27/03/2026: तेल उछला, बाजार टूटा | रुपया रिकॉर्ड गिरावट | मणिपुर में गोलीबारी | बंगाल वोटर लिस्ट विवाद | नीतीश के बाद सियासत | नेपाल में रैपर PM | FBI डेटा लीक | ईरान पर जंग तेज |
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फलक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
₹94.81: तेल की कीमतों में उछाल और रुपये में कमजोरी से निवेशकों के 8.86 लाख करोड़ रुपये डूबे
क्यों गिर रहा है भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले
पेट्रोल और डीजल पर ड्यूटी घटाने का सरकार का फैसला आम जनता के लिए वास्तव में राहत क्यों नहीं है?
मणिपुर में सेना और कुकी उग्रवादियों के बीच झड़प, सेना की चौकी को निशाना बनाया था
13 लाख, 8 लाख या 14 लाख? चुनाव आयोग अब भी चुप, अलग-अलग आंकड़ों ने बंगाल में बढ़ाई बेचैनी
नीतीश कुमार के बाद कौन होगा मुख्यमंत्री? जेडीयू ने बीजेपी के सामने रखीं शर्तें
बजरंग दल के विरोध के 3 महीने बाद, ‘मोहम्मद’ दीपक और ‘बाबा’ अहमद सामान्य जीवन में लौटने के लिए कर रहे संघर्ष
महाराष्ट्र में एक और बाबा पर रेप का केस; खुद को ‘महादेव’ का अवतार बताकर शोषण किया
रैपर और इंजीनियर बालेन शाह ने नेपाल के 47वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली
एफ़बीआई निदेशक काश पटेल के ईमेल और फोटो हैक; ईरान से जुड़े हैकर समूह का हाथ
‘कुछ भी सामान्य नहीं है’: ईरानी राष्ट्रपति के बेटे की डायरी में आम नागरिकों की आशाएं और डर
रिपोर्ट: ईरान के खिलाफ सैन्य विकल्पों पर विचार कर रहे ट्रम्प, मध्य पूर्व में 10,000 अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती संभव
अमेरिका को उम्मीद है कि ईरान अभियान ‘महीनों नहीं, हफ्तों’ में समाप्त हो जाएगा: रूबियो
संयंत्रों पर हमलों के लिए ईरान ने ‘भारी कीमत’ चुकाने की चेतावनी दी
कड़वी कॉफी: ईरान पर हमले के बहाने बदलती दुनिया का विश्लेषण
शादीशुदा पुरुष का दूसरी महिला के साथ रहना अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
केरल हाई कोर्ट की सख्ती: “हमें हिंदू विधायक चाहिए” बयान पर चुनाव आयोग को कार्रवाई का निर्देश
₹94.81: तेल की कीमतों में उछाल और रुपये में कमजोरी से निवेशकों के 8.86 लाख करोड़ रुपये डूबे
‘पीटीआई” के मुताबिक, पश्चिम एशिया संघर्ष के कम होने के संकेत न मिलने और कच्चे तेल की कीमतों में आए ताज़ा उछाल के कारण शुक्रवार को शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई. इस उथल-पुथल के चलते इक्विटी निवेशकों की संपत्ति से 8.86 लाख करोड़ रुपये साफ हो गए और बाजार 2 प्रतिशत से अधिक टूट गया.
इस बीच अर्चिश्मा अय्यर की रिपोर्ट है कि भारतीय रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर गिर गया और प्रति डॉलर 94.81 पर बंद हुआ, और इसने पिछले सत्र के ₹93.98 के रिकॉर्ड निचले स्तर को भी पीछे छोड़ दिया. दिन के दौरान रुपये में लगभग 80 पैसे का बड़ा उतार-चढ़ाव देखा गया. रुपया प्रति डॉलर ₹94.15 पर खुला था. इस वर्ष अब तक डॉलर के मुकाबले रुपये में लगभग 5 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है, जिससे यह एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक बन गई है.
‘पीटीआई’ के अनुसार 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स आज 1,690.23 अंक या 2.25 प्रतिशत गिरकर 73,583.22 पर बंद हुआ. दिन के दौरान, यह 1,739.04 अंक या 2.31 प्रतिशत लुढ़ककर 73,534.41 के स्तर तक पहुँच गया था. शेयरों में इस मंदी के रुझान के चलते बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) 8,86,383.92 करोड़ रुपये घटकर 4,22,15,450.82 करोड़ रुपये (4.46 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर) रह गया.
पश्चिम एशिया में जारी अराजकता के बीच कच्चे तेल की कीमतों का 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर बने रहना, रुपये की भारी गिरावट और विदेशी फंडों की निरंतर निकासी ने भी निवेशकों को बेचैन कर दिया है. सेंसेक्स की 30 कंपनियों में से रिलायंस इंडस्ट्रीज में सबसे ज्यादा 4.55 प्रतिशत की गिरावट आई, इसके बाद इंटरग्लोब एविएशन, बजाज फाइनेंस, भारतीय स्टेट बैंक, इटरनल और एचडीएफसी बैंक का स्थान रहा.
इसके विपरीत, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), भारती एयरटेल, पावर ग्रिड और सन फार्मा बढ़त बनाने वाले शेयरों में शामिल रहे. वैश्विक तेल बेंचमार्क, ब्रेंट क्रूड 2.93 प्रतिशत उछलकर 111.2 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गया.
