28/02/2026: अमेरिका इजराइल हमले में ईरान की 80 से ज़्यादा स्कूली बच्चियों की मौत | जंग की आग पूरे मध्य पूर्व में फैैलती हुई | अफ़गानों का पाकिस्तान जहाज गिराने का दावा | मोदी के इजराइल जाने पर सवाल
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
ईरान पर ‘एपिक फ्यूरी’: अमेरिका-इज़राइल का भीषण हमला, खामेनेई को निशाना बनाने का दावा.
मासूमों की मौत: ईरान के स्कूल पर बमबारी, 85 छात्राओं की दर्दनाक मौत.
वायुसेना की टेंशन: तेजस बेड़े पर रोक, स्क्वाड्रन की कमी पर फ्रंटलाइन की गंभीर रिपोर्ट.
ट्रम्प का यू-टर्न: पाकिस्तान के पीएम और जनरल की तारीफ की, बताया ‘शानदार’.
पहाड़ में भूचाल: उत्तराखंड के नेताओं का पुराना ‘डांस बार’ वीडियो वायरल, भाजपा-कांग्रेस में ठनी.
इतिहास बनेगा: मेनका गुरुस्वामी हो सकती हैं भारत की पहली LGBTQ+ सांसद.
मस्क का पावर: स्टारलिंक के ज़रिए यूक्रेन युद्ध को कंट्रोल कर रहे हैं एलोन मस्क.
फैक्ट्री हादसा: आंध्र प्रदेश में पटाखा फैक्ट्री में धमाका, 21 लोगों की जान गई.
अमेरिका- इज़राइल हमले के बाद ईरान तो जला ही, पूरे मिडिल ईस्ट में फैल रही है जंग
शनिवार की सुबह मध्य-पूर्व में एक नया और खतरनाक मोड़ लेकर आई है. अमेरिका और इज़रायल ने ईरान के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा संयुक्त सैन्य अभियान शुरू कर दिया है. इसका उद्देश्य केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करना नहीं, बल्कि 1979 से सत्ता में काबिज इस्लामिक शासन को उखाड़ फेंकना है. ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और उनके शीर्ष कमांडरों को सीधा निशाना बनाया गया है. इस हमले के बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागी हैं, जिससे व्यापक युद्ध का खतरा मंडराने लगा है. अभी तक की मुख्य हेडलाइंस-
खामेनेई निशाने पर: इज़रायली वायु सेना ने ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई और राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान के आवास और कार्यालयों पर बमबारी की है.
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी: राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान को दिए गए 10-दिन के अल्टीमेटम के खत्म होते ही ‘मेजर कॉम्बैट ऑपरेशंस’ (बड़े सैन्य अभियान) की घोषणा की.
शीर्ष कमांडर ढेर: इज़रायली अधिकारियों का दावा है कि ईरानी रक्षा मंत्री और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर मारे गए हैं.
ईरान का पलटवार: ईरान ने बहरीन, कतर, यूएई और कुवैत में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमले शुरू कर दिए हैं.
ट्रम्प का संदेश: अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरानी जनता से शासन के खिलाफ विद्रोह करने और अपनी सरकार पर कब्जा करने का आह्वान किया है.
85 से ज्यादा ईरानी स्कूली बच्चियों को मार डाला
अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर शुरू किए गए भीषण बमबारी अभियान के बीच नागरिकों, विशेषकर बच्चों की मौत की दिल दहला देने वाली खबरें सामने आ रही हैं. अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिणी ईरान के होर्मोज़गन प्रांत के मिनब (Minab) शहर में एक गर्ल्स एलिमेंट्री स्कूल (प्राथमिक बालिका विद्यालय) पर इज़रायली हवाई हमला हुआ है. सरकारी मीडिया और स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, इस हमले में मरने वालों की संख्या 85 तक पहुंच गई है.
ईरान की अर्ध-सरकारी तस्नीम न्यूज़ एजेंसी ने मिनब की न्यायपालिका के हवाले से पुष्टि की है कि शनिवार को स्कूल पर हुए हमले के बाद मलबे से और शव निकाले गए हैं, जिससे मृतकों का आंकड़ा बढ़कर 85 हो गया है. सरकारी समाचार एजेंसी इरना ने बताया कि मलबे को हटाने का काम अभी भी जारी है और वहां से 63 अन्य घायल लोगों को निकाला गया है. यह स्कूल होर्मोज़गन प्रांत में स्थित है, जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य के करीब है.
इसके अलावा, ईरान की मेहर न्यूज़ एजेंसी ने एक अलग घटना की रिपोर्ट दी है, जिसमें राजधानी तेहरान के पूर्व में स्थित एक स्कूल पर भी इज़रायली हमला हुआ. इस हमले में कम से कम दो छात्रों की मौत की खबर है.
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर हमले की एक तस्वीर साझा की, जिसमें स्कूल की इमारत मलबे में तब्दील दिखाई दे रही है. उन्होंने लिखा कि इस हमले में “मासूम बच्चे” मारे गए हैं. अराघची ने चेतावनी देते हुए कहा, “ईरानी लोगों के खिलाफ किए गए इन अपराधों का जवाब दिया जाएगा.” वहीं, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने इसे “खुल्लम-खुल्ला अपराध” करार दिया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की. तेहरान से रिपोर्टिंग कर रहे अल जजीरा के पत्रकार मोहम्मद वल्ल ने विश्लेषण करते हुए कहा कि ये हमले अमेरिका और इज़रायल के उन दावों को खारिज करते हैं जिनमें कहा गया था कि वे केवल “सैन्य ठिकानों और शासन को दंडित” कर रहे हैं, न कि ईरान की जनता को.
वल्ल ने कहा, “राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरानी लोगों से वादा किया था कि मदद उनके रास्ते में है, लेकिन अब हम बड़े पैमाने पर नागरिकों की मौतें देख रहे हैं. ईरानी सरकार निश्चित रूप से इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और ईरानी लोगों के खिलाफ आक्रामकता के रूप में पेश करेगी.”
https://x.com/araghchi/status/2027732295629873332?s=20
फिलहाल, स्कूलों पर हुए इन हमलों के ईरानी दावों पर अमेरिका या इज़रायल की ओर से कोई तत्काल प्रतिक्रिया नहीं आई है. रिपोर्ट में इस बात का भी ज़िक्र किया गया है कि जून 2025 में जब अमेरिका और ईरान के बीच 12-दिवसीय युद्ध हुआ था, तब भी भारी संख्या में नागरिक मारे गए थे. ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, उस संघर्ष के दौरान भी हजारों नागरिक हताहत हुए थे और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा था.
निशाने पर खामेनेई और ईरानी लीडरशिप
ईरान के शासन को अस्थिर करने के उद्देश्य से इज़रायली वायु सेना ने शनिवार की सुबह पूरे ईरान में कई हवाई हमले किए. एक्सियोस के बराक रविड की रिपोर्ट के अनुसार, इज़रायली और अमेरिकी अधिकारियों ने पुष्टि की है कि इन हमलों का मुख्य लक्ष्य सुप्रीम लीडर अली खामेनेई और अन्य वरिष्ठ राजनीतिक और सैन्य नेताओं की हत्या करना था.
एक इज़रायली अधिकारी ने बताया, “इस अभियान का लक्ष्य ईरानी शासन के पतन के लिए सभी आवश्यक परिस्थितियां पैदा करना है, लेकिन आगे का घटनाक्रम इस बात पर निर्भर करेगा कि ईरानी जनता किस हद तक विद्रोह करती है.” इज़रायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) के एक अधिकारी के मुताबिक, तीन स्थानों पर जहां ईरानी शासन की बैठकें हो रही थीं, वहां एक साथ हमला किया गया. दावा किया जा रहा है कि अभियान के प्रबंधन और शासन के संचालन के लिए महत्वपूर्ण कई वरिष्ठ हस्तियों को खत्म कर दिया गया है.
