27/01/2026: यूरोप के लिए भारत बाज़ार खोलेगा | यूजीसी पर सवर्णों का विरोध | उत्तराखंड हेट स्पीच| लद्धड़ भारत | सेक्यूलर भारत के खिलाफ राजस्थान कानून | मार्क टली | शिमजिता मुस्तफा
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियाँ
भारत-ईयू डील: ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ फाइनल, यूरोपीय कारें और वाइन होंगी सस्ती.
ट्रैफिक अलर्ट: बेंगलुरु दुनिया का दूसरा सबसे धीमा शहर, पुणे ने मुंबई को पछाड़ा.
हेट स्पीच: सीएम धामी देश में सबसे ज़्यादा नफरती भाषण देने वाले नेता: रिपोर्ट.
यूजीसी विवाद: नए इक्विटी नियमों के खिलाफ ऊंची जाति का प्रदर्शन, बीजेपी नेताओं के इस्तीफे.
सेहत: 10 में से सिर्फ 1 भारतीय करता है व्यायाम, महिलाओं की भागीदारी सबसे कम.
चुनाव आयोग: ओडिशा चुनाव में डाले गए और गिने गए वोटों में भारी गड़बड़ी का खुलासा.
ग्लोबल डेट: अमेरिका और यूरोप सहित अमीर देश भारी कर्ज़ में डूबे, विकास पर खतरा.
‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के तहत भारत यूरोप के लिए शराब, कारों और मशीनरी के बाज़ार खोलेगा
भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) ने सोमवार को एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर बातचीत पूरी कर ली है. इसके तहत, भारत ने यूरोपीय संघ के 96.6% माल निर्यात पर आयात शुल्क (टैरिफ) को खत्म करने या कम करने पर सहमति जताई है. ईयू का अनुमान है कि इस कदम से 2032 तक भारत को उसका माल निर्यात दोगुना हो जाएगा.
समझौते की मुख्य बातें:
नई दिल्ली और ईयू के बीच हुए इस समझौते के बाद भारत अपनी कुछ सबसे ऊंची इंपोर्ट ड्यूटी में भारी कटौती करेगा.
कारें: यूरोपीय कारों पर टैरिफ, जो अभी दुनिया में सबसे ज्यादा (110%) हैं, उन्हें घटाकर 10% तक लाया जाएगा. इसके अलावा, कार के पुर्जों पर ड्यूटी 5 से 10 वर्षों में पूरी तरह खत्म कर दी जाएगी. यह कदम भारत के संरक्षित कार बाजार को बदल सकता है और यूरोपीय वाहन निर्माताओं को बड़ी बढ़त दे सकता है.
शराब: यूरोपीय वाइन पर लेवी को समझौते के लागू होते ही 150% से घटाकर 75% कर दिया जाएगा और समय के साथ इसे 20% तक लाया जाएगा.
मशीनरी और अन्य: मशीनरी पर 44%, रसायनों पर 22% और फार्मास्यूटिकल्स पर 11% तक के टैरिफ को काफी हद तक चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जाएगा.
कृषि उत्पाद: ऑलिव ऑयल (जैतून का तेल) पर टैरिफ पांच साल में 45% से घटकर शून्य हो जाएगा. ब्रेड और कन्फेक्शनरी जैसे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर 50% तक की ड्यूटी खत्म कर दी जाएगी.
हालांकि, संवेदनशील यूरोपीय कृषि क्षेत्रों जैसे बीफ, पोल्ट्री, चावल और चीनी को टैरिफ उदारीकरण से बाहर रखा गया है. इसके बदले में, यूरोपीय बाजार भारतीय निर्यातकों के लिए और खुलेंगे, जिसमें कपड़ा, चमड़ा, समुद्री उत्पाद और हस्तशिल्प शामिल हैं.यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे “सभी समझौतों की जननी” और “ऐतिहासिक” करार दिया. उन्होंने कहा कि यह समझौता करीब 2 अरब लोगों को कवर करने वाला एक मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसे ऐतिहासिक बताया. यह सौदा ऐसे समय में हुआ है जब दोनों पक्ष अमेरिका के साथ तनाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं. हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगाया है. इस समझौते पर बातचीत पहली बार 2007 में शुरू हुई थी, 2013 में रुकी और 2022 में फिर से शुरू हुई थी. कानूनी समीक्षा और अनुमोदन के बाद आने वाले महीनों में इस पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है.
यूजीसी इक्विटी नियमों के खिलाफ ऊंची जातियों का विरोध; भाजपा नेताओं के इस्तीफे
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026’ के खिलाफ उच्च जाति के हिंदू छात्रों और उनके अभिभावकों का एक निरंतर अभियान उभर कर सामने आया है. प्रदर्शनकारियों का दावा है कि ये नियम सामान्य श्रेणी के छात्रों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं. ‘मकतूब मीडिया’ की रिपोर्ट कहती है कि इन नियमों को इस रूप में पेश किया जा रहा है कि ये अनुचित रूप से उच्च जाति के छात्रों को उत्पीड़न के संभावित अपराधियों के रूप में खड़ा करते हैं. बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंक अग्निहोत्री, जो 2019 बैच के प्रांतीय सिविल सेवा (पीसीएस) अधिकारी हैं, ने सोमवार (26 जनवरी, 2026) को यूजीसी के इन नियमों के प्रति अपनी असंतोष का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया. लगभग उसी समय, लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के करीब एक दर्जन स्थानीय सदस्यों ने नए नियमों के विरोध में पार्टी से इस्तीफा दे दिया.
ये विनियम सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में ‘इक्विटी समितियों’ के गठन को अनिवार्य बनाते हैं. इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), दिव्यांग व्यक्तियों और महिलाओं के सदस्यों का होना अनिवार्य है. 2026 के ये नियम यूजीसी के पहले के 2012 के भेदभाव-विरोधी ढांचे का स्थान लेते हैं.
उत्तर प्रदेश भाजपा के विधान परिषद सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने यूजीसी को पत्र लिखकर कहा है कि ये नियम “सामान्य श्रेणी के छात्रों को असुरक्षित महसूस करा रहे हैं.”
इसके अतिरिक्त, उत्तरप्रदेश के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के एक पोस्ट-डॉक्टरल शोधकर्ता मृत्युंजय तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देना) विनियम, 2026 को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका भी दायर की है.
इस बीच, झारखंड से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया पर कहा कि नए नियमों के संबंध में “सभी भ्रांतियों” को जल्द ही दूर किया जाएगा. उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ही थी, जिसने उनके द्वारा “गरीब सवर्णों” के रूप में वर्णित लोगों के लिए 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू किया. दुबे ने यह भी कहा, “जब तक मोदी जी हैं, उच्च जातियों के बच्चों का कोई अहित नहीं होगा.”
‘पीटीआई’ के अनुसार, यह दस्तावेज़ तब जारी किया गया जब सुप्रीम कोर्ट ने रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं द्वारा दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान यूजीसी को नए नियम प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था. उस याचिका में 2012 के यूजीसी नियमों के कार्यान्वयन पर सवाल उठाए गए थे. हालांकि, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मंगलवार को आश्वासन दिया कि किसी के भी साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा.
इस बीच प्रीता नायर की रिपोर्ट में बताया गया है कि संसद के बजट सत्र से पहले मंगलवार को आयोजित एक सर्वदलीय बैठक में, विपक्षी दलों ने कई मुद्दों पर व्यवस्थित चर्चा की मांग की. इन मुद्दों में यूपीए काल के मनरेगा को फिर से बहाल करने, मतदाता सूचियों के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), भारत की विदेश नीति और नए यूजीसी दिशा-निर्देशों से जुड़े विवाद शामिल हैं.
आप इसे नफरती भाषण कहते हैं, तो मैं इसे स्वीकार करता हूँ
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ‘इंडिया हेट लैब’ की एक रिपोर्ट में साल 2025 का सबसे बड़ा ‘हेट-स्पीच एक्टर’ (नफरती भाषण देने वाला) नामित किए जाने के बाद कहा कि वह इस “टैग को स्वीकार करते हैं.” उन्होंने तर्क दिया कि यदि उन मुद्दों को उठाना, जिन्हें वे “उत्तराखंड के भविष्य के लिए खतरा” मानते हैं, नफरत भरा भाषण कहलाता है, तो वे इसे स्वीकार करने के लिए तैयार हैं.
‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट’ (सीएसओएच) की एक परियोजना ‘इंडिया हेट लैब’ (आईएचएल) द्वारा नफरती भाषणों पर जारी एक वार्षिक रिपोर्ट में पाया गया कि पुष्कर सिंह धामी 71 दर्ज भाषणों के साथ देश में सबसे अधिक “नफरती भाषण” देने वाले व्यक्ति के रूप में उभरे हैं.
‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, गणतंत्र दिवस के अपने संबोधन के दौरान इस रिपोर्ट का जवाब देते हुए धामी ने कहा, “एक अमेरिकी एनजीओ ने मुझे सबसे ज़्यादा नफरती भाषण देने के मामले में नंबर एक पर रखा है. भाइयों और बहनों, क्या उत्तराखंड में अवैध घुसपैठ होनी चाहिए? क्या उत्तराखंड में जबरन धर्मांतरण होना चाहिए? क्या उत्तराखंड में हिंसा फैलाने वालों के लिए कानून नहीं होना चाहिए?”
