27/02/2026: पाक -अफ़गान जंग शुरू ? | केजरीवाल बरी, राजनीतिक मायने क्या | अजीत पवार को क्लीन चिट | गंगा समेत 46 % नदियां प्रदूषित | वक्फ़ जायदादों के लिए नई डेडलाइन | पत्रकारों की रिकॉर्ड हत्याएं |
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
पाकिस्तान और तालिबान के बीच खुला संघर्ष। हवाई हमलों में 274 तालिबानी लड़ाके मारे गए
आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया बरी। कोर्ट ने सीबीआई जांच को सिरे से नकारा
केजरीवाल के आंसुओं पर कांग्रेस का तंज. राहुल गांधी को बताया शेर. पंजाब की राजनीति में भी तल्ख हुई खींचतान
25 हजार करोड़ के बैंक घोटाले में अजित पवार को क्लीन चिट. कोर्ट ने ईओडब्ल्यू की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकारी
मुजफ्फरनगर में हाउस जिहाद का विवाद. मुस्लिम परिवार को घर छोड़ने की धमकी के बाद हड़कंप
भारत की जीडीपी 7.8 प्रतिशत बढ़ी.
कंपनियों को कुशल टैलेंट मिलने में 82 प्रतिशत की भारी दिक्कत
कमजोर रुपये की मार. एनआरआई जमा प्रवाह में 16 प्रतिशत की बड़ी गिरावट.
गंगा समेत दुनिया की 46 प्रतिशत नदियाँ असुरक्षित. प्रदूषण रोकने के लिए उत्तराखंड सरकार का नया अभियान
शिलॉन्ग में दो अग्निवीर प्रशिक्षुओं की मौत. संदिग्ध मेनिंगोकोकल संक्रमण के बाद सैन्य अस्पताल में अलर्ट
दिल्ली देहरादून एक्सप्रेसवे पर नफरती संदेश। हिंदू रक्षा दल के सदस्यों पर मुकदमा दर्ज।
नेतन्याहू से गले मिले प्रधानमंत्री मोदी। विदेश नीति के इस कदम पर उठे कूटनीतिक सवाल।
वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण की अंतिम दौड़। 12 मार्च तक का समय और पोर्टल पर दस्तावेजों की लंबी कतार
पत्रकारों के लिए सबसे घातक साल 2025। सीपीजे की रिपोर्ट में दावा, 81 प्रतिशत मौतों के लिए इजराइली बल जिम्मेदार
पाकिस्तान का दावा: हवाई हमलों में 274 तालिबानी लड़ाके मारे गए; अफ़गानों को और अधिक तनाव बढ़ने का डर
“रॉयटर्स” और एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के हवाई हमलों ने 22 अफ़गान सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है. यह कार्रवाई दोनों दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के बीच रात भर चली भारी लड़ाई के बाद हुई है.
सैन्य प्रवक्ता अहमद शरीफ चौधरी ने बताया कि गुरुवार रात से अब तक कम से कम 12 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए हैं और 274 तालिबानी अधिकारी व उग्रवादी मारे गए हैं. हालांकि, दोनों पक्षों ने घटनाक्रम को लेकर बिल्कुल अलग-अलग विवरण पेश किए हैं.
तालिबान सरकार ने शुक्रवार के हवाई हमलों की पुष्टि की है. प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि अफ़गान सेना ने 55 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया है, जबकि अफ़गान सैनिकों की मृत्यु संख्या 13 बताई है. अफ़गान सरकार ने दो पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर कब्ज़ा करने का भी दावा किया है.
तालिबान के एक बयान में कहा गया, “कुल 55 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, दो बेस और 19 चौकियों पर कब्ज़ा कर लिया गया. ये हमले पक्तिका, पक्तिया, खोस्त, नंगरहार, कुनार और नुरिस्तान प्रांतों के पास डूरंड रेखा के साथ पाकिस्तानी सैन्य बलों को निशाना बनाकर किए गए थे. इन ऑपरेशनों में निर्धारित लक्ष्य योजना के अनुसार हासिल किए गए और आधी रात को इस्लामिक अमीरात के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ के आदेश पर लड़ाई रोक दी गई.”
इस सप्ताह पड़ोसियों के बीच जारी भीषण लड़ाई के बीच, अफ़गान तालिबान के प्रवक्ता मुजाहिद ने शुक्रवार को रॉयटर्स के संवाददाताओं से कहा कि अफ़गानिस्तान पाकिस्तान के साथ अपने इस ताज़ा संघर्ष को बातचीत के माध्यम से हल करना चाहता है.
ये हमले पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के तालिबान अधिकारियों के बीच बढ़ते तनाव का हिस्सा हैं. कभी करीबी सहयोगी रहे ये दोनों देश अब सीमा पार हमले कर रहे हैं और पाकिस्तान ने स्थिति को ‘खुले संघर्ष’ के रूप में वर्णित किया है.
रॉयटर्स द्वारा सत्यापित वीडियो में पश्चिमी काबुल के आवासीय पड़ोस दारुलअमन के ऊपर काले धुएं का घना गुबार उठता हुआ दिखाई दिया, जहाँ कई सरकारी और सैन्य परिसर भी स्थित हैं. वहां एक डिपो के हिस्से में आग लग गई और अंदर गोला-बारूद फटने से बार-बार होने वाले धमाकों ने रात के आसमान को रोशन कर दिया.
पाकिस्तानी हवाई हमलों ने रात भर काबुल के पश्चिमी बाहरी इलाके में एक हथियार डिपो को निशाना बनाया, जिससे घंटों तक द्वितीयक विस्फोट होते रहे. इन धमाकों से अफ़गान राजधानी के घर दहल गए और निवासियों में और अधिक हिंसा फैलने का डर पैदा हो गया है.
न्यायिक जांच में टिकने योग्य नहीं है मामला: आबकारी मामले में केजरीवाल और सिसोदिया समेत 23 आरोपी बरी
दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार को सीबीआई द्वारा 2022 में दर्ज किए गए आबकारी नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित 23 आरोपियों को दोषमुक्त (बरी) कर दिया. इस मामले में शराब नीति बनाने में साजिश और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे.
