30/03/2026: रुपया 95 | केरल में FCRA संग्राम | बीजू पर BJP में ही बवाल | वेदांता-अडानी केस | SC स्कॉलरशिप गिरावट | उत्तराखंड में दलबदल | जनगणना में लिव-इन मान्यता | हॉर्मुज़ संकट, ईरान जंग तेज
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फलक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
सरकार का प्रस्ताव; सोशल मीडिया पर यूजर्स, इन्फ्लुएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स द्वारा साझा किए गए समाचारों को ब्लॉक करने की तैयारी
केरल चुनाव: एफसीआरए संशोधन विधेयक बना मुख्य मुद्दा; चर्चों के साथ एलडीएफ और यूडीएफ खासे चिंतित
बीजू पटनायक पर निशिकांत दुबे की टिप्पणी से सियासी घमासान: नवीन पटनायक ने दी ‘डॉक्टर’ को दिखाने की सलाह, जय पांडा ने बताया ‘अस्वीकार्य’
वेदांता पहुँचा सुप्रीम कोर्ट; अनिल अग्रवाल बोले—लिखित में बताया कि हमने बोली जीत ली है, लेकिन फिर अडानी के पक्ष में पलट दी गई
चुनावी राज्यों ने खोला खजाना: जन कल्याणकारी योजनाओं पर 37,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च
बंगाल, केरल और ओडिशा में अनुसूचित जाति (एससी) के छात्रों की पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति में भारी गिरावट
उत्तराखंड में भाजपा को झटका: चुनाव से पहले छह वरिष्ठ नेता कांग्रेस में शामिल
जनगणना 2027: ‘स्थिर रिश्ते’ में रहने वाले लिव-इन कपल बिना फेरे ही ‘पति-पत्नी’ कहलाएंगे!
सदियों के भेदभाव पर नेपाल सरकार दलित समुदाय से मांगेगी माफी
नीतीश कुमार ने विधान परिषद से दिया इस्तीफा, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी बरकरार
आकार पटेल : जो ईरान के साथ हुआ, अगर वही अमेरिका के साथ हुआ होता, तब भी क्या हमारी प्रतिक्रिया ऐसी ही होती?
मिडिल ईस्ट में अमेरिकी मरीन की तैनाती; हूतियों का इज़राइल पर हमला और सऊदी अरब में अमेरिकी सैनिक ज़ख़्मी
ट्रंप की ईरान को चेतावनी: ‘हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य नहीं खुला तो बिजली और ऊर्जा ढांचे को कर देंगे पूरी तरह तबाह’
ईरान युद्ध का एक महीना: ट्रंप का ‘शासन परिवर्तन’ का दावा और गहराता वैश्विक संकट
स्पेन ने अमेरिकी सैन्य विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद किया; ईरान युद्ध को बताया ‘अन्यायपूर्ण’
वैज्ञानिकों ने पहली बार स्पर्म व्हेल के बच्चे को जन्म देने का वीडियो बनाया; अन्य मादा व्हेल ने मिलकर की मदद
वेदांता पहुँचा सुप्रीम कोर्ट; अनिल अग्रवाल बोले—लिखित में बताया कि हमने बोली जीत ली है, लेकिन फिर अडानी के पक्ष में पलट दी गई
खनन दिग्गज अनिल अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा है कि वेदांता को लिखित पुष्टि मिली थी कि उसने जयपी ग्रुप (Jaypee Group) की संपत्ति के लिए बोली जीत ली है, लेकिन बाद में इस फैसले को पलट दिया गया—और यह अडानी ग्रुप के पक्ष में चला गया (हालांकि उन्होंने पोस्ट में अडानी ग्रुप का नाम नहीं लिया).
‘द वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक, अग्रवाल ने अपनी पोस्ट में लिखा, “यह एक पारदर्शी प्रक्रिया थी. हमें लिखित में सूचित किया गया था कि हम जीत गए हैं. लेकिन जीवन इतना सरल नहीं होता. कुछ दिनों बाद फैसला बदल दिया गया.” वेदांता के सीईओ अग्रवाल ने इसके कारणों पर विस्तार से कुछ नहीं कहा और यह दर्ज किया कि वह “विवरण में नहीं जाना चाहते.” इस पोस्ट के कुछ ही समय बाद, कई समाचार माध्यमों ने बताया कि वेदांता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है और जयपी ग्रुप की संपत्तियों के लिए अडानी ग्रुप द्वारा प्रस्तुत समाधान योजना पर रोक लगाने की मांग की है.
अपने ‘एक्स’ पोस्ट में, अग्रवाल ने 5 सितंबर, 2025 की एक समाचार कतरन साझा की, जिसमें वेदांता द्वारा दिवालिया हो चुकी ‘जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड’ (जेएएल) के अधिग्रहण के लिए 17,000 करोड़ रुपये की बोली जीतने की खबर थी. उस समाचार कतरन में यह भी उल्लेख है कि बोली प्रक्रिया में कई कंपनियों ने भाग लिया था, लेकिन केवल वेदांता और अडानी ग्रुप ने ही अंतिम बोलियाँ लगाई थीं. अन्य प्रतिभागियों में डालमिया भारत, जिंदल पावर और पीएनसी इंफ्राटेक शामिल थे.
अग्रवाल ने इस पोस्ट की शुरुआत में उल्लेख किया कि जीवन ने श्रीमद्भगवद्गीता के उस सिद्धांत की “परीक्षा” ली है, जो पाठक को विनम्र रहने और आसक्ति के बिना अपना कर्तव्य करने के लिए प्रेरित करता है.
उन्होंने जयपी समूह के संस्थापक जयप्रकाश गौड़ के साथ अपनी बातचीत की यादों के बारे में लिखा, जिन्होंने पहले स्पष्ट रूप से अग्रवाल से कहा था कि समूह की संपत्तियाँ सुरक्षित हाथों में सौंपी जानी चाहिए.
उन्होंने लिखा: “कुछ साल पहले, जयपी समूह बनाने वाले जयप्रकाश गौड़ मुझसे मिलने लंदन आए थे. उन्होंने कड़ी मेहनत और दूरदृष्टि के साथ अपने जीवनकाल में एक साम्राज्य खड़ा किया था. उन्होंने एक से अधिक बार संपर्क किया. उन्होंने मुझे पत्र लिखा. उनकी एकमात्र सरल इच्छा थी कि उन्होंने जो बनाया है वह सुरक्षित हाथों में जाना चाहिए और सही इरादे के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए. उन्होंने मुझे अपने शब्दों में हिन्दी में पत्र भी लिखे, जिसमें अपना विश्वास व्यक्त किया था. उस समय, हम आगे नहीं बढ़ सके.”
अग्रवाल ने फिर ‘जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड’ की सार्वजनिक नीलामी का वर्णन किया. “अचानक, जयप्रकाश गौड़ जी की भावनाएँ और इच्छाएँ मुझे याद आने लगीं. एक-एक करके, हर कोई बोली से बाहर हो गया. अंत में, हमें सार्वजनिक रूप से सबसे बड़ा बोलीदाता घोषित कर दिया गया.”
अग्रवाल ने आगे कहा, “यह एक पारदर्शी प्रक्रिया थी. हमें लिखित रूप में सूचित किया गया था कि हम जीत गए हैं. लेकिन जीवन इतना सरल नहीं होता. कुछ दिनों बाद, फैसला बदल दिया गया.”
‘पीटीआई’ की रिपोर्ट के अनुसार, ‘जेएएल’ की ऋणदाता समिति (सीओसी) ने प्रतिस्पर्धी बोलियों का मूल्यांकन किया और बाद में अडानी की बोली को मंजूरी देने के लिए दिवाला अदालत ‘एनसीएलटी’ का रुख किया. एनसीएलटी की इलाहाबाद पीठ ने इस बोली को मंजूरी दे दी, जिसके खिलाफ अग्रवाल के वेदांता समूह ने अपीलीय निकाय ‘एनसीएलएटी’ के समक्ष चुनौती दायर की है.
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, नेशनल कंपनी लॉ अपीलीय ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने पिछले हफ्ते हुई दूसरी सुनवाई में, जेएएल के लिए अडानी की बोली को मंजूरी देने वाले एनसीएलटी के फैसले पर रोक नहीं लगाई.
