28/07/2025: 91.69% फॉर्म जमा, आयोग ने खुद की पीठ ठोंकी | फिर मंदिर में भगदड़, 8 मौतें | भाजपा की कथनी/करनी | गवई का रिटायरमेंट प्लान | टेस्ट ड्रॉ | संतूर बनाने वाले आखिरी हाथ
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल
आज की सुर्खियां :
आयोग के मुताबिक 91.69% मतदाताओं के फॉर्म जमा, पहले चरण की सफल समाप्ति की घोषणा
“एसआईआर” कराना उचित या नहीं, सुप्रीम कोर्ट में आज तय होगा
सीजेआई गवई ने कहा, रिटायरमेंट के बाद किसी भी सरकारी पद को स्वीकार नहीं करेंगे
वार्षिक आय 3 रुपया, भारत का सबसे गरीब आदमी मध्यप्रदेश में
भारत-इंग्लैंड टेस्ट : वॉशिंगटन और जडेजा की पारियों ने मैच ड्रा करवाया
हरिद्वार मनसा देवी मंदिर में भगदड़: 8 की मौत, कई घायल
आकार पटेल: भाजपा की कथनी और करनी पर आईना दिखाना जरूरी है
उद्धव को जन्मदिन की बधाई देने राज ठाकरे 6 साल बाद मातोश्री पहुंचे, उद्धव ने कहा - 'मैं अभिभूत हूं'
खड़गे ने धनखड़ के इस्तीफे पर कहा- 'यह उनके और मोदी के बीच का मामला है'
श्रीनगर की ऊंची पहाड़ियों में सेना पर घुमंतू आदिवासियों की पिटाई का आरोप
पूर्व मंत्री एकनाथ खडसे के दामाद ड्रग्स केस में गिरफ्तार, पुणे पुलिस ने सात लोगों को पकड़ा
फर्जी राजदूत ने 300 करोड़ की ठगी और 162 बार विदेश यात्रा की
आलोचना के बाद वंचित समुदायों के छात्रों को लंबित छात्रवृत्ति प्रदान की
टीसीएस 2% कर्मचारी छंटनी करेगा
17 वर्षीय को पेड़ से बांधा, पीटकर मार डाला
'लाडकी बहिन योजना' में बड़ा फर्जीवाड़ा: 14,000 पुरुषों ने महिला बनकर उठाया लाभ
मोदी-शाह द्वारा बंगाली प्रवासियों को 'बांग्लादेशी' कहना खतरनाक
गाजा में आंशिक युद्धविराम की घोषणा
थाईलैंड और कंबोडिया सीमा विवाद पर वार्ता करेंगे
कश्मीर की संगीतमय विरासत बचाने की लड़ाई
आयोग के मुताबिक 91.69% मतदाताओं के फॉर्म जमा, पहले चरण की सफल समाप्ति की घोषणा
भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने रविवार, 27 जुलाई, 2025 को घोषणा की कि बिहार में 2025 की मतदाता सूची में पंजीकृत 91.69% मतदाताओं ने चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के हिस्से के रूप में गणना फॉर्म जमा कर दिए हैं. इन मतदाताओं को 1 अगस्त को प्रकाशित होने वाली मसौदा सूची में शामिल किया जाएगा. 24 जून तक पंजीकृत 7.89 करोड़ मतदाताओं में से 7.24 करोड़ से अधिक ने गणना फॉर्म जमा किए, जो इस प्रक्रिया में भारी भागीदारी को दर्शाता है. इसका प्रभावी अर्थ यह है कि जुलाई 2025 की सूची में पंजीकृत 65 लाख मतदाताओं के नाम 1 अगस्त की मसौदा सूची में शामिल नहीं होंगे. जिन मतदाताओं के नाम नहीं मिले हैं, उनमें लगभग 2.83% (22 लाख) मृतक, 4.59% (36 लाख) स्थायी रूप से स्थानांतरित या लापता और 0.89% (7 लाख) कई स्थानों पर नामांकित पाए गए. इन मतदाताओं की सही स्थिति की जानकारी 1 अगस्त तक निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ईआरओ) द्वारा फॉर्म की जांच के बाद ही पता चल पाएगी. हालांकि, वास्तविक मतदाताओं को 1 अगस्त से 1 सितंबर तक दावा और आपत्ति अवधि के दौरान मतदाता सूची में वापस जोड़ा जा सकता है.
चुनाव आयोग ने एक 10-सूत्रीय बयान में एसआईआर के विभिन्न लक्ष्यों को सूचीबद्ध किया. इनमें प्रत्येक पात्र मतदाता को शामिल करना, सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी, युवा और शहरी मतदाताओं को शामिल करना, और दावा और आपत्तियों की अवधि के दौरान मसौदा सूचियों की जांच और सभी शिकायतों का निवारण शामिल है. आयोग ने कहा कि 1 जुलाई, 2025 को 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके, या 1 अक्टूबर, 2025 तक 18 वर्ष के होने वाले युवा मतदाताओं को निर्धारित घोषणा पत्र के साथ फॉर्म 6 में अपना आवेदन दाखिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. आयोग 1 अगस्त से 1 सितंबर तक पूरे बिहार में ऐसे युवा मतदाताओं को नामांकित करने के लिए विशेष अभियान चलाएगा. एसआईआर प्रक्रिया के बारे में बताते हुए 5.7 करोड़ पंजीकृत मोबाइल नंबरों पर एसएमएस भेजे गए. इस अभ्यास को "पिछले दरवाजे से एनआरसी" बताकर विपक्षी दलों ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है, जिस पर सुनवाई 28 जुलाई को होनी है.
चुनाव आयोग ने कहा कि एसआईआर के पहले चरण की "सफल समाप्ति" का श्रेय बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी, 38 जिला निर्वाचन अधिकारियों, 243 ईआरओ, 2,976 एईआरओ और 77,895 मतदान केंद्रों पर तैनात बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) को भी जाता है. बीएलओ ने मतदाता सूची में शामिल प्रत्येक मतदाता के घर-घर जाकर गणना फॉर्म बांटे और भरे हुए फॉर्म इकट्ठा करने के लिए कम से कम तीन दौरे किए. कोई भी अस्थायी प्रवासी पीछे न छूटे, यह सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रयास किए गए. लगभग 16 लाख प्रवासी श्रमिकों ने अपने गणना फॉर्म ऑनलाइन भरे, जबकि अन्य 13 लाख ने फॉर्म डाउनलोड किए. शहरी मतदाताओं के लिए सभी 261 शहरी स्थानीय निकायों के 5,683 वार्डों में विशेष शिविर लगाए गए. ईसीआई ने राजनीतिक दलों के साथ मृतक मतदाताओं, जिनके गणना फॉर्म प्राप्त नहीं हुए थे, या जो स्थायी रूप से चले गए थे, की बूथ-स्तरीय सूचियां भी साझा कीं ताकि वे ऐसे मतदाताओं के बारे में पूछताछ कर सकें.
'द टेलीग्राफ' की रिपोर्ट है कि चुनाव आयोग ने रविवार को उन लोगों पर निशाना साधा जो, उसके अनुसार, यह धारणा बना रहे हैं कि बिहार में प्रकाशित होने वाली मतदाता सूची की प्रारूप सूची (ड्राफ्ट) ही अंतिम सूची है. चुनाव आयोग ने कहा कि वह यह समझ नहीं पा रहा है कि जब 1 अगस्त से 1 सितंबर तक पूरे एक महीने का समय दावों और आपत्तियों के लिए दिया गया है, तो “अब इतना हंगामा क्यों किया जा रहा है?” यह बयान बिहार में विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) के पहले चरण के समाप्त होने के बाद आया है. इस चरण में घर-घर जाकर अर्ध-भरे एन्युमरेशन फॉर्म मतदाताओं को बांटे गए थे, जिन्हें भरकर वापस करना था. अब तक 7.24 करोड़ मतदाताओं से एन्युमरेशन फॉर्म प्राप्त किए गए हैं. आयोग ने कहा कि इनमें से 36 लाख लोग या तो स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके हैं या फिर उपलब्ध नहीं पाए गए. साथ ही यह भी बताया गया कि लगभग 7 लाख मतदाता ऐसे पाए गए जो एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत हैं.