‘एचटी’ की खबर के अनुसार, राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने यह आदेश पारित किया. न्यायाधीश ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि उन्हें अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों का समर्थन करने के लिए आरोपियों के खिलाफ कोई भी ठोस सामग्री नहीं मिली.
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला कई आंतरिक अंतर्विरोधों से ग्रस्त है, जो नीति में कथित साजिश की मूल भावना पर ही चोट करते हैं.
अदालत ने कहा, “यह मामला न्यायिक जांच में टिकने योग्य नहीं है.” न्यायाधीश ने आगे टिप्पणी की, “आरोपपत्र में भ्रामक अनुमान लगाए गए हैं... इसमें कई खामियां हैं जो पेश किए गए सबूतों का समर्थन नहीं करती हैं.”
कोर्ट के फैसले के बाद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय राजधानी में नए सिरे से चुनाव कराने की चुनौती दी. उन्होंने कहा कि यदि सत्ताधारी भाजपा 10 से अधिक सीटें जीतती है, तो वे राजनीति छोड़ देंगे. ‘आप’ प्रमुख ने भाजपा पर तीखा हमला बोला और दावा किया कि उन्होंने यह साजिश यह देखकर रची कि दिल्ली के लोग पार्टी के काम से खुश थे और उसे हराया नहीं जा सकता था.
अदालत ने चार्जशीट में केजरीवाल और अन्य के खिलाफ ‘साउथ ग्रुप’ शब्द के बार-बार इस्तेमाल पर सवाल उठाए. विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने टिप्पणी की, “मुझे लगता है कि इस तरह की शब्दावली से बचना चाहिए... क्या यह संभव है कि अगर सीबीआई ने यही चार्जशीट चेन्नई की किसी अदालत में दाखिल की होती, तो इसे अपमानजनक नहीं माना जाता?” अदालत ने विशेष लोक अभियोजक से यह भी सवाल किया कि यह शब्द किसने गढ़ा है? न्यायाधीश ने पूछा, “आपने यह क्यों नहीं कहा कि आरोपियों में जो उत्तर के हैं, वे ‘नॉर्थ ग्रुप’ हैं?”
राहुल को ‘शेर’ दिखाते मीम के साथ कांग्रेस ने केजरीवाल और उनके आंसुओं पर बोला हमला; केजरीवाल ने वाड्रा का नाम लिया
आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल शुक्रवार को उस समय फूट-फूट कर रो पड़े, जब दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और 21 अन्य लोगों को 2021-22 की दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े सीबीआई मामले में आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) कर दिया. लेकिन यह धारणा कि इससे विपक्षी खेमे में सहानुभूति या एकता पैदा होगी, मीम्स और तीखे हमलों के बीच जल्द ही खत्म हो गई.
आरिश छाबड़ा की रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस नेता गुरदीप सिंह सप्पल ने पूछा कि क्या केजरीवाल के आंसुओं में उन आरोपों के लिए “थोड़ा पछतावा भी है” जो उन्होंने पिछले वर्षों में कांग्रेस पार्टी पर लगाए थे, विशेष रूप से 2011-12 में आप की शुरुआत के समय. सप्पल ने ‘एक्स’ पर लिखा, “झूठे आरोप, नकली मसीहा, खोखला लोकपाल — यह सब उनके द्वारा रचे गए ढोंग का हिस्सा थे.” उन्होंने कहा कि केजरीवाल का शुरुआती राजनीतिक करियर पूर्व पीएम मनमोहन सिंह, पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और दिवंगत दिल्ली सीएम शीला दीक्षित को निशाना बनाकर बना था.
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा और भी हमलावर दिखे. उन्होंने सुझाव दिया कि भाजपा नीत केंद्र सरकार के नियंत्रण वाली सीबीआई ने जानबूझकर अपना मामला कमजोर किया होगा. खेड़ा ने ‘एक्स’ पर लिखा, “यह भाजपा की कार्यशैली है: शासन के रूप में प्रतिशोध और अभियान के उपकरण के रूप में एजेंसियां.” उन्होंने कहा, “आप और अन्य में उनके ‘सुविधाजनक सहयोगियों’ के खिलाफ कार्यवाही गुजरात और पंजाब चुनावों के आलोक में चुपचाप गायब हो जाएगी.” उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया कि हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने तमिलनाडु चुनावों से पहले एयरसेल मैक्सिस और आईएनएक्स मीडिया मामलों में कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के खिलाफ कार्यवाही तेज करने की कोशिश की है.
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने भावुक होने पर केजरीवाल का मजाक उड़ाने की कोशिश की. ‘एक्स’ पर आप सुप्रीमो के रोने वाले एक मीम (साउंड इफेक्ट के साथ) में श्रीनेत ने राहुल गांधी को “हमारा नेता, एक शेर” बताया क्योंकि वे कथित तौर पर “32 मामलों” का सामना कर रहे हैं, जबकि केजरीवाल के पास “एक मामला” है.
केजरीवाल ने भी कांग्रेस की टिप्पणियों का जवाब दिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, “मैं कांग्रेस से पूछना चाहता हूँ — केजरीवाल जेल गए; क्या रॉबर्ट वाड्रा जेल गए? (आप नेता) संजय सिंह जेल गए. क्या राहुल गांधी जेल गए?... कांग्रेस क्या कह रही है? क्या उसे कोई शर्म नहीं है?”
आप ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन के हिस्से के रूप में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था, लेकिन उसके बाद से वह राष्ट्रीय विपक्ष के नेतृत्व के प्रति ठंडी रही है. पंजाब और अन्य जगहों पर इन पार्टियों का एक-दूसरे के विपरीत होना इसका एक बड़ा कारण प्रतीत होता है. इस राजनीतिक वाकयुद्ध के केंद्र में पंजाब का मुद्दा भी शामिल है. राज्य में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं, और भगवंत मान के नेतृत्व वाली ‘आप’ सरकार के सामने वहां कांग्रेस ही मुख्य विपक्षी दल है.
