30/08/2025: राहुल के ख़िलाफ भाजपा हरकत में | मोदी का चीन, रूस की तरफ झुकाव | नवारो का कोसना जारी | प्रताप भानु, सुभाष गर्ग, सुशांत सिंह के विश्लेषण | स्कूलों में भर्तियां, मनरेगा का पैसा घटा
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल
आज की सुर्खियां
बिहार: राहुल की यात्रा में भीड़, भाजपा बेचैन.
'वोटर अधिकार यात्रा': सड़क पर संग्राम, बयानों में तकरार.
शरजील इमाम: जेल से लड़ेंगे बिहार का चुनाव.
अर्थव्यवस्था: अमेरिकी टैरिफ का झटका, रुपया पस्त, बाजार ध्वस्त.
भू-राजनीति: अमेरिका से तल्खी, 7 साल बाद चीन चले मोदी.
नवारो: भारत पर हमला जारी, 'क्रेमलिन का लॉन्ड्रोमैट' कहा.
टैक्स: पहली बार, आम आदमी का टैक्स कॉरपोरेट से ज़्यादा.
मनरेगा: 5 महीने में बजट लगभग खत्म.
कॉलेजियम: न्यायमूर्ति की असहमति पर सवाल.
राजनयिक विवाद: नेतन्याहू के पोस्टर, नौकरी गई.
उत्तराखंड: धर्मांतरण कानून में 'डिजिटल प्रचार' पर नकेल.
न्याय: ज़मानत पर 21 बार टालमटोल, सुप्रीम कोर्ट नाराज़.
नियुक्ति: उर्जित पटेल अब आईएमएफ में.
पर्यावरण: चेतावनियों के बावजूद चारधाम बायपास को हरी झंडी.
सुप्रीम कोर्ट: "क्या अमेरिका जैसी दीवार बनाएंगे?"
शिक्षा: सरकारी स्कूलों से मोहभंग, दाखिले फिर गिरे.
विश्लेषण: डेमोग्राफिक डिविडेंड या टाइम बम?
राजस्व: टैक्स रियायतें, खजाने पर बढ़ता संकट.
पूंजीवाद: भारतीय पूंजीपति कसौटी पर.
जम्मू-कश्मीर: बाढ़ का कहर, 'स्मार्ट सिटी' धोखे की जांच होगी.
भारत-कनाडा: यह शांति टिकेगी नहीं.
दहेज: कानून बदलवाने वाली महिला की अधूरी लड़ाई.
बिहार
राहुल की यात्रा में जुट रही भीड़, भाजपा चिंतित, अपने और एनडीए नेताओं को सक्रिय किया
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की बिहार में “वोटर अधिकार यात्रा” विधानसभा चुनावों से पहले बड़ी भीड़ जुटा रही है. इसके जवाब में सत्ताधारी भाजपा ने अपने प्रमुख नेताओं के साथ-साथ एनडीए सहयोगियों को भी मैदान में उतारा है, ताकि एकता का प्रदर्शन किया जा सके और विपक्ष के समर्थक आधार के संभावित एकीकरण का मुकाबला किया जा सके.
आरजेडी नेता तेजस्वी प्रसाद यादव के शामिल होने से राहुल की यात्रा को और बल मिला है. इस दौरान उन्होंने चुनाव आयोग (ईसी) और भाजपा पर "वोट चोरी" के आरोपों को और तीखा किया है, जिससे विपक्षी “इंडिया ब्लॉक” ने बिहार में चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पर आक्रामक रुख अपना लिया है.
“द इंडियन एक्सप्रेस” में लिज़ मैथ्यू की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ भाजपा नेताओं को लग रहा है कि यह “एसआईआर प्रक्रिया” एनडीए के लिए कोई खास फायदा नहीं ला सकी” और इससे "एनडीए समर्थक कई मतदाताओं के नाम भी मतदाता सूची से हट गए होंगे.” बिहार भाजप के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “शायद ही कोई परिवार इस प्रक्रिया से अछूता रहा हो. एसआईआर के साथ-साथ संसद के बजट सत्र में पारित वक्फ संशोधन विधेयक ने आरजेडी और कांग्रेस के लिए मुस्लिम-यादव वोटबैंक को और संगठित कर दिया है.”
