28/03/2026:गोवा सेक्स स्कैंडल | हॉर्मुज़ संकट, रूसी तेल प्रतिबंध | ईरान जंग, पाकिस्तान पहल | ईरान स्कूल बमबारी | एपस्टीन नेटवर्क खुलासा | नेपाल में ओली गिरफ्तार | बेंगलुरु प्रोफेसर सस्पेंड
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फलक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
‘नो किंग्स’: ट्रम्प प्रशासन के विरोध में अमेरिका भर में लाखों लोगों के जुटने की संभावना
गोवा सेक्स स्कैंडल: भाजपा पार्षद का गिरफ्तार बेटा 100 से अधिक नाबालिग लड़कियों के शोषण का आरोपी
भारत-चीन की राजनीतिक दिशाओं की तुलना; ‘हमारा विमर्श सिर्फ सांप्रदायिक लामबंदी का जरिया बन गया है’
डोनाल्ड ट्रंप के वकील का दावा: ‘सब डरे हुए हैं’, डेमोक्रेट्स फिर सत्ता में आते हैं तो क्या होगा
रूस 1 अप्रैल से गैसोलीन (पेट्रोल) निर्यात पर प्रतिबंध लगाएगा
हॉर्मुज़ संकट के बीच, भारत के रूसी तेल आयात में 82.3% की वृद्धि
ईरान युद्ध पर चर्चा के लिए पाकिस्तान रविवार से सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र की मेजबानी करेगा
निक्सन से ट्रम्प तक: खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए पाकिस्तान की ‘बैकचैनल’ कूटनीति
‘इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि मैं किस बच्चे को बचा रहा हूँ’: ईरान स्कूल बमबारी के पीड़ितों के माता-पिता का सबसे बुरा दिन
ईरान युद्ध का 29वां दिन: परमाणु ठिकानों पर हमले और हूती विद्रोहियों की एंट्री
राष्ट्रपति ट्रंप का युद्ध कौशल: अल्टीमेटम, अनिश्चितता और ‘आर्ट ऑफ द डील’
विशेषज्ञ की चेतावनी: “युद्ध उम्मीद से ज़्यादा लंबा खिंच सकता है”
फेथ केट्स: वह महिला जिसने मॉडल्स को अपने ‘प्रिय मित्र’ जेफरी एपस्टीन से मिलवाया
नेपाल: बालेन शाह के पीएम बनते ही पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली गिरफ्तार
‘तुम्हें शर्म नहीं आती?, आतंकवादी’: बेंगलुरु में प्रोफेसर ने मुस्लिम छात्र को कहा आतंकी, सस्पेंड
मुर्शिदाबाद: राम नवमी जुलूस के दौरान मुस्लिम दुकानों पर हमला, आगजनी
‘नो किंग्स’: ट्रम्प के विरोध में अमेरिका भर में लाखों के जुटने की संभावना
“द गार्डियन” के अनुसार, ट्रम्प प्रशासन के खिलाफ ‘नो किंग्स’ विरोध प्रदर्शनों के लिए शनिवार को लाखों अमेरिकियों के सड़कों पर उतरने की उम्मीद है. आयोजकों के एक गठबंधन के अनुसार, अमेरिका के सभी 50 राज्यों और 16 अन्य देशों में 3,000 से अधिक कार्यक्रमों की योजना बनाई गई है. इस गठबंधन में ‘इंडिविजिबल’ और ‘50501’ जैसे अधिनायकवाद विरोधी समूह, श्रमिक संघ और अन्य जमीनी संगठन शामिल हैं. ‘इंडिविजिबल’ के सह-संस्थापक एज्रा लेविन ने कहा, “मुझे उम्मीद है कि 28 मार्च अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन होगा.”
‘इंडिविजिबल’ की सह-संस्थापक लिया ग्रीनबर्ग ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि पंजीकरण कराने वाले दो-तिहाई से अधिक प्रतिभागी “प्रमुख शहरी केंद्रों के बाहर” से हैं, जिनमें रिपब्लिकन-नियंत्रित क्षेत्र और निर्णायक काउंटी शामिल हैं. ‘वॉइसेस ऑफ फ्लोरिडा’ की कार्यकारी निदेशक और 50501 आंदोलन की राष्ट्रीय समन्वयक सारा पार्कर ने कहा, “पिछले ‘नो किंग्स’ के बाद से, हम गैस और किराने की कीमतों में उछाल देख रहे हैं, और यह सब ईरान में एक अवैध युद्ध के बीच हो रहा है. अमेरिका के लोग बेहद गुस्से में हैं.”
‘नो किंग्स’ गठबंधन ने बार-बार इस कार्रवाई के “अहिंसक” होने पर जोर दिया है. पार्कर ने उल्लेख किया कि नेताओं को तनाव कम करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. वेबसाइट के अनुसार, प्रतिभागियों को कानूनी रूप से अनुमति प्राप्त हथियारों सहित कोई भी हथियार लाने की अनुमति नहीं है. जून में पहले ‘नो किंग्स डे’ के दौरान, साल्ट लेक सिटी में एक प्रदर्शनकारी मारा गया था और दूसरा घायल हो गया था.
हालाँकि ट्रम्प ने इन विरोध प्रदर्शनों की स्पष्ट आलोचना करना कम कर दिया है, लेकिन उनका प्रशासन ‘आइस’ विरोधी प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाना और उन पर संघीय मुकदमा चलाना जारी रखे हुए है.
डोनाल्ड ट्रंप के वकील का दावा: ‘सब डरे हुए हैं’, डेमोक्रेट्स फिर सत्ता में आते हैं तो क्या होगा
रॉ स्टोरी की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के उप-अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश ने इस हफ्ते कंजरवेटिव पॉलिटिकल एक्शन कॉन्फ्रेंस के दौरान खुलासा किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को इस बात का डर है कि अगर 2028 में डेमोक्रेट्स फिर सत्ता में आते हैं तो उनके साथ क्या होगा.
डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस के इस अधिकारी ने गुरुवार को डलास के उपनगर में आयोजित इस कार्यक्रम में कहा कि ट्रंप की टीम संभावित मुकदमों को लेकर क्यों चिंतित है. ब्लांश ने कहा,“इस प्रशासन में भी हर कोई डरा हुआ है कि अगर हम नहीं जीते, तो अगला प्रशासन हम सबकी जांच करेगा और हमें आरोपित (इंडाइट) करेगा.”
