29/01/2026: रुपया 92 के रसातल में | यूजीसी कायदे पर रोक, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल | यूपी भाजपा में सवर्ण वोट बैंक | हिंदुत्व बनाम हिंदू धर्म | अजीत पवार की भ्रष्टाचार फाइल | फिलीस्तीन पर नाटक
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
रुपया रसातल में: 92 के पार जाने से आरबीआई ने बचाया, विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली से रिकॉर्ड गिरावट
लगातार जारी गिरावट के बीच भारतीय रुपये ने गुरुवार को एक नया और चिंताजनक रिकॉर्ड बनाया. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. रॉयटर्स की रिपोर्ट में जसप्रीत कालरा बताते हैं कि रुपये पर यह दबाव नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (एनडीएफ) मैच्योरिटी और कॉरपोरेट हेजिंग से जुड़ी डॉलर की मांग के कारण बढ़ा है. हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के संभावित हस्तक्षेप के चलते रुपया मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण 92 के स्तर को पार करने से बच गया.
‘रॉयटर्स’ के अनुसार, सत्र के दौरान रुपया 91.9850 प्रति डॉलर तक गिर गया था, लेकिन दिन के अंत में यह पिछले बंद भाव से 0.2% गिरकर 91.9550 पर बंद हुआ.
बाजार में घबराहट और विदेशी पूंजी की निकासी
गिरावट की वजहों का विश्लेषण करते हुए सीएनबीसी-टीवी18 ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि विदेशी पूंजी का प्रवाह कमजोर पड़ने और बाजार में बढ़ती घबराहट ने करेंसी पर दबाव डाला है. एक सिंगापुर स्थित हेज फंड मैनेजर ने चैनल को बताया, “बाजार एनडीएफ मैच्योरिटी की पहले से उम्मीद कर रहा है और संभव है कि स्टॉप-लॉस का एक दौर शुरू हो गया हो.”
वहीं, ‘द वायर’ ने अपनी रिपोर्ट में एक और गंभीर पहलू उजागर किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, रुपया न केवल कमजोर डॉलर के मुकाबले गिर रहा है, बल्कि यह अन्य एशियाई मुद्राओं के मुकाबले भी कमजोर साबित हो रहा है. इसे अब “एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा” कहा जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ के बाद से रुपये पर यह मार और गहरी हुई है.
आंकड़ों की बात करें तो ‘रॉयटर्स’ ने बताया कि विदेशी निवेशकों ने जनवरी में अब तक 4 अरब डॉलर से ज्यादा के भारतीय शेयर बेचे हैं. यह सिलसिला 2025 से जारी है, जब रिकॉर्ड 19 अरब डॉलर की निकासी हुई थी. डीबीएस बैंक इंडिया का अनुमान है कि पूंजी प्रवाह कम होने से इस साल रुपया 93-94 के स्तर तक गिर सकता है.
अर्थव्यवस्था मजबूत, फिर करेंसी कमजोर क्यों?
एक तरफ करेंसी गिर रही है, तो दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर अच्छी खबरें भी हैं. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2025 में भारत का औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) दो साल के उच्चतम स्तर 7.8% की दर से बढ़ा है. वहीं, ‘रॉयटर्स’ ने आर्थिक सर्वेक्षण के हवाले से लिखा है कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की जीडीपी विकास दर 6.8%-7.2% रहने की उम्मीद है. सर्वेक्षण में कहा गया है कि “रुपये का मूल्यांकन भारत के शानदार आर्थिक बुनियादी ढांचे को सही ढंग से नहीं दर्शाता.” हालांकि, यह भी माना गया कि रुपये की कमजोरी अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कुछ हद तक कम करने में मदद कर सकती है.
‘द हिंदू’ ने सीआर फॉरेक्स के एक्सपर्ट अमित पबारी के हवाले से चेतावनी दी है कि भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए क्रूड की बढ़ती कीमतें जोखिम बढ़ा रही हैं. ब्रेंट क्रूड वायदा कारोबार में 1.32% बढ़कर 69.30 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. पबारी ने विश्लेषण किया कि “एनडीएफ मार्केट में यूएसडी/आईएनआर 92.00 के करीब है, जो निकट अवधि के लिए एक महत्वपूर्ण धुरी है. अगर यह इसके ऊपर बना रहता है तो 92.20–92.50 का रास्ता खुल सकता है, लेकिन आरबीआई का समर्थन इसे 91.00–91.20 की रेंज में वापस ला सकता है.”
घरेलू शेयर बाजार पर भी इसका असर दिखा. ‘द हिंदू’ के अनुसार, सेंसेक्स 343.67 अंक गिरकर 82,001.01 पर और निफ्टी 94.2 अंक फिसलकर 25,248.55 पर आ गया.
खुद ही यूजीसी से कायदा बनवाया, खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही रोक लगा दी
एक महत्वपूर्ण आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026’ पर रोक लगा दी. शीर्ष अदालत ने कहा कि ये नियम कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करते हैं, जिनका यदि समाधान नहीं किया गया, तो इसके “बहुत व्यापक परिणाम होंगे... और यह समाज को विभाजित कर देगा.” यह नियम सुप्रीम कोर्ट ने बनवाने की हिदायत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को दी थी.
इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, “फिलहाल के लिए, 2026 के नियमों को स्थगित रखा जाए. अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, हम आगे निर्देश देते हैं कि अगले आदेश तक 2012 के नियम लागू रहेंगे.”
अनंतकृष्णन जी की रिपोर्ट के अनुसार, सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “ऐसे 4-5 प्रश्न हैं, जो विचार के लिए उत्पन्न होते हैं. अन्यथा, इसके बहुत व्यापक परिणाम होंगे. यह समाज को विभाजित करेगा. इसके कई. बहुत खतरनाक प्रभाव होंगे.”
न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की, “हमें उस स्थिति में नहीं जाना चाहिए जहां हम संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह अलग-थलग स्कूलों की ओर बढ़ें, जहां अश्वेत बच्चे एक स्कूल में जाते थे और श्वेत लड़के-लड़कियां दूसरे स्कूल में. भारत की एकता शैक्षणिक संस्थानों में झलकनी चाहिए.”
अदालत ने कहा कि भाषा पूरी तरह से अस्पष्ट है, प्रावधानों का दुरुपयोग हो सकता है. मुख्य रूप से नियमों की धारा 3(1)(सी) को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनते हुए, मुख्य न्यायाधीश ने उस स्थिति का उल्लेख किया, जिसमें देश के एक हिस्से का छात्र दूसरे हिस्से में क्षेत्रीय आधार पर उत्पीड़न का सामना करता है. उन्होंने पूछा कि क्या नियमों में इस समस्या का समाधान किया गया है.
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि खंड (ई), जो यह परिभाषित करता है कि भेदभाव क्या है, इस मुद्दे को संबोधित करता है. इस पर पीठ ने सवाल किया कि यदि ऐसा है, तो फिर खंड (सी) की आवश्यकता क्या थी?
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “हम विश्वविद्यालयों में एक स्वतंत्र और न्यायसंगत वातावरण बनाने के लिए नियमों के विकास को देख रहे हैं. जब हम इसे देखते हैं, तो हमें कोई कारण नजर नहीं आता कि जब धारा 3(1)(ई) वैसे ही बनी हुई है जैसी वह 2012 के नियमों में थी, तो 3(1)(सी) कैसे प्रासंगिक हो जाती है? क्या यह अनावश्यक है? आप इसकी व्याख्या कैसे करते हैं? हम यह समझने में विफल रहे हैं कि जब 3(1)(सी) पहले से ही 3(1)(ई) में समाहित है, तो इसे एक अलग परिभाषा खंड के रूप में क्यों निकाला गया?”