उन्होंने आगे सवाल किया, “हमारे बच्चों का भविष्य अनिश्चित हो रहा था. क्या यह हमारी जिम्मेदारी नहीं है कि हम राज्य की भावी पीढ़ी को एक सुरक्षित उत्तराखंड दें?” उन्होंने यह भी कहा, “राज्य के मुख्य सेवक के रूप में, अगर मैं इन चीजों को उठाता हूँ और आप इसे नफरती भाषण कहते हैं, तो मैं इसे स्वीकार करता हूँ.” उन्होंने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ दिए गए भाषणों को सही ठहराने के लिए ‘लव जिहाद’ जैसी साजिशों का भी जिक्र किया.
जवाब में, इंडिया हेट लैब ने दोहराया कि वे “उत्तराखंड में अल्पसंख्यक समुदायों के सामने आने वाली स्थितियों की बारीकी से निगरानी करना जारी रखेंगे और नफरत को बढ़ावा देने तथा हिंसा भड़काने के लिए राजनीतिक नेताओं और निर्वाचित अधिकारियों को जवाबदेह ठहराएंगे.” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि “सत्ता में बैठे लोग अल्पकालिक रूप से जवाबदेही से बच सकते हैं, लेकिन ऐसी दण्डमुक्ति अनिश्चित काल तक नहीं चल सकती. “
रिपोर्ट में शीर्ष अपराधी के रूप में नामित किए जाने के कुछ दिनों बाद, शनिवार को धामी ने इस्लामफोबिक टिप्पणियों की एक श्रृंखला भी की, जिसमें उन्होंने धर्मांतरण, दंगों, “लव जिहाद”, “लैंड जिहाद” और “थूक जिहाद” के खिलाफ अपनी सरकार के सख्त रुख को दोहराया.
‘रिपोर्ट 2025: भारत में नफरती भाषण की घटनाएं’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट के अनुसार, 21 राज्यों में धार्मिक अल्पसंख्यकों, मुख्य रूप से मुस्लिमों और ईसाइयों को निशाना बनाने वाली लगभग 1,318 व्यक्तिगत नफरती भाषण की घटनाएं दर्ज की गईं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह 2024 की तुलना में 13 प्रतिशत की वृद्धि और 2023 (जब 668 ऐसी घटनाएं दर्ज की गई थीं) की तुलना में 97 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है. इनमें से 1,289 भाषणों (98 प्रतिशत) में मुस्लिमों को निशाना बनाया गया, जिनमें से 1,156 मामलों में स्पष्ट रूप से और 133 मामलों में ईसाइयों के साथ उन्हें निशाना बनाया गया.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नफरती भाषण की सभी घटनाओं में से लगभग 88 प्रतिशत (1,164) भाजपा शासित राज्यों, भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के राज्यों और भाजपा-प्रशासित केंद्र शासित प्रदेशों में हुईं.
हमें अगले 30 साल ध्रुवीकरण की राजनीति करना होगी, हाँ, हम ‘मिया’ वोटों को चुराने की कोशिश कर रहे हैं: हिमंता
‘एएनआई’ के अनुसार, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने मंगलवार को गुवाहाटी में कहा “असम एक ध्रुवीकृत समाज है. अगर हम जीना चाहते हैं तो अगले 30 वर्षों तक हमें ध्रुवीकरण की राजनीति ही अपनानी होगी. अगर आप आत्मसमर्पण करना चाहते हैं तो कर लीजिए. लेकिन एक असमिया होने के नाते मैं आत्मसमर्पण नहीं करना चाहता. लेकिन ध्रुवीकरण हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नहीं है. ध्रुवीकरण असमिया और बांग्लादेशी के बीच है. यही अंतर है. हम असमिया मुसलमानों से नहीं लड़ते. हम सिर्फ बांग्लादेशी मुसलमानों से लड़ते हैं.”
इधर, ‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने दावा किया कि जब राज्य में मतदाता सूची का “विशेष गहन पुनरीक्षण” होगा, तो “चार लाख से पांच लाख मिया मतदाताओं” के नाम हटा दिए जाएंगे. उन्होंने यह भी कहा कि उनका काम “उन्हें परेशान करना” है. सरमा ने कहा, “हमारे लिए ‘वोट चोरी’ का क्या मतलब है? हाँ, हम कुछ मिया वोटों को चुराने की कोशिश कर रहे हैं. आदर्श रूप से, उन्हें असम में वोट देने की अनुमति नहीं होनी चाहिए. उन्हें बांग्लादेश में वोट देना चाहिए.” वह असम के तिनसुकिया जिले के डिगबोई में एक सरकारी कार्यक्रम के इतर बोल रहे थे. बता दें, असम में “मिया” एक अपमानजनक शब्द है जिसका उपयोग बंगाली मूल के मुसलमानों के लिए किया जाता है. हिंदू राष्ट्रवादियों और असमिया राष्ट्रवादियों द्वारा उन्हें अक्सर बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों के रूप में लेबल किया जाता है.
सरमा ने संवाददाताओं से कहा, “हमने ऐसी व्यवस्था की है कि वे असम में वोट न दे सकें. लेकिन यह अभी शुरुआती चरण है. जब असम में विशेष गहन पुनरीक्षण होगा, तो चार से पांच लाख मिया वोट काटने होंगे.” उन्होंने आगे कहा, “इसलिए, कांग्रेस मुझे जितना चाहे उतना गाली दे, लेकिन मेरा काम मिया लोगों को कष्ट देना है.”
बेंगलुरु और कोलकाता दुनिया के सबसे धीमे शहरों में शामिल, पुणे में ट्रैफिक जाम का बुरा हाल
डच लोकेशन टेक्नोलॉजी फर्म ‘टॉमटॉम’ के नवीनतम ट्रैफिक इंडेक्स 2025 के अनुसार, बेंगलुरु दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा ट्रैफिक जाम वाला शहर बन गया है. पहले नंबर पर मेक्सिको सिटी है. बेंगलुरु के यात्रियों को 2025 में पीक ऑवर्स (व्यस्त घंटों) के दौरान ट्रैफिक जाम के कारण लगभग एक पूरा कामकाजी सप्ताह गंवाना पड़ा. बेंगलुरु में औसत जाम का स्तर 74.4% दर्ज किया गया. पीक ऑवर्स में 4.2 किलोमीटर की दूरी तय करने में यात्रियों को 15 मिनट लगे, और औसत गति 16.6 किमी प्रति घंटा रही. 2024 में यह गति 18 किमी प्रति घंटा थी, जो दिखाती है कि हालात बदतर हुए हैं. एक आम यात्री ने साल भर में 168 घंटे ट्रैफिक में बर्बाद किए. ‘टॉमटॉम’ की ‘स्लोएस्ट सिटीज’ (सबसे धीमे शहर) की सूची में भी भारतीय शहरों का दबदबा रहा. बेंगलुरु तीसरे और कोलकाता चौथे स्थान पर रहा. लंदन और कोलंबिया का बैरेंक्विला इस सूची में सबसे ऊपर हैं. इंडेक्स के मुताबिक, पुणे ने मुंबई को पछाड़ दिया है और अब वह दुनिया का पांचवां सबसे ज्यादा भीड़भाड़ वाला शहर बन गया है, जहां यात्री साल में 152 घंटे ट्रैफिक में खो रहे हैं. मुंबई में मामूली सुधार हुआ है और वहां यह समय 126 घंटे रहा. नई दिल्ली 23वें स्थान पर है. कुल मिलाकर, भारत दुनिया का पांचवां सबसे ज्यादा ट्रैफिक वाला देश है और एशिया में फिलीपींस के बाद दूसरे नंबर पर है. रिपोर्ट यह भी बताती है कि ट्रैफिक का पैटर्न बदल रहा है. अब सुबह की पीक का समय बिखर गया है, लेकिन शाम को 3 बजे से ही ट्रैफिक जाम शुरू हो जाता है जो 6 बजे तक रहता है.
आंकड़े
लद्धड़ लोगों का देश : 10 में से 9 भारतीय नहीं करते कसरत
नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (एनएसओ) के टाइम यूज़ सर्वे 2024 के अनुसार, भारत में किसी भी सामान्य दिन पर 10 में से केवल 1 व्यक्ति ही व्यायाम करता है. हालांकि 2019 के 5.7% के मुकाबले इसमें मामूली सुधार हुआ है, लेकिन यह अभी भी चिंताजनक स्तर पर है. सर्वे में पाया गया कि पुरुष महिलाओं की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक व्यायाम करते हैं. 14.5% पुरुषों ने व्यायाम करने की बात कही, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा सिर्फ 4.9% था. शहरों में व्यायाम करने वालों की संख्या गांवों से ज्यादा है. ग्रामीण महिलाओं में व्यायाम का स्तर सबसे कम (3.1%) पाया गया.
इंडियास्पेंड में विजय जाधव की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं बिना वेतन वाले घरेलू और देखभाल के कार्यों में इतना समय बिताती हैं कि उनके पास व्यायाम के लिए न तो समय बचता है और न ही ऊर्जा. पुणे की न्यूट्रिशनिस्ट चैताली अहेर कहती हैं, “कई महिलाओं को गलतफहमी है कि घर का काम ही व्यायाम है, जो सही नहीं है. यही कारण है कि महिलाओं में पीसीओएस ( और थायराइड की समस्याएं बढ़ रही हैं.” सर्वे में देखा गया कि शिक्षा और आय बढ़ने के साथ व्यायाम करने वालों की संख्या बढ़ती है. 2024 में, 26% पोस्ट-ग्रेजुएट्स ने व्यायाम करने की बात कही. इसी तरह, अधिक खर्च करने वाले (अमीर) परिवारों के लोग कम आय वाले परिवारों की तुलना में दोगुना अधिक व्यायाम करते हैं. व्यायाम करने में जातिगत अंतर भी देखने को मिला. ‘अन्य’ श्रेणी (सामान्य वर्ग) के 13.3% लोगों ने व्यायाम किया, जबकि ओबीसी के लिए यह 9.1%, अनुसूचित जाति (एससी) के लिए 7.9% और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 6.9% था. खेलकूद (स्पोर्ट्स) में भागीदारी मुख्य रूप से 20 वर्ष से कम उम्र के बच्चों तक सीमित है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, लोग खेलकूद छोड़ देते हैं. डॉ. अविनाश भोंडवे कहते हैं कि स्कूलों में पीटी और व्यायामशालाओं का गायब होना शारीरिक संस्कृति को नुकसान पहुंचा रहा है.