हालांकि, कोर्ट के फैसले के बाद केजरीवाल को गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों का समर्थन जरूर मिला. सीपीएम ने कहा कि मोदी सरकार द्वारा “जांच एजेंसियों को राजनीतिक प्रतिशोध के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना पूरी तरह उजागर हो गया है.” तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया: “सत्यमेव जयते! भाजपा समय रहते सबक सीख ले — आपके ईडी और सीबीआई के सभी कठपुतले सच्चाई के सामने ढेर हो जाएंगे”.
तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी के. कविता, जो खुद भी दोषमुक्त होने वालों में शामिल हैं, ने बस इतना कहा: “यह झूठ का जाल था. न्यायपालिका ने इसे पूरी तरह काट दिया है”.
मुंबई की अदालत ने 25 हजार करोड़ रुपये के बैंक घोटाले में अजीत पवार के परिवार को क्लीन चिट दी
सुधीर सूर्यवंशी की रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई की एक विशेष अदालत ने शुक्रवार को महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक में हुए कथित 25,000 करोड़ रुपये के घोटाले से संबंधित मामले में महाराष्ट्र सरकार की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा दायर क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया. इसके साथ ही उपमुख्यमंत्री की पत्नी सुनेत्रा पवार, दिवंगत अजीत पवार और अन्य आरोपियों को क्लीन चिट मिल गई है.
अदालत ने सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और अन्य द्वारा दायर ‘प्रोटेस्ट पिटीशन’ (विरोध याचिकाओं) के साथ-साथ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की हस्तक्षेप याचिका को भी खारिज कर दिया.
विशेष न्यायाधीश महेश जाधव ने ईओडब्ल्यू की ‘सी-समरी’ रिपोर्ट को स्वीकार किया, जिसमें कहा गया था कि सहकारी चीनी मिलों से जुड़े कथित ऋण और वसूली की अनियमितताओं में कोई आपराधिक मामला नहीं बनता है. अदालत के आदेश ने ईओडब्ल्यू के उस निष्कर्ष का भी समर्थन किया कि अजीत पवार, सुनेत्रा पवार, उनके रिश्तेदारों और अन्य संस्थाओं से संबंधित लेन-देन में “कोई आपराधिक अपराध” नहीं था.
हिंदुत्ववादी समूह ने मुस्लिम परिवार द्वारा घर खरीदे जाने का विरोध किया, ‘हाउस जिहाद’ करार दिया
‘मकतूब मीडिया’ की खबर है कि मुजफ्फरनगर के हिंदू बहुल गौशाला पश्मी इलाके में हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं ने एक मुस्लिम परिवार द्वारा घर खरीदे जाने का विरोध किया है और इसे “हाउस जिहाद” का नाम दिया है. यह शब्द उन इस्लामफोबिक विमर्शों में इस्तेमाल किया जाता है, जहाँ मुस्लिमों पर जानबूझकर हिंदू बहुल इलाकों में बसने का झूठा आरोप लगाया जाता है.
संपत्ति खरीदने वाले अली हसन ने आरोप लगाया कि कार्यकर्ताओं के समूह उनके घर आ रहे हैं और उनके परिवार पर इलाका छोड़ने का दबाव बना रहे हैं. उन्होंने ‘द हिंदू’ को बताया, “हाल के दिनों में अलग-अलग मौकों पर 4-5 ज्ञात और 15-20 अज्ञात व्यक्तियों का एक समूह मेरे घर आया और हमें जबरन घर छोड़ने को कहा और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी.”
हसन के अनुसार, कार्यकर्ताओं ने दावा किया है कि हिंदू इलाके में मुस्लिमों की जरूरत नहीं है और क्षेत्र में प्रदर्शन भी किए. निवासियों को लामबंद करने और परिवार की मौजूदगी के खिलाफ दबाव बनाने के लिए लगातार बैठकों की घोषणा करने वाले पोस्टर भी लगाए गए.
दोनों पक्षों ने कोतवाली थाने में शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें एक-दूसरे पर धमकी देने और उपद्रव करने का आरोप लगाया गया है. पुलिस ने अभी तक इस मामले में की गई किसी भी कार्रवाई का सार्वजनिक विवरण नहीं दिया है.
यह घटना अकेली नहीं है. हाल के वर्षों में मुजफ्फरनगर और पड़ोसी जिलों के कुछ हिस्सों में आवास से संबंधित इसी तरह के तनाव की खबरें आई हैं, जहाँ हिंदुत्ववादी समूहों के विरोध के कारण मुस्लिम संपत्ति खरीदारों पर दबाव बनाया गया है. मुरादाबाद जैसे क्षेत्रों में भी इसी तरह के विवाद सामने आए हैं, जिन्हें अक्सर जनसांख्यिकीय परिवर्तन की चिंताओं के रूप में पेश किया जाता है.
2024 की एक ऐसी ही घटना में, मुजफ्फरनगर में एक मुस्लिम खरीदार ने स्थानीय समूहों के निरंतर विरोध के बाद अपनी संपत्ति बेच दी थी. इसी तरह का विवाद दिसंबर 2024 में मुरादाबाद की ‘टीडीआई सोसाइटी’ में सामने आया था, जहाँ एक निवासी द्वारा मुस्लिम डॉक्टर को घर बेचने के बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे. स्थानीय निवासियों ने “मकान वापस लो” के नारे लगाए और संपत्ति पंजीकरण रद्द करने की मांग की थी.
दिलचस्प बात यह है कि यह घटना सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की उस टिप्पणी के कुछ दिनों बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि संवैधानिक अदालतों द्वारा संवैधानिक नैतिकता की वकालत करने के बावजूद, भारतीय समाज गहराई से विभाजित है. उन्होंने याद किया था कि कैसे उनकी बेटी की सहेली को केवल उसकी मुस्लिम पहचान के कारण दिल्ली में एक फ्लैट देने से मना कर दिया गया था.
