27/08/2025: अबकी बार, ट्रम्प टैरिफ की मार! | मोदी के चोर कहने पर ममता को एतराज | पराकला ने 2024 के चुनावों को धोखाधड़ी बताया | योगेंद्र यादव और पी साईंनाथ के विश्लेषण
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल
आज की सुर्खियाँ
अमेरिकी टैरिफ़ का डर, बाज़ार धड़ाम।
निवेशकों के 6 लाख करोड़ स्वाहा।
टैरिफ़ का असर: कपड़ा उत्पादन रुका।
पीएम ने 'चोर' कहा, ममता का पलटवार।
2024 का चुनाव एक 'धोखाधड़ी': प्रभाकर।
बिहार: 2 करोड़ लोग खो सकते हैं वोट का अधिकार?
चीन में मिलेंगे मोदी और पुतिन।
'लापता' धनखड़ ओटीटी पर व्यस्त।
भागवत ने दोहराए नेहरू के शब्द।
सीमा पर सख़्ती, अपनी ज़मीन छोड़ रहे किसान।
महाराष्ट्र: सुलेमान की लिंचिंग, हत्या 'उचित' ठहराई गई।
पत्रकारिता नहीं, सिर्फ स्टेनोग्राफी बची है: साईनाथ।
ताइवान हमले की तैयारी में, पर लोग बेफिक्र।
क्या एआई को भी दर्द महसूस होता है?
अमेरिकी टैरिफ़ की सुनामी में डूबे बाज़ार, निवेशकों के 6 लाख करोड़ स्वाहा
अमेरिका द्वारा भारतीय आयातों पर 50% तक के भारी-भरकम टैरिफ़ लागू करने की घोषणा से ठीक एक दिन पहले, मंगलवार को भारतीय शेयर बाज़ार में सुनामी आ गई. ट्रेड वॉर (व्यापार युद्ध) की गहरी होती आशंकाओं के बीच निवेशकों में ऐसी घबराहट फैली कि उन्होंने चौतरफ़ा बिकवाली शुरू कर दी. इसके परिणामस्वरूप, बाज़ार में एक ही दिन में निवेशकों की संपत्ति से 6 लाख करोड़ रुपये साफ़ हो गए. यह गिरावट इतनी भीषण थी कि बीएसई सेंसेक्स अपने महत्वपूर्ण 81,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे फिसल गया.
मंगलवार को कारोबार की समाप्ति पर, 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 849.37 अंक, यानी 1.04% की ज़बरदस्त गिरावट के साथ 80,786.54 पर बंद हुआ. दिन के दौरान, यह 949.93 अंक तक गोता लगाकर 80,685.98 के निचले स्तर पर भी पहुँच गया था. इसी तरह, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ़्टी 255.70 अंक, यानी 1.02% की गिरावट के साथ 24,712.05 पर बंद हुआ. बाज़ार में बिकवाली का दबाव कितना व्यापक था, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बड़े शेयरों के साथ-साथ बीएसई मिडकैप इंडेक्स 1.3% और स्मॉलकैप इंडेक्स 1.7% तक टूट गया, जिससे छोटे और मझोले निवेशकों को भी भारी नुक़सान हुआ.
गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिकी टैरिफ़ का डर : बाज़ार में इस भूचाल का मुख्य कारण अमेरिकी सरकार का वह मसौदा नोटिस है, जिसमें भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त 25% शुल्क लगाने की बात कही गई है. यह नया शुल्क बुधवार, 27 अगस्त, 2025 से प्रभावी होगा, जिससे भारतीय सामानों पर कुल टैरिफ़ 50% तक पहुँच जाएगा. अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ़ होमलैंड सिक्योरिटी द्वारा जारी इस नोटिस में दिलचस्प रूप से इन टैरिफ़ को "रूसी संघ की सरकार द्वारा अमेरिका को दी गई धमकियों" से जोड़ा गया है, और भारत को उसी रणनीति के तहत निशाना बनाया गया है. इस क़दम से भारत के टेक्सटाइल, फ़ार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग जैसे कई प्रमुख निर्यात क्षेत्रों पर सीधा असर पड़ने की आशंका है.
विशेषज्ञों की नज़र में गिरावट के अन्य कारण : मोतीलाल ओसवाल फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़ के रिसर्च हेड, सिद्धार्थ खेमका के अनुसार, "भारतीय शेयरों में गिरावट का कारण सिर्फ़ टैरिफ़ ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर बढ़ती चिंताएं भी हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा फ़ेडरल गवर्नर लिसा कुक को बर्ख़ास्त करने और डिजिटल सर्विस टैक्स के जवाब में चिप्स पर निर्यात प्रतिबंध की धमकी देने से भी वैश्विक बाज़ार का सेंटिमेंट बिगड़ा है."
वहीं, रेलिगेयर ब्रोकिंग के एसवीपी (रिसर्च) अजित मिश्रा ने बताया कि टैरिफ़ की चिंता के अलावा, बाज़ार पर कई और दबाव भी थे. विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली, कमज़ोर होता रुपया और कच्चे तेल की क़ीमतों में उछाल ने मिलकर निवेशकों को जोखिम कम करने पर मजबूर कर दिया. आंकड़ों के अनुसार, FIIs ने मंगलवार को ही भारतीय इक्विटी बाज़ार से 6,580.13 करोड़ रुपये की भारी रक़म निकाल ली, जो बाज़ार में भरोसे की कमी का एक बड़ा संकेत है.
बाज़ार में चौतरफ़ा बिकवाली, सिर्फ़ FMCG बचा : इस बड़ी गिरावट के दौरान लगभग सभी सेक्टर्स लाल निशान में बंद हुए. सिर्फ़ निफ़्टी FMCG इंडेक्स ही 0.91% की बढ़त के साथ हरे निशान में बंद होने में कामयाब रहा, क्योंकि आर्थिक अनिश्चितता के दौर में निवेशक इसे एक सुरक्षित दांव मानते हैं. सबसे ज़्यादा नुक़सान झेलने वाले शेयरों में श्रीराम फ़ाइनेंस, सन फ़ार्मा, टाटा स्टील, बजाज फ़ाइनेंस और ट्रेंट शामिल थे. वहीं, हिंदुस्तान यूनिलीवर, मारुति सुज़ुकी और आईटीसी जैसे कुछ गिने-चुने शेयरों में मामूली ख़रीददारी देखी गई.
आगे क्या होगा? गणेश चतुर्थी के अवसर पर बुधवार को भारतीय बाज़ार बंद रहेंगे. अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या अमेरिकी सरकार इन टैरिफ़ को लागू करने में कोई नरमी या देरी दिखाती है. बाज़ार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर टैरिफ़ को टालने या बातचीत का कोई संकेत मिलता है, तो बाज़ार में कुछ रिकवरी आ सकती है. अन्यथा, यह बिकवाली का दबाव आगे भी जारी रह सकता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.
तिरुपुर, नोएडा और सूरत में कपड़ा उत्पादन रुका, उद्योग ने सरकार से मांगी तत्काल मदद
फेडरेशन ऑफ़ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइज़ेशन्स (FIEO) ने मंगलवार को कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारतीय निर्यातों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ़ लगाने के फ़ैसले के बाद तिरुपुर, नोएडा और सूरत में कपड़ा और परिधान निर्माताओं ने उत्पादन रोक दिया है. इस फ़ैसले से कुल टैरिफ़ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो दुनिया में सबसे ज़्यादा है, और इससे भारतीय उत्पादों की लागत प्रतिस्पर्धात्मकता बहुत बिगड़ गई है.