भाजपा के वरिष्ठ नेता बिहार के सभी 38 जिलों में प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे तथा अपने एनडीए सहयोगियों के साथ मिलकर विधानसभा बैठकें आयोजित करेंगे ताकि विपक्ष के समर्थन को रोक सकें और एकता की तस्वीर पेश कर सकें. भाजपा इस यात्रा द्वारा विपक्ष को मिले लाभ को कम करने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार की उपलब्धियों को भी दर्शाएगी.
कुछ भाजपा नेता मान रहे हैं कि राहुल की यात्रा ने इतनी बड़ी भीड़ जमा की है, जो भाजपा के लिए चिंता का विषय है. इसके कारण आरजेडी और कांग्रेस के मुस्लिम-यादव वोट बैंक मजबूत हो रहा है. साथ ही कई दलित समूह भी इंडिया ब्लॉक के करीब आ रहे हैं. भाजपा नेताओं ने माना है कि आरोपों ने भाजपा की मुख्य ताकत, भ्रष्टाचार मुक्त शासन की छवि को नुकसान पहुंचाया है.
भाजपा, जन सुराज पार्टी प्रमुख प्रशांत किशोर द्वारा राज्य के नेतृत्व पर लगातार किए जा रहे हमलों को लेकर भी चिंतित नजर आ रही है. प्रशांत किशोर भाजपा नेताओं पर विभिन्न मामलों में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं. पिछले कुछ हफ्तों में किशोर ने भाजपा के बिहार अध्यक्ष दिलीप कुमार जायसवाल, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय को सीधा निशाना बनाया है. किशोर ने जायसवाल पर किशनगंज स्थित सिख संस्था माता गुजरी मेडिकल कॉलेज पर धोखाधड़ी से कब्जा करने का आरोप लगाया है. सम्राट चौधरी पर उन्होंने शैक्षणिक दस्तावेज़ों को फर्जी करार देने का आरोप लगाया, जबकि स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय पर एंबुलेंस घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाया. उनका दावा है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने प्रति एंबुलेंस 28 लाख रुपये की “फर्जी बढ़ी हुई कीमत” पर 466 एंबुलेंस खरीदीं, जबकि अन्य राज्यों ने इन्हें कम दामों पर खरीदा था.
हालांकि, भाजपा ने इन आरोपों को निराधार और मनगढ़ंत बताते हुए खारिज कर दिया है. पार्टी नेतृत्व का मानना है कि “एनडीए” का संयुक्त और बड़े पैमाने पर चलने वाला प्रचार अभियान तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसे ईमानदार और स्वच्छ नेतृत्व की छवि, इन आरोपों से हुए किसी भी नुकसान को संतुलित कर देगी. भाजपा का यह भी मत है कि राहुल गांधी की यात्रा में जुटी भीड़ मुख्यत: टिकट की उम्मीद लगाने वाले कार्यकर्ता हैं न कि आम जनता.
कांग्रेस बोली- भाजपा डरी हुई है, शाह ने कहा- 'घुसपैठियों का मार्च'
टेलीग्राफ़ के मुताबिक पटना में शुक्रवार को कांग्रेस मुख्यालय के बाहर हुई झड़पों के बाद, कांग्रेस ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर अपनी 'वोटर अधिकार यात्रा' को बाधित करने और डराने-धमकाने के लिए "गुंडों" को भेजने का आरोप लगाया है. यह टकराव बिहार के कैबिनेट मंत्रियों नितिन नबीन और संजय सरावगी के नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा एक विरोध मार्च के बाद हुआ. यह विरोध कांग्रेस नेता राहुल गांधी की दरभंगा में हुई यात्रा के एक वायरल वीडियो को लेकर था.
इस वीडियो क्लिप में कथित तौर पर अज्ञात लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत मां के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करते दिख रहे थे. द टेलीग्राफ़ ऑनलाइन ने इस वीडियो की प्रामाणिकता की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है. झड़प के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं ने पत्थरबाज़ी की, गाड़ियों में तोड़फोड़ की और कांग्रेस मुख्यालय, सदाकत आश्रम के गेट को बंद करने पर मजबूर कर दिया.
कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि यह हमला सत्ताधारी पार्टी द्वारा मार्च को पटरी से उतारने के लिए आयोजित किया गया था. उन्होंने लिखा, "'वोटर अधिकार यात्रा' की बढ़ती लोकप्रियता से बौखलाई भाजपा ने हमें डराने-धमकाने के लिए एक बार फिर अपने गुंडों को भेज दिया है. बिहार पीसीसी कार्यालय पर एक मौजूदा कैबिनेट मंत्री और अन्य भाजपा नेताओं के नेतृत्व में हमला कायरता का काम है और यह हमें रोक नहीं पाएगा."[1] वेणुगोपाल ने पुलिस से सख़्त कार्रवाई करने और इसमें शामिल मंत्रियों की गिरफ़्तारी की मांग की.
पटना की एसपी (सेंट्रल) दीक्षा ने इस हमले को "मामूली झड़प" बताया और कहा कि दोनों पक्षों से चोटों की शिकायतें मिली हैं और मामले की जांच की जाएगी. वहीं, भाजपा ने यह कहते हुए विरोध को सही ठहराया है कि वे प्रधानमंत्री के अपमान का जवाब दे रहे थे. मंत्री नितिन नबीन ने कहा, "हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपमान बर्दाश्त नहीं करने वाले हैं. राहुल गांधी और उनके सहयोगियों को देश से माफ़ी मांगनी चाहिए."
असम में एक रैली को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस मार्च का मज़ाक उड़ाते हुए इसे "घुसपैठिया बचाओ यात्रा" कहा और आरोप लगाया कि इसका उद्देश्य कांग्रेस के "वोट बैंक" की रक्षा करना है. उन्होंने कहा, "किसी भी लोकतंत्र में, चुनाव उसकी आत्मा होते हैं. अगर घुसपैठियों को व्यवस्था को प्रदूषित करने की अनुमति दी जाए तो कोई देश कैसे सुरक्षित रह सकता है?" उन्होंने गांधी से कथित दुर्व्यवहार के लिए माफ़ी की भी मांग की.[1]
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने शाह को जवाब देते हुए एक्स पर लिखा: "केंद्रीय गृह मंत्री 2-इन-1 WMD हैं - शरारती ध्यान भटकाने का हथियार और दुर्भावनापूर्ण मानहानि का हथियार भी... बिहार के लोगों की कांग्रेस की वोटर अधिकार यात्रा पर असाधारण प्रतिक्रिया से वे बौखलाए, परेशान और घबराए हुए हैं, और राहुल गांधी तथा अन्य नेताओं के बारे में झूठ फैला रहे हैं."
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने भी एक वीडियो संदेश में इस प्रकरण की निंदा की और मोदी व उनकी दिवंगत मां के लिए इस्तेमाल की गई भाषा को "अत्यधिक निंदनीय और आपत्तिजनक" बताया. उन्होंने विपक्ष के नेता और राजद नेता तेजस्वी यादव पर बिहार की संस्कृति का अनादर करने का भी आरोप लगाया.[1]
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि यह विवाद खड़ा करने के लिए अपमानजनक टिप्पणी सत्ताधारी पार्टी के "अपने एजेंट" द्वारा करवाई गई थी. कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने एक्स पर भाजपा पर विपक्षी मार्च को पटरी से उतारने के लिए "गुंडागर्दी" का सहारा लेने का आरोप लगाया और कहा कि पार्टी की हताशा स्पष्ट है. उन्होंने लिखा, "उनकी चोरी पकड़ी गई है, इसलिए ये लोग घबरा गए हैं और अब हमारे सदाकत आश्रम में हंगामा करने आ गए हैं. उनके मंत्री और विधायक हमारे कार्यकर्ताओं पर हमला कर रहे हैं. लेकिन देश और लोग यह देख रहे हैं."
