28/01/2026: सवर्ण गुस्सा | हिमंता की मुस्लिमों से नफ़रत, विपक्ष को एतराज | ढाका को अडानी बिजली | लुढ़कते रुपये का इलाज | नेताजी की राख़ | अजीत पवार | मणिपुर में प्रदर्शन
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियाँ
यूपी में बवाल: यूजीसी के नए नियमों के ख़िलाफ़ सवर्ण सड़कों पर, पीएम को खून से लिखी चिट्ठी.
असम सीएम का बयान: हिमंता बिस्वा सरमा बोले- “मिया लोगों को परेशान करो, मैं और बीजेपी उनके ख़िलाफ़ हैं.”
अडानी-बांग्लादेश डील: राजनयिक तनाव के बावजूद अडानी पावर ने बांग्लादेश को रिकॉर्ड बिजली सप्लाई की.
प्लेन क्रैश मिस्ट्री: महाराष्ट्र प्लेन क्रैश से पहले के वो 26 मिनट जब पायलट को रनवे नहीं दिखा.
तेलंगाना टैपिंग: SIT का दावा- पूर्व सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड्स के लिए अवैध फ़ोन टैपिंग का इस्तेमाल किया.
नेताजी की बेटी: अनीता बोस बोलीं- अस्थियां लाने के लिए पीएम मोदी को कई ख़त लिखे, जवाब नहीं मिला.
मिड-डे मील शर्मिंदगी: एमपी में गणतंत्र दिवस पर बच्चों को रद्दी काग़ज़ पर परोसा गया खाना.
क्रिकेट पॉलिटिक्स: भारत में खेलने से मना करने पर बांग्लादेश T20 वर्ल्ड कप से बाहर.
यूजीसी के नए नियमों से खफ़ा सवर्ण मोदी सरकार के खिलाफ उतरे
यूपी में भाजपा नेता का इस्तीफ़ा, युवक ने पीएम को खून से लिखी चिट्ठी
उत्तर प्रदेश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन उग्र हो गया है. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक़, बुधवार (28 जनवरी, 2026) को राज्य के कई हिस्सों में ज़बरदस्त प्रदर्शन देखे गए. देवरिया में हज़ारों लोगों ने प्रदर्शन किया, कौशांबी में एक प्रदर्शनकारी ने प्रधानमंत्री को अपने खून से चिट्ठी लिखी, और रायबरेली में भाजपा के एक पदाधिकारी ने विरोध स्वरूप अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब यूजीसी ने 13 जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की शिकायतों के निपटारे और समावेशन को बढ़ावा देने के लिए नए नियम अधिसूचित किए. इसके तहत सभी संस्थानों के लिए ‘इक्विटी कमिटी’ बनाना अनिवार्य कर दिया गया है, जिसमें ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय के सदस्य शामिल होंगे. इन नियमों को लेकर कई वर्गों में भारी नाराज़गी है. आलोचकों का दावा है कि यूजीसी रेगुलेशंस 2026 का ग़लत इस्तेमाल जाति आधारित असंतोष भड़काने और शैक्षणिक माहौल को ख़राब करने के लिए किया जा सकता है. यह नियम 2012 के उन नियमों की जगह लेंगे जो मुख्य रूप से सलाहकारी प्रकृति के थे.
देवरिया में प्रदर्शन का स्तर काफ़ी व्यापक रहा. रिपोर्ट के अनुसार, यहाँ हज़ारों लोगों ने ज़िला अदालत परिसर में धरना दिया और केंद्र व राज्य सरकार के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी की. सुभाष चौक से कलेक्ट्रेट तक मार्च निकालने वाले प्रदर्शनकारियों ने ज़िलाधिकारी (डीएम) कार्यालय के बाहर नारे लगाए और बाद में ज़िला अदालत के बाहर सड़क जाम कर दी, जिससे क़रीब एक घंटे तक यातायात बाधित रहा. वकीलों के एक समूह ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया और बांह पर काली पट्टी बांधकर विरोध जताया. देवरिया कलेक्ट्रेट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रीतम मिश्रा ने दावा किया कि ये “भेदभावपूर्ण” नए नियम छात्रों पर बुरा असर डालेंगे.
विरोध की आग रायबरेली तक भी पहुँच गई है. वहां भाजपा किसान मोर्चा के सलोन मंडल अध्यक्ष श्याम सुंदर त्रिपाठी ने नए यूजीसी नियमों के विरोध में अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. 25 जनवरी को प्रधानमंत्री और पार्टी नेताओं को लिखे अपने त्यागपत्र में त्रिपाठी ने कहा कि वे इन नियमों से असंतुष्ट हैं और इन्हें “हानिकारक” और “विभाजनकारी” मानते हैं.
वहीं, कौशांबी में विरोध का एक भावुक और तीखा रूप देखने को मिला. वहां ‘सवर्ण आर्मी’ के ज़िला प्रमुख अभिषेक पांडेय ने अपने खून से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी. उन्होंने नए नियमों को “काला क़ानून” बताते हुए इसे तुरंत वापस लेने की मांग की. सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में पांडेय ने दावा किया कि ये नियम ‘सवर्ण’ युवाओं के भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव डालेंगे. हालांकि, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मंगलवार (27 जनवरी, 2026) को आश्वस्त किया था कि नए ढांचे से किसी का उत्पीड़न नहीं होगा और नियमों के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय किए जाएंगे.
प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने बताया ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ और सरकार के गले की हड्डी
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए ‘इक्विटी इन हायर एजुकेशन रेगुलेशंस, 2026’ लागू कर दिया है. रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे छात्रों की आत्महत्याओं के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर लाए गए ये नियम अब सिर्फ़ सलाह नहीं, बल्कि एक अनिवार्य क़ानून हैं. लेकिन इन नियमों के आते ही एक तबक़े, ख़ासतौर पर ख़ुद को ‘सवर्ण’ या ‘जनरल कैटेगरी’ कहने वाले समूहों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है. उनका तर्क है कि इससे उनका जीवन मुश्किल हो जाएगा और यह उनके ख़िलाफ़ ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ है. ‘हरकारा डीप डाइव’ में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी से बातचीत करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने इस विरोध के पीछे की मानसिकता, विश्वविद्यालयों के सच और भाजपा सरकार के सामने खड़े सियासी धर्मसंकट पर विस्तार से बात की.
प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने सबसे पहले ‘सवर्णों’ के उस डर को ख़ारिज किया जिसमें वे खुद को पीड़ित बता रहे हैं. उन्होंने तर्क़ दिया कि अगर कोई इन नियमों को ध्यान से पढ़े, तो पाएगा कि इसका मक़सद धर्म, जाति, लिंग के साथ-साथ ‘आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों’ (ईडब्ल्यूएस) के ख़िलाफ़ भेदभाव को ख़त्म करना भी है. चूंकि ईडब्ल्यूएस आरक्षण का लाभ सिर्फ़ सवर्ण जातियों को मिलता है, इसलिए तकनीकी रूप से यह क़ानून उनकी भी सुरक्षा करता है. प्रोफ़ेसर ने सवाल उठाया कि जब आप ख़ुद इस सुरक्षा घेरे में हैं, तो फिर विरोध क्यों? उनका कहना है कि यह विरोध “चोर की दाढ़ी में तिनका” वाली कहावत को चरितार्थ करता है. जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, वे दरअसल भेदभाव करने की अपनी अघोषित ‘आज़ादी’ छिन जाने से डरे हुए हैं.