अरिजीत सिंह ने प्लेबैक सिंगिंग से लिया संन्यास; कहा— स्वतंत्र संगीत बनाना जारी रखेंगे
अरिजीत सिंह, जो पिछले एक दशक में बॉलीवुड की सबसे पहचानी जाने वाली और लोकप्रिय आवाजों में से एक रहे हैं, ने प्लेबैक सिंगिंग (पार्श्व गायन) से संन्यास लेने की घोषणा कर दी है. इसके साथ ही उस करियर पर पर्दा गिर गया है, जिसने आधुनिक हिंदी फिल्म संगीत की ध्वनि को फिर से परिभाषित किया था.
“द टेलीग्राफ” के अनुसार, 38 वर्षीय गायक ने 27 जनवरी को अपने निजी सोशल मीडिया अकाउंट के माध्यम से इस निर्णय की पुष्टि की. उन्होंने स्पष्ट किया कि हालांकि वे अब फिल्मों के लिए नए प्रोजेक्ट्स नहीं लेंगे, लेकिन वे संगीत से पूरी तरह दूर नहीं हो रहे हैं. सिंह ने बताया कि उनके पास अभी कुछ पुराने वादे (कमिटमेंट्स) बाकी हैं जिन्हें पूरा किया जाएगा, और उन्होंने पुष्टि की कि श्रोता 2026 में उनकी नई रिलीज की उम्मीद कर सकते हैं. हालांकि, उन्होंने साफ कर दिया कि वे आगे किसी भी नई फिल्म परियोजना पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे.
चुनाव आयोग की चुप्पी पर सवाल
2024 ओडिशा चुनाव का डेटा बताता है कि न लोकतंत्र सलामत है न गणतंत्र
दिल्ली के कर्तव्य पथ पर 26 जनवरी की सुबह हुई भव्य सेना परेड हमारे गणतंत्र की रक्षा में भारत के प्रहरी की भूमिका का प्रतीक थी. लेकिन गणतंत्र के लिए एक नया खतरा इसकी सुरक्षा कमजोरियों से नहीं, बल्कि भारत के चुनाव आयोग (चुनाव आयोग) की विफलता से पैदा हो रहा है जो चुनावों की अखंडता के बारे में बढ़ते संदेहों को दूर करने में नाकाम रहा है. फ्रंटलाइन में एजाज़ अशरफ लिखते हैं कि जिस देश में चुनावों की पवित्रता का उल्लंघन माना जाने लगे, वह एक लोकतांत्रिक गणतंत्र नहीं हो सकता.
गणतंत्र के लिए इस नए खतरे को 13 मई से 1 जून 2024 के बीच ओडिशा में एक साथ हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों के परिणामों में विसंगतियों से समझा जा सकता है. 24 साल तक ओडिशा पर शासन करने के बाद सत्ता से बाहर होने के सदमे से उबरते हुए, बीजू जनता दल (बीजेडी) ने दिसंबर 2024 में चुनाव आयोग को अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया और परिणामों में विसंगतियों की ओर इशारा करते हुए स्पष्टीकरण मांगा. जून और अगस्त 2025 में दो और बैठकों के बाद भी, चुनाव आयोग ने बीजेडी के दावों का न तो खंडन किया है और न ही उन्हें स्वीकार किया है.
पार्टी ने तीन आधारों पर चुनाव प्रक्रिया और परिणामों पर सवाल उठाए. पहला फॉर्म 17सी और फॉर्म 20 की गिनती के बीच विसंगतियों से संबंधित था. फॉर्म 17सी हर पोलिंग बूथ में पड़े वोटों की संख्या को सूचीबद्ध करता है, जबकि फॉर्म 20 हर बूथ से गिने गए वोटों की गिनती प्रदान करता है. कायदे से इन दोनों के आंकड़े हमेशा मेल खाने चाहिए.
बीजेडी ने अपनी शिकायत में ओडिशा के 147 विधानसभा क्षेत्रों में फैले 58 बूथों को सूचीबद्ध किया जहां वोट डाले गए और गिने गए वोटों के बीच का अंतर 1 से लेकर 908 तक था. लेखक ने जब डेटा को देखा तो पाया कि फुलबनी के बूथ नंबर 57 के फॉर्म 17सी में 682 वोट डाले गए थे, लेकिन इसके फॉर्म 20 में एक भी वोट गिना हुआ नहीं दिखाया गया. यानी 682 वोट गायब हो गए. वहीं तलसारा और कुचिंडा जैसी जगहों पर भी सैकड़ों वोट गायब मिले.
हैरानी की बात यह है कि वोट सिर्फ गायब ही नहीं हुए, बल्कि रहस्यमय तरीके से जुड़ भी गए. पदमपुर विधानसभा क्षेत्र के 14 बूथों पर कुल मिलाकर सिर्फ 82 वोट पड़े थे (फॉर्म 17सी के अनुसार), लेकिन उनके फॉर्म 20 दिखाते हैं कि वहां 9,304 वोट गिने गए. ये 9,222 अतिरिक्त वोट कहां से आए?
इसके अलावा, डेटा एक और अजीबोगरीब बात बताता है: बड़ी संख्या में लोगों ने लोकसभा के लिए वोट दिया लेकिन विधानसभा के लिए नहीं—और इसके विपरीत भी हुआ. जबकि दोनों चुनाव एक ही दिन, एक ही कमरे में हो रहे थे. ढेंकनाल संसदीय क्षेत्र में विधानसभा चुनावों में लोकसभा चुनावों की तुलना में 4,056 अधिक लोगों ने मतदान किया. कंधमाल में यह उल्टा था. मतदान के दिन शाम 5 बजे घोषित वोटर टर्नआउट और बाद में अपडेट किए गए आंकड़ों में 8% से लेकर 30% तक की भारी बढ़ोतरी देखी गई, जो अभूतपूर्व है. लेखक का कहना है कि चुनाव आयोग की चुप्पी और निष्क्रियता भारत की चुनाव प्रक्रिया के बारे में संदेह को गहरा करती है, जो दीमक की तरह गणतंत्र को खोखला कर सकती है.
विश्लेषण
आकार पटेल: राजस्थान का नये कानून के निशाने पर सेक्यूलर भारत है
इस हफ़्ते राजस्थान एक ऐसा अलगाववादी कानून पास करने जा रहा है जो गुजरात के कानून की तर्ज पर बना है. इस बात की उम्मीद कम ही है कि ज़्यादातर हिंदुस्तानियों को इसके अस्तित्व के बारे में पता भी चलेगा क्योंकि मीडिया शायद ही इसे रिपोर्ट करेगा. चलिए देखते हैं कि इस कानून का असल मक़सद क्या है.
जब गरीब लोग मजबूरी में एक साथ भिंचकर रहते हैं, तो उसे हम ‘स्लम’ कहते हैं. लेकिन जब किसी ख़ास समुदाय या एथनिक ग्रुप को जबरदस्ती कुछ इलाकों तक सीमित कर दिया जाता है, तो उसे ‘घेटो’ कहते हैं. स्लम वालों के पास कहीं और जाने का साधन नहीं होता. लेकिन घेटो में रहने वालों के पास साधन होने के बावजूद कोई विकल्प नहीं होता. ‘अपार्थाइड’ का मतलब होता है ‘अलगाव’ और ये साउथ अफ्रीका की उस पॉलिसी की याद दिलाता है जहां काले अफ्रीकी लोगों को जबरदस्ती घेटोज़ में रखा जाता था. कानून के मुताबिक़ वो सिर्फ़ तय जगहों पर ही रह सकते थे.
जब 1960 के दशक में अमेरिका में कानूनी तौर पर सेग्रीगेशन ख़त्म हुआ, तो वहां की सरकार ने ऐसे कानून बनाए जो अलग-अलग नस्लों को घुलने-मिलने में मदद करें, जैसे कि ‘फेयर हाउसिंग एक्ट’. इसने प्रॉपर्टी खरीदने और बेचने में होने वाले भेदभाव को रोका जिसने नस्लों को अलग-अलग रखा हुआ था. लेकिन पूरे गुजरात में, सभी बड़े शहरों और कई कस्बों में, बीजेपी सरकार ने इसका बिल्कुल उल्टा किया है. ‘गुजरात प्रोहिबिशन ऑफ़ ट्रांसफर ऑफ़ इमूवेबल प्रॉपर्टी एंड प्रोविज़न फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ टेनेंट्स फ्रॉम एविक्शन फ्रॉम प्रमिसेज़ इन डिस्टर्ब्ड एरियाज़ एक्ट’ नाम के कानून के ज़रिए मुसलमानों को जानबूझकर घेटोज़ में धकेला जा रहा है.
ये कानून शहर के कुछ ख़ास हिस्सों में रहने वाले नागरिकों को प्रॉपर्टी बेचने या किरायेदार बदलने से पहले सरकार से मंज़ूरी लेने को मजबूर करता है और उन्हें धर्म के आधार पर फ़िल्टर करता है. अर्ज़ी में खरीदार और बेचने वाले का नाम देना होता है और एक एफिडेविट देना पड़ता है कि ये सौदा बिना किसी दबाव के और मार्केट प्राइस पर हुआ है.