आयोग ने पूछा, “राजनीतिक दलों के 1.6 लाख बूथ स्तर के एजेंट्स से यह क्यों नहीं कहा जा रहा कि वे 1 अगस्त से 1 सितंबर के बीच दावे और आपत्तियां दर्ज करें?” बूथ लेवल एजेंट्स, जो राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त किए जाते हैं, मतदाता सूची को तैयार करने और अद्यतन करने की प्रक्रिया में चुनाव आयोग के बूथ लेवल अधिकारियों के साथ मिलकर काम करते हैं. आयोग ने स्पष्ट किया कि “कुछ लोग क्यों यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि ड्राफ्ट लिस्ट ही फाइनल लिस्ट है, जबकि विशेष सघन पुनरीक्षण के आदेशों के अनुसार ऐसा नहीं है.”
इसी बीच राज्य के विभिन्न विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया में करोड़ों पात्र नागरिकों के नाम दस्तावेज़ों के अभाव में मतदाता सूची से बाहर कर दिए जाएंगे, जिससे उन्हें मतदान का अधिकार नहीं मिल पाएगा. उनका यह भी कहना है कि इससे सत्तारूढ़ बीजेपी को फायदा मिलेगा, क्योंकि राज्य की सरकारी मशीनरी उन लोगों को निशाना बनाएगी जो सत्तारूढ़ गठबंधन के विरोध में हैं.
कांग्रेस ने रविवार को हमला तेज करते हुए कहा कि चुनाव आयोग को “संस्थागत अहंकार” नहीं दिखाना चाहिए और बिहार में चल रही इस विशेष सघन पुनरीक्षण प्रक्रिया को तत्काल रोक देना चाहिए.
कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने, भाकपा(माले) महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, राजद सांसद मनोज झा और माकपा नेता नीलोत्पल बसु के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “यह कोई राजनीतिक ज़िद का मामला नहीं है, न ही संस्थागत घमंड का. मैं चुनाव आयोग से विनम्र निवेदन करता हूं, कृपया इस पर पुनर्विचार करें. हर कोई आपसे यही कह रहा है.”
वहीं भाजपा ने विपक्षी इंडिया गठबंधन पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि वे “विदेशी घुसपैठियों के सहारे भारतीय लोकतंत्र को लूटने” की कोशिश कर रहे हैं.
“एसआईआर” कराना उचित या नहीं, सुप्रीम कोर्ट में आज तय होगा
सुप्रीम कोर्ट कल सोमवार 28 जुलाई को बिहार में मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई करेगा. जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमल्या बागची की पीठ मामले की सुनवाई करेगी. याचिकाकर्ता इस कदम को 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बड़े पैमाने पर मतदाता बहिष्कार का कारण मानते हैं और कहते हैं कि चुनावी राज्य में इतनी कम अवधि में इस प्रकार का "गंभीर" संशोधन आवश्यक नहीं था. याचिकाकर्ता संगठन और विपक्षी दल यह तर्क दे रहे हैं कि एसआईआर के कारण कई वैध मतदाता अपना मतदान अधिकार खो सकते हैं, जिससे चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट अब इस प्रक्रिया की वैधता, समय और चुनाव आयोग की अधिकारिता पर विचार करेगा. चुनाव आयोग और याचिकाकर्ताओं के तर्कों को सुनकर यह तय करेगा कि चुनाव से पहले इतने व्यापक स्तर पर मतदाता सूची संशोधन करना उचित और संवैधानिक है या नहीं?
सीजेआई गवई ने कहा, रिटायरमेंट के बाद किसी भी सरकारी पद को स्वीकार नहीं करेंगे
'द वायर' की रिपोर्ट है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई ने कहा है कि वे रिटायरमेंट के बाद किसी भी सरकारी पद को स्वीकार नहीं करेंगे. सीजेआई गवई ने शुक्रवार (25 जुलाई) को कहा, "मैंने फैसला किया है कि रिटायरमेंट के बाद मैं किसी भी सरकारी पद को स्वीकार नहीं करूंगा... रिटायरमेंट के बाद मुझे अधिक समय मिलेगा, इसलिए मैं दारापुर, अमरावती और नागपुर में अधिक समय बिताने की कोशिश करूंगा." सीजेआई गवई, जो इस साल नवंबर में रिटायर होने वाले हैं, ने यह टिप्पणी महाराष्ट्र के अमरावती जिले में अपने पैतृक गांव दारापुर में एक सम्मान समारोह के दौरान की. गांव में प्रवेश करते ही सीजेआई गवई का बड़ी संख्या में लोगों ने स्वागत किया. इसके बाद, सीजेआई गवई ने अपने पिता, स्वर्गीय आर.एस. गवई, जो केरल और बिहार के पूर्व राज्यपाल थे, के स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की. सीजेआई ने अपने पिता की पुण्यतिथि के अवसर पर कुछ परिवारजनों के साथ एक कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया. उन्होंने दारापुर के रास्ते में अपने पिता के नाम पर बनने वाली एक भव्य द्वार के लिए आधारशिला भी रखी.
वार्षिक आय 3 रुपया, भारत का सबसे गरीब आदमी मध्यप्रदेश में
मध्यप्रदेश के सतना जिले के एक किसान की वार्षिक आय सिर्फ 3 रुपये दर्शाने वाला एक आधिकारिक आय प्रमाण पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसके बाद कांग्रेस ने चुटकी ली कि “भारत का सबसे गरीब आदमी” मुख्यमंत्री मोहन यादव के शासन में मिला है.
इसके बाद, अधिकारियों ने प्रमाण पत्र का एक संशोधित संस्करण जारी किया और कहा कि पहले का प्रमाण पत्र एक लिपिकीय गलती का परिणाम था. प्रारंभिक प्रमाण पत्र कोठी तहसील कार्यालय द्वारा जारी किया गया था और उस पर स्थानीय तहसीलदार के हस्ताक्षर थे.
यह घटना तब हुई जब नया गांव के निवासी रामस्वरूप ने कोठी तहसील कार्यालय में आय प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया था. जब उन्हें 22 जुलाई को दस्तावेज़ मिला, तो उसमें उनके परिवार की वार्षिक आय 3 रुपये दर्शाई गई थी, जिससे उनकी मासिक आय मात्र 25 पैसे हो जाती है. आनंद मोहन जे के मुताबिक, प्रमाण पत्र पर तहसीलदार सौरभ द्विवेदी के हस्ताक्षर थे और उसमें उल्लेख था कि आय का विवरण आवेदक द्वारा दी गई स्व-घोषणा पर आधारित है. हालांकि, 25 जुलाई को एक नया प्रमाण पत्र जारी किया गया, जिसमें उनकी वार्षिक आय 30,000 रुपये, यानी 2,500 रुपये प्रति माह बताई गई थी.
क्रिकेट
भारत-इंग्लैंड टेस्ट : वॉशिंगटन और जडेजा की पारियों ने मैच ड्रा करवाया
भारत-इंग्लैंड के बीच मैनचेस्टर में खेले गए चौथे टेस्ट में, वॉशिंगटन सुंदर और रवींद्र जडेजा ने दो सत्र से अधिक समय तक बल्लेबाज़ी कर भारत को लगभग तय लग रही हार से बचा लिया और ऐतिहासिक ड्रा दिलाया. परिपक्वता से भरी दोनों की पारियों की बदौलत यह रोमांचक सीरीज़ ओवल में होने वाले फाइनल टेस्ट तक जीवित रही.