अग्रवाल ने कहा कि वह अपने समूह की जीती हुई बोली के पलटने के विवरण में नहीं जाना चाहते। उन्होंने लिखा:
“वह उचित मंच के लिए है. लेकिन मैं अपने दिल की कुछ बात साझा करना चाहता हूँ. हमें इस संपत्ति से कोई मोह नहीं है. यदि यह आती है, तो यह ईश्वर की कृपा है. यदि यह जाती है, तो वह भी उनकी इच्छा है. लेकिन एक बात जिसे हम दृढ़ता से मानते हैं—जब धर्म में कुछ वादा किया जाता है, तो उसे वापस नहीं लिया जाना चाहिए. हमारे शास्त्रों में भी, हम इसे बार-बार देखते हैं. सत्य, प्रतिबद्धता और निष्पक्षता सब कुछ से ऊपर है. तो, किसी को क्या करना चाहिए? गीता एक सरल उत्तर देती है—अपना कर्तव्य साहस के साथ करें, लेकिन बिना क्रोध या मोह के. हम वही करेंगे. हम तथ्यों को सही तरीके से रखेंगे. हम सही रास्ते पर चलेंगे. बाकी, मैं भगवान पर छोड़ता हूँ.”
‘परम पूज्य’ अडानी का दिल आ गया...
शिव सेना (यूबीटी) की पूर्व सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने भी “एक्स” पर लिखा कि दिवाला प्रक्रिया के दौरान, लेनदारों द्वारा आयोजित ‘चैलेंज ऑक्शन’ में वेदांता समूह ने अडानी समूह को पछाड़ते हुए सबसे बड़ी बोली लगाई थी. वेदांता ने ₹17,000 करोड़ का प्रस्ताव दिया था, जबकि अडानी का प्रस्ताव ₹14,535 करोड़ का था.
जयप्रकाश के ऋणदाताओं, जिनके ₹59,000 करोड़ से अधिक के दावे स्वीकार किए गए थे, उन्हें लगभग 71% का ‘हेयरकट’ (नुकसान) सहना पड़ता, और अडानी की कम बोली के मामले में यह नुकसान और भी अधिक होता. लेकिन इस सरकार के तहत ‘परम पूज्य’ अडानी जी वह चीज़ कैसे हार सकते हैं, जिस पर उनका दिल आ गया हो? भाजपा अपने ‘लाड़ले’ को कैसे निराश कर सकती है? इसलिए, वेदांता को बोली जीतने का जो लिखित आश्वासन दिया गया था, उसे पलट दिया गया.
सरकार का प्रस्ताव; सोशल मीडिया पर यूजर्स, इन्फ्लुएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स के ब्लॉक होंगे समाचार!
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सोमवार (30 मार्च) को ‘सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021’ में प्रस्तावित संशोधनों को प्रकाशित किया. इनमें ऑनलाइन सामग्री, विशेष रूप से समाचार और समसामयिक मामलों पर केंद्र सरकार के नियंत्रण का विस्तार करना शामिल है. इसके तहत उन मध्यवर्तियों के साथ-साथ उन उपयोगकर्ताओं को भी निगरानी तंत्र के दायरे में लाने का प्रस्ताव है जो ‘प्रकाशक’ नहीं हैं, लेकिन ऑनलाइन समाचार साझा करते हैं.
‘द वायर’ के अनुसार, इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आइएफएफ) सहित डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं ने इन मसौदा नियमों को “डिजिटल अधिनायकवाद” करार दिया है. उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कार्यकारी नियंत्रण के निरंतर विस्तार पर चिंता व्यक्त की है. सोमवार को जारी ‘सूचना प्रौद्योगिकी (द्वितीय संशोधन) नियम, 2026’ के इन मसौदा नियमों पर 14 अप्रैल तक हितधारकों से प्रतिक्रिया मांगी गई है. ये नियम ‘एक्स’ और ‘मेटा’ जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को जारी किए गए कई ‘टेकडाउन ऑर्डर’ (सामग्री हटाने के आदेश) के तुरंत बाद आए हैं, जिनके माध्यम से हाल के हफ्तों में सरकार की आलोचना करने वाली सामग्री और हैंडल हटा दिए गए हैं.
मसौदा नियमों में ‘नियम 8(1)’ के तहत संशोधन का प्रावधान है, जिसके माध्यम से नियम 14 (अंतर्विभागीय समिति), नियम 15 (सामग्री ब्लॉक करने की प्रक्रिया) और नियम 16 (आपातकालीन ब्लॉकिंग प्रावधान) निम्नलिखित पर लागू होंगे: (क) मध्यवर्ती; और (ख) उन उपयोगकर्ताओं द्वारा मध्यवर्तियों के कंप्यूटर संसाधनों पर होस्ट, प्रदर्शित, अपलोड, संशोधित, प्रकाशित, प्रसारित, संग्रहीत, अपडेट या साझा की गई समाचार और समसामयिक मामलों की सामग्री, जो प्रकाशक नहीं हैं.
मसौदा नियमों में ‘नियम 3(1)(g)’ और ‘3(1)(h)’ में संशोधन का भी प्रावधान है, जो किसी भी अन्य कानून के तहत ऐसी आवश्यकताओं के साथ डेटा प्रतिधारण को अनिवार्य बनाते हैं. इसमें यह भी प्रावधान है कि एक मध्यवर्ती को लिखित में दिए गए किसी भी स्पष्टीकरण, परामर्श, आदेश, निर्देश, मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी), अभ्यास संहिता या दिशानिर्देश का पालन करना होगा और उसे प्रभावी बनाना होगा.
मसौदा ‘नियम 14(2)’ में भी संशोधन का प्रस्ताव करता है और अंतर्विभागीय समितियों के दायरे को “शिकायतों या शिकायतों” की सुनवाई से बढ़ाकर “मामलों” (मंत्रालय द्वारा संदर्भित मामलों सहित) की सुनवाई तक विस्तृत करता है. एक बयान में, इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने कहा कि हालांकि इन नियमों को “स्पष्टीकरण और प्रक्रियात्मक” के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन वे “ऑनलाइन भाषण पर कार्यकारी शक्ति के खतरनाक विस्तार का प्रतिनिधित्व करते हैं”.
भारतीय रुपया 95/ डॉलर के पार पहुँचा; एक दशक से अधिक समय में दर्ज की गई सबसे बड़ी वार्षिक गिरावट
सोमवार को एक अस्थिर कारोबारी सत्र के दौरान भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर गिर गया. इसके साथ ही एक कठिन वित्त वर्ष का अंत हुआ, जिसमें व्यापारिक घर्षण, भू-राजनीति और प्रतिकूल पूंजी प्रवाह ने दक्षिण एशियाई मुद्रा को भारी नुकसान पहुँचाया.
‘रॉयटर्स’ के अनुसार, विदेशी मुद्रा पोजीशन पर केंद्रीय बैंक द्वारा लगाए गए अचानक प्रतिबंध ने पस्त रुपये को दिन में कुछ समय के लिए राहत दी, लेकिन इससे व्यापारियों को घाटा भी हुआ, क्योंकि उन्हें अपनी ‘आर्बिट्राज पोजीशन’ को जल्दबाजी में बंद करना पड़ा. रुपये ने कारोबारी सत्र की शुरुआत 93.59 प्रति डॉलर के एक सप्ताह के उच्च स्तर पर की थी, लेकिन बाद में गिरावट दर्ज करते हुए यह 95.21 के निचले स्तर पर पहुँच गया.
संभवतः केंद्रीय बैंक (आरबीआई) के हस्तक्षेप के कारण मुद्रा को सहारा मिला और सत्र की समाप्ति 94.83 पर हुई, जो पिछले बंद स्तर से थोड़ा ही अलग था. एक विदेशी बैंक के एक ट्रेडर ने कहा, “आज रुपये की चाल का अनुमान लगाना कठिन था और व्यापार करना उससे भी अधिक कठिन. यदि आरबीआई 95 के पार कदम नहीं उठाता, तो रुपये की गिरावट और गहरी हो सकती थी.”
अप्रैल से मार्च तक चलने वाले भारत के वित्त वर्ष के दौरान रुपये में 11% की गिरावट आई, जो 2011-12 के बाद से इसकी सबसे बड़ी गिरावट है.