टैलेंट की कमी आपकी सोच से कहीं अधिक गंभीर है; 82% नियोक्ताओं को सही व्यक्ति खोजना मुश्किल लग रहा है
एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में टैलेंट (प्रतिभा) की कमी वैश्विक औसत से काफी अधिक है, जहाँ देश के 10 में से 8 से अधिक नियोक्ताओं ने 2026 में कुशल श्रमिकों को खोजने में कठिनाई होने की बात कही है. ‘मैनपावर ग्रुप’ के नवीनतम ‘ग्लोबल टैलेंट शॉर्टेज सर्वे’ में पाया गया कि भारत में नियोक्ताओं के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) कौशल खोजना सबसे कठिन हो गया है, जिसने पारंपरिक इंजीनियरिंग और आईटी क्षमताओं को भी पीछे छोड़ दिया है. निष्कर्ष बताते हैं कि पिछले वर्ष की तुलना में टैलेंट का दबाव बढ़ा है.
भारत 82% की कमी के साथ विश्व स्तर पर सबसे अधिक टैलेंट की कमी वाले बाजारों में शामिल है, जिसमें स्लोवाकिया (87%), ग्रीस (84%) और जापान (84%) जैसे देश भी शामिल हैं. जबकि इसका वैश्विक औसत 72% है.
यह शोध 41 देशों के 39,000 से अधिक नियोक्ताओं पर आधारित है, जिनमें भारत के 3,051 नियोक्ता शामिल हैं. यह शोध बताता है कि वैश्विक नियुक्तियों में मामूली गिरावट (2025 में 74% के मुकाबले 72%) के बावजूद एआई क्षमताओं के लिए प्रतिस्पर्धा बनी हुई है. यह एक बढ़ते हुए ‘संरचनात्मक कौशल बेमेल’ को भी उजागर करता है, क्योंकि संगठन उन्नत तकनीकी विशेषज्ञता और आवश्यक पारस्परिक कौशल (सॉफ्ट स्किल्स), दोनों को हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ में श्रीराधा बसु के मुताबिक, वर्तमान में एआई से संबंधित कौशल सबसे अधिक मांग में हैं. इनमें “एआई मॉडल और एप्लीकेशन डेवलपमेंट” (39%) और “एआई साक्षरता” (38%) शीर्ष पर हैं. तकनीकी कौशल के अलावा संचार, सहयोग और टीम वर्क (39%) जैसे मानवीय गुण भी नियोक्ताओं के लिए प्राथमिकता बने हुए हैं. इस कमी से निपटने के लिए 91% नियोक्ता विभिन्न रणनीतियाँ अपना रहे हैं, जिनमें मौजूदा कर्मचारियों का कौशल बढ़ाना (37%), लचीला समय निर्धारण (26%) और स्थान लचीलापन (25%) शामिल है. टैलेंट की यह कमी ऑटोमोटिव (94%), सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी - 84%) और वित्त व बीमा (85%) जैसे क्षेत्रों में सबसे अधिक देखी जा रही है.
कमजोर रुपये के कारण एनआरआई जमा प्रवाह में 16% की गिरावट
यशस्विनी चौहान की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-दिसंबर वित्त वर्ष 2026 के दौरान अनिवासी भारतीय (एनआरआई) जमा प्रवाह 16 प्रतिशत घटकर 11.2 बिलियन डॉलर रह गया. यह वित्त वर्ष 2025 की समान अवधि में दर्ज 42.8 प्रतिशत की भारी वृद्धि (13.33 बिलियन डॉलर) के बिल्कुल विपरीत है.
प्रवाह में यह नरमी दो वर्षों की मजबूत वृद्धि के बाद आई है. वित्त वर्ष 2024 में प्रवाह 72.7 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2025 में 42.8 प्रतिशत बढ़ा था. विशेषज्ञों का कहना है कि एनआरआई जमा में वृद्धि हमेशा से ही “अस्थायी और असंगत” रही है.
प्रवाह में कमी के मुख्य कारण: कमजोर रुपया: विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच रुपये के कमजोर होने की आशंका ने जमा की गति धीमी कर दी है. रणनीतिक समय: ग्रांट थॉर्नटन भारत के विवेक अय्यर ने कहा कि यह समान डॉलर के बदले अधिक रुपये प्राप्त करने के लिए “टाइमिंग का खेल” था, और यह बदलाव संरचनात्मक के बजाय रणनीतिक लगता है.
जमा प्रवाह में कुल गिरावट का मुख्य कारण एफसीएनआर (बी) (फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट बैंक) खातों में आई कमी है: एफसीएनआर (बी) जमा: इनमें भारी गिरावट दर्ज की गई. वित्त वर्ष 2026 में यह 68.4 प्रतिशत घटकर 2.04 बिलियन डॉलर रह गया, जो पिछले साल इसी अवधि में 6.46 बिलियन डॉलर था.
एनआर(ई) आरए (नॉन-रेसिडेंट एक्सटर्नल रुपया अकाउंट) जमा: इसके विपरीत, एनआर(ई) जमा 41.7 प्रतिशत बढ़कर 5.06 बिलियन डॉलर हो गया. ये रुपये-मूल्यवर्ग वाले खाते हैं और भारत में कर-मुक्त हैं. एनआरओ खाते: ये खाते 24.3 प्रतिशत बढ़कर 4.09 बिलियन डॉलर हो गए. इनका उपयोग भारत में अर्जित आय (जैसे किराया या लाभांश) के प्रबंधन के लिए किया जाता है.
विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य में प्रवाह में उछाल के बजाय स्थिरता आने की उम्मीद है. उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि आरबीआई ब्याज दरों में कटौती करता है या रुपये में और गिरावट की संभावना बनी रहती है, तो जमा प्रवाह और भी कम हो सकता है.
अक्टूबर से दिसंबर में भारत की जीडीपी वृद्धि दर घटकर 7.8% रही
“रॉयटर्स” के अनुसार, सरकार ने शुक्रवार को राष्ट्रीय उत्पादन आंकड़ों की एक संशोधित श्रृंखला जारी करते हुए बताया कि पिछली तिमाही में 8.4% की वृद्धि दर्ज करने के बाद, अक्टूबर-दिसंबर की अवधि में भारत की अर्थव्यवस्था पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 7.8% की दर से बढ़ी है.