ऑनलाइन ट्रेडिंग और वेल्थ टेक फर्म ‘एनरिच मनी’ के सीईओ पोनमुडी आर. ने कहा, “भारतीय शेयर बाजारों में पूरे सत्र के दौरान निरंतर और व्यापक गिरावट देखी गई. हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को लक्षित करने वाले हमलों पर रोक 6 अप्रैल तक बढ़ा दी है और कूटनीतिक जुड़ाव की संभावना दोहराई है, फिर भी निवेशकों का उत्साह कम बना रहा. यह आश्वासन बाजार के भरोसे में पूरी तरह नहीं बदल सका, क्योंकि अमेरिका-इजरायल हमले के बाद तेहरान ने अपनी जवाबी कार्रवाई जारी रखी है और अमेरिकी प्रस्तावों पर सहमति के कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिख रहे हैं.”
शुक्रवार को बीएसई पर कुल 3,544 शेयरों में गिरावट आई, जबकि 822 में बढ़त रही और 135 शेयर अपरिवर्तित रहे. छुट्टियों के कारण छोटे रहे इस कारोबारी सप्ताह में बीएसई सूचकांक ने 949.74 अंक (1.27%) और निफ्टी ने 294.9 अंक (1.27%) गंवाए.
रेलिगेयर ब्रोकिंग लिमिटेड के रिसर्च एसवीपी, अजीत मिश्रा ने कहा, “अमेरिका और ईरान के बीच भू-राजनीतिक तनाव को लेकर स्पष्टता की कमी के कारण निवेशकों का भरोसा डगमगाया हुआ रहा, जिससे कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर 100 अमेरिकी डॉलर के स्तर के पार पहुँच गईं. इसके अतिरिक्त, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की निरंतर निकासी और रुपये में आई भारी कमजोरी ने जोखिम लेने की क्षमता को और कम कर दिया. “
क्यों गिर रहा है भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले
रितिक राज के अनुसार, साल 2026 में भारतीय रुपया तेज़ी से गिरावट का सामना कर रहा है. जानकारों का कहना है कि पश्चिम एशिया का संघर्ष बाज़ारों को बुरी तरह अस्थिर कर रहा है, जिससे आशंका बढ़ गई है कि तेल आपूर्ति में व्यवधान लंबे समय तक जारी रह सकता है. कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं, और इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है.
उच्च तेल कीमतें घरेलू महँगाई की आशंका को बढ़ा रही हैं, जिससे केंद्रीय बैंक को अर्थव्यवस्था को ठंडा करने के लिए नई नीतिगत हस्तक्षेप करने पड़ सकते हैं.
एनरिच मनी के संस्थापक और सीईओ पोनमुडी आर. ने कहा कि रुपया दबाव में बना हुआ है, जिसे बढ़ती तेल कीमतें, लगातार एफआईआई निकासी और मज़बूत अमेरिकी डॉलर और भी कमजोर कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “डॉलर/रुपये की जोड़ी 94 के स्तर से ऊपर कारोबार कर रही है, जो रुपया की लगातार कमजोरी को दर्शाता है.”
पोनमुडी ने यह भी बताया कि तकनीकी ढाँचा अमेरिकी डॉलर के पक्ष में मज़बूती दिखा रहा है, जिसमें लगातार ऊँचे स्तर और ऊँचे निचले स्तर दर्ज हो रहे हैं.
सेबी-पंजीकृत रिसर्च विश्लेषक हरिप्रसाद के. ने कहा कि लगातार ऊँची तेल कीमतें भारत का चालू खाता घाटा बढ़ा सकती हैं, रुपया पर दबाव डाल सकती हैं और महँगाई की आशंका को बढ़ा सकती हैं.
उन्होंने कहा, “इससे भारतीय रिज़र्व बैंक की ब्याज दरों पर लचीलापन सीमित हो सकता है, जिससे वित्तीय परिस्थितियाँ लंबे समय तक सख्त बनी रह सकती हैं.”
पोनमुडी ने आगे कहा, “डॉलर/रुपये का दृष्टिकोण अमेरिकी डॉलर के पक्ष में सकारात्मक बना हुआ है और वैश्विक अनिश्चितता तथा डॉलर की मज़बूती के बीच रुपया दबाव में रहने की संभावना है.”
पेट्रोल और डीजल पर ड्यूटी घटाने का सरकार का फैसला आम जनता के लिए वास्तव में राहत क्यों नहीं है?
केंद्र सरकार ने शुक्रवार (27 मार्च) को एक गजट अधिसूचना के माध्यम से पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज़ ड्यूटी) घटाकर 3 रुपये प्रति लीटर कर दिया और डीजल पर इसे घटाकर शून्य कर दिया है. इसके अतिरिक्त, डीजल के निर्यात पर 21.5 रुपये प्रति लीटर का ‘विंडफॉल टैक्स’ लगाया गया है. हालांकि, इस कदम से उपभोक्ताओं के लिए इन ईंधनों की खरीद कीमतों में कमी आने की संभावना कम है.
वर्तमान में, अमेरिका-इजरायल सेनाओं द्वारा ईरान पर युद्ध के बीच अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 122 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुँच गई हैं. चूंकि भारत में उपभोक्ताओं के लिए कीमतें अपरिवर्तित रहीं, इसलिए तेल विपणन कंपनियां (ओएमसीज़) अतिरिक्त मूल्य का बोझ खुद उठा रही थीं और इसे डीलरों पर नहीं डाल रही थीं. उत्पाद शुल्क में कटौती करके सरकार कंपनियों (ओएमसीज़) के इस वित्तीय बोझ को कम करेगी.