उन्होंने आगे कहा, “वे क्यों डर रहे हैं? क्योंकि पिछली सरकार में ठीक ऐसा ही हुआ था. ट्रंप की पूरी कैबिनेट और व्हाइट हाउस में काम करने वाले सभी लोगों को ग्रैंड जूरी के सामने जाना पड़ा था”
डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस में शामिल होने से पहले ब्लांश, ट्रंप के निजी वकील रह चुके हैं. हालांकि, उनके “ग्रैंड जूरी के सामने जाने” वाले बयान से यह स्पष्ट नहीं हुआ कि वे किसी खास मामले की बात कर रहे थे या नहीं, और न ही यह साफ है कि प्रशासन के किसी सदस्य को सीधे निशाना बनाया गया था.
रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के कई पूर्व सहयोगियों को सजा भी हो चुकी है. इनमें पूर्व रणनीतिकार स्टीव बैनन और व्यापार सलाहकार पीटर नवारो शामिल हैं, जिन्होंने कांग्रेस के समन का पालन करने से इनकार किया था. इसके अलावा, ट्रंप के अन्य सहयोगी जैसे वकील माइकल कोहेन, राजनीतिक सलाहकार रोजर स्टोन और पूर्व चुनाव अभियान प्रमुख पॉल मैनाफोर्ट को भी अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराया गया था.
ब्लांश ने अपने भाषण में यह भी बताया कि डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने ट्रंप से जुड़े आपराधिक मामलों की जांच करने वाले 200 से अधिक वकीलों को हटा दिया है, जिसे ट्रंप द्वारा एजेंसी का अपने विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
उन्होंने कहा, “डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस में अब एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसका उन अभियोजनों से कोई संबंध रहा हो.”
ईरान युद्ध का 29वां दिन:
परमाणु ठिकानों पर हमले और हूती विद्रोहियों की एंट्री
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी युद्ध अब और भी भयानक मोड़ ले चुका है. अल जज़ीरा के लिए क्रिस कैमरून और जॉन यून की रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के 29वें दिन तनाव अपने चरम पर है. ईरान ने चेतावनी दी है कि इजरायल द्वारा उसके परमाणु और औद्योगिक ठिकानों पर किए गए हमलों की उसे ‘भारी कीमत’ चुकानी होगी. इस बीच, यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने भी आधिकारिक तौर पर युद्ध में शामिल होने का एलान कर दिया है. उन्होंने इजरायल पर मिसाइल हमला किया, जिसे हालांकि नाकाम कर दिया गया, लेकिन हूती प्रवक्ता याह्या सारी ने कसम खाई है कि जब तक ‘आक्रमण’ नहीं रुकता, उनके हमले जारी रहेंगे.
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने पुष्टि की है कि 3,500 नौसैनिकों और मरीन कमांडो के साथ ‘यूएसएस त्रिपोली’ मिडिल ईस्ट पहुँच चुका है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन सैनिकों को विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खुलवाने के लिए तैनात किया है, जिसे ईरानी सेना ने लगभग बंद कर दिया है. इजरायली सेना ने रात भर तेहरान में परमाणु केंद्रों और स्टील फैक्ट्रियों पर बमबारी की है. वहीं, लेबनान में एक इजरायली हमले में हिजबुल्लाह के नेटवर्क के लिए काम करने वाले एक पत्रकार समेत तीन लोगों की मौत हो गई है. खाड़ी क्षेत्र में तनाव तब और बढ़ गया जब सऊदी अरब के एक एयरबेस पर ईरानी हमले में कम से कम 10 अमेरिकी सैनिक घायल हो गए.
युद्ध का वैश्विक असर भी साफ़ दिख रहा है. उर्वरक की आपूर्ति रुकने से दुनिया के कई हिस्सों में खाद्य संकट का खतरा पैदा हो गया है. केन्या का 24 मिलियन डॉलर का चाय का स्टॉक बंदरगाह पर फंसा हुआ है. मानवीय दृष्टिकोण से देखें तो अब तक ईरान में 1,492 नागरिकों समेत 3,300 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं. लेबनान में मरने वालों का आंकड़ा 1,110 के पार पहुँच गया है. अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने उम्मीद जताई है कि यह युद्ध महीनों नहीं, बल्कि कुछ हफ़्तों में खत्म हो जाएगा, हालांकि ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है.
राष्ट्रपति ट्रंप का युद्ध कौशल: अल्टीमेटम, अनिश्चितता और ‘आर्ट ऑफ द डील’
न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए व्हाइट हाउस संवाददाता एरिका एल. ग्रीन की रिपोर्ट बताती है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस युद्ध को अपने चिर-परिचित अंदाज़ में संभाल रहे हैं, जहाँ वह सैन्य श्रेष्ठता के दावों और कूटनीतिक समझौतों के बीच झूल रहे हैं. 21 मार्च की शाम को ट्रंप ने एक असाधारण अल्टीमेटम दिया था कि यदि ईरान ने 48 घंटों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य नहीं खोला, तो वह ईरान के नागरिक बिजली घरों को बम से उड़ा देंगे. हालांकि, सोमवार की समय सीमा खत्म होने से कुछ घंटे पहले उन्होंने इसे पांच दिन के लिए टाल दिया.
ट्रंप का यह रवैया उनके सहयोगियों को भी हैरान कर रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप दिन भर युद्ध की ब्रीफिंग में डूबे रहते हैं और अक्सर सैन्य हमलों के वीडियो देखते हैं. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट का कहना है कि ट्रंप का एकमात्र लक्ष्य ‘जीत’ है और वह इसे अपनी विरासत के रूप में देख रहे हैं. हालांकि, ज़मीन पर चुनौतियाँ कम नहीं हैं. युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक 13 अमेरिकी सैनिक अपनी जान गंवा चुके हैं. ट्रंप के सैन्य सलाहकार जनरल डैन केन और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ उन्हें लगातार ब्रीफिंग दे रहे हैं.
दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने युद्ध शुरू करते समय ‘शासन परिवर्तन’ का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब वह इससे पीछे हटते दिख रहे हैं. वह इसे युद्ध के बजाय एक ‘ऑपरेशन’ या ‘एक्सकर्शन’ कहना पसंद करते हैं क्योंकि उन्होंने इसके लिए कांग्रेस की मंजूरी नहीं ली है. ट्रंप का मानना है कि उनकी पूरी ज़िंदगी एक मोलतोल रही है और वह ईरान को भी बातचीत की मेज पर ले आएंगे. लेकिन आलोचकों का कहना है कि युद्ध कोई व्यापारिक सौदा नहीं है; यह अनियंत्रित और घातक होता है.