इंग्लैंड ने पहली पारी में 669 रन बनाए थे. भारत पहली पारी में 358 रन ही बना सका, जिससे इंग्लैंड को 311 रनों की बढ़त हासिल हुई. दूसरी पारी में भारत के दोनों सलामी बल्लेबाज शून्य पर आउट हो गए, लेकिन कप्तान शुभमन गिल (103), केएल राहुल (90), रवींद्र जडेजा (107*), और वॉशिंगटन सुंदर (101*) ने जबरदस्त जुझारूपन दिखाया. शुभमन गिल ने सीरीज़ का अपना चौथा शतक जड़ा, और वे इंग्लैंड में एक टेस्ट सीरीज़ में 700 रन बनाने वाले पहले एशियाई बल्लेबाज़ बने.
हरिद्वार मनसा देवी मंदिर में भगदड़: 8 की मौत, कई घायल
'द हिन्दू' की रिपोर्ट है कि उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित प्रसिद्ध मनसा देवी मंदिर में रविवार सुबह भगदड़ मच गई, जिसमें आठ लोगों की मौत हो गई और करीब 30 श्रद्धालु घायल हो गए. अधिकारियों के अनुसार, हादसा उस वक्त हुआ जब मंदिर की सीढ़ियों पर भारी भीड़ जुटी हुई थी और बिजली की तार टूटने की अफवाह से अचानक भगदड़ मच गई. मरने वालों में उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड के लोग शामिल हैं, जिनकी उम्र 12 से 60 वर्ष के बीच है.
हृदयविदारक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए हैं, जिनमें श्रद्धालुओं को सीढ़ियों पर एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते, बच्चों को गोद में लिए लोगों को सांस लेने के लिए जूझते देखा गया. कई लोग रेलिंग फांदकर जान बचाने की कोशिश करते दिखे. घटनास्थल पर चप्पलें, पूजा की थालियां और कपड़े बिखरे पड़े थे. पुलिस और SDRF (राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल) की टीमें तुरंत मौके पर पहुंचीं और कई घंटे तक राहत कार्य जारी रहा.
हरिद्वार के ज़िलाधिकारी मयूर दीक्षित ने घटना की मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए हैं. एक उप-जिलाधिकारी (SDM) के नेतृत्व में जांच समिति 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट देगी. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हादसे पर शोक व्यक्त करते हुए मृतकों के परिजनों को ₹2 लाख और घायलों को ₹50,000 की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की, उन्होंने अस्पताल जाकर पीड़ितों से भी मुलाकात की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी घटना पर दुख जताया है. मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष रविंद्र पुरी ने मृतकों के परिजनों को ₹5 लाख और घायलों को ₹1 लाख की सहायता की घोषणा की है. आम आदमी पार्टी ने इसे प्रणाली की विफलता बताया और कहा कि त्योहारों और सप्ताहांत के दौरान भीड़ प्रबंधन की गंभीर जरूरत है.
विश्लेषण
आकार पटेल: भाजपा की कथनी और करनी पर आईना दिखाना जरूरी है
"संयुक्त परिवार और अटूट विवाह हिंदू समाज का आधार रहे हैं. जो कानून इस आधार को बदलते हैं, वे अंततः समाज के विघटन का कारण बनेंगे. इसलिए जनसंघ हिंदू विवाह और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियमों को रद्द कर देगा."
यह 1957 की पार्टी के घोषणापत्र से है. जनसंघ/भाजपा का तलाक का विरोध और संयुक्त परिवारों का समर्थन महिलाओं के अधिकारों पर हमले के साथ भी था. 1950 के दशक की शुरुआत में अपने मसौदा कानूनों में डॉ बी आर अम्बेडकर ने हिंदू व्यक्तिगत कानून में मामूली बदलाव प्रस्तावित किए थे, खासकर महिलाओं के लिए विरासत के सवाल पर. उन्होंने पारंपरिक विरासत कानून के दो प्रमुख रूपों की पहचान की और उनमें से एक को संशोधित करके महिलाओं के लिए विरासत को अधिक न्यायसंगत बनाया. अपने 1951 के घोषणापत्र में जनसंघ ने हिंदू कोड बिल में इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा था कि सामाजिक सुधार ऊपर से नहीं बल्कि समाज से आना चाहिए. 1957 में, जिसका ऊपर हवाला दिया गया है, उसने कहा कि ऐसे बदलाव तब तक स्वीकार्य नहीं हैं जब तक वे प्राचीन संस्कृति में जड़ें न जमाए हों. इसका डर था कि इससे 'उच्छृंखल व्यक्तिवाद' पैदा होगा.
तलाक के विरोध का एक हिस्सा शाश्वत विवाह का विचार था. हालांकि, भौतिक तत्व यह था कि तलाकशुदा महिलाओं और विधवा बहुओं को संपत्ति में विरासत न मिले. समय के साथ यह स्थिति बदली, लेकिन पार्टी ने अपने घोषणापत्रों में अपनी स्थिति क्यों बदली, इसकी कोई व्याख्या नहीं है. जैसे-जैसे भारतीय समाज में तलाक कम दुर्लभ हुआ और जैसे-जैसे शहरी, उच्च जाति, मध्यमवर्गीय परिवार (भाजपा का आधार) अधिक एकल होते गए, संयुक्त परिवारों के प्रति प्रतिज्ञाबद्ध वफादारी का क्षरण हुआ.
जैसा कि हमने पहले के कॉलम में देखा था जहां जनसंघ/भाजपा द्वारा अर्थव्यवस्था पर अपनी समाजवादी नीतियों के समान परित्याग को देखा था, यह जरूरी तौर पर कोई समस्या नहीं है. सभी पार्टियों को अपना रुख बदलने और स्थानांतरित करने का अधिकार है, लेकिन जब कोई स्थिति रखी जाती है, तो उसकी पीछे हटना और रद्दीकरण और उस रुख को अपनाना जिसका पहले विरोध किया जाता था, इसे भी स्पष्ट किया और समझाया जाना चाहिए. यह आरएसएस से जुड़ी राजनीतिक शक्ति ने नहीं करना चुना है.
जाति को कैसे संभालना है, इसकी बेचैनी भी इसके घोषणापत्रों में झलकती है. पार्टी ने कहा था कि वह "अस्पृश्यता और जातिवाद को समाप्त करके हिंदू समाज में समानता और एकता की भावना पैदा करेगी." लेकिन यह नहीं बताया कि कैसे. जनसंघ ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कांग्रेस की आरक्षण नीति में कुछ नहीं जोड़ा, उदाहरण के लिए इसे निजी क्षेत्र में धकेलकर या इसका विस्तार करके. दलितों को समर्थन इस तरह के विचारों से आता है जैसे "उनके फायदे के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण कक्षाओं, रिफ्रेशर कोर्सों और सेवाकालीन प्रशिक्षण की व्यवस्था." सांस्कृतिक रूप से, पार्टी शराब के खिलाफ दृढ़ता से खड़ी थी और राष्ट्रव्यापी शराबबंदी चाहती थी. और यह चाहती थी कि अंग्रेजी को सभी क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं और खासकर हिंदी से बदल दिया जाए. यह कुछ ऐसा है जिसके बारे में गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में बात की थी. हंगामे के बाद, भाजपा ने मीडिया आउटलेट्स को उनका वीडियो हटाने पर मजबूर किया, संभवतः इसलिए कि इसने उनके मध्यमवर्गीय आधार को नाराज किया.