‘द वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार द्वारा पेट्रोल और डीज़ल पर एक्साइज ड्यूटी घटाने का कदम आम लोगों को राहत नहीं देता, बल्कि तेल कंपनियों का बोझ कम करता है. उपभोक्ताओं के लिए कीमतें जस की तस बनी हुई हैं.
रिपोर्ट कहती है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें गिरी थीं, तब सरकार ने उपभोक्ताओं को कोई राहत नहीं दी. उस समय तेल कंपनियों ने भारी मुनाफा कमाया. अब जब कीमतें बढ़ी हैं, सरकार ने टैक्स घटाकर कंपनियों का नुकसान कम किया है, लेकिन जनता को फायदा नहीं दिया.
कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि यह कदम चुनावी राजनीति से प्रेरित है. पवन खेड़ा ने कहा कि सस्ता कच्चा तेल होने के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीज़ल महँगा बेचा गया. उन्होंने आरोप लगाया कि रूस से सस्ता तेल खरीदने का फायदा भी जनता तक नहीं पहुँचाया गया, बल्कि बड़ी कंपनियों को मिला. हालांकि, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि सरकार ने टैक्स राजस्व में बड़ा नुकसान उठाया ताकि तेल कंपनियों का बोझ कम हो और जनता को अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता से बचाया जा सके.
कुलमिलाकर, सरकार का यह कदम उपभोक्ताओं की जेब पर कोई असर नहीं डालता. असली राहत तेल कंपनियों को मिली है, जबकि आम जनता को पेट्रोल और डीज़ल की ऊँची कीमतें ही चुकानी पड़ रही हैं. आलोचकों का कहना है कि जब तेल सस्ता था तब जनता को राहत नहीं दी गई, और अब महँगा होने पर भी कीमतें कम नहीं की जा रही हैं.
मणिपुर में सेना और कुकी उग्रवादियों के बीच झड़प, सेना की चौकी को निशाना बनाया था
मणिपुर में फिर हिंसा की खबरें हैं. पुलिस ने बताया कि बिष्णुपुर जिले में भारतीय सेना और संदिग्ध उग्रवादियों के बीच मुठभेड़ हुई. लगभग 30 मिनट तक चली यह गोलीबारी बुधवार रात को तब शुरू हुई, जब संदिग्ध कुकी उग्रवादियों ने सेना की एक चौकी पर हमला कर दिया.
‘डेक्कन क्रॉनिकल’ की खबर है कि संदिग्ध सशस्त्र कुकी उग्रवादियों ने फौल्जंग/गोथोल के सामान्य क्षेत्र में गोलीबारी की और फौगाकचाओ अवांग लेइकाई स्थित भारतीय सेना की एक चौकी को निशाना बनाया. क्षेत्र में तैनात भारतीय सेना और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (58वीं बटालियन) ने जवाबी कार्रवाई करते हुए उस दिशा में तुरंत गोलियां चलाईं जहाँ से हमला हो रहा था. इस घटना के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, पुलिस और इंडियन रिजर्व बटालियन सहित सुरक्षा बलों ने क्षेत्र और उससे सटे पहाड़ी इलाकों में तलाशी अभियान शुरू किया. अधिकारियों ने कहा कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है और ऑपरेशन जारी रहेगा.
13 लाख, 8 लाख या 14 लाख? चुनाव आयोग अब भी चुप, अलग-अलग आंकड़ों ने बंगाल में बढ़ाई बेचैनी
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नामों की बड़ी संख्या में कटौती को लेकर भारी असमंजस है. अलग-अलग आंकड़े सामने आ रहे हैं—कहीं 8 लाख, कहीं 13 लाख और कहीं 14 लाख तक नाम हटाए जाने की बात कही जा रही है. चुनाव आयोग (ईसी) ने अब तक स्पष्ट संख्या नहीं बताई है, जिससे राज्य में राजनीतिक दलों और मतदाताओं के बीच चिंता बढ़ रही है.
“द इंडियन एक्सप्रेस” में अत्री मित्रा और रविक भट्टाचार्य ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में लिखा है कि चुनाव आयोग ने फरवरी 2026 में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के बाद अंतिम मतदाता सूची जारी की थी. इसमें लगभग 63.66 लाख नाम हटाए गए थे, जिन्हें “ग़ैर-हाज़िर, मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट” श्रेणी में रखा गया. इसके अलावा करीब 60 लाख नाम न्यायिक अधिकारियों के पास जाँच (एडजुडिकेशन) के लिए लंबित रखे गए. मार्च 2026 में चुनाव आयोग ने पहली पूरक सूची जारी की, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि कितने नाम हटाए गए और कितने जोड़े गए.
अलग-अलग राजनीतिक दल और मीडिया रिपोर्टें अलग-अलग आंकड़े बता रही हैं—8 लाख, 13 लाख और 14 लाख तक नाम हटाए जाने की बात कही जा रही है. इस अस्पष्टता ने चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है.
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का आरोप है कि बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने से अल्पसंख्यक और ग्रामीण मतदाता प्रभावित होंगे. भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी है और अवैध या डुप्लीकेट नाम हटाए जा रहे हैं.
कटौती का सबसे बड़ा असर बांग्लादेश सीमा से लगे जिलों में देखा जा रहा है, जहाँ मतुआ समुदाय (भाजपा का वोट बैंक) और अल्पसंख्यक समुदाय (टीएमसी का वोट बैंक) दोनों प्रभावित हो रहे हैं.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 दो चरणों में होंगे—23 अप्रैल और 29 अप्रैल को मतदान और 4 मई को मतगणना होगी. मतदाता सूची में अस्पष्टता और भारी पैमाने पर नाम कटौती ने चुनावी माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया है.