विशेषज्ञ की चेतावनी: “युद्ध उम्मीद से ज़्यादा लंबा खिंच सकता है”
पॉलिटिको के लिए स्कॉट वाल्डमैन ने व्हाइट हाउस के पूर्व ईरान विशेषज्ञ नेट स्वानसन का इंटरव्यू लिया है. स्वानसन ने युद्ध शुरू होने से पहले ही सटीक भविष्यवाणी की थी कि ईरान घुटने टेकने के बजाय वैश्विक तेल प्रवाह और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग को निशाना बनाएगा. स्वानसन का मानना है कि ट्रंप प्रशासन और ईरान, दोनों ही अपनी स्थितियों को लेकर ‘अतार्किक रूप से आश्वस्त’ हैं, जिस वजह से इस युद्ध से बाहर निकलने का कोई स्पष्ट रास्ता नज़र नहीं आ रहा है.
स्वानसन के अनुसार, ट्रंप को लगता है कि सैन्य सफलता से ईरान राजनीतिक आत्मसमर्पण कर देगा, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. ईरान का मानना है कि वह जीवित रहकर ही अपनी जीत घोषित कर सकता है. सीएनएन के लिए निक पैटन वॉल्श का विश्लेषण भी कुछ ऐसा ही संकेत देता है. वॉल्श लिखते हैं कि ट्रंप उस जाल में फंस गए हैं जिसमें उनसे पहले कई राष्ट्रपति फंसे थे: एक त्वरित सैन्य अभियान के माध्यम से स्थायी राजनीतिक परिवर्तन लाने का भ्रम.
युद्ध की कूटनीति पर नज़र डालें तो पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं. उधर, इजरायल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं. ‘द बीबी फाइल्स’ नामक डॉक्यूमेंट्री के लीक हुए फुटेज से पता चलता है कि नेतन्याहू भ्रष्टाचार के मामलों में घिरे हैं और उन पर आरोप है कि वह अपनी सत्ता बचाने और जेल जाने से बचने के लिए युद्ध को लंबा खींच रहे हैं. फिल्म निर्माता एलेक्स गिबनी का दावा है कि नेतन्याहू ने सालों तक हमास को कतरी पैसा पहुँचने दिया ताकि फ़िलिस्तीनी अथॉरिटी को कमज़ोर किया जा सके, जिसे उन्होंने ‘लपटों की ऊंचाई को नियंत्रित करना’ कहा था. कुल मिलाकर, यह युद्ध केवल सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई बनता जा रहा है.
ईरान युद्ध पर चर्चा के लिए पाकिस्तान रविवार से सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र की मेजबानी करेगा
‘रॉयटर्स’ की खबर है कि पाकिस्तान रविवार से सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के साथ ईरान युद्ध पर वार्ता की मेजबानी करेगा. इसके साथ ही इस्लामाबाद खुद को महीने भर से जारी इस संघर्ष में अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता के मंच के रूप में स्थापित कर रहा है.
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने शनिवार को एक बयान में कहा कि इन चार देशों के विदेश मंत्री दो दिवसीय वार्ता के दौरान “क्षेत्र में तनाव कम करने के प्रयासों सहित कई मुद्दों पर गहन चर्चा करेंगे.”
तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने कहा कि इस बैठक का उद्देश्य तनाव कम करने के लिए एक तंत्र स्थापित करना होगा. उन्होंने शुक्रवार देर रात कहा, “हम इस पर चर्चा करेंगे कि इस युद्ध में बातचीत किस दिशा में जा रही है, ये चारों देश स्थिति का आकलन कैसे करते हैं और (शांति के लिए) क्या किया जा सकता है.”
पाकिस्तान ने तेहरान को युद्ध समाप्त करने का एक अमेरिकी प्रस्ताव दिया है और वार्ता की मेजबानी करने की पेशकश की है. ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि कोई भी बातचीत पाकिस्तान या तुर्की में हो सकती है. ईरान 15-सूत्रीय अमेरिकी प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है, हालांकि एक अधिकारी ने इसे “एकतरफा और अनुचित” बताकर खारिज कर दिया है. अमेरिका की इन मांगों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने से लेकर उसके मिसाइल विकास पर अंकुश लगाने और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य का नियंत्रण प्रभावी ढंग से सौंपने तक की शर्तें शामिल हैं. तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने शनिवार को इस्तांबुल में एक सम्मेलन में कहा कि दुनिया की नई “बहुकेंद्रित प्रणाली” में महत्वपूर्ण ऊर्जा और व्यापार मार्गों की सुरक्षा के लिए समाधान की आवश्यकता है.
उन्होंने कहा कि तुर्की के उच्च स्तरीय संवाद का उद्देश्य क्षेत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था को और अधिक विनाश से बचाने के लिए युद्ध समाप्त करने हेतु “व्यावहारिक कदमों” का तेजी से खाका तैयार करना है.
निक्सन से ट्रम्प तक: खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए पाकिस्तान की ‘बैकचैनल’ कूटनीति
‘अल जज़ीरा’ में आबिद हुसैन का यह विश्लेषण बताता है कि कैसे पाकिस्तान ने दशकों से दुनिया की महाशक्तियों के बीच एक गुप्त कड़ी या ‘ब्रिज’ (पुल) के रूप में काम किया है. वर्तमान में, जब पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने के लिए सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के साथ वार्ता की मेजबानी कर रहा है, यह रिपोर्ट उसके पुराने रिकॉर्ड को रेखांकित करती है.
पाकिस्तान की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता 1971 में रही, जब उसने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और चीन के बीच संबंधों को सामान्य करने में मदद की. पाकिस्तान ने ही तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर की बीजिंग की गुप्त यात्रा का प्रबंध किया था, जिससे दशकों की दुश्मनी खत्म हुई.
शीत युद्ध के दौरान, पाकिस्तान ने अमेरिका और सोवियत संघ के बीच संवाद बनाए रखने में भूमिका निभाई. अफगानिस्तान में सोवियत आक्रमण के समय भी पाकिस्तान ने एक रणनीतिक मध्यस्थ के रूप में खुद को स्थापित किया.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पिछले और वर्तमान कार्यकाल के दौरान, पाकिस्तान ने अमेरिका और तालिबान के बीच कतर में हुई वार्ताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. अब, ईरान-अमेरिका संघर्ष के संदर्भ में, पाकिस्तान एक बार फिर खुद को “शांति के मंच” के रूप में पेश कर रहा है.