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस ओर भी इशारा किया कि ऐसे मामले भी हो सकते हैं, जहां एक ही जाति के भीतर दबंग छात्र अपनी ही जाति के अन्य छात्रों को परेशान करें, और यह जानना चाहा कि नियम इसे कैसे संबोधित करते हैं. याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इसे नियमों में शामिल नहीं किया गया है. सीजेआई ने कहा, “हमें यह कहते हुए खेद हो रहा है कि, प्रथम दृष्टया इन नियमों की भाषा पूरी तरह से अस्पष्ट है और इन प्रावधानों का दुरुपयोग किया जा सकता है.”
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “संवैधानिक प्रश्न यह है कि अनुच्छेद 15(4) राज्य को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार देता है. यदि 2012 के नियम अधिक व्यापक और समावेशी भेदभाव की बात करते थे, जिसमें रैगिंग जैसे भेदभाव भी शामिल थे, तो एक सुरक्षात्मक या सुधारात्मक कानून में प्रतिगमन (पीछे हटने की स्थिति) क्यों होनी चाहिए? ‘नो-रिग्रेशन’ (पीछे न हटने) का सिद्धांत मुख्य रूप से पर्यावरण कानून में विकसित हुआ है, लेकिन यह उन कानूनों में भी व्याप्त है जो सामाजिक न्याय और समानता के रक्षक हैं.”
सीजेआई ने आगे कहा, “इस तरह की स्थिति का समाज के शरारती तत्वों द्वारा फायदा उठाया जा सकता है.” केंद्र से जवाब मांगते हुए, पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यह भी कहा कि सरकार को इस मुद्दे के समाधान के लिए प्रख्यात न्यायविदों की एक समिति गठित करनी चाहिए. सीजेआई ने कहा, “अदालत को विश्वास में लिया जाना चाहिए, और समिति के गठन को हमें (न्यायालय को) मंजूरी देनी होगी.”
सीजेआई सूर्यकांत ने आगे कहा, “हम विश्वविद्यालयों, स्कूलों और कॉलेजों को अलग-थलग नहीं रख सकते. वे समाज का ही एक हिस्सा हैं. पूरे समाज को कैसे विकसित होना चाहिए? हमें किस दिशा में जाना चाहिए? यदि हम कैंपस के भीतर इस तरह का माहौल बनाएंगे, तो लोग कैंपस के बाहर कैसा व्यवहार करेंगे? हम इन सभी विषयों के विशेषज्ञ नहीं हो सकते, लेकिन जो लोग सामाजिक मुद्दों को समझते हैं, उन्हें इस पर विचार करना चाहिए.”
सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि ऐसा (समिति का गठन) किया जाएगा. सीजेआई सूर्यकांत ने पूछा, “75 वर्षों के बाद इस देश में, एक जातिविहीन समाज विकसित करने की दिशा में हमने जो कुछ भी हासिल किया है, क्या हम (अब) एक प्रतिगामी (पीछे ले जाने वाली) नीति की ओर बढ़ रहे हैं?” इसके साथ ही उन्होंने नियमों में ‘अलग हॉस्टल’ के उल्लेख पर भी आपत्ति जताई. सीजेआई ने कहा, “एक और प्रावधान जो मुझे दिख रहा है, वह आपके द्वारा किए जा रहे उपायों में अलग हॉस्टल की बात करता है. भगवान के लिए, ऐसा मत कीजिए. हम हॉस्टल में रहे हैं. हर समुदाय के छात्र साथ रहते हैं. हमने अंतरजातीय विवाहों को भी बढ़ावा दिया है. हमें एक जातिविहीन समाज विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए.
गौतम भाटिया: सुप्रीम कोर्ट का परेशान करने वाला स्टे ऑर्डर; यूजीसी विनियम 2026 पर रोक और कानूनी तर्क का अभाव
संविधान विशेषज्ञ गौतम भाटिया ने अपने ब्लॉग में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी (समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026 पर रोक लगाने के आदेश की कड़ी आलोचना की है. भाटिया लिखते हैं कि यह “बिना कारण बताए दिए गए स्टे ऑर्डर” का एक और दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण है, जिसके गंभीर परिणाम होंगे.
इन नियमों को उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए लाया गया था. इसका विरोध मुख्य रूप से इस आधार पर किया गया कि यह ‘असममित’ है, यानी यह केवल एससी/एसटी/ओबीसी को सुरक्षा देता है, सवर्णों को नहीं. भाटिया तर्क देते हैं कि एन.एम. थॉमस के 50 साल पुराने फैसले के बाद से भारतीय कानून में ‘सारवान समानता’ ही आधार रही है. एट्रोसिटी एक्ट की तरह ही भेदभाव विरोधी कानून भी शक्ति-संतुलन को देखते हुए असममित ही होते हैं.
लेखक के अनुसार, कोर्ट ने स्टे देने के लिए जरूरी कानूनी मानकों (प्रथम दृष्टया मामला, अपूरणीय क्षति, और सुविधा का संतुलन) का जिक्र तक नहीं किया. कोर्ट ने चार सवाल उठाए हैं जिन्हें भाटिया “लॉजिक से परे” बताते हैं:
रैगिंग: कोर्ट ने पूछा कि इसमें रैगिंग क्यों शामिल नहीं है. भाटिया का जवाब है कि रैगिंग के लिए अलग नियम हैं, यह नियम सिर्फ भेदभाव के लिए हैं.
सेग्रीगेशन (पृथक्करण): कोर्ट ने ‘सेग्रीगेशन’ शब्द पर आपत्ति जताई. भाटिया कहते हैं कि इसका मतलब हॉस्टल या स्कॉलरशिप में विशेष आवंटन से था, न कि ‘जिम क्रो’ जैसे नस्लीय भेदभाव से.
उप-वर्गीकरण : कोर्ट ने पूछा कि क्या यह सब-क्लासिफिकेशन को प्रभावित करेगा. भाटिया इसे विषयांतर मानते हैं क्योंकि यह नियम आरक्षण के बारे में नहीं, भेदभाव के बारे में हैं.
भाटिया निष्कर्ष निकालते हैं कि कोर्ट सार्वजनिक तर्क के बिना आदेश पारित कर रहा है, जो न्यायिक जवाबदेही के लिए एक बड़ा झटका है.
यूजीसी के नए नियमों पर सतीश देशपांडे: सामाजिक न्याय के बुनियादी ढांचे को कमजोर करने की एक सचेत कोशिश
‘द वायर’ को दिए एक इंटरव्यू में प्रसिद्ध समाजशास्त्री सतीश देशपांडे ने यूजीसी के नए ‘इक्विटी नियमों’, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है, की भाषा और उनके पीछे छिपे इरादों का गहरा समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया है.
देशपांडे का का तर्क है कि यूजीसी ने इन नियमों में जिस “संतुलन” की भाषा का उपयोग किया है, वह वास्तव में ताकतवर वर्गों (सवर्ण/प्रभुत्वशाली समूहों) को बचाने का एक तरीका है. नियमों में भेदभाव की परिभाषा को इतना अस्पष्ट बना दिया गया है कि वह पीड़ित (दलित/पिछड़े) के बजाय आरोपी (संस्थान या प्रभुत्वशाली समूह) के पक्ष में झुक जाती है.
देशपांडे आलोचना करते हुए कहते हैं कि नए नियम जाति-आधारित विशिष्ट भेदभाव को अन्य सामान्य समस्याओं के साथ मिला देते हैं. इससे जातिवाद की गंभीरता कम हो जाती है. जब आप जाति-आधारित अत्याचार को केवल “अमर्यादित व्यवहार” की श्रेणी में डाल देते हैं, तो आप उस ऐतिहासिक और सामाजिक अन्याय को अनदेखा कर रहे होते हैं, जिससे सामाजिक सुरक्षा के कानून बने थे.