इज़रायली अधिकारियों का कहना है कि वे ईरान के पूरे नेतृत्व—राजनीतिक और सैन्य, भूतपूर्व, वर्तमान और भविष्य—को निशाना बना रहे हैं. अधिकारियों ने बताया कि राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर मोहम्मद पाकपुर, ईरानी रक्षा मंत्री अमीर नसीरज़ादेह, और पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद भी उनके रडार पर थे. इज़रायली खुफिया आकलन के अनुसार, पाकपुर और नसीरज़ादेह के मारे जाने की संभावना है, जबकि खामेनेई के बेटे हमलों में बच गए बताए जा रहे हैं.
हालांकि, स्थिति अभी पूरी तरह साफ नहीं है. इज़रायली अधिकारी अभी भी यह आकलन करने में जुटे हैं कि कौन से ईरानी नेता मारे गए हैं. वहीं, ईरानी अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि उनके कई शीर्ष अधिकारियों को निशाना बनाया गया है.
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक वीडियो संदेश में कहा, “हमारी संयुक्त कार्रवाई बहादुर ईरानी लोगों के लिए अपनी किस्मत अपने हाथों में लेने की स्थिति पैदा करेगी. वह समय आ गया है जब ईरान के लोग अत्याचार के जुए को उतार फेंकें.”
‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और ट्रम्प का अल्टीमेटम
अमेरिका और इज़रायल ने ईरान के सैन्य ढांचे को नष्ट करने और सत्ता परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिए रातों-रात “बड़े पैमाने पर युद्ध अभियान” शुरू कर दिया. एक्सियोस के हर्ब स्क्रिबर्नर की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रम्प ने फ्लोरिडा के मार-ए-लागो से जारी एक वीडियो बयान में इसकी घोषणा की. पेंटागन ने इस हमले को ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम दिया है, जबकि इज़रायल ने इसे ‘लायन्स रोर’ कहा है.
यह हमला ठीक उसी समय शुरू हुआ जब ट्रम्प द्वारा ईरान को परमाणु समझौते के लिए दी गई 10 दिनों की समय सीमा समाप्त हुई. सुबह 2:30 बजे (ET) जारी अपने वीडियो में, ट्रम्प ने ईरान पर 1979 की क्रांति के बाद से “सामूहिक आतंक” फैलाने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, “हम अब इसे और बर्दाश्त नहीं करेंगे. हम उनकी मिसाइलों को नष्ट कर देंगे और उनके मिसाइल उद्योग को ज़मींदोज़ कर देंगे... हम यह सुनिश्चित करेंगे कि ईरान परमाणु हथियार हासिल न कर सके.”
ट्रम्प ने ईरानी जनता को सीधे संबोधित करते हुए कहा, “जब हम अपना काम खत्म कर लेंगे, तो अपनी सरकार को अपने कब्ज़े में ले लें, यह आपकी होगी. यह शायद पीढ़ियों में आपका एकमात्र मौका होगा.”
ट्रम्प प्रशासन का मानना है कि पिछले साल के हमलों और जनवरी में हुए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के बाद ईरानी शासन कमज़ोर पड़ गया है. इज़रायल लगातार एक व्यापक ऑपरेशन के लिए दबाव बना रहा था. ट्रम्प के सलाहकारों ने चेतावनी दी थी कि यह संघर्ष लंबा खिंच सकता है, लेकिन ट्रम्प ने स्पष्ट किया था कि अगर कूटनीति विफल रही, तो वे सैन्य बल का प्रयोग करेंगे.
ईरान ने भी तुरंत जवाबी कार्रवाई की है. ईरानी स्टेट टीवी ने पुष्टि की है कि ईरान ने कतर, बहरीन, कुवैत और यूएई में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागी हैं. वहीं, ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल-बुसैदी ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि सक्रिय और गंभीर वार्ता को फिर से कमजोर कर दिया गया है.
अमेरिका के भीतर ट्रंप का विरोध ‘यह कांग्रेस की मंज़ूरी के बिना छेड़ा गया युद्ध है’
ईरान पर हुए इस भीषण हमले ने वॉशिंगटन में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है. पॉलिटिको की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रम्प के आलोचकों ने इसे “असंवैधानिक युद्ध” करार दिया है. रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ये हमले “कांग्रेस द्वारा अनधिकृत युद्ध कृत्य” हैं.
डेमोक्रेट सीनेटर रूबेन गैलेगो ने हमले की निंदा करते हुए कहा, “हम अपने सैनिकों को मरने के लिए भेजे बिना भी ईरानी लोकतंत्र आंदोलन का समर्थन कर सकते हैं.” वहीं, सीनेटर टिम केन ने मांग की है कि हर सीनेटर को इस “खतरनाक और मूर्खतापूर्ण कार्रवाई” पर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए. सीनेट माइनॉरिटी लीडर चक शूमर ने कहा कि प्रशासन ने कांग्रेस को खतरे की तात्कालिकता के बारे में महत्वपूर्ण विवरण नहीं दिए हैं.
दूसरी ओर, रिपब्लिकन ‘हॉक्स’ (युद्ध समर्थक) ने इस कदम का स्वागत किया है. ट्रम्प के करीबी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने ‘X’ पर लिखा, “आतंकवाद के सबसे बड़े प्रायोजक का अंत हमारे सामने है... यह ऑपरेशन आवश्यक और लंबे समय से उचित था.” सीनेट आर्म्ड सर्विसेज कमिटी के चेयरमैन रोजर विकर ने इसे अमेरिकियों की सुरक्षा के लिए एक “निर्णायक और आवश्यक ऑपरेशन” बताया.
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट के अनुसार, हमलों से पहले विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ‘गैंग ऑफ एट’ (संसद के शीर्ष 8 नेता) के सात सदस्यों को जानकारी दी थी, लेकिन हाउस माइनॉरिटी लीडर हकीम जेफरीज से संपर्क नहीं हो पाया था.
इस हमले के बाद क्षेत्र में तनाव चरम पर है. पॉलिटिको के विश्लेषण के अनुसार, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या खामेनेई मारे गए हैं या नहीं. यदि खामेनेई की मृत्यु होती है, तो सत्ता का हस्तांतरण कैसे होगा, यह एक बड़ा सवाल है. साथ ही, सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देश चिंतित हैं कि ईरान अपने प्रॉक्सी गुटों (हिज़बुल्लाह, हूतियों) के माध्यम से उन पर और भीषण हमले कर सकता है, जिससे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका लग सकता है.
अलजज़ीरा के अनुसार, ईरान की फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी ने दावा किया है कि राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान, संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर क़ालिबफ़ और सुरक्षा प्रमुख अली अर्दशिर लारीजानी सहित वरिष्ठ अधिकारी “पूर्ण रूप से स्वस्थ” हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि इज़राइली स्रोतों द्वारा शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाने के दावों के बावजूद, देश के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार सभी वरिष्ठ अधिकारी सुरक्षित हैं. इस बीच, दक्षिणी ईरान के होर्मोज़गान प्रांत के मिनाब शहर में एक लड़कियों के प्राथमिक विद्यालय पर हमले की खबर सामने आई। अल जज़ीरा के अनुसार, पहले पाँच मौतों की सूचना थी, लेकिन बाद में फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी के हवाले से बताया गया कि मरने वाले छात्रों की संख्या बढ़कर 85 हो गई है.
कई खाड़ी देशों ने हवाई क्षेत्र बंद कर दिए हैं. अंतरराष्ट्रीय एयरलाइनों ने उड़ानें रद्द कीं. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, एयर इंडिया ने दिल्ली-तेल अवीव उड़ान को मुंबई मोड़ दिया और भारत ने अपने नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह दी. इसी दौरान ईरान में इंटरनेट कनेक्टिविटी गंभीर रूप से बाधित हो गई और नेटब्लॉक्स के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर कनेक्टिविटी बहुत कम हो गई.