पिछले 12 महीनों में रुपये ने महत्वपूर्ण दबाव झेला है, क्योंकि विदेशी निवेशकों ने लगातार भारतीय शेयरों को बेचा और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों ने वैश्विक स्तर पर वित्तीय बाजारों को हिलाकर रख दिया. विदेशी निवेशकों ने पिछले 12 महीनों में 19 बिलियन डॉलर से अधिक के भारतीय शेयर बेचे. मार्च में यह बिक्री रिकॉर्ड मासिक गति पर पहुँच गई, क्योंकि मध्य पूर्व में युद्ध के कारण तेल की कीमतों में आए उछाल ने ऊर्जा आयातक भारत के लिए जोखिमों के प्रति निवेशकों को चिंतित कर दिया.
बार्कलेज के विश्लेषकों ने सोमवार को एक नोट में कहा, “जमीनी हकीकत यह है कि आरबीआई का प्रतिबंध उन बुनियादी कारकों को नहीं बदलता जिन्होंने मुद्रा पर दबाव बनाया है. रुपया तेल आपूर्ति के झटके के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बना हुआ है, जबकि भारत की भुगतान संतुलन स्थिति और खराब हो सकती है.”
सोमवार को भारतीय शेयर दबाव में रहे और बेंचमार्क निफ्टी 50 में मार्च में 11% की गिरावट आई, जो मार्च 2020 में कोविड के समय आई गिरावट के बाद सबसे बड़ी मासिक गिरावट है. भारत के 10-वर्षीय बेंचमार्क बॉन्ड पर यील्ड 21 महीनों में पहली बार 7% से ऊपर पहुँच गई,
केरल चुनाव: एफसीआरए संशोधन विधेयक बना मुख्य मुद्दा; चर्चों के साथ एलडीएफ और यूडीएफ खासे चिंतित
केरल में 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए मतदान में मुश्किल से दस दिन शेष हैं, ऐसे में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधनों ने तेजी से एक बड़े चुनावी मुद्दे का रूप ले लिया है. कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) और माकपा के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) ने इस विधेयक को तत्काल वापस लेने की मांग की है, जिससे राज्य में भाजपा के सावधानीपूर्वक तैयार किए गए ईसाई संपर्क अभियान में उथल-पुथल मच गई है.
‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस’ के मुताबिक, मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने इन चिंताओं को प्रमुखता से उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है और केंद्र से संशोधन विधेयक के प्रावधानों पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है. विजयन ने अल्पसंख्यक समुदायों और धर्मार्थ संगठनों के बीच “गंभीर और तार्किक चिंताओं” को रेखांकित किया है, विशेष रूप से उन धाराओं के संबंध में जो सरकार को उन संपत्तियों को अपने कब्जे में लेने और निपटाने का अधिकार देती हैं जो विदेशी धन से बनाई गई हैं, यदि किसी एनजीओ का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रद्द हो जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता है.
उन्होंने चेतावनी दी कि प्रक्रियात्मक देरी या तकनीकी खामियां भी संपत्तियों की जब्ती का कारण बन सकती हैं, जिससे कल्याणकारी गतिविधियों में लगे संस्थानों के लिए अनिश्चितता पैदा होगी. चुनावों में एलडीएफ के लिए लगातार तीसरे कार्यकाल की तलाश कर रहे पिनाराई ने राजनीतिक रूप से आवेशित माहौल में इन आशंकाओं को अल्पसंख्यक समुदायों के बीच बढ़ती चिंताओं से जोड़ा है, और एलडीएफ को संस्थागत स्वायत्तता और सामाजिक सेवा नेटवर्क के रक्षक के रूप में पेश किया है.
इस मुद्दे का राजनीतिक वजन इसलिए और बढ़ गया है, क्योंकि राज्य सरकार और प्रभावशाली चर्च नेतृत्व संशोधनों के विरोध में एक साथ आ गए हैं. कैथोलिक और रूढ़िवादी चर्चों की वरिष्ठ हस्तियों ने सार्वजनिक रूप से अपनी आशंकाएं व्यक्त की हैं, जिससे इस बहस को नैतिक और चुनावी महत्व मिला है.
विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में प्रस्तावित बदलावों पर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि इन संशोधनों ने लोगों, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित संगठनों और धर्मार्थ एवं सामाजिक सेवा गतिविधियों में लगे संस्थानों के बीच आशंकाएं पैदा कर दी हैं.
बीजू बाबू पर निशिकांत दुबे की टिप्पणी से सियासी घमासान: नवीन पटनायक ने दी ‘डॉक्टर’ को दिखाने की सलाह, जय पांडा ने बताया ‘अस्वीकार्य’
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे द्वारा दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी और ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को लेकर की गई एक विवादास्पद टिप्पणी ने देश की सियासत में खासा विवाद पैदा कर दिया है. झारखंड के गोड्डा से सांसद दुबे ने आरोप लगाया था कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान बीजू पटनायक अमेरिकी सरकार, सीआईए और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच एक ‘कड़ी’ के रूप में काम कर रहे थे. इस टिप्पणी के बाद न केवल विपक्षी दल बीजू जनता दल (बीजेडी), बल्कि बीजेपी के अंदर से भी तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं.
बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और सांसद बैजयंत ‘जय’ पांडा ने अपनी ही पार्टी के सहयोगी दुबे की आलोचना करते हुए उनकी बातों को ‘तथ्यहीन’ और ‘अस्वीकार्य’ बताया है. एक्स पर एक पोस्ट में पांडा ने कहा, “बीजू अंकल एक महान व्यक्तित्व थे, वे न केवल अपने दौर के ओडिशा के सबसे बड़े नेता थे, बल्कि देश के मार्गदर्शकों में से एक थे. उनके रग-रग में राष्ट्रवाद दौड़ता था और उन्होंने अपना पूरा जीवन भारत को आज़ाद कराने और ओडिशा के उत्थान में समर्पित कर दिया. एक पायलट, उद्योगपति और राजनीतिक नेता के रूप में उनकी भूमिका अनुकरणीय रही है.” पांडा ने आगे कहा कि बीजू बाबू की देशभक्ति पर सवाल उठाना पूरी तरह से काल्पनिक और हास्यास्पद है. उनके पिता बंशीधर पांडा और बीजू पटनायक के बीच बेहद करीबी रिश्ते थे.
दूसरी ओर, बीजू पटनायक के बेटे और ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने दुबे की टिप्पणी पर कड़ा ऐतराज़ जताया है. उन्होंने सोमवार को मीडिया से बात करते हुए कहा, “मैं निशिकांत दुबे द्वारा बीजू बाबू के बारे में कही गई अपमानजनक बातों से हैरान हूँ. मुझे नहीं लगता कि जवाहरलाल नेहरू ने रणनीति बनाने के लिए दिल्ली में बीजू बाबू के दफ़्तर के पास अपना दफ़्तर बनाया था.” उन्होंने 1962 के युद्ध की अपनी यादें साझा करते हुए कहा कि एक 13 साल के बच्चे के रूप में उन्हें याद है कि उनके पिता चीनी हमले को लेकर कितने ग़ुस्से में थे. नवीन पटनायक ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि बीजेपी सांसद को ऐसी ‘भद्दी’ बातें करने के लिए किसी ‘मानसिक रोग विशेषज्ञ’ को दिखाने की ज़रूरत है.
इस विवाद का असर संसद में भी देखने को मिला. बीजेडी ने राज्यसभा में इस मुद्दे पर ज़ोरदार विरोध किया और वॉकआउट किया. बीजेडी नेता सस्मित पात्रा ने सदन में कहा, “बीजेडी आमतौर पर सदन की कार्यवाही में बाधा नहीं डालती, लेकिन आज हम सांसद निशिकांत दुबे के अपमानजनक और मनगढ़ंत बयानों के ख़िलाफ़ कड़ा विरोध दर्ज कराते हैं. उन्होंने बीजू पटनायक को ‘सीआईए एजेंट’ कहा है. यह सत्ताधारी दल की गिरावट की हद है, जो बेहद शर्मनाक है.”