एक और जगह जहां जनसंघ ने खुद को शहरी मध्यमवर्गीय पार्टी दिखाया, वह कृषि में था. अपने पहले घोषणापत्र के कृषि पर पहले बिंदु में "अधिक उत्पादन के लिए कड़ी मेहनत की आवश्यकता के बारे में किसान को शिक्षित करने और उत्साहित करने के लिए देशव्यापी अभियान" की मांग की गई है. आज किसी भाहरी भाजपा मंत्री की हिम्मत होगी कि वह भारत के किसानों पर पर्याप्त कड़ी मेहनत न करने का आरोप लगाए, और कृषि बिलों पर समर्पण दिखाता है कि पार्टी भारतीय किसान की सोच से दूर रहती है.
विदेशी मामलों पर, एक विषय जिस पर भाजपा ने हाल ही में कई स्वर्ण पदक जीते हैं, जनसंघ का दुनिया और उसमें भारत की जगह के बारे में कोई खास रणनीतिक दृष्टिकोण नहीं था, सिवाय इसके कि भारत को उन सभी के साथ मित्र होना चाहिए जो मित्रतापूर्ण थे और उन पर सख्त होना चाहिए जो नहीं थे. यह चाहता था कि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जगह दी जाए लेकिन इसका कोई उल्लेख नहीं था कि क्यों या भारत की भूमिका क्या होगी, या अगर यह सीट चमत्कारिक रूप से दी जाती तो इसका प्रभाव और विकल्प कैसे बढ़ाए जा सकते हैं. इसने सुरक्षा परिषद तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं दिया. जनसंघ इस तरह की चीजों के बारे में जिस तरह सोचता था, उसमें कोई निरंतरता नजर नहीं आती. 1957 का घोषणापत्र पाकिस्तान-पुर्तगाली गठबंधन से उत्पन्न खतरे की गंभीर चेतावनी के साथ खुला. 1962 के घोषणापत्र में इसका कोई उल्लेख नहीं था बल्कि यह चीन से युद्ध हारने के लिए नेहरू की निंदा के साथ खुला. 1972 के घोषणापत्र में बांग्लादेश के युद्ध का कोई उल्लेख नहीं था जो कुछ ही सप्ताह पहले पाकिस्तान से अलग कर बनाया गया था. रक्षा नीति का इसका विचार इस तरह की मांगों से आया जैसे सभी लड़कों और लड़कियों के लिए अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण, मज़ल-लोडिंग बंदूकें (अठारहवीं सदी का हथियार) रखने के लिए लाइसेंस हटाना, राष्ट्रीय कैडेट कोर का विस्तार और परमाणु हथियारों का निर्माण. यह बिना किसी तालमेल के एक साथ पिरोई गई चीजों की श्रृंखला है.
पाठक पूछ सकता है कि 2025 में इन चीजों को उठाने का क्या मतलब है, और यह एक वैध सवाल है. शायद इसका जवाब यह है कि भाजपा हमारे देश की सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति है. यह क्या कहती है कि वह किसके लिए खड़ी है और अंततः क्या करती है, यह महत्वपूर्ण है. इसका अपना संविधान कहता है कि पार्टी "समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेगी," और यह अन्य पार्टियों को कानून द्वारा ऐसा करने पर मजबूर होने से वर्षों पहले आया था. आज यह संविधान से इन शब्दों को हटाने की बात कर रही है. इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि इसके अपने शब्दों को पार्टी को पढ़कर सुनाया जाए कि वह कुछ दबाव में है, भले ही वह कॉलमनिस्ट द्वारा डाला गया बहुत नरम दबाव हो, खुद को और अपने अंतहीन बदलावों को अपने मतदाताओं और इस देश के नागरिकों को समझाने के लिए.
(लेखक एमनेस्टी इंडिया के प्रमुख हैं.)
जन्मदिन की बधाई देने राज ठाकरे 6 साल बाद मातोश्री पहुंचे, उद्धव ने कहा - 'मैं अभिभूत हूं'
'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट है कि उद्धव ठाकरे के जन्मदिन के अवसर पर, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) प्रमुख राज ठाकरे कोई छह साल बाद उद्धव के निवास मातोश्री पहुंचे. उन्होंने उद्धव ठाकरे को गुलाब के फूलों का एक बड़ा गुलदस्ता भेंट किया और अपनी शुभकामनाएं दीं. राज ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के बीच गठबंधन की चर्चाओं के बीच, राज ने रविवार को उद्धव के निवास मातोश्री पर जाकर अपने चचेरे भाई को जन्मदिन की बधाई दी. यह लगभग दो दशकों में राज का ठाकरे परिवार के निवास पर दूसरा दौरा है, जब से उन्होंने शिवसेना से अलग होकर एमएनएस की स्थापना की थी. दोनों चचेरे भाइयों ने लगभग 20 मिनट साथ बिताए.
राज ठाकरे ने इस मौके पर एक ट्वीट भी किया, जिसमें लिखा - "मेरे बड़े भाई, शिवसेना प्रमुख श्री उद्धव ठाकरे के जन्मदिन के अवसर पर मैंने उनके निवास मातोश्री, जो स्वर्गीय माननीय श्री बाळासाहेब ठाकरे का निवास स्थान है, जाकर उन्हें शुभकामनाएं दीं…" मुलाकात के बाद मीडिया से संक्षेप में बात करते हुए उद्धव भावुक दिखे. उन्होंने कहा, "मैं अभिभूत हूं… मैं बोल नहीं पा रहा." उन्होंने आगे कुछ नहीं कहा. शिवसेना (यूबीटी) के नेताओं ने इस मुलाकात का स्वागत किया. यह दौरा एक राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समय पर हुआ है, जब महाराष्ट्र में स्थानीय निकायों के चुनाव आने वाले हैं और विधानसभा चुनावों से पहले शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस के बीच संभावित गठबंधन की अटकलें तेज हो रही हैं. यह चर्चा 5 जुलाई को दोनों दलों द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित मराठी समर्थक रैली के बाद और तेज हुई, जिसे संबंधों में नरमी और राजनीतिक सुलह की दिशा में एक प्रतीकात्मक कदम के रूप में देखा गया. 5 जुलाई के आयोजन के दौरान दोनों ने भविष्य में गठबंधन के संकेत दिए थे, जिसमें उद्धव ने कहा था, "हम आज एक साथ आए हैं, हमेशा के लिए एक साथ रहने के लिए."
खड़गे ने धनखड़ के इस्तीफे पर कहा- 'यह उनके और मोदी के बीच का मामला है'
'इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने रविवार को कहा कि उन्हें जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफे के वास्तविक कारण की कोई जानकारी नहीं है. उन्होंने कहा कि धनखड़ को यह बताना होगा कि वास्तव में क्या हुआ, क्योंकि यह मामला उनके और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच है. राज्यसभा में विपक्ष के नेता खरगे ने उल्लेख किया कि धनखड़ हमेशा सरकार का पक्ष लेते थे और जब भी विपक्ष ने किसानों, गरीबों या विदेश नीति से संबंधित मुद्दे उठाने की कोशिश की, उन्हें कभी अवसर नहीं दिया गया.
खड़गे ने यह पूछे जाने पर कि क्या धनखड़ को किसानों के पक्ष में बोलने के कारण इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया, उन्होंने कहा, "मुझे उन सभी विवरणों की जानकारी नहीं है. वह (धनखड़) हमेशा सरकार के पक्ष में थे. उन्हें बताना चाहिए कि क्या हुआ. जब हमने किसानों, गरीबों, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों या विदेश नीति से संबंधित कई मुद्दे उठाए, तो उन्होंने हमें कभी अवसर नहीं दिया (राज्यसभा में सभापति के रूप में)."