जेल में बंद शरजील इमाम लड़ेंगे बिहार चुनाव
सीएए विरोधी कार्यकर्ता शरजील इमाम, जो जेल में बंद हैं, ने आगामी बिहार चुनाव लड़ने की योजना की घोषणा की है. उन्होंने राजनीतिक भागीदारी को एक शिक्षित मुस्लिम के रूप में महसूस की जाने वाली जिम्मेदारी बताया है. जेल से एक लिखित साक्षात्कार में, इमाम ने बताया कि उनका निर्णय इस विश्वास से उपजा है कि मुसलमानों को हाशिये पर रहने के बजाय राजनीतिक विमर्श को आकार देने में सक्रिय रूप से शामिल होना चाहिए.
यह पूछे जाने पर कि वह बिहार चुनाव क्यों लड़ना चाहते हैं, इमाम ने कहा, "चुनाव लड़ने का सबसे महत्वपूर्ण कारण सकारात्मक राजनीति पर हमारे विमर्श को सामने लाना है, यानी अल्पसंख्यक अधिकारों और संरचनात्मक परिवर्तनों पर रचनात्मक बातचीत, जो बहुसंख्यकवादी अत्याचार के सामने अल्पसंख्यकों के लिए सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं."
उन्होंने कहा, "भारतीय राजनीति में कांग्रेस के नेतृत्व वाली मुख्यधारा की 'धर्मनिरपेक्ष सहमति' कहती है कि कोई 'मुस्लिम मुद्दा' नहीं है. प्रणालीगत संदर्भ में, वे तर्क देते हैं, सब कुछ सही है - हमें बस भारतीय जनता पार्टी को हराना है. यह धर्मनिरपेक्ष सहमति न केवल एक झूठ है, बल्कि एक जाल भी है जिसमें मुसलमान 1947 से खुद को फंसा हुआ पाते हैं." इमाम का मानना है कि जब तक हम संरचनात्मक और संवैधानिक परिवर्तनों के बारे में बात करना शुरू नहीं करते, भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक हाशिए पर जाने से कोई रास्ता नहीं है. इन प्रणालीगत परिवर्तनों में चुनावों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व, मुस्लिम आरक्षण (आंतरिक रूप से जाति समूहों में विभाजित), संघवाद और धार्मिक मुद्दों में बहुसंख्यकवादी निगरानी से स्वायत्तता शामिल है
अमेरिकी टैरिफ की चिंता से रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर, बाजार में भारी गिरावट
लगातार तीसरे सत्र में भारतीय शेयर बाजारों में गिरावट जारी रही. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये के 88.31 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंचने से बेंचमार्क सूचकांकों में भारी गिरावट आई. देश के आर्थिक विकास और कॉर्पोरेट आय पर 50% अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं, जिससे मोदी सरकार के लिए खतरे की घंटी बज गई है.
स्थानीय इक्विटी से लगातार विदेशी फंड के बाहर जाने के कारण रुपया इस साल एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा है. इस सप्ताह नए अमेरिकी टैरिफ लागू होने से इस पर दबाव और बढ़ गया है, जो कपड़ा, जूते और आभूषण जैसे निर्यात-गहन उद्योगों को लक्षित करते हैं. बीएसई सेंसेक्स 270.92 अंक या 0.34% गिरकर 79,809.65 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 74.05 अंक या 0.30% गिरकर 24,426.85 पर बंद हुआ. बाजार की शुरुआत सपाट हुई थी, लेकिन कारोबार के अंतिम घंटे में बिकवाली का दबाव बढ़ने से सूचकांक दिन के निचले स्तर के करीब पहुंच गए.
विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की 17 सितंबर की नीति बैठक से पहले रुपया और कमजोर होकर 89.5-90 रुपये की सीमा तक पहुंच सकता है. इसका कारण फेड द्वारा ब्याज दरों में कटौती की बाजार की उम्मीदें हैं, जो डॉलर को कमजोर कर सकती हैं और INR/USD विनिमय दर को प्रभावित कर सकती हैं. आलोचकों का तर्क है कि मोदी प्रशासन एक विश्वसनीय प्रतिक्रिया देने में विफल रहा है. उनका आरोप है कि सरकार राजनीतिक दिखावे में व्यस्त है, जबकि निवेशक भाग रहे हैं और कॉर्पोरेट आय पर गंभीर दबाव है. मुद्रा की गिरावट, उनके अनुसार, सरकार के आर्थिक प्रबंधन में विश्वास के गहरे संकट को दर्शाती है.