चौतरफ़ा घिरने के बाद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया पर सफ़ाई देने की कोशिश की. उन्होंने दावा किया कि वे बीजू पटनायक पर निशाना नहीं साध रहे थे, बल्कि कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार के ‘कुकर्मों’ को उजागर कर रहे थे. दुबे ने कहा, “जब कांग्रेस ने बीजू बाबू के साथ अन्याय किया, तब जनसंघ और बीजेपी उनके साथ खड़ी थी. मेरे ट्वीट में बीजू बाबू के ख़िलाफ़ क्या आरोप है? अगर किसी को बुरा लगा है, तो मैं उन्हें केवल समझाने की कोशिश ही कर सकता हूँ.”
पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजू पटनायक के करीबी रहे दिलीप राय ने भी दुबे की आलोचना की. उन्होंने कहा कि बीजू बाबू के देश और राज्य के लिए दिए गए असाधारण योगदान को राजनीतिक बयानबाज़ी के ज़रिए छोटा करना अनुचित और अपमानजनक है.
इस बीच बीजद के राज्यसभा सदस्य सस्मित पात्रा ने भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली ‘संचार और आईटी’ संबंधी संसदीय स्थायी समिति से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने यह कदम पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक के बारे में दुबे की “अपमानजनक टिप्पणियों” के विरोध में उठाया है.
28 मार्च को राज्यसभा सभापति को लिखे एक पत्र में पात्रा ने कहा, “मैं अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर ऐसे व्यक्ति के नेतृत्व में काम करना जारी नहीं रख सकता, जो एक सार्वजनिक बयान में दिवंगत बीजू पटनायक जी के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करता है...”
चुनावी राज्यों ने खोला खजाना: जन कल्याणकारी योजनाओं पर 37,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च
चुनाव आते ही जन कल्याणकारी खर्चों की बाढ़ आ जाती है. असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले, मौजूदा सरकारों ने नई या संवर्धित योजनाओं के माध्यम से सामूहिक रूप से 37,000 करोड़ रुपये से अधिक की घोषणा, आवंटन या वितरण किया है. केरल की एक योजना (जिसका परिव्यय लगभग 3,000 करोड़ रुपये है) को छोड़कर, अन्य सभी योजनाओं की घोषणा जनवरी से मार्च के बीच की गई, यानी राज्यों में मतदान शुरू होने से कुछ हफ्ते पहले.
यदि हेडलाइन के आंकड़े सरकारों के इरादे को दर्शाते हैं, तो राज्यों ने पिछले महीने के दौरान धन वितरण में वास्तविक तत्परता दिखाई है. केवल पिछले एक महीने में ही नकद सहायता, एकमुश्त हस्तांतरण, या बढ़े हुए वेतन और पेंशन के माध्यम से 20,000 करोड़ रुपये से अधिक वितरित किए गए हैं. जहाँ तमिलनाडु ने मौजूदा योजनाओं के अग्रिम भुगतान और पोंगल उपहारों के साथ मार्च में 13,000 करोड़ रुपये से अधिक का वितरण किया है, वहीं पश्चिम बंगाल ने फरवरी-मार्च में 3,000 करोड़ रुपये से अधिक वितरित किए. 10 मार्च को असम ने एक ही दिन में मतदाताओं को 3,600 करोड़ रुपये बाँटे.
यह इस बात को रेखांकित करता है कि कैसे सरकारों ने आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले के हफ्तों में भुगतानों का बोझ बढ़ा दिया, जिससे महीनों के लाभ को चुनाव से पहले की एक छोटी सी अवधि में समेट दिया गया. “द इंडियन एक्सप्रेस” में दीप्तिमान तिवारी की पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है.
बंगाल, केरल और ओडिशा में अनुसूचित जाति (एससी) के छात्रों की पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति में भारी गिरावट
अनुसूचित जाति (एससी) के छात्रों के बीच उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने वाली एक राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना के लाभार्थियों की संख्या में पिछले दो वर्षों में (2025-26 के दौरान) भारी गिरावट देखी गई है. इसमें बंगाल, केरल और ओडिशा सबसे पीछे रहने वाले राज्यों के रूप में उभरे हैं.
बसंत कुमार मोहंती की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2024-25 में, तेलंगाना को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 48 लाख से अधिक अनुसूचित जाति के छात्र इस योजना में शामिल हुए थे. सरकार द्वारा निर्धारित 76 लाख छात्रों के लक्ष्य के मुकाबले, 2025-26 में यह संख्या घटकर लगभग 36 लाख रह गई है. भाजपा सांसद पी.सी. मोहन की अध्यक्षता वाली सामाजिक न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने 2025-26 में पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप (पीएमएस) के तहत लाभार्थियों की संख्या में इस महत्वपूर्ण कमी पर चिंता व्यक्त की है.
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय (एमओएसजेई) ने इस गिरावट का कारण योजना के बारे में जागरूकता की कमी को बताया है. मंत्रालय की 2026-27 के लिए अनुदान मांगों से संबंधित समिति की रिपोर्ट में यह बात कही गई है. 24 मार्च को लोकसभा में एक अलग लिखित उत्तर में, सामाजिक न्याय राज्य मंत्री रामदास अठावले ने 19 मार्च तक के राज्य-वार लाभार्थियों के आंकड़े साझा किए. इन आंकड़ों के अनुसार, ओडिशा में 2024-25 के 1.92 लाख लाभार्थियों की तुलना में 2025-26 में केवल 1,745 छात्रों को लाभ मिला. इसी अवधि के दौरान, बंगाल में यह संख्या 1.08 लाख से गिरकर 28,666 और केरल में 1.47 लाख से घटकर 17,133 रह गई.
पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसे राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के माध्यम से लागू किया जाता है. यह छात्रवृत्ति उन छात्रों को दी जाती है जिनके माता-पिता की वार्षिक आय 2.5 लाख रुपये से कम है. इसका उद्देश्य सबसे गरीब परिवारों के छात्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति के छात्रों के सकल नामांकन अनुपात को बढ़ाना है.
राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित करते हैं और दस्तावेजों का सत्यापन करते हैं. राज्यों द्वारा अपना हिस्सा भुगतान करने के बाद ही छात्रवृत्ति का केंद्रीय हिस्सा जारी किया जाता है.
संसदीय पैनल के सवालों पर मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि आय मानदंड और योजना के बारे में जागरूकता कम थी. अधिकारी ने पैनल को सूचित किया कि 2026-27 से आय मानदंड को बढ़ाकर 4.5 लाख रुपये प्रति वर्ष करने का प्रस्ताव है. साथ ही, सरकार योजना के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए बजट का 1 प्रतिशत निर्धारित करने की योजना बना रही है.
पैनल ने कहा, “समिति यह समझने में असमर्थ है कि विभाग उच्च शिक्षा में एससी छात्रों के सकल नामांकन अनुपात को कैसे बढ़ाएगा, जबकि 2025-26 में वास्तविक खर्च और लाभार्थियों की संख्या में वास्तव में कमी आई है.”
नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ दलित ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष अशोक भारती ने इस समस्या के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रणाली और राज्यों द्वारा पहले अपना हिस्सा भुगतान करने की शर्त को जिम्मेदार ठहराया. भारती ने कहा, “यह पूरी तरह संभव है कि केंद्र ने धन जारी करने में देरी की हो, क्योंकि राज्यों ने अभी तक अपना हिस्सा नहीं दिया है. पीएमएस को पूरी तरह से केंद्र द्वारा वित्तपोषित किया जाना चाहिए. इसके अलावा, कई छात्रों के पास ऑनलाइन आवेदन करने के लिए कंप्यूटर तक पहुंच नहीं है.”
उत्तराखंड में भाजपा को झटका: चुनाव से पहले छह वरिष्ठ नेता कांग्रेस में शामिल
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से एक साल से भी कम समय पहले और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक प्रमुख एक्सप्रेसवे परियोजना के उद्घाटन के लिए प्रस्तावित दौरे से कुछ दिन पहले, भाजपा के छह वरिष्ठ नेता कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने दावा किया कि 2027 के चुनावों से पहले सत्ताधारी दल के एक दर्जन से अधिक और नेता पाला बदल सकते हैं.