उन्होंने आगे कहा, "जब हमने गरीबों, महिलाओं पर अत्याचार, दलितों और उत्पीड़ितों, और हिंदू-मुस्लिम झड़पों जैसे मुद्दों पर नोटिस देकर मुद्दे उठाने की कोशिश की, तो उन्होंने हमें अवसर नहीं दिया. (धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफे का कारण) यह उनके और मोदी के बीच का मामला है. हमें इसकी कोई जानकारी नहीं है." एक आकस्मिक कदम में धनखड़ ने 21 जुलाई की शाम को उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया, जिसमें उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया, जिसने राजनीतिक हलकों में अटकलों को जन्म दिया. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लिखे अपने इस्तीफे में धनखड़ ने कहा कि वह तत्काल प्रभाव से पद छोड़ रहे हैं ताकि "स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता दी जा सके." कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष को बदलने के सवाल का जवाब देते हुए खरगे ने कहा, "इन सभी बातों को अभी नहीं कहा जा सकता. बाद में बात करेंगे." वर्तमान में, उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस समिति (केपीसीसी) के अध्यक्ष पद पर विस्तारित कार्यकाल के साथ बने हुए हैं. राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस के भीतर कुछ लोग उनकी जगह बदलने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि वह दो प्रमुख पदों पर हैं.
मोदी के 'मन की बात' कार्यक्रम के दौरान त्रिपुरा में हिंसा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'मन की बात' कार्यक्रम के दौरान त्रिपुरा के एक गांव में रविवार को हिंसा भड़क गई, जब कथित तौर पर टिपरा मोथा पार्टी (टीएमपी) के “गुंडों” ने बीजेपी कार्यकर्ताओं पर हमला कर दिया, जिसमें कम से कम सात कार्यकर्ता घायल हो गए. टीएमपी ने अपनी संलिप्तता से इनकार किया है. उल्लेखनीय है कि टीएमपी और बीजेपी राज्य सरकार में सहयोगी और घटक दल हैं. यह घटना खवाई जिले के अशारामबरी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत तक्षपारा गांव में हुई. वहां लगभग 30 बीजेपी कार्यकर्ता मोदी का 'मन की बात' सुनने के लिए इकट्ठा हुए थे. घायलों को खवाई ज़िला अस्पताल में भर्ती कराया गया. इनमें से दो की हालत नाजुक बताई गई है.
श्रीनगर की ऊंची पहाड़ियों में सेना पर घुमंतू आदिवासियों की पिटाई का आरोप
'द वायर' के लिए जहांगीर अली की रिपोर्ट है कि जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर की ऊपरी पहाड़ियों में शनिवार (26 जुलाई) को 50 राष्ट्रीय राइफल्स के एक अधिकारी द्वारा राजौरी ज़िले के चार घुमंतू आदिवासियों को कथित रूप से पीटने का मामला सामने आया है. पीड़ितों में मो. लियाक़त, मो. आज़म, शौकत अहमद और अब्दुल क़ादिर शामिल हैं, जिन्हें अलग-अलग स्तर की चोटें आई हैं. यह घटना पहलगाम आतंकी हमले के बाद बनाए गए नए सैन्य बेस कैंप के पास धगवान क्षेत्र में हुई, जहां सेना ने संदिग्ध आतंकियों की मदद के आरोप में इन आदिवासियों को निशाना बनाया.
पीड़ितों ने आरोप लगाया कि उन्हें दो समूहों में बांटकर पीटा गया. एक समूह में 10-15 लोगों को जानवरों की तरह पीटा गया, जबकि दूसरे समूह को हल्की मार पड़ी. आरोप है कि एक अधिकारी ने लकड़ी के भारी डंडे से पीटने का नेतृत्व किया, जबकि दो जवान उन्हें पकड़कर खड़े रहे. मो. लियाक़त ने बताया कि सैनिक उनके मौसमी घर पर आए और कहा कि "साहब तुम्हें बुला रहे हैं." जब वे कैंप पर पहुंचे, तो 40 से ज्यादा पुरुष पहले से वहां जमा थे. अधिकारी ने उन पर आतंकियों को खाना देने और उनकी जानकारी छिपाने का आरोप लगाया और दो दिन में घर खाली करने का अल्टीमेटम भी दिया.
पीड़ित लियाक़त बोले - “जब मैंने आरोपों से इनकार किया तो अधिकारी ने कहा – ‘पाकिस्तान जाओ और उन्हें (आतंकियों को) वहां से लेकर आओ’. फिर कहा – ‘हमारे लोग पहलगाम में मारे गए हैं.’ लेकिन हमारा उस घटना से क्या लेना-देना?” लियाक़त ने बताया कि उनकी सर्जरी होनी थी, लेकिन फिर भी अधिकारी ने दूसरा पैर भी तोड़ दिया. “अब मैं खड़ा भी नहीं हो सकता, बाथरूम तक नहीं जा सकता. बेहतर होता कि वहीं गोली मार देते.”
राजौरी के बुधल क्षेत्र से नेशनल कॉन्फ्रेंस विधायक और आदिवासी नेता जावेद चौधरी ने इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया और FIR दर्ज करने व दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की. “अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो समुदाय बड़े स्तर पर आंदोलन करेगा.”
पीड़ितों ने दावा किया कि पिटाई करने वाला अधिकारी लंबे बालों वाला था और उसका नाम उन्हें नहीं पता. सेना के श्रीनगर स्थित प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल एम.के. साहू से संपर्क नहीं हो पाया. श्रीनगर के एसएसपी जी.वी. संदीप चक्रवर्ती ने कहा कि पीड़ित राजधानी की ओर आ रहे हैं, पुलिस टीम उनसे संपर्क कर रही है.
धगवान एक दुर्गम पर्वतीय इलाका है जहां ज़बरवान रेंज और लिद्दर घाटी मिलती हैं. यह स्थान गुर्जर-बकरवाल समुदाय की 200 से ज्यादा परिवारों का गर्मियों का बसेरा होता है, जो पशुपालन कर जीवन यापन करते हैं. धगवान का क्षेत्र ट्रेकिंग और वन्यजीव प्रेमियों के लिए भी जाना जाता है, जो श्रीनगर को दाचीगाम, वस्तुरवन, ओवेरा और पहलगाम से जोड़ता है. सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, यह क्षेत्र हाल के वर्षों में आतंकियों का ट्रांजिट रूट बन चुका है. पीड़ितों ने दावा किया कि पहलगाम हमले के बाद सेना ने वहां नया बेस कैंप बनाया और इन्हीं आदिवासियों से लकड़ियां ढुलवाकर उसका निर्माण कराया गया.
यह कोई पहला मामला नहीं है. इससे पहले भी दिसंबर 2023 में पुंछ ज़िले में तीन गुर्जर युवकों की मौत और कई के घायल होने का आरोप सेना पर लगा था. नवंबर 2024 में किश्तवाड़ में चार नागरिकों को हिरासत में लेकर अत्याचार का आरोप लगा था. इन मामलों में सेना ने इंक्वायरी के आदेश दिए थे, लेकिन दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है.
जम्मू के वरिष्ठ विश्लेषक ज़फर चौधरी ने कहा - “गुर्जर समुदाय के भीतर यह भावना गहरी हो गई है कि उन्हें या तो जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है या इंसान के तौर पर बराबरी का दर्जा नहीं मिल रहा.” उन्होंने कहा कि अगर यह सोच राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, तो यह विच्छेदन और अन्याय की भावना को स्थायी बना सकती है. “ऐसी स्थिति में व्यापक कानूनी, प्रशासनिक और राजनीतिक प्रक्रिया जरूरी है.”
