही, लेकिन सैकड़ों पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद भीड़ को नहीं रोका गया. इस हिंसा में दो लोगों की मौत हुई है- एक सूरज डे जो आग में फंस गए थे और दूसरे लाइनस फांगचो जिनकी मौत पुलिस की गोलीबारी में हुई.
कार्बी समुदाय के नेताओं का कहना है कि यह हिंसा छठी अनुसूची क्षेत्र (Sixth Schedule area) में ग़ैर-आदिवासी निवासियों की बढ़ती संख्या और ज़मीन पर उनके दावों के ख़िलाफ़ उपजे ग़ुस्से का नतीजा है. पूर्व मंत्री होलीराम तेरांग ने ‘स्क्रॉल’ को बताया कि प्रशासन का रवैया उदासीन रहा और हिंदुत्ववादी ताक़तों की खुली मौजूदगी ने स्थिति को और बिगाड़ दिया.
विवाद की जड़ ज़मीन है. फ़रवरी 2024 में कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद ने चरागाह भूमि से 2,000 से अधिक परिवारों (ज़्यादातर बिहारी) को बेदख़ल करने का आदेश दिया था, जिसे गौहाटी उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी. प्रदर्शनकारी मांग कर रहे थे कि अवैध निवासियों को तुरंत हटाया जाए. कार्बी प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि भाजपा सरकार ‘वोट बैंक’ की राजनीति के कारण हिंदू ग़ैर-आदिवासियों को संरक्षण दे रही है.
‘नरक जैसे हालात’: गुजरात के 100 से अधिक युवा म्यांमार में फंसे, साइबर अपराध करने को मजबूर
विदेश में अच्छी नौकरी का सपना लेकर निकले गुजरात के 100 से ज़्यादा युवा म्यांमार में एक अंतरराष्ट्रीय साइबर-स्कैम रैकेट के जाल में फंस गए हैं. ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ में दिलीप सिंह क्षत्रिय की रिपोर्ट के अनुसार, वडोदरा ज़िले के सावली और देसर तालुका के कई युवाओं को डेटा-एंट्री की नौकरी और आकर्षक वेतन का लालच देकर एजेंटों ने विदेश भेजा था. लेकिन वहां पहुँचते ही उन्हें बंधक बना लिया गया और साइबर अपराधों में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया.
फंसे हुए युवाओं का कहना है कि उन्हें धमकियां देकर रोज़ाना 14 से 18 घंटे काम कराया जाता है. विरोध करने पर उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं. यह मामला तब सामने आया जब एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें डरे हुए युवा भारत सरकार और विदेश मंत्रालय से मदद की गुहार लगा रहे हैं.
वायरल ऑडियो संदेश में संधासाल गाँव के कुंजन शाह ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा, “हमें नौकरी के नाम पर यहाँ लाया गया था, लेकिन हमसे अवैध काम करवाया जा रहा है. हम किसी तरह वहां से भाग निकले हैं, लेकिन हमारे पास न पैसे हैं, न फ़ोन में बैलेंस और न ही कोई सहारा.”
पीड़ितों का दावा है कि वे पिछले 20 दिनों से म्यांमार के माया वाड़ी इलाक़े में एक स्थानीय एनजीओ के सेफ़ हाउस में छिपे हुए हैं और ‘नरक जैसी स्थितियों’ का सामना कर रहे हैं. हाल ही में अहमदाबाद क्राइम ब्रांच द्वारा म्यांमार स्थित एक साइबर क्राइम रैकेट का भंडाफोड़ किए जाने की ख़बर के बाद इन युवाओं में डर और बढ़ गया, जिसके बाद उन्होंने उस कंपनी से भागने का फ़ैसला किया.
बिहार के रोहतास में निर्माणाधीन रोपवे ढहा, नए साल पर होने वाला था उद्घाटन
बिहार के रोहतास ज़िले में एक बड़ा हादसा होते-होते टला जब शुक्रवार को वहां निर्माणाधीन रोपवे गिर गया. ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक़, यह रोपवे पर्यटकों के लिए नए साल के दिन, यानी 1 जनवरी 2026 को खोला जाना था. हादसे में रोपवे के पिलर और ट्रॉली क्षतिग्रस्त हो गए हैं, हालाँकि, किसी के हताहत होने की ख़बर नहीं है.