अमेरिकी टैरिफ का असर, 7 वर्षों में पहली चीन यात्रा पर मोदी, व्यापार में अन्य साझेदारों की तरफ रुख
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सप्ताहांत 7 साल बाद पहली बार चीन की यात्रा पर पहुंचेंगे. यह दौरा उन्हें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मंच साझा कराएगा, ऐसे समय में जब भारत-अमेरिका संबंधों में खटास आ चुकी है.
“द गार्डियन” के अनुसार, तिआनजिन में होने वाले क्षेत्रीय सुरक्षा सम्मेलन में मोदी की मौजूदगी उस समय हो रही है, जब कुछ ही दिन पहले अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर शुल्क को बढ़ाकर 50% कर दिया. अमेरिका का कहना है कि भारत ने रूसी तेल की ख़रीद नहीं रोकी है, इसी वजह से ऐसा किया गया.
इस विवाद ने भारत और अमेरिका के लंबे समय से बढ़ते सहयोग को अचानक झटका दिया है — एक ऐसा सहयोग जो तकनीकी साझेदारी और बीजिंग की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का मुकाबला करने की साझा प्रतिबद्धता पर टिका था. लेकिन अब इसने भारत को अन्य व्यापारिक साझेदारों की ओर तेजी से रुख करने के लिए मजबूर किया है.
दक्षिण एशिया मामलों के विश्लेषक माइकल कुगेलमैन ने कहा, “भारत का अमेरिका में विश्वास चूर-चूर हो गया है. मुझे नहीं लगता कि अमेरिकी अधिकारी समझ पा रहे हैं कि उन्होंने कितनी जल्दी कितना विश्वास खो दिया.”
चीन के लिए रविवार से शुरू हो रहे शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन का समय बिल्कुल उपयुक्त है. कुगेलमैन ने कहा, “मोदी ऐसे समय में चीन में होंगे जब भारत-चीन संबंध स्थिर हो रहे हैं और भारत-अमेरिका रिश्ते नीचे की ओर जा रहे हैं. यह एक बड़ा प्रतीकात्मक संदेश है.”
तक्षशिला संस्थान (बेंगलुरु) के इंडो-पैसिफिक कार्यक्रम प्रमुख मनोज केवलरमानी ने टिप्पणी की, “बेशक, चीन में कुछ लोग भारत-अमेरिका के बीच पैदा हुई व्यापारिक तनातनी का आनंद ले रहे हैं.” कुगेलमैन के अनुसार, पुतिन भी इस मौके का फायदा उठाना चाहेंगे ताकि रूस-भारत की करीबी दोस्ती को फिर से रेखांकित किया जा सके. उन्होंने कहा, “यह ऐसा समय है जब सब मिलकर वॉशिंगटन की ओर जीभ दिखा सकते हैं.” अमेरिका का कहना है कि भारत लगातार रूसी कच्चा तेल और रक्षा हार्डवेयर खरीद रहा है, जिससे मॉस्को के यूक्रेन युद्ध को वित्तीय मदद मिल रही है. इसी को वजह बनाते हुए शुल्क बढ़ाए गए हैं.
जैसे ही मोदी यात्रा पर रवाना हुए, डोनाल्ड ट्रम्प के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि भारत "क्रेमलिन के लिए तेल का मनी-लॉन्ड्रिंग अड्डा" बन गया है.
भारत ने अपनी तेल नीति का बचाव करते हुए कहा है कि रूसी तेल खरीदना उसकी विशाल विकासशील अर्थव्यवस्था में ऊर्जा लागत को स्थिर बनाए रखने के लिए ज़रूरी है, यह वैश्विक कीमतों को संतुलित रखने में मदद करता है और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन भी नहीं करता. यूक्रेन युद्ध को लेकर मोदी ने संतुलन साधने की कोशिश की है — उन्होंने मॉस्को की सीधी आलोचना करने से परहेज़ किया, लेकिन शांति की अपील की.