चुनाव आयोग ने अब तक स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया है कि कितने नाम हटाए गए और कितने जोड़े गए हैं. अलग-अलग आंकड़ों ने मतदाताओं और राजनीतिक दलों में अनिश्चितता और चिंता पैदा कर दी है. यह मुद्दा चुनावी राजनीति में बड़ा विवाद बन चुका है और आने वाले दिनों में इसके और गर्माने की संभावना है.
नीतीश कुमार के बाद कौन होगा मुख्यमंत्री? जेडीयू ने बीजेपी के सामने रखीं शर्तें
पटना से संतोष सिंह की रिपोर्ट में बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार के इस्तीफे और उनके उत्तराधिकारी को लेकर चल रही गहमागहमी का ब्यौरा दिया गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा जा रहे हैं. लिहाजा ‘प्रॉहिबिशन ऑफ साइमलटेनियस मेंबरशिप रूल्स (1950)’ के अनुसार, उन्हें राजपत्र में चुनाव परिणाम प्रकाशित होने के 14 दिनों के भीतर राज्य विधानमंडल की सीट से इस्तीफा देना होगा. उनके 13 अप्रैल को राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ लेने की संभावना है.
इस बीच जेडीयू ने स्पष्ट कर दिया है कि नीतीश कुमार का उत्तराधिकारी कौन होगा, इसमें उनकी पसंद का महत्व होना चाहिए. पार्टी का कहना है कि वे मध्यप्रदेश या राजस्थान जैसा कोई ‘अचानक प्रयोग’ (सरप्राइज मुख्यमंत्री) नहीं चाहते. उनका तर्क है कि बिहार में समाजवादी जड़ें बहुत गहरी हैं और गठबंधन के सहयोगियों (एलजेपी-रामविलास, हम-सेक्युलर आदि) को विश्वास में लेना जरूरी है.
नीतीश कुमार के बेटे, निशांत कुमार, अब राज्य की राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं. जेडीयू चाहती है कि नया मुख्यमंत्री ऐसा हो जो निशांत कुमार को विश्वास में लेकर चले और नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाए.
बीजेपी के वरिष्ठ नेता विनोद तावड़े पटना में स्थानीय नेताओं के साथ बैठक कर रहे हैं. बीजेपी ने अभी तक किसी नाम पर आधिकारिक मुहर नहीं लगाई है, लेकिन पार्टी सूत्रों के अनुसार वे एक सुचारू सत्ता हस्तांतरण की उम्मीद कर रहे हैं.
जेडीयू सूत्रों ने यह भी संकेत दिया है कि यदि उन्हें गठबंधन में ‘जूनियर पार्टनर’ की भूमिका निभानी पड़ती है, तो वे मौजूदा मंत्रियों के विभागों के बंटवारे में बदलाव और विधानसभा अध्यक्ष के पद पर अपना दावा ठोक सकते हैं.
बजरंग दल के विरोध के 3 महीने बाद, ‘मोहम्मद’ दीपक और ‘बाबा’ अहमद सामान्य जीवन में लौटने के लिए कर रहे संघर्ष
“लोग अलग-अलग तरीकों से अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं, लेकिन हमलावर बनने से बेहतर है कि खुद कष्ट सह लिया जाए. जब भीड़ मुझ पर चिल्ला रही थी, तब भी मैंने एक शब्द नहीं बोला,” गंभीर कंपकंपी के दौरे की चपेट में आने से पहले वकील अहमद ने ये शब्द कहे.
ऐश्वर्या राज की रिपोर्ट है कि पौड़ी गढ़वाल जिले के कोटद्वार में उनकी कपड़ों की दुकान के सामने बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के जमा होने और दुकान के नाम में ‘बाबा’ शब्द होने के कारण उन्हें प्रताड़ित करने की घटना को तीन महीने बीत चुके हैं. उसी शहर में एक जिम के मालिक, दीपक, जो उस समय वहीं पास में थे और उन्होंने भीड़ का सामना किया था, उन्हें समान रूप से सराहा भी गया और निशाना भी बनाया गया—और इस सब के बीच उनके व्यवसाय को काफी नुकसान पहुँचा है.
लगभग तीन महीने पहले, बजरंग दल के सदस्यों ने कोटद्वार में एक दुकान और जिम के बाहर विरोध प्रदर्शन किया था. विरोध प्रदर्शन के दौरान यह आरोप लगाया गया कि मुस्लिम मालिक अपनी पहचान छिपाकर या नाम बदलकर काम कर रहे हैं. इस विवाद के बाद ‘वकील अहमद’ और ‘मोहम्मद दीपक’ दोनों के लिए अपना सामान्य जीवन और काम फिर से शुरू करना बेहद मुश्किल हो गया है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि इस घटना के बाद से उनका व्यवसाय पूरी तरह ठप हो गया है. वकील अहमद, जो पिछले कई दशकों से वहां रह रहे थे, अब असुरक्षा और सामाजिक अलगाव महसूस कर रहे हैं। वहीं, दीपक को भी अपने ही समुदाय और पड़ोस में सफाई देनी पड़ रही है.