पूर्व मंत्री एकनाथ खडसे के दामाद ड्रग्स केस में गिरफ्तार, पुणे पुलिस ने सात लोगों को पकड़ा
'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट है कि पूर्व महाराष्ट्र मंत्री और एनसीपी (एसपी) नेता एकनाथ खडसे के दामाद प्रांजल खेवलकर को पुणे पुलिस ने रविवार तड़के एक स्टूडियो अपार्टमेंट से ड्रग्स के साथ गिरफ्तार किया है. इस रेड में कुल सात लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें दो महिलाएं और पांच पुरुष शामिल हैं. यह अपार्टमेंट पुणे के पॉश खराड़ी इलाके में स्थित है. क्राइम ब्रांच को इनपुट मिला था कि खराड़ी के एक अपार्टमेंट में रेव पार्टी चल रही है. सुबह करीब 3 बजे पुलिस ने छापा मारा. मौके से कोकीन, गांजा और शराब बरामद की गई. फील्ड किट टेस्ट में ड्रग्स की पुष्टि हुई है. पुलिस आयुक्त अमितेश कुमार ने बताया कि सभी सातों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है.
प्रांजल खेवलकर, एनसीपी (एसपी) नेता रोहिणी खडसे-खेवलकर के पति हैं. रोहिणी, एकनाथ खडसे की बेटी हैं. खडसे ने इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "मैंने अभी-अभी इस घटना के बारे में सुना है. मैं जानकारी जुटा रहा हूं. मुझे पहले से संदेह था कि राजनीतिक हालातों के चलते कुछ ऐसा हो सकता है, लेकिन अगर किसी ने गलत किया है, तो उसे सज़ा मिलनी चाहिए. मैं किसी गलत काम का समर्थन नहीं करूंगा." एकनाथ खडसे और बीजेपी मंत्री गिरीश महाजन के बीच लंबे समय से राजनीतिक तनाव है. खडसे के बयान से संकेत मिलता है कि वह इस रेड को राजनीतिक प्रतिशोध से जोड़कर देख रहे हैं.
फर्जी राजदूत ने 300 करोड़ की ठगी और 162 बार विदेश यात्रा की
गाजियाबाद में फर्जी दूतावास चलाने के आरोप में 47 वर्षीय हर्षवर्धन जैन की गिरफ्तारी से एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ है, जिसमें करीब 300 करोड़ रुपये की ठगी, पिछले दस वर्षों में 162 बार विदेशी यात्रा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैली 25 से अधिक शेल कंपनियों का नेटवर्क सामने आया है. जैन खुद को वर्षों से एक राजनयिक बताकर लोगों को विदेश में नौकरी दिलाने का लालच देता था और हवाला के जरिए पैसे की हेराफेरी करता था.
पुलिस की जांच में यह भी सामने आया कि जैन फर्जी दूतावास के जरिये हाई-प्रोफाइल लोगों से जुड़ाव दिखाकर लोगों को विदेशों में नौकरी दिलाने के नाम पर ठगता था. उसके पास विदेशों में कई बैंक अकाउंट्स का भी पता चला है. जैन की नजदीकी कुख्यात साधु चंद्रास्वामी तथा सऊदी हथियार डीलर अदनान खाशोगी से भी थी. जैन की तस्वीरें उनके साथ मिली हैं. जैन को अहमद अली सैयद नामक भगोड़े ठग से चंद्रास्वामी ने मिलवाया था. सैयद और जैन ने मिलकर 25 शेल कंपनियां खोलीं, जो हवाला चैनल से मनी लांड्रिंग में प्रयुक्त होती थीं.
आलोचना के बाद वंचित समुदायों के छात्रों को लंबित छात्रवृत्ति प्रदान की
'द टेलीग्राफ' की रिपोर्ट है कि केंद्र सरकार ने सामाजिक रूप से हाशिए पर पड़े वर्गों के 66 छात्रों को राष्ट्रीय विदेशी छात्रवृत्ति (NOS) प्रदान की है, जिनके प्रोविजनल पत्र पहले धन की कमी का हवाला देते हुए रोक दिए गए थे. इस मुद्दे पर सरकार का यू-टर्न तब आया जब इस कदम की विपक्ष ने कड़ी आलोचना की और छात्र समूहों ने विरोध प्रदर्शन किए. केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने गुरुवार (24 जुलाई) को केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को सूचित किया कि व्यय विभाग ने एक बार की छूट देने और 2025-26 में NOS के लिए 130 करोड़ रुपये प्रदान करने पर सहमति जताई है. इससे पहले, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने NOS के लिए चुने गए 106 उम्मीदवारों में से केवल 40 को प्रोविजनल छात्रवृत्ति पुरस्कार जारी किए थे. मंत्रालय ने कहा था कि शेष 66 उम्मीदवारों के लिए पत्र "धन की उपलब्धता के अधीन" जारी किए जा सकते हैं.
NOS कार्यक्रम 1954-55 में शुरू किया गया था. यह अनुसूचित जाति (SC), विमुक्त घुमंतू जनजातियों (DNT), अर्ध-घुमंतू जनजातियों, भूमिहीन कृषि मजदूरों या पारंपरिक कारीगर श्रेणियों के छात्रों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है, जिनके परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपये से कम है.
टीसीएस 2% कर्मचारी छंटनी करेगा
'द टेलिग्राफ' की रिपोर्ट है कि भारत की सबसे बड़ी आईटी सेवा कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) ने रविवार को कहा कि वह 2026 वित्तीय वर्ष में अपनी कार्यबल की लगभग 2% छंटनी करेगी, जिसका अर्थ है लगभग 12,200 नौकरियों में कटौती, जो मुख्य रूप से मध्यम और वरिष्ठ प्रबंधन को प्रभावित करेगी. कंपनी ने कहा कि यह कदम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और ऑटोमेशन द्वारा संचालित इसके विकसित हो रहे व्यवसाय मॉडल के साथ संरेखित है, जो अनिश्चित मांग के माहौल के बीच उठाया गया है.
17 वर्षीय को पेड़ से बांधा, पीटकर मार डाला
'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट है कि रतलाम जिले के नमली क्षेत्र में मेसावा गांव में शुक्रवार रात एक लड़की के माता-पिता और परिवार वालों ने कथित तौर पर एक 17 वर्षीय लड़के को पेड़ से बांधा, उसका सिर मुंडवाया और फिर उसे पीट-पीटकर मार डाला, जब उसे लड़की से मंदिर परिसर में मिलते हुए पकड़ा गया.
रतलाम जिला पुलिस अधीक्षक अमित कुमार के अनुसार, चार लोगों को हिरासत में लिया गया है और जांच चल रही है. यह घटना मेसावा गांव में हुई, जहां एक अन्य जाति का लड़का, जो एक नाबालिग लड़की के साथ रिश्ते में था, उसे मिलने के लिए बुलाया गया था, लेकिन रात 11 बजे के आसपास लड़की के माता-पिता ने उसे पकड़ लिया, जिसके बाद उसकी क्रूर हत्या कर दी गई.
पीड़ित के भाई ने बताया कि उसे शनिवार सुबह इस घटना की जानकारी मिली. “हम पड़ोसी गांव से हैं. जब मैं पहुंचा, तो मैंने अपने भाई को मंदिर के पास एक घर के निकट मृत पड़ा पाया. स्थानीय लोगों ने बताया कि उसे पहले पेड़ से बांधा गया, उसका सिर जबरन मुंडवाया गया और फिर उसे पीट-पीटकर मार डाला गया. उसके सिर पर गहरे घाव थे.”