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के अनुसार, मार्च में समाप्त होने वाले पूरे वित्त वर्ष के लिए सरकार को उम्मीद है कि दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्था 7.6% की दर से बढ़ेगी. पुरानी डेटा श्रृंखला के तहत इसके 7.4% रहने का अनुमान लगाया गया था. इस गति के साथ, भारत वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा. वर्ष 2025/26 के लिए भारत की नॉमिनल जीडीपी (जिसमें मुद्रास्फीति के प्रभाव शामिल नहीं होते) के 8.6% की दर से बढ़ने का अनुमान है.
इस महीने की शुरुआत में वित्त वर्ष 2026/27 का बजट पेश करते समय, सरकार ने पुराने आधार वर्ष के तहत अगले वर्ष के लिए भारत की नॉमिनल विकास दर 10% रहने का अनुमान लगाया था.
गंगा दुनिया की उन 46 प्रतिशत नदियों में शामिल, जिनका पानी इंसानी इस्तेमाल के लिए असुरक्षित
गौमुख की बर्फीली ऊंचाइयों से निकलने वाली और करोड़ों लोगों का जीवन संवारने वाली जीवनदायिनी गंगा अब एक गंभीर वैश्विक आंकड़े का हिस्सा बन गई है. साओ पाउलो के फेडरल विश्वविद्यालय के हालिया अध्ययन के अनुसार, गंगा और यमुना सहित दुनिया की 46 प्रतिशत नदियाँ अब इतनी प्रदूषित हो चुकी हैं कि उनका पानी पीने और नहाने, दोनों के लिए अनुपयुक्त है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि हर साल गंगा में लगभग 6 लाख टन कचरा फेंका जाता है. इसके जवाब में, उत्तराखंड सरकार ने स्थिति और खराब होने से पहले अपने जल निकायों की रक्षा के लिए एक अभियान शुरू किया है.
नरेंद्र सेठी के अनुसार, देहरादून में रिस्पना, बिंदल, आसन और ससुआ जैसी नदियाँ, जो कभी पानी के प्राथमिक स्रोत थीं, अब प्लास्टिक कचरे और औद्योगिक अपशिष्टों से भारी रूप से प्रदूषित हैं. विशेषज्ञों ने इस गिरावट का कारण अनियमित शहरी विस्तार, नदी किनारे अतिक्रमण और औद्योगिक गतिविधियों को बताया है.
2027 के कुंभ मेले और जल्द शुरू होने वाली चारधाम यात्रा के मद्देनजर, राज्य पर प्रदूषण से निपटने का दबाव बढ़ रहा है. लाखों श्रद्धालु इन नदियों में पवित्र डुबकी लगाने उत्तराखंड आते हैं, ऐसे में यदि प्रदूषण कम नहीं हुआ तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चिंता का विषय है.
उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव, पराग मधुकर धकाते ने कहा कि स्थिति गंभीर है. उन्होंने कहा, “2027 में कुंभ आने वाला है और चारधाम यात्रा भी जल्द शुरू होगी. यदि पानी प्रदूषित रहा, तो यह न केवल तीर्थयात्रियों के लिए स्वास्थ्य का गंभीर जोखिम है, बल्कि राज्य की वैश्विक छवि को भी प्रभावित करता है.” धकाते ने आगे कहा कि नदी संरक्षण के लिए सरकारी प्रयासों के साथ-साथ जनभागीदारी की भी आवश्यकता है.
बोर्ड ने पर्यावरणीय उल्लंघनों के खिलाफ “जीरो-टॉलरेंस” नीति अपनाई है और उन औद्योगिक व गैर-औद्योगिक इकाइयों की पहचान शुरू कर दी है जो कथित तौर पर बिना उपचार के कचरा नदियों में बहा रही हैं. हालाँकि नदी स्वच्छता पहल की घोषणा पहले भी की गई है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि आगामी कुंभ की समय-सीमा ने प्रशासनिक तत्परता बढ़ा दी है.
गंगा उत्तरकाशी में गंगोत्री ग्लेशियर से बंगाल की खाड़ी तक लगभग 2,525 किमी का सफर तय करती है, जो उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर गुजरती है. उद्गम राज्य होने के नाते, गंगा नदी के स्वास्थ्य के लिए उत्तराखंड के प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं, बशर्ते ईमानदारी से किए जाएं.
मेघालय में संदिग्ध मेनिंगोकोकल संक्रमण से दो अग्निवीर प्रशिक्षुओं की मौत, जांच शुरू
शिलॉन्ग में संदिग्ध मेनिंगोकोकल बैक्टीरियल संक्रमण से दो अग्निवीर प्रशिक्षुओं की मौत के बाद, मेघालय सरकार ने एक स्वास्थ्य एडवाइजरी जारी की है. इसमें लोगों से मास्क पहनने और भीड़भाड़ वाले इलाकों से बचने का आग्रह किया गया है.
‘एक्सप्रेस न्यूज़’ के अनुसार, पिछले एक सप्ताह में जिन दो प्रशिक्षुओं की मृत्यु हुई, वे शिलॉन्ग स्थित ‘असम रेजिमेंटल सेंटर’ के 30 प्रशिक्षुओं के समूह का हिस्सा थे. अन्य प्रशिक्षुओं को क्वारंटीन कर दिया गया है और उन्हें चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया है.
सरकार ने अपनी एडवाइजरी में कहा कि राज्य निगरानी इकाई (एसएसयू) को मेनिंगोकोकल संक्रमण के संदिग्ध मामलों की सूचना दी गई है.
इस बीच अग्निवीर प्रशिक्षुओं की मौत के बाद मेघालय सरकार ने संदिग्ध ‘मेनिंगोकोकल संक्रमण’ के मामलों की विस्तृत जांच शुरू कर दी है. कम समय के अंतराल में हुई इन दो मौतों ने सैन्य प्रतिष्ठान और आसपास के क्षेत्रों में निगरानी, आपातकालीन चिकित्सा प्रतिक्रिया और एहतियाती रोकथाम उपायों को तेज कर दिया है.