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की स्थिति को लेकर अनिश्चितता, विरोधाभासी दा
फाइनेंसशयल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की स्थिति को लेकर फिलहाल स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है. ऐसे समय में जब ईरान खाड़ी क्षेत्र के देशों के ख़िलाफ़ व्यापक जवाबी कार्रवाई में लगा है, इज़राइल ने दावा किया है कि अमेरिका-इज़राइल के संयुक्त हमलों में उनके मारे जाने के “संकेत बढ़ रहे हैं.” वहीं ईरानी सरकार ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि खामेनेई जीवित हैं.
अब तक किसी भी पक्ष की ओर से कोई ठोस और स्वतंत्र रूप से सत्यापित सबूत सामने नहीं आया है. स्वयं खामेनेई की ओर से भी कोई सार्वजनिक बयान जारी नहीं हुआ है, जिससे स्थिति और अधिक अस्पष्ट बनी हुई है.
इज़राइल के चैनल 12 ने अनाम इज़रायली सूत्रों के हवाले से कहा कि सरकार यह “आकलन” कर रही है कि शनिवार को हुए एक हमले में खामेनेई की मृत्यु हो सकती है. इसी चैनल ने पहले यह खबर दी थी कि वह “कम से कम घायल” हुए हैं, और बाद में दावा किया कि उनकी मौत हो गई है. इज़राइल के सरकारी प्रसारक ‘कान’ ने भी रिपोर्ट किया कि खामेनेई से “कोई संपर्क नहीं” है और उनकी स्थिति अज्ञात है.
दूसरी ओर, ईरान ने इन खबरों को सिरे से खारिज किया है. सरकारी समाचार एजेंसी IRNA ने राष्ट्रपति कार्यालय के करीबी सूत्र के हवाले से कहा कि खामेनेई और राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन दोनों “स्वस्थ” हैं. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने NBC को दिए इंटरव्यू में कहा कि “मेरी जानकारी के अनुसार” खामेनेई जीवित हैं. इसके अलावा ईरान के अल-आलम टीवी ने दावा किया है कि खामेनेई जल्द ही राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं.
हमलों से पहले सुरक्षित स्थान पर ले जाए गए थे?
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में एक ईरानी अधिकारी के हवाले से कहा गया कि हमलों से पहले खामेनेई को एक “सुरक्षित स्थान” पर स्थानांतरित कर दिया गया था.वहीं ‘ईरान इंटरनेशनल’ की रिपोर्ट के अनुसार, उनके तीसरे बेटे मसूद खामेनेई ने दैनिक प्रशासनिक ज़िम्मेदारियाँ संभाल ली हैं और वे सरकार की विभिन्न शाखाओं के साथ संपर्क का मुख्य माध्यम बने हुए हैं. विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम एहतियाती अधिकार सौंपने का संकेत भी हो सकता है, या फिर स्थिति कहीं अधिक गंभीर हो सकती है.
एक विश्लेषक ने कहा कि यदि वास्तव में सुप्रीम लीडर की मौत हुई है, तो इस्लामिक गणराज्य ईरान में तुरंत उत्तराधिकार संकट खड़ा हो सकता है. खामेनेई के पास सेना, सरकार और न्यायपालिका पर अंतिम संवैधानिक अधिकार है. ऐसे में उनकी अनुपस्थिति देश की राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकती है.
फिलहाल, स्थिति को लेकर भ्रम बना हुआ है और आधिकारिक पुष्टि का इंतज़ार किया जा रहा है.
अमेरिका-इज़राइल हमले के बाद यूएई पर ईरान की जवाबी कार्रवाई, दुबई एयरपोर्ट बंद, पाम जुमेराह में आग
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ शनिवार को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर बड़े हमले के बाद तेहरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए मध्य पूर्व में अमेरिका के सहयोगी देशों को निशाना बनाया. संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पर ईरान की मिसाइलों की तीसरी लहर दागी गई. हमलों के बीच दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट (DXB) और दुबई वर्ल्ड सेंट्रल, अल मकतूम इंटरनेशनल एयरपोर्ट (DWC) पर उड़ान संचालन रोक दिया गया. रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि लगातार हो रहे हमलों के बीच दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा को एहतियात के तौर पर खाली कराया गया.
यूएई के रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि देश की वायु रक्षा प्रणाली ने शनिवार को देश की ओर दागी गई ईरानी मिसाइलों और ड्रोन को हवा में ही रोक दिया. मंत्रालय के अनुसार, नष्ट की गई मिसाइलों और ड्रोन का मलबा अबू धाबी और दुबई के कई इलाकों में गिरा. हालांकि किसी के घायल होने की सूचना नहीं है, जैसा कि गल्फ न्यूज ने बताया. इस बीच, पाम जुमेराह इलाके की एक इमारत में आग लगने की पुष्टि हुई. दुबई सिविल डिफेंस ने कहा कि आग पर काबू पा लिया गया है. इस घटना में चार लोग घायल हुए हैं, जिन्हें चिकित्सा सुविधाओं में भर्ती कराया गया है। हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है.
दक्षिण लेबनान में इज़रायली हवाई हमले
अल जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक़ इज़राइल ने दक्षिण लेबनान के इक़लीम अल-तुफ्फाह क्षेत्र में ब्लात और वादी बरघौती इलाकों पर कई हवाई हमले किए. यह हमले नवंबर 2024 में इज़राइल और लेबनान के सशस्त्र समूह हिज़्बुल्लाह के बीच हुए सीज़फायर के बाद भी जारी हैं, जो समझौते का उल्लंघन माने जा रहे हैं.
इज़रायली सेना ने कहा कि वह दक्षिण लेबनान में हिज़्बुल्लाह के ठिकानों और ढांचे को निशाना बना रही है. हालांकि, स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, इन लगभग रोज़ाना हो रहे हमलों में नागरिक और नागरिक ढांचे भी प्रभावित हुए हैं. अभी तक किसी के हताहत होने की खबर नहीं है. ज़्यादातर हमले जंगलों और पहाड़ी खुले इलाकों में किए गए.
लेबनान के अल-मयादीन चैनल ने पुष्टि की कि इज़राइली विमानों ने अल-तुफ्फाह की ऊंचाइयों पर कई हमले किए. वहीं हिज़्बुल्लाह के अल-मनार टीवी ने बताया कि इज़रायली “क्वाडकॉप्टर” ड्रोन ने तीसरी बार मरकबा कस्बे में विस्फोटक गिराए.
नवंबर 2024 में हुए संघर्षविराम का मकसद एक साल से अधिक समय से चल रही लड़ाई को खत्म करना था. इसके बावजूद इज़रायली सेना लेबनान में हमले करती रही है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, तब से अब तक 300 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें 127 नागरिक शामिल हैं. इज़राइल ने अक्टूबर 2023 में लेबनान के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू किया था, जो सितंबर 2024 में पूर्ण युद्ध में बदल गया. इस दौरान 4,000 से अधिक लोग मारे गए और लगभग 17,000 लोग घायल हुए.
हमलों के बीच मोदी की इज़राइल यात्रा ने खड़े किए कूटनीतिक सवाल
फ्रंटलाइन के लिए इफ़्तेख़ार गिलानी लिखते हैं कि में 25 फरवरी की शाम, रमज़ान के इस महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इज़राइल का दौरा किया. इज़राइली संसद नेसेट में भाषण भी दिया. नेसेट से करीब एक किलोमीटर दूर हेरोद गेट के पास स्थित जविया अल-हिंदिया में रहने वाला अंसारी परिवार उनकी यात्रा पर नज़र रखे हुए था. यह ऐतिहासिक स्थल 12वीं–13वीं सदी के सूफी संत बाबा फरीद गंज शकर से जुड़ा माना जाता है. 1995 में भारत- इज़राइल के पूर्ण राजनयिक संबंध बनने के बाद से अधिकांश भारतीय मंत्री यहां जाते रहे हैं, लेकिन इस बार मोदी वहां नहीं गए. उन्होंने याद वशेम होलोकॉस्ट संग्रहालय का दौरा किया और इज़राइली टीवी सीरीज़ ‘फौदा’ से जुड़े लोगों से भी मुलाकात की.