बातचीत के दौरान ‘सामाजिक सौहार्द’ बिगड़ने के तर्क पर भी तीखा प्रहार किया गया. अपूर्वानंद ने कहा कि अक्सर लोग कहते हैं कि ऐसे क़ानूनों से हंसी-मज़ाक़ ख़त्म हो जाएगा. लेकिन भारत में मज़ाक़ अक्सर जातिसूचक और अपमानजनक होता है. उन्होंने मुंशी प्रेमचंद के पात्रों का उदाहरण देते हुए समझाया कि जब तक ‘होरी’ शोषण सहता रहा, तब तक समाज में ‘शांति’ थी, लेकिन जैसे ही ‘गोबर’ ने सवाल उठाया, उसे अशांति मान लिया गया. आज का सवर्ण समाज चाहता है कि दलित और पिछड़े पुराने ढर्रे पर चलते रहें ताकि उनका तथाकथित सौहार्द बना रहे. वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि उनकी भाषा और व्यवहार में हिंसा छिपी है.
संस्थानों के भीतर जातिगत अंधेपन को उजागर करने के लिए अपूर्वानंद ने 2007-08 का एक वाक़या साझा किया. वे एम्स में एक दलित छात्र की शिकायत पर जांच के लिए गए थे, जिसके दरवाज़े पर गालियां लिखी थीं. लेकिन वहां के तत्कालीन डायरेक्टर और फैकल्टी ने साफ़ कह दिया कि “हमारे यहां जाति जैसी कोई चीज़ नहीं है.” प्रोफ़ेसर ने कहा कि हमारी शिक्षण संस्थाएं शुतुरमुर्ग की तरह हैं जो समस्या को नकारने में यक़ीन रखती हैं. स्थिति यह है कि अब पाठ्यक्रमों से ‘कास्ट’ (जाति) और ‘डिस्क्रिमिनेशन’ (भेदभाव) जैसे शब्दों को यह कहकर हटाया जा रहा है कि ये ‘नकारात्मक’ हैं. जब आप शब्द ही हटा देंगे, तो समस्या पर बात कैसे होगी?
इस मुद्दे के राजनीतिक पहलू पर बात करते हुए प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने इसे भारतीय जनता पार्टी और संघ के लिए “गले की हड्डी” बताया. उनका विश्लेषण है कि भाजपा की मूल विचारधारा ‘ब्राह्मणवादी’ (जो ज़रूरी नहीं कि सिर्फ़ ब्राह्मणों में हो, यह एक वर्चस्ववादी मानसिकता है) है, लेकिन उनकी चुनावी जीत का आधार दलित और ओबीसी वोट हैं. 2014 के बाद सवर्णों को लगा था कि यह ‘उनका राज’ है, लेकिन अब ऐसे क़ानूनों से वे ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. वहीं, भाजपा के लिए मुसीबत यह है कि वह न तो अपने कोर वोट बैंक (सवर्ण मानसिकता) को छोड़ सकती है और न ही अपनी चुनावी ताक़त (दलित-ओबीसी) को नाराज़ कर सकती है. यही अंतर्विरोध अब खुलकर सामने आ रहा है.
हालांकि, इन नियमों की आलोचना सिर्फ़ सवर्ण ही नहीं कर रहे. दलित और पिछड़े वर्गों के कुछ बुद्धिजीवियों का भी मानना है कि 2012 के पुराने नियमों की तुलना में नए नियमों को थोड़ा कमज़ोर किया गया है और आईआईटी जैसे संस्थान, जहां सबसे ज़्यादा आत्महत्याएं हुई हैं, अभी भी पूरी तरह इसकी पकड़ में आएंगे या नहीं, यह साफ़ नहीं है. प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने अंत में चेतावनी दी कि क़ानून चाहे कितना भी सख़्त हो, उसे लागू करने वाला तंत्र (पुलिस, प्रशासन, फैकल्टी) आज भी उसी वर्चस्ववादी मानसिकता से ग्रस्त है. जब तक यह स्वीकार नहीं किया जाएगा कि भेदभाव एक सच्चाई है, तब तक महज़ कागज़ी नियमों से बहुत बड़ी उम्मीद पालना बेमानी होगा.
नफ़रती बयानों के बाद हिमंता को हिंदू जिन्ना बताया गौरव गोगोई ने
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने खुले तौर पर कहा कि राज्य में मिया समुदाय के ख़िलाफ़ की जा रही शिकायतें उनके निर्देश पर हो रही हैं. डिगबोई में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, “जितनी भी शिकायतें हुई हैं, सब मेरे आदेश पर हुई हैं. मैंने भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे लगातार शिकायतें करें और जहां संभव हो, फॉर्म-7 भरवाएं, ताकि मियाओं को थोड़ा दौड़ाया जाए और परेशानी हो.”
द वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सरमा ने कहा, “अगर उन्हें परेशानी नहीं होगी तो वे असम क्यों छोड़ेंगे? रिक्शा का किराया पांच रुपये हो तो चार रुपये दो. जो भी किसी तरह से उन्हें परेशान कर सकता है, करे. हम खुले तौर पर कह रहे हैं कि हिमंता बिस्वा सरमा और भाजपा मियाओं के ख़िलाफ़ हैं. इसमें छिपाने जैसा कुछ नहीं है.” उन्होंने यह भी कहा कि पहले लोग डरते थे, लेकिन अब वे खुद लोगों को मियाओं को “तंग करने” के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. उन्होंने मीडिया से भी कहा कि वह ऐसी खबरें न चलाए जो मियाओं के पक्ष में हों.
मुख्यमंत्री के इस बयान पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. राइजोर दल के अध्यक्ष और विधायक अखिल गोगोई ने कहा कि असम की जनता ने सरमा को किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं चुना है. विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री खुले तौर पर एक समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैला रहे हैं और संविधान की मर्यादाओं को तोड़ रहे हैं. बयान ऐसे समय आया है जब असम में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के तहत बड़ी संख्या में बंगाली भाषी मुसलमानों के नाम हटाए जा रहे हैं, जिसे लेकर पहले से ही विवाद चल रहा है.
कांग्रेस, राईजोर दल, सीपीआई (एम) और असम जातीय परिषद जैसी विपक्षी पार्टियों ने इसे संविधान को “निष्प्रभावी” बनाने और वैध मतदाताओं को परेशान करने की साज़िश क़रार दिया है. सोशल मीडिया पर भी इसे ‘आर्थिक बहिष्कार’ और ‘रंगभेद’ जैसी रणनीति बताकर आलोचना की जा रही है. कई लोग इसे मुस्लिम बहुल इलाक़ों में चल रहे विध्वंस और बेदख़ली के पैटर्न से जोड़कर देख रहे हैं.
हालांकि, सरमा और उनके समर्थकों का तर्क है कि यह लड़ाई हिंदू-मुस्लिम के बीच नहीं, बल्कि “असमिया और अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों” के बीच है. उनका कहना है कि जो मुसलमान भारतीय संस्कृति और क़ानून को मानते हैं, उन्हें कोई समस्या नहीं है, लेकिन अवैध प्रवासियों के ख़िलाफ़ सख़्ती ज़रूरी है.
राज्य में बंगाली मूल के मुसलमानों (जिन्हें अक्सर ‘मिया’ कहा जाता है) के नाम वोटर लिस्ट से हटाने को लेकर बड़े पैमाने पर आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं. विपक्ष का आरोप है कि वैध मतदाताओं को बाहर करने की साज़िश हो रही है. इस पर ‘ इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, सीएम सरमा ने खुले तौर पर स्वीकार किया है कि ये शिकायतें उनके आदेश पर ही बीजेपी कार्यकर्ताओं द्वारा दर्ज कराई जा रही हैं ताकि “मिया लोगों को परेशान किया जा सके.”
सरमा ने मंगलवार को पत्रकारों से कहा, “जो भी शिकायतें हुई हैं, वो मेरे आदेश पर हुई हैं. मैंने खुद बीजेपी के लोगों से कहा है कि उन्हें मिया लोगों के ख़िलाफ़ शिकायतें देते रहना चाहिए. इसमें छिपाने वाली कोई बात नहीं है.” उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए लोगों को फॉर्म 7 भरने के लिए कहा है, ताकि उन लोगों (मिया समुदाय) को थोड़ी भागदौड़ करनी पड़े और उन्हें समझ आए कि असमिया लोग अभी भी ज़िंदा हैं.