शिलॉन्ग के सैन्य अस्पताल में भर्ती होने से पहले दोनों प्रशिक्षुओं में गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण के लक्षण विकसित हुए थे, जिनमें तेज बुखार और तीव्र शारीरिक संकट शामिल था. चिकित्सा हस्तक्षेप के बावजूद, दोनों ने दम तोड़ दिया, जिससे घनी आबादी वाले प्रशिक्षण वातावरण में संभावित मेनिंगोकोकल प्रकोप की चिंता बढ़ गई है. मृतक प्रशिक्षुओं के करीबी संपर्कों को चिकित्सा निगरानी में रखा गया है, और एहतियात के तौर पर कई साथी प्रशिक्षुओं को निगरानी के लिए भर्ती किया गया है. अधिकारियों ने संकेत दिया है कि निगरानी में रखे गए अधिकांश लोगों की स्थिति स्थिर है और उनमें गंभीर लक्षण विकसित नहीं हुए हैं, लेकिन संदिग्ध संक्रमण की प्रकृति को देखते हुए उन पर कड़ी नजर रखी जा रही है.
“यह सड़क मुसलमानों के लिए नहीं है”: हिंदू रक्षा दल ने दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर लिखा संदेश
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के सहारनपुर में बिहारीगढ़ के पास एक ऊँचे हिस्से पर बने साउंड बैरियर पर कथित तौर पर “यह सड़क मुसलमानों के लिए नहीं है” जैसा इस्लामफोबिक (मुस्लिम-विरोधी) संदेश लिखे जाने के बाद पुलिस ने आपराधिक मामला दर्ज किया है.
खबरों के अनुसार, यह संदेश शिवालिक की पहाड़ियों से गुजरने वाले एलिवेटेड रोड पर देर रात लिखा गया था. अगली सुबह राहगीरों ने पुलिस को सूचित किया, जिसके बाद अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर दीवार पर लिखे संदेश पर काला पेंट पोत दिया.
‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, इस मामले में, नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) के कर्मचारी और हरिद्वार के बुग्गावाला थाना क्षेत्र के बंजारेवाला गांव निवासी सुनील कुमार ने बिहारीगढ़ थाने में हिंदू रक्षा दल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई.
पुलिस ने बताया कि हिंदू रक्षा दल के सदस्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है. आरोपियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा और जांच जारी है. इस बीच, हिंदू रक्षा दल के सदस्यों ने इस कृत्य की जिम्मेदारी ली है.
हिंदू रक्षा दल के उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष ललित शर्मा ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में इस कृत्य की जिम्मेदारी ली और कहा कि मुसलमानों को राष्ट्रीय राजमार्गों का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. ललित शर्मा ने दावा किया कि राष्ट्रीय राजमार्ग हिंदुओं द्वारा दिए गए कर (टैक्स) से बने हैं और “जिहादी” टैक्स नहीं देते; इसलिए उन्हें इनका उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं है. पोस्ट में यह चेतावनी भी दी गई थी कि मुसलमानों को राष्ट्रीय राजमार्गों पर यात्रा नहीं करने दी जाएगी.
संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पिंकी चौधरी, जो गाजियाबाद में हिंदू परिवारों को सरेआम तलवारें और अन्य हथियार बांटने के लिए जाने जाते हैं, ने इस कृत्य का बचाव किया और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे से मुसलमानों को बाहर रखने के उपायों का आह्वान किया.
उन्होंने यह भी कहा, “मुसलमानों को सभी सरकारी लाभों से वंचित किया जाना चाहिए. हम ही सरकार को टैक्स देते हैं. सारी व्यवस्थाएं और सुविधाएं हमारे वोटों के कारण हैं. सरकारें हिंदू वोटों से बनती हैं, और सारा लाभ इन ‘जिहादियों’ को दिया जा रहा है.”
पुलिस ने कहा कि सोशल मीडिया पर आए इन बयानों की समीक्षा की जा रही है और कानूनी उल्लंघन के लिए इनकी जांच की जाएगी. बिहारीगढ़ थाना प्रभारी अक्षय शर्मा ने पुष्टि की कि मामला दर्ज कर लिया गया है और जांच जारी है.
हरकारा डीप डाइव: श्रवण गर्ग
नेतन्याहू से गले पड़े मोदी: कूटनीतिक गर्मजोशी या किसी दबाव की कहानी?
हरकारा डीप डाइव के ताज़ा एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इज़राइल यात्रा पर वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ विस्तृत और आलोचनात्मक चर्चा हुई. यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब गाज़ा में जारी हिंसा में 75 हज़ार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर युद्ध अपराधों के आरोप अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चर्चा में हैं.
चर्चा का केंद्रीय सवाल यही रहा कि आखिर इस समय और इसी माहौल में भारत के प्रधानमंत्री का इज़राइल जाकर 140 करोड़ भारतीयों की ओर से समर्थन जताना क्या संकेत देता है. हरकारा डीप डाइव में यह रेखांकित किया गया कि भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से फ़लस्तीन के प्रश्न पर उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद विरोधी रुख के साथ जुड़ी रही है. ऐसे में यह यात्रा उस पारंपरिक नीति से एक विचलन के रूप में देखी जा रही है.
यात्रा का कोई स्पष्ट एजेंडा सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया. न किसी बड़े समझौते की घोषणा हुई, न किसी उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी दिखी. यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि प्रधानमंत्री क्या लेकर गए, क्या लेकर लौटे और किन मुद्दों पर बातचीत हुई. इस अपारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए.
श्रवण गर्ग ने यह भी इंगित किया कि इसी दौरान अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भाषण में दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित युद्ध को रोका, वरना वह परमाणु संघर्ष में बदल सकता था. इस बयान ने भारत की कूटनीतिक स्थिति पर नए सवाल खड़े किए. साथ ही, वैश्विक स्तर पर एपस्टीन फाइल्स को लेकर उठ रही हलचल और इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद से जुड़े अटकलों का संदर्भ भी चर्चा में आया.