शुरू में ये कानून कांग्रेस द्वारा पास किया गया था, और 2009 में मोदी सरकार ने इस एक्ट में संशोधन करके कलेक्टर को ये ताक़त दे दी कि वो जांच कर सके और प्रॉपर्टी को अपने कब्ज़े में ले सके. जुलाई 2019 में एक और बदलाव किया गया. पहले, प्रॉपर्टी बेचने वालों को ट्रांसफर की इज़ाज़त के लिए आवेदन करना पड़ता था और एफिडेविट पर अपनी सहमति दर्ज करनी पड़ती थी.
अब, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि सौदा आपसी सहमति से हुआ है या मालिक को सही दाम मिला है. कलेक्टर अपनी मर्जी से किसी भी प्रॉपर्टी की बिक्री को रोक सकता है अगर उसे ये लगे कि ट्रांसफर होने से “डेमोग्राफिक इक्विलिब्रियम” (जनसांख्यिक संतुलन) में गड़बड़ी होगी या “किसी एक समुदाय के लोगों का अनुचित जमावड़ा” होगा या फिर “ध्रुवीकरण की संभावना” है.
कलेक्टर इन आधारों पर आकलन करके प्रॉपर्टी के लीगल ट्रांसफर की अर्ज़ी को खारिज कर सकता है. बिना क्लीयरेंस के प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने की सज़ा बढ़ाकर छह साल जेल कर दी गई (जब कानून पहली बार आया था तो ये छह महीने थी). कानून अब राज्य सरकार को एक “मॉनिटरिंग और एडवाइजरी कमेटी” बनाने की भी अनुमति देता है जो मोहल्लों के डेमोग्राफिक स्ट्रक्चर (जनसांख्यिक ढांचे) पर नज़र रखेगी. ये कमेटी कलेक्टर को सलाह देगी कि बिक्री की अनुमति दी जाए या नहीं.
ये एक्ट अभी राज्य के तीन सबसे बड़े शहरों- अहमदाबाद, वडोदरा और सूरत के बड़े हिस्सों में लागू है, और भरूच, कपड़वंज, आणंद और गोधरा में भी. ये वही जगहें हैं जहां गुजरात के मुसलमान केंद्रित हैं, और उन्हें प्रभावी रूप से हमेशा के लिए घेटोज़ में कैद किया जा रहा है. असर ये है कि विदेशी लोग गुजरात में प्रॉपर्टी लीज़ पर ले सकते हैं या खरीद सकते हैं, लेकिन भारतीय मुसलमान नहीं.
पिछले हफ़्ते, राजस्थान कैबिनेट ने एक ऐसे कानून को मंज़ूरी दी है जो उनके राज्य में भी यही काम करेगा. लॉ मिनिस्टर जोगाराम पटेल ने कहा कि “इम्प्रोपर क्लस्टरिंग” (अनुचित जमावड़े) वाले मोहल्लों को टारगेट किया जाएगा. इन इलाकों में सरकार की अनुमति के बिना अचल संपत्ति का ट्रांसफर अमान्य होगा.
अल्पसंख्यकों को सताने वाले दूसरे कानूनों की तरह, इसे भी एक सौम्य नाम दिया गया है: ‘द राजस्थान प्रोहिबिशन ऑफ़ ट्रांसफर ऑफ़ इमूवेबल प्रॉपर्टी एंड प्रोविज़न फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ टेनेंट्स फ्रॉम एविक्शन फ्रॉम द प्रमिसेज़ इन डिस्टर्ब्ड एरियाज़ बिल, 2026’. (राजस्थान अशांत क्षेत्र विधेयक 2026)
इसके नतीजे जाहिर तौर पर वही होंगे जो हमने गुजरात में देखे हैं. ये समुदायों के बीच सामाजिक और व्यापारिक मेलजोल को अपराध बना देता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे नाज़ी जर्मनी ने किया था. राजस्थान के कानून के प्रावधानों का उल्लंघन गैर-ज़मानती और संज्ञेय अपराध है, और इसमें पांच साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है. आप सिर्फ़ प्रॉपर्टी किराए पर देने के लिए जेल जा सकते हैं.
राज्य में कांग्रेस इस कानून के पास होने का विरोध कर रही है, लेकिन उनके पास संख्या बल कम है और वे इसे रोक नहीं पाएंगे. उनके प्रदेश अध्यक्ष का कहना है कि “डेमोग्राफिक इम्बैलेंस (जनसांख्यिक असंतुलन) कोई कानूनी शब्द नहीं है. इस बात का कोई ज़िक्र नहीं है कि किस आधार पर किसी इलाके को ‘डिस्टर्ब्ड’ (अशांत) घोषित किया जाएगा. बीजेपी गुजरात मॉडल अपनाकर सत्ता में बने रहना चाहती है.”
ये सच है. मोदी के राज में भारत ने संविधान के सेक्युलरिज़्म को ऐसे कई कानूनों के ज़रिए खोखला कर दिया है जिनका कोई विरोध नहीं हुआ. अदालतें मुंह फेरे बैठी हैं, विपक्ष बहुत कमज़ोर है और मीडिया इसमें भागीदार है. बीफ रखने को 2015 में अपराध बनाया गया, जिसकी शुरुआत महाराष्ट्र और हरियाणा से हुई. अंतरधार्मिक विवाह को 2018 में अपराध बनाया गया, जिसकी शुरुआत उत्तराखंड से हुई. मुस्लिम तलाक (तीन तलाक) को 2019 में अपराध बनाया गया, और इसी तरह नागरिकता संशोधन कानून से उन्हें विशेष रूप से बाहर रखा गया.
राजस्थान का कानून इसी सिलसिले को आगे बढ़ाता है. एक के बाद एक कानून, कदम दर कदम, हम ‘न्यू इंडिया’ में दाखिल हो चुके हैं, एक ऐसा बहुसंख्यकवादी राज्य जो अपने सेक्युलरिज़्म के कवच को उतार रहा है.
आकार पटेल स्तंभकार के अलावा मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के प्रमुख हैं.
भारत की अदालतें अब सत्ता पक्ष की असहिष्णुता की गूंज बन गई हैं
आर्टिकल 14 के संपादक समर हलर्नकर ने भारत की अदालतों का आलोचनात्मक विश्लेषण किया है. 19 जनवरी 2025 को, मुंबई सेशंस कोर्ट के एक जज मनोज बी. ओझा ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टिस) के नौ छात्रों की अग्रिम जमानत याचिकाओं पर सुनवाई की. उन्होंने पुलिस से यह नहीं पूछा कि जी.एन. साईबाबा की पुण्यतिथि मनाने वाले युवाओं के खिलाफ ‘दंगा’, ‘गैरकानूनी जमावड़ा’ और ‘राष्ट्रीय अखंडता के खिलाफ काम करने’ जैसे बेतुके आरोप क्यों लगाए गए. इसके बजाय, उन्होंने छात्रों को बिगड़े हुए बच्चों की तरह डांटा और चेतावनी दी कि उनका करियर अब खत्म हो गया है.
साईबाबा, दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक पूर्व प्रोफेसर, ने एक दशक जेल में बिताया था, जबकि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था. बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था. जज ओझा ने पुलिस की ज्यादती पर सवाल उठाने के बजाय कहा, “आपका रिकॉर्ड अब पुलिस के पास है... आपने अपने करियर की शुरुआत से पहले ही बहुत बड़ी गलती कर दी है.” यह ‘न्यू इंडिया’ के उस विकृत न्यायशास्त्र का ताज़ा उदाहरण है जो विरोध और असहमति को अपराध मानता है, हेट क्राइम के शिकार लोगों को ही अपराधी बना देता है और हेट क्राइम करने वालों को बचाता है.
भारत की आपराधिक-न्याय प्रणाली ने ‘निर्दोष होने की धारणा’ और बोलने की आज़ादी को सिर के बल खड़ा कर दिया है. इसकी जगह अब एक ऐसी रूढ़िवादी व्यवस्था ने ले ली है जो सत्ताधारी भाजपा और उसके सहयोगियों की विचारधारा से प्रेरित है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने हाल ही में न्यायपालिका की स्वतंत्रता में राज्य की घुसपैठ पर चिंता जताई थी और कहा था कि “न्यायपालिका के पास न तो धन है और न ही तलवार, उसके पास केवल लोगों का विश्वास है.” लेकिन वह विश्वास अब टूट रहा है.
बीता हफ्ता ऐसी कई घटनाओं का गवाह बना. कश्मीर में चार पत्रकारों को पुलिस ने सिर्फ इसलिए तलब किया क्योंकि उन्होंने स्थानीय मस्जिदों में इमामों की प्रोफाइलिंग पर रिपोर्ट दी थी. उत्तर प्रदेश में, एक खाली घर में नमाज पढ़ने के लिए मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया. एक आदिवासी स्कूल को इसलिए गिरा दिया गया क्योंकि उसे एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपनी जमीन पर बनाया था. ओडिशा में एक पादरी को गाय का गोबर खाने और ‘जय श्री राम’ बोलने पर मजबूर किया गया.
हेट स्पीच (नफरती भाषण) में लगातार बढ़ोतरी हुई है. ‘हेट स्पीच इवेंट्स इन इंडिया’ की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में 1,289 हेट स्पीच के मामले सामने आए, जिनमें से 98% मुसलमानों को निशाना बनाकर दिए गए थे. भाजपा शासित राज्यों में ऐसी घटनाओं में 25% की वृद्धि हुई है. लेखक निष्कर्ष निकालते हैं कि चाहे वाइमर जर्मनी हो, एर्दोगन का तुर्की हो या आपातकाल का दौर, इतिहास गवाह है कि संस्थानों का पतन लोकतंत्र की मंदी का सबसे बड़ा संकेत होता है. यह आश्चर्यजनक नहीं है कि छात्रों को विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के लिए करियर खत्म होने की धमकी दी जा रही है, या उमर खालिद जैसे लोगों को बिना किसी ठोस कारण के जेल में रखा जा रहा है—सिर्फ बहती हवा के साथ चलने के लिए.