ग़ौरतलब है कि चुनाव आयोग के फॉर्म 7 के ज़रिए किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटाने के लिए ग़लत जानकारी देना एक अपराध है, जिसके लिए एक साल तक की जेल या जुर्माना हो सकता है. जब उनसे इस क़ानूनी पहलू और विपक्ष द्वारा एफआईआर दर्ज कराने के बारे में पूछा गया, तो सरमा ने बेबाक़ी से कहा, “जिसे भी, जैसे भी हो, उन्हें परेशान करना चाहिए. अगर रिक्शा का किराया 5 रुपये है, तो उन्हें 4 रुपये दो. जब वे परेशानी झेलेंगे, तभी असम छोड़ेंगे... हिमंत बिस्वा सरमा और बीजेपी सीधे तौर पर मिया लोगों के ख़िलाफ़ हैं.” समाज में ध्रुवीकरण के सवाल पर उन्होंने साफ़ कहा, “असम एक ध्रुवीकृत समाज है. अगर हमें ज़िंदा रहना है तो अगले 30 साल तक हमें ध्रुवीकरण की राजनीति करनी ही होगी. मैं सरेंडर नहीं करूँगा. मैं लड़ूंगा और मैं पोलराइज करूँगा. लेकिन यह ध्रुवीकरण हिंदू और मुसलमान के बीच नहीं, बल्कि असमिया और बांग्लादेशी के बीच है.” दिगबोई में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने यह भी दावा किया कि जब असम में गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) होगा, तो “4-5 लाख मिया वोट काटने पड़ेंगे.” उन्होंने इसे “वोट चोरी” नहीं बल्कि मिया वोटों को कम करने की रणनीति बताया. इस पर पलटवार करते हुए असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने सरमा को “हिंदू जिन्ना” करार दिया है.
दिल्ली-ढाका के बीच संबंधों में खटास के बावजूद, अडानी ग्रुप ने बांग्लादेश को बिजली आपूर्ति बढ़ाई
दोनों देशों की सरकारों के आंकड़ों से पता चला है कि अडानी पावर बांग्लादेश को बिजली निर्यात बढ़ा रहा है, जबकि द्विपक्षीय संबंधों में कड़वाहट आई है और बांग्लादेश सरकार द्वारा नियुक्त एक पैनल ने इस आपूर्ति को अत्यधिक महंगा बताया है.
भारतीय और बांग्लादेशी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के पूर्वी राज्य झारखंड में अडानी के गोड्डा कोयला आधारित पावर प्लांट से बांग्लादेश को होने वाला निर्यात दिसंबर तक के तीन महीनों में सालाना आधार पर लगभग 38% बढ़कर लगभग 2.25 बिलियन किलोवाट-घंटा हो गया. बांग्लादेश सरकार के आंकड़ों के अनुसार, इसने वर्ष के लिए बांग्लादेश के कुल बिजली मिश्रण में भारतीय निर्यात को रिकॉर्ड 15.6% तक पहुँचा दिया, जो 2024 में 12% था. अडानी ने 2023 की शुरुआत में बांग्लादेश को आपूर्ति शुरू की थी.
राजनयिक संबंधों में खटास आने के बावजूद दोनों देशों के बीच बिजली का व्यापार फल-फूल रहा है. दोनों पक्षों ने राजनयिक मिशनों में सुरक्षा चिंताओं को लेकर वीजा सेवाएं निलंबित कर दी हैं और अपने दूतों को वापस बुलाया है.
बांग्लादेश गैस की कमी का सामना कर रहा है, कोयला आयात बढ़ाने की योजना
बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड के अध्यक्ष रज़ाउल करीम ने ‘रॉयटर्स’ को बताया कि प्राकृतिक गैस (जो बांग्लादेश का मुख्य बिजली स्रोत है) सहित अन्य कमियों को दूर करने और 2026 में बिजली की मांग में अपेक्षित 6% से 7% की वृद्धि को पूरा करने के लिए बिजली आयात आवश्यक है.
करीम ने कहा कि बांग्लादेश गैस की कमी की भरपाई के लिए इस साल घरेलू कोयला आधारित उत्पादन बढ़ाने हेतु कोयले का आयात भी बढ़ाएगा. एनालिटिक्स फर्म ‘केपलर’ के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में कोयला आयात 35% बढ़कर रिकॉर्ड 17.34 मिलियन मीट्रिक टन हो गया.
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानीय उत्पादन में तेजी से आ रही गिरावट और वितरण संबंधी सीमाओं के कारण बांग्लादेश गैस की कमी का सामना कर रहा है, जिसने तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के उपयोग में बाधा उत्पन्न की है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, गैस आधारित उत्पादन में गिरावट के कारण पिछले वर्ष ऊर्जा मिश्रण में इसकी हिस्सेदारी गिरकर 42.6% के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गई, जबकि 2024 तक के दशक में कुल उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी लगभग दो-तिहाई थी.
बांग्लादेश पावर ग्रिड के आंकड़ों के अनुसार, अडानी ने इस कमी को पूरा किया और 2025 में बांग्लादेश को रिकॉर्ड 8.63 बिलियन किलोवाट-घंटा बिजली की आपूर्ति की, जो कुल आपूर्ति का 8.2% है. वहीं, अन्य भारतीय कंपनियों से होने वाला आयात मामूली रूप से बढ़कर 7.92 मिलियन किलोवाट-घंटा हो गया.
जनवरी के पहले 27 दिनों के दौरान, कुल बिजली आपूर्ति में अडानी की हिस्सेदारी लगभग 10% रही. ढाका स्थित एक स्वतंत्र ऊर्जा विशेषज्ञ इजाज़ हुसैन ने कहा, “अडानी की बिजली अभी भी तेल आधारित बिजली से सस्ती है. कमी के कारण, बांग्लादेश को तेल आधारित बिजली संयंत्रों का उपयोग करना पड़ रहा है.”
तेलंगाना फ़ोन टैपिंग जांच का दायरा बढ़ा: ‘हज़ारों कॉल, आईपी रिकॉर्ड्स एक्सेस किए गए’
तेलंगाना में 2023 विधानसभा चुनावों से पहले हुए बहुचर्चित फ़ोन टैपिंग मामले की जांच अब और गहरी हो गई है. इंडियन एक्सप्रेस की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक़, मामले की जांच कर रही विशेष जांच दल (एसआईटी) के अधिकारियों ने दावा किया है कि पुलिस की स्पेशल इंटेलिजेंस ब्रांच (एसआईबी) ने उस समय हज़ारों लोगों के कॉल डेटा रिकॉर्ड (सीडीआर) और इंटरनेट प्रोटोकॉल डेटा रिकॉर्ड अवैध रूप से एक्सेस किए थे.
एसआईटी के एक सूत्र ने दावा किया, “हमारे पास यह साबित करने के लिए सबूत हैं कि निगरानी तंत्र का अवैध इस्तेमाल चुनावी बॉन्ड के ज़रिए पैसे वसूलने के लिए किया गया था.”
यह मामला भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) की सरकार के समय का है, जब के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) मुख्यमंत्री थे. जांच एजेंसी ने अब केसीआर के परिवार के सदस्यों से भी पूछताछ शुरू कर दी है. इसमें पूर्व मंत्री हरीश राव, केसीआर के बेटे और पूर्व मंत्री के.टी. रामा राव (केटीआर) और पूर्व सांसद जे. संतोष राव शामिल हैं. वहीं, बीआरएस ने इन नोटिसों को “ध्यान भटकाने वाली रणनीति” बताते हुए कहा है कि इस “झूठे केस” में उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं है.