पाकिस्तान अपनी भौगोलिक स्थिति और वाशिंगटन व बीजिंग/तेहरान दोनों के साथ अपने संबंधों का उपयोग एक ‘डिप्लोमैटिक लीवरेज’ (कूटनीतिक लाभ) के रूप में करता है. जब भी वैश्विक शक्तियों के बीच सीधी बातचीत संभव नहीं होती, पाकिस्तान एक विश्वसनीय गुप्त मार्ग प्रदान करता है.
रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि इस तरह की मध्यस्थता जोखिम भरी होती है. अक्सर पाकिस्तान को अपनी इस भूमिका के कारण घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय अस्थिरता का सामना करना पड़ता है, क्योंकि प्रतिद्वंद्वी शक्तियों की अपनी-अपनी माँगें और शर्तें होती हैं.
रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि पाकिस्तान की विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा “मध्यस्थ” की भूमिका निभाने पर टिका है. चाहे वह 1970 के दशक में चीन को अमेरिका से जोड़ना हो या आज ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करना, पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए इस ‘बैकचैनल’ कूटनीति का सहारा लेता है. अंग्रेजी में हुसैन की पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है.
रूस 1 अप्रैल से गैसोलीन (पेट्रोल) निर्यात पर प्रतिबंध लगाएगा
‘रॉयटर्स’ के अनुसार, रूस की सरकार ने कहा है कि रूसी उप-प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने शुक्रवार को ऊर्जा मंत्रालय को 1 अप्रैल से पेट्रोल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया है. सरकारी समाचार एजेंसी ‘तास’ ने पहले बताया था कि यह प्रतिबंध 31 जुलाई तक लागू रहेगा.
नोवाक ने कहा कि मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) के संकट के कारण वैश्विक तेल और तेल उत्पाद बाजार में जो उथल-पुथल मची है, उसकी वजह से कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव हो रहा है. साथ ही, विदेशी बाजारों में रूसी ऊर्जा संसाधनों की उच्च मांग बनी रहना एक सकारात्मक कारक है.
सरकार ने एक बयान में कहा कि कच्चे तेल के प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) की मात्रा पिछले साल के स्तर पर बनी हुई है, जिससे तेल उत्पादों की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित हो रही है. पिछले साल, रूस के कई क्षेत्रों और रूस के नियंत्रण वाले यूक्रेन के कुछ हिस्सों में पेट्रोल की कमी की खबरें आई थीं. यह कमी यूक्रेन द्वारा रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमलों को तेज करने और ईंधन की मांग में मौसमी उछाल के बीच देखी गई थी.
रूस ने ईंधन की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने और कमी से निपटने के लिए पहले भी कई बार पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए हैं. उद्योग जगत के स्रोतों के अनुसार, रूस ने पिछले साल लगभग 50 लाख मीट्रिक टन पेट्रोल का निर्यात किया था, जो कि लगभग 1,17,000 बैरल प्रतिदिन के बराबर है.
क्या इस प्रतिबंध का भारत पर प्रभाव पड़ेगा?
विकास यादव के मुताबिक, भारत मुख्य रूप से कच्चे तेल पर निर्भर है — जो पेट्रोल और डीजल बनाने के लिए कच्चा माल है — न कि तैयार ईंधन (जैसे पेट्रोल) के आयात पर. भारत की कच्चे तेल की लगभग 80% ज़रूरतें आयात के ज़रिए पूरी होती हैं, और उसका लगभग 20% हिस्सा रूस से आता है. हालाँकि, भारत पेट्रोल या अन्य रिफाइंड ईंधन उत्पादों का बहुत कम आयात करता है. इसके बजाय, यह अपने विशाल रिफाइनिंग इकोसिस्टम के माध्यम से घरेलू स्तर पर कच्चे तेल को प्रोसेस करता है. इसका मतलब है कि देश रूसी पेट्रोल आपूर्ति पर सीधे तौर पर निर्भर नहीं है, और हालिया निर्यात प्रतिबंध का कोई तत्काल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है.
वास्तव में, भारत दुनिया के प्रमुख रिफाइनिंग केंद्रों में से एक है, जिसकी क्षमता लगभग 56 लाख बैरल प्रति दिन है. यह न केवल घरेलू मांग को पूरा करता है बल्कि रिफाइंड ईंधन का निर्यात भी करता है.
कहा जा रहा है कि जोखिम अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है। वैश्विक ईंधन आपूर्ति में कोई भी व्यवधान — जिसमें रूस का पेट्रोल निर्यात प्रतिबंध भी शामिल है — बाजारों में दबाव बढ़ा सकता है और कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर धकेल सकता है. भारतीय रिफाइनर पहले से ही दबाव में हैं, क्योंकि जारी युद्ध के बीच तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं.
इसलिए, भले ही यह प्रतिबंध सीधे तौर पर भारत को नुकसान न पहुँचाए, लेकिन कच्चे तेल की ऊँची कीमतें भविष्य में ईंधन की लागत और रिफाइनिंग मार्जिन को प्रभावित कर सकती हैं.
हॉर्मुज़ संकट के बीच, भारत के रूसी तेल आयात में 82.3% की वृद्धि
मार्च में भारत का रूसी तेल आयात ऐतिहासिक शिखर के करीब पहुँच रहा है. इसका कारण पश्चिमी एशिया में जारी संकट है, जो ईरान पर अमेरिका और इजरायल के युद्ध के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ है. इसके चलते हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद हो गया है—यह वह जलमार्ग है जहाँ से हाल के महीनों में भारत के कुल तेल आयात का लगभग आधा हिस्सा गुजरता था.
रूस से होने वाले तेल आयात में फरवरी के स्तर की तुलना में 82.3% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है, जो 1 से 25 मार्च की अवधि में बढ़कर 19 लाख बैरल प्रति दिन हो गई है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च में अब तक भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 45.2% रही है, जो फरवरी में दर्ज 20.1% की तुलना में काफी अधिक है.
‘इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि मैं किस बच्चे को बचा रहा हूँ’: ईरान स्कूल बमबारी के पीड़ितों के माता-पिता का सबसे बुरा दिन
‘द गार्डियन’ की इस मर्मस्पर्शी रिपोर्ट में ईरान के दक्षिणी शहर मिनाब में स्थित ‘शजरेह तैयबा’ स्कूल पर हुए भीषण बम हमले के पीड़ितों और उनके परिवारों के दर्द को बयां किया गया है. इस हमले में 170 लोग मारे गए थे, जिनमें अधिकांश स्कूल की छात्राएं थीं.