दुनिया के सबसे अमीर देशों में रिकॉर्ड कर्ज वैश्विक विकास के लिए खतरा
ऐतिहासिक रूप से, भारी कर्ज और वित्तीय अस्थिरता को गरीब या विकासशील देशों की समस्या माना जाता था. लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी और समृद्ध अर्थव्यवस्थाएं—अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और जापान—असहनीय कर्ज के बोझ तले दबी हुई हैं. यह कर्ज न केवल इन देशों की आंतरिक स्थिरता को चुनौती दे रहा है, बल्कि संपूर्ण वैश्विक वित्तीय तंत्र को संकट में डालने की क्षमता रखता है. उधार लेने की लागत (ब्याज) पहले से ही कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण सार्वजनिक खर्च का दम घोंट रही है. अब यह और भी बड़े स्तर पर खतरे की घंटी बजा रही है.
“द न्यूयॉर्क टाइम्स” में पैट्रीसिया कोहेन ने लिखा है कि कर्ज का यह पहाड़ रातों-रात खड़ा नहीं हुआ है. इसकी शुरुआत 2008 के वित्तीय संकट से हुई थी, जब सरकारों ने गिरती अर्थव्यवस्थाओं को बचाने के लिए भारी उधारी ली. इसके बाद कोविड-19 महामारी ने इस स्थिति को और भयावह बना दिया. महामारी के दौरान स्वास्थ्य खर्चों और राहत पैकेजों के कारण कर्ज का स्तर नई ऊंचाइयों पर पहुँच गया. वर्तमान में, जी-7 के छह देशों का राष्ट्रीय ऋण उनकी वार्षिक जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के बराबर या उससे अधिक हो चुका है.
कोहेन के मुताबिक, अत्यधिक कर्ज का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव आम जनता पर पड़ता है. जब सरकारों को अपने राजस्व का एक बड़ा हिस्सा केवल ब्याज चुकाने में खर्च करना पड़ता है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सड़क और सार्वजनिक आवास जैसे बुनियादी क्षेत्रों के लिए बजट कम हो जाता है. उदाहरण के तौर पर, अमेरिका में ब्याज का भुगतान अब सामाजिक सुरक्षा के बाद दूसरा सबसे बड़ा सरकारी खर्च बन गया है.
इसके अतिरिक्त, कर्ज की यह भूख ब्याज दरों को बढ़ाती है, जिससे आम आदमी के लिए होम लोन, कार लोन और क्रेडिट कार्ड महंगे हो जाते हैं, जो अंततः महंगाई (मुद्रास्फीति) को बढ़ावा देता है.
यूरोप और जापान जैसे देशों में बुजुर्ग आबादी का बढ़ना एक बड़ी चुनौती है. पेंशन और स्वास्थ्य सेवा पर खर्च बढ़ रहा है, जबकि कर देने वाले कामकाजी युवाओं की संख्या कम हो रही है. साथ ही, आधुनिक युग की जरूरतों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और साझा ऊर्जा ग्रिड के लिए अरबों डॉलर के निवेश की आवश्यकता है. यूरोपीय संघ को ही प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए अतिरिक्त 900 बिलियन डॉलर की जरूरत है, लेकिन कर्ज के बोझ के कारण यह फंड जुटाना मुश्किल हो रहा है.
जापान और अमेरिका की विशिष्ट स्थितियां
जापान: जापान का कर्ज उसकी जीडीपी का दोगुने से भी अधिक है. प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची द्वारा लोकलुभावन वादों (जैसे करों में कटौती और खर्च में वृद्धि) ने निवेशकों को डरा दिया है. दशकों की न्यूनतम ब्याज दर नीति के बाद अब ब्याज दरों में बढ़ोतरी वहां के वित्तीय क्षेत्र में हलचल पैदा कर रही है.
अमेरिका: $38 ट्रिलियन के विशाल ऋण के साथ अमेरिका एक कठिन मोड़ पर है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अनिश्चित व्यापार नीतियां, टैरिफ युद्ध और सैन्य खर्च बढ़ाने के वादे निवेशकों के भरोसे को कम कर रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति अमेरिका के वैश्विक आर्थिक नेतृत्व और डॉलर की साख को कमजोर कर सकती है.
बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव (जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन-अमेरिका संघर्ष) ने देशों को रक्षा बजट बढ़ाने पर मजबूर कर दिया है. नाटो देश अब अपनी जीडीपी का 5% रक्षा पर खर्च करने की योजना बना रहे हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि सरकारों ने शांति और मजबूती के समय में कर्ज कम करने के बजाय उसे और बढ़ाया. अब यदि भविष्य में कोई और महामारी, युद्ध या वित्तीय संकट आता है, तो सरकारों के पास उससे निपटने के लिए वित्तीय गुंजाइश बहुत कम बची है.
कुलमिलाकर इस लेख का निचोड़ यह है कि अमीर देशों का वर्तमान उपभोग भविष्य की पीढ़ियों की कीमत पर हो रहा है. अत्यधिक कर्ज न केवल वर्तमान आर्थिक विकास को बाधित कर रहा है, बल्कि यह आने वाले बच्चों और पोते-पोतियों के संसाधनों को भी हड़प रहा है. जैसा कि अर्थशास्त्री विलियम जे. गेल ने कहा है, “आज आप जितना अधिक उपभोग करेंगे, भविष्य में उतना ही कम कर पाएंगे.” यदि इन अमीर देशों ने अपने ‘कर्ज की लत’ को जल्द ही नियंत्रित नहीं किया, तो वैश्विक वित्तीय अस्थिरता एक अपरिहार्य वास्तविकता बन जाएगी. अंग्रेजी में पूरा लेख यहां पढ़ सकते हैं.
आईपीएस अधिकारी ने गणतंत्र दिवस के संबोधन में मदरसा छात्रों से भगवद गीता पढ़ने का आग्रह किया
मध्यप्रदेश के एक वरिष्ठ आईपीएस (भारतीय पुलिस सेवा) अधिकारी ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक मदरसे के छात्रों को संबोधित किया और उन्हें “अपना मार्ग आलोकित करने” के लिए कुरान के साथ-साथ भगवद गीता पढ़ने का आग्रह किया.
एडीजीपी (प्रशिक्षण), राजा बाबू सिंह ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सीहोर जिले के दोराहा गाँव में स्थित संस्थान के छात्रों से बात की.
सिंह ने ‘पीटीआई’ को बताया, “मदरसे के मौलाना साहब मेरे पुराने मित्र हैं. उन्होंने मुझसे गणतंत्र दिवस पर छात्रों को संबोधित करने का अनुरोध किया था. मैंने छात्रों को उनके द्वारा प्राप्त की जा रही शिक्षा के लिए बधाई दी, लेकिन साथ ही मैंने छात्रों और उनके शिक्षकों से पर्यावरण संरक्षण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सहिष्णुता के प्रति चिंता विकसित करने को कहा.”
1994-बैच के आईपीएस अधिकारी ने आगे कहा कि उन्होंने छात्रों से “पवित्र कुरान के साथ भगवद गीता का भी अध्ययन करने को कहा, क्योंकि यह सदियों से मानवता को राह दिखा रही है.” सिंह, जो पहले कश्मीर में सीमा सुरक्षा बल के महानिरीक्षक के रूप में सेवाएं दे चुके हैं, ने कहा कि उन्होंने छात्रों को बताया कि भारत एक विशाल देश है और “कश्मीर से कन्याकुमारी तक” इसकी एकता और अखंडता को बनाए रखना उनमें से प्रत्येक का कर्तव्य है.
यह आईपीएस अधिकारी अतीत में भी तब चर्चा में रहे थे, जब उन्होंने मध्यप्रदेश के सभी पुलिस प्रशिक्षण स्कूलों को रंगरूटों के लिए भगवद गीता और रामचरितमानस पाठ सत्र आयोजित करने का निर्देश दिया था, ताकि उन्हें “न्यायपूर्ण” जीवन जीने में मदद मिल सके.
मध्यप्रदेश के गाँव में अपनी पसंद से शादी करने वालों के परिवारों के बहिष्कार का ‘ऐलान’
मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में निजी संबंधों को नियंत्रित करने वाली अनौपचारिक सामुदायिक संस्थाओं की भूमिका की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए, एक अंतरजातीय विवाह पर ग्राम पंचायत की प्रतिक्रिया का कथित वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है.
रतलाम जिले की पिपलोदा तहसील के पंचेवा गाँव में रिकॉर्ड किए गए इस वीडियो में एक व्यक्ति उन “फैसलों” को पढ़कर सुनाता दिख रहा है, जिनके बारे में उसका दावा है कि वे ग्राम पंचायत द्वारा लिए गए हैं. यह मामला गाँव की एक महिला द्वारा अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ कथित तौर पर भागकर शादी करने के बाद सामने आया.
वक्ता के अनुसार, महिला के परिवार ने शुरुआत में इस शादी का विरोध किया था, लेकिन बाद में जोड़े को स्वीकार कर लिया, जिसके बाद कथित तौर पर पंचायत ने इस मामले पर विचार-विमर्श करने के लिए बैठक बुलाई.
वीडियो क्लिप में, वह व्यक्ति भागकर की गई शादी के जवाब में पंचायत द्वारा कथित रूप से लगाए गए दंडात्मक और सुधारात्मक उपायों की घोषणा करते हुए सुना जा सकता है.