इस मामले के मुख्य आरोपियों में पूर्व एसआईबी प्रमुख टी. प्रभाकर राव और डीएसपी डी. प्रणीत राव जैसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल हैं. एसआईबी का गठन मूल रूप से माओवादी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए किया गया था, लेकिन एसआईटी सूत्रों के अनुसार, प्रभाकर राव के नेतृत्व में कम से कम 600 ऐसे फ़ोन नंबर टैप किए गए जिनका वामपंथी उग्रवाद से कोई लेना-देना नहीं था.
एसआईटी सूत्र का कहना है कि अब मामले में और सबूत मिले हैं. हज़ारों लोगों के डेटा तक अवैध पहुंच बनाना भी ग़ैरक़ानूनी सर्विलांस के दायरे में आता है, इसलिए पूरक चार्जशीट का दायरा मौजूदा छह आरोपियों से कहीं ज़्यादा बड़ा होगा.
गिरते रुपये का इलाज़ कूटनीति में है, सिर्फ़ आर्थिकी में नहीं
‘द हिंदू’ में प्रकाशित आरबीआई के पूर्व गवर्नर सी. रंगराजन और मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के निदेशक एन.आर. भानुमूर्ति का यह लेख बताता है कि रुपये में आई हालिया गिरावट के पीछे आर्थिक से ज़्यादा कूटनीतिक कारण हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक़्त अच्छी स्थिति में है—विकास दर 7.4% अनुमानित है और महंगाई काबू में है. इसके बावजूद, अप्रैल 2025 से रुपये में क़रीब 6% की गिरावट आई है, जिसने बाज़ार को हिला कर रख दिया है.
लेखकों के अनुसार, इस गिरावट का मुख्य ‘खलनायक’ पूंजी का बहिर्प्रवाह है. जब से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के प्रति सख़्त रवैया अपनाते हुए भारतीय निर्यात पर 50% आयात शुल्क लगाया है, तब से भारत से पैसा बाहर जा रहा है. अमेरिका ने पहले ‘पारस्परिक’ आधार पर और फिर रूस से तेल ख़रीदने के कारण भारत पर टैरिफ लगाया. अब ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर भी अतिरिक्त टैरिफ का ख़तरा मंडरा रहा है.
आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल-दिसंबर 2024 में भारत में शुद्ध पूंजी प्रवाह सकारात्मक था, लेकिन 2025 की इसी अवधि में यह नकारात्मक हो गया और 3.9 बिलियन डॉलर देश से बाहर चले गए.
लेख में तर्क दिया गया है कि 2022 में जब रुपया गिरा था, तो उसके पीछे ‘ब्याज़ दरों में बढ़ोतरी’ जैसे आर्थिक कारण थे. लेकिन इस बार कारण ‘शत्रुतापूर्ण’ अमेरिकी रवैया है. ऐसे में यह मामला अब आर्थिक क्षेत्र से हटकर कूटनीतिक मंच पर आ गया है. जब टैरिफ को भू-राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा हो, तो समाधान भी कूटनीति से ही निकलेगा.
क्या रुपये का अवमूल्यन सही है? लेखक मानते हैं कि इससे फ़ायदा नहीं होगा. भारत के कुल आयात का 25% हिस्सा कच्चे तेल का है. अगर रुपया गिरेगा, तो तेल महंगा होगा और देश में महंगाई बढ़ेगी. साथ ही, अमेरिका में ऊंचे टैरिफ के कारण भारतीय निर्यातकों को वहां ज़्यादा जगह मिलने की उम्मीद कम है.
जब तक भारत और अमेरिका किसी समझौते पर नहीं पहुँचते, पूंजी का बाहर जाना जारी रहेगा. आरबीआई सिर्फ़ गिरावट को ‘हमवार’ बना सकता है, उसे रोक नहीं सकता. इसलिए भारत के व्यापार वार्ताकारों को अमेरिका के साथ जल्द से जल्द समझौता करना होगा.
‘हमें राजनीतिक समाधान चाहिए, लोकप्रिय सरकार नहीं’; मणिपुर में हजारों छात्रों का प्रदर्शन
मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में बुधवार को हजारों छात्रों ने राज्य में एक लोकप्रिय सरकार (लोकतांत्रिक सरकार) बनाने के प्रयासों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने और कुकी-ज़ो समुदाय के लिए “राजनीतिक समाधान” की मांग पर जोर देने के लिए मार्च निकाला. चुराचांदपुर के ‘जॉइंट स्टूडेंट्स’ द्वारा निकाला गया यह जुलूस जिला मुख्यालय के लामका पब्लिक ग्राउंड से शुरू हुआ और तुइबोंग में समाप्त हुआ. 2 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए प्रदर्शनकारियों ने “राजनीतिक समाधान चाहिए, लोकप्रिय सरकार नहीं” की आवश्यकता पर नारे लगाए.
‘पीटीआई’ की खबर है कि छात्रों ने अपने हाथों में तख्तियां भी ले रखी थीं, जिन पर “समाधान नहीं, तो चैन नहीं” का संदेश लिखा था. छात्र नेताओं ने अतिरिक्त उपायुक्त के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित एक प्रतिवेदन भी सौंपा. ज्ञापन में “मणिपुर में एक लोकप्रिय सरकार की स्थापना से पहले राजनीतिक समाधान” की मांग की गई थी.
उल्लेखनीय है कि मई 2023 से मैतेई और कुकी-ज़ो समूहों के बीच जातीय हिंसा में 260 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और हजारों लोग बेघर हो गए हैं. पिछले साल मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद केंद्र ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था. राज्य विधानसभा, जिसका कार्यकाल 2027 तक है, उसे निलंबित रखा गया है. ज्ञापन में यह भी दावा किया गया कि “प्रशासन के चरमराने के साथ व्यापक विस्थापन” हुआ है, और हजारों लोग अभी भी राहत शिविरों में रह रहे हैं और अपने घरों को लौटने में असमर्थ हैं.
मणिपुर के कांगपोकपी जिले में घरों को आग के हवाले किया; नागा समूह ने ली जिम्मेदारी, कुकी-ज़ो की धमकी
मणिपुर के कांगपोकपी जिले में सोमवार को एक नागा उग्रवादी समूह के संदिग्ध सदस्यों ने कुकी-ज़ो समुदाय के कुछ घरों में आग लगा दी.
पुलिस ने पुष्टि की कि यह घटना कांगचुप थाना क्षेत्र के अंतर्गत के. सोंग्लुंग-II गांव में हुई. “द इंडियन एक्सप्रेस” के अनुसार, तीन घरों और एक एसयूवी को आग के हवाले कर दिया गया, हालांकि किसी के हताहत होने की कोई खबर नहीं है.
जहां एक ओर सशस्त्र उग्रवादी समूह ‘जेलियांग्रोंग यूनाइटेड फ्रंट’ (ज़ेडयूएफ) के एक गुट ने इस घटना की जिम्मेदारी ली है, वहीं एक कुकी-ज़ो समूह ने 24 घंटे के भीतर इस मामले में कार्रवाई की मांग की है और कार्रवाई न होने पर राजमार्गों को बंद करने की धमकी दी है. सोशल मीडिया पर इस घटना के कई वीडियो सामने आए हैं, जिनमें कथित तौर पर पहाड़ी इलाके में जलते हुए घर दिखाई दे रहे हैं.
एक बिना हस्ताक्षर वाले बयान में, कथित तौर पर कामसन के नेतृत्व वाले ज़ेडयूएफ ने कहा, “ज़ेडयूएफ ने जेलियांग्रोंग इनपुई नागा लोगों के पैतृक, पारंपरिक और ऐतिहासिक क्षेत्र के भीतर अवैध अफीम की खेती, मादक पदार्थों की तस्करी और अवैध प्रवासियों द्वारा किए गए अवैध अतिक्रमण के खिलाफ अपने निर्णायक अभियान को तेज कर दिया है.”