पश्चिम एशिया के कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि इस यात्रा से इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन का संदेश मिला. गाज़ा में लंबे सैन्य अभियान के कारण इज़राइल पर वैश्विक दबाव है और बहुत कम शीर्ष नेता हाल के वर्षों में वहां गए हैं. मोदी के भारत लौटने के एक दिन बाद ही इज़राइल ने अमेरिका के समर्थन से ईरान पर मिसाइल हमले किए. इस घटनाक्रम ने भारत की संतुलन नीति पर नए सवाल खड़े कर दिए, क्योंकि भारत के ईरान के साथ भी पुराने रणनीतिक और ऊर्जा संबंध रहे हैं.
नेसेट में अपने भाषण में मोदी ने गाज़ा शांति पहल का समर्थन किया और कहा कि स्थायी शांति के लिए फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान ज़रूरी है. हालांकि कई फिलिस्तीनी नेताओं और कुछ इज़रायली विश्लेषकों ने इस यात्रा को समय से पहले बताया. उनका कहना था कि गाज़ा में संर्षविराम स्थिर होने और क्षेत्रीय तनाव कम होने के बाद यात्रा अधिक संतुलित संदेश देती.
यात्रा के दौरान भारत और इज़राइल ने संबंधों को “विशेष रणनीतिक साझेदारी” का दर्जा दिया और रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कृषि, शिक्षा और निवेश सहित 16 समझौतों पर हस्ताक्षर किए. दोनों देशों ने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत तेज करने, साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने और 50,000 अतिरिक्त भारतीय कामगारों को अगले पांच वर्षों में इज़राइल भेजने पर सहमति जताई. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार 2014 से 2024 के बीच इज़राइल के हथियार निर्यात का 38 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भारत को गया. 2022-23 में द्विपक्षीय व्यापार 10.7 अरब डॉलर था, जो 2024-25 में घटकर 3.6 अरब डॉलर रह गया.
विश्लेषकों का मानना है कि इज़राइल के साथ बढ़ती साझेदारी भारत के लिए अवसर और चुनौती दोनों है. एक ओर रक्षा और तकनीक सहयोग मज़बूत हो रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ संतुलन बनाए रखना जटिल हो सकता है. ईरान पर हालिया हमलों के बीच यह यात्रा भारत की पश्चिम एशिया नीति को नए परिप्रेक्ष्य में ला खड़ा करती है, जहां कूटनीतिक संतुलन और रणनीतिक हितों के बीच तालमेल बनाना पहले से अधिक कठिन दिख रहा है.
जलालाबाद में पाकिस्तानी लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त, पायलट बंदी: अफगान सेना
अफगान सेना और पुलिस ने शनिवार को बताया कि जलालाबाद शहर में एक पाकिस्तानी लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया है और उसके पायलट को जिंदा पकड़ लिया गया है. वहीं, स्थानीय निवासियों ने ‘एएफपी’ को बताया कि पकड़े जाने से पहले वह व्यक्ति विमान से पैराशूट के जरिए नीचे कूदा था.
पूर्वी अफगानिस्तान में सेना के प्रवक्ता वहीदुल्ला मोहम्मदी ने पुष्टि की कि अफगान बलों द्वारा पाकिस्तानी विमान को गिराया गया “और पायलट को जीवित पकड़ लिया गया है.” हालांकि, इस बारे में पाकिस्तान की सेना और सूचना मंत्रालय ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया है. पाकिस्तान ने शुक्रवार को अफगान राजधानी काबुल और दक्षिणी कंधार पर हवाई हमले किए थे, जहाँ सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा का ठिकाना है.
पाकिस्तान बहुत शानदार काम कर रहा है, उसके पास बेहतरीन पीएम और शानदार जनरल है : ट्रंप
इस बीच ‘टीएनआईई’ के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान, वहां के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की प्रशंसा की, जबकि सीमा पार हमलों के बाद इस्लामाबाद और काबुल के बीच तनाव चरम पर है. यह पूछे जाने पर कि क्या वे चल रहे संघर्ष को रोकने के लिए हस्तक्षेप करेंगे, ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा, “पाकिस्तान के साथ मेरे संबंध बहुत अच्छे हैं, बहुत-बहुत अच्छे. उनके पास एक बेहतरीन प्रधानमंत्री हैं, एक शानदार जनरल हैं, और वे दो ऐसे लोग हैं जिनका मैं वास्तव में बहुत सम्मान करता हूँ. पाकिस्तान बहुत शानदार काम कर रहा है.”
ये टिप्पणियाँ तब आईं जब पाकिस्तान ने काबुल, कंधार और पक्तिया में तालिबान-नियंत्रित शहरों को निशाना बनाकर हवाई हमले किए और इस स्थिति को सीमा पार कथित रूप से शरण पाए हुए आतंकवादियों के खिलाफ एक “खुले युद्ध” के रूप में वर्णित किया.
उधर, ‘रॉयटर्स’ के अनुसार, अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा, “संयुक्त राज्य अमेरिका एक ‘विशेष रूप से नामित वैश्विक आतंकवादी’ समूह, तालिबान के हमलों के खिलाफ पाकिस्तान के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन करता है.”
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि वाशिंगटन तनाव में वृद्धि और “पाकिस्तान व अफगान तालिबान के बीच छिड़ी लड़ाई” से अवगत है, साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि अमेरिका “जान-माल के नुकसान से दुखी है.” स्टेट डिपार्टमेंट ने कहा, “अफगानिस्तान आतंकवाद विरोधी अपनी प्रतिबद्धताओं को निभाने में लगातार विफल रहा है. आतंकवादी समूह अफगानिस्तान का उपयोग अपने जघन्य हमलों के लिए लॉन्चिंग पैड के रूप में कर रहे हैं.
डांस बार वीडियो ने पहाड़ों में बढ़ाई राजनीतिक तपिश, उत्तराखंड में भाजपा नेता नए विवाद के घेरे में
पीयूष श्रीवास्तव की रिपोर्ट के अनुसार, खानपुर के पूर्व भाजपा विधायक प्रणव सिंह चैंपियन ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया है, जिसमें वे एक बार में सोफे पर बैठे और एक महिला डांसर पर पैसे लुटाते हुए दिखाई दे रहे हैं.
दो दशक पुराने इस वीडियो, जिसमें उत्तराखंड के कुछ दिग्गज राजनेता कथित तौर पर मुंबई के एक डांस बार में मौज-मस्ती करते दिख रहे हैं, ने इस पहाड़ी राज्य में कीचड़ उछालने की राजनीति शुरू कर दी है और भाजपा के भीतर दरार के दावों को भी हवा दे दी है.
प्रणव सिंह चैंपियन, जो खानपुर के पूर्व भाजपा विधायक हैं और पहले कांग्रेस में थे, ने इस वीडियो को सोशल मीडिया पर साझा किया. वीडियो में वे एक बार के सोफे पर बैठकर एक महिला डांसर पर नोट उड़ाते देखे जा सकते हैं. चैंपियन का दावा है कि कांग्रेस विधायक गणेश गोदियाल (जिनसे मिलता-जुलता एक व्यक्ति क्लिप में दिख रहा है) ने 2003 में मुंबई में इस पार्टी का आयोजन किया था.