उनका मानना है कि ये नियम छात्रों को भेदभाव से बचाने के बजाय शैक्षणिक संस्थानों के प्रशासन को कानूनी जवाबदेही से बचाने के लिए डिज़ाइन किए गए लगते हैं. “अस्पष्ट प्रावधानों” का उपयोग संस्थानों द्वारा शिकायतों को दबाने या उन्हें भ्रमित करने के लिए किया जा सकता है.
देशपांडे इस बात पर भी ध्यान दिलाते हैं कि कैसे इन नियमों की भाषा में एक अंतर्निहित डर दिखाया गया है कि आरक्षण या सुरक्षात्मक कानूनों का “दुरुपयोग” हो सकता है. देशपांडे के अनुसार, यह तर्क अक्सर वही लोग देते हैं जो यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं.
उनका निष्कर्ष है कि ये नियम 2012 के उन नियमों से काफी पीछे हटना है, जो सामाजिक न्याय के प्रति अधिक स्पष्ट और प्रतिबद्ध थे. नए नियमों में “समानता” की आड़ में “असमानता” को ही नए तरीके से परिभाषित करने की कोशिश की गई है.
उनका कहना है कि यूजीसी के ये नए नियम केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं हैं, बल्कि ये उच्च शिक्षा में सामाजिक न्याय के बुनियादी ढांचे को कमजोर करने की एक सचेत कोशिश हैं. वे चेतावनी देते हैं कि “न्यूट्रल” (तटस्थ) दिखने वाली भाषा अक्सर उन्हीं का साथ देती है जिनके पास पहले से सामाजिक और राजनीतिक सत्ता है.
यूपी बीजेपी में गहराता संकट: यूजीसी नियमों और शंकराचार्य विवाद से सवर्ण वोट बैंक खिसकेगा ?
उत्तर प्रदेश बीजेपी में यूजीसी के नए नियमों और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के अपमान को लेकर अंदरूनी कलह तेज हो गई है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट और कई बीजेपी पदाधिकारियों के इस्तीफे ने पार्टी को मुश्किल में डाल दिया है. पार्टी के भीतर यह डर सता रहा है कि यह विवाद उसके मुख्य आधार यानी ब्राह्मणों और अन्य सवर्ण जातियों के समर्थन को नुकसान पहुंचा सकता है.
यह विवाद तब और बढ़ गया जब निलंबित अधिकारी अग्निहोत्री ने आरोप लगाया कि नए यूजीसी नियम “फर्जी शिकायतों” के जरिए सामान्य वर्ग के छात्रों का “उत्पीड़न” करेंगे. साथ ही उन्होंने 18 जनवरी को त्रिवेणी संगम पर यूपी पुलिस द्वारा शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को शाही स्नान से रोकने की घटना को “दुर्व्यवहार” बताया. अग्निहोत्री ने दावा किया कि उनके खिलाफ “साजिश” की गई है और ब्राह्मण विधायकों पर अपने समाज के लिए खड़े न होने का आरोप लगाया.
लखनऊ और नई दिल्ली में छात्र समूह यूजीसी के उन नए नियमों का विरोध कर रहे हैं, जिनके तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों की भेदभाव की शिकायतों के लिए “इक्विटी कमेटियों” का गठन अनिवार्य किया गया है. शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने भी इन नियमों को “हिंदू धर्म के लिए नुकसानदेह” बताया है.
बीजेपी के ब्राह्मण नेताओं में बेचैनी
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया, “कोई इसे खुलकर नहीं कह रहा, लेकिन बीजेपी के ब्राह्मण प्रतिनिधियों, खासकर उन क्षेत्रों में जहां ब्राह्मण वोटर निर्णायक हैं, उनके बीच एक ‘अंडरकरंट’ (असंतोष) है. अग्निहोत्री के बयानों और यूजीसी नियमों के साथ-साथ शंकराचार्य विवाद ने एक पेंडोरा बॉक्स खोल दिया है.”
दिसंबर में यूपी विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान, कुशीनगर विधायक पी.एन. पाठक द्वारा बुलाए गए रात्रिभोज में करीब 40 ब्राह्मण विधायकों ने अपनी चिंताएं जाहिर की थीं, हालांकि प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने इसे पार्टी के मूल्यों के खिलाफ बताया था.
इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए लखनऊ जिला बीजेपी अध्यक्ष विजय मौर्य ने कहा कि उन्हें इस्तीफे के पत्र सीधे नहीं मिले हैं, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए जानकारी मिली है. उन्होंने कहा कि मंडल महासचिव अंकित तिवारी जैसे नेताओं को सार्वजनिक रूप से जाने के बजाय पार्टी फोरम में बात रखनी चाहिए थी. वहीं, रायबरेली के सलोन मंडल प्रमुख श्याम सुंदर त्रिपाठी ने भी यूजीसी नियमों को “काला कानून” बताते हुए इस्तीफा दे दिया है.
केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सफाई दी है कि किसी के साथ भेदभाव नहीं होने दिया जाएगा, लेकिन पूर्व केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र और सांसद बृजभूषण शरण सिंह जैसे दिग्गज नेताओं ने इन नियमों पर सवाल उठाए हैं. उमा भारती ने भी शंकराचार्य से सबूत मांगने को प्रशासन द्वारा अपनी हदें पार करना बताया है.
विपक्ष का समर्थन : दिलचस्प बात यह है कि सपा और बसपा ने यूजीसी के नए नियमों का समर्थन किया है. मायावती ने विरोध को “जातिवादी मानसिकता” बताया, जबकि रामगोपाल यादव ने कहा कि सामान्य वर्ग का 90% नौकरियों पर कब्जा है. इससे बीजेपी अपने सवर्ण वोट बैंक और केंद्र सरकार के फैसले के बीच फंस गई है.
विश्लेषण
अरुण श्रीवास्तव: हिंदुत्व बनाम हिंदू धर्म
इतिहास में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ. न मुग़लों के राज में, न अंग्रेजों के राज में. हिंदू धर्म को ऐसी मुसीबत का सामना कभी नहीं करना पड़ा जैसा आज कट्टरपंथी आरएसएस और फासिस्ट भाजपा के राज में करना पड़ रहा है. भारत के पॉलिटिकल इतिहास में यह पहली बार है कि हिंदू धर्म पर अपने अस्तित्व का संकट आ गया है. हिंदुत्व के ठेकेदार अब खुलेआम सदियों पुराने हिंदू धर्म को मिटाने की धमकी दे रहे हैं.
इस बात का सबसे साफ और बड़ा सबूत 18 जनवरी को इलाहाबाद में देखने को मिला. वहां यूपी के चीफ मिनिस्टर योगी आदित्यनाथ और उनके अफसरों ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की जिस तरह बेइज्जती की, वो हैरान करने वाला है. शंकराचार्य ने शाही स्नान करने से मना कर दिया क्योंकि उनके रथ को—जो हिंदू धर्म की सबसे बड़ी अथॉरिटी का सिंबल है—घाट के पास जाने ही नहीं दिया गया.
यहाँ तक कि औरंगजेब, जिसे हिंदुत्व वाले सबसे ज्यादा नफरत करते हैं, उसने भी कभी शंकराचार्य को पवित्र माघ स्नान करने से नहीं रोका. औरंगजेब ने भी अपने राज में कभी शंकराचार्य की संस्था को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं की. इतिहास में ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता कि किसी मुग़ल बादशाह ने आदि शंकराचार्य को टारगेट किया हो. मुघलों की पॉलिसी में अद्वैत वेदांत को निशाना बनाना कभी शामिल नहीं था.