कोटद्वार जैसे छोटे शहर में, जहाँ पहले सांप्रदायिक सौहार्द था, इस घटना ने स्थानीय लोगों के बीच एक गहरी दरार पैदा कर दी है. रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे एक छोटे से विवाद या अफवाह ने दो व्यक्तियों के वर्षों के भरोसे और आजीविका को संकट में डाल दिया. पुलिस और प्रशासन ने मामले को शांत करने की कोशिश की है, लेकिन ‘बाबा’ अहमद और ‘मोहम्मद’ दीपक के लिए वह पुराना भरोसा और सामाजिक स्वीकार्यता वापस पाना अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.
महाराष्ट्र में एक और बाबा पर रेप का केस; खुद को ‘महादेव’ का अवतार बताकर शोषण किया
‘एनडीटीवी’ के अनुसार, महाराष्ट्र के पालघर जिले के एक स्वयंभू बाबा पर 35 वर्षीय महिला के साथ कथित तौर पर दुष्कर्म करने का मामला दर्ज किया गया है. एक अधिकारी ने शुक्रवार को बताया कि आरोपी ने खुद को भगवान शिव का अवतार बताकर महिला को झांसे में लिया था.
अधिकारी ने कहा कि नासिक में मर्चेंट नेवी के पूर्व अधिकारी और स्वयंभू बाबा अशोक खरात की हालिया गिरफ्तारी के बाद, महिला ने 40 वर्षीय आरोपी ऋषिकेश वैद्य के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत जुटाई.
पुलिस के अनुसार, पुणे की रहने वाली पीड़ित महिला पहली बार 2023 में फेसबुक के माध्यम से आरोपी के संपर्क में आई थी। एफआईआर का हवाला देते हुए अधिकारी ने बताया, “उसी वर्ष दिसंबर में, आरोपी महिला से मिलने पुणे गया था. उसने कथित तौर पर महिला को यह दावा करके धोखा दिया कि वह महादेव (भगवान शिव) का अवतार है और वह उसकी ‘पार्वती’ है.”
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि वह व्यक्ति उसे पुणे के मांजरी इलाके के एक लॉज में ले गया, जहाँ उसने दुष्कर्म करने से पहले उसे कोई नशीला पदार्थ दिया. हमले के दौरान, आरोपी ने कथित तौर पर महिला की जानकारी के बिना उसकी तस्वीरें भी खींच लीं.
महिला ने पुलिस को बताया कि पालघर जिले में एक सामाजिक संस्था चलाने वाले आरोपी ने उन तस्वीरों का इस्तेमाल उसे ब्लैकमेल करने के लिए किया. पिछले साल मई में, उसने कथित तौर पर महिला को वसई के एक होटल में बुलाया और फिर से उसका यौन उत्पीड़न करने का प्रयास किया.
रैपर और इंजीनियर बालेन शाह ने नेपाल के 47वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली
नेपाल की राजनीति शुक्रवार को एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व बदलाव की साक्षी बनी, जब प्रसिद्ध रैपर और स्ट्रक्चरल इंजीनियर बालेन शाह (बालेंद्र शाह) ने देश के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली.
‘एक्सप्रेस ग्लोबल डेस्क’ के अनुसार, काठमांडू के मेयर के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले बालेन शाह अब राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष पर पहुँच गए हैं. उन्होंने राष्ट्रपति भवन (शीतल निवास) में आयोजित एक विशेष समारोह में पद और गोपनीयता की शपथ ली.
बालेन शाह की नियुक्ति नेपाल के पारंपरिक राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत है, जहाँ दशकों से पुराने और स्थापित नेताओं का वर्चस्व रहा है. उन्हें युवाओं और बदलाव चाहने वाले नागरिकों का व्यापक समर्थन प्राप्त है. राजनीति में आने से पहले बालेन शाह एक लोकप्रिय रैपर के रूप में जाने जाते थे. साथ ही, उनके पास स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की डिग्री है, जिसका उपयोग उन्होंने काठमांडू के शहरी विकास और आधारभूत संरचना को बेहतर बनाने के लिए किया.
लेकिन, प्रधानमंत्री के रूप में उनके सामने नेपाल की अर्थव्यवस्था को स्थिर करने, बेरोजगारी को दूर करने और पड़ोसी देशों (भारत और चीन) के साथ संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौतियां होंगी. उन्होंने ‘सुशासन’ और ‘तकनीक आधारित समाधान’ को अपनी प्राथमिकता बताया है.
‘एक्सप्रेस’ के मुताबिक, यह घटना न केवल नेपाल बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दर्शाती है कि कैसे स्वतंत्र और गैर-पारंपरिक पृष्ठभूमि वाले युवा नेता स्थापित राजनीतिक दलों को चुनौती देकर सत्ता के शीर्ष तक पहुँच सकते हैं.
एफ़बीआई निदेशक काश पटेल के ईमेल और फोटो हैक; ईरान से जुड़े हैकर समूह का हाथ
ईरान से जुड़े हैकरों के एक समूह ने दावा किया है कि उन्होंने संघीय जांच ब्यूरो (एफ़बीआई) के निदेशक काश पटेल के निजी ईमेल तक सफलतापूर्वक पहुँच बना ली है. समूह ने इस अमेरिकी अधिकारी के व्यक्तिगत दस्तावेजों और तस्वीरों को ऑनलाइन साझा भी किया है.