'लाडकी बहिन योजना' में बड़ा फर्जीवाड़ा: 14,000 पुरुषों ने महिला बनकर उठाया लाभ
'द टेलिग्राफ' की रिपोर्ट है कि महाराष्ट्र में आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को ₹1,500 मासिक सहायता देने के लिए शुरू की गई ‘लाडकी बहिन योजना’ में बड़ा घोटाला सामने आया है. महिला एवं बाल विकास विभाग (WCD) की एक ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि लगभग 14,000 पुरुषों ने खुद को महिला बताकर जालसाजी से इस योजना का लाभ उठाया. ऑनलाइन फॉर्म में हेरफेर कर इन पुरुषों ने अपने दस्तावेजों में लिंग बदलकर खुद को पात्र दर्शाया. राज्य के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने शनिवार को कहा, "जो पुरुष इस योजना का फर्जीवाड़ा करके लाभार्थी बने हैं, उनसे पैसे वसूले जाएंगे. अगर वे सहयोग नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी."
अजित पवार ने यह भी बताया कि कुछ सरकारी महिला कर्मचारी भी योजना की लाभार्थी बन गई थीं, लेकिन जांच में उनके नाम हटा दिए गए. "जैसे-जैसे समीक्षा आगे बढ़ेगी, हम ऐसे और फर्जी नामों को हटाते रहेंगे," उन्होंने कहा. यह योजना अगस्त 2024 में शुरू हुई थी और नवंबर 2024 के विधानसभा चुनावों में भाजपा-नीत महायुति की बड़ी जीत का एक प्रमुख कारण मानी गई थी. इस घोटाले से एक ओर जहां प्रशासन की जांच व्यवस्था पर सवाल उठे हैं, वहीं योजना की साख को भी गहरा धक्का लगा है.
मोदी-शाह द्वारा बंगाली प्रवासियों को 'बांग्लादेशी' कहना खतरनाक
'द वायर' के लिए लिखे तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद जवाहर सरकार के एक लेख के अनुसार, ममता बनर्जी भाजपा के प्रवासी विरोधी रुख के चलते फिर से ताकतवर होकर उभर रही हैं. बंगाल में भाजपा द्वारा प्रवासी बंगालियों को ‘बांग्लादेशी’ कहना न सिर्फ मुस्लिमों बल्कि सभी गरीब बंगाली प्रवासियों के लिए खतरनाक है. ममता ने कोलकाता की सड़कों पर भारी विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया है.
लेख में बताया गया है कि बंगाल ने कभी क्षेत्रीय या बाहरी विरोधी राजनीति को नहीं अपनाया, जबकि कोलकाता में लाखों लोग बाहर से आए हुए हैं. बंगाली अपनी भाषा और संस्कृति को लेकर भावुक हैं और इतिहास में भाषा की रक्षा के लिए बलिदान भी दे चुके हैं.
बीजेपी शासित राज्यों में बंगाली मजदूरों को निशाना बनाया जा रहा है. गुजरात, हरियाणा और असम में बंगाली मजदूरों को बांग्लादेशी कहकर हिरासत में लिया गया या पीटा गया, यहां तक कि जब उनके पास भारतीय दस्तावेज थे. यह बंगालियों के खिलाफ एक समग्र हमले के रूप में देखा जा रहा है.
भाजपा बंगाली मुस्लिमों को निशाना बना रही है क्योंकि वे उसे वोट नहीं देते. लेकिन इससे ममता बनर्जी को एक भावनात्मक मुद्दा मिला है जो भ्रष्टाचार और अन्य मामलों में उनकी फिसलती लोकप्रियता को संभालने में मदद कर रहा है.
लेख यह भी उजागर करता है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) केवल हिंदू बांग्लादेशियों को नागरिकता देने का एक प्रयास है, जबकि मुस्लिम बंगाली प्रवासियों को ‘दीमक’ कहा जा रहा है. इससे भाषा-आधारित भेदभाव और विभाजन को बढ़ावा मिल रहा है.
लेखक का निष्कर्ष है कि मोदी-शाह की यह रणनीति भाजपा को अल्पकालिक लाभ दे सकती है, लेकिन यह दीर्घकालिक रूप से बेहद खतरनाक है और इससे भारत के सामाजिक और भाषाई ताने-बाने पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है. ममता बनर्जी इस मुद्दे को ‘भाषाई आतंकवाद’ करार देकर बंगालियों को भावनात्मक रूप से एकजुट कर रही हैं. यहां पढ़े पूरा लेख.
गाजा में आंशिक युद्धविराम की घोषणा
इज़राइल को गाजा में मानवीय संकट को लेकर बढ़ती अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ रहा है, जिसे सरकार खारिज करती है और दोहा में इज़राइल और फिलिस्तीनी उग्रवादी समूह हमास के बीच अप्रत्यक्ष युद्धविराम वार्ता बिना किसी समझौते के टूट गई है. सैन्य गतिविधियां अल-मवासी, तटीय क्षेत्र में एक नामित मानवीय क्षेत्र, मध्य देयर अल-बलाह और गाजा शहर में उत्तर की ओर, सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक अगली सूचना तक बंद रहेंगी.
जॉर्डन और संयुक्त अरब अमीरात ने रविवार को गाजा पट्टी में 25 टन सहायता सामग्री की हवाई डिलीवरी की, जो महीनों में उनकी पहली हवाई डिलीवरी थी, एक जॉर्डन के आधिकारिक स्रोत ने कहा. अधिकारी ने कहा कि हवाई डिलीवरी जमीन के रास्ते डिलीवरी का विकल्प नहीं है. गाजा शहर में फिलिस्तीनी स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा कि हवाई सहायता बक्सों के गिरने से कम से कम 10 लोग घायल हो गए.
थाईलैंड और कंबोडिया सीमा विवाद पर वार्ता करेंगे
'रॉयटर्स' की रिपोर्ट है कि थाईलैंड सरकार ने कहा कि थाईलैंड और कंबोडिया के नेता सोमवार को मलेशिया में अपने घातक सीमा विवाद पर मध्यस्थता वार्ता में भाग लेंगे, भले ही दोनों पक्ष एक-दूसरे पर विवादित क्षेत्रों में ताजा तोपखाने हमले शुरू करने का आरोप लगा रहे हों. वार्ता सोमवार को स्थानीय समयानुसार दोपहर 3 बजे शुरू होने वाली है, जिसमें कार्यवाहक प्रधानमंत्री फुमथम वेचायाचाई थाई वार्ता दल का नेतृत्व करेंगे, सरकार ने रविवार रात एक बयान में घोषणा की. मलेशिया, जो ASEAN क्षेत्रीय सहयोग मंच की अध्यक्षता करता है, ने थाई सरकार को सूचित किया है कि कंबोडियाई प्रधानमंत्री हुन मानेट भी वार्ता में भाग लेंगे, बयान में कहा गया.
मई के अंत में एक कंबोडियाई सैनिक की हत्या के बाद से थाईलैंड और कंबोडिया के बीच तनाव बढ़ गया है. दोनों पक्षों की सीमा पर सैनिकों की संख्या में वृद्धि हुई, जिसके बीच एक पूर्ण राजनयिक संकट ने थाईलैंड की नाजुक गठबंधन सरकार को पतन के कगार पर ला दिया है. गुरुवार को दोनों देशों के बीच शत्रुता फिर से शुरू हुई और केवल चार दिनों में यह दक्षिण पूर्व एशियाई पड़ोसियों के बीच एक दशक से अधिक समय में सबसे खराब लड़ाई में बढ़ गई. मृतकों की संख्या 30 से ऊपर हो गई है, जिसमें थाईलैंड में 13 नागरिक और कंबोडिया में आठ लोग शामिल हैं, जबकि अधिकारियों ने बताया कि सीमा क्षेत्रों से 200,000 से अधिक लोगों को निकाला गया है.