रिपोर्ट उस भयावह दिन को याद करती है, जब एक सामान्य स्कूली सुबह अचानक चीख-पुकार और धुएं के गुबार में बदल गई. प्रत्यक्षदर्शियों और माता-पिता ने बताया कि धमाका इतना शक्तिशाली था कि स्कूल की इमारत का एक हिस्सा ढह गया और आसपास के घरों की खिड़कियां टूट गईं.
माता-पिता ने उस खौफनाक मंजर को साझा किया जब वे अपने बच्चों को ढूंढने के लिए मलबे की ओर भागे. कई परिवारों ने अपने मासूम बच्चों को खो दिया, जबकि कई बच्चे जीवन भर के लिए दिव्यांग हो गए. जो बच्चे इस हमले में बच गए, वे गहरे मानसिक आघात (पीटीएसडी) से गुजर रहे हैं. वे अब स्कूल जाने के नाम से भी डरते हैं और तेज आवाजों से सिहर जाते हैं.
यह स्कूल स्थानीय समुदाय के लिए केवल एक शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि एक सुरक्षित भविष्य की उम्मीद था. हमले ने न केवल मासूम जानें लीं, बल्कि एक पूरे समुदाय के सुरक्षित महसूस करने के अधिकार को भी छीन लिया. पीड़ित परिवार और मानवाधिकार कार्यकर्ता इस हमले के पीछे के दोषियों को सजा दिलाने की मांग कर रहे हैं. ‘गार्डियन’ के लिए टेस मैक्कलूर और शाह मीर बलोच की इस रिपोर्ट में ईरान में शैक्षणिक संस्थानों की सुरक्षा और वहां के राजनीतिक-सामाजिक माहौल में बच्चों की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं.
मानवाधिकार संगठनों ने 28 फरवरी की इस घटना को “मानवता के खिलाफ अपराध” बताया है. रिपोर्ट रेखांकित करती है कि युद्ध या संघर्ष की स्थिति में स्कूलों को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन है.
इस रिपोर्ट में भी उन परिवारों की आवाज़ उठाई गई है, जिन्होंने अपनी सबसे कीमती पूंजी—अपने बच्चों—को खो दिया है. यह दुनिया का ध्यान इस ओर खींचता है कि राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा की सबसे बड़ी कीमत अक्सर निर्दोष बच्चों को चुकानी पड़ती है. ईरान में अब तक अमेरिकी-इजरायली हमलों में 600 से अधिक स्कूलों और शैक्षणिक केंद्रों को नष्ट कर दिया गया है या भारी क्षति पहुँचाई गई है, जबकि कम से कम 230 बच्चों और शिक्षकों की जान जा चुकी है.
नेपाल: बालेन शाह के पीएम बनते ही पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली गिरफ्तार
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को शनिवार सुबह जेन ज़ी विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई मौतों से जुड़े गैर इरादतन हत्या और आपराधिक लापरवाही के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है. पुलिस ने तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके ओली को राजधानी काठमांडू स्थित उनके आवास से हिरासत में लिया है. साथ ही नेपाली कांग्रेस नेता व पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को भी गिरफ्तार किया गया है.
ये गिरफ्तारियां नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (बालेन) और उनकी कैबिनेट के शपथ लेने के 24 घंटे से भी कम समय में हुई हैं. बालेन, जो रैपर से नेता बने हैं, ने इस महीने भारी जीत दर्ज की थी. उनके चुनाव अभियान में पिछले साल के विरोध प्रदर्शनों में हुई मौतों के लिए न्याय और भ्रष्टाचार पर सख्ती का वादा शामिल था.
सितंबर 2025 में सोशल मीडिया बैन और राजनीति में बढ़ते भ्रष्टाचार व भाई-भतीजावाद के खिलाफ युवाओं के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन हुए थे. उस दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग की, जिसमें 19 लोगों की मौत हो गई थी.
इसके अगले 24 घंटों में यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया था. कई जगहों पर हिंसा भड़क उठी, संसद और सरकारी इमारतों में आगजनी हुई, और कुल मिलाकर कम से कम 77 लोगों की जान चली गई थी. यही वह मोड़ था, जहां से ओली सरकार की पकड़ कमजोर हुई और अंततः उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ा.
‘द गार्डियन’ के अनुसार, नए गृह मंत्री सुदन गुरुंग ने सोशल मीडिया पर इन गिरफ्तारियों की जानकारी दी. उन्होंने कहा, “कानून से ऊपर कोई नहीं है. हमने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को हिरासत में लिया है. यह किसी के खिलाफ बदला नहीं है, बल्कि न्याय की शुरुआत है.”
दंगारोधी गियर से लैस पुलिस के कई ट्रकों ने दोनों नेताओं के घरों पर जाकर उन्हें गिरफ्तार किया और फिर काठमांडू जिला पुलिस कार्यालय ले जाया गया.
74 वर्षीय ओली किडनी से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे हैं. उनकी गिरफ्तारी के बाद अस्पताल ले जाने की खबर है. उनके वकील टीकाराम भट्टराई ने ‘रॉयटर्स’ से कहा कि यह गिरफ्तारी कानूनी मानकों के अनुरूप नहीं है. उन्होंने कहा, “इसे जांच के लिए बताया गया है. यह अवैध और अनुचित है क्योंकि उनके भागने या पूछताछ से बचने का कोई खतरा नहीं है.”
‘तुम्हें शर्म नहीं आती?, ‘आतंकवादी’: बेंगलुरु में प्रोफेसर ने मुस्लिम छात्र को कहा आतंकी, सस्पेंड
मकतूब मीडिया के अनुसार, बेंगलुरु की पीईएस यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने मुस्लिम छात्र को ‘आतंकवादी’ कह कर अपमानित किया. घटना मंगलवार की है. इस घटना का एक कथित वीडियो भी सामने आया है जिसमें बताया जा रहा है कि अफ्फान नाम के छात्र पर प्रोफेसर तब भड़क गया, जब उसने किसी से मिलने के लिए क्लास से बाहर जाने की इजाजत मांगी.