हिंदू समाज में हमेशा से शैव और वैष्णव संप्रदायों के बीच फर्क रहा है. लेकिन वो फर्क आध्यात्मिक थे, पॉलिटिकल या नफरत भरे नहीं. वैष्णव लोग भक्ति और विष्णु को मानते हैं, जबकि शैव लोग शिव, योग और ज्ञान पर फोकस करते हैं. इन मतभेदों के बावजूद, दोनों एक-दूसरे के देवताओं की इज्जत करते थे. लेकिन आज का ‘हिंदुत्व’ अलग है—यह तो हिंदू धर्म को ही अपना दुश्मन मान बैठा है.
हिंदू धर्म और हिंदुत्व के बीच की यह दबी हुई दुश्मनी 22 जनवरी को खुलकर सामने आ गई. हरियाणा में एक प्रोग्राम के दौरान यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को “कालनेमि जैसी ताकतें” बता दिया जो धर्म के भेस में सनातन धर्म को कमजोर कर रही हैं. इस पर शंकराचार्य ने भी करारा जवाब दिया. उन्होंने कहा कि जो लोग उन्हें “कालनेमि” (रामायण का एक मायावी राक्षस) कह रहे हैं, वो खुद कालनेमि हैं. उन्होंने साफ कहा कि मुझ पर आरोप लगाने वालों ने खुद सनातन धर्म के लिए क्या किया है?
यह बहुत ही शर्मनाक बात है कि योगी अपनी ईगो को संतुष्ट करने के लिए शंकराचार्य की तुलना कालनेमि से कर रहे हैं. कालनेमि रामायण का वो शक्तिशाली राक्षस था जिसे रावण ने हनुमान जी को मारने भेजा था. वह बुराई और अहंकार का प्रतीक है. एक शंकराचार्य की तुलना राक्षस से करना? योगी गोरखपुर मठ के संत हैं, फिर भी हिंदुत्व को हिंदू धर्म से ऊपर दिखाने की होड़ में वो धर्म के बेसिक नियम ही भूल गए. शंकराचार्य को अपशब्द बोलकर उन्होंने आम हिंदुओं की नजर में अपना ही कद छोटा किया है. दूसरी तरफ शंकराचार्य ने योगी को कोई अपशब्द नहीं बोला, बस इतना कहा कि “जिन्होंने धर्म के लिए कुछ नहीं किया, वो मुझे ज्ञान न दें.” लोग इसे ‘राजदंड’ (सत्ता की ताकत) द्वारा ‘धर्मदंड’ (धर्म की सत्ता) को दबाने की कोशिश मान रहे हैं.
आजकल हिंदुत्व के रेडिकल्स अपने एंटी-हिंदू एजेंडे को सही ठहराने के लिए ‘सनातन धर्म’ का इस्तेमाल करते हैं. हिंदू धर्म प्राचीन है और इसी मिट्टी का है, लेकिन ‘हिंदुत्व’ एक पॉलिटिकल विचारधारा है जिसे 1892 में चंद्रनाथ बसु ने दिया और 1923 में सावरकर ने कोडिफाई किया. हिंदुत्व का मकसद हिंदू धर्म की रक्षा नहीं, बल्कि चुनाव जीतना और सत्ता हथियाना है. सीधी बात यह है—हिंदू धर्म एक आस्था है, और हिंदुत्व एक पॉलिटिकल औजार.
आरएसएस शुरू से ही हिंदू धर्म को हटाकर अपना ‘कैपिटलिस्ट हिंदुत्व’ लाना चाहता था. मोदी के पीएम बनने के बाद यह मिशन और तेज हो गया है. लेकिन भारत जैसे सेक्युलर और सोशलिस्ट देश में उन्हें इसमें मुश्किल आ रही है.
आरएसएस हमेशा यह नैरेटिव चलाता है कि हिंदू समाज 1000 साल से गुलाम रहा है और हिंदू धर्म मुघलों के अत्याचार से हिंदुओं को नहीं बचा पाया, इसलिए अब ‘हिंदुत्व’ की जरूरत है. मोदी राज के 11 सालों में हिंदुत्व और हिंदू धर्म के बीच की यह लड़ाई खतरनाक मोड़ पर आ गई है. आरएसएस और भाजपा ‘सनातन धर्म’ के नाम का इस्तेमाल करके समाज में अपनी पैठ बना रहे हैं. हाल ही में मोहन भागवत ने कहा कि अंग्रेजों ने भारत की “ओरिजिनल पहचान” बदल दी थी. फिर वो यह भी कहते हैं कि भारत एक “हिंदू राष्ट्र” है. अगर पहचान बदल गई थी, तो यह हिंदू राष्ट्र कैसे हुआ? इनकी बातों में कोई लॉजिक नहीं है, बस लोगों को गुमराह करना है.
सच तो यह है कि आज हिंदू धर्म को सबसे बड़ा खतरा बाहर से नहीं, बल्कि इस ‘हथियारबंद’ हिंदुत्व से है. ये लोग “सनातन का संग्राम” के नाम पर हिंदू धर्म की विरासत को हाइजैक कर रहे हैं.
सनातन धर्म को अक्सर मनुस्मृति से जोड़कर देखा जाता है, जिसमें जाति और महिलाओं को लेकर बहुत ही पिछड़ी सोच है. आरएसएस इसी का फायदा उठाता है ताकि अपनी राजनीति चमका सके. इसके पीछे असल दिमाग महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों का है जो खुद को सुप्रीम अथॉरिटी बनाना चाहते हैं. ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ाई असल में इसी भेदभाव और शोषण के खिलाफ लड़ाई है. यह सच है कि ब्राह्मणवादी सिस्टम ने हिंदू धर्म को बिगाड़ा है. अंबेडकर ने भी कहा था कि वर्ण व्यवस्था ही जातिवाद की जड़ है.
अफसोस की बात है कि आरएसएस की लीडरशिप हर पैमाने पर फेल हुई है. योगी का ‘कालनेमि’ शब्द यूज करना इसका सबूत है. हिंदू धर्म सहिष्णुता सिखाता है, लेकिन हिंदुत्व लिंचिंग सिखाता है. इन लोगों ने कलबुर्गी, गौरी लंकेश, डाभोलकर और पानसरे जैसे विद्वानों की हत्या की है और दलितों-माइनॉरिटीज पर हमले किए हैं.
मोदी की तरह आरएसएस भी ‘डबल स्पीक’ (दोगली बातें) करने में माहिर है. वो स्कूल की किताबें बदल रहे हैं ताकि भारत के सेक्युलर संविधान को खत्म करके एक एथनिक हिंदू स्टेट बनाया जा सके.
इतिहास में कभी शंकराचार्यों के खिलाफ ऐसा कैंपेन नहीं चला. योगी के राज में अफसर शंकराचार्य से उनके “आध्यात्मिक सबूत” मांग रहे हैं. यह 110 करोड़ हिंदुओं के लिए शर्म की बात है. इसका मतलब साफ है—या तो योगी और उनके लोग शंकराचार्य की ताकत नहीं जानते, या फिर वो जान-बूझकर हिंदू धर्म को नीचा दिखाना चाहते हैं.
यह बेइज्जती उस संन्यासी की हुई है जिसे दुनियादारी से कोई मतलब नहीं. शंकराचार्य बनने का प्रोसेस बहुत कठिन होता है, जिसमें 13 अखाड़े और काशी विद्वत परिषद की मंजूरी लगती है. शंकराचार्य का काम हिंदू धर्म को एकजुट करना था. योगी का उन्हें अपमानित करना हर उस इंसान के लिए खतरे की घंटी है जो धर्म की चिंता करता है.