यह रोपवे रोहतास क़िले, जिसे रोहतासगढ़ भी कहा जाता है, आने वाले पर्यटकों की सुविधा के लिए बनाया जा रहा था. यह क़िला समुद्र तल से लगभग 1,400 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है और नए साल पर यहाँ हज़ारों पर्यटक और श्रद्धालु आते हैं. 1,324 मीटर लंबे इस रोपवे का निर्माण 12.35 करोड़ रुपये की लागत से कोलकाता स्थित कंपनी आरआरपीएल (RRPL) द्वारा किया जा रहा था.
परियोजना अपने अंतिम चरण में थी और ट्रायल रन होने ही वाला था कि यह हादसा हो गया. इसमें पांच टावर बनाए जाने थे और प्रत्येक ट्रॉली में चार यात्रियों के बैठने की क्षमता थी.
सरकारी दबाव के बाद मीरवाइज़ ने ‘X’ बायो से हटाया ‘हुर्रियत चेयरमैन’ का टाइटल
कश्मीर के मुख्य मौलवी और अलगाववादी नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने अधिकारियों की तरफ़ से मिली “आधिकारिक चेतावनी” के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर अपने बायो से ‘हुर्रियत चेयरमैन’ का पदनाम हटा दिया है. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, मीरवाइज़ ने कहा कि उन पर यह बदलाव करने के लिए दबाव डाला जा रहा था, क्योंकि हुर्रियत कांफ्रेंस के सभी घटकों को यूएपीए (UAPA) के तहत प्रतिबंधित कर दिया गया है.
मीरवाइज़ ने एक पोस्ट में कहा, “अधिकारियों ने चेतावनी दी थी कि अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो मेरा हैंडल हटा दिया जाएगा. ऐसे समय में जब संचार के रास्ते सीमित हैं, यह प्लेटफॉर्म लोगों तक अपनी बात पहुँचाने का एक ज़रिया है.” मीरवाइज़ को शुक्रवार को जामा मस्जिद में नमाज़ अदा करने की अनुमति भी नहीं दी गई.
इस फ़ैसले पर घाटी में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं. पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि हुर्रियत एक विचार है जिसे क़ैद नहीं किया जा सकता. वहीं, पीडीपी विधायक वहीद-उर-रहमान पारा ने इसे पैगंबर मुहम्मद द्वारा की गई ‘हुदैबिया की संधि’ जैसा बताया और कहा कि यह शांति के लिए उठाया गया क़दम है, न कि कमज़ोरी. हालाँकि, पीपुल्स कांफ्रेंस के सज्जाद लोन ने मीरवाइज़ की आलोचना करते हुए कहा कि प्रोटोकॉल और सुरक्षा के बदले किए गए “समर्पण” की तुलना हुदैबिया की संधि से नहीं की जानी चाहिए.
भारत का डेटा संकट: तुलनात्मकता ख़त्म, प्रकाशन चयनात्मक और जनगणना में देरी से कमज़ोर सर्वे
भारत में प्रमुख डेटा सेट जारी तो हो रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इनकी गुणवत्ता, निरंतरता और पारदर्शिता को लेकर गहरी समस्याएं बनी हुई हैं. ‘इंडियास्पेंड’ के लिए प्राची साल्वे की विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि कैसे डेटा संग्रह के तरीक़ों में बदलाव, जनगणना में देरी और चयनात्मक प्रकाशन नीति-निर्माण को प्रभावित कर रहे हैं.
रिपोर्ट में पूर्व कार्यवाहक एनएससी (NSC) अध्यक्ष पी.सी. मोहनन और अर्थशास्त्री अरुण कुमार जैसे विशेषज्ञों के हवाले से बताया गया है कि हाल ही में जारी घरेलू उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण (HCES 2022-23) में कार्यप्रणाली बदल दी गई है. हालाँकि सटीकता के लिए बदलाव ज़रूरी थे, लेकिन पुराने डेटा के साथ तालमेल बिठाने के लिए कोई ‘ब्रिज सर्वे’ नहीं किया गया. इसका नतीजा यह है कि अब ग़रीबी और उपभोग के रुझानों की तुलना पिछले वर्षों से करना मुश्किल हो गया है.