‘हंडाला हैक टीम’ ने शुक्रवार को कहा कि पटेल का नाम अब “सफलतापूर्वक हैक किए गए पीड़ितों की सूची” में शामिल होगा. “अलजज़ीरा” की रिपोर्ट के अनुसार, समाचार एजेंसी रॉयटर्स और सीएनएन ने अज्ञात सुरक्षा अधिकारियों और मामले से जुड़े सूत्रों के हवाले से इस सेंधमारी की पुष्टि की है. हालांकि, एफबीआई और न्याय विभाग ने अभी तक इस घटना पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
ऐसा प्रतीत होता है कि इस हैकिंग में एक दशक से भी अधिक पुराने कुछ दस्तावेज सार्वजनिक हुए हैं. कुछ ईमेल पटेल के यात्रा और व्यावसायिक पत्राचार को दर्शाते हैं. अन्य तस्वीरों में पटेल एक एंटीक स्पोर्ट्स कनवर्टिबल कार के पास, मुंह में सिगार लिए और हाथ में रम की बोतल लेकर आईने के सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं.
काश पटेल एफबीआई के नौवें निदेशक हैं और उन्होंने 2025 में अपना कार्यकाल शुरू किया था. उनका नेतृत्व विवादों से घिरा रहा है, जहाँ आलोचकों ने उन पर व्यक्तिगत यात्रा के लिए संघीय कानून प्रवर्तन एजेंसी का दुरुपयोग करने और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की प्राथमिकताओं को पूरा करने के आरोप लगाए हैं. खुद को फिलिस्तीन समर्थक ‘हैकिंग विजिलेंटे’ बताने वाले इस समूह ने हाल ही में मेडिकल डिवाइस कंपनी ‘स्ट्राइकर’ पर हुए साइबर हमले की जिम्मेदारी भी ली थी.
पश्चिमी शोधकर्ताओं का कहना है कि यह समूह ईरानी साइबर इंटेलिजेंस से जुड़ा है. समूह के अनुसार, यह हमला दक्षिणी ईरान के मिनाब में बच्चों के एक स्कूल पर हुए अमेरिका-इजरायल हमले के प्रतिशोध में किया गया है, जिसमें 170 से अधिक लोग मारे गए थे, जिनमें अधिकांश स्कूली छात्राएं थीं. समूह ने उस समय कहा था कि यह ऑपरेशन “साइबर युद्ध के एक नए अध्याय की शुरुआत” है. ईरान ने अमेरिका-इजरायल युद्ध के बीच दबाव बनाने के लिए पश्चिमी आर्थिक हितों पर हमले तेज करने की धमकी दी है.
‘कुछ भी सामान्य नहीं है’: ईरानी राष्ट्रपति के बेटे की डायरी में आम नागरिकों की आशाएं और डर
“द गार्डियन” ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन के बेटे यूसुफ पेज़ेशकियन द्वारा सोशल मीडिया पर लिखी जा रही ‘वॉर डायरी’ के हवाले से युद्ध से प्रभावित इस मुल्क की तस्वीर पेश की है.
‘गार्डियन’ ने लिखा है कि यूसुफ पेज़ेशकियन (45), जो पेशे से भौतिकी के प्रोफेसर हैं, सोशल मीडिया पर अपनी दैनिक भावनाओं और विचारों को साझा कर रहे हैं. हालांकि वह राष्ट्रपति के बेटे हैं, लेकिन उनकी डायरी किसी सरकारी जासूस या रणनीतिकार की नहीं, बल्कि एक आम नागरिक की तरह युद्ध के डर और अनिश्चितता को दर्शाती है.
डायरी का शीर्षक “नथिंग इज़ नॉर्मल” (कुछ भी सामान्य नहीं है) उस भावुक पल से आया है जब यूसुफ अपनी दादी से मिलने जाते हैं. वह अपनी दादी को मुस्कुराकर दिलासा देते हैं कि “सब कुछ सामान्य है, यह तो बस युद्ध है,” लेकिन उनके घर से बाहर निकलते ही वह फूट-फूट कर रोने लगते हैं और लिखते हैं कि वास्तव में “कुछ भी सामान्य नहीं है.”
यूसुफ अपनी पोस्ट में युद्ध के प्रति अपनी वफादारी और देश प्रेम को तो दिखाते हैं, लेकिन साथ ही इसके कारण होने वाली तबाही पर गहरा दुख भी व्यक्त करते हैं. वह लिखते हैं कि कैसे मिसाइलों की आवाज़ के बीच तेहरान का सुहावना मौसम उन्हें अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सड़कों पर टहलने की याद दिलाता है.
उनकी डायरी में ईरानी समाज में हो रही सरकार की आलोचनाओं की झलक भी मिलती है. वह अपने पिता द्वारा खाड़ी देशों से माफी मांगने के फैसले का बचाव करते हुए इसे एक “नैतिक कर्तव्य” बताते हैं, ताकि पड़ोसियों के साथ संबंध सुधारे जा सकें.
राष्ट्रपति का बेटा होने के बावजूद, यूसुफ का कहना है कि उन्हें भी युद्ध की खबरें टेलीविजन या सोशल मीडिया से ही मिलती हैं. वह ईरान में इंटरनेट ब्लैकआउट और सेंसर की गई खबरों पर अपना गुस्सा भी जाहिर करते हैं.
अंततः, यूसुफ का मानना है कि केवल ‘राष्ट्रीय एकता’ ही ईरान को इस संकट से बचा सकती है. वह स्वीकार करते हैं कि सरकार से गलतियाँ हुई हैं, लेकिन उनका तर्क है कि ये गलतियाँ अमेरिका और इज़रायल के हमलों को सही नहीं ठहरातीं.
बहरहाल, ‘द गार्डियन’ के कूटनीतिक संपादक पैट्रिक विंटूर अपनी इस रिपोर्ट में एक ऐसे व्यक्ति की आंतरिक उथल-पुथल को दिखाते हैं, जो सत्ता के बहुत करीब है, फिर भी युद्ध की विभीषिका उसे एक असहाय आम नागरिक जैसा महसूस कराती है.