आज हिंदू धर्म पर ‘कैपिटलिस्ट कोलोनाइजेशन’ का खतरा मंडरा रहा है. पॉलिटिकल हिंदुत्व वाले लोग आम हिंदुओं की अज्ञानता का फायदा उठा रहे हैं. आदि शंकराचार्य ने धर्म को पुनर्जीवित किया था, लेकिन मोहन भागवत और उनके लोग इसे तोड़ने पर तुले हैं. हिंदुत्व और हिंदू धर्म में वही फर्क है जो लोकतंत्र और फासीवाद में है. 1920-30 के दशक में हिंदुत्व ने मुसोलिनी और हिटलर से प्रेरणा ली थी, और यह आज भी उसी रास्ते पर चल रहा है.
‘ट्रेड यूनियनों ने देश के औद्योगिक विकास को रोका, कई यूनिट्स बंद करवाईं’: सीजेआई सूर्यकांत की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने गुरुवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए ट्रेड यूनियनों पर बेहद तल्ख टिप्पणी की. लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सीजेआई ने कहा कि देश में औद्योगिक विकास को रोकने के लिए काफी हद तक ट्रेड यूनियन जिम्मेदार हैं.
घरेलू कामगारों के कल्याण और न्यूनतम मजदूरी की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “ट्रेड यूनियनों की वजह से देश में कितनी औद्योगिक इकाइयां बंद हो गई हैं? हकीकत को जानिए. देश भर में तमाम पारंपरिक उद्योग इन ‘झंडा यूनियनों’ की वजह से बंद हो गए. वे काम नहीं करना चाहते. बेशक शोषण होता है, लेकिन उसे संबोधित करने के और भी तरीके हैं.”
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने सिंगापुर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां घरेलू कामगारों के लिए कड़े नियम हैं. इस पर सीजेआई ने कहा कि सुधारों की जल्दबाजी कभी-कभी अनचाहे परिणाम लाती है. उन्होंने कहा, “आप न्यूनतम मजदूरी तय कर देंगे, तो लोग काम पर रखना बंद कर देंगे. यह मांग और आपूर्ति का सवाल है.”
सीजेआई ने यह भी कहा कि असली शोषक तो प्लेसमेंट एजेंसियां हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का अपना उदाहरण साझा करते हुए बताया, “सुप्रीम कोर्ट ने एक एजेंसी को प्रति कर्मचारी 40,000 रुपये दिए, लेकिन उन गरीब लड़कियों को असल में सिर्फ 19,000 रुपये मिल रहे थे. असली शोषक ये बड़ी एजेंसियां हैं.”
सीजेआई ने कहा कि जैसे ही आप घरेलू मदद और नियोक्ता के बीच के भरोसे को तोड़ेंगे, और एजेंसियों को लाएंगे, वह मानवीय जुड़ाव खत्म हो जाएगा. कोर्ट ने अंततः यह कहते हुए याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया कि कानून बनाना कोर्ट का काम नहीं है, यह राज्यों का विषय है. कोर्ट ने राज्यों से इन शिकायतों पर गौर करने को कहा.
अजीत पवार - वो नेता जो हमेशा जल्दबाजी में रहा, भले ही मंजिल का पता न हो
वरिष्ठ पत्रकार और लोकसत्ता संपादक गिरीश कुबेर ने इंडियन एक्सप्रेस में लेख में अजीत पवार के राजनीतिक सफर का विश्लेषण करते हुए लिखते हैं कि अजीत ‘दादा’ एक बेहतरीन प्रशासक और कड़ी मेहनत करने वाले नेता थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमी उनका धैर्य न होना था—एक ऐसा गुण जो उनके चाचा और मेंटर शरद पवार में कूट-कूट कर भरा था.
कुबेर लिखते हैं कि 1999 में जब शरद पवार ने एनसीपी बनाई, तो अजीत को विलासराव देशमुख सरकार में जगह मिली. 2004 में एनसीपी को कांग्रेस से ज्यादा सीटें मिलीं, और अजीत पवार के पास सीएम बनने का मौका था. लेकिन शरद पवार ने सीएम पद कांग्रेस को दे दिया. यह वह पल था जब अजीत पवार का सीएम बनने का सपना टूट गया और उन्हें गहरा धक्का लगा.
लेख में कहा गया है कि शरद पवार जहाँ वक्त का इंतजार करते थे, वहीं अजीत अपनी भड़ास सार्वजनिक रूप से निकाल देते थे. उनका वह कुख्यात बयान—”क्या मैं बांध में पेशाब करूँ?”—उनके करियर पर एक बदनुमा दाग बन गया.
सत्ता के बिना अजीत पवार का रह पाना मुश्किल था. उन्होंने पृथ्वीराज चव्हाण, उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस—इन सभी के साथ डिप्टी सीएम के रूप में काम किया. 2019 में फडणवीस के साथ उनकी सुबह-सुबह की शपथ ग्रहण उनकी सत्ता की भूख और जल्दबाजी का प्रतीक थी. वह अपने चाचा की तरह धर्मनिरपेक्ष थे, लेकिन इतिहास उन्हें “महाराष्ट्र के उस सबसे सक्षम उप मुख्यमंत्री के रूप में याद रखेगा, जो कभी मुख्यमंत्री नहीं बन सका.”
अजीत पवार और भ्रष्टाचार मामले
एनसीपी नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री अजीत पवार का आज राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया. उनका राजनीतिक करियर सहकारी बैंकों और सिंचाई परियोजनाओं से जुड़े भ्रष्टाचार के बड़े आरोपों से घिरा रहा है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में इन मामलों की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण किया गया है, जिसमें जांच एजेंसियों द्वारा बार-बार यू-टर्न, क्लोजर रिपोर्ट और क्लीन चिट का खेल देखने को मिला.
सहकारी बैंक घोटाला
आर्थिक अपराध शाखा और ईडी ने आरोप लगाया था कि कई चीनी मिलों को जानबूझकर घाटे में दिखाया गया, एनपीए घोषित किया गया और फिर कौड़ियों के दाम उन कंपनियों को बेच दिया गया जो अजीत पवार के रिश्तेदारों से जुड़ी थीं. इसमें सतारा की जरंडेश्वर शुगर मिल का मामला प्रमुख था.
यह मामला 2020 से कई बार पलटा. महा विकास अघाड़ी सरकार के दौरान ईओडब्ल्यू ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की. 2022 में सत्ता बदलते ही जांच फिर खुली. और फिर जनवरी 2024 में, अजीत पवार के सत्ताधारी गठबंधन में शामिल होने के कुछ महीनों बाद, एजेंसी ने फिर कहा कि कोई अपराध नहीं बनता. हालांकि, कोर्ट में अभी भी इसके खिलाफ याचिकाएं लंबित हैं. ईडी के मामले में अजीत पवार को चार्जशीट नहीं किया गया है, लेकिन उनके भतीजे रोहित पवार को आरोपी बनाया गया है.
सिंचाई घोटाला
अजीत पवार पर 70,000 करोड़ रुपये के कथित सिंचाई घोटाले का भी आरोप था. लेकिन दिसंबर 2019 में, एंटी करप्शन ब्यूरो ने बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया कि उनकी जांच में कोई गड़बड़ी नहीं मिली, जिससे उन्हें प्रभावी रूप से क्लीन चिट मिल गई.
पार्थ पवार और ‘महार वतन’ भूमि विवाद
2025 में अजीत पवार को अपने बेटे पार्थ पवार पर लगे आरोपों का सामना करना पड़ा. आरोप था कि ‘महार वतन’ की जमीन (जो कानूनन संरक्षित है) का अवैध हस्तांतरण किया गया. अजीत पवार ने इसे प्रशासनिक गलती बताया और कहा कि जमीन मूल मालिकों को वापस कर दी गई है और रिकॉर्ड सुधारे जा रहे हैं. फिलहाल इस मामले में पार्थ पवार के खिलाफ कोई चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है.