पीयूष श्रीवास्तव की रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली में कांग्रेस में शामिल होने वाले इन भाजपा नेताओं ने पुष्कर सिंह धामी सरकार के प्रति असंतोष व्यक्त किया और भाजपा को दोबारा सत्ता में आने से रोकने का संकल्प लिया. इनमें पूर्व विधायक राज कुमार ठुकराल और भीमलाल आर्य, रुड़की के पूर्व मेयर गौरव गोयल, भीमताल के पूर्व ब्लॉक प्रमुख लखन सिंह और मसूरी के पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष अनुज गुप्ता शामिल हैं. भीमलाल आर्य ने भाजपा शासन के दौरान व्यापक भ्रष्टाचार का आरोप लगाया और राज्य में कांग्रेस की जीत की संभावनाओं पर विश्वास जताया. कांग्रेस नेता प्रीतम सिंह ने भी सरकार की आलोचना करते हुए उस पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल रहने का आरोप लगाया. उन्होंने ऋषिकेश में 2022 में एक युवा रिसेप्शनिस्ट की हत्या पर सार्वजनिक आक्रोश का भी उल्लेख किया—एक ऐसी घटना जिसका संबंध भाजपा के एक पूर्व नेता के परिवार से था.
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इन दलबदलों को कमतर बताते हुए इन नेताओं को ‘आदतन दल बदलने वाला’ करार दिया. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने इन्हें “नकारे गए” चेहरे बताते हुए खारिज कर दिया और दावा किया कि कांग्रेस उम्मीदवारों की कमी के कारण इन्हें शामिल कर रही है. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक मोदी के दौरे से ठीक पहले हुए इन दलबदलों को भाजपा के लिए एक झटके के रूप में देख रहे हैं. माना जा रहा है कि कानून-व्यवस्था और पर्यावरणीय मुद्दों सहित शासन संबंधी चिंताएँ जनभावनाओं को प्रभावित कर रही हैं.
जनगणना 2027:‘स्थिर रिश्ते’ में रहने वाले लिव-इन कपल बिना फेरे ही ‘पति-पत्नी’ कहलाएंगे!
स्क्रोल के अनुसार, जनगणना 2027 से जुड़ा एक बड़ा बदलाव सामने आया है, जहां लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल, अगर खुद को स्थिर रिश्ते में मानते हैं, तो उन्हें विवाहित के रूप में गिना जाएगा. यह जानकारी स्व-गणना पोर्टल पर प्रकाशित एक FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न) के जवाब में दी गई है.
यह पोर्टल उन लोगों के लिए शुरू किया गया है, जो घर-घर आने वाले गणनाकर्ताओं को जानकारी देने के बजाय खुद ऑनलाइन अपनी डिटेल्स भरना चाहते हैं. जनगणना के दोनों चरण हाउस लिस्टिंग व हाउसिंग जनगणना और जनसंख्या गणना में इसका इस्तेमाल होगा. हालांकि, यह फैसला कपल के स्वयं के बयान पर आधारित होगा.
गणना के पहले चरण की शुरुआत बुधवार से होगी. इसमें घरों की स्थिति और संपत्तियों से जुड़ी जानकारी इकट्ठा की जाएगी. इसमें मकान का प्रकार, उपलब्ध सुविधाएं और घर में मौजूद वाहनों जैसी जानकारी शामिल होगी. साथ ही, परिवार के सदस्यों की संख्या और मुखिया का विवरण जैसे नाम, लिंग, सामाजिक वर्ग (एससी/एसटी/अन्य) और मकान के स्वामित्व की स्थिति भी दर्ज की जाएगी.
दूसरे चरण की शुरुआत फरवरी 2027 में होने की उम्मीद है, जिसमें लोगों से जुड़ी व्यक्तिगत जानकारी जुटाई जाएगी. भारत में आखिरी बार जनगणना 2011 में हुई थी. 2020 में इसकी शुरुआत होनी थी, लेकिन कोरोना महामारी के चलते इसे टाल दिया गया.
सदियों के भेदभाव पर नेपाल सरकार दलित समुदाय से मांगेगी माफी
मूकनायक की रिपोर्ट के मुताबिक, नव-निर्वाचित नेपाल सरकार ने ऐतिहासिक रूप से वंचित और बहिष्कृत समुदायों के प्रति औपचारिक माफी मांगने का एक अहम फैसला लिया है. प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में 100 सूत्रीय शासकीय सुधार एजेंडा को मंजूरी दी गई, जिसमें राज्य, समाज और नीतिगत ढांचे द्वारा सदियों से किए गए अन्याय, भेदभाव और अवसरों से वंचित रखने की बात को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया है.
इस निर्णय के तहत राज्य की ओर से 15 दिनों के भीतर औपचारिक क्षमायाचना जारी की जाएगी. साथ ही सामाजिक न्याय, समावेशी पुनर्स्थापना और ऐतिहासिक मेल-मिलाप को आधार बनाकर विशेष सुधार कार्यक्रमों की घोषणा की जाएगी. सरकार ने इस पहल को शासन सुधार की प्राथमिकताओं में शामिल किया है, जिससे दलित समुदायों के लिए न्याय, समानता और आर्थिक-सामाजिक उन्नति का रास्ता खुल सके.
नेपाल में दलित समुदाय लंबे समय से भेदभाव का सामना करता रहा है. पारंपरिक हिंदू जाति व्यवस्था और 1854 के मुलुकी ऐन के तहत उन्हें अछूत माना गया, जिसके चलते पानी के स्रोतों, मंदिरों, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक संबंधों तक उनकी पहुंच सीमित रही. हालांकि 1963 में अछूत प्रथा को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया और संविधान में समानता का प्रावधान किया गया, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी अलग है. लगभग 13% आबादी वाले दलित समुदाय का संसद में प्रतिनिधित्व महज 5.8% है, और वे अब भी रोजगार में भेदभाव, हिंसा और सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रहे हैं.
सरकार के इस फैसले का दलित नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों ने स्वागत किया है. उनका मानना है कि यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, हालांकि उन्होंने यह भी जोर दिया कि घोषित सुधार कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना जरूरी है.
नेपाल के इतिहास में यह पहली बार है जब राज्य ने दलित समुदायों के प्रति औपचारिक माफी की घोषणा की है. यह पहल न केवल ऐतिहासिक गलतियों को स्वीकार करने का आधार बनेगी, बल्कि समावेशी विकास और राष्ट्रीय एकता को भी मजबूत करेगी. सरकार ने 15 दिनों की समयसीमा तय की है, जिसके बाद विस्तृत सुधार कार्यक्रम सार्वजनिक किए जाएंगे.
नीतीश कुमार ने विधान परिषद से दिया इस्तीफा, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी बरकरार
स्क्रोल के अनुसार, बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार का करीब 20 साल लंबा कार्यकाल समाप्त होने जा रहा है. राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद उन्होंने बिहार विधान परिषद (एमएलसी ) की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार संसद और राज्य विधानमंडल की दोहरी सदस्यता की अनुमति नहीं है, इसलिए उनका इस्तीफा जरूरी था.
नीतीश कुमार फिलहाल मुख्यमंत्री पद पर बने रहेंगे, क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 164(4) किसी व्यक्ति को बिना राज्य विधानमंडल का सदस्य हुए भी अधिकतम छह महीने तक मुख्यमंत्री बने रहने की अनुमति देता है.
नीतीश कुमार नवंबर 2025 में विधानसभा चुनावों के बाद दसवीं बार मुख्यमंत्री बने थे. उसके बाद 5 मार्च को राज्यसभा चुनाव के लिए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करते हुए नीतीश कुमार ने कहा था कि उनकी इच्छा राज्य और केंद्र, दोनों स्तरों पर सभी चार विधायी भूमिकाओं में सेवा करने की रही है. विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य के रूप में. फिलहाल वे विधान परिषद के सदस्य हैं, जबकि पहले वे विधायक और लोकसभा सांसद भी रह चुके हैं।
हालांकि, राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद उनके मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की अटकलें लगाई जा रही हैं, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि वे कब इस्तीफा देंगे और उनकी जगह मुख्यमंत्री पद कौन लेगा.
आकार पटेल : जो ईरान के साथ हुआ, अगर वही अमेरिका के साथ हुआ होता, तब भी क्या हमारी प्रतिक्रिया ऐसी ही होती?