रिपोर्ट: ईरान के खिलाफ सैन्य विकल्पों पर विचार कर रहे ट्रम्प, मध्य पूर्व में 10,000 अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती संभव
एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका मध्य पूर्व में कम से कम 10,000 अतिरिक्त लड़ाकू सैनिकों को भेजने पर विचार कर रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान के खिलाफ सैन्य विकल्पों का आकलन कर रहे हैं, जिसमें एक संभावित जमीनी अभियान भी शामिल है.
यह कदम तब उठाया जा रहा है जब ईरान ने चल रहे संघर्ष को समाप्त करने और वैश्विक तेल मार्ग के लिए महत्वपूर्ण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को फिर से खोलने के उद्देश्य से दिए गए अमेरिका के 15-सूत्रीय प्रस्ताव को खारिज कर दिया है. 28 फरवरी को परमाणु वार्ता के दौरान ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के साथ शुरू हुआ यह युद्ध अब पूरे क्षेत्र में फैल गया है. इस युद्ध में अब तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं और इसने वैश्विक ऊर्जा व उर्वरक की कीमतों को बढ़ा दिया है, जिससे दुनिया भर में मुद्रास्फीति (महंगाई) की चिंताएं गहरा गई हैं.
“द इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, एक्सियोस की रिपोर्ट में एक वरिष्ठ अमेरिकी रक्षा अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि व्हाइट हाउस और पेंटागन नई लड़ाकू इकाइयों से अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती पर चर्चा कर रहे हैं, जिस पर अगले सप्ताह तक निर्णय होने की उम्मीद है. सैनिकों की संख्या में यह संभावित वृद्धि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को काफी बढ़ा देगी और यह संकेत देगी कि वाशिंगटन, ईरान में संभावित जमीनी कार्रवाई के लिए गंभीरता से तैयारी कर रहा है.
अमेरिका को उम्मीद है कि ईरान अभियान ‘महीनों नहीं, हफ्तों’ में समाप्त हो जाएगा: रूबियो
‘द गार्डियन’ की खबर है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने शुक्रवार को फ्रांस में G7 देशों के विदेश मंत्रियों से मुलाकात के बाद कहा कि अमेरिका को उम्मीद है कि ईरान में उसका सैन्य अभियान “महीनों नहीं, बल्कि हफ्तों” में संपन्न हो जाएगा. रूबियो ने यह भी कहा कि ईरान ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (होर्मुज जलडमरूमध्य) के लिए एक टोलिंग सिस्टम (शुल्क प्रणाली) स्थापित करने का निर्णय ले सकता है.
संयंत्रों पर हमलों के लिए ईरान ने ‘भारी कीमत’ चुकाने की चेतावनी दी
इस बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि शुक्रवार के हमले डोनाल्ड ट्रम्प के उस वादे के खिलाफ हैं, जिसमें उन्होंने बातचीत “अच्छी चलने” का दावा करते हुए ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमलों को 10 दिनों के लिए टालने की बात कही थी. उन्होंने चेतावनी दी कि तेहरान इन हमलों के लिए “भारी कीमत” वसूलेगा.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में अराघची ने कहा कि इजरायल ने “ईरान के दो सबसे बड़े स्टील कारखानों, एक पावर प्लांट और नागरिक परमाणु स्थलों सहित अन्य बुनियादी ढांचों को निशाना बनाया है.” अराघची ने आगे कहा, “इजरायल का दावा है कि उसने अमेरिका के साथ समन्वय में यह कार्रवाई की है,” और यह हमला “राजनय के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा बढ़ाई गई समय-सीमा का उल्लंघन है.”
इससे 24 घंटे से भी कम समय पहले, ट्रम्प ने ईरान के पावर ग्रिड पर हमला करने की अपनी रोक को आगे बढ़ाया था और ईरान के लिए ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को फिर से खोलने की समय-सीमा को एक बार फिर 10 दिनों के लिए टाल दिया था. अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया था कि यह देरी “ईरानी सरकार के अनुरोध पर” की गई थी और युद्ध समाप्त करने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत “जारी है और... बहुत अच्छी चल रही है.”
कड़वी कॉफी: ईरान पर हमले के बहाने बदलती दुनिया का विश्लेषण
“कड़वी कॉफी” के हालिया एपिसोड में वैश्विक राजनीति के सबसे जटिल और संवेदनशील मुद्दे, ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले पर प्रो. अपूर्वानंद ने कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण साहनी और पंकज कुमार से चर्चा की.
बातचीत की शुरुआत ही एक बुनियादी सवाल से हुई कि क्या इसे युद्ध कहा जाए या एकतरफा हमला? इस पर प्रवीण साहनी ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह पारंपरिक युद्ध नहीं, बल्कि “अग्रेशन (आक्रामकता) और टेररिज्म (आतंकवाद)” का मिश्रण है. उनके अनुसार, अमेरिका की भूमिका एक आक्रामक शक्ति की है, जबकि इजराइल की रणनीति टारगेटेड किलिंग (लक्षित हत्याएं) और खुफिया ऑपरेशंस (गुप्त अभियान) के जरिए आतंकवादी शैली की प्रतीत होती है. उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि पश्चिमी मीडिया ने इस हमले को बहुत सहजता से स्वीकार कर लिया.