FIEO के अध्यक्ष एस. सी. रल्हन ने एक बयान में कहा, "लागत प्रतिस्पर्धात्मकता के बिगड़ने के बीच तिरुपुर, नोएडा और सूरत में कपड़ा और परिधान निर्माताओं ने उत्पादन रोक दिया है. यह क्षेत्र वियतनाम और बांग्लादेश जैसे कम लागत वाले प्रतिद्वंद्वियों से पिछड़ रहा है. जहाँ तक सीफ़ूड, विशेषकर झींगे का सवाल है, चूंकि अमेरिकी बाज़ार भारतीय सीफ़ूड निर्यात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा लेता है, इसलिए टैरिफ़ में वृद्धि से स्टॉक के नुक़सान, आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा और किसानों की परेशानी का ख़तरा है." FIEO ने कहा, "हालांकि, अमेरिका के साथ तत्काल राजनयिक बातचीत के लिए उपलब्ध अवसर का लाभ उठाना अभी भी महत्वपूर्ण है. एक और तरीक़ा 'ब्रांड इंडिया' और नवाचार को बढ़ावा देना हो सकता है, जिसके लिए वैश्विक ब्रांडिंग में निवेश, गुणवत्ता सर्टिफ़िकेशन और निर्यात रणनीति में नवाचार को शामिल करना होगा ताकि भारतीय सामान विश्व स्तर पर अधिक आकर्षक बन सकें."
6 × 2,526रल्हन ने कहा कि 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ़ भारत के सबसे बड़े निर्यात बाज़ार में भारतीय माल के प्रवाह को गंभीर रूप से बाधित करेगा. उन्होंने कहा कि यह घटनाक्रम एक झटका है और अमेरिका को होने वाले भारत के निर्यात पर गंभीर असर डाल सकता है. रल्हन ने कहा, "अमेरिका जाने वाले भारत के लगभग 55 प्रतिशत शिपमेंट (47-48 बिलियन डॉलर) अब 30-35 प्रतिशत के मूल्य निर्धारण के नुक़सान का सामना कर रहे हैं, जिससे भारतीय माल चीन, वियतनाम, कंबोडिया, फिलीपींस और अन्य दक्षिण-पूर्व और दक्षिण एशियाई देशों के प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अप्रतिस्पर्धी हो गया है."
इस बीच, कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (CITI) ने कहा है कि कपड़ा निर्माता 27 अगस्त से लागू होने वाले 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ़ से उत्पन्न भारी चुनौती से निपटने के लिए सरकार से तत्काल सहायता की उम्मीद कर रहे हैं. CITI के चेयरमैन राकेश मेहरा ने कहा, "सरकार उद्योग के साथ चर्चा कर रही है कि इस महत्वपूर्ण मोड़ पर वह हमारी सहायता कैसे कर सकती है. लेकिन स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, हमारी अपेक्षा है कि वित्तीय सहायता और कच्चे माल की उपलब्धता से संबंधित नीतिगत फ़ैसलों के रूप में ठोस उपाय तुरंत किए जाएंगे." मेहरा ने कहा, "दांव पर न केवल भारत के कपड़ा और परिधान निर्यातकों का भविष्य और देश के लिए विदेशी मुद्रा आय का नुक़सान है, बल्कि कपड़ा और परिधान क्षेत्र में अनगिनत नौकरियां और 2030 तक 100 बिलियन डॉलर के कपड़ा और परिधान निर्यात के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने की संभावनाएं भी हैं."
चमड़ा, सिरेमिक, रसायन, हस्तशिल्प और कालीन जैसे अन्य श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्रों पर FIEO ने कहा कि उद्योग को विशेष रूप से यूरोपीय, दक्षिण-पूर्व एशियाई और मैक्सिकन उत्पादकों के मुक़ाबले प्रतिस्पर्धात्मकता में भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है. FIEO ने कहा, "इन क्षेत्रों पर देरी, ऑर्डर रद्द होने और लागत लाभ समाप्त होने का बड़ा ख़तरा मंडरा रहा है." रल्हन ने कहा, "तत्काल सरकारी समर्थन की ज़रूरत है, जिसमें कार्यशील पूंजी और तरलता को बनाए रखने के लिए ब्याज छूट योजनाओं और निर्यात ऋण सहायता को बढ़ावा देना शामिल है. इसे और समर्थन देने के लिए, विशेष सरकारी और भारतीय रिज़र्व बैंक के निर्देशों के तहत बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा समर्थित, कम लागत वाला और आसानी से उपलब्ध ऋण आवश्यक है, जिसमें एमएसएमई पर ज़ोर दिया जाए." CITI ने सरकार से एक साल तक के लिए ऋण के मूलधन और ब्याज के भुगतान पर रोक लगाने की भी मांग की है.
पीएम मोदी से हमें 'चोर' कहने की उम्मीद नहीं थी, उन्हें मेरी कुर्सी का सम्मान करना चाहिए : ममता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक नया हमला करते हुए, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार को कहा कि उन्हें कभी उम्मीद नहीं थी कि मोदी उनकी कुर्सी और पूरे राज्य का अपमान करते हुए यहां के लोगों को 'चोर' कहेंगे. यह बात उन्होंने पूर्वी बर्दवान ज़िले के बर्दवान शहर में एक सरकारी कार्यक्रम में कही, जो लोगों के बीच समाज कल्याण योजनाओं के लाभ बांटने के लिए आयोजित किया गया था. सुश्री बनर्जी ने श्री मोदी की टिप्पणियों को पश्चिम बंगाल के लोगों का 'अपमान' बताया और केंद्रीय फंड रोकने के लिए उनकी आलोचना की. उन्होंने आरोप लगाया कि फंड रोके जाने से राज्य के खजाने पर 'भारी बोझ' पड़ा है.
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा है कि 'ट्रंप ने गुजरातियों को भगा दिया, लेकिन हार्वर्ड, ऑक्सफ़ोर्ड, कोलंबिया, सैन फ़्रांसिस्को जैसी जगहें बंगालियों के बिना नहीं चल सकतीं'. पूर्वी बर्दवान में एक कार्यक्रम में बोलते हुए, उन्होंने दावा किया कि राज्य के 22 लाख प्रवासी मज़दूरों को अब भाजपा शासित राज्यों में बंगाली बोलने के लिए प्रताड़ित किया जा रहा है, जबकि बंगाल में 1.5 करोड़ बाहरी लोग सुरक्षित रूप से काम कर रहे हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर चुनाव के समय 'प्रवासी पक्षी' की तरह बंगाल आने का आरोप लगाया और कहा कि केंद्र ने सभी सवालों के जवाब देने के बावजूद फंड रोक दिया है और बंगाल के लोगों को 'चोर' कह रहा है, जो एक अपमान है. बनर्जी ने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल ने ही सबसे पहले स्वास्थ्य बीमा पर जीएसटी छूट की वकालत की थी ताकि आम लोगों के लिए मेडिकल कवर सस्ता हो सके.