स्थानीय लोगों की एक बड़ी सभा में वह व्यक्ति कहता है, “सभी ग्रामीणों ने फैसला किया है कि यदि पंचेवा गाँव का कोई भी लड़का या लड़की भागकर शादी करता है या प्रेम विवाह करता है, तो उन पर और उनके परिवार पर निम्नलिखित प्रतिबंध लगाए जाएंगे. परिवार का सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा, उन्हें किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में नहीं बुलाया जाएगा, और कोई भी उन्हें मजदूरी के काम के लिए नहीं बुलाएगा. यदि कोई उस परिवार को बुलाता है, तो उसे भी सामाजिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा.”
वह व्यक्ति आगे कहता है, “कोई भी गवाह या गाँव का कोई भी निवासी जो शादी में मदद करता है, या प्रेम विवाह करने वाले जोड़े को आश्रय प्रदान करता है, उसका भी सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा.” इस दौरान वह उन तीन व्यक्तियों के नाम भी लेता है, जिन्हें पंचायत की घोषणा के अनुसार “बहिष्कृत” किया गया है.
रतलाम की कलेक्टर मिशा सिंह ने कहा कि गाँव के किसी भी परिवार से अभी तक कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई है।
‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, रतलाम की कलेक्टर मिशा सिंह ने कहा कि मामले को संज्ञान में लिया गया है और जांच जारी है, साथ ही उन्होंने इस बात से इनकार किया कि यह निर्णय ‘ग्राम सभा’ द्वारा लिया गया था. ‘द हिंदू’ ने कलेक्टर सिंह के हवाले से बताया, “यह हाल ही का वीडियो है, जहां मनोहर नाम के व्यक्ति के नेतृत्व में कुछ स्थानीय लोगों ने ऐसे निर्णय लिए और घोषणाएं कीं.
क्रिकेट का ‘डबल स्टैंडर्ड’? भारत को दुबई मिला, लेकिन बांग्लादेश को वर्ल्ड कप से किया गया बाहर
स्कॉटलैंड ने आधिकारिक तौर पर 2026 टी20 विश्व कप में बांग्लादेश की जगह ले ली है. अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने बांग्लादेश के वेन्यू (मैदान) बदलने के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया. इस फैसले ने ‘डबल स्टैंडर्ड’ (दोहरे मानदंड) की बहस छेड़ दी है, क्योंकि पिछले साल चैंपियंस ट्रॉफी में भारत की पाकिस्तान न जाने की जिद को मान लिया गया था और उनके मैच दुबई में कराए गए थे. विजडन क्रिकेट में सारा वारिस का विश्लेषण प्रकाशित हुआ है.
कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) ने बीसीसीआई के निर्देशों पर बांग्लादेश के तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को आईपीएल 2026 के स्क्वाड से “हालिया घटनाक्रमों” का हवाला देते हुए रिलीज कर दिया. इसे भारत-बांग्लादेश के बिगड़ते रिश्तों और भू-राजनीतिक तनाव से जोड़कर देखा गया. इसके बाद, बांग्लादेश ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए भारत में होने वाले टी20 वर्ल्ड कप में खेलने से इनकार कर दिया और अपने मैच श्रीलंका में शिफ्ट करने का अनुरोध किया. कई बैठकों के बावजूद, आईसीसी ने अनुरोध खारिज कर दिया और 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया. शनिवार को बांग्लादेश ने आधिकारिक तौर पर टूर्नामेंट से अपना नाम वापस ले लिया. इसके कुछ ही घंटों बाद, पीसीबी चेयरमैन मोहसिन नकवी ने आईसीसी पर “दोहरे मानदंड” का आरोप लगाया.
2025 चैंपियंस ट्रॉफी से पहले, भारत ने पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था. तीन महीने चले इस ड्रामे के बाद, आईसीसी ने एक ‘हाइब्रिड मॉडल’ अपनाया, जिसके तहत भारत के मैच दुबई में हुए. यह भारत को एक अनुचित लाभ देने के रूप में देखा गया, खासकर तब जब पाकिस्तान 2023 वर्ल्ड कप के लिए भारत आया था.
भारत ने तीन महीने पहले अपनी मंशा जाहिर कर दी थी, जबकि बांग्लादेश ने टूर्नामेंट से बमुश्किल एक महीना पहले अपनी चिंताएं उठाईं. लेकिन क्या सिर्फ टाइमिंग इस भेदभाव को सही ठहरा सकती है? भारत ने बिना किसी स्पष्ट कारण के रहमान को हटाकर एक राजनीतिक संदेश दिया, जिसे बांग्लादेश ने सुरक्षा खतरे के रूप में देखा. भारत ने क्रिकेट के जरिए राजनीतिक संदेश देने के लिए अपनी प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल किया. बांग्लादेश अपने खिलाड़ियों की सुरक्षा और स्वाभिमान के लिए अड़ा रहा, लेकिन उनके पास भारत जैसा रसूख और पैसा नहीं था. भारत जानता है कि उसके बिना कोई आईसीसी इवेंट नहीं हो सकता. नतीजा यह हुआ कि जहां भारत को अपनी जिद पूरी करने का मौका मिला, वहीं बांग्लादेश को टूर्नामेंट से ही बाहर होना पड़ा. यह महज संयोग नहीं हो सकता.
केरल बस कांड
बस में औरत को अनुचित तरीके से छूते मर्द का उसने वीडियो बनाया और सोशल मीडिया में डाला. मर्द ने तीन दिन बाद खुदकुशी कर ली. औरत को खुदकुशी के लिए उकसाने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया और अदालत ने जमानत पर फैसला टाल दिया..
शिमजिता मुस्तफा की गिरफ्तारी पर एक्टिविस्ट्स ने क्यों उठाए सवाल? 5 कारण
स्क्रोल.इन में जोहाना दीक्षा की रिपोर्ट के मुताबिक केरल के कोझिकोड की रहने वाली शिम्जिता मुस्तफा को एक बस में वीडियो बनाने के बाद एक व्यक्ति (यू दीपक) को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. 24 जनवरी को कुन्नमंगलम की एक अदालत ने उनकी जमानत याचिका पर फैसला टाल दिया. पुलिस का तर्क है कि अगर उन्हें रिहा किया गया तो वे “समान अपराध कर सकती हैं और अन्य महिलाओं को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं.”
मामला क्या है? कहानी की मुख्य किरदार हैं कोझिकोड की एक व्लॉगर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, शिमजिता मुस्तफा. 16 जनवरी 2026 को वो एक बस में सफर कर रही थीं. उन्होंने आरोप लगाया कि बस में उनके पास खड़े एक शख्स, यू. दीपक (42 वर्ष) ने उन्हें गलत तरीके से छुआ. बजाय पुलिस के पास जाने के, शिमजिता ने उसी वक्त दीपक का वीडियो बनाया, उसे बस में कन्फ्रंट किया और बाद में वह वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया. वीडियो में वो दीपक का चेहरा दिखाते हुए उन पर आरोप लगा रही थीं. यहीं से मामला पूरी तरह पलट गया. वीडियो जंगल की आग की तरह वायरल हो गया. दीपक, जो पेशे से एक पेंटर थे, कथित तौर पर इस अचानक मिली बदनामी और सोशल मीडिया पर हो रही ट्रोलिंग को बर्दाश्त नहीं कर पाए. वीडियो सामने आने के दो दिन बाद, 18 जनवरी को उनका शव उनके घर पर मिला. पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया. दीपक के परिवार का कहना था कि वो निर्दोष थे और सोशल मीडिया पर हुई ‘मॉब लिंचिंग’ जैसी बेइज्जती ने उनकी जान ले ली.
दीपक की मौत के बाद जनआक्रोश शिमजिता की तरफ मुड़ गया. पुलिस ने कार्रवाई करते हुए शिमजिता को ‘आत्महत्या के लिए उकसाने’ के गंभीर आरोप में गिरफ्तार कर लिया. जब उन्होंने कोर्ट से जमानत मांगी, तो 27 जनवरी को अदालत ने उसे खारिज कर दिया. पुलिस का तर्क था कि समाज में गलत संदेश जाएगा और वे वीडियो के असली फुटेज की जांच कर रहे हैं.
अब यह मामला दो तीखे मतों में बंट गया है.
एक बड़ा वर्ग, जिसमें सोशल मीडिया यूजर्स शामिल हैं, का मानना है कि शिमजिता ने कानून हाथ में लिया और “सोशल मीडिया ट्रायल” चलाया. उनका कहना है कि अगर छेड़छाड़ हुई भी थी, तो पुलिस के पास जाना चाहिए था, न कि किसी की सार्वजनिक रूप से धज्जियां उड़ानी चाहिए थीं. आरोप लग रहे हैं कि यह सब “लाइक्स और फॉलोअर्स” के लिए किया गया, जिसकी कीमत एक आदमी को जान देकर चुकानी पड़ी.
दूसरी तरफ, महिला अधिकार कार्यकर्ता और कई वकील (जैसा कि स्क्रॉल और द हिंदू की रिपोर्ट्स में बताया गया है) शिमजिता के समर्थन में हैं और पुलिस की कार्रवाई को बहुत सख्त मान रहे हैं. उनका तर्क है कि सार्वजनिक जगहों पर महिलाएं अक्सर असुरक्षित महसूस करती हैं और वीडियो बनाना उनका एक ‘सेल्फ-डिफेंस’ यानी बचाव का तरीका है. उनका कहना है कि अगर पुलिस थानों में महिलाओं की सुनवाई आसानी से होती, तो शायद उन्हें सोशल मीडिया पर न्याय नहीं मांगना पड़ता. एक्टिविस्ट्स का मानना है कि शिमजिता को एक आदतन अपराधी की तरह जेल में रखना ज्यादती है और यह बाकी महिलाओं को अपनी आवाज उठाने से डराएगा.