ज़रा इस ख़याली प्रयोग के बारे में सोचिये. कल्पना कीजिये कि दो बड़ी मिसाइलें व्हाइट हाउस पर गिरीं. पहली मिसाइल रिहायशी हिस्से में उस समय गिरी जब पूरा परिवार घर पर था. राष्ट्रपति ट्रंप, उनकी पत्नी मेलानिया, उनके बेटे डोनाल्ड और एरिक और उनकी पत्नियाँ और उनके बच्चे. कल्पना कीजिये कि वे सब पहली मिसाइल से मारे गए, वे सभी. और दूसरी मिसाइल ठीक तब गिरी जब बचाव दल मदद के लिए परिवार के पास पहुँचा और उसने उन सबको भी मार दिया. इसके बाद, कल्पना कीजिये कि ट्रंप की कैबिनेट अपने घरों में अपने परिवारों के साथ मर रही है. विदेश मंत्री (वहाँ उन्हें सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट कहते हैं) रूबियो, पीटर हेगसेथ, रक्षा मंत्री, और दूसरे लोग जो अक्सर ट्रंप के आसपास दिखाई देते हैं. और इसके बाद, उन्हीं लोगों के बारे में सोचिये जिन्होंने यह सब किया, एक अमेरिकी स्कूल पर हमला करके 150 से ज़्यादा स्कूली लड़कियों को मार डाला.
अमेरिका के पास इतिहास की सबसे बड़ी नौसेना है — उसके पास 11 विशाल विमानवाहक जहाज़ हैं, जिनमें से हर एक के साथ मदद के लिए एक दर्जन या उससे ज़्यादा जहाज़ जुड़े होते हैं — और कल्पना कीजिये कि युद्ध की घोषणा के बिना, उसी इकाई ने जिसने ऊपर के उन सभी लोगों को मारा, गुपचुप तरीके से एक बड़े अमेरिकी युद्धपोत पर टॉरपीडो से हमला किया और उसे डुबो दिया, जिससे जहाज़ पर सवार ज़्यादातर नाविक मारे गए. इन शब्दों को पढ़ने वालों को इन चीज़ों के बारे में सोचने के लिए ज़्यादा कल्पना की ज़रूरत नहीं होगी, क्योंकि ये सभी चीज़ें असल में ईरानियों के साथ हुई हैं.
और ये सब अमेरिकियों के हाथों हुआ. अगर ऊपर लिखे ये शब्द सुनने में अजीब लग रहे हैं, तो इसलिए क्योंकि हमें अमेरिकियों के बारे में उस तरह से सोचने के लिए तैयार किया गया है जैसा कि ईरानियों के बारे में नहीं. यह विशेष रूप से अंग्रेज़ी भाषी दुनिया के बारे में सच है जिसका हम हिस्सा हैं, लेकिन आम तौर पर यह लगभग कहीं भी सच है. ईरान को लगातार बुरा दिखाने और बदनाम करने की वजह से (जैसा कि इराक़, अफ़गानिस्तान, रूस और इसी तरह के देशों के मामले में हुआ) हम उनके प्रति वैसी सहानुभूति नहीं रख पा रहे हैं जैसी हम अमेरिकियों के लिए रख सकते हैं.
अब, हमारे इस ख़याली प्रयोग को एक तरफ रखिये और शर्तों की उन दो सूचियों पर गौर कीजिये जो दोनों पक्षों ने युद्ध ख़त्म करने के लिए रखी हैं. अमेरिकियों की सूची में 15 चीज़ें हैं. वे ये हैं: ईरान को अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह ख़त्म करना होगा. यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करना होगा. अमेरिका को इसकी बेरोकटोक जाँच की अनुमति देनी होगी. बैलिस्टिक मिसाइल विकास रोकना होगा. सैन्य क्षमताओं को कम करना होगा. फ़िलिस्तीन और लेबनान के समूहों को समर्थन बंद करना होगा. विदेशों में प्रभाव ख़त्म करना होगा. होर्मुज़ जलडमरूमध्य का नियंत्रण छोड़ना होगा. शिपिंग लेन पर नियंत्रण छोड़ना होगा. खाड़ी में अमेरिकी सहयोगियों पर हमले रोकने होंगे. क्षेत्र में युद्ध को कम करना होगा. अमेरिका के नेतृत्व वाली बातचीत को मानना होगा. लंबी अवधि की निगरानी और अनुपालन शर्तों को स्वीकार करना होगा. हथियारों के हस्तांतरण को सीमित करना होगा. भविष्य के व्यवहार को बदलना होगा. ईरानियों की एक सूची है जिसमें 5 शर्तें हैं जो इस प्रकार हैं: ईरानी नेताओं की हत्याएँ बंद होनी चाहिए. भविष्य में युद्ध न होने की गारंटी. इस युद्ध से हुए नुक़सान का मुआवज़ा. इस क्षेत्र पर इज़राइल के व्यापक युद्ध का अंत. होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान के संप्रभु अधिकारों की मान्यता. हम यहाँ कुछ चीज़ों को देख सकते हैं.
ईरानी सूची में कुछ चीज़ें गायब हैं हालाँकि उनके बारे में उनके द्वारा बात की गई है और दुनिया ने सुना है. ईरान को, भारत की तरह, पाकिस्तान की तरह और वास्तव में अमेरिका और इज़राइल की तरह, एक शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम का अधिकार है जिसमें यूरेनियम का संवर्धन शामिल है. उन्होंने इसे बाहर क्यों रखा है? शायद इसलिए क्योंकि दुनिया से यह नहीं कहा जाना चाहिए कि ईरान के साथ दूसरों से अलग व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए और नहीं किया जा सकता. इसके अलावा ईरान की सूची रक्षात्मक प्रकृति की है और उन लोगों से कोई माँग नहीं करती जिन्होंने उस पर युद्ध छेड़ा है.
अमेरिकी सूची के बारे में जिसकी पुष्टि ट्रंप ने की है, क्या कहा जा सकता है? बस इतना ही कि यह आक्रामक, अतिवादी और पागलपन भरी है. आक्रामक इस अर्थ में कि यह डराने वाली है, अतिवादी इस मायने में कि यह किसी भी तरह से बातचीत के लिए जगह नहीं देती. और पागलपन भरी इसलिए क्योंकि यह मान लेती है कि अमेरिका और इज़राइल वर्तमान में इस संघर्ष की दिशा तय करने की स्थिति में हैं, जो वे नहीं हैं. इस कारण से, दुर्भाग्य से इस संघर्ष और इसके प्रभाव में शामिल सभी लोगों के लिए, जिनमें हम भी शामिल हैं, दर्द जल्द ख़त्म होने की उम्मीद नहीं है. अब एक आख़िरी बात पर विचार कीजिये. अगर वास्तव में वह सब हुआ होता जिससे हमने शुरुआत की थी.
कि अगर बिना किसी उकसावे के अमेरिका और ट्रंप और उनके परिवार और उनके मंत्रियों और अमेरिकी स्कूली लड़कियों और नाविकों की हत्या हुई होती, तो क्या हमारे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने वही बातें कही और की होतीं जो उन्होंने 28 फरवरी से अब तक की हैं? मुझे इस पर संदेह है. जब हम वसुधैव कुटुंबकम कहते हैं, तो क्या हमारा वास्तव में यह मतलब होता है कि भारत की बुद्धिमत्ता दुनिया और उसके सभी लोगों को एक परिवार मानने में है? जवाब है नहीं, जैसा कि भारत अपने शब्दों के बजाय अपने कार्यों से स्पष्ट और पारदर्शी रूप से दिखाता है.
दुनिया का एक पदानुक्रम है और परिवार में करीबी सदस्य, दूर की मौसियाँ, भूले हुए चाचा और नापसंद चचेरे भाई होते हैं. वे रिश्तेदार जो भौगोलिक रूप से काफ़ी करीब हैं (1947 तक ईरान और भारत की ज़मीन की सीमाएँ जुड़ी हुई थीं) लेकिन मानसिक रूप से दूर हैं, उन्हें एक तरफ रखा जा सकता है और उनके सदमे को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है, जैसा कि हमने ईरान के मामले में पूरी तरह से किया है.