चर्चा में बदलते हुए वैश्विक शक्ति संतुलन पर बात करते हुए साहनी ने कहा कि यह संघर्ष केवल ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस विश्व व्यवस्था के अंत का संकेत है जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के नेतृत्व में बनी थी. उनका दावा था कि अगर इस संघर्ष में अमेरिका कमजोर पड़ता है, तो एक नया “मल्टीपोलर वर्ल्ड (बहुध्रुवीय विश्व)” तेजी से उभरेगा, जिसमें चीन और रूस जैसी शक्तियां निर्णायक भूमिका निभाएंगी.
ईरान की रणनीति को समझाते हुए साहनी ने “असिमेट्रिकल वॉरफेयर (असममित युद्ध)” की अवधारणा पर विस्तार से बात की. उनके अनुसार, ईरान ने पारंपरिक सैन्य ताकत के बजाय सस्ते और प्रभावी हथियारों जैसे ड्रोन (मानवरहित विमान), मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) और साइबर तकनीक (साइबर प्रौद्योगिकी) का इस्तेमाल कर एक ऐसी युद्ध प्रणाली विकसित की है, जो बड़ी सैन्य शक्तियों को भी चुनौती दे सकती है.
उन्होंने कहा कि ईरान इस संघर्ष को धार्मिक युद्ध के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता की लड़ाई के रूप में देख रहा है. वहीं दूसरी ओर, अमेरिका और इजराइल के कुछ बयान इसे धार्मिक रंग देते नजर आते हैं, जो इस पूरे संघर्ष को और जटिल बना देता है.
भारत की भूमिका पर उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति अब संतुलित नहीं दिखती और वह अमेरिका के करीब झुकी हुई नजर आती है. उनके अनुसार, यदि कोई देश मध्यस्थता करना चाहता है, तो उसे पूरी तरह तटस्थ होना चाहिए, जो इस समय भारत के मामले में स्पष्ट नहीं है.
पंकज कुमार के सवाल कि “क्या दुनिया इस समय नेतृत्व के संकट से गुजर रही है?” पर साहनी ने कहा कि पारंपरिक पश्चिमी नेतृत्व कमजोर जरूर हुआ है, यह समस्या सिर्फ पश्चिमी दुनिया में है, लेकिन ग्लोबल साउथ (वैश्विक दक्षिण), जिसमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका शामिल हैं, में नई ताकतें उभर रही हैं, जो भविष्य की दिशा तय कर सकती हैं.
शादीशुदा पुरुष का दूसरी महिला के साथ रहना अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
“यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी बालिग महिला के साथ आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, तो इसके लिए उसके खिलाफ कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.”
शुक्रवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह अहम टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाला एक युगल अपने ऊपर दर्ज पुलिस केस को रद्द कराने के लिए पहुंचा था.
मामला उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर का है. यह केस महिला की मां ने दर्ज कराया था, जिसे रद्द कराने की मांग को लेकर दोनों ने रिट याचिका दाखिल की थी.
महिला की मां ने अपनी शिकायत में कहा कि उनकी बेटी के साथ लिव-इन में रहने वाला पुरुष पहले से शादीशुदा है. उसने उनकी बेटी का विवाह के लिए अपहरण किया है, इसलिए यह अपराध है और उस पर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए.
द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, जस्टिस जे. जे. मुनिर और तरुण सक्सेना की डिवीजन बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि, “सामाजिक नैतिकता और कानून में अंतर होता है, जिसे समझना जरूरी है. कोई रिश्ता समाज की नजर में गलत हो सकता है, लेकिन अदालत का काम उसे कानून के नजरिए से देखना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है.
कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया है कि उन्हें गिरफ्तार न किया जाए. इसके साथ ही, कोर्ट ने महिला (अनामिका) के घरवालों को भी कड़ी चेतावनी दी है. परिवार का कोई भी सदस्य इस जोड़े को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएगा. वे न तो उनके घर में घुसेंगे और न ही फोन, मैसेज या किसी तीसरे बंदे के जरिए उनसे संपर्क करने की कोशिश करेंगे.
केरल हाई कोर्ट की सख्ती: “हमें हिंदू विधायक चाहिए” बयान पर चुनाव आयोग को कार्रवाई का निर्देश
मकतूब मीडिया के अनुसार, केरल हाई कोर्ट ने गुरुवायुर विधानसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार बी. गोपालकृष्णन के “हमें हिंदू एमएलए चाहिए” बयान पर गंभीर चिंता जताई है. यह विवाद एक चुनावी वीडियो को लेकर है, जिसमें गोपालकृष्णन ने कथित तौर पर दावा किया था कि गुरुवायूर निर्वाचन क्षेत्र ने लगभग पांच दशकों से किसी हिंदू विधायक को नहीं चुना है, और उन्होंने सवाल उठाया था कि प्रतिद्वंद्वी दलों द्वारा इस समुदाय के उम्मीदवारों को मैदान में क्यों नहीं उतारा गया. जिसके बाद कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी)) ने चुनाव आयोग से कार्रवाई की मांग की थी.
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस ने चुनाव आयोग से पूछा, “वीडियो हटा दिया गया है, लेकिन समुदाय, समाज और देश को हुए नुकसान का क्या?”
याचिकाकर्ता ने इसे कानून का उल्लंघन बताते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की. हालांकि कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि “यह मामला पहले से ही चुनाव आयोग के पास विचाराधीन है.”
कोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया कि वह दो महीने के भीतर इस मामले पर निर्णय ले. साथ ही, अदालत ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के कारण वह इस पर कोई अतिरिक्त टिप्पणी नहीं करेगी.
अपील :
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