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26: राज्यों की वित्तीय स्थिति चिंता का विषय
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में यह रेखांकित किया गया है कि राज्य सरकारें मौजूदा वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही (जनवरी-मार्च) में बाजार से लगभग 5 लाख करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी में हैं. यह अब तक का सबसे बड़ा तिमाही ऋण कार्यक्रम है. कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य इस कर्ज में मुख्य हिस्सेदार हैं.
“द इंडियन एक्सप्रेस” में दीपांशु मोहन और गीताली मल्होत्रा ने लिखा है कि, जहां एक तरफ केंद्र सरकार ने अपने राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों को सफलतापूर्वक प्राप्त किया है (वित्त वर्ष 25 में 4.8% और वित्त वर्ष 26 के लिए 4.4% का लक्ष्य), वहीं राज्यों का वित्तीय व्यवहार चिंताजनक है. कई राज्य अपने राजस्व घाटे की भरपाई के लिए बाजार से भारी कर्ज ले रहे हैं, जिससे कर्ज की स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं.
अब निवेशक और बाजार केवल केंद्र सरकार के आंकड़ों को नहीं देख रहे, बल्कि वे ‘जनरल गवर्नमेंट फाइनेंस’ (केंद्र + राज्यों का संयुक्त वित्तीय प्रदर्शन) को देख रहे हैं. भारत का कर्ज-जीडीपी अनुपात लगभग 82% पर बना हुआ है, जिसमें राज्यों के कर्ज का हिस्सा बढ़ रहा है.
राज्यों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनके खर्चों का एक बड़ा हिस्सा (लगभग एक-तिहाई) वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और सब्सिडी जैसी चीजों में जा रहा है, जिन्हें कम करना मुश्किल है. साथ ही, जीएसटी आने के बाद राज्यों के पास राजस्व जुटाने की अपनी शक्तियां सीमित हो गई हैं, जिससे वे संसाधनों की कमी के लिए कर्ज पर निर्भर हो गए हैं.
पिछले दशक में राज्य सरकारें कल्याणकारी योजनाओं (नकद हस्तांतरण, स्वास्थ्य, आवास आदि) के वितरण का मुख्य माध्यम बन गई हैं. ये योजनाएं राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, इसलिए इन्हें वापस लेना कठिन है, जिससे राजकोषीय दबाव और बढ़ जाता है.
लेख का निष्कर्ष है कि आगामी बजट में राजकोषीय अनुशासन और संघीय समानता के बीच संतुलन बनाना होगा. सर्वेक्षण सुझाव देता है कि राज्यों को पूंजीगत व्यय (के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और राजस्व घाटे को कर्ज से भरने की प्रक्रिया पर कड़ी निगरानी रखनी चाहिए.
संक्षेप में, यह लेख चेतावनी देता है कि यदि राज्यों की वित्तीय स्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह भारत की समग्र आर्थिक स्थिरता और साख को प्रभावित कर सकता है.
मणिपुर
सामूहिक बलात्कार और महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाना ‘बर्बर’ था, मुख्य आरोपी की जमानत याचिका खारिज
अपराध को “प्रकृति में अत्यंत जघन्य, अमानवीय और बर्बर” बताते हुए, एक विशेष सीबीआई अदालत ने बुधवार को मणिपुर के कांगपोकपी में 4 मई 2023 को एक कुकी महिला के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मुख्य आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी. इसी घटना में उस महिला को दो अन्य महिलाओं के साथ निर्वस्त्र कर घुमाया गया था.
मयंक कुमार के अनुसार, अदालत ने कहा कि केवल लंबे समय तक जेल में रहना जमानत का आधार नहीं हो सकता. निंगोमबम तोंबा सिंह की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने उल्लेख किया कि यह मामला संघर्षग्रस्त राज्य में “सबसे सनसनीखेज” है, जिसने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा है.
इस घटना के महीनों बाद, महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाए जाने का एक वीडियो ऑनलाइन पोस्ट किया गया था, जिससे देश भर में भारी आक्रोश और निंदा की लहर फैल गई थी.
इससे पहले, महिलाओं ने निंगोमबम तोंबा सिंह की पहचान मुख्य आरोपियों में से एक के रूप में की थी। आरोप है कि उसने तीन पीड़ितों में से एक के पिता की भी हत्या कर दी थी, जिसके बाद उसने पीड़िता को सार्वजनिक रूप से कपड़े उतारने के लिए मजबूर किया और उसके छोटे भाइयों के सामने ही उसके साथ मारपीट और बलात्कार किया.
मणिपुर पुलिस ने सबसे पहले जुलाई 2023 में तोंबा सिंह को गिरफ्तार किया था, और बाद में मामला केंद्रीय एजेंसी को सौंपे जाने के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने उसकी हिरासत ली. तोंबा सिंह अब दो साल से अधिक समय से जेल में है.
उत्तराखंड में कश्मीरी शॉल विक्रेता पर जानलेवा हमला, सिर में आईं गंभीर चोटें
कश्मीरी व्यापारियों पर हमले की एक और घटना में, उत्तराखंड में एक 17 वर्षीय कश्मीरी शॉल विक्रेता पर बेरहमी से हमला किया गया. इस हमले में उसका चचेरा भाई मामूली चोटों के साथ बचने में सफल रहा.
फ़ैयाज़ वानी की खबर के अनुसार, ‘जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (जेकेएसए) के राष्ट्रीय संयोजक नासिर खुहामी के अनुसार, 17 वर्षीय कश्मीरी लड़का ताबिश अहमद अपने चचेरे भाई के साथ शॉल बेच रहा था, जब बुधवार शाम उत्तराखंड के विकासनगर इलाके में कुछ असामाजिक तत्वों ने उन पर हमला कर दिया.
नासिर ने बताया, “जब हमला हुआ, तब दोनों एक स्थानीय दुकान पर चाय पी रहे थे. दुकानदार और कुछ स्थानीय लोगों ने मिलकर दोनों पर हमला किया. ताबिश को लोहे की रॉड और डंडों से बेरहमी से पीटा गया.” इस बर्बर हमले में उसके सिर में गंभीर चोटें आईं और बाएं हाथ में फ्रैक्चर हो गया. ताबिश को पहले एक स्थानीय अस्पताल ले जाया गया और बाद में विशेष उपचार के लिए देहरादून के दून अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया.
नासिर के अनुसार, ताबिश को 11 टांके आए हैं और अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है. जेकेएसए संयोजक ने कहा, “उसके रिश्तेदारों ने बताया कि उससे उसकी पहचान पूछी गई और यह जानने पर कि वह मुस्लिम समुदाय से है और कश्मीर का रहने वाला है, वे उस पर और उसके भाई पर टूट पड़े, उन्हें घसीटा और लोहे की छड़ों से मारा.”
‘सरकार गिराने की बात नहीं की’: सोनम वांगचुक ने ‘अरब स्प्रिंग’ जैसे बयानों के आरोपों को नकारा
जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में इस आरोप से इनकार किया कि उन्होंने ‘अरब स्प्रिंग’ की तरह सरकार को उखाड़ फेंकने का बयान दिया था. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उनके पास सरकार की आलोचना करने और विरोध करने का लोकतांत्रिक अधिकार है.
वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ के समक्ष दलील दी कि पुलिस ने हिरासत में लेने वाले अधिकारियों को गुमराह करने के लिए एक ‘चुनिंदा’ वीडियो का सहारा लिया है.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, सिब्बल ने पीठ से कहा, “वीडियो को देखिए. पुलिस के अनुसार उन्होंने (वांगचुक ने) कहा है कि यदि भारत सरकार लद्दाख को राज्य का दर्जा नहीं देगी, तो वह अरब स्प्रिंग की तरह सरकार को उखाड़ फेंकेंगे. उन्होंने ऐसा नहीं कहा है. मैं उस वीडियो की पूरी प्रतिलिपि अदालत को दूंगा.”