2011 के बाद से जनगणना न होने का असर बहुत गहरा है. जीडीपी (GDP) और सीपीआई (CPI) जैसे सभी बड़े सर्वेक्षण 2011 की जनसंख्या के आधार पर ही चल रहे हैं, जबकि ज़मीनी हक़ीक़त (शहरीकरण, प्रवासन) बदल चुकी है. राजनीतिक अर्थशास्त्री परकाला प्रभाकर कहते हैं कि “तेज़ी से बदलते दौर में पुराने डेटा का इस्तेमाल करने का मतलब है कि हमारे अनुमान वास्तविकता से दूर होते जा रहे हैं.”
विशेषज्ञों ने डेटा को रोकने या देरी से जारी करने की प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई है, जैसे 2019 चुनाव से पहले रोज़गार के आंकड़े रोकना. पी.सी. मोहनन का कहना है कि अब यह सिर्फ़ आंकड़ों की बात नहीं है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि “कौन तय करता है कि क्या देखा जाएगा और कब.” एक स्वतंत्र और मज़बूत सांख्यिकीय आयोग की बहाली ही इसका एकमात्र समाधान नज़र आता है.
आरएसएस, कांग्रेस सेवा दल और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी
सत्य सागर: वाम, दक्षिण और मध्य, सौ साल पुराने तीन भारतीय संगठनों के सफरनामे
जैसे-जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) 1925 में अपनी स्थापना के बाद से एक सदी पूरी होने का जश्न मना रहा है, आज इसका वैचारिक प्रभाव लगभग सर्वव्यापी है, और इसकी संरक्षित पार्टी, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर हावी है. इसके एकदम विपरीत, दो अन्य शताब्दी पुराने संगठन—कांग्रेस सेवा दल (सीएसडी), जो 1924 में थोड़ा पहले स्थापित हुआ था, और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), जिसका जन्म दिसंबर 1925 में हुआ—बड़े पैमाने पर राजनीतिक अप्रासंगिकता में फीके पड़ गए हैं.
स्पष्ट सवाल यह है कि वास्तव में क्या हुआ? आरएसएस, जिसे ब्रिटिश औपनिवेशिकों के साथ सहयोग करने के लिए व्यापक रूप से घृणा की जाती थी और स्वतंत्रता के बाद कई बार प्रतिबंधित किया गया था (महात्मा गांधी की हत्या के बाद, आपातकाल के दौरान, और बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद), राष्ट्रीय वर्चस्व बनने के लिए कैसे उभरा, जबकि सीएसडी और सीपीआई, जो राजनीतिक केंद्र और वाम का प्रतिनिधित्व करते थे, अपने प्रारंभिक फ़ायदों को गँवा बैठे?
पारंपरिक कथा आरएसएस के उदय का श्रेय इसके संगठनात्मक अनुशासन और समर्पित कार्यकर्ताओं को देती है. हालाँकि, एक अधिक आलोचनात्मक व्याख्या से पता चलता है कि आरएसएस का वर्चस्व निंदनीय रणनीतियों की एक श्रृंखला, नैतिक निर्लज्जता, और भारत की गहरी सामाजिक चिंताओं के शोषण में निहित है.
आरएसएस और सीएसडी के बीच ऐतिहासिक विरोधाभास विशेष रूप से मार्मिक है क्योंकि दो प्रतिद्वंद्वी स्वयंसेवक दलों के संस्थापक, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (आरएसएस) और डॉ. नारायण सुब्बाराव हार्डिकर (सीएसडी), 1910 के दशक की शुरुआत में कलकत्ता में अपनी चिकित्सा पढ़ाई के दौरान समकालीन और सहपाठी थे. दोनों आदमियों का राष्ट्रवादी क्रांतिकारी समूहों के साथ शुरुआती जुड़ाव था और वे संगठन और अर्धसैनिक अनुशासन की शक्ति को समझते थे.
हालाँकि, राष्ट्र-निर्माण के लिए उनके समाधान नाटकीय रूप से अलग हो गए.
• डॉ. हार्डिकर, जो जवाहरलाल नेहरू के करीबी सहयोगी थे, ने सीएसडी को “कांग्रेस के स्वयंसेवक दल” के रूप में तैयार किया, जो अहिंसक राजनीतिक कार्रवाई, भीड़ प्रबंधन और नागरिक से्वा के लिए समर्पित था. सीएसडी की विचारधारा दृढ़ता से अहिंसा, धर्मनिरपेक्षता और नागरिक कर्तव्य के गांधीवादी सिद्धांतों में निहित थी.