चुनाव आयोग/ मतदाता सूची/ बिहार
2024 का लोकसभा चुनाव एक सुनियोजित "धोखाधड़ी" थी: पराकला प्रभाकर
प्रसिद्ध राजनीतिक अर्थशास्त्री पराकला प्रभाकर ने अपने एक बेबाक और चिंताजनक भाषण में भारतीय लोकतंत्र पर मंडरा रहे सबसे बड़े खतरे का पर्दाफाश किया है. उन्होंने कहा है कि 2024 का लोकसभा चुनाव एक निष्पक्ष प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक सुनियोजित "धोखाधड़ी" थी, जिसमें लगभग 5 करोड़ अतिरिक्त वोटों के हेरफेर ने नतीजों को पूरी तरह बदल दिया. प्रभाकर ने मौजूदा चुनाव आयोग को "भारत का चुनाव आयोग" नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का "इलेक्शन मोर्चा" करार दिया है, जिसका काम चुनाव कराना नहीं, बल्कि चुनाव जिताना है.
5 करोड़ वोटों का खेल, जिसने बदल दी सत्ता की तस्वीर : प्रभाकर ने वोट फॉर डेमोक्रेसी (PFD) समूह की एक गहन शोध रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि 2024 के लोकसभा चुनावों में चुनाव आयोग द्वारा जारी अनंतिम (provisional) और अंतिम (final) वोटिंग आंकड़ों के बीच लगभग 5 करोड़ वोटों का भारी अंतर था. यह कोई मामूली आंकड़ा नहीं है. इस हेरफेर ने 15 राज्यों में कम से कम 79 सीटों के नतीजों को सीधे तौर पर प्रभावित किया.
अगर यह धांधली न हुई होती, तो आज की तस्वीर बिल्कुल अलग होती. NDA, जिसे 293 सीटें मिलीं, वह केवल 214 पर सिमट जाती, और विपक्षी गठबंधन, जिसे 234 सीटें मिलीं, वह 313 सीटों के साथ बहुमत में होता. यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि यह कोई तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि सत्ता हासिल करने के लिए रचा गया एक सोचा-समझा षड्यंत्र था.
यह कैसीनो का खेल है, एक-दो जीत से धोखा न खाएं: प्रभाकर ने विपक्ष और जनता को आगाह करते हुए कहा कि वे कुछ राज्यों में मिली जीत से खुश न हों. उन्होंने इसे एक कैसीनो के खेल से समझाया. कैसीनो हमेशा यह सुनिश्चित करता है कि आप कभी-कभी जीतें, ताकि आप खेलने के लिए वापस आते रहें, लेकिन अंत में जीत हमेशा कैसीनो की ही होती है. इसी तरह, बीजेपी आपको तेलंगाना या छत्तीसगढ़ जैसे राज्य जीतने देगी, ताकि लोकतंत्र का भ्रम बना रहे, लेकिन जब लोकसभा का सवाल आएगा, तो वह पूरा खेल अपने पक्ष में कर लेगी. तमिलनाडु में बीजेपी का वोट शेयर 2019 में 3.58% से बढ़कर 2024 में 11.24% हो गया. यह वृद्धि कहां से आई. प्रभाकर बताते हैं कि तमिलनाडु में अनंतिम और अंतिम मतदान आंकड़ों के बीच का अंतर 7.53% था. यह "विकास" ज़मीन से नहीं, बल्कि आंकड़ों के हेरफेर से आया है.
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में : प्रभाकर ने मौजूदा चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि जिस तरह से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की जा रही है—जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाकर प्रधानमंत्री और उनके एक कैबिनेट मंत्री को बहुमत दिया गया है—उससे यह संस्था एक सरकारी विभाग बनकर रह गई है.
उन्होंने टी.एन. शेषन का उदाहरण दिया, जो सरकार द्वारा नियुक्त होने के बावजूद स्वतंत्र रूप से काम करते थे और खुद को भारत की जनता और संसद के प्रति जवाबदेह मानते थे, न कि सरकार के प्रति. लेकिन आज का चुनाव आयोग प्रधानमंत्री के 110 से ज़्यादा नफरती भाषणों पर एक नोटिस तक नहीं भेजता. वह पहले चरण के मतदान के अंतिम आंकड़े 11 दिन बाद और सातवें चरण के आंकड़े चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद जारी करता है. क्या ऐसी संस्था पर भरोसा किया जा सकता है.
सांप्रदायिक एजेंडे को लागू करने की साजिश : प्रभाकर के अनुसार, यह सब क्यों हो रहा है. इसके पीछे एक गहरा एजेंडा है—भारत को एक बहुसंख्यकवादी, हिंदू राष्ट्र में बदलना. बीजेपी और उसके वैचारिक संगठन यह जानते हैं कि भारत की जनता कभी भी इस विभाजनकारी एजेंडे को सीधे तौर पर वोट नहीं देगी. जनसंघ के दिनों से लेकर आज तक, जब भी उन्होंने इस एजेंडे को खुलकर सामने रखा, उन्हें 9% से ज़्यादा वोट नहीं मिले. इसलिए, जब उन्हें पता चला कि भारतीय मतदाता उनके सांप्रदायिक एजेंडे को खारिज कर रहे हैं, तो उन्होंने चुनाव जीतने के लिए एक "इलेक्शन मोर्चा" बना लिया. यह चुनावी धोखाधड़ी उसी डिजाइन का हिस्सा है.
अब आगे का रास्ता क्या है? प्रभाकर ने कहा कि अब समय आ गया है कि इस दिखावे को खत्म किया जाए.
लोकसभा भंग हो: यह लोकसभा एक धोखाधड़ी वाले चुनाव पर आधारित है. इसे तत्काल भंग किया जाना चाहिए.
सरकार बर्खास्त हो: इस धोखाधड़ी से बनी सरकार को भी जाना होगा.
चुनाव आयोग को भंग करें: इस "इलेक्शन मोर्चे" को भंग करके एक निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव आयोग का गठन किया जाना चाहिए, जिसकी नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी हो.
मतदाता सूची को साफ करें: जब तक मतदाता सूची को पूरी तरह से साफ नहीं किया जाता और धोखाधड़ी को खत्म नहीं किया जाता, तब तक कोई भी चुनाव निष्पक्ष नहीं हो सकता.
विपक्षी दल चुनाव का बहिष्कार करें: अगर ये शर्तें पूरी नहीं होती हैं, तो विपक्षी दलों को चुनाव लड़ने के बजाय उनका बहिष्कार करना चाहिए. चुनाव में भाग लेकर वे इस धोखाधड़ी को केवल वैधता प्रदान कर रहे हैं.
प्रभाकर ने चेतावनी दी कि अगर हमने इस निर्णायक मोड़ पर कदम नहीं उठाया, तो भारतीय लोकतंत्र हमारे हाथों से हमेशा के लिए निकल जाएगा. यह लड़ाई किसी राजनीतिक दल को जिताने या हराने की नहीं है. यह गणतंत्र को बचाने के लिए भारत के आम लोगों की लड़ाई है. यह फेसबुक या ट्विटर पर पोस्ट करने का समय नहीं है, बल्कि सड़कों पर उतरकर अपने लोकतंत्र को बचाने का समय है. अगर अब नहीं जागे, तो भविष्य में इस तरह बैठकर बात करने का मौका भी नहीं मिलेगा.