मैं इस संकट से निपटने के किसी नए तरीके के लिए तर्क नहीं दे रहा हूँ, जो कहीं और किया जा सकता है और इस कॉलम में नहीं. मैं केवल यह कह रहा हूँ कि जब हम दुनिया और इसमें आज जो हो रहा है उसका परीक्षण करते हैं, तो हम उन पूर्वाग्रहों और पक्षपातों पर विचार करें जिनसे हमने खुद को लाद रखा है.
आकार लेखक, पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैैं.
मिडिल ईस्ट में अमेरिकी मरीन की तैनाती; हूतियों का इज़राइल पर हमला और सऊदी अरब में अमेरिकी सैनिक ज़ख़्मी
शनिवार को मिडिल ईस्ट में अमेरिकी मरीन की एक विशेष फ़ौज पहुँची है. इसी दौरान ईरान समर्थित यमनी गुट हूतियों ने इज़राइल पर मिसाइल हमला कर इस बढ़ते संघर्ष में सीधे तौर पर प्रवेश कर लिया है, हालाँकि यह हमला असफल रहा. न्यूयॉर्क टाइम्स की इस रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ राजनयिक समाधान के लिए “बहुत मज़बूत बातचीत” चल रही है, लेकिन शुक्रवार और शनिवार को हुए हमलों से युद्ध थमने के कोई संकेत नहीं मिले हैं. यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखने वाले हूतियों के इस हमले से वैश्विक बाज़ारों में हलचल बढ़ सकती है. हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सारी ने कहा कि जब तक “आक्रमण” बंद नहीं होता, तब तक उनके हमले जारी रहेंगे.
अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप द्वारा भेजे गए 31वें मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट के 2,500 मरीन और उनके साथ 2,500 नाविक यू.एस.एस. त्रिपोली एम्फीबियस रेडी ग्रुप का हिस्सा हैं. सुरक्षा कारणों से उनकी सटीक लोकेशन गुप्त रखी गई है. ये मरीन हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के ट्रंप के प्रयासों का हिस्सा होंगे, जिसे ईरानी सेना ने लगभग बंद कर दिया है. विदेश मंत्री मार्को रुबियो का मानना है कि युद्ध हफ़्तों में ख़त्म हो जाएगा, लेकिन ट्रंप ने मरीन या विशेष बलों के इस्तेमाल से इनकार नहीं किया है.
युद्ध की अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं में, सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर हुए एक ईरानी हमले में लगभग दो दर्जन अमेरिकी सैनिक ज़ख़्मी हो गए हैं, जिनमें से दो की हालत गंभीर है. वहीं, दक्षिण लेबनान में इज़राइली हमले में दो टीवी पत्रकार और एक कैमरामैन की मौत हो गई है. इज़राइल ने तेहरान और मध्य ईरान के परमाणु केंद्रों पर नए हमले शुरू कर दिए हैं, जबकि ईरान के ड्रोन हमलों ने कुवैत और ओमान के बुनियादी ढांचों को नुक़सान पहुँचाया है. अब तक इस युद्ध में ईरान में 1,492 नागरिकों समेत 3,300 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं, जबकि लेबनान में 1,110 और इज़राइल में 16 लोगों की मौत हुई है.
ट्रंप की ईरान को चेतावनी: ‘हॉर्मुज़ नहीं खुला तो बिजली और ऊर्जा ढांचे को कर देंगे पूरी तरह तबाह’
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर जल्द ही कोई समझौता नहीं हुआ और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को तुरंत व्यापार के लिए नहीं खोला गया, तो अमेरिका ईरान के बिजली, ऊर्जा और पानी के बुनियादी ढांचे को “पूरी तरह से नेस्तनाबूद” कर देगा. एक्सियोस और रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि अमेरिका ईरान में एक “नए और अधिक तर्कसंगत शासन” के साथ बातचीत कर रहा है और इसमें काफी प्रगति हुई है. लेकिन उन्होंने साफ़ किया कि अगर बात नहीं बनी, तो अमेरिका ईरान के पावर प्लांट, तेल के कुओं, खर्ग द्वीप और यहाँ तक कि पानी साफ़ करने वाले संयंत्रों को उड़ा देगा.
ट्रंप ने कहा कि यह कार्रवाई पिछले 47 वर्षों में ईरान द्वारा अमेरिकी सैनिकों और अन्य लोगों की हत्या का बदला होगी. वर्तमान स्थिति यह है कि ईरान ने अभी तक अमेरिका के 15-सूत्रीय शांति प्रस्ताव का आधिकारिक जवाब नहीं दिया है, हालाँकि ईरानी मीडिया ने इन शर्तों को ख़ारिज करने की बात कही है. पाकिस्तान की मध्यस्थता के बाद ईरान ने अगले कुछ दिनों में हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से 20 वाणिज्यिक जहाजों को गुज़रने की अनुमति देने पर सहमति जताई है.
दूसरी ओर, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अमेरिकी प्रस्तावों को “अवास्तविक और अतार्किक” बताया है. बघाई ने यह भी संकेत दिया कि ईरान की संसद ‘परमाणु अप्रसार संधि’ से बाहर निकलने पर विचार कर रही है. इस तनाव के बीच वैश्विक तेल बाज़ारों में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गई हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट में बताया गया है कि ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स नेवी कमांडर अलीरेज़ा तंगसिरी की भी मौत हो गई है. ईरान में अब सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की जगह उनके बेटे मोज्तबा खामेनेई ने ले ली है.
ईरान युद्ध का एक महीना: ट्रंप का ‘शासन परिवर्तन’ का दावा और गहराता वैश्विक संकट
सीएनएन के विश्लेषण के अनुसार, ट्रंप और ईरान के बीच चल रही बयानबाज़ी ने युद्ध को एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है. एक तरफ ट्रंप का दावा है कि तेहरान में एक “नया शासन” आ गया है क्योंकि पुराने नेता मारे जा चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ ज़मीनी हकीकत यह है कि ईरान का रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (आईआरजीसी) अभी भी कड़ा प्रतिरोध कर रहा है. स्टीफन कॉलिन्सन की रिपोर्ट बताती है कि यह युद्ध अब अमेरिका के लिए भी भारी पड़ रहा है. बाज़ारों में गिरावट आ रही है और मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैनिकों के हताहत होने की ख़बरें ट्रंप की घरेलू लोकप्रियता को प्रभावित कर रही हैं.
पाकिस्तान ने इस संकट से निकलने के लिए सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के साथ मिलकर मध्यस्थता की कोशिशें शुरू की हैं. इस्लामाबाद में होने वाली इन वार्ताओं का मक़सद एक ऐसा रास्ता निकालना है जिससे ट्रंप और ईरान दोनों अपनी जीत का दावा कर सकें. लेकिन चुनौती बहुत बड़ी है, क्योंकि ट्रंप की मांगें “अत्यधिक” हैं और ईरान अपनी व्यवस्था बचाने के लिए हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है.
युद्ध का असर अब दुनिया के अन्य हिस्सों में भी दिखने लगा है. फिलीपींस ने ऊर्जा आपातकाल घोषित कर दिया है, क्योंकि कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित हुई है. अमेरिकी नौसेना के पूर्व एडमिरल जेम्स स्टावरिडिस का मानना है कि हूतियों का इस युद्ध में शामिल होना “वैश्विक अर्थव्यवस्था के सिर पर बंदूक तानने” जैसा है, क्योंकि वे स्वेज़ नहर की ओर जाने वाले समुद्री मार्ग को भी बाधित कर सकते हैं. ट्रंप के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे इस युद्ध को और बढ़ाकर “निर्णायक जीत” हासिल करने की कोशिश करें या फिर कूटनीति के ज़रिए बाहर निकलने का सम्मानजनक रास्ता ढूंढें.
स्पेन ने अमेरिकी सैन्य विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद किया; ईरान युद्ध को बताया ‘अन्यायपूर्ण’
अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, स्पेन ने ईरान के ख़िलाफ़ चल रहे युद्ध में शामिल अमेरिकी विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद करने का कड़ा फैसला लिया है. रक्षा मंत्री मार्गरीटा रोबल्स ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि स्पेन ने शुरू से ही साफ़ कर दिया था कि वह अपने सैन्य ठिकानों या हवाई क्षेत्र का उपयोग ईरान के ख़िलाफ़ किसी भी कार्रवाई के लिए नहीं होने देगा. रोबल्स ने इस युद्ध को “गहराई से अवैध और अन्यायपूर्ण” करार दिया है.