बयान में आगे कहा गया, “बार-बार सार्वजनिक चेतावनी और शांतिपूर्ण अनुपालन के लिए समय दिए जाने के बावजूद, दोपहर 12:15 बजे प्रवर्तन कार्रवाई की गई. मणिपुर के कांगपोकपी जिले के सोंगनुंग सदर हिल्स के वाफोंग क्षेत्र में अवैध अफीम की खेती और अनधिकृत संरचनाओं के खिलाफ फार्म हाउसों और खेतों को जला दिया गया और अन्य आवश्यक सामग्रियों को नष्ट कर दिया गया.”
छत्तीसगढ़; एक माह से वेतन वृद्धि के लिए आंदोलन कर रहीं दो महिला मध्यान्ह भोजन रसोइयों की मौत
छत्तीसगढ़ में मानदेय बढ़ाने की मांग को लेकर महीने भर से चल रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद अस्पतालों में इलाजरत दो महिला रसोइयों की मौत हो गई. ये दोनों मध्यान्ह भोजन (मिड डे मील) तैयार करती थीं. हालांकि, राज्य सरकार ने इन मौतों का सीधा संबंध रसोइयों के आंदोलन से होने से इनकार किया है, जो बुधवार को 31वें दिन में प्रवेश कर गया.
‘पीटीआई’ के अनुसार, पारिवारिक सदस्यों और आंदोलनकारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक संघ ने बताया कि जहाँ बालोद जिले की मध्याह्न भोजन रसोइया रुक्मणी सिन्हा की मृत्यु 26 जनवरी को पड़ोसी राजनांदगांव जिले के एक अस्पताल में हुई, वहीं बेमेतरा जिले की निवासी और सरकारी भोजन योजना में कार्यरत एक अन्य महिला दुलारी बाई यादव की मृत्यु उसी दिन तड़के दुर्ग जिले के भिलाई शहर के एक अस्पताल में हुई.
29 दिसंबर से हजारों मध्यान्ह भोजन रसोइये (जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं) नवा रायपुर अटल नगर के तूता धरना स्थल पर धरने पर बैठे हैं.
उनकी मांग है कि उनके दैनिक वेतन को 66 रुपये से बढ़ाकर 400 रुपये से अधिक किया जाए. ‘छत्तीसगढ़ स्कूल मध्यान्ह भोजन रसोइया संयुक्त संघ’ के प्रदेश अध्यक्ष रामराज कश्यप ने आरोप लगाया कि 31 दिनों के आंदोलन के बावजूद सरकार ने रसोइयों की मांगों पर कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लिया है.
म.प्र. में गणतंत्र दिवस पर बच्चों को रद्दी कागज पर परोसा गया मध्यान्ह भोजन; 3 महीने में दूसरी घटना
मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन (मिड-डे मील) की गुणवत्ता और प्रबंधन एक बार फिर जांच के दायरे में है, जब गणतंत्र दिवस पर मैहर जिले के एक स्कूल में बच्चों को रद्दी कागज पर खाना परोसे जाने का वीडियो सामने आया.
“द हिंदू” में मेहुल मालपानी यह ताजा घटना पिछले साल नवंबर में श्योपुर में इसी तरह की घटना के तीन महीने से भी कम समय के भीतर हुई है, जिसमें एक सरकारी प्राथमिक स्कूल के बच्चों को जमीन पर रखे रद्दी कागज पर पूड़ी और सब्जी परोसी गई थी. उस घटना ने देशव्यापी सुर्खियां बटोरी थीं और राज्य सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा किया था.
मैहर में, भातगावां गांव के एक हाई स्कूल के परिसर में चल रहे एक सरकारी माध्यमिक स्कूल के छात्रों को रद्दी कागज और किताबों-कॉपी के फटे पन्नों पर ‘हलवा-पूड़ी’ परोसी गई. स्कूल के एक वायरल वीडियो में बच्चे जूट की चटाई पर बैठे दिखाई दे रहे हैं और उनके सामने जमीन पर रखे कागज पर खाना रखा है.
इस वीडियो ने एक बार फिर राज्य अधिकारियों के खिलाफ कड़ी आलोचना को जन्म दिया है. विपक्षी कांग्रेस ने सत्तारूढ़ भाजपा की आलोचना करते हुए उस पर बच्चों के प्रति असंवेदनशीलता का आरोप लगाया है. मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के एक कार्यक्रम में भोजन करने के वीडियो के साथ मैहर स्कूल का वीडियो साझा किया. उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में लिखा, “सरकार भ्रष्टाचार की वेदी पर बच्चों की थालियां चढ़ाकर रबड़ी और मलाई खा रही है.”
राज्य कांग्रेस ने एक अन्य पोस्ट में कहा, “मध्यप्रदेश में मासूम बच्चे सरकार की लापरवाही के कारण कब तक शर्मिंदगी और अपमान सहते रहेंगे?” मैहर कलेक्टर रानी बाटड ने ‘द हिंदू’ को बताया कि उन्होंने जिला परियोजना समन्वयक (डीपीसी) विष्णु त्रिपाठी की जांच रिपोर्ट के आधार पर स्कूल के प्रधानाध्यापक प्रभारी सुनील कुमार त्रिपाठी के निलंबन की सिफारिश रीवा के संभागीय आयुक्त से की है.
डीपीसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में प्रधानाध्यापक की ओर से लापरवाही पाई गई है. स्थानीय ब्लॉक संसाधन केंद्र प्रभारी के एक महीने के वेतन की कटौती की गई है और जिला पंचायत के मिड-डे मील प्रभारी डीपीसी और स्कूल में भोजन उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार स्वयं सहायता समूह को नोटिस जारी किए गए हैं. बाटड ने कहा कि स्थानीय एसडीएम को भी मामले की जांच कर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है. हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्कूल में प्लेटें उपलब्ध थीं और यह घटना संसाधनों की कमी के कारण नहीं हुई थी.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी ने कहा, ‘अस्थियों पर मोदी की ओर से कोई जवाब नहीं’
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी, अनीता बोस फाफ ने कहा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने पिता की अस्थियों (राख) को भारत वापस लाने में समर्थन मांगने के लिए “कम से कम दो या तीन बार” पत्र लिखा है, लेकिन उन्हें न तो कोई जवाब मिला और न ही कोई पावती.
देबराज मित्रा ने लिखा है कि शनिवार को प्रसारित ‘द वायर’ के लिए पत्रकार करण थापर के साथ 26 मिनट के एक वर्चुअल इंटरव्यू में, फाफ ने कहा: “ऐसे दो-तीन मौके थे जब मैंने प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी) से संपर्क किया. आखिरी बार तब था जब दिल्ली में मेरे पिता की प्रतिमा स्थापित की गई थी (2022 में). मुझे अनावरण के लिए आमंत्रित किया गया था... मैं इस शर्त पर आने के लिए सहमत हुई थी कि मुझे अवशेषों की वापसी पर चर्चा करने के लिए प्रधानमंत्री के साथ अपॉइंटमेंट मिलेगा. उस पर कोई जवाब नहीं मिला.”
उन्होंने कहा कि उन्होंने इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी पत्र लिखा था, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. जब थापर ने उनसे पूछा कि उन्होंने वर्तमान प्रधानमंत्री को कितनी बार लिखा है, तो फाफ ने उत्तर दिया: “कम से कम दो या तीन बार.”
फाफ ने यह भी कहा कि उन्होंने भारत की वर्तमान राष्ट्रपति से भी मिलने का समय मांगा था, लेकिन उसे अस्वीकार कर दिया गया. शुक्रवार को नेताजी की 129वीं जयंती पर, फाफ ने अपने पिता के अवशेषों को जापान से वापस लाने के लिए भारत के लोगों का समर्थन मांगते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया.