फिलहाल, शिमजिता जेल में हैं और यह मामला इस बात का उदाहरण बन गया है कि कैसे एक वीडियो किसी की जिंदगी खत्म कर सकता है और कैसे न्याय और सोशल मीडिया के बीच की लकीर धुंधली हो गई है.
सोशल मीडिया पर शिम्जिता के खिलाफ माहौल गरमाया हुआ है, लेकिन महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और फेमिनिस्ट्स ने उनकी गिरफ्तारी पर गंभीर सवाल उठाए हैं. स्क्रोल ने उनसे बात करके 5 प्रमुख कारण बताए कि क्यों इस मामले पर पुनर्विचार की जरूरत है:
1. सार्वजनिक स्थानों पर वीडियो बनाना कोई अपराध नहीं
अधिवक्ता संध्या राजू का कहना है कि सार्वजनिक बस में वीडियो बनाने पर कोई कानूनी रोक नहीं है. यह आक्रोश इसलिए है क्योंकि समाज नहीं चाहता कि महिलाएं अपनी सुरक्षा के लिए तकनीक का इस्तेमाल करें. हाल के वर्षों में कई महिलाओं ने अपनी सुरक्षा के लिए ऐसी घटनाओं को रिकॉर्ड किया है.
2. वीडियो बनाना आत्मरक्षा का नया रूप है
केरल में सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ आम है. पहले महिलाएं सेफ्टी पिन का इस्तेमाल करती थीं, अब वे फोन का इस्तेमाल कर रही हैं. लेखिका सरयू पानी कहती हैं कि वीडियो बनाने से शायद कोई और अपराधी ऐसा करने से पहले दो बार सोचे.
3. शिम्जिता की बॉडी लैंग्वेज का विश्लेषण गलत है
लोग वीडियो में शिम्जिता के हाव-भाव और दीपक के पास खड़े होने का विश्लेषण कर रहे हैं. एक्टिविस्ट मृदुला भवानी का कहना है कि हर महिला का प्रतिक्रिया देने का तरीका अलग होता है—कुछ शांत रहती हैं, कुछ चिल्लाती हैं. क्लिप के आधार पर पूरे परिदृश्य का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.
4. पुलिस के पास न जाना गलत नीयत का सबूत नहीं
आलोचक कह रहे हैं कि उन्हें वीडियो पोस्ट करने के बजाय पुलिस के पास जाना चाहिए था. लेकिन कार्यकर्ताओं का तर्क है कि भारतीय पुलिस स्टेशनों में अक्सर महिलाओं की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता और उन्हें मामले वापस लेने के लिए कहा जाता है. इसलिए महिलाएं सोशल मीडिया का सहारा लेती हैं.
5. जमानत न देना अधिकारों का उल्लंघन है
संध्या राजू ने जमानत खारिज करने को “अत्याचारी” बताया. उनका तर्क है कि शिम्जिता के भागने का कोई जोखिम नहीं है और पुलिस ने उनका फोन जब्त कर लिया है, जो सबूत है. उन्हें केवल जनआक्रोश के कारण गिरफ्तार किया गया है, जैसे वे कोई आतंकवादी हों.
चीन में बड़ी हलचल: शी जिनपिंग ने अपने सबसे बड़े जनरल को हटाया, सेना में बगावत का डर ?
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के शीर्ष नेतृत्व में भारी उथल-पुथल मची हुई है. सप्ताहांत में चीन के शीर्ष जनरल झांग यूक्सिया और एक अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, जनरल लियू झेनली को उनके पदों से हटा दिया गया है. इस ‘सफाई अभियान’ ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं कि चीन के कुलीन वर्गों में सत्ता को लेकर क्या संघर्ष चल रहा है और इसका चीन की युद्ध क्षमता पर क्या असर पड़ेगा—खासकर ताइवान पर हमला करने या किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष की महत्वाकांक्षाओं पर. बीबीसी में स्टीफन मैकडोनेल का विश्लेषण है.
75 वर्षीय झांग, सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (सीएमसी) के वाइस-चेयरमैन थे. यह कम्युनिस्ट पार्टी का वह समूह है जिसका नेतृत्व देश के नेता शी जिनपिंग करते हैं और जो सशस्त्र बलों को नियंत्रित करता है. आमतौर पर सीएमसी में लगभग सात सदस्य होते हैं, लेकिन अब यह घटकर सिर्फ दो सदस्यों तक रह गया है—खुद शी जिनपिंग और जनरल झांग शेंगमिन. बाकी सभी को पिछली गिरफ्तारियों की लहर के बाद “भ्रष्टाचार विरोधी” कार्रवाई में हटा दिया गया है. यह कमीशन लाखों सैनिकों को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार है और यह इतना शक्तिशाली है कि 1980 के दशक में देंग शियाओपिंग ने अधिकांश समय केवल यही एक पद अपने पास रखा था.
एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के लाइल मॉरिस ने बीबीसी को बताया कि केवल शी और एक सीएमसी जनरल का बचना अभूतपूर्व है. उन्होंने कहा, “पीएलए अव्यवस्था की स्थिति में है और अब वहां एक बड़ा नेतृत्व शून्य पैदा हो गया है.” जब उनसे पूछा गया कि इतने सारे शीर्ष जनरलों को हटाने के पीछे असली वजह क्या है, तो उन्होंने कहा, “कई तरह की अफवाहें उड़ रही हैं... परमाणु रहस्यों को अमेरिका को लीक करने से लेकर तख्तापलट की साजिश और गुटीय अंदरूनी लड़ाई तक. बीजिंग में गोलीबारी की अफवाहें भी हैं.”
आधिकारिक घोषणा में कहा गया है कि झांग और लियू “जांच के दायरे में” हैं और उन पर “अनुशासन और कानून के गंभीर उल्लंघन” का आरोप है, जो भ्रष्टाचार के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक शब्द है. पीएलए डेली ने एक संपादकीय में स्पष्ट किया कि कम्युनिस्ट पार्टी का भ्रष्टाचार के प्रति “जीरो टॉलरेंस” है, चाहे व्यक्ति का पद कितना भी ऊंचा क्यों न हो. हालांकि, विशिष्ट आरोप सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन जांच के दायरे में आने का मतलब लगभग निश्चित रूप से जेल की सजा है.
विश्लेषकों का मानना है कि जनरलों को निशाना बनाना भ्रष्टाचार के बारे में हो सकता है, लेकिन यह ‘पावर पॉलिटिक्स’ भी हो सकता है. शी जिनपिंग पर आरोप लगते रहे हैं कि वे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को खत्म करने के लिए भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का इस्तेमाल करते हैं. इससे शी को चेयरमैन माओ के बाद सबसे ज्यादा अनियंत्रित शक्ति मिल गई है. लेकिन इस तरह का नेतृत्व उल्टा भी पड़ सकता है. सेना में शक का माहौल कमजोर निर्णय लेने की क्षमता को जन्म दे सकता है.
झांग के पिता शी के पिता के क्रांतिकारी साथी थे, और उन्हें शी का करीबी माना जाता था. उनका हटाया जाना यह संदेश देता है कि कोई भी सुरक्षित नहीं है. वह पीएलए में युद्ध के अनुभव वाले गिने-चुने अधिकारियों में से एक थे. विश्लेषक अब यह आकलन कर रहे हैं कि क्या इन हटाए जाने की घटनाओं ने ताइवान पर हमले की संभावनाओं को बाधित किया है. हालांकि कुछ का मानना है कि यह ‘सफाई अभियान’ ताइवान को नियंत्रित करने की चीन की महत्वाकांक्षाओं को प्रभावित नहीं करेगा, लेकिन शीर्ष सैन्य पेशेवरों के बिना, आक्रामकता से जुड़े फैसले अब और भी ज्यादा शी जिनपिंग की व्यक्तिगत पसंद और सनक पर केंद्रित होंगे.
“यूरोप खुद अपने खिलाफ युद्ध को फंड कर रहा है”: भारत से रूसी तेल खरीदने पर अमेरिका भड़का
अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने यूरोप पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने कहा कि अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने के लिए भारत पर 25% टैरिफ (आयात शुल्क) लगाया है, लेकिन यूरोपीय देशों ने नई दिल्ली के साथ एक ट्रेड डील साइन कर ली है. बेसेंट ने जोर देकर कहा कि यूरोप भारत से रिफाइंड (परिष्कृत) रूसी तेल उत्पाद खरीदकर अपने ही खिलाफ छेड़े गए “युद्ध” को वित्तपोषित कर रहा है.
बेसेंट ने एबीसी न्यूज को बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रूस-यूक्रेन संघर्ष पर समझौता करने के लिए काम कर रहे हैं और अमेरिका ने यूरोप की तुलना में बहुत बड़े बलिदान दिए हैं. उन्होंने कहा, “हमने रूसी तेल खरीदने के लिए भारत पर 25% टैरिफ लगाया है. और अंदाजा लगाइए कि पिछले हफ्ते क्या हुआ? यूरोपीय लोगों ने भारत के साथ एक व्यापार समझौता किया.”
उन्होंने आगे समझाया, “स्पष्ट कर दूं कि रूसी तेल भारत जाता है, वहां से रिफाइंड उत्पाद बाहर आते हैं, और यूरोपीय देश उन रिफाइंड उत्पादों को खरीदते हैं. वे अपने ही खिलाफ युद्ध को फंड कर रहे हैं.” उन्होंने कहा कि ट्रंप के नेतृत्व में वे अंततः रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त कर देंगे.