चर्चा में यह भी रेखांकित किया गया कि भारत की अंतरराष्ट्रीय साख, नैतिक स्थिति और लोकतांत्रिक छवि ऐसे निर्णयों से प्रभावित हो सकती है. संसद सत्र से पहले इस यात्रा का समय, वैश्विक तनाव की पृष्ठभूमि और घरेलू राजनीतिक परिस्थितियां मिलकर इस पूरे प्रकरण को और अधिक गंभीर बनाती हैं.
हरकारा डीप डाइव ने इस विषय को केवल एक विदेश दौरे की खबर के रूप में नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति, लोकतांत्रिक जवाबदेही और नैतिक रुख के व्यापक सवालों से जोड़कर देखने की कोशिश की.
12 मार्च की डेडलाइन: तेलंगाना की हजारों वक्फ संपत्तियों पर अनिश्चितता, UMEED पोर्टल पर अपलोड की दौड़ तेज
अगर 12 मार्च तक दस्तावेज़ अपलोड नहीं हुए, तो तेलंगाना की हज़ारों वक़्फ़ संपत्तियां, जिनमें कई सदियों पुरानी मस्जिदें, दरगाहें और कब्रिस्तान शामिल हैं, सरकारी डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाएंगी. यही वजह है कि इन दिनों हैदराबाद में वक़्फ़ संपत्तियों के मुतवल्ली और प्रबंधक कागज़ों की फाइलें लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं. यह रिपोर्ट द हिन्दू में प्रकाशित हुई है.
यह पोर्टल पिछले साल जून में केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लॉन्च किया था. सरकार का कहना था कि इससे वक्फ संपत्तियों में पारदर्शिता आएगी, जियो-टैगिंग होगी, लीज रिकॉर्ड साफ होंगे और ऑनलाइन शिकायत की सुविधा मिलेगी. लेकिन तेलंगाना में यह प्रक्रिया आसान नहीं रही.
तेलंगाना राज्य वक़्फ़ बोर्ड के सीईओ मोहम्मद असदुल्लाह के मुताबिक, राज्य में 33,929 गजट-नोटिफाइड वक़्फ़ संपत्तियां हैं. दूसरे सर्वे में 13,400 और संपत्तियां चिन्हित की गईं. इसके अलावा करीब 2,800 वक़्फ़ संस्थाएं ‘किताब-उल-अवकाफ’ में दर्ज हैं. अधिकारी मानते हैं कि असल संख्या इससे भी ज़्यादा हो सकती है, क्योंकि कई वक़्फ़-यूज़र संपत्तियां बिना औपचारिक रिकॉर्ड के मौजूद हैं.
इतनी बड़ी संख्या में संपत्तियों के कागज़ ढूंढना, उन्हें एकत्र करना और डिजिटल करना तय समय में बड़ी चुनौती बन गया है. कई दस्तावेज़ अधूरे या विवादित हैं. तकनीकी दिक्क़तें भी सामने आईं. असदुल्लाह के मुताबिक, बल्क अप्रूवल का विकल्प बंद था, इसलिए हर एंट्री को अलग-अलग मंज़ूर या ख़ारिज करना पड़ रहा है, जिससे काम धीमा हो गया. दस्तावेज़ों की सूची भी बढ़ा दी गई.
24 फरवरी के आंकड़ों के अनुसार, 62,837 वक़्फ़ संपत्तियों का पंजीकरण शुरू या पूरा हो चुका है. इनमें 23,945 को मंज़ूरी मिल चुकी है. 6,638 आवेदन चेकिंग के बाद अंतिम मंज़ूरी का इंतज़ार कर रहे हैं और 17,289 आवेदन अभी जांच के स्तर पर लंबित हैं. अधिकारी मानते हैं कि ये आंकड़े प्रगति दिखाते हैं, लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में काम बाकी है.
इस बीच कानूनी अनिश्चितता ने भी प्रक्रिया को धीमा किया. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. शुरुआत में बोर्ड ने दस्तावेज़ अपलोड करने को लेकर सावधानी बरतने को कहा था, लेकिन बाद में संभावित नुकसान के डर से लोगों को अपलोड करने की सलाह दी. बोर्ड का कहना है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 26 के खिलाफ है.
पोर्टल पर एक और समस्या सामने आई, कई मामलों में एक ही वक़्फ़ संस्था पर दो अलग-अलग लोगों ने मुतवल्ली होने का दावा किया. वक्फ बोर्ड का कहना है कि वह रिकॉर्ड के आधार पर ही तय करेगा कि मान्य मुतवल्ली कौन है. बोर्ड सदस्य सैयद बंदगी बादशाह कादरी ने यह भी चिंता जताई कि कई आवेदनों की स्थिति “सबमिटेड” दिखती है, लेकिन अगर वे ख़ारिज हो जाएं तो आवेदकों को जानकारी नहीं मिलती. उन्होंने एसएमएस और ईमेल अलर्ट की मांग की है.
नई जटिलता तब आई जब तेलंगाना के हेरिटेज विभाग ने दावा किया कि कुछ संरक्षित मध्यकालीन स्मारकों को भी UMEED पोर्टल पर वक़्फ़ के रूप में दर्ज किया गया है. विभाग ने वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम 2025 की धारा 3D का हवाला देकर इन्हें हटाने की मांग की है.
इन सबके बीच तेलंगाना में ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि दूर-दराज जिलों से लोग हैदराबाद आकर अपने छोटे-छोटे मस्जिदों और कब्रिस्तानों को पोर्टल पर दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं. कई लोग आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं, लेकिन वे चाहते हैं कि उनकी संस्थाएं सरकारी रिकॉर्ड में सुरक्षित रहें.
2025 में पत्रकारों की रिकॉर्ड हत्याएं, 81 प्रतिशत के लिए इज़राइली बल ज़िम्मेदार
कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) ने एक खास रिपोर्ट जारी की है. इसमें कहा गया है कि 2025 में उतने पत्रकार और मीडिया कर्मियों की मौत हुई जितनी पिछले 30 साल में किसी एक साल में नहीं हुई. रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में कुल 129 पत्रकारों की मौत हुई. इनमें से 104 मौतें युद्ध और संघर्ष वाले इलाकों में हुईं.