उल्लेखनीय है कि ‘अरब स्प्रिंग’ सरकार विरोधी प्रदर्शनों, विद्रोहों और सशस्त्र संघर्षों की एक शृंखला थी, जो 2010 और 2018 के आसपास मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में फैली थी.
सिब्बल ने इस बात का भी खंडन किया कि वांगचुक ने एक इंटरव्यू में कहा था कि यदि सरकार ने मदद नहीं की, तो लद्दाख के लोग युद्ध के दौरान भारतीय सेना की मदद नहीं करेंगे. सिब्बल ने कहा, “यह झूठ है, और इस मामले के साथ यही समस्या है. उन्होंने हिरासत में लेने वाले अधिकारियों को गुमराह किया है. मेरे पास उस वीडियो का लिंक है, जिसमें वह सरकार और प्रधानमंत्री की प्रशंसा कर रहे हैं; वीडियो में स्पष्ट रूप से शांतिपूर्ण विरोध का संदर्भ दिया गया है.”
उन्होंने आगे कहा, “किसी ने उनसे (वांगचुक से) कहा कि कारगिल कश्मीर में मिलना चाहता है. उन्होंने कहा, ‘ठीक है, अगर वे शामिल होना चाहते हैं, तो हो सकते हैं.’ इसमें जनमत संग्रह जैसा कुछ भी नहीं है.” सिब्बल ने वांगचुक के खिलाफ उन आरोपों को भी नकारा कि उन्होंने हिंदू देवताओं के खिलाफ कोई अपमानजनक टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा कि कुछ ‘आईटी सेल’ ने इसे गलत तरीके से पेश किया है.
सिब्बल ने कहा, “वीडियो का बिना एडिट किया गया संस्करण पूरी तस्वीर साफ कर देता है. उनके कहने का मतलब यह था कि लद्दाख को कश्मीर से अलग करने के बाद, केंद्र सरकार संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा उपायों के अपने वादे को पूरा करने में विफल रही.”
उन्होंने आगे स्पष्ट किया, “वांगचुक ने कहा कि जैसे राम सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाकर लाए और फिर उन्हें बाजार (अकेला) छोड़ दिया, वैसा ही कुछ केंद्र सरकार ने लद्दाख के साथ किया. उन्होंने राम पर सिर्फ यह एक रूपकात्मक बयान दिया था. अगर ऐसे बयानों के आधार पर किसी को हिरासत में लिया जाता है, तो हमारा बोलना बंद कर देना ही बेहतर है. उनकी पत्नी खुद एक हिंदू हैं.”
वरिष्ठ वकील ने कहा कि लद्दाख एक अत्यंत शुद्ध और प्राकृतिक स्थान है, जहां प्रकृति को संरक्षित किया जाना चाहिए. सिब्बल ने दलील दी, “अब वहां अलग-अलग तरह के बड़े निवेश आ रहे हैं. उत्तराखंड में भी यही हुआ था. अब अरावली का मामला भी सामने है. हमें विरोध करना चाहिए, इसमें कुछ भी गलत नहीं है. अगर लद्दाख की पवित्रता को बनाए रखना है, तो हम ऐसी किसी भी गतिविधि को नहीं चाहते जो पर्यावरण को नष्ट करे.”
इस मामले में सुनवाई अधूरी रही और अब 2 फरवरी को जारी रहेगी. याद रहे, गीतांजलि आंग्मो ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत वांगचुक की हिरासत के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है. याचिका में दावा किया गया है कि यह हिरासत अवैध और मनमानी है, जो वांगचुक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है.
थरूर और राहुल-खड़गे की दो घंटे लंबी बैठक: ‘मुद्दे सुलझ गए हैं’
वरिष्ठ कांग्रेस नेता और सांसद शशि थरूर, जिनके पिछले कुछ महीनों से कांग्रेस के साथ संबंध तनावपूर्ण रहे हैं, ने गुरुवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से दो घंटे तक मुलाकात की.
लिज़ मैथ्यू और असद रहमान की रिपोर्ट है कि यह बैठक पिछले हफ्ते कांग्रेस पार्टी और थरूर के बीच हुए ताज़ा विवाद के बाद हुई है, जब तिरुवनंतपुरम के सांसद ने विधानसभा चुनावों की रणनीति बनाने के लिए दिल्ली में केरल के शीर्ष नेताओं के साथ अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की एक महत्वपूर्ण बैठक में हिस्सा नहीं लिया था. हालांकि, राज्य कांग्रेस नेताओं ने उनकी अनुपस्थिति को तवज्जो नहीं दी, लेकिन इसने एक बार फिर चर्चाओं को हवा दे दी. पता चला है कि थरूर पार्टी से नाराज थे और खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे.
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, बैठक के दौरान राहुल गांधी ने थरूर से कहा कि पार्टी को उनकी बहुत जरूरत है और उन्हें आश्वासन दिया कि केरल में कांग्रेस के सभी प्रमुख निर्णयों में उन्हें विश्वास में लिया जाएगा. एक सूत्र ने बताया, “बैठक में राहुल गांधी ने ही सबसे ज्यादा बात की. उन्होंने जोर दिया कि पार्टी को थरूर की जरूरत है और उन्हें केरल विधानसभा चुनाव में (कांग्रेस के नेतृत्व वाले) यूडीएफ के लिए प्रचार करना चाहिए. राहुल ने उनसे कहा कि कांग्रेस को एकजुट होकर काम करना होगा और केरल जीतना होगा.”
संसद भवन स्थित खड़गे के कार्यालय में हुई इस बैठक के बाद थरूर के करीबी एक सूत्र ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया, “मुद्दे सुलझा लिए गए हैं.” सूत्रों के मुताबिक, थरूर ने उन समस्याओं के बारे में विस्तार से बात की जिनका वह पार्टी में सामना कर रहे हैं. विशेष रूप से उन्होंने कोच्चि में हाल ही में हुई ‘महापंचायत’ में हुए “अपमान” का जिक्र किया, जिसका उद्घाटन पिछले हफ्ते राहुल गांधी ने किया था. गांधी ने अपना भाषण शुरू करते समय मंच पर मौजूद कई नेताओं के नाम लिए थे, लेकिन थरूर का नाम छोड़ दिया था.
सूत्रों ने बताया कि राहुल गांधी ने उनसे पुरानी बातों को भूलने के लिए कहा और इस बात पर जोर दिया कि केरल जीतना पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है. यह भी बताया गया कि के.सी. वेणुगोपाल ने ही इस विवाद को सुलझाने के लिए गुरुवार की बैठक आयोजित करवाई थी.
पिछले काफी समय से थरूर और कांग्रेस नेतृत्व (राष्ट्रीय और केरल दोनों स्तरों पर) कई मुद्दों पर एकमत नहीं रहे हैं, जिससे अक्सर उनके भविष्य को लेकर अटकलें लगती रही हैं. लेकिन गुरुवार की बैठक के बाद थरूर सकारात्मक दिखे और कहा: “हमने अपने दो पार्टी नेताओं, विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष के साथ चर्चा की. यह एक बहुत अच्छी और रचनात्मक चर्चा थी. सब कुछ ठीक है, और हम एक साथ मिलकर आगे बढ़ रहे हैं.”
जब उनसे पूछा गया कि क्या केरल के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार पर चर्चा हुई, तो थरूर ने कहा: “नहीं. यह कभी मुद्दा था ही नहीं. सच कहूं तो मैं किसी भी चीज का उम्मीदवार बनने में दिलचस्पी नहीं रखता. मैं एक सांसद हूं, और मुझे संसद में मतदाताओं का भरोसा प्राप्त है. यही मेरा काम है.” केरल विधानसभा चुनावों की तैयारी कर रही कांग्रेस के लिए थरूर एक महत्वपूर्ण संपत्ति हैं. अगले कुछ महीनों में जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, उनमें केरल ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां कांग्रेस के पास जीत की वास्तविक संभावना है.