जल्द ही, गोदियाल ने यह इशारा किया कि उत्तराखंड भाजपा के अध्यक्ष महेन्द्र भट्ट भी इस वीडियो में नज़र आ रहे हैं. शुक्रवार को जैसे ही विवाद गहराया, भाजपा सूत्रों ने कहा कि चैंपियन ने जानबूझकर भट्ट को शरारतपूर्ण तरीके से निशाना बनाने के लिए यह पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है.
चैंपियन ने कहा कि यह वीडियो तब रिकॉर्ड किया गया था जब 2003 में कांग्रेस और भाजपा नेता महाराष्ट्र चुनाव में अपनी पार्टियों के प्रचार के लिए मुंबई गए थे. चैंपियन ने एक वीडियो संदेश में कहा, “पार्टी में कांग्रेस और भाजपा के कुछ नेता थे, जिनमें हमारे वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष (भट्ट) भी शामिल थे. लेकिन मैं अपने भाई गोदियाल की याददाश्त ताज़ा करना चाहूँगा कि तब मैं एक निर्दलीय विधायक था और बाद में कांग्रेस में शामिल हुआ था. आप (गोदियाल) हमें नवी मुंबई के एक डांस बार में ले गए थे और हमारे लिए शो का आयोजन किया था.”
उन्होंने आगे जोड़ा, “हरक सिंह रावत (उस समय लैंसडाउन के कांग्रेस विधायक) ने भी बार गर्ल्स के साथ डांस किया था. मैं एक पहलवान हूँ और मुझे डांस करना नहीं आता. मैं डांस को उसी तरह देख रहा था जैसे (अभिनेता) धर्मेंद्र अपनी फिल्मों में देखते थे. आप (गोदियाल) पर शर्म आती है.”
चैंपियन ने कहा, “आपने (गोदियाल) ऐसा इसलिए किया, क्योंकि मैं अब भाजपा में हूँ. मैं आपको अपनी भाषा सुधारने की चेतावनी देता हूँ, वरना मैं सबको बेनकाब कर दूँगा.”
इस पूरे घटनाक्रम को हँसकर टालते हुए भट्ट ने कहा: “मैं ऐसी चीजों में नहीं पड़ता और अपने आलोचकों के झूठ का जवाब नहीं देता. मैं इस पर एक शब्द भी नहीं बोलना चाहता.”
वहीं रावत ने कहा: “मैं चैंपियन से दूर रहना चाहूँगा क्योंकि मैं उस गंदगी में डुबकी नहीं लगाना चाहता जिसमें वह रहते हैं.” गोदियाल ने कहा कि वह रात के खाने के बाद घर लौट आए थे, और साथ ही जोड़ा कि उन्हें भट्ट के नाचने में “कुछ भी गलत” नहीं लगा.
क्या भारतीय वायुसेना का दम फूल रहा है?
‘फ्रंटलाइन’ में मुक़्तेदार खान की रिपोर्ट है कि तेजस बेड़े की उड़ानों पर रोक और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के सबक ने भारत की रक्षा मुद्रा के केंद्र में मौजूद एक संरचनात्मक कमजोरी को उजागर कर दिया है—एक ऐसी कमजोरी जिसे केवल भारी खरीदारी या खरीद-फरोख्त के जरिए जल्दी ठीक नहीं किया जा सकता.
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय वायुसेना एक गंभीर और तात्कालिक संकट का सामना कर रही है. 7 फरवरी को वायुसेना के अग्रिम पंक्ति के एक हवाई अड्डे पर इसके स्वदेशी लड़ाकू विमान, तेजस Mk1, के साथ दुर्घटना हुई, जब प्रशिक्षण उड़ान के दौरान विमान रनवे से आगे निकल गया. पायलट सुरक्षित बाहर निकल गया, लेकिन विमान का ढांचा इतना गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया कि उसे ‘राइट-ऑफ’ (काम के लायक नहीं) माना जा रहा है. हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने इस घटना को “जमीन पर एक मामूली तकनीकी घटना” बताया—यह शब्दावली बेहद सावधानी से चुनी गई थी, ताकि इसे आधिकारिक ‘क्रैश’ से अलग रखा जा सके. शब्दावली चाहे जो भी हो, इसके परिचालन परिणाम काफी महत्वपूर्ण रहे हैं: वायुसेना ने जांच लंबित रहने तक अपने लगभग 30 तेजस Mk1 विमानों की उड़ान पर रोक लगा दी है. यह उस बल के लिए एक बड़ा झटका है जो पहले से ही अपनी स्वीकृत क्षमता से काफी नीचे काम कर रहा है.
वायुसेना के अपने आकलन के अनुसार, उसे वर्तमान रक्षा आकस्मिकताओं से निपटने के लिए, विशेष रूप से पाकिस्तान और चीन से ‘दो-मोर्चों’ की चुनौती की संभावना को देखते हुए, कम से कम 42 स्क्वाड्रन की आवश्यकता है. सितंबर 2025 में अपने अंतिम मिग-21 स्क्वाड्रनों की सेवानिवृत्ति के बाद, वायुसेना के पास केवल 29 स्क्वाड्रन शेष हैं—यानी 13 स्क्वाड्रन की कमी है. यह घाटा लगभग 200 लड़ाकू विमानों के बराबर है. पूरे तेजस बेड़े के खड़े (ग्राउंडेड) होने के साथ, भारत के पास प्रभावी रूप से दो अतिरिक्त स्क्वाड्रनों की कमी हो गई है, जिससे यह पहले से ही नाजुक अंतर और गहरा गया है.
इस संकट को भारत के हालिया सैन्य अनुभव के व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए. पाकिस्तान के खिलाफ भारत का ‘ऑपरेशन सिंदूर’ देश की रक्षा क्षमताओं के आकलन के नजरिए में एक निर्णायक मोड़ बन गया. इससे पहले, भारत को व्यापक रूप से एक उभरती हुई शक्ति के रूप में देखा जाता था, जिसकी क्षमताएं समय के साथ चीन की बराबरी कर सकती थीं, और उसे क्वाड ढांचे के भीतर अमेरिका की ‘इंडो-पैसिफिक रणनीति’ के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में देखा जाता था. भारत को तेजी से एक ऐसे सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय शक्ति के रूप में माना जा रहा था, जो चीन के उदय को संतुलित करने में सक्षम है. लेकिन इस संघर्ष के बाद रणनीतिक विश्लेषक अब भारत की वायु शक्ति की सीमाओं पर सवाल उठा रहे हैं.
यह रिपोर्ट राफेल विमानों की कमी और नए विमानों की खरीद में होने वाली देरी पर भी चर्चा करती है. कहा गया है कि राफेल के आने से जो ‘गैप’ भरा जाना था, वह अभी भी बना हुआ है. केवल विमानों की खरीद से इस समस्या का समाधान नहीं होगा, क्योंकि वायुसेना की चुनौतियाँ अब संरचनात्मक हो चुकी हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की “आत्मनिर्भर भारत” पहल और स्वदेशी तकनीक (तेजस) को अभी भी परिपक्व होने में समय लगेगा. तब तक, वायुसेना को एक ऐसी कठिन स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, जहाँ उसे पुराने विमानों को रिटायर करना पड़ रहा है और नए विमानों की आपूर्ति में देरी हो रही है. यह स्थिति भारत की क्षेत्रीय शक्ति और ‘क्वाड’ के भीतर उसके प्रभाव को भी प्रभावित कर सकती है.
एलोन मस्क ने यूक्रेन में रूसियों के खिलाफ कदम उठाए, लेकिन असली चिंता कुछ और है
“द अटलांटिक” में साइमन शूस्टर ने लिखा है कि यूक्रेन और रूस के बीच जारी युद्ध में एलोन मस्क और उनकी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक एक निर्णायक कारक बन गए हैं. स्टारलिंक दुनिया का सबसे बड़ा उपग्रह नेटवर्क है, जो युद्ध क्षेत्र में हाई-स्पीड इंटरनेट प्रदान करता है. इसके बिना न तो ड्रोन संचालित किए जा सकते हैं और न ही सेनाओं के बीच समन्वय संभव है.