वीडियो में चेक पैटर्न वाली आधी आस्तीन की शर्ट पहने प्रोफेसर मुरलीधर देशपांडे को पूरे क्लासरूम में चिल्लाते हुए सुना जा सकता है. वीडियो में प्रोफेसर कहता है कि “तुम्हें शर्म नहीं आती?” “मुझे लगा था कि आज मैं बहुत शांत रहूंगा” इसके बाद वीडियो में प्रोफेसर को ‘आतंकवादी’ कहते हुए सुना जा सकता है.
प्रोफेसर ने कथित तौर पर छात्र को ईरान युद्ध के लिए ‘उस जैसे लोगों’ को जिम्मेदार ठहराया. प्रोफेसर ने कहा कि डोनाल्ड ट्रम्प आकर उसे ले जाएंगे. प्रोफेसर ने छात्र को यह भी कहा कि वह नरक में जाएगा.
यूनिवर्सिटी ने प्रोफेसर को किया निलंबित
वीडियो सामने आने के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने प्रोफेसर मुरलीधर देशपांडे को निलंबित कर दिया है. साथ ही कई लोगों का आरोप है कि घटना की सीसीटीवी फुटेज हटा दी गई और अफ़्फ़ान का समर्थन करने वाले कुछ छात्रों के खिलाफ भी अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है. प्रोफेसर ने कथित तौर पर यूनिवर्सिटी को लिखित माफ़ी सौंपी है, लेकिन उन्होंने सीधे तौर पर छात्र से माफ़ी नहीं मांगी है.
मुर्शिदाबाद: राम नवमी जुलूस के दौरान मुस्लिम दुकानों पर हमला, आगजनी
मकतूब मीडिया के अनुसार, पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में शुक्रवार को रामनवमी के जुलूस के दौरान हिंसा भड़क गई.आरोप है कि संघ से जुड़े हिंदुत्व समूह के लोगों ने रैली के दौरान मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाते हुए तोड़फोड़ और आगजनी की.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, भगवा कपड़े पहने भीड़ ने करीब 40 मुस्लिमों की दुकानों पर हमला किया, लूटपाट की और कई दुकानों को आग के हवाले कर दिया. यह हिंसा ऐसे समय में हुई है जब विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, जिससे क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव को लेकर चिंता बढ़ गई है.
घटना फुलतला इलाके की है, जो जंगीपुर सबडिविजनल अस्पताल के पास स्थित है और जहां मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है. इस इलाके में ज्यादातर घर, छोटे व्यवसाय, फल की दुकानें और खाने-पीने के ठेले मुस्लिम समुदाय के लोगों के हैं.
‘द टेलीग्राफ’ के हवाले से मकतूब मीडिया की रिपोर्ट में कहा गया कि तनाव तब बढ़ा जब तेज़ संगीत और नाच-गाने के साथ निकली राम नवमी रैली फुलतला चौराहे से करीब 200 मीटर दूर स्थित एक मस्जिद के सामने से गुजरी, उस वक्त वहां जुमे की नमाज़ चल रही थी.
नमाज़ अदा कर रहे लोगों ने इस पर आपत्ति जताई, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच टकराव हो गया.आरोप है कि भीड़ ने मुस्लिम घरों की छतों पर चढ़कर भगवा झंडे लगाए, संपत्तियों में तोड़फोड़ की, दुकानों में आग लगाई और लोगों के साथ मारपीट की.
जांगीपुर विधानसभा से तृणमूल कांग्रेस के विधायक प्रत्याशी ज़ाकिर हुसैन ने इसे भाजपा की साजिश बताया. उन्होंने कहा कि “बीजेपी ने जानबूझकर चुनाव से पहले यह घटना कराई है. पार्टी जंगीपुर में आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही है और सांप्रदायिक तनाव पैदा कर हिंदू वोटों को एकजुट करने की कोशिश कर रही है. बिना परिणाम समझे उन्होंने हिंसा को बढ़ावा दिया है. मैं मांग करता हूं कि आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए.”
गोवा सेक्स स्कैंडल: भाजपा पार्षद का गिरफ्तार बेटा 100 से अधिक नाबालिग लड़कियों के शोषण का आरोपी
गोवा में सामने आए सेक्स स्कैंडल में, जिसमें एक भाजपा पार्षद के बेटे पर नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार करने, उनके अश्लील वीडियो बनाने और उन्हें प्रसारित करने का आरोप है, 100 से अधिक पीड़िताएं शामिल हैं. राज्य कांग्रेस अध्यक्ष अमित पाटकर ने शनिवार को कहा कि पुलिस शुरुआत में मामला दर्ज करने में कतरा रही थी.
दक्षिण गोवा के ‘कुरचोरम नगर परिषद’ के सदस्य सुशांत नाइक के 20 वर्षीय बेटे सोहम को 21 मार्च को गिरफ्तार किया गया था. उसके खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, गोवा बाल अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम के तहत चार मामले दर्ज किए गए हैं. पाटकर ने आरोप लगाया, “पीड़ितों की संख्या 100 से अधिक है. आरोपी पिछले तीन वर्षों से इस अपराध को अंजाम दे रहा था. यह सेक्स स्कैंडल उससे कहीं ज्यादा बड़ा है जितना इसे दिखाया जा रहा है.” पाटकर ने दावा किया कि पीड़ित नाबालिग लड़कियां कुरचोरम, मडगाँव, वास्को डी गामा और पोंडा जैसी जगहों से हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि इन लड़कियों को काउंसलिंग प्रदान करने की तत्काल आवश्यकता है ताकि वे दबाव में आकर कोई गलत कदम न उठा लें.
पाटकर ने कहा, “आरोपी इस हफ्ते 21 साल का हो गया है. इसका मतलब है कि वह 17-18 साल की उम्र से ही इस अपराध में शामिल था. कुरचोरम पुलिस शुरू में मामला दर्ज करने में हिचकिचा रही थी और स्थानीय निवासियों के दबाव के बाद ही ऐसा किया गया.” उन्होंने सवाल उठाया, “गोवा राज्य महिला आयोग, गोवा राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राज्य शिक्षा विभाग अभी तक हरकत में क्यों नहीं आए हैं?”
मामले की जांच कर रही गोवा पुलिस की क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी ने ‘पीटीआई’ को बताया कि अब तक तीन लड़कियां शिकायत लेकर आगे आई हैं. अधिकारी ने कहा, “अधिक पीड़ितों को शिकायत दर्ज करने के लिए प्रोत्साहित करने के प्रयास जारी हैं. पीड़ितों की सटीक संख्या जांच पूरी होने के बाद ही पता चल पाएगी.”