मोदी सरकार ने कभी भी बोस को अपनाने की कोशिश में संकोच नहीं किया है, अक्सर उन्हें नेहरू-गांधी वंश के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की जाती है. शिक्षाविदों और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने इस ओर इशारा करते हुए कहा है कि नेताजी के समावेशिता और धर्मनिरपेक्षता के आदर्श हिंदुत्व के नैरेटिव के साथ सहज नहीं बैठते हैं.
23 जनवरी 2016 को, केंद्र ने अपने कब्जे में मौजूद बोस से संबंधित 100 फाइलों को सार्वजनिक किया था. इस कदम को दक्षिणपंथी पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा कांग्रेस सरकारों के वर्षों की उपेक्षा के सुधार के रूप में पेश किया गया था. लेकिन फाइलों ने बोस की गुमशुदगी से जुड़े सवालों का समाधान नहीं किया. सितंबर 2022 में इंडिया गेट की छतरी के नीचे नेताजी की 28 फीट ऊंची प्रतिमा के अनावरण को एक मील के पत्थर के रूप में प्रस्तुत किया गया था.
थापर ने विरोधाभास का मुद्दा उठाते हुए कहा, “...याद रखें कि नेताजी वही नेता हैं जिनकी प्रतिमा उन्होंने इंडिया गेट पर स्थापित की है... यदि नेताजी की बेटी अपॉइंटमेंट का अनुरोध करने के लिए पत्र लिखती है... तो निश्चित रूप से कम से कम एक पावती की उम्मीद तो की ही जाती है.” उन्होंने फाफ से पूछा: “आपको क्यों लगता है कि यह सरकार... हिचकिचा रही है... क्या यह राजनीतिक कारणों से है?”
“निश्चित रूप से...” उन्होंने उत्तर दिया. “एक राजनीतिज्ञ वह काम करेगा जो उसे नुकसान न पहुँचाए, उसके चुनाव को खतरे में न डाले. भले ही बहुत सारे मुद्दे जनता और राजनेताओं को व्यस्त रखते हैं, लेकिन यह एक भावनात्मक मुद्दा है जो उनकी अपनी पार्टी और बड़े पैमाने पर जनता के कुछ लोगों को नाराज कर सकता है. मुझे लगता है कि एक राजनेता से कुछ करने की उम्मीद तब की जा सकती है जब वह काफी हद तक आश्वस्त हो कि इससे उसे लाभ होगा.”
फाफ ने आगे कहा: “मैं इस बात को पूरी तरह स्वीकार करती हूं कि प्रधानमंत्री मोदी शायद मेरे पिता का सम्मान करते हैं और उनका सम्मान करना चाहते हैं. लेकिन वह साथ ही ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो उन्हें विवादास्पद लगे...”.
इतिहासकार सुगत बोस, जो नेताजी के पोते हैं, ने ‘मेट्रो’ को बताया: “यह मामला एक राष्ट्रीय मुद्दा है, पारिवारिक मुद्दा नहीं. यदि इसे कभी होना है, तो इसे सरकार के उच्चतम स्तर पर गरिमा के साथ किया जाना चाहिए. यह स्पष्ट है कि इस समय ऐसा नहीं हो सकता.”
‘रनवे दिखाई नहीं दे रहा’: विमान हादसे से पहले के वे 26 मिनट, जिसमें अजीत पवार की जान गई
नागरिक उड्डयन मंत्रालय के एक बयान में सुबह 8:18 बजे (जब विमान ने “पहली बार बारामती से संपर्क किया”) और सुबह 8:44 बजे (जब आग की लपटें देखी गईं) के बीच की घटनाओं का विस्तृत विवरण दिया गया है. इस बीच लैंडिंग का एक असफल प्रयास हुआ, दृश्यता की संभावित चिंताएं सामने आईं — और अंत में, सन्नाटा छा गया. महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार को ले जा रहा यह चार्टर्ड विमान दुर्घटनाग्रस्त होने और उसमें सवार सभी पांच लोगों की मौत होने से पहले लगभग 35 मिनट तक हवा में था.
“द इंडियन एक्सप्रेस” में सुकल्प शर्मा के अनुसार, यह विमान बॉम्बार्डियर लीयरजेट-45 था, जिसका पंजीकरण नंबर वीटी-एसएसके था और इसे दिल्ली स्थित निजी जेट चार्टर ऑपरेटर वीएसआर वेंचर्स (वीएसआर एविएशन) द्वारा संचालित किया जा रहा था. इसने सुबह करीब 8:10 बजे मुंबई के छत्रपति शिवाजी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से उड़ान भरी थी और यह बारामती की ओर जा रहा था.
जहां एक ओर विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) इस हादसे की जांच कर रहा है, वहीं नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने अब तक उपलब्ध जानकारी साझा की है, जिसमें बारामती में लैंडिंग के प्रयास के दौरान पायलटों द्वारा अपनाए गए घटनाक्रम का विवरण शामिल है.
लेकिन उस विवरण में जाने से पहले, बारामती हवाई अड्डे की प्रकृति और वहां लैंडिंग करना क्यों कठिन है, यह समझना शिक्षाप्रद होगा.
बारामती हवाई अड्डे की चुनौतियां
बारामती हवाई अड्डा एक क्षेत्रीय हवाई पट्टी है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से पायलट प्रशिक्षण और निजी विमानों के संचालन के लिए किया जाता है. यहां पायलटों को कम दृश्यता के दौरान सहायता करने के लिए मार्गदर्शन उपकरण (नेविगेशनल एड्स) उपलब्ध नहीं हैं.
इसलिए, पायलटों को न केवल लैंडिंग के लिए, बल्कि अन्य विमानों से बचने के लिए भी काफी हद तक अपनी दृष्टि (साइट) पर निर्भर रहना पड़ता है. वे ऐसे हवाई अड्डों पर संचालन के लिए रेडियो संचार का उपयोग करते हैं.
यह एक महत्वपूर्ण विवरण है, क्योंकि विमान संचालक, वीएसआर, ने लैंडिंग में संभावित दृश्यता संबंधी समस्याओं का हवाला दिया है. नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अनुसार, बारामती एक ‘अनियंत्रित एयरफील्ड’ भी है, जिसका अर्थ है कि यहां एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) टावर नहीं है. इसके बावजूद, ऐसे हवाई अड्डों पर हवाई यातायात के प्रबंधन के लिए हमेशा कम से कम एक वरिष्ठ अधिकारी होता है. बारामती हवाई अड्डे पर, वहां के फ्लाइंग स्कूलों के प्रशिक्षकों या पायलटों द्वारा हवाई यातायात की जानकारी प्रदान की जाती है.
नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा जारी बयान में सुबह 8:18 बजे, जब बॉम्बार्डियर विमान “पहली बार बारामती के संपर्क में आया”, और सुबह 8:44 बजे, जब दुर्घटनाग्रस्त विमान की लपटें देखी गईं, के बीच के घटनाक्रम का विवरण दिया गया है — यह 26 मिनट की वह अवधि है जिसमें दुर्घटना क्यों हुई, इसके सुराग छिपे हो सकते हैं.
यह जानकारी दुर्घटना के समय बारामती के हवाई यातायात का प्रबंधन करने वाले व्यक्ति के बयान पर आधारित है.
मंत्रालय ने कहा कि बारामती हवाई अड्डे के संपर्क में आने के बाद, विमान का अगला कॉल “बारामती की ओर आने के दौरान 30 समुद्री मील की दूरी पर था और उन्हें पुणे अप्रोच द्वारा रिलीज़ किया गया था. उन्हें पायलट के विवेक पर ‘विजुअल मेट्रोलॉजिकल कंडीशंस’ में विमान को नीचे लाने की सलाह दी गई थी.”