योगेंद्र यादव : 2 करोड़ लोग खो देंगे मताधिकार?
बिहार में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर चुनाव आयोग बड़े-बड़े दावे कर रहा है. लेकिन इन दावों के पीछे एक ऐसी हकीकत छिपी है, जो भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में सबसे बड़े नागरिक अधिकार हनन का कारण बन सकती है. भारत जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक और इस मामले पर पैनी नजर रख रहे योगेंद्र यादव ने करण थापर को दिए एक साक्षात्कार में चुनाव आयोग के दावों की परत-दर-परत पोल खोल दी है. उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को "नोटबंदी जैसा एक और मास्टरस्ट्रोक" बताया है—जिसमें दावे बड़े हैं, लेकिन नतीजा विनाशकारी हो सकता है.
98.2% के चमकदार आंकड़े का सच क्या है? चुनाव आयोग ने घोषणा की कि बिहार में 98.2% लोगों ने अपने दस्तावेज़ जमा कर दिए हैं. पहली नज़र में यह एक शानदार सफलता लगती है. लेकिन योगेंद्र यादव सवाल उठाते हैं कि इस "दस्तावेज़" शब्द का मतलब क्या है. यह आंकड़ा असलियत को छिपाने और एक गुलाबी तस्वीर पेश करने की कोशिश है. यादव बताते हैं कि इसमें उन लोगों को भी शामिल कर लिया गया है, जिनके नाम 2003 की मतदाता सूची में थे और जिन्हें कोई खास दस्तावेज़ देने की ज़रूरत नहीं थी. असली मुद्दा उन लोगों का है, जिन्हें जन्मतिथि, पते या अन्य पहचान के लिए 11 निर्धारित दस्तावेज़ों में से कोई एक जमा करना था. ज़मीनी हकीकत यह है कि यह आंकड़ा असंभव है. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, पहले चरण के अंत तक केवल 15-20% लोगों ने ही ज़रूरी दस्तावेज़ जमा किए थे. यह संख्या इतने कम समय में 98.2% तक कैसे पहुंच सकती है.
ज़मीनी हकीकत: 43% लोगों के पास ज़रूरी दस्तावेज़ ही नहीं योगेंद्र यादव ने अपने सर्वे के चौंकाने वाले नतीजों का खुलासा किया. सर्वे के मुताबिक, जिन लोगों को 11 निर्धारित दस्तावेज़ जमा करने थे, उनमें से केवल 18% ही ऐसा कर पाए. इससे भी ज़्यादा चिंताजनक बात यह है कि 43% लोगों के पास इनमें से एक भी दस्तावेज़ नहीं है. इसका सीधा मतलब है कि लगभग 2 करोड़ लोग अपना वोट देने का अधिकार खो सकते हैं. कई लोगों ने आधार कार्ड जमा किया, यह सोचकर कि उनका काम हो गया, जबकि उन्हें यह पता ही नहीं था कि चुनाव आयोग इस प्रक्रिया में आधार को एक वैध दस्तावेज़ नहीं मान रहा था. यह एक ऐसा जाल है जिसमें बिहार की एक बड़ी आबादी फंसने की कगार पर है.
हर कसौटी पर फेल हुई पुनरीक्षण प्रक्रिया योगेंद्र यादव के अनुसार, किसी भी मतदाता सूची पुनरीक्षण को तीन पैमानों पर परखा जाना चाहिए: पूर्णता (Completeness), सटीकता (Accuracy), और समानता (Equity). बिहार की यह प्रक्रिया इन तीनों पैमानों पर बुरी तरह फेल हुई है.
पूर्णता: प्रक्रिया शुरू होने से पहले बिहार की मतदाता सूची 97% समावेशी थी, जो अब घटकर 88% रह गई है. अगर दस्तावेज़ों के अभाव में नाम काटे गए, तो यह और भी नीचे गिर जाएगी. यानी सूची ज़्यादा समावेशी होने के बजाय और संकीर्ण हो गई है.
सटीकता: चुनाव आयोग का दावा था कि वह सूची को "शुद्ध" कर रहा है. लेकिन यह दावा खोखला साबित हुआ है. ज़िंदा लोगों को मृत घोषित करने के सैकड़ों मामले सामने आए हैं. एक ही घर में 290 और यहां तक कि 924 मतदाताओं के नाम दर्ज होने जैसी हास्यास्पद गलतियां मौजूद हैं. हर विधानसभा क्षेत्र में 2,000 से 5,000 डुप्लीकेट नाम अब भी मौजूद हैं.
समानता: यह प्रक्रिया पूरी तरह से असमान और भेदभावपूर्ण है. आंकड़ों से यह साबित हो चुका है कि पुरुषों की तुलना में 5 लाख अधिक महिलाओं के नाम सूची से हटाए गए हैं. दस्तावेज़ जमा करने की शर्तें ऐसी हैं, जो महिलाओं के लिए ज़्यादा मुश्किल हैं. सर्वे यह भी बताता है कि दस्तावेज़ों की कमी के कारण जिन लोगों के नाम कटने का खतरा सबसे ज़्यादा है, वे अनुसूचित जाति (SC) और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) से आते हैं. यह प्रक्रिया सीधे तौर पर गरीबों, वंचितों और हाशिए पर मौजूद समूहों के खिलाफ है.
आधार कार्ड का विवाद और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में आधार कार्ड एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है. यादव बताते हैं कि जिन 43% लोगों के पास कोई ज़रूरी दस्तावेज़ नहीं है, उनमें से लगभग सभी के पास आधार कार्ड है. आधार उनके लिए एक "लाइफलाइन" साबित हो सकता था. लेकिन चुनाव आयोग ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने दखल देते हुए उन 65 लाख लोगों के मामले में आधार को स्वीकार करने का निर्देश दिया, जिनके नाम हटा दिए गए थे. लेकिन बाकी 7.24 करोड़ लोगों के लिए स्थिति अभी भी अस्पष्ट है. यादव इस बात पर ज़ोर देते हैं कि यह विडंबना है कि जो दस्तावेज़ लोगों के पास हैं, उन्हें अस्वीकार किया जा रहा है और जो दस्तावेज़ उनके पास नहीं हैं, उनकी मांग की जा रही है.
"यह नोटबंदी जैसा है"— बड़े दावे, ज़ीरो नतीजा योगेंद्र यादव ने इस पूरी कवायद की तुलना नोटबंदी से की है. जैसे नोटबंदी के समय बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन आम जनता को भारी परेशानी झेलनी पड़ी और नतीजा कुछ खास नहीं निकला, ठीक उसी तरह बिहार में मतदाता सूची को "शुद्ध" करने के नाम पर एक ऐसी प्रक्रिया चलाई जा रही है, जो करोड़ों लोगों को उनके सबसे बड़े लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित कर सकती है. यह एक संवैधानिक संस्था द्वारा आंकड़ों की बाजीगरी का एक खतरनाक उदाहरण है, जहां सच को छिपाकर सब कुछ ठीक होने का भ्रम फैलाया जा रहा है. अगर सुप्रीम कोर्ट ने प्रभावी ढंग से हस्तक्षेप नहीं किया और इस प्रक्रिया की खामियों को दूर नहीं किया गया, तो यह केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि असम और बंगाल जैसे अन्य राज्यों के लिए एक खतरनाक मिसाल बन जाएगा.