हाल के कुछ घटनाक्रमों के आधार पर साइमन अपनी लंबी रिपोर्ट में बताते हैं कि मस्क का ‘हृदय परिवर्तन’ हो गया है. पिछले महीने कीव के सरकारी जिले में एक रूसी ड्रोन (BM-35) घुसने के बाद, यूक्रेन ने सीधे मस्क से मदद की अपील की. यूक्रेन के रक्षा मंत्री मायखाइलो फेडोरोव ने सबूत पेश किए कि रूसी सेना भी स्टारलिंक का उपयोग कर अपने ड्रोन चला रही है. इसके जवाब में, मस्क ने एक बड़ा राजनीतिक निर्णय लिया और ‘व्हाइटलिस्ट’ सिस्टम लागू किया. इसके तहत केवल स्वीकृत यूक्रेनी उपयोगकर्ताओं को ही सेवा दी गई और रूसियों की पहुंच बंद कर दी गई.
मस्क के इस कदम से रूसी सेना की संचार व्यवस्था चरमरा गई है. रूसी संवाददाताओं ने स्वीकार किया है कि स्टारलिंक उनकी ‘कमजोर नस’ बन गया है. इस तकनीकी बढ़त का लाभ उठाते हुए, यूक्रेनी सेना ने फरवरी 2026 के शुरुआती हफ्तों में 400 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को मुक्त करा लिया है. राष्ट्रपति जेलेंस्की ने माना है कि रूसियों को हो रही संचार समस्या का उनकी सेना भरपूर फायदा उठा रही है.
शूस्टर लिखते हैं कि मस्क की सहायता के बावजूद, यूक्रेन और यूरोपीय देश एक निजी व्यक्ति पर अपनी सुरक्षा के लिए इस कदर निर्भर होने से चिंतित भी हैं. 2022 में मस्क ने क्रीमिया के पास यूक्रेनी नौसैनिकों का स्टारलिंक कनेक्शन काट दिया था, जिससे रूसी बेड़े पर होने वाला एक बड़ा हमला विफल हो गया था. मस्क का तर्क था कि वह युद्ध को परमाणु स्तर तक बढ़ने से रोकना चाहते थे. जर्मनी की ‘राइनमेटाल’ जैसी कंपनियां अब स्टारलिंक का विकल्प खोजने में जुटी हैं, क्योंकि उनका मानना है कि मस्क पर निर्भरता एक रणनीतिक जोखिम है.
युद्ध में स्टारलिंक की भूमिका को लेकर तनाव केवल मस्क बनाम रूस तक सीमित नहीं है. अमेरिकी राजनीति, विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रम्प के प्रभाव और यूक्रेन को मिलने वाली सहायता में कटौती की धमकियों ने भी स्टारलिंक की उपलब्धता को अनिश्चित बनाया है. हालाँकि, वर्तमान में मस्क ने यूक्रेन को पूरा सहयोग देने का वादा किया है, जिससे कीव को बड़ी राहत मिली है.
कुलमिलाकर, एलोन मस्क अपनी कंपनी स्पेसएक्स के मुख्यालय से बैठकर युद्ध का पलड़ा किसी भी दिशा में झुकाने की शक्ति रखते हैं. यूक्रेन के लिए स्टारलिंक एक अपरिहार्य हथियार है, लेकिन इसका “स्विच” एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में है जिसके निर्णय अनिश्चित और व्यक्तिगत विचारधारा से प्रेरित हो सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी के संदर्भ में अपनी गरिमा की रक्षा की, लेकिन असुरक्षित समुदायों का क्या?
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई.कुरैशी ने “द इंडियन एक्सप्रेस” में लिखा है कि एक लोकतंत्र चयनात्मक सतर्कता का जोखिम नहीं उठा सकता. यदि कानून संस्थाओं के अपमान पर तुरंत कार्रवाई करता है, लेकिन समुदायों के साथ रूढ़िवादी या अपमानजनक व्यवहार पर हिचकिचाता है, तो यह अनजाने में चिंता की एक असमान श्रेणी बना सकता है. वह लिखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का हालिया “सुओ मोटू” (स्वतः स्फूर्त) हस्तक्षेप, जिसमें एनसीईआरटी की एक पाठ्यपुस्तक में कथित रूप से न्यायिक भ्रष्टाचार का चित्रण किया गया था, संस्थागत जिम्मेदारी का स्वागतयोग्य और समयोचित दावा है. त्वरित और निर्णायक कार्रवाई करके, इसने एक बुनियादी सिद्धांत को पुनः स्थापित किया है: कि सार्वजनिक संस्थाओं, विशेषकर वे जो संवैधानिक अधिकार से संपन्न हैं, को आकस्मिक या जानबूझकर किए गए अपमान से बचाया जाना चाहिए — खासकर उस शैक्षिक सामग्री में जो युवा मस्तिष्कों को आकार देती है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने संकेत दिया है कि प्रतिष्ठा को होने वाला नुकसान, यदि सामान्यीकृत हो जाए, तो सार्वजनिक विश्वास को ऐसे तरीकों से कमजोर कर सकता है, जिन्हें आसानी से उलटा नहीं जा सकता. संस्थाओं का अधिकार केवल कानूनी आदेश पर ही नहीं, बल्कि जनविश्वास पर भी टिका होता है; एक बार जब यह व्यवस्थित रूप से कमजोर हो जाता है, तो संवैधानिक शासन स्वयं टूटने लगता है.
हालाँकि, यह हस्तक्षेप एक बड़े संवैधानिक प्रश्न को खोलता है. यदि संस्थाओं की गरिमा को गलत चित्रण से बचाया जाना चाहिए, तो क्या वही सिद्धांत आवश्यक रूप से उन समुदायों की गरिमा पर भी लागू होता है, जो गणराज्य की संरचना का हिस्सा हैं? संविधान गरिमा की कोई श्रेणी नहीं मानता. इसकी गारंटियाँ इस आधार पर संरचित हैं कि व्यक्तियों, समूहों
और संस्थाओं के प्रति सम्मान परस्पर सुदृढ़ करने वाला है, न कि परस्पर विरोधी.
कुरैशी का कहना है कि कोर्ट ने अपनी संस्थागत छवि और गरिमा को बनाए रखने के लिए “जीरो टॉलरेंस” की नीति अपनाई. मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि बच्चों को यह सिखाना कि न्यायपालिका भ्रष्ट है, संस्था की नींव को कमजोर करना है. मगर महत्वपूर्ण सवाल ये हैं कि क्या न्यायपालिका अन्य कमज़ोर समुदायों (जैसे अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी) की गरिमा को लेकर भी उतनी ही तत्पर रहती है? अक्सर पाठ्यपुस्तकों या सार्वजनिक विमर्श में जब कुछ समुदायों को गलत तरीके से पेश किया जाता है या उन्हें ‘रूढ़िबद्ध’ किया जाता है, तो क्या कोर्ट उतनी ही तेजी से हस्तक्षेप करता है?
उनका तर्क है कि एक जीवंत लोकतंत्र में “गरिमा” केवल एक संस्था (न्यायालय) तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह हर नागरिक और हर समुदाय का संवैधानिक अधिकार है. पाठ्यपुस्तकों में सुधार और आलोचना की जगह होनी चाहिए. यदि न्यायपालिका में सुधारों की आवश्यकता या लंबित मामलों और भ्रष्टाचार की चुनौतियों पर चर्चा की जा रही थी, तो उसे पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय संतुलित किया जा सकता था.