इन 129 मौतों में से 86 मौतें इज़राइली गोलीबारी से हुईं. रिपोर्ट कहती है कि इन 86 में से 60 प्रतिशत से ज़्यादा पत्रकार फ़िलस्तीनी थे, जो गाज़ा से रिपोर्टिंग कर रहे थे.47 मामलों को टारगेटेड किलिंग यानी जानबूझकर की गई हत्या बताया है. इन मामलों में 81 प्रतिशत के लिए इज़राइल को ज़िम्मेदार ठहराया गया है.
सीपीजे की मुख्य कार्यकारी अधिकारी जोडी गिन्सबर्ग ने कहा कि पत्रकारों की रिकॉर्ड संख्या में हत्या हो रही है, जबकि इस समय जानकारी तक पहुंच पहले से ज़्यादा ज़रूरी है. उन्होंने कहा कि मीडिया पर हमले, दूसरी आज़ादियों पर हमलों का संकेत होते हैं. जब पत्रकार खबर दिखाने के कारण मारे जाते हैं, तो हम सब खतरे में होते हैं.
रिपोर्ट में अल जज़ीरा के पत्रकारों को निशाना बनाने की एक पैटर्न की बात कही गई है. रिपोर्ट के अनुसार, बिना सबूत आरोप लगाए जाने के बाद 10 अगस्त 2025 को पत्रकार अनस अल-शरीफ एक हमले में मारे गए. उनके साथ अलजज़ीरा के तीन और कर्मचारी और दो फ्रीलांसर भी एक टेंट पर हुए हमले में मारे गए.
सीपीजे के अनुसार, यमन में दो अखबार दफ्तरों पर इज़रायली हमलों में 31 पत्रकार और मीडिया कर्मी मारे गए. इसे सीपीजे ने दुनिया में दर्ज किए गए अपने इतिहास के दूसरे सबसे घातक हमलों में से एक बताया है. इज़राइल ने कहा कि उसने सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था, जिनमें “हूती पब्लिक रिलेशंस डिपार्टमेंट” भी शामिल था.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जून में ईरान के साथ 12 दिन के युद्ध के दौरान इज़राइल ने दो पत्रकार और एक मीडिया कर्मी को मार दिया. इज़राइल का कहना था कि हमले सैन्य ठिकानों पर थे.
खतरा सिर्फ पत्रकारों तक सीमित नहीं है. सीपीजे ने फिलिस्तीनी जर्नलिस्ट्स सिंडिकेट की 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि अक्टूबर 2023 से शुरू हुए संघर्ष के बाद से इज़रायली सेना 700 से ज्यादा पत्रकारों के परिवार के सदस्यों को मार चुकी है. इसे सामूहिक सजा का तरीका बताया गया है.
सीपीजे का आरोप है कि इजराइल ने कई बार पत्रकारों को बिना सबूत उन्हें उग्रवादी बताकर मार दिया. इनमें 23 साल के फिलिस्तीनी संवाददाता हुसाम शबत भी शामिल हैं. उनकी मौत उत्तरी गाज़ा के इंडोनेशियाई अस्पताल के पास एक ड्रोन हमले में हुई. इज़राइल ने कहा कि वह हमास का स्नाइपर था, लेकिन कोई सबूत नहीं दिया.
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल ड्रोन से पत्रकारों को निशाना बनाने की घटनाएं बहुत बढ़ीं. 2023 में दो पत्रकार ड्रोन हमलों में मारे गए थे, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 39 हो गई.
इन 39 में से 28 मौतों के लिए गाज़ा में इज़रायली सेना ज़िम्मेदार बताई गई. सूडान की रैपिड सपोर्ट फोर्सेस पांच मामलों में, रूस चार मामलों में, हूती बल एक मामले में और एक संदिग्ध तुर्की हमले में एक पत्रकार की मौत हुई.
अंतरराष्ट्रीय पत्रकार भी इन हमलों का शिकार हुए. फ्रांस के फोटो जर्नलिस्ट एंटोनी लालिकन और यूक्रेन के पत्रकार ओलेना ह्रामोवा और येवहेन करमाजिन डोनेट्स्क क्षेत्र में रूसी ड्रोन हमले में मारे गए.
सूडान में 2025 में नौ पत्रकार मारे गए. वहां रैपिड सपोर्ट फोर्सेस ने ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ा दिया है. नवंबर में सूडान न्यूज एजेंसी के निदेशक ताज अल-सिर अहमद सुलेमान और उनके भाई की हत्या के लिए भी रैपिड सपोर्ट फोर्सेस को जिम्मेदार बताया गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 15 साल में 373 पत्रकारों की हत्या सैन्य अधिकारियों द्वारा की गई. इनमें से 60 प्रतिशत से ज़्यादा मौतें पिछले तीन साल में हुईं. सीपीजे का कहना है कि इन तीन सालों में हुई मौतों में से 21 को छोड़कर बाकी सभी के लिए इज़राइली बल ज़िम्मेदार थे.
संघर्ष क्षेत्रों के बाहर भी पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं. भारत में फ्रीलांस पत्रकार मुकेश चंद्राकर का शव एक सेप्टिक टैंक में मिला. उन्होंने 120 करोड़ रुपये की सड़क परियोजना में कथित भ्रष्टाचार की जांच की थी.
मैक्सिको में छह पत्रकार मारे गए और अपराधियों की पहचान अब तक नहीं हो पाई, जबकि वहां संघीय सुरक्षा तंत्र मौजूद है. फिलीपींस में तीन पत्रकारों को गोली मार दी गई, लेकिन केवल एक गिरफ्तारी हुई.रिपोर्ट में सऊदी अरब का भी ज़िक्र है, जहां सात साल हिरासत में रखने के बाद प्रसिद्ध स्तंभकार तुर्की अल-जासेर को फांसी दे दी गई. उन पर देशद्रोह और आतंकवाद के आरोप लगाए गए थे. सीपीजे ने इन्हें झूठे आरोप बताया है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.