ट्रंप प्रशासन ने भारत पर कुल 50% टैरिफ लगाया है, जिसमें दिल्ली द्वारा रूसी तेल की खरीद के लिए 25% शामिल है. दूसरी तरफ, भारत और यूरोपीय संघ 27 जनवरी को एक मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने और बातचीत के निष्कर्ष की घोषणा करने के लिए तैयार हैं. इसका उद्देश्य अमेरिकी टैरिफ के कारण वैश्विक व्यापार में आए व्यवधानों के बीच दोनों क्षेत्रों के बीच आर्थिक संबंधों को बढ़ावा देना है. ये बातचीत 2007 में शुरू हुई थी.
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन, जो वर्तमान में भारत में हैं और नई दिल्ली में 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि थीं, ने ईयू-इंडिया एफटीए को “सभी व्यापार समझौतों की जननी” करार दिया है.
“दोस्त नहीं, नौकर चाहता है अमेरिका”: ट्रंप की नीतियों और भारत की दुविधा पर डॉ. नंदिनी देव
अमेरिका, यूरोप और पूरी दुनिया इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रही है जिसे कनाडा के पूर्व गवर्नर मार्क कार्नी ने “पुरानी दुनिया का अंत” करार दिया है. ‘हरकारा डीप डाइव’ पर वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी के साथ बातचीत में, जॉर्ज टाउन यूनिवर्सिटी (कतर) की एसोसिएट प्रोफेसर और राजनीति विज्ञान की विशेषज्ञ डॉ. नंदिनी देव ने वर्तमान भू-राजनीतिक उथल-पुथल पर अपनी बेबाक राय रखी. डॉ. देव का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप के शासन में अमेरिका तेजी से अलग-थलग पड़ रहा है. लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रंप इसे अपनी विफलता नहीं मानते. नंदिनी देव कहती हैं, “ट्रंप को दोस्तों की जरूरत नहीं है. वो चाहते हैं कि देश उनके मित्र न रहें, बल्कि उनके नौकर बनें. उनकी नजर में मंच पर सिर्फ अमेरिका खड़ा होना चाहिए और बाकी सब नीचे.”
हाल ही में ग्रीनलैंड को खरीदने या कब्जाने की धमकी और फिर उसे वापस लेने का घटनाक्रम यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अब कोई नियम नहीं बचे हैं. डॉ. देव के अनुसार, पहले ताकतवर देश अपनी मनमानी के लिए कोई नैतिक बहाना (जैसे लोकतंत्र या मानवाधिकार) देते थे, लेकिन अब वह पर्दा भी हट चुका है. बातचीत का एक अहम हिस्सा भारत की कूटनीतिक स्थिति पर केंद्रित रहा. निधीश त्यागी ने रेखांकित किया कि कैसे प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप के बीच की पुरानी “गर्मजोशी” अब ठंडी पड़ती दिख रही है. भारत पर बढ़ते टैरिफ और वीजा प्रतिबंधों के बीच, डॉ. देव का मानना है कि भारत के लिए अब अमेरिका की तरफ देखना मुश्किल है.
डॉ. देव ने कहा, “अमेरिका में फैसले अब किसी रणनीति के तहत नहीं, बल्कि एक व्यक्ति (ट्रंप) की सनक पर हो रहे हैं. ऐसे में भारत के लिए यूरोपीय यूनियन (ईयू) के साथ व्यापार समझौते और ऑस्ट्रेलिया या रूस जैसे अन्य देशों के साथ संबंध मजबूत करना ज्यादा व्यावहारिक होगा.” शो में इस बात पर भी चर्चा हुई कि यूरोप अब अमेरिका की “दादागिरी” सहने के मूड में नहीं है. जर्मनी, फ्रांस और पोलैंड जैसे देश अब अपनी सुरक्षा और नीतियों के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम कर रहे हैं. हालांकि, डॉ. देव ने चेतावनी दी कि आने वाले समय में अनिश्चितता और बढ़ेगी. उन्होंने कहा, “हर दो हफ्ते में कोई नया संकट खड़ा हो रहा है. आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र (अमेरिका) ही सबसे बड़ी अस्थिरता की वजह बनता दिख रहा है.”
पूरी बातचीत हरकारा के यूट्यूब चैनल पर .
टली साब, रेडियो और पत्रकारिता के स्तंभ थे
मार्क टली सिर्फ़ एक विदेशी संवाददाता नहीं थे; वे भारत की आत्मा को समझते थे. रविवार को 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. सोमवार को नई दिल्ली के लोधी श्मशान घाट पर उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ी, जो भारत के प्रति उनके गहरे जुड़ाव का प्रमाण थी. टली का भारत प्रेम जगजाहिर था. 1983 में जब भारत ने पहली बार क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता, तो टली पुरानी दिल्ली में अपने दोस्त सतीश जैकब के पास दौड़ते हुए पहुंचे और चिल्लाए, “हम वर्ल्ड कप जीत गया! हम साला वर्ल्ड जीत गया!” और फिर हाथ में व्हिस्की की बोतल लिए भीड़ में नाचने लगे.
एक दौर था, जब दुनिया भारत को टली की नज़रों से ही देखती थी. भारत में भी बीबीसी वर्ल्ड सर्विस विश्वसनीयता का प्रतीक थी. कहा जाता है कि राजीव गांधी ने अपनी मां इंदिरा गांधी की हत्या की खबर पर तब तक यकीन नहीं किया जब तक उन्होंने मार्क टली को बीबीसी पर इसकी पुष्टि करते नहीं सुन लिया. टली का जन्म 1935 में कलकत्ते के टॉलीगंज में हुआ था. हालांकि उनकी परवरिश एक अंग्रेज की तरह हुई थी, लेकिन वे भारत लौट आए और 1965 में बीबीसी से जुड़े. 1970 के दशक की शुरुआत में वे बीबीसी के भारत ब्यूरो चीफ बने और 1993 तक इस पद पर रहे.
उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार को कवर किया, जब सेना स्वर्ण मंदिर में दाखिल हुई थी. उन्होंने पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की फांसी की खबर सबसे पहले ब्रेक की थी. इमरजेंसी के दौरान, जब भारतीय मीडिया पर सेंसरशिप थी, टली और बीबीसी सूचना का एकमात्र विश्वसनीय स्रोत बन गए थे, जिसके चलते उन्हें कुछ समय के लिए देश से निष्कासित भी कर दिया गया था.
टली को भारत से इतना प्यार था कि उन्होंने इंग्लैंड को एक “दुखी और अंधेरी जगह” बताया और भारत में ही रहना पसंद किया. उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शोक व्यक्त किया, जो एक ब्रिटिश पत्रकार के लिए एक असाधारण सम्मान है. टेलीग्राफ में परन बालकृष्णन ने उन पर स्मृति लेख लिखा है.
माधव गाडगिल: पर्यावरण के संरक्षक का प्रस्थान
“द वायर’ में शुभेंद्र त्यागी ने प्रसिद्ध पारिस्थितिकी विज्ञानी माधव गाडगिल के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके जीवन, कार्यों और उनके पर्यावरण संरक्षण के अनूठे भारतीय मॉडल को याद किया है.
स्मृति शेष में वह लिखते हैं कि माधव गाडगिल का मानना था कि भारत के लिए पश्चिमी देशों (यूरोप व अमेरिका) का संरक्षण मॉडल उपयुक्त नहीं है. पश्चिम में प्रकृति को मनुष्य से अलग रखकर बचाने की बात की जाती है, जबकि गाडगिल का तर्क था कि भारत के वन कभी निर्जन नहीं रहे. यहां की एक बड़ी आबादी सदियों से आजीविका के लिए वनों पर निर्भर रही है. उन्होंने हमेशा पर्यावरण को ‘मनुष्य और उसकी आजीविका’ के साथ जोड़कर देखा.
1942 में पुणे में जन्मे गाडगिल पर उनके पिता, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री धनंजय रामचंद्र गाडगिल का गहरा प्रभाव था. उन्होंने पुणे की पहाड़ियों और पश्चिमी घाट की प्राकृतिक सुंदरता के बीच अपना बचपन बिताया, जहाँ से उनमें प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम जागा. प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सालिम अली की पुस्तक ने भी उन्हें प्रेरित किया.
उन्होंने रामचंद्र गुहा के साथ मिलकर ‘द फिस्वर्ड लैंड’- हिंदी अनुवाद ‘दरकती ज़मीन’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं. इस पुस्तक में उन्होंने स्थापित किया कि चाहे पूंजीवाद हो या समाजवाद, दोनों ही औद्योगिक प्रणालियों ने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन एक ही तरीके से किया है. उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आजाद भारत की वन नीतियां भी काफी हद तक औपनिवेशिक काल जैसी ही रहीं, जिससे जनता का वनों पर अधिकार कम हुआ और सामाजिक संघर्ष बढ़े.
गाडगिल को उनकी सादगी और विनम्रता के लिए जाना जाता था. उन्होंने मछुआरों, किसानों और आदिवासियों के बीच रहकर उनके जीवन को समझा. वे केवल एक बंद कमरे वाले वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि ‘पीपुल्स इकोलॉजिस्ट’ (जनता के पारिस्थितिकी विज्ञानी) थे.
गाडगिल एक ऐसे भविष्य का सपना देखते थे, जहां सामाजिक समरसता और संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग साथ-साथ चलें. आज जब जलवायु संकट और संसाधनों के लिए संघर्ष बढ़ रहा है, उनके विचार और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं. उनके निधन को पर्यावरण जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया गया है.
अपील :
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