स्पेन के प्रधानमंत्री प्रेडो सांचेज़ ने युद्ध को “खतरनाक” बताते हुए कहा कि दुनिया अपनी समस्याओं का समाधान बमों से नहीं कर सकती. स्पेन का यह रुख ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा झटका है, जिन्होंने स्पेन द्वारा अपने सैन्य ठिकानों (रोटा और मोरोन) के इस्तेमाल की अनुमति न देने पर व्यापारिक प्रतिबंधों की धमकी दी थी. स्पेन के इस फैसले के कारण 15 अमेरिकी विमानों को वहां से हटना पड़ा है. यूरोपीय संघ में स्पेन ही वह प्रमुख आवाज़ है जो इस सैन्य अभियान का खुलकर विरोध कर रही है. इससे पहले स्पेन ने इज़राइल पर पूर्ण हथियार प्रतिबंध भी लगा दिया था और फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दी थी, जिससे इज़राइल के साथ उसके संबंध पहले ही तनावपूर्ण हो चुके हैं.
वैज्ञानिकों ने पहली बार स्पर्म व्हेल के बच्चे को जन्म देने का वीडियो बनाया; अन्य मादा व्हेल ने मिलकर की मदद
वैज्ञानिकों ने एक स्पर्म व्हेल को बच्चे को जन्म देते हुए फिल्माने में सफलता प्राप्त की है, जबकि अन्य मादा व्हेल माँ और उसके नवजात शिशु की सहायता के लिए मिलकर काम कर रही थीं.
‘प्रोजेक्ट सेटी’ की एक टीम—जो यह समझने का एक अंतरराष्ट्रीय प्रयास है कि व्हेल आपस में कैसे संवाद करती हैं—8 जुलाई 2023 को कैरेबियाई द्वीप डोमिनिका के तट के पास 11 व्हेल के एक झुंड के पास नाव में मौजूद थी. ‘राउंडर’ नाम की 19 वर्षीय मादा अपने परिवार के सदस्यों और अन्य व्हेल से घिरी हुई थी, क्योंकि वह अपने दूसरे बछड़े को जन्म देने वाली थी.
‘द गार्डियन’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, लगभग साढ़े पांच घंटों तक, वैज्ञानिकों ने इस समूह के व्यवहार का दस्तावेजीकरण किया. उन्होंने नाव से उन पर नज़र रखी, ड्रोन से उनका वीडियो बनाया और लहरों के नीचे की आवाज़ों को रिकॉर्ड किया. ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ और ‘साइंस’ पत्रिकाओं में प्रकाशित यह डेटा, विज्ञान के इतिहास में एक असाधारण दुर्लभता को दर्शाता है.
सिटेशियन—जिस समूह में व्हेल, डॉल्फिन और पोरपॉइज़ शामिल हैं—की 93 प्रजातियों में से केवल नौ को ही कभी जंगली वातावरण में जन्म देते हुए देखा गया है. इससे भी दुर्लभ बात यह थी कि जो व्हेल माँ की रिश्तेदार नहीं थीं, वे भी मदद कर रही थीं.
‘प्रोजेक्ट सेटी’ के टीम सदस्य शेन गेरो ने ‘न्यू साइंटिस्ट’ को बताया: “गैर-प्राइमेट्स में जन्म सहायता का यह पहला प्रमाण है. दादी द्वारा अपनी प्रसव पीड़ा से गुज़र रही बेटी को दिए जाने वाले अंतर-पीढ़ीगत समर्थन और अन्य गैर-संबंधित मादाओं से मिलने वाली सहायता को देखना बेहद दिलचस्प है.”
पूंछ के पानी से बाहर निकलने से लेकर बच्चे के जन्म तक, यह प्रसव प्रक्रिया 34 मिनट तक चली. प्रसव के दौरान, अन्य वयस्क मादाओं ने राउंडर के ‘डॉर्सल फिन’ (पीठ का पंख) के नीचे गोता लगाया, जो अक्सर अपनी पीठ के बल लेटी थीं और उनके सिर राउंडर के जननांग की ओर थे.
‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ के अध्ययन के अनुसार, जन्म के तुरंत बाद झुंड का व्यवहार “तेजी से बदल गया” क्योंकि हर सदस्य सक्रिय हो गया था. शोधकर्ताओं ने लिखा कि सभी वयस्क “नवजात के शरीर को अपने बीच दबा रहे थे और अपने सिर से उसे छू रहे थे.” व्हेल ने अपनी नाक नवजात की ओर कर ली थी और वे उसे “पानी के नीचे, और सतह के ऊपर अपने शरीरों पर इधर-उधर धकेल रही थीं.”
यह अद्भुत व्यवहार 3.6 करोड़ साल से भी ज़्यादा पुराना है और माना जाता है कि यह सिटेशियन के अनूठे इतिहास के कारण है. उनके दूर के पूर्वजों द्वारा पानी छोड़कर ज़मीन पर जीवन के अनुकूल होने के बाद, सिटेशियन ही एकमात्र ऐसे स्तनधारी हैं जो वापस समुद्र में लौट आए. पानी में वापस जाने की इस प्रक्रिया में नवजात शिशुओं को डूबने से बचाने के लिए कुछ विकासवादी युक्तियों की आवश्यकता थी.
उदाहरण के लिए, व्हेल के बच्चे अन्य स्तनधारियों की तरह सिर के बजाय पहले पूंछ की तरफ से पैदा होते हैं. हालाँकि, नवजात स्पर्म व्हेल कुछ ही घंटों में कुशल तैराक बन जाते हैं, लेकिन जन्म के तुरंत बाद वे डूबने लगते हैं.
इसलिए शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि अन्य व्हेल को बछड़े को ऊपर उठाना पड़ता है “ताकि नवजात को डूबने से बचाया जा सके और साथ ही उसे पहली सांस लेने में मदद मिल सके.”
प्राइमेट्स—जिनमें मनुष्य भी शामिल हैं—एकमात्र अन्य ऐसे स्तनधारी हैं जिन्हें जन्म के दौरान एक-दूसरे की सहायता करते हुए जाना जाता है. अध्ययन में कहा गया है कि वैज्ञानिकों ने व्हेल द्वारा निकाली गई कई आवाज़ें भी रिकॉर्ड कीं, जिनमें महत्वपूर्ण घटनाओं के दौरान उनकी “मुखर शैली” में बड़े बदलाव देखे गए. इसमें वह समय भी शामिल था जब जन्म के बाद ‘पायलट व्हेल’ का एक समूह उस झुंड के पास आया था.
शोधकर्ताओं ने कहा कि आवाज़ों में बदलाव यह संकेत देते हैं कि समूह जन्म में सहायता करने या नवजात की रक्षा करने के लिए आपस में समन्वय कर रहा था. पशु जगत में स्पर्म व्हेल की गर्भावस्था सबसे लंबी अवधियों में से एक होती है, जिसका गर्भकाल 16 महीने तक का होता है. जब बछड़े पैदा होते हैं, तो वे पहले से ही 4 मीटर (13 फीट) लंबे होते हैं. वे कम से कम दो वर्षों तक अपनी माँ के दूध पर निर्भर रहते हैं.
जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, बच्चे अपने झुंड की सामाजिक इकाई का केंद्र बन जाते हैं, और जब माँ भोजन की तलाश में होती है, तो अन्य व्हेल ‘बेबीसिटिंग’ (बच्चे की देखभाल) में मदद करती हैं.
2023 में जन्म के फिल्मांकन के बाद, उस झुंड को एक साल से अधिक समय तक नहीं देखा गया. फिर पिछले साल 25 जुलाई को, नवजात को झुंड के अन्य युवा सदस्यों—अकरा और ऑरोरा—के साथ देखा गया.
‘प्रोजेक्ट सेटी’ की टीम ने कहा कि अपने जीवन का पहला वर्ष सफलतापूर्वक बीताना इस बात का अच्छा संकेत है कि यह स्पर्म व्हेल वयस्क होने की उम्र तक पहुँच जाएगी.
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