भारत-चीन की राजनीतिक दिशाओं की तुलना; ‘हमारा विमर्श सिर्फ सांप्रदायिक लामबंदी का जरिया बन गया है’
‘द टेलीग्राफ’ में असीम अली ने ‘इतिहास के प्रतिशोध’ के विचार के माध्यम से भारत और चीन की राजनीतिक दिशाओं की तुलना की है. उनका कहना है कि चीनी सपना एक सामूहिक, राज्य-नेतृत्व वाला और ऐतिहासिक रूप से निर्देशित दृष्टिकोण है, जिसका लक्ष्य चीन को एक समृद्ध, शक्तिशाली और तकनीकी रूप से उन्नत राष्ट्र बनाना है, जबकि भारत का सार्वजनिक विमर्श मुगलों और गजनवी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है. अंग्रेजी में उनके लेख के प्रमुख अंश यहां हिंदी में प्रस्तुत हैं.
अली के अनुसार, राजनीति अक्सर ‘रियर व्यू मिरर’ यानी अतीत की घटनाओं से प्रेरित होती है. 2014 के बाद से भारत में सत्तारूढ़ विचारधारा ने सावरकरवादी इतिहास को स्थापित करने पर जोर दिया है. इस नजरिए में भारतीय इतिहास को मुख्य रूप से हिंदुओं और उनके ‘साझा शत्रु’ (मुसलमानों) के बीच के संघर्ष के रूप में देखा जाता है. बॉलीवुड फिल्मों (जैसे तानाजी, द कश्मीर फाइल्स) के माध्यम से इस धारणा को और गहरा किया गया है, जहाँ अतीत के संघर्षों को वर्तमान की सांप्रदायिक राजनीति का आधार बनाया जाता है.
वे अपने इस लंबे लेख में दो तरह की ‘प्रतिशोध की राजनीति’ का वर्णन करते हैं. (एक)-प्रतिक्रियावादी प्रतिशोध, जिसका लक्ष्य अपने ही देश के अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना होता है. इसे अली असम के डिटेंशन कैंपों और देश में बढ़ती लिंचिंग की घटनाओं से जोड़ते हैं. (दो)-प्रगतिशील प्रतिशोध, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक शोषण, जैसे सामंतवाद और उपनिवेशवाद को खत्म करना होता है. चीन में माओ ज़ेदोंग ने विदेशी शक्तियों द्वारा थोपी गई ‘अपमान की सदी’ का बदला लेने के लिए साम्यवाद को एक औजार बनाया. भारत में भी 1970 के दशक तक नेहरूवादी राष्ट्रवाद ने आर्थिक संप्रभुता और उपनिवेशवाद के खिलाफ ‘ग्लोबल साउथ’ को एकजुट करने का प्रयास किया था.
लेकिन शीत युद्ध के बाद भारत और चीन के रास्ते अलग हो गए. चीन ने अपनी संप्रभुता और बाजारों पर नियंत्रण बनाए रखा. शी जिनपिंग का ‘चीनी सपना’ ऐतिहासिक कायाकल्प और तकनीकी शक्ति पर आधारित है, जो विदेशी प्रभुत्व के अपमान का बदला लेने की भावना से जुड़ा है. जबकि भारतीय अभिजात वर्ग ने 1990 के बाद ‘इतिहास के अंत’ के प्रतिमान को अपनाया और पश्चिम के साथ रणनीतिक संरेखण शुरू किया. मनमोहन सिंह का ‘भारतीय सपना’ अमेरिकी सपने की नकल था, जो केवल मध्यम वर्ग के उपभोग और ऊपर की ओर गतिशीलता तक सीमित था.
उनका तर्क है कि वर्तमान मोदी शासन का ‘इतिहास का बदला’ लेना उपनिवेशवाद के खिलाफ नहीं, बल्कि मध्यकालीन मुस्लिम शासकों के खिलाफ केंद्रित है. विडंबना यह है कि आज का भारत बाहरी शक्तियों (जैसे अमेरिका) को अपनी नीतियों को प्रभावित करने की अनुमति दे रहा है, जो औपनिवेशिक मानसिकता का ही एक रूप है.
अंततः, जहाँ चीन ने अपने ‘अपमान’ को एक आधुनिक और तकनीकी राष्ट्रवाद में बदल दिया, वहीं भारत का सार्वजनिक विमर्श मुगलों और गजनवी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है. यह विमर्श संरचनात्मक सुधारों और वास्तविक वि-औपनिवेशीकरण के बजाय केवल सांप्रदायिक लामबंदी का जरिया बन गया है. पूरा लेख यहां पढ़ा जा सकता है.
फेथ केट्स: वह महिला जिसने मॉडल्स को अपने ‘प्रिय मित्र’ जेफरी एपस्टीन से मिलवाया
“द गार्डियन” की एक जाँच में पाया गया है कि मॉडलिंग उद्योग के शीर्ष पर बैठी एक महिला कार्यकारी की जेफरी एपस्टीन के साथ गहरी दोस्ती थी और उन्होंने एजेंसी की मॉडल्स को उससे मिलवाया था.
लूसी ओसबोर्न की इस रिपोर्ट के अनुसार, पिछले नवंबर तक, फेथ केट्स ‘नेक्स्ट मैनेजमेंट’ मॉडलिंग और टैलेंट एजेंसी चला रही थीं. यह एजेंसी एलेक्सा चुंग, मिला जोवोविच और बिली इलिश जैसी हस्तियों का प्रतिनिधित्व कर चुकी है. केट्स इस व्यवसाय की संस्थापक थीं और दशकों तक इस पद पर रहीं. एपस्टीन से जुड़ी पहली बड़ी फाइलों के सार्वजनिक होने से कुछ हफ्ते पहले ही उन्होंने चुपचाप अपना पद छोड़ दिया था, यह कहते हुए कि वह अब धर्मार्थ कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहती हैं.
केट्स और दिवंगत यौन अपराधी एपस्टीन के बीच संबंधों की खबरें पहले भी आई थीं, लेकिन अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा प्रकाशित दस्तावेजों के विश्लेषण से पहले की तुलना में कहीं अधिक गहरे संबंधों का पता चलता है. ईमेल से पता चलता है कि केट्स गुप्त रूप से एपस्टीन से व्यावसायिक सलाह लेती थीं और करोड़ों डॉलर के ऋणों पर चर्चा करती थीं.