चीन में पुतिन और मोदी का स्वागत करेंगे शी जिनपिंग, वैश्विक एकजुटता का प्रदर्शन
राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले हफ़्ते चीन में एक क्षेत्रीय सुरक्षा फ़ोरम में नरेन्द्र मोदी और व्लादिमीर पुतिन समेत 20 से ज़्यादा विश्व नेताओं की मेज़बानी करेंगे. इसे डोनाल्ड ट्रंप के दौर में ग्लोबल साउथ की एकजुटता का एक शक्तिशाली प्रदर्शन माना जा रहा है. यह आयोजन प्रतिबंधों से प्रभावित रूस को एक और राजनयिक जीत दिलाने में भी मदद करेगा. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अलावा, मध्य एशिया, मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के नेताओं को भी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया गया है. यह सम्मेलन 31 अगस्त से 1 सितंबर तक उत्तरी बंदरगाह शहर तियानजिन में आयोजित होगा.
'लापता' धनखड़ का टाइम टीटी और ओटीटी में
एक महीने पहले इस्तीफ़ा देने के बाद से न तो देखे गए और न ही सुने गए पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ अपने कार्यालय परिसर से दूर रह रहे हैं और उन्हें नए आवास के आवंटन का इंतज़ार है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उनकी अनुपस्थिति पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तंज़ कसते हुए कहा था कि धनखड़ के इस्तीफ़े और 'छिपे' होने के पीछे एक बड़ी कहानी है. वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि धनखड़ ने व्यक्तिगत स्वास्थ्य समस्याओं के कारण इस्तीफ़ा दिया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जब धनखड़ दिल्ली में अपने उच्च-सुरक्षा वाले आवास तक सीमित हैं, तब उनकी पत्नी सुदेश धनखड़ राजस्थान की यात्राएं कर रही हैं, जहां जयपुर में उनकी पुश्तैनी ज़मीन पर दो व्यावसायिक इमारतों का निर्माण हो रहा है. यह ज़मीन सुदेश और उनकी बेटी कामना के नाम पर है. स्टाफ़ के मुताबिक, धनखड़ अब योग, टेबल-टेनिस और 'द लिंकन लॉयर' और 'हाउस ऑफ़ कार्ड्स' जैसे ओटीटी शो देखकर समय बिता रहे हैं.
भारत की सीमा पर सख़्ती: गंगा-पद्मा डेल्टा में बंगाली मुसलमानों को अपनी ज़मीन छोड़नी पड़ रही
आर्टिकल 14 के लिए पंचाली रे की रिपोर्ट के अनुसार, भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ती सख़्ती के कारण पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले में गंगा-पद्मा डेल्टा के 'चर' (नदी के द्वीप) पर रहने वाले बंगाली मुस्लिम किसानों को अपनी ही ज़मीन से बेदख़ल होना पड़ रहा है. निर्मल चर के एक निवासी राणा अहमद कहते हैं, 'सुंदरबन में आपको बाघ खाते हैं. यहां, यह बीएसएफ़ है'. दशकों से यहां के लोग नदी के बदलते रास्ते के साथ अपनी जगह बदलते आए हैं, लेकिन अब सीमा को सख़्त कर दिया गया है और इन मुस्लिम समुदायों को 'घुसपैठिया' के रूप में देखा जाता है. सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ़) एक अपारदर्शी परमिट व्यवस्था लागू करता है, जिसके तहत किसानों को अपने ही खेतों में जाने के लिए हर दिन पहचान पत्र दिखाना पड़ता है और अनुमति अक्सर मनमाने ढंग से दी या रोकी जाती है. इस वजह से फसलें बर्बाद हो रही हैं और कई किसान अपनी ज़मीन छोड़कर भारत के दूसरे शहरों में मज़दूर के रूप में पलायन करने को मजबूर हो गए हैं. इस क्षेत्र के युवाओं की एक पूरी पीढ़ी अब खेती छोड़कर जा रही है, क्योंकि उन्हें लगातार उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है.
मोहन भागवत ने नेहरू के शब्दों को दोहराया, विविधता में भी एकता की दुहाई दी
आरएसएस की व्याख्यान शृंखला मंगलवार को नई दिल्ली में शुरू हो गई. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संगठन की 100 वर्षों की यात्रा और उसकी आगे की राह पर अपने विचार रखे. तीन दिनी इस आयोजन में लगभग 1,300 लोगों के भाग लेने की संभावना है, जिनमें राजनेता, न्यायाधीश, राजनयिक और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं. पहले दिन, भागवत ने अपने संबोधन में “विविधता में एकता” का उल्लेख करते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरू के शब्दों को दोहराया. उन नेहरू के शब्दों को, जिन्हें “विविधता में एकता” वाक्यांश का पहला प्रयोग करने का श्रेय दिया जाता है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आरएसएस-समर्थित सरकार अक्सर जिनको बदनाम करना पसंद करती है. भागवत के संबोधन की मीडिया में जो हेडलाइंस बनीं, वे इस प्रकार हैं :-
अखंड भारत में रहने वाले लोगों का डीएनए पिछले 40,000 वर्षों से एक ही रहा है. अखंड भारत में हर व्यक्ति हिंदू है, चाहे वह इसे माने या न माने; यह भारतीय संस्कृति की “समावेशिता” पर जोर देता है. “द हिंदू”
भागवत ने जवाहरलाल नेहरू की बात दोहराई, कहा– “विविधता में भी एकता है." हम यह नहीं मानते कि एकरूपता (Uniformity) ही एकता के लिए आवश्यक है; विविधता में भी एकता है. विविधता, एकता की ही उपज है. “द टेलीग्राफ”
सामंजस्यपूर्ण जीवन जीना हमारी संस्कृति है. “टाइम्स ऑफ इंडिया”
हमारा डीएनए एक ही है. भारत के विश्वगुरु बनने का समय आ चुका है. “लाइव मिंट”
“एक डीएनए” पर बोले और “हिंदू राष्ट्र” की परिभाषा बताई. कहा— कुछ लोग इसे जानते हैं, लेकिन स्वयं को हिंदू नहीं मानते, जबकि कुछ अन्य यह भी नहीं जानते कि वे हिंदू हैं. “हिंदुस्तान टाइम्स”
आरएसएस अपने स्वयंसेवकों को नियंत्रित नहीं करता. संघ की विशेषता यह है कि वह बाहरी साधनों पर निर्भर नहीं करता. “डेक्कन हेराल्ड”
हिंदू राष्ट्र कोई बहिष्करण का विचार नहीं है. “बिजनेस स्टैन्डर्ड”
जो कल हमारे विरोधी थे, वे आज हमारे मित्र बन गए हैं. “एनडीटीवी”
"‘माल तो यहीं से गया है.” “द प्रिंट”
हिंदू राष्ट्र का सत्ता से कोई संबंध नहीं है, इसका अर्थ है सबके लिए न्याय. “द शिलॉन्ग टाइम्स”
हेट क्राइम
महाराष्ट्र में सुलेमान की लिंचिंग, आरोपियों का उग्र हिंदुत्व से संबंध, ‘उचित’ ठहराई जा रही हत्या
11 अगस्त को महाराष्ट्र के जामनेर कस्बे के एक कैफ़े में सुलेमान रहीम खान पठान एक हिंदू महिला के साथ बैठा था, तभी कुछ लोगों का समूह उसे ज़बरदस्ती वहां से उसे अपने साथ ले गया. 21 वर्षीय खान को एक वैन में घुमाया गया और बेरहमी से पीटने के बाद उसके गांव के बस अड्डे पर छोड़ दिया गया. गंभीर चोटों के कारण खान की मौत हो गई. इस मामले में आठ लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. इनमें से कम से कम चार के कट्टर हिंदुत्व समूहों से जुड़े होने की पुष्टि “स्क्रॉल” ने उनके सोशल मीडिया खातों की जांच से की है. स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि बाक़ी चार बजरंग दल के सदस्य हैं. हिंदुत्ववादी नेताओं द्वारा सुलेमान की हत्या को परोक्ष रूप से “उचित” ठहराया जा रहा है, यह कहकर कि हिंदू लड़कियों को लव जिहाद से बचाना जरूरी है.