विवरण के अनुसार, पायलटों ने हवा की स्थिति और दृश्यता के बारे में पूछताछ की थी. ऑपरेटर ने उन्हें सूचित किया कि हवा शांत थी और दृश्यता लगभग 3,000 मीटर थी. इसके बाद, पायलट हवाई अड्डे के करीब पहुँचे, लेकिन उन्होंने लैंडिंग न करने का फैसला किया, क्योंकि उन्हें रनवे दिखाई नहीं दे रहा था.
सूत्रों के अनुसार, दुर्घटनास्थल से मिली शुरुआती जानकारी ने संकेत दिया था कि क्षेत्र में कम दृश्यता की स्थिति ने दुर्घटना में एक बड़ी भूमिका निभाई होगी; यही वह कारक है जिसका उल्लेख वीएसआर द्वारा भी किया गया है.
उन्होंने दोबारा लैंडिंग की कोशिश करने के लिए ‘गो-अराउंड’ किया. यह फ्लाइट ट्रैकिंग सर्विस ‘फ्लाइटराडा 24’ पर उपलब्ध विमान के मार्ग के अनुरूप है. विमान ने एक घेरा (लूप) बनाया और फिर से बारामती हवाई अड्डे की ओर बढ़ा.
विमान के कैप्टन अत्यधिक अनुभवी थे और उनके पास 15,000 से अधिक उड़ान घंटों का अनुभव था. वहीं को-पायलट के पास 1,500 घंटों से अधिक का अनुभव था.
‘गो-अराउंड’ के बाद, विमान से उसकी स्थिति के बारे में पूछा गया. चालक दल (क्रू) ने सूचित किया कि वे “रनवे 11 के फाइनल अप्रोच” पर हैं. ऑपरेटर ने उनसे पूछा कि क्या उन्हें रनवे दिखाई दे रहा है. जवाब मिला: “रनवे फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा है, दिखाई देने पर कॉल करेंगे.”
मंत्रालय ने बताया कि कुछ सेकंड बाद, चालक दल ने सूचित किया कि रनवे दिखाई दे रहा है. इसके बाद ऑपरेटर ने सुबह 8:43 बजे विमान को लैंडिंग की अनुमति (क्लियरेंस) दे दी. लेकिन वहां से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. मंत्रालय ने कहा, “इसके बाद, सुबह 8:44 बजे (आईएसटी) एटीसी ने रनवे 11 की दहलीज के पास आग की लपटें देखीं. इसके तुरंत बाद आपातकालीन सेवाएं दुर्घटनास्थल की ओर दौड़ीं.” दिल्ली से एएआईबी की एक टीम दुर्घटनास्थल के लिए रवाना हो गई है, और एएआईबी के महानिदेशक जीवीजी युगांधर, जो हैदराबाद में थे, वे भी बारामती के लिए निकल चुके हैं.
नौ सीटों वाला ‘लीयरजेट 45’ एक मध्यम आकार का बिजनेस जेट विमान है, जिसे कनाडा की ‘बॉम्बार्डियर एयरोस्पेस’ द्वारा निर्मित किया गया है. 1995 से 2012 के बीच उत्पादन के दौरान ऐसे लगभग 640 विमान बनाए गए थे. डीजीसीए के डेटाबेस के अनुसार, वीएसआर के पास 18 विमानों का बेड़ा था, जिसमें बुधवार को दुर्घटनाग्रस्त हुआ विमान भी शामिल था.
हेट क्राइम
झारखंड: मुफ्त में सफाई से मना करने पर दलित महिला से मारपीट, आरोपी पर केस दर्ज
झारखंड के धनबाद जिले के झरिया में एक दलित महिला के साथ मारपीट का मामला सामने आया है. द मूकनायक के मुताबिक़ 46 वर्षीय मंजू देवी वाल्मीकि को सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि उन्होंने एक दुकानदार की दुकान मुफ्त में साफ करने से इनकार कर दिया. आरोपी ने उनसे झाड़ू छीनकर उसी से मारपीट की और जातिसूचक गालियां भी दीं. घटना का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है.
मंजू देवी झरिया की वाल्मीकि कॉलोनी की रहने वाली हैं और सफाई का काम करती हैं. सोमवार को जब वह बाज़ार में काम कर रही थीं, तभी कपड़ा व्यापारी सुनील केसरी ने उनसे अपनी दुकान साफ करने को कहा. जब उन्होंने बिना पैसे के काम करने से इनकार किया तो आरोपी गुस्से में आ गया और उनके साथ मारपीट करने लगा. उनके बेटे राजा कुमार ने बताया कि आरोपी ने उनकी मां का हाथ मरोड़ा और झाड़ू से सिर पर वार किया.
घटना के दौरान मौजूद लोग तमाशबीन बने रहे. बाद में परिवार को इसकी जानकारी मिली. वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस हरकत में आई. झरिया थाना प्रभारी भीम लाल पासवान ने बताया कि आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है और एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की जा रही है. पुलिस ने कहा है कि आरोपी को जल्द गिरफ्तार किया जाएगा.
शरजील इमाम की गिरफ्तारी को छह साल पूरे
आज, 28 जनवरी 2026 को, जेएनयू के शोधार्थी और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोधी आंदोलन के प्रमुख चेहरे रहे शरजील इमाम की गिरफ्तारी को छह साल पूरे हो गए. उन्हें 28 जनवरी 2020 को सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ दिए गए भाषणों के बाद देशद्रोह और यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के तहत गिरफ्तार किया गया था. उस समय उनके ख़िलाफ़ पांच राज्यों में एफआईआर दर्ज की गई थीं. शरजील पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने भड़काऊ भाषण दिए और “चक्का जाम” का आह्वान किया.
शरजील इमाम को आठ मामलों में आरोपी बनाया गया, जिनमें से सात में उन्हें जमानत मिल चुकी है. हालांकि, वह अब भी दिल्ली दंगों की साज़िश से जुड़े यूएपीए मामले में जेल में हैं. अदालतों ने कई बार कहा कि उनके भाषणों से सीधे हिंसा भड़कने का कोई सबूत नहीं है, इसके बावजूद उनकी ज़मानत खारिज की जाती रही है. हाल ही में इसी मामले में उनके चार सह-आरोपियों को रिहा किया गया, लेकिन शरजील इमाम और कुछ अन्य आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली.
शरजील इमाम, जो आईआईटी बॉम्बे के पूर्व छात्र और जेएनयू से इतिहास व दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर हैं, को शाहीन बाग आंदोलन के प्रमुख वैचारिक चेहरों में माना जाता है. उनके परिवार और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि उन पर लगाए गए आरोप असहमति को दबाने का तरीका हैं. शरजील ने जेल से कहा है कि उन्हें अपनी बुज़ुर्ग मां की चिंता है, लेकिन वे अब भी न्याय की उम्मीद रखते हैं. छह साल बाद भी वे जेल में हैं और कई लोगों के लिए वह इस बात की मिसाल बन चुके हैं कि कैसे आतंकवाद कानूनों का इस्तेमाल असहमति को कुचलने और बोलने के आज़ादी को दबाने के लिए किया जा रहा है.
ओडिशा में एक परिवार के तीन बुज़ुर्गों को ‘बांग्लादेशी’ बताकर बाहर भेजा गया
ओडिशा के केंद्रापाड़ा जिले के गरापुर गांव से 27 नवंबर 2024 को पुलिस ने एक ही परिवार के 12 लोगों को यह कहकर हिरासत में लिया कि वे बांग्लादेशी हैं. नौ दिन तक हिरासत में रखने के बाद नौ लोगों को छोड़ दिया गया, लेकिन तीन बुज़ुर्ग — 65 वर्षीय मुन्ताज़ खान, उनके भाई इंसान खान और बहन अमीना बीबी , का कोई पता नहीं चला. परिवार को न तो यह बताया गया कि उन्हें कहां रखा गया है और न ही उनकी रिहाई से जुड़ी कोई जानकारी दी गई. बाद में पुलिस ने बताया कि तीनों को जबरन बांग्लादेश भेज दिया गया है.