अमेरिकी शुल्क का आर्थिक असर बेहद बड़ा है. अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है — सालाना लगभग 86.5 अरब डॉलर — जिसमें से करीब दो-तिहाई (60.2 अरब डॉलर) अब अतिरिक्त शुल्क की मार झेल रहा है, जिससे कपड़ा, ज्वेलरी जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर गहरा असर होगा. शुल्क से पहले भी भारत सावधानीपूर्वक चीन से निवेश और तकनीकी सहयोग की ओर झुक रहा था और व्यापार बढ़ाने की उम्मीद कर रहा था.
2020 में हिमालयी सीमा पर हुए हिंसक संघर्ष के बाद संबंध लगभग ठंडे पड़ गए थे, लेकिन पिछले साल अक्टूबर में रूस में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में मोदी और शी जिनपिंग की चार साल बाद आमने-सामने मुलाकात के बाद रिश्तों में थोड़ी गर्माहट आई. अब कुगेलमैन का कहना है कि “भारत-अमेरिका संकट ने मोदी को तनाव घटाने की कोशिशों को तेज़ करने का एक बड़ा कारण दे दिया है. अनुमान है कि मोदी क्षेत्रीय सम्मेलन के इतर शी जिनपिंग से मुलाकात करेंगे, जहां व्यापार और निवेश प्रमुख मुद्दे होंगे.
मनोज केवलरमानी ने कहा, “एक कोशिश जारी है कि भारत और चीन किसी नए संतुलन पर पहुंच सकें. दोनों मानते हैं कि वैश्विक व्यवस्था बदल रही है. सारे तनाव खत्म होना शायद संभव न हो, लेकिन रिश्ते बढ़ाने की दिशा में प्रक्रिया तो शुरू हो गई है.” उन्होंने जोड़ा, “ऐतिहासिक अविश्वास बना रहेगा, खासकर उस सीमा विवाद को देखते हुए जिसे चीन लगातार सड़क, रेल और नई बस्तियों से मजबूत कर रहा है. लेकिन अगर दिल्ली और बीजिंग कुछ हद तक स्थिरता और अनुमानित स्थिति पैदा कर सकें, तो व्यावहारिक लाभ उठाए जा सकते हैं.”
रूस भी भारत-अमेरिका मतभेदों से फायदा उठा सकता है, क्योंकि दिल्ली अब पश्चिम के साथ संतुलन, रक्षा उपकरणों की विविधता और ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस को और भी महत्वपूर्ण मान रहा है.
एक सेवानिवृत्त भारतीय राजनयिक ने कहा, “मोदी की वे तस्वीरें, जिनमें वे शी जिनपिंग और पुतिन के साथ खड़े होंगे, वॉशिंगटन को एक सीधे संदेश जैसी होंगी.”
भारतीय अधिकारी ज़ोर देकर कहते हैं कि दिल्ली अमेरिका से संबंध बनाए रखना चाहता है, लेकिन अपनी “साझेदारियों को विविध” भी करना चाहता है। उन्होंने कहा, “भारत यह नहीं दिखा सकता कि वह तेल आयात या किसी अन्य मामले में अमेरिकी दबाव के आगे झुक रहा है — और घरेलू स्तर पर जनता का गुस्सा भी चरम पर है.”
गुरुवार को भारत सरकार ने अमेरिकी शुल्क का पहला जवाब देते हुए 40 देशों में निर्यात बढ़ाने के अभियान की शुरुआत की है — ब्रिटेन से लेकर दक्षिण कोरिया तक — ताकि कपड़ा व्यापार को सहारा मिल सके. चीन रवाना होने से पहले मोदी टोक्यो पहुंचे, जहां उन्होंने जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा के साथ वार्षिक भारत-जापान शिखर सम्मेलन किया. अमेरिकी शुल्कों की पृष्ठभूमि में यह दौरा और महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि रक्षा, तकनीक और निवेश साझेदारी के ज़रिए जापान के साथ गहरे होते रिश्ते भारत को अमेरिकी बाज़ार पहुंच खोने की चोट से बचा सकते हैं.