• डॉ. हेडगेवार, जो उग्रवादी हिंदू राष्ट्रवादी विचार से प्रभावित थे, ने एक हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए आरएसएस की स्थापना की. जबकि आरएसएस ने खुद को एक ग़ैर-राजनीतिक, सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत किया जो दैनिक शाखाओं के माध्यम से हिंदू युवाओं के बीच एकता और चरित्र बनाने पर केंद्रित था, इसका निजी उद्देश्य हमेशा भारत पर हिंदू उच्च जातियों के लिए पूर्ण शक्ति और वर्चस्व प्राप्त करना था.
आरएसएस का विश्वदृष्टिकोण कई उपनिवेशित राष्ट्रों में एक बड़ी प्रवृत्ति का हिस्सा था जहाँ पारंपरिक अभिजात वर्ग, यूरोपीय विजय के आघात के जवाब में, अपनी ऐतिहासिक शक्ति को बहाल करने के लिए धार्मिक पहचान को आधुनिक राष्ट्रवाद के साथ मिलाते थे. उपनिवेशवादियों—ब्रिटिशों—का बहादुरी से सामना करने के बजाय, आरएसएस ने एक विशिष्ट कायरतापूर्ण तरीक़े से इतिहास से दुश्मनों की तलाश करके खुद को परिभाषित किया. यह दावा करते हुए कि भारत सदियों से विदेशी आक्रमणों से कमज़ोर हो गया था, आरएसएस ने मुसलमानों और ईसाइयों जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया. आंदोलन ने राष्ट्रवादी जोश को औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष से दूर कर दिया (जिसमें आरएसएस ने कोई योगदान नहीं दिया) और एक सांप्रदायिक परियोजना की ओर मोड़ दिया.
यह सांप्रदायिक ज़हर वह मुद्रा बन गई जिसका उपयोग एक स्थायी समर्थन संरचना बनाने के लिए किया गया, जो ‘दूसरे’ के बारे में हिंदुओं के डर और चिंताओं पर खेल रहा था. इस रणनीति को विभाजन की रक्तपात और यादों से बड़ा बढ़ावा मिला, जिसने राष्ट्रीय मानस पर एक स्थायी निशान छोड़ा.
अपने प्रतिद्वंद्वियों के विपरीत, आरएसएस मौजूदा भारतीय समाज के मौलिक सुधार, क्रांति या परिवर्तन में दिलचस्पी नहीं रखता था. इसका शीर्ष नेतृत्व, जो महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों द्वारा भारी रूप से हावी था, पेशवा राज को बहाल करने की लंबे समय से चली आ रही महत्वाकांक्षा में निहित था—उच्च-जाति नियंत्रण की एक ऐतिहासिक अवधि. आरएसएस ने हमेशा उन समुदायों के बीच सहयोगियों की तलाश की है जो परंपरागत रूप से भारत के विभिन्न हिस्सों में सत्ता रखते थे और कभी भी गरीब, हाशिए पर या उत्पीड़ित वर्गों की जनसंख्या के लिए खड़े नहीं हुए. इसकी वर्तमान राजनीतिक सफलता इस प्रकार आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि यथास्थिति बनाए रखने के प्रयास स्वाभाविक रूप से कट्टरपंथी सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए आवश्यक कठिन, प्रणालीगत काम की तुलना में आसान होते हैं.
आरएसएस की सफलता का एक और महत्वपूर्ण, अक्सर अनदेखा किया जाने वाला आयाम इसके संचालन की पूरी तरह से अनैतिक और बेईमान प्रकृति थी. आरएसएस नेतृत्व, धर्म, जाति और राष्ट्रवाद के अपने संकीर्ण और कट्टर विचारों के साथ, दंगों की इंजीनियरिंग करने, झूठे झंडे अभियान चलाने, सबसे प्रतिगामी सामाजिक रुझानों का समर्थन करने, और सत्ता के लिए खुले तौर पर झूठ बोलने के लिए तैयार था. नफ़रत, हिंसा और छल-कपट का उपयोग करने की इस इच्छा ने, बिना किसी नैतिक पछतावे के, इसे अपने प्रतिद्वंद्वियों से बेहतर प्रदर्शन करने की अनुमति दी, जो गांधीवादी अहिंसा या समाजवादी आदर्शवाद जैसे सिद्धांतों से बाधित थे.