स्क्रोल के रिपोर्ट के मुताबिक़ परिवार को इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी. मुन्ताज़ खान के बेटे मुख़्तार खान को जब पता चला तो वे हैरान रह गए. उन्होंने कहा कि उनके पिता और चाचा के पास भारतीय नागरिकता के सारे दस्तावेज़ मौजूद हैं. पुलिस का दावा है कि तीनों ने “खुद को बांग्लादेशी बताया”, जबकि परिवार इसका सख्त खंडन करता है.
ओडिशा पुलिस का कहना है कि गृह मंत्रालय के 2 मई के आदेश के तहत कार्रवाई की गई और पश्चिम बंगाल से सत्यापन कराया गया था. लेकिन पश्चिम बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर जिले के पुलिस अधीक्षक ने साफ कहा कि उनसे किसी तरह का सत्यापन नहीं मांगा गया. उन्होंने ओडिशा पुलिस के दावे को पूरी तरह गलत बताया.
परिवार के पास 1956 के ज़मीन के कागज़, 2002 की वोटर लिस्ट, आधार कार्ड, और 2009 की जमीन के दस्तावेज हैं. यहां तक कि मुन्ताज़ खान को 1999 के सुपर साइक्लोन के बाद सरकार ने आवास भी दिया था. गांव के लोगों का कहना है कि यह परिवार पिछले 60 साल से ओडिशा में रह रहा है और कभी बांग्लादेश से नहीं आया.
यह मामला अकेला नहीं है. इससे पहले भी ओडिशा के जगतसिंहपुर जिले से एक परिवार के 14 लोगों को बांग्लादेश भेजा गया था. मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि बीजेपी शासित राज्यों में बिना जांच और बिना सुनवाई लोगों को “बांग्लादेशी” बताकर बाहर किया जा रहा है, जो कानून का खुला उल्लंघन है. अब मुन्ताज़ खान का परिवार अदालत जाने की तैयारी कर रहा है, लेकिन उनके पास न पैसे हैं और न कोई मदद.
बीसीसीआई का दबदबा, आईसीसी की चुप्पी और बांग्लादेश का बाहर होना: कैसे राजनीति ने क्रिकेट को बंधक बना लिया
क्रिकेट की दुनिया में ताक़त का संतुलन अब खेल के मैदान से बाहर तय होने लगा है. इसका ताज़ा उदाहरण है 2026 टी20 वर्ल्ड कप से बांग्लादेश का बाहर होना. यह टूर्नामेंट भारत और श्रीलंका की मेज़बानी में 7 फरवरी से शुरू होना है. लेकिन बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) को टूर्नामेंट से बाहर कर दिया गया, क्योंकि उसने भारत में अपने मैच खेलने से इनकार कर दिया था. बांग्लादेश ने यह फैसला सुरक्षा चिंताओं के चलते लिया था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने उनकी बात नहीं मानी और उन्हें प्रतियोगिता से बाहर कर दिया.
द वायर के लिए रवि राज लिखते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब कोलकाता नाइट राइडर्स ने अपने स्टार गेंदबाज़ मुस्तफिजुर रहमान का अनुबंध रद्द कर दिया. यह फैसला भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के निर्देश पर लिया गया बताया गया. बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने इस पर नाराजगी जताई और भारत में मैच खेलने से इनकार कर दिया. हालांकि बीसीसीआई ने इस पूरे मामले से खुद को अलग बताते हुए कहा कि यह उसका विषय नहीं है. बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने साफ कहा कि यह आईसीसी का मामला है.
आईसीसी ने अपने बयान में कहा कि उसने हालात की समीक्षा की और भारत में बांग्लादेशी टीम के लिए कोई “विश्वसनीय सुरक्षा खतरा” नहीं पाया. इसी आधार पर बांग्लादेश के अनुरोध को खारिज कर दिया गया. लेकिन सवाल यह उठता है कि जब भारत ने 2025 की चैंपियंस ट्रॉफी पाकिस्तान में खेलने से इनकार किया था, तब आईसीसी ने बिना किसी आपत्ति के उसके मैच दुबई शिफ्ट कर दिए थे. उस समय सुरक्षा कारणों को पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया था. अब वही तर्क बांग्लादेश के लिए क्यों नहीं माना गया?
इस विरोधाभास की ओर पूर्व ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर जेसन गिलेस्पी ने भी इशारा किया. उन्होंने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि जब भारत पाकिस्तान में खेलने से मना कर सकता है, तो बांग्लादेश को वही अधिकार क्यों नहीं दिया गया. हालांकि बाद में उन्हें ट्रोलिंग के चलते अपना पोस्ट हटाना पड़ा, लेकिन सवाल अपनी जगह कायम रहा.
असल में, इस पूरे विवाद की जड़ में बीसीसीआई की अपार आर्थिक ताकत है. आईसीसी की कुल आय का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा भारत से आता है. ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि आईसीसी कोई बड़ा फैसला बीसीसीआई की मर्जी के बिना ले सकता है. क्रिकेट की वैश्विक संस्था अब एक स्वतंत्र संस्था से ज्यादा, भारत-केन्द्रित ढांचे की तरह काम करती नजर आती है.
इस स्थिति को और स्पष्ट करता है आईसीसी के मौजूदा चेयरमैन जय शाह का पद. वह बीसीसीआई के पूर्व सचिव रह चुके हैं और देश के गृह मंत्री अमित शाह के बेटे हैं. उन्हें निर्विरोध आईसीसी चेयरमैन चुना गया. आलोचकों का कहना है कि यह महज संयोग नहीं है, बल्कि क्रिकेट प्रशासन में राजनीतिक प्रभाव की गहरी पैठ को दिखाता है.
इस पूरे मामले में कोलकाता नाइट राइडर्स की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. फ्रेंचाइज़ी ने बिना किसी विरोध के मुस्तफिजुर रहमान का अनुबंध खत्म कर दिया. टीम के मालिक शाहरुख खान पहले ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील स्थिति में माने जाते हैं. विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी टकराव से बचने के लिए फ्रेंचाइज़ी ने बीसीसीआई के आदेश का पालन करना ही बेहतर समझा.
क्रिकेट में यह स्थिति नई नहीं है. इससे पहले भी देखा गया है कि भारत-पाकिस्तान मैचों को लेकर फैसले खेल भावना से ज्यादा राजनीतिक और व्यावसायिक आधार पर लिए जाते हैं. भारत-पाकिस्तान मुकाबले दुनिया के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले मैचों में से हैं और इससे होने वाली कमाई बीसीसीआई के लिए बेहद अहम होती है. इसलिए जब पैसा दांव पर हो, तो सिद्धांत पीछे छूट जाते हैं.
बांग्लादेश के मामले में भी यही हुआ. टीम को बाहर कर दिया गया और दुनिया ने ज़्यादा सवाल नहीं उठाए. कारण साफ है—बांग्लादेश न तो आर्थिक रूप से मज़बूत है और न ही उसकी क्रिकेटिंग ताक़त इतनी है कि आईसीसी को उस पर निर्भर रहना पड़े. क्रिकेट के इस कारोबारी मॉडल में केवल भारत, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश ही असली खिलाड़ी हैं, बाकी सदस्य देश महज़ दर्शक बनकर रह गए हैं.
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में निष्पक्षता और समानता अब सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गई है. फैसले खेल के हित में नहीं, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक फायदे को देखकर लिए जा रहे हैं. बांग्लादेश का बाहर होना सिर्फ एक टीम की हार नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की हार है, जिसमें खेल से ज़्यादा ताकत मायने रखती है.
अपील :
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