कंबोडिया के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि थाईलैंड ने रविवार सुबह सीमा पर कई बिंदुओं पर गोले दागे और जमीनी हमले किए. मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि ऐतिहासिक मंदिर परिसरों पर भारी तोपखाने से गोले दागे गए. इधर, थाई सेना ने कहा कि कंबोडियाई बलों ने रविवार को कई क्षेत्रों में, जिसमें नागरिकों के घरों के पास, गोलीबारी की और लंबी दूरी के रॉकेट लांचर तैनात कर रहे थे. सेना ने एक अपडेट में कहा, "स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है और कंबोडियाई सैनिक वार्ता से पहले अंतिम चरणों में अधिकतम नुकसान पहुंचाने के लिए तीव्र सैन्य अभियानों की तैयारी कर सकते हैं."
चलते-चलते
कश्मीर की संगीतमय विरासत बचाने की लड़ाई

'बीबीसी' के लिए बिसमा फारुख भट ने कश्मीर के आखिरी पारंपरिक हस्तनिर्मित संतूर वाद्य यंत्र निर्माता को लेकर एक रपोर्ट की है. कश्मीर की शांत, संकरी गलियों में एक छोटी, मंद रोशनी वाली कार्यशाला एक लुप्तप्राय कला का अंतिम गढ़ है. इस कार्यशाला में गुलाम मोहम्मद ज़ाज़ बैठते हैं, जिन्हें इस क्षेत्र का अंतिम कारीगर माना जाता है जो संतूर को हस्तनिर्मित करता है.
संतूर एक त्रिकोणीय तार वाला वाद्य यंत्र है, जो डल्सिमर जैसा है और इसे हल्के हथौड़ों से बजाया जाता है. इसकी क्रिस्टल जैसी घंटी-सी ध्वनि कश्मीर की संगीतमय पहचान रही है. ज़ाज़ सात पीढ़ियों से कश्मीर में संतूर, रबाब, सारंगी और सितार जैसे तार वाले वाद्य यंत्र बनाने वाले कारीगरों के वंश से हैं.
हाल के वर्षों में, हस्तनिर्मित वाद्य यंत्रों की मांग कम हो गई है, क्योंकि मशीन से बने सस्ते और जल्दी तैयार होने वाले यंत्रों ने उनकी जगह ले ली है. साथ ही, संगीत के रुझान बदल गए हैं. संगीत शिक्षक शब्बीर अहमद मीर कहते हैं, "हिप-हॉप, रैप और इलेक्ट्रॉनिक संगीत अब कश्मीर के संगीत परिदृश्य पर हावी हैं, जिसके कारण नई पीढ़ी पारंपरिक संगीत की गहराई और अनुशासन से नहीं जुड़ पा रही." नतीजतन, संतूर की मांग ध्वस्त हो गई है, जिससे कारीगरों के पास न शिष्य बचे हैं न ही टिकाऊ बाजार.
ज़ाज़ की सदी पुरानी दुकान में, वह लकड़ी के एक खोखले टुकड़े और घिसे हुए लोहे के औजारों के पास बैठते हैं, जो एक लुप्त होती परंपरा के मूक अवशेष हैं. वह कहते हैं, "कोई नहीं बचा [इस कला को जारी रखने के लिए]. मैं आखिरी हूं."
हालांकि, हमेशा ऐसा नहीं था. वर्षों तक, प्रसिद्ध सूफी और लोक कलाकारों ने ज़ाज़ के हस्तनिर्मित संतूरों पर प्रदर्शन किया. उनकी दुकान में एक तस्वीर में पंडित शिव कुमार शर्मा और भजन सोपोरी उनके यंत्रों के साथ प्रदर्शन करते दिखते हैं.
माना जाता है कि संतूर की उत्पत्ति फारस में हुई और 13वीं या 14वीं सदी में यह भारत पहुंचा. कश्मीर में इसने एक विशिष्ट पहचान बनाई, जो सूफी कविता और लोक परंपराओं का केंद्र बन गया. मीर कहते हैं, "मूल रूप से सूफियाना मौसिकी (एक सामूहिक संगीत परंपरा) का हिस्सा, संतूर की ध्वनि नरम और लोक जैसी थी." पंडित शिव कुमार शर्मा ने इसे भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए अनुकूलित किया, तारों की संख्या बढ़ाकर, पुलों को समृद्ध गूंज के लिए फिर से डिज़ाइन किया और नई बजाने की तकनीकों को पेश किया. कश्मीरी मूल के भजन सोपोरी ने इसकी स्वर सीमा को और गहरा किया और सूफी भावनाओं को जोड़ा, जिससे संतूर का भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्थान पक्का हुआ.
ज़ाज़ को 2022 में उनकी कारीगरी के लिए भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से नवाजा गया. वह 1940 के दशक में कदाल में पैदा हुए थे, जो एक ऐतिहासिक पुल के नाम पर बनी एक बस्ती है. स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उन्होंने कम उम्र में औपचारिक शिक्षा छोड़ दी और अपने पिता व दादा, दोनों माहिर कारीगरों से संतूर बनाने की कला सीखी. वह कहते हैं, "उन्होंने मुझे न सिर्फ यंत्र बनाना सिखाया, बल्कि लकड़ी, हवा और इसे बजाने वाले हाथों को सुनना भी सिखाया."
उनकी कार्यशाला में छेनी और तारों से भरी एक लकड़ी की बेंच एक अधूरे संतूर के ढांचे के पास रखी है. हवा में पुरानी अखरोट की लकड़ी की हल्की महक है, और कोई मशीनरी नजर नहीं आती. ज़ाज़ का मानना है कि मशीन से बने यंत्रों में हस्तनिर्मित यंत्रों की गर्माहट और गहराई नहीं होती.
संतूर बनाना एक धीमी, सावधानीपूर्वक प्रक्रिया है. यह सही लकड़ी चुनने से शुरू होती है, जिसे कम से कम पांच साल तक पुराना किया जाता है. फिर शरीर को नक्काशी करके खोखला किया जाता है, 25 पुलों को सटीकता से आकार दिया जाता है और 100 से अधिक तार जोड़े जाते हैं. इसके बाद ट्यूनिंग की प्रक्रिया होती है, जो हफ्तों या महीनों तक चल सकती है. वह कहते हैं, "यह धैर्य और लगन की कला है."
हाल के वर्षों में सोशल मीडिया प्रभावित करने वालों ने उनकी कार्यशाला का दौरा किया और इसकी कहानी ऑनलाइन साझा की, लेकिन ज़ाज़ कहते हैं कि इससे कला या इसकी विरासत को संरक्षित करने के वास्तविक प्रयास नहीं हुए. उनकी तीन बेटियां अन्य करियर में हैं और परिवार में कोई इस काम को आगे बढ़ाने वाला नहीं है. उन्हें सरकारी अनुदान और शिष्यों के वादे मिले, लेकिन वह कहते हैं, "मैं न तो प्रसिद्धि चाहता हूँ न दान." वह चाहते हैं कि कोई इस कला को आगे बढ़ाए.
अब अस्सी की उम्र में वह अक्सर एक अधूरे संतूर के पास घंटों बैठते हैं, उसकी चुप्पी को सुनते हुए. वह कहते हैं, "यह सिर्फ लकड़ी का काम नहीं है. यह कविता है. एक भाषा. मैं यंत्र को एक आवाज देता हूं. मैं संतूर को बजने से पहले सुन लेता हूं. यही रहस्य है. यही आगे बढ़ना चाहिए."
जैसे-जैसे दुनिया आधुनिकता को अपनाती जा रही है, ज़ाज़ की कार्यशाला समय से अछूती रहती है. धीमी, शांत और अखरोट की लकड़ी व स्मृतियों की महक से भरी. वह कहते हैं, "लकड़ी और संगीत, दोनों मर जाते हैं अगर आप उन्हें समय न दें. मैं चाहता हूं कि कोई ऐसा व्यक्ति जो इस कला से सच्चा प्यार करता हो, इसे आगे बढ़ाए. न पैसों के लिए, न कैमरों के लिए, बल्कि संगीत के लिए."
पाठकों से अपील :
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