जबकि आरएसएस इन दीर्घकालिक, निर्दयी रणनीतियों को अपना रहा था, सीएसडी और सीपीआई भी अपनी संगठनात्मक और वैचारिक चूकों से पीड़ित थे.
उदाहरण के लिए, स्वतंत्रता के बाद, सीएसडी को उसी पार्टी द्वारा तोड़फोड़ किया गया था जिसकी सेवा के लिए इसे बनाया गया था. कई कांग्रेस नेताओं ने सीएसडी की अर्धसैनिक संरचना को संदेह की नज़र से देखा, इस डर से कि एक अनुशासित, उग्रवादी युवा विंग राजनीतिक नेतृत्व से स्वतंत्र शक्ति का केंद्र बन सकता है. नतीजतन, कांग्रेस पार्टी ने सीएसडी को एक मौसमी इकाई के रूप में माना—रैलियों के आयोजन के लिए उपयोगी लेकिन निरंतर वित्तीय या संस्थागत निवेश के अयोग्य. पार्टी राज्य की शक्ति और व्यक्तिगत नेताओं के करिश्मे पर निर्भर थी, बजाय वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं के एक मज़बूत, स्थायी रूप से जुटाए गए नेटवर्क के, एक घातक रणनीतिक चूक जो आरएसएस ने कभी नहीं की.
अपनी ओर से, भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन, शुरुआत में बड़े पैमाने पर अनुयायियों के बावजूद, आरएसएस की राजनीतिक परियोजना का मुक़ाबला करने के लिए आवश्यक सुसंगत, देशव्यापी जमीनी स्तर के काम को बनाने में विफल रहा. जब कम्युनिस्ट पार्टियों ने केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चुनावी सफलता हासिल की, तो आत्मसंतोष आ गया, और फोकस निरंतर आंदोलन-निर्माण से शासन, संरक्षण और राज्य तंत्र के प्रशासन के यांत्रिकी पर स्थानांतरित हो गया. इसके अलावा, पार्टी कट्टरपंथियों ने अक्सर स्थानीय जुटाव और सामाजिक सेवा के सुसंगत, ग़ैर-शानदार काम को “सुधारवादी” और अपर्याप्त रूप से “क्रांतिकारी” के रूप में खारिज कर दिया. औद्योगिक बेल्टों और कट्टरपंथी राजनीतिक कार्रवाई पर इस ज़ोर ने ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में वैचारिक प्रसारण के दीर्घकालिक काम पर, विशाल जनसांख्यिकीय स्थानों को बिना प्रतिद्वंद्विता के छोड़ दिया. न तो कांग्रेस और न ही कम्युनिस्टों ने महसूस किया कि संगठन निर्माण के कठिन काम को आउटसोर्स नहीं किया जा सकता है, न ही राजनीतिक परिवर्तन को लोगों पर ऊपर से थोपा जा सकता है.
सीएसडी और सीपीआई दोनों गहरी जड़ों वाली जाति व्यवस्था को चुनौती देने में भी विफल रहे—यह बहाना करते हुए कि यह आधुनिकीकरण और धर्मनिरपेक्ष शासन के साथ बस फीका पड़ जाएगा. इसने आरएसएस को, जो ब्राह्मण वर्चस्व सुनिश्चित करने के मिशन पर स्थापित किया गया था, निचली जाति के समूहों को सहयोजित करने के लिए बहुत अधिक छूट प्रदान की. प्रमुख राष्ट्रीय समस्या को सांप्रदायिकता के रूप में फ़्रेम करके, बजाय सामाजिक या आर्थिक मुद्दों के, आरएसएस ने सफलतापूर्वक नियमित असंतोष को अपनी सांप्रदायिक राजनीति में बदल दिया.