आर्थिक सर्वेक्षण में डिजिटल लत को लेकर चेतावनी, ऑनलाइन प्लेटफार्मों पर पहुँच के लिए आयु-सीमा हो
बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के वैश्विक रुझानों से संकेत लेते हुए, सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण ने गुरुवार को कहा कि ऑनलाइन प्लेटफार्मों तक पहुँच के लिए ‘आयु-आधारित’ सीमा पर विचार किया जाना चाहिए. साथ ही, डिजिटल लत से बचने के लिए ऑनलाइन शिक्षण में भी कटौती करने का सुझाव दिया गया है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, संसद में पेश किए गए सर्वेक्षण में कहा गया है कि बच्चों की डिजिटल आदतों को आकार देने में स्कूलों को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए. बच्चों को हानिकारक ऑनलाइन सामग्री से बचाने के लिए उन्हें शैक्षिक सामग्री के वास्ते ‘सरल उपकरणों’ के उपयोग को बढ़ावा देने का आव्हान किया गया है.
सर्वेक्षण में कहा गया, “आयु-आधारित पहुंच सीमा से संबंधित नीतियों पर विचार किया जा सकता है, क्योंकि कम उम्र के उपयोगकर्ता अनिवार्य उपयोग और हानिकारक सामग्री के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं. प्लेटफार्मों को आयु-सत्यापन और आयु-उपयुक्त डिफॉल्ट सेटिंग्स लागू करने के लिए जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए, विशेष रूप से सोशल मीडिया, जुआ ऐप, ऑटो-प्ले फीचर्स और लक्षित विज्ञापनों के संदर्भ में.”
मुख्य सुझाव इस प्रकार हैं- सोशल मीडिया और अन्य ऐप्स के लिए उम्र तय करना, उम्र की पहचान सुनिश्चित करना कंपनियों का काम हो, लगातार स्क्रीन के सामने रहने से होने वाली लत को रोकना, बच्चों को जटिल स्मार्टफोन के बजाय केवल पढ़ाई के काम आने वाले सीमित फीचर्स वाले गैजेट्स देना.
सर्वेक्षण जारी होने के बाद मीडिया से बातचीत के दौरान, मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि उन्होंने सुना है कि आंध्र प्रदेश और गोवा सरकारें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक आयु-आधारित पहुंच की नीति लाने पर विचार कर रही हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत सरकार भी ऑस्ट्रेलिया की तरह बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग पर कोई नीति बनाने पर विचार कर रही है, तो उन्होंने कहा, “मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि भारत सरकार ऐसा कुछ सोच रही है या नहीं.”
सर्वेक्षण में कहा गया कि स्कूल डिजिटल आदतों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. उन्हें एक ‘डिजिटल वेलनेस करिकुलम’ शुरू करना चाहिए जिसमें स्क्रीन-टाइम साक्षरता, साइबर सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता शामिल हो.
कोविड-19 के दौरान विस्तारित ऑनलाइन शिक्षण उपकरणों पर निर्भरता को कम किया जाना चाहिए और ऑफलाइन जुड़ाव को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. सर्वेक्षण ने परिवारों को शिक्षित करने, स्क्रीन-टाइम की सीमा तय करने, ‘डिवाइस-फ्री’ (उपकरण मुक्त) घंटे और सामूहिक ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा देने का आव्हान किया है. स्कूलों और सामुदायिक केंद्रों के माध्यम से अभिभावकों को स्वस्थ सीमाएं निर्धारित करने, लत के लक्षणों को पहचानने और ‘पैरेंटल कंट्रोल टूल्स’ का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने डिजिटल लत को एक बढ़ती हुई समस्या के रूप में पहचाना है, जो युवाओं और वयस्कों के मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक प्रदर्शन और कार्यस्थल की उत्पादकता को प्रभावित कर रही है.
15-24 वर्ष की आयु के लोगों में सोशल मीडिया की लत का गहरा संबंध चिंता, अवसाद, कम आत्मसम्मान और साइबर बुलिंग से पाया गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘गेमिंग डिसऑर्डर’ को रोगों के अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण में शामिल किया है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार, यह गेमिंग व्यवहार का एक ऐसा पैटर्न है, जहां व्यक्ति का गेमिंग पर नियंत्रण नहीं रहता और वह अन्य दैनिक गतिविधियों और हितों के ऊपर गेमिंग को प्राथमिकता देने लगता है, भले ही इसके नकारात्मक परिणाम क्यों न निकल रहे हों. ऑनलाइन जुआ और ‘रियल मनी गेमिंग’ से वित्तीय तनाव, अवसाद और आत्महत्या के विचार जैसे गंभीर नुकसान देखे गए हैं. अंतहीन वीडियो लूप और ‘बिंज वाचिंग’ (लगातार वीडियो देखना) के कारण नींद की कमी, एकाग्रता में कमी और तनाव बढ़ता है.
सर्वेक्षण ने ऑस्ट्रेलिया, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे विभिन्न देशों द्वारा उठाए गए कदमों का उल्लेख किया और भारत में भी विभिन्न सरकारी विभागों के चल रहे प्रयासों के अलावा व्यापक हस्तक्षेप का आव्हान किया है.
केरल थिएटर फेस्टिवल में फिलिस्तीन समर्थक इज़राइली नाटक का मंचन रद्द, भारतीय दूतावास ने वीज़ा देने से किया इनकार
केरल के इंटरनेशनल थिएटर फेस्टिवल (ITFoK) में फिलिस्तीन के समर्थन में बना नाटक द लास्ट प्ले इन गाज़ा मंचित नहीं हो सका. इज़राइली थिएटर ग्रुप को भारत आने का वीज़ा नहीं मिला,जिसकी वजह से मंगलवार को होने वाले दोनों शो रद्द कर दिए गए. यह नाटक गाज़ा में फिलिस्तीनी थिएटर की स्थिति पर आधारित है और इसे मशहूर निर्देशक ऐनात वीज़मैन ने तैयार किया था.
मकतूब मीडिया के मुताबिक़ वीज़मैन ने बताया कि उन्होंने दो महीने पहले वीज़ा के लिए आवेदन किया था. बाद में भारतीय अधिकारियों ने नाटक की पूरी जानकारी मांगी, जो दे दी गई थी. इसके बावजूद वीज़ा नहीं मिला. उन्होंने कहा कि अंतिम समय तक इंतज़ार कराया गया और फिर दूतावास में प्रवेश तक नहीं दिया गया. वीज़मैन ने इसे प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक सेंसरशिप बताया.
उन्होंने कहा कि यह वही आवाज़ दबाने की प्रक्रिया है, जिसकी बात उनका नाटक करता है , पहले गाज़ा को मिटाया गया, फिर उसकी कहानी को, और अब उस पर बना नाटक भी रोका जा रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि यह नाटक इज़राइल-फिलिस्तीन में भी कभी मंचित नहीं होने दिया गया.
फेस्टिवल आयोजकों ने बताया कि अगर कलाकार समय रहते केरल पहुंच जाते हैं तो नाटक दिखाया जाएगा, वरना टिकट का पैसा लौटाया जाएगा. नाटक की जगह आयोजकों ने एकजुटता कार्यक्रम रखा. केरल संगीत नाटक अकादमी ने कहा कि गृह मंत्रालय से अनुमति मिल गई थी, लेकिन वीज़ा दूतावास स्तर पर अटक गया.
वीज़मैन ने कहा, “नाटक भारत नहीं पहुंच सका, लेकिन उसकी आवाज़ ज़रूर पहुंच गई. संघर्ष जारी रहेगा
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