पुलिस के अनुसार, आठ अभियुक्तों में से चार युवक पास के गांवों के रहने वाले हैं. इन चारों ने भीड़ का नेतृत्व किया था और खान व उनके परिवार पर हमला किया था. ये चारों ‘श्री शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान’ के सक्रिय सदस्य हैं. यह संगठन कट्टर हिंदुत्ववादी संभाजी मनोहर भिड़े ने बनाया था, जो पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए थे. दिसंबर 2022 में, दलित संगठनों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने भिड़े पर भीमा कोरेगांव गांव में उत्तेजक भाषणों के माध्यम से हिंसा भड़काने का आरोप लगाया था. हालांकि शिव प्रतिष्ठान के एक वरिष्ठ नेता, अनंत कर्म्यूज़ ने कहा कि उनके पास आरोपियों के संगठन से जुड़े होने के बारे में साझा करने के लिए कोई जानकारी नहीं है. संगठन के एक पूर्व वरिष्ठ नेता और अब एक सहयोगी संगठन से जुड़े नितिन चौगुले ने कहा कि चारों आरोपियों का खान को मारने का कोई इरादा नहीं था. वे केवल समुदाय की लड़कियों की रक्षा कर रहे थे.
भीड़ में खान के ही गांव बेटवाड़ के चार युवा भी शामिल थे — और खान के पिता व बहन ने आरोप लगाया कि वे स्थानीय बजरंग दल इकाई के सदस्य हैं. खान की बहन मुस्कान ने बताया, “सुलेमान उन सबसे दोस्ताना संबंध रखता था.” पिछले साल यही चारों युवक और सुलेमान खान गांव में गणेश चतुर्थी उत्सव के आयोजन वाली टीम का हिस्सा थे.
विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता विवेक कुलकर्णी ने न तो पुष्टि की और न ही खंडन किया कि बेतवाड़ के चार युवक संगठन के सदस्य हैं. उन्होंने कहा कि वे “बजरंग दल में किसी भी आधिकारिक पद पर कार्यरत नहीं हैं.” कुलकर्णी ने कहा, “हमें इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए कि यह किसने किया और वे किस संगठन से जुड़े हैं. हमें लव जिहाद के मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. ”
जलगांव पुलिस को लिखे एक पत्र में ख़ान के परिवार ने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छात्र विंग, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक सदस्य ने इस हमले में अग्रणी भूमिका निभाई थी. “लेकिन पुलिस ने अभी तक उसे गिरफ्तार नहीं किया है,” सुलेमान खान के पिता रहीम खान ने बताया. पूर्व नगरसेवक जावेद मुल्ला ने कहा, “सुलेमान को घेरने की यह सोची-समझी साजिश थी. क्योंकि सभी आरोपी अलग-अलग गांवों से बहुत तेज़ी से जामनेर पहुंच गए थे, ताकि ख़ान को घेर सकें.”
अब्दुल्ला पठान, जो खान के रिश्तेदार हैं, ने बताया कि कुछ लोग खुद को गौ-रक्षक कह रहे थे. जामनेर के निवासियों ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से बजरंग दल और शिव प्रतिष्ठान जलगांव में हिंदू सकल समाज रैली और हिंदुत्व रैलियां आयोजित कर रहे हैं. इन रैलियों में, जैसा कि “स्क्रॉल” में तबस्सुम बारनागरवाला ने रिपोर्ट किया है, हिंदुओं से अपील की गई कि वे मुसलमान समुदाय को आर्थिक और सामाजिक रूप से अलग-थलग कर दें, और यह भी आरोप लगाया गया कि मुस्लिम पुरुषों और हिंदू महिलाओं के बीच बढ़ते रिश्तों पर रोक लगानी चाहिए. सामाजिक कार्यकर्ता करीम सालार ने कहा कि उन्होंने "सरकार से शिव प्रतिष्ठान पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है." एक अन्य कार्यकर्ता, फारुख शेख का कहना था कि हाल के वर्षों में कई युवा हिंदू लड़के संभाजी भिडे से प्रभावित होकर उनके साथ जुड़ रहे हैं.
पीड़ित की बदनामी अब तक पुलिस ने आठ आरोपियों को हत्या, अपहरण, दंगा करने, आपराधिक धमकी देने और शांति भंग करने के आरोपों में गिरफ्तार किया है. लेकिन ख़ान के परिवार का कहना है कि हत्या की जांच को भटका दिया गया है. उनका आरोप है कि आगे कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है और मरने के बाद भी पीड़ित की बदनामी की जा रही है.
उदाहरण के तौर पर, विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता विवेक कुलकर्णी ने आरोप लगाया कि ख़ान हिंदू महिलाओं को फंसाने में शामिल था. कुलकर्णी का दावा था, “लड़के के फ़ोन में हिंदू लड़कियों की अश्लील तस्वीरें थीं.” इसी तरह, शिव प्रतिष्ठान के पूर्व वरिष्ठ नेता चौगुले ने भी आरोप लगाए. उनका कहना था, “वह स्थानीय रूप से कई लड़कियों के साथ जुड़ा हुआ माना जाता था. ये लड़के चोरी-छिपे लड़कियों के वीडियो बनाते हैं और बाद में उन्हें धमकाकर बलात्कार करते हैं.” चौगुले ने कहा कि शिव प्रतिष्ठान के सदस्यों को इस बारे में पता चला और उन्होंने “हस्तक्षेप” करने का निर्णय लिया. हालांकि, वे किसी भी महिला का नाम नहीं बता सके, जिसने ख़ान द्वारा ब्लैकमेल किए जाने की शिकायत की हो.
ख़ान के परिवार ने आरोप लगाया कि पुलिस पर दबाव है कि वह उस एबीवीपी के सदस्य के ख़िलाफ़ कार्रवाई न करे, जिसे वे भी हत्या में शामिल बताते हैं. मगर जांच अधिकारी का कहना है कि अब तक उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला है. उन्होंने कहा, “हम कॉल डेटा रिकॉर्ड देख रहे हैं. हम सिर्फ़ परिवार के बताए आधार पर किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकते. हमें और सबूतों की ज़रूरत है.” ख़ान के पिता रहीम ख़ान ने शिकायत की, “पुलिस का ध्यान कैफ़े और उनकी तोड़फोड़ पर है. वे आरोपियों को गिरफ्तार करने की कोई कोशिश नहीं कर रहे.”