कुलमिलाकर, कुरैशी का यह लेख सुझाव देता है कि न्यायपालिका को “चयनात्मक सतर्कता” से बचना चाहिए. जिस सक्रियता से कोर्ट ने अपनी छवि की रक्षा की, उसी प्रतिबद्धता से उसे समाज के सबसे कमज़ोर वर्गों की गरिमा और सुरक्षा के लिए भी खड़ा होना चाहिए, ताकि न्याय का संतुलन बना रहे.
हरकारा डीप डाइव : प्रोफेसर अपूर्वानंद
एनसीआरटी की किताब पर विवाद: लीपापोती से नहीं निपट सकेगा यह मामला
हरकारा डीप डाइव के ताज़ा एपिसोड में कक्षा 8 की एनसीआरटी की किताब में न्यायपालिका और भ्रष्टाचार पर लिखे एक हिस्से को लेकर उठे विवाद पर विस्तार से चर्चा हुई. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुओ मोटू संज्ञान लिया, मुख्य न्यायाधीश ने तीखी टिप्पणी की और कहा कि न्यायपालिका पर हमला हुआ है. इसके बाद केंद्र सरकार ने तेज़ी से प्रतिक्रिया दी, कैबिनेट बैठक हुई और प्रधानमंत्री ने शिक्षा मंत्री से जवाब मांगा.
चर्चा में प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि सवाल सिर्फ एक वाक्य या एक पैराग्राफ का नहीं है. असली प्रश्न यह है कि पाठ्यपुस्तक कैसे बनी, किस प्रक्रिया से बनी और उसका शैक्षणिक उद्देश्य क्या था. क्या किताब का मकसद छात्रों को न्यायपालिका की कार्यप्रणाली समझाना था या केवल भ्रष्टाचार का एक सीमित चित्र प्रस्तुत करना?
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार एक मुद्दा हो सकता है, लेकिन न्याय न मिलने के पीछे कई संस्थागत कारण होते हैं. कानूनों का स्वरूप, पुलिस की भूमिका, कार्यपालिका के फैसले और न्यायिक प्रक्रियाओं की जटिलता, इन सब पर समग्र चर्चा ज़रूरी है. यदि पाठ्यपुस्तक इन व्यापक संदर्भों को छोड़कर केवल एक पहलू पर जोर देती है, तो वह अधूरी समझ देती है.
चर्चा में पाठ्यपुस्तक लेखन की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए गए. आरोप है कि हाल के वर्षों में विशेषज्ञों की भूमिका कम हुई है और गैर-विशेषज्ञ या वैचारिक रूप से जुड़े लोगों का प्रभाव बढ़ा है. यदि ऐसा है, तो यह शिक्षा की गुणवत्ता के लिए चिंताजनक है. पाठ्यपुस्तकें किसी सरकार की छवि सुधारने या बचाव करने के लिए नहीं, बल्कि विषय की संतुलित और तथ्यपरक समझ देने के लिए होती हैं.
इतिहास, विज्ञान, गणित और भूगोल की किताबों में भी बदलावों का ज़िक्र हुआ. कहा गया कि इतिहास में चयनात्मक प्रस्तुति, विज्ञान में गौरववादी दावे और गणित में अवधारणात्मक समझ की कमी जैसी प्रवृत्तियां शिक्षा को कमज़ोर कर सकती हैं. यदि छात्र अपने सामाजिक यथार्थ और किताबों के बीच गहरा अंतर महसूस करते हैं, तो उनकी आलोचनात्मक क्षमता और भरोसा दोनों प्रभावित होते हैं.
एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी रहा कि सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी को एक अवसर में बदला जा सकता है. यदि न्यायपालिका चाहे तो वह पूरे पाठ्यपुस्तक निर्माण की प्रक्रिया की समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र समिति गठित कर सकती है. इसमें विषय विशेषज्ञ, शिक्षाविद और बाल मनोविज्ञान के जानकार शामिल हों. पारदर्शिता के साथ यह देखा जाए कि किताबें किस उद्देश्य से और किन मानकों पर लिखी जा रही हैं.
समाधान के रूप में यह सुझाव भी आया कि पाठ्यपुस्तकों में विविध दृष्टिकोण शामिल किए जाएं, छात्रों को जटिल मुद्दों पर सोचने की क्षमता दी जाए और संवैधानिक मूल्यों को केंद्र में रखा जाए. किताबों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखकर पेशेवर और शैक्षणिक मानकों के आधार पर तैयार किया जाए.
बंगाल में नई वोटर लिस्ट जारी: बांकुरा में 1.18 लाख नाम हटे, लाखों अभी भी जांच के दायरे में
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष संशोधन (SIR) के बाद चुनाव आयोग ने शनिवार से चरणों में नई वोटर लिस्ट जारी करना शुरू कर दिया. टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक़ बांकुरा जिले के आंकड़ों से पता चला है कि इस प्रक्रिया के दौरान करीब 1.18 लाख नाम हटाए गए हैं.
बांकुरा जिले में जब 4 नवंबर को SIR प्रक्रिया शुरू हुई थी, तब कुल मतदाताओं की संख्या 30,33,830 थी. 16 दिसंबर को जारी ड्राफ्ट लिस्ट में यह घटकर 29,01,009 रह गई. इसके बाद सुनवाई और जांच की अगली प्रक्रिया में करीब 4,000 और नाम हटाए गए, जबकि फॉर्म-6 के जरिए नए मतदाताओं के कुछ हज़ार आवेदन मंज़ूर किए गए. अब बांकुरा में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 29,15,000 है. यानी पूरी प्रक्रिया में करीब 1.18 लाख नाम कम हुए हैं. अधिकारियों के अनुसार, नाम हटाने की वजह मौत, दूसरे स्थान पर चले जाना, डुप्लीकेट एंट्री या व्यक्ति का पता न चल पाना रही.
राज्य स्तर पर 16 दिसंबर को जारी ड्राफ्ट लिस्ट में 7.08 करोड़ मतदाताओं के नाम थे. इससे पहले अगस्त 2025 तक राज्य में 7.66 करोड़ मतदाता दर्ज थे. पहली जांच में ही 58 लाख से ज़्यादा नाम हटाए गए थे.उत्तर कोलकाता के कुछ इलाकों में करीब 17,000 नाम स्वीकृत सूची से गायब पाए गए, जिससे राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया भी सामने आई है. करीब 60 लाख मतदाता अभी भी “विचाराधीन” श्रेणी में हैं और इनके बारे में फैसला बाद में जारी होने वाली पूरक सूचियों में होगा।
टीएमसी की मेनका गुरुस्वामी बन सकती हैं भारत की पहली LGBTQ+ सांसद
तृणमूल कांग्रेस ने आगामी राज्यसभा चुनाव के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी को उम्मीदवार घोषित किया है. यदि वह निर्वाचित होती हैं, तो वह भारत की पहली खुलकर LGBTQ+ पहचान रखने वाली सांसद बनेंगी.
मेनका गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और मानवाधिकार से जुड़े मामलों में उनकी मज़बूत पहचान है. उन्होंने 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को चुनौती देने वाले ऐतिहासिक मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था. यह फैसला भारत में LGBTQ+ अधिकारों की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ.
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद मेनका गुरुस्वामी ने अपनी साथी अधिवक्ता अरुंधति कट्जू के साथ अपने संबंध को सार्वजनिक किया. उनका यह कदम LGBTQ+ समुदाय के लिए साहस और स्वीकार्यता का प्रतीक माना गया.
पश्चिम बंगाल विधानसभा में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए टीएमसी की स्थिति मानी जा रही है. ऐसे में मेनका गुरुस्वामी का राज्यसभा पहुंचना लगभग तय माना जा रहा है.