ऐसा प्रतीत होता है कि केट्स नियमित रूप से एपस्टीन से मिलती थीं. दिसंबर 2010 में न्यूयॉर्क के एक डिपार्टमेंटल स्टोर में तत्कालीन प्रिंस एंड्रयू के साथ उनकी एक मुलाकात भी शामिल है. यह वही हफ्ता था जब एंड्रयू माउंटबेटन-विंडसर अपनी उस कुख्यात यात्रा पर न्यूयॉर्क आए थे, जिसके बारे में कहा गया था कि वह फाइनेंसर (एपस्टीन) से अपनी दोस्ती खत्म करने आए हैं.
68 वर्षीय केट्स ने 2009 में वेश्यावृत्ति के लिए एक नाबालिग को उकसाने के जुर्म में एपस्टीन को पहली बार दोषी ठहराए जाने के बाद उसे अपना समर्थन और “बिना शर्त” दोस्ती की पेशकश की थी. 2019 में एपस्टीन की दोबारा गिरफ्तारी से कुछ हफ्ते पहले तक वह उसे मैत्रीपूर्ण ईमेल भेज रही थीं. जाँच से पता चला है कि केट्स और जेफरी एपस्टीन के बीच लगभग 40 साल पुराना और बेहद गहरा रिश्ता था. फाइलों में केट्स का नाम 5,000 से अधिक बार आया है, जहाँ उन्होंने एपस्टीन को “भाई जैसा” प्रिय मित्र बताया है.
सबसे गंभीर आरोप यह है कि केट्स ने अपनी एजेंसी की युवा मॉडल्स को एपस्टीन से मिलवाने में एक ‘पुल’ की तरह काम किया. 1990 के दशक में उन्होंने ऐसी डिनर पार्टियों का आयोजन किया जहाँ अमीर व्यापारियों का मेल-जोल युवा मॉडल्स से कराया जाता था.
स्टेसी विलियम्स: 1992 में केट्स ने ही उन्हें एपस्टीन से मिलवाया. विलियम्स, जो उस समय ‘नेक्स्ट’ की शीर्ष मॉडल्स में से एक थीं, ने बताया कि इसके लगभग तीन महीने बाद केट्स उन्हें ‘प्लाजा होटल’ में डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा आयोजित एक पार्टी में ले गईं, जहाँ उनकी मुलाकात फिर से एपस्टीन से हुई. विलियम्स आगे चलकर एपस्टीन के साथ रिश्ते में रहीं. उन्होंने कहा कि यह रिश्ता आपसी सहमति से था, लेकिन “उस रिश्ते के दायरे में होने वाली कुछ घटनाएँ सहमति से नहीं थीं.” इसमें वह आरोप भी शामिल है जिसमें उन्होंने कहा कि ट्रम्प ने उनके साथ छेड़छाड़ की थी, जो उनके अनुसार उन दोनों पुरुषों (ट्रम्प और एपस्टीन) के बीच किसी “विकृत खेल” का हिस्सा था.
बारबरा स्टोयानोफ़: विक्टोरियाज़ सीक्रेट मॉडल बारबरा को केट्स ने यह कहकर एपस्टीन से मिलवाया कि वह उनके करियर में मदद कर सकता है. कार्यालय में हुई उस मुलाकात के दौरान एपस्टीन ने मॉडल के साथ बेहद आपत्तिजनक व्यवहार किया. स्टोयानोफ़ ने ‘गार्डियन’ को बताया कि “उसने मुझे खड़े होने के लिए कहा... और मेरी टांगें देखने के लिए मेरी ड्रेस ऊपर खींचने को कहा, फिर उसने मुझे पीछे से अपनी ड्रेस उठाने के लिए कहा ताकि वह देख सके कि मेरा पिछला हिस्सा (बट) कैसा है.”
सेना सेच: केट्स ने 20 वर्षीय सेना को एपस्टीन के घर भेजा था, जहाँ एपस्टीन ने उनका अपमान किया. सेच ने बताया कि एपस्टीन ने उनके हाथ देखने को कहा. उन्होंने याद किया कि उसने तब कहा: “उफ़, तुम्हारे नाखून कितने गंदे हैं, तुम उस तरह की लड़की नहीं हो जिसे हम जेट पर ले जाते हैं.” उन्होंने कहा कि वह रोते हुए वहां से निकलीं और सालों बाद उन्हें एहसास हुआ कि जिस व्यक्ति ने उनका अपमान किया था, वह एपस्टीन था. उन्होंने कहा, “जब मुझे एहसास हुआ कि मैं एक बड़ी मुसीबत से बाल-बाल बच गई, तो मुझे अपने पेट में पत्थर जैसा महसूस हुआ.”
जाँच में पाया गया कि एपस्टीन केवल केट्स का मित्र ही नहीं, बल्कि उनका गुप्त व्यावसायिक सलाहकार भी था. 2015 से 2018 के बीच, एपस्टीन ने केट्स को ‘नेक्स्ट मैनेजमेंट’ के सह-मालिकों (गोल्डन गेट कैपिटल) की हिस्सेदारी खरीदने के लिए $60 लाख के गुप्त ऋण की पेशकश की थी. उसने केट्स को बाकायदा ‘स्क्रिप्ट’ लिखकर दी थी कि उन्हें अपने बिजनेस पार्टनर्स से क्या बात करनी है. जब एपस्टीन पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लग रहे थे, तब केट्स ने उसका बचाव किया. उन्होंने आरोपों को “पैसों के लिए किया गया नाटक” करार दिया. एपस्टीन ने भी केट्स को महंगे ‘प्राडा’ हैंडबैग, $12,000 का चूल्हा और उनके चैरिटी फंड में $50,000 का दान देकर उपकृत किया. केट्स ने एपस्टीन को अपनी छवि सुधारने के लिए “सकारात्मक कार्यों में दान” करने की रणनीतिक सलाह भी दी थी.
यह मामला दर्शाता है कि कैसे ग्लैमर उद्योग के शीर्ष पर बैठे प्रभावशाली लोगों ने अपने पद का दुरुपयोग कर युवा मॉडल्स को असुरक्षित परिस्थितियों में धकेला. फेथ केट्स का मामला न केवल एक व्यक्तिगत पतन है, बल्कि मॉडलिंग उद्योग के भीतर व्याप्त उस ‘सिस्टम’ पर भी सवाल उठाता है जिसने दशकों तक एक अपराधी को फलने-फूलने में मदद की.
अपील :
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