हाल ही में, बाहरी कारक जिसने आरएसएस के उदय को सबसे अधिक सक्षम किया वह नब्बे के दशक की शुरुआत में भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण था. यह एक विवर्तनिक घटना थी जिसने बड़े पैमाने पर ग्रामीण-से-शहरी प्रवासन, तेज़ शहरीकरण, और सार्वजनिक भलाई पर लाभ और लालच के लिए राष्ट्रीय लोकाचार में एक मौलिक बदलाव को उजागर किया. इस नए, आक्रामक उपभोक्तावाद से उत्पन्न सामाजिक अपराधबोध अक्सर विवेक को शांत करने के लिए बढ़ी हुई धार्मिकता या धर्म के सार्वजनिक प्रदर्शनों की ओर ले गया. आरएसएस ने चतुराई से ऐसी भावनाओं को भुनाया, एक दर्शन को अपनाते हुए जिसे (कॉम. डेंग से उचित माफ़ी के साथ) इस तरह व्याख्यायित किया जा सकता है: “चाहे बिल्ली काली हो या सफ़ेद, यह एक अच्छी बिल्ली है जब तक यह चूहे पकड़ती है और ‘जय श्री राम’ का जाप करती है”.
आरएसएस का प्रभावी ढंग से मुक़ाबला करने के लिए इसके वैचारिक विरोधियों को एक अनुशासित सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी परियोजना बनानी होगी, जो विभिन्न क्षेत्रीय, भाषाई और जातीय समूहों को जुटाती है जो भारतीय समाज के मोज़ेक बनाते हैं—जिन सभी को हिंदुत्व के रथ द्वारा दबाया या समाहित किया जा रहा है.
इस लड़ाई में सीपीआई और सीएसडी तमिलनाडु में और भी पुराने द्रविड़ आंदोलन से कई चीज़ें सीख सकते हैं, जिसने पिछले आठ दशकों में सामाजिक न्याय, संघवाद और क्षेत्रीय संस्कृति और पहचान की रक्षा पर ध्यान केंद्रित करके आरएसएस के समरूप दृष्टिकोण को सबसे प्रभावी चुनौती दी है.
द्रविड़ आंदोलन सफल रहा क्योंकि यह भाषाई गर्व जैसे सांस्कृतिक मुद्दों को मज़बूत सकारात्मक कार्रवाई और कल्याण योजनाओं के माध्यम से मापनीय सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के साथ मिला सकता था. आंदोलन के नेताओं द्वारा कला, साहित्य, कविता और सिनेमा के कुशल उपयोग ने भी सदियों के प्रचार का मुक़ाबला करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जो ब्राह्मणों, उनके विश्वदृष्टिकोण और सांस्कृतिक प्रथाओं की श्रेष्ठता का दावा करती थी.
परिणाम सभी के देखने के लिए हैं. तमिलनाडु न केवल सभी विकास संकेतकों में अधिकांश भारतीय राज्यों में सबसे ऊपर है, बल्कि उन बहुत कम जगहों में से एक है जहाँ देश के अन्य हिस्सों में आरएसएस द्वारा फैलाई गई दुष्ट सांप्रदायिकता को बिल्कुल भी कोई समर्थन या बढ़ने की जगह नहीं मिलती है.
सीएसडी और सीपीआई के लिए अपनी खोई हुई प्रासंगिकता को पुनर्प्राप्त करने के लिए, उन्हें अमूर्त धर्मनिरपेक्ष आदर्शों या समाजवादी सिद्धांत से अधिक की आवश्यकता होगी. उन्हें समझना चाहिए—जैसे महान पेरियार ने किया—कि भारत जैसे प्राचीन और जटिल समाज में सत्ता की लड़ाई केवल वर्ग या संविधान के बारे में नहीं है बल्कि सभ्यतागत भी है. अधिक विशेष रूप से, यह वैदिक और ग़ैर-वैदिक सभ्यताओं के बीच एक टकराव है, जिनमें से कई बहुत पुरानी, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और भारतीय उपमहाद्वीप में गहरी जड़ों वाली हैं.
यह निश्चित रूप से द्रविड़ आंदोलन की अंतर्दृष्टि और अनुभवों को राष्ट्रीय स्तर तक बढ़ाने में एक और 100 साल नहीं लगने चाहिए. जितनी जल्दी यह किया जाता है, उतनी ही तेज़ी से स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय के आदर्शों पर आधारित एक सच्चे गणराज्य के रूप में भारत की बहाली होगी.
सत्य सागर एक पत्रकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं जिनसे sagarnama@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
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