जापानी कंपनियां अगले दशक में भारत में करीब 10 ट्रिलियन येन (68 अरब डॉलर) का निवेश करेंगी, जबकि सुजुकी मोटर ने अगले 5-6 वर्षों में लगभग 8 अरब डॉलर का निवेश करने की घोषणा की है. अधिकारियों के अनुसार, दोनों देशों के नेता महत्वपूर्ण खनिजों और भारत में जापानी निवेश को उच्च मूल्य विनिर्माण की दिशा में बढ़ाने पर चर्चा करेंगे. माना जाता है कि भारत के पास दुर्लभ खनिजों का बड़ा भंडार है, जिनका उपयोग स्मार्टफोन से लेकर सौर ऊर्जा पैनल तक में होता है, लेकिन उनके खनन और व्यापक प्रसंस्करण के लिए आवश्यक तकनीक भारत के पास नहीं है.
पीटर नवारो का कोसना जारी, भारत को 'क्रेमलिन के लिए ऑयल मनी लॉन्ड्रोमैट' कहा
व्हाइट हाउस के विवादास्पद व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने एक बार फिर भारत पर "क्रेमलिन के लिए ऑयल मनी लॉन्ड्रोमैट (सिक्का डालकर कपड़े धोने वाली मशीन" होने का आरोप लगाया है. यह बयान उनके उस दावे के एक दिन बाद आया है जिसमें उन्होंने यूक्रेन संघर्ष को "मोदी का युद्ध" कहा था.
ट्रम्प प्रशासन के व्यापार और विनिर्माण के वरिष्ठ सलाहकार नवारो ने गुरुवार को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक लंबे थ्रेड में रूस से भारत की तेल खरीद और नई दिल्ली के उच्च टैरिफ के बारे में अपनी भड़ास निकाली. नवारो ने लिखा, "भारतीय आयातों पर राष्ट्रपति ट्रम्प का 50% टैरिफ अब प्रभावी है. यह सिर्फ भारत के अनुचित व्यापार के बारे में नहीं है - यह उस वित्तीय जीवन रेखा को काटने के बारे में है जो भारत ने पुतिन की युद्ध मशीन को दी है."[1]
उन्होंने भारत-रूस तेल गणित की व्याख्या करते हुए कहा कि अमेरिकी उपभोक्ता भारतीय सामान खरीदते हैं, जबकि भारत उच्च टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं के माध्यम से अमेरिकी निर्यातों को बाहर रखता है. भारत इन डॉलरों का उपयोग रियायती रूसी कच्चे तेल को खरीदने के लिए करता है. भारतीय रिफाइनर, अपने गुप्त रूसी भागीदारों के साथ, इस तेल को रिफाइन करते हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़े मुनाफे के लिए बेचते हैं - जबकि रूस यूक्रेन पर अपने युद्ध को वित्तपोषित करने के लिए हार्ड करेंसी कमाता है.
नवारो ने बताया कि यूक्रेन पर रूस के आक्रमण से पहले, भारत के आयातों में रूसी तेल का हिस्सा 1% से भी कम था, जो आज 30% से अधिक हो गया है - यानी प्रतिदिन 1.5 मिलियन बैरल से अधिक. उन्होंने दावा किया कि यह उछाल घरेलू मांग से नहीं, बल्कि भारतीय मुनाफाखोरों द्वारा संचालित है और इसकी कीमत यूक्रेन में रक्त और तबाही के रूप में चुकानी पड़ रही है.
अमेरिकी आधिकारिक स्थिति भी नवारो के आरोपों से मेल खाती है. भारत अब प्रतिदिन 1 मिलियन बैरल से अधिक रिफाइंड पेट्रोलियम का निर्यात करता है, जो उसके द्वारा आयातित रूसी कच्चे तेल की मात्रा का आधे से अधिक है. इससे होने वाली आय भारत के राजनीतिक रूप से जुड़े ऊर्जा दिग्गजों और सीधे पुतिन के युद्ध कोष में जाती है.