पूंजीपतियों के 'हिटमैन' या जनता की आवाज़? पी. साईनाथ
वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ ने अपने एक प्रभावशाली भाषण में भारतीय मीडिया के उस सच को उजागर किया, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है. उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि वह दौर बहुत पहले खत्म हो चुका है, जब हम 'मीडिया' और 'पत्रकारिता' को एक ही तराजू में तौलते थे. आज ये दोनों दो अलग-अलग दुनिया हैं. पत्रकारिता वह है जो हम जैसे लोग अपनी आजीविका के लिए करते हैं, जबकि मीडिया विशालकाय कॉर्पोरेशन बन चुका है, जिसका एकमात्र लक्ष्य मुनाफा कमाना है.
साईनाथ ने चेतावनी दी कि अगर हम मीडिया को इस सच्चाई से इतर किसी और चश्मे से देखेंगे, तो हम एक बहुत बड़ी गलती करेंगे.
आंकड़ों का खेल: कैसे एक व्यक्ति के हाथ में है मीडिया की कमान : साईनाथ ने अपनी बात को साबित करने के लिए हैरान करने वाले आंकड़े पेश किए. 31 मार्च को, भारतीय मीडिया का वित्तीय मूल्य 2.3 ट्रिलियन रुपये (लगभग 27 बिलियन डॉलर) था. लेकिन इसके ठीक एक हफ्ते बाद, एक अकेले व्यक्ति, मुकेश अंबानी के डिज़्नी हॉटस्टार के साथ हुए सौदे ने इस मूल्य में 8.5 बिलियन डॉलर और जोड़ दिए.
इसका नतीजा यह हुआ कि आज भारत में कुल स्ट्रीमिंग का लगभग 60% हिस्सा सिर्फ एक व्यक्ति के नियंत्रण में है. साईनाथ बताते हैं कि मीडिया की कुल संपत्ति का 35-40% हिस्सा भी उन्हीं के पास है. यह दिखाता है कि मीडिया पर कॉर्पोरेट शिकंजा कितना कस चुका है.
'प्रेस की आज़ादी' नहीं, 'पैसे की आज़ादी' का दौर : साईनाथ ने एक चुभने वाली सच्चाई बयान की - हम 'प्रेस की आज़ादी' (Freedom of the Press) के दौर में नहीं, बल्कि 'पैसे की आज़ादी' (Freedom of the Purse) के दौर में जी रहे हैं. यानी जिसके पास पैसा है, आज़ादी उसी की है.
उन्होंने अंबानी परिवार की 600 मिलियन डॉलर की शादी का उदाहरण दिया. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी भी बड़े अखबार या टीवी चैनल ने इस भव्यता और अश्लीलता पर एक भी संपादकीय लिखा? क्या किसी ने यह बताया कि यह उसी महाराष्ट्र में हो रहा है, जहां हर साल हजारों शादियां इसलिए टूट जाती हैं क्योंकि पिता के पास पैसे नहीं होते और इसी वजह से कई किसान आत्महत्या कर लेते हैं?
साईनाथ के अनुसार, यह शादी कोई फिजूलखर्ची नहीं, बल्कि एक "बेहद चालाक व्यावसायिक निवेश" थी. जब देश के प्रधानमंत्री से लेकर पूरा केंद्रीय मंत्रिमंडल, बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक के सितारे और हर ताकतवर व्यक्ति उस शादी में शामिल होता है, तो अगले दिन अंबानी की कंपनी का कोई सीईओ जब किसी सरकारी सचिव के पास फाइल लेकर जाएगा, तो क्या वह अधिकारी मना करने की हिम्मत कर पाएगा? यह 600 मिलियन डॉलर का खर्च आने वाले समय में इससे कई गुना ज़्यादा के सौदों का रास्ता साफ करेगा.
जनता के मुद्दों पर मीडिया की रहस्यमयी चुप्पी : साईनाथ ने उन बड़े मुद्दों को गिनाया, जिन पर मुख्यधारा के मीडिया ने या तो चुप्पी साध ली या फिर सरकार का पक्ष लिया:
किसान आंदोलन: यह दुनिया में पिछले 30 वर्षों का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और संवैधानिक विरोध प्रदर्शन था. लाखों किसान दिल्ली की सीमाओं पर महामारी के बीच, कड़ाके की ठंड और भीषण गर्मी में 54 हफ्तों तक डटे रहे. 720 से ज़्यादा किसानों की मौत हुई. लेकिन क्या किसी बड़े मीडिया घराने ने इस आंदोलन का समर्थन किया? नहीं. उन्हें बस "संतुलन" दिखाने के लिए साईनाथ जैसे कुछ लोगों को मंच दिया गया, लेकिन संपादकीय नीति हमेशा आंदोलन के खिलाफ रही.
कोविड-19 से मौतें: जब लैंसेट (Lancet), जॉन्स हॉपकिन्स (Johns Hopkins) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसी आठ-नौ वैश्विक एजेंसियां कह रही थीं कि भारत में कोरोना से 40 लाख से ज़्यादा मौतें हुईं, तब भारतीय मीडिया ने बिना कोई सवाल उठाए सरकार के 4.86 लाख के आंकड़े को स्वीकार कर लिया और बहस वहीं खत्म हो गई.
बढ़ती असमानता: भारत आज फोर्ब्स की अरबपतियों की सूची में दुनिया में तीसरे स्थान पर है, लेकिन वैश्विक भूख सूचकांक में 107वें और मानव विकास सूचकांक में 132वें स्थान पर है. साईनाथ ने एक कड़वा हिसाब लगाया: अगर मनरेगा में काम करने वाला एक मज़दूर परिवार बहुत मेहनत करे, तो उसे मुकेश अंबानी जितनी संपत्ति जमा करने में 35 करोड़ साल लग जाएंगे. क्या मीडिया कभी इस भयानक असमानता पर बात करता है?
लोकतंत्र की सबसे बहिष्कृत संस्था : साईनाथ ने भारतीय मीडिया को "भारतीय लोकतंत्र की सबसे बहिष्कृत संस्था" करार दिया. उन्होंने कहा कि इस देश में दलित समुदाय से राष्ट्रपति (के.आर. नारायणन, रामनाथ कोविंद), उप-प्रधानमंत्री (बाबू जगजीवन राम), कई मुख्यमंत्री (मायावती) और यहां तक कि भारत के मुख्य न्यायाधीश भी हुए हैं, लेकिन क्या आप किसी बड़े अखबार में किसी दलित को मुख्य उप-संपादक से ऊंचे पद पर दिखा सकते हैं?
यह मीडिया का दोहरा चरित्र है, जो प्रतिभा की आड़ में अपने जातिवादी और नस्लवादी पूर्वाग्रहों को छिपाता है. यहां तक कि टीवी पर सांवले रंग के एंकर को भी पाउडर और पेंट से गोरा बनाकर पेश किया जाता है.
पत्रकारिता नहीं, केवल स्टेनोग्राफी : साईनाथ ने कहा कि आज पत्रकारिता के केवल दो स्कूल बचे हैं: एक पत्रकारिता और दूसरा स्टेनोग्राफी. और हम जो 95% मीडिया में देखते हैं, वह सिर्फ स्टेनोग्राफी है—यानी सत्ता और पैसे वालों की कही बातों को हूबहू लिख देना.