काकीनाडा पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट, 21 मरे
आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में शनिवार को एक पटाखा फैक्ट्री में ज़ोरदार विस्फोट हुआ, जिसमें कम से कम 21 लोगों की मौत हो गई. पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह हादसा काकीनाडा जिले के समरलकोटा के वेटलापालेम गांव में स्थित ‘सूर्या फायरवर्क्स’ फैक्ट्री में दोपहर करीब 2 बजे हुआ. उस समय वहां 35–40 लोग पटाखे बनाने के लिए विस्फोटक सामग्री मिला रहे थे. मृतकों में ज़्यादातर महिलाएं बताई जा रही हैं, जबकि कम से कम छह लोग गंभीर रूप से झुलस गए हैं.
जिला कलेक्टर एस. एस. मोहन ने बताया कि शव बुरी तरह जल जाने के कारण उनकी पहचान करना मुश्किल हो रहा है. कई दमकल गाड़ियों की मदद से आग पर काबू पाया गया. पुलिस के अनुसार, सूर्या फायरवर्क्स एक बड़ी और जानी-मानी फैक्ट्री है, जहां रोजाना भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री रखी जाती है. विस्फोट की तीव्रता इतनी अधिक थी कि आसपास के गांवों में दहशत फैल गई.मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने जिला अधिकारियों से बात कर घटना की जानकारी ली और हादसे की जांच के आदेश दिए.
एक्स पर ‘कम्युनिटी नोट्स’ को लेकर विवाद, फैक्ट-चेक या संगठित दुरुपयोग?
क्या देश के गृहमंत्री, राष्ट्रपति या बड़े नेताओं के पोस्ट पर खुलेआम गालियां और अपमानजनक बातें लिखी जा सकती हैं, और उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “सत्य” की तरह दिखा सकता है? एक्स पर इन दिनों ‘कम्युनिटी नोट्स’ फीचर को लेकर ऐसा ही विवाद सामने आ रहा है.
कम्युनिटी नोट्स को मूल रूप से फेक न्यूज रोकने और पोस्ट पर संदर्भ जोड़ने के लिए बनाया गया था. अगस्त 2020 में ट्विटर ने कम्युनिटी आधारित फैक्ट-चेकिंग सिस्टम पर काम शुरू किया. जनवरी 2021 में इसे अमेरिका में “Birdwatch” नाम से पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लॉन्च किया गया. अक्टूबर 2022 में यह फीचर सभी अमेरिकी यूजर्स के लिए खोला गया. नवंबर 2022 में एलन मस्क द्वारा ट्विटर खरीदने के बाद इसका नाम बदलकर “Community Notes” कर दिया गया और इसे वैश्विक स्तर पर लागू किया गया. यह रिपोर्ट द मूकनायक से ली गई है.
हालांकि अब आरोप लग रहे हैं कि यह फीचर निष्पक्ष नहीं रह गया है. कुछ लोगों का दावा है कि खासकर UGC 2026 नियम को लेकर चल रही बहस के दौरान कम्युनिटी नोट्स का इस्तेमाल एक खास नैरेटिव फैलाने के लिए किया जा रहा है. आरोप है कि संगठित समूह मिलकर कुछ पोस्ट्स के नीचे भ्रामक या अपमानजनक नोट लिखते हैं और फिर बड़ी संख्या में उन्हें “हेल्पफुल” रेट कर देते हैं, जिससे एल्गोरिदम उन्हें सार्वजनिक रूप से दिखा देता है.
कम्युनिटी नोट्स तुरंत पब्लिक नहीं होते. किसी नोट को दिखाने के लिए सैकड़ों रेटिंग्स (लगभग 500-600) की ज़रुरत होती है. जो यूज़र कम से कम पांच ऐसे नोट्स रेट कर चुके हों जो पब्लिक हो गए हों, वे खुद नोट लिखने के पात्र बन जाते हैं. आरोप है कि कुछ समूह आपस में समन्वय करके यह पात्रता हासिल कर लेते हैं और फिर संगठित तरीके से नोट्स को प्रमोट करते हैं.
कई स्क्रीनशॉट्स में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री अमित शाह, राष्ट्रपति, भाजपा नेता निशिकांत दुबे, सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. लक्ष्मण यादव और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं और सार्वजनिक व्यक्तियों के पोस्ट पर अपमानजनक कम्युनिटी नोट लगाए गए. आलोचकों का कहना है कि यह सामान्य फैक्ट-चेकिंग नहीं, बल्कि दबाव बनाने की रणनीति हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी डिजिटल टूल को पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं माना जा सकता. अगर किसी पोस्ट पर भ्रामक या अपमानजनक कम्युनिटी नोट दिखाई देता है, तो उसे “मिसलीडिंग ” या “अब्यूसिव” के रूप में रिपोर्ट किया जा सकता है. यूजर्स “नॉट हेल्पफुल” रेटिंग देकर भी एल्गोरिदम को संकेत दे सकते हैं कि नोट उपयुक्त नहीं है.
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: कश्मीरी युवक पर PSA लगाने में ‘रूटीन ट्रैफिक चालान’ जितनी भी जांच नहीं हुई
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत करीब दो साल से बंद कश्मीरी युवक शबीर अहमद डार की रिहाई का आदेश देते हुए सख्त टिप्पणी की है. अदालत ने कहा कि इस मामले में PSA को जिस तरह लागू किया गया, वह “एक साधारण ट्रैफिक चालान से भी कम गंभीर जांच” के साथ किया गया. कोर्ट ने यह भी कहा कि हिरासत के आदेश में उचित विचार नहीं किया गया. यह रिपोर्ट द वायर में प्रकाशित हुई है.
5 फरवरी को दिए गए फैसले में जस्टिस राहुल भारती ने शबीर की हिरासत को रद्द कर दिया. हालांकि आदेश की कॉपी 27 फरवरी को सार्वजनिक हुई, जब इसकी रिपोर्ट बार एंड बेंच में प्रकाशित हुई. कोर्ट ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट ने बिना स्वतंत्र रूप से दिमाग लगाए, एसएसपी की सिफारिश को सीधे स्वीकार कर लिया.
मामले के अनुसार, 17 अप्रैल 2024 को अनंतनाग के तत्कालीन एसएसपी जी.वी. चकरवर्ती ने जिला मजिस्ट्रेट सैयद फखरुद्दीन हामिद को पत्र लिखकर कोकेरनाग निवासी 28 वर्षीय शबीर अहमद डार को पब्लिक सेफ्टी एक्ट में बंद करने की सिफारिश की थी. शबीर एक निजी शिक्षक हैं और दारुल आहिया-आलूम बिंदू मदरसा में पढ़ाते थे. उन पर आरोप था कि वे 2022 के एक आतंकी मामले में आरोपी रऊफ अहमद डार के संपर्क में थे. हालांकि शबीर उस मामले में आरोपी नहीं थे और “सबूतों की कमी” के कारण पहले ही रिहा कर दिए गए थे.
इसके बावजूद 20 अप्रैल 2024 को जिला मजिस्ट्रेट ने पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत उनकी हिरासत मंजूर कर ली. 29 अप्रैल 2024 को जम्मू-कश्मीर गृह विभाग ने इसे मंज़ूरी दी और 27 मई 2024 को पब्लिक सेफ्टी एक्ट सलाहकार बोर्ड ने भी हिरासत को सही ठहराया. शबीर को पहले जम्मू की कोट भलवाल जेल और बाद में उत्तर प्रदेश के वाराणसी जेल भेजा गया.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि शबीर का नाम संबंधित एफआईआर में आरोपी के रूप में दर्ज नहीं था. जस्टिस भारती ने कहा कि “सिर्फ एक खाली संदर्भ” के आधार पर उनकी स्वतंत्रता छीन ली गई. अदालत ने जेल अधीक्षक को आदेश दिया कि यदि शबीर किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए.
2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में PSA का व्यापक उपयोग हुआ है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस कानून का इस्तेमाल आलोचकों को दबाने के लिए किया जाता है. पिछले वर्ष विधानसभा में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बताया था कि 400 से अधिक लोग देश की अलग-अलग जेलों में पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत बंद हैं.
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