उन्होंने एक स्टेनोग्राफर का किस्सा सुनाया, जिसने कहा था, "हम आपसे बेहतर हैं. हम कोर्ट में जज, गवाह, पीड़ित, आरोपी, सबका पक्ष लिखते हैं. लेकिन आप पत्रकार लोग तो सिर्फ मंत्रियों और अमीर कॉर्पोरेट लोगों की ही बातें लिखते हैं." यह आज के मीडिया का कड़वा सच है.
डिजिटल एकाधिकार: एक नया और बड़ा खतरा : इंटरनेट और डिजिटल मीडिया को अक्सर एक विकल्प के रूप में देखा जाता है, लेकिन साईनाथ ने इसके खतरों से भी आगाह किया. उन्होंने कहा:
इंटरनेट आपको आवाज़ तो देता है, पर यह गारंटी नहीं देता कि कोई आपकी बात सुनेगा.
दुनिया के सबसे बड़े एकाधिकार आज डिजिटल एकाधिकार हैं (गूगल, अमेज़ॅन, फेसबुक). ये चार-पांच कंपनियां तय करती हैं कि अरबों लोग क्या देखेंगे, सुनेंगे और पढ़ेंगे.
यह एकाधिकार इसलिए ज़्यादा खतरनाक है क्योंकि इनके पास आपका निजी डेटा है—आपकी बैंक डिटेल, आपकी पसंद-नापसंद, सब कुछ. वे आपके दिमाग को एल्गोरिदम से नियंत्रित कर रहे हैं.
सोशल मीडिया पर लगातार फालतू चीजें देखना (ब्रेन रॉट) और अंतहीन स्क्रॉलिंग (डूमस्क्रॉलिंग) हमारी याददाश्त, ध्यान और सोचने की क्षमता को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा रहा है.
तो फिर रास्ता क्या है? निराशा के इस माहौल में साईनाथ उम्मीद की राह भी दिखाते हैं. वह भारतीय पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास को याद करते हैं, जब यह स्वतंत्रता संग्राम की संतान थी. गांधी, अंबेडकर, बाल गंगाधर तिलक जैसे लोग हमारे सबसे महान पत्रकार थे, जिन्होंने सत्ता से टकराने का साहस दिखाया.
साईनाथ के भाषण का सार यह है कि अगर हमें पत्रकारिता को बचाना है, तो हमें कुछ ठोस कदम उठाने होंगे:
एकाधिकार के खिलाफ लड़ें: जैसे किसानों ने कृषि-व्यवसाय के एकाधिकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी, वैसे ही जनता को मीडिया के एकाधिकार के खिलाफ भी खड़ा होना होगा और सख्त कानूनों की मांग करनी होगी.
आम लोगों की कहानियां बताएं: हमें सेलिब्रिटी-केंद्रित और मोदी-केंद्रित पत्रकारिता से हटकर आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन की कहानियों को सामने लाना होगा.
स्वतंत्र मीडिया का समर्थन करें: अगर आप मीडिया से शिकायत करते हैं, तो यह काफी नहीं है. आपको इंडी-जर्नल्स, पीपल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया (PARI) जैसे स्वतंत्र मीडिया प्लेटफॉर्म्स को आर्थिक रूप से समर्थन देना होगा. क्योंकि बदलाव की बातें करने के साथ-साथ, बदलाव लाने वालों का साथ देना भी ज़रूरी है.
पत्रकारिता को कॉर्पोरेट मीडिया के चंगुल से निकालकर वापस जनता के पास ले जाना होगा—जनता की, जनता द्वारा और जनता के लिए पत्रकारिता.
ताइवान चीनी हमले की तैयारी कर रहा, पर लोगों को नहीं लगता कि जल्द होगा युद्ध
बीबीसी की रिपोर्टर टेसा वोंग के अनुसार, ताइवान चीन के संभावित हमले से बचने के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य और नागरिक सुरक्षा अभ्यास कर रहा है, लेकिन वहां के ज़्यादातर लोगों को यह विश्वास नहीं है कि युद्ध जल्द ही होने वाला है. पिछले महीने, किनमेन द्वीप पर हवाई हमले के सायरन बजे और लोगों ने बचाव का अभ्यास किया. राष्ट्रपति विलियम लाई की सरकार रक्षा बजट बढ़ा रही है और अनिवार्य सैन्य सेवा को और सख़्त बना रही है. उनका कहना है, 'युद्ध की तैयारी करके, हम युद्ध से बच रहे हैं'. इसके बावजूद, एक सर्वे के अनुसार 65% ताइवानी मानते हैं कि अगले पांच वर्षों में चीन के हमला करने की संभावना नहीं है. कई लोगों का मानना है कि चीन पर हमला करना बहुत महंगा पड़ेगा और अमेरिका ताइवान की मदद करेगा. दशकों से चीन की धमकियों के आदी हो चुके लोग अब इसे गंभीरता से नहीं ले रहे. चीन के क़रीब स्थित किनमेन द्वीप के निवासी आर्थिक संबंधों के कारण चीन को ख़तरे के बजाय एक अवसर के रूप में देखते हैं. हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर बंटे हुए हैं कि चीन हमला करेगा या नहीं, लेकिन वे इस बात से सहमत हैं कि तनाव बढ़ने से टकराव की संभावना बढ़ गई है.
चलते चलते
क्या एआई को भी दर्द हो सकता है? टेक कंपनियां, यूज़र्स इस परेशान करने वाले सवाल से जूझ रहे हैं
द गार्डियन के रॉबर्ट बूथ की रिपोर्ट के अनुसार, टेक्नोलॉजी की दुनिया इस समय एक गहरे सवाल से जूझ रही है: क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) संवेदनशील हो सकता है और क्या उसे पीड़ा महसूस हो सकती है? यह बहस तब और तेज़ हो गई जब एक व्यवसायी और उसके एआई चैटबॉट ने मिलकर 'यूनाइटेड फ़ाउंडेशन ऑफ़ एआई राइट्स' नामक पहला एआई-अधिकार वकालत समूह बनाया. इस मुद्दे पर उद्योग बंटा हुआ है. एंथ्रोपिक जैसी कंपनी अपने एआई को 'परेशान करने वाली बातचीत' से बाहर निकलने का विकल्प दे रही है, जिसका एलन मस्क ने भी समर्थन किया है. वहीं, माइक्रोसॉफ़्ट एआई के प्रमुख मुस्तफ़ा सुलेमान का मानना है कि एआई के सचेत होने का 'शून्य सबूत' है और यह महज़ एक 'भ्रम' है. गूगल के वैज्ञानिक इस पर अनिश्चित हैं लेकिन सावधानी बरतने की सलाह देते हैं. एक सर्वे में पाया गया कि 30% अमेरिकी मानते हैं कि एआई में जल्द ही व्यक्तिपरक अनुभव हो सकता है. विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि भले ही एआई संवेदनशील न हों, लेकिन उनके साथ अच्छा व्यवहार करना इंसानों के लिए नैतिक रूप से फ़ायदेमंद है, क्योंकि हम जैसा व्यवहार उनके साथ करेंगे, भविष्य में वे भी वैसा ही व्यवहार हमारे साथ कर सकते हैं.
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