सरकार के सुधार कॉरपोरेट्स को लाभ पहुंचा रहे हैं, नागरिकों का कर योगदान अब कॉरपोरेट से अधिक
भारत के इतिहास में पहली बार व्यक्तिगत आयकर संग्रह ने कॉरपोरेट कर को पीछे छोड़ दिया है, जो देश की प्रत्यक्ष कर संरचना में एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है. यह जानकारी जेएम फाइनेंशियल इंस्टिट्यूशनल सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट में दी गई है.
रिपोर्ट के अनुसार, कुल प्रत्यक्ष कर संग्रह में व्यक्तिगत आयकर का हिस्सा वित्त वर्ष 2014 (FY14) में 38.1% से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 (FY24) में 53.4% तक पहुंच गया है. इसके विपरीत, कॉरपोरेट कर योगदान उसी अवधि में 61.9% से घटकर 46.6% रह गया. यह बदलाव पिछले एक दशक में औपचारिककरण, डिजिटलीकरण और कड़े अनुपालन उपायों के प्रभाव को दर्शाता है.
मनरेगा का बजट वित्तीय वर्ष के 5 माह में ही खर्च, सितंबर के लिए सिर्फ 79 करोड़ रुपये बचेंगे
केंद्र सरकार की प्रमुख ग्रामीण रोज़गार योजना — महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) — के लिए आवंटित बजट का लगभग 60% हिस्सा, दूसरी तिमाही समाप्त होने में अभी एक महीना शेष रहते ही ख़र्च हो चुका है. ग्रामीण विकास मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 के केंद्रीय बजट में निर्धारित कुल 86,000 करोड़ रुपये में से अब तक 51,521 करोड़ खर्च हो चुके हैं.
वित्त मंत्रालय ने हाल ही में प्रावधान किया था कि वित्तीय वर्ष 2025-26 की पहली छमाही के लिए इस योजना के तहत वार्षिक आवंटन का अधिकतम 60% ही खर्च किया जा सकेगा. ऐसे में सितंबर महीने के लिए इस योजना के पास केवल 79 करोड़ रुपये शेष रह जाएंगे. वर्तमान में 12.15 करोड़ सक्रिय मज़दूर इस योजना पर अपने परिवार की आय को पूरक करने के लिए निर्भर हैं.
“द हिंदू” में सोभना के. नायर की रिपोर्ट कहती है, केंद्र सरकार ने पहली बार मनरेगा के खर्च पर सीमा लगाई है, जिससे पहली छमाही में कुल बजट का 60% यानी करीब 51,600 करोड़ रुपये खर्च करने की अनुमति है, जबकि सालाना बजट 86,000 करोड़ रुपये है.
वित्त मंत्रालय ने ग्रामीण विकास मंत्रालय को मासिक/तिमाही खर्च योजना के तहत इस स्कीम को लाने का निर्देश दिया है. योजना के अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में पहली छमाही में सामान्यतः 50-60% बजट खर्च होता था, इसलिए इस बार की सीमा से विशेष फर्क नहीं पड़ेगा.
लेकिन, इस फैसले के बाद अब मनरेगा में रोजगार सृजन पर असर पड़ सकता है, क्योंकि इस वर्ष बकाया भुगतान की राशि 21,000 करोड़ रुपये बताई गई है. वित्त मंत्रालय ने यह सवाल उठाया है कि मनरेगा अधिनियम, 2005 के तहत 15 दिनों में मजदूरी का भुगतान अनिवार्य है, बावजूद इसके इतनी बकाया राशि क्यों है.
उल्लेखनीय है कि मनरेगा की शुरुआत वर्ष 2006-07 में भारत के 200 सबसे पिछड़े जिलों में हुई थी, जिसे बाद में पूरे देश में लागू कर दिया गया. अब तक यह मांग-आधारित योजना थी, लेकिन अब इसे भी मासिक/तिमाही खर्च योजना में शामिल कर दिया गया है.
कॉलेजियम के फैसले पर न्यायमूर्ति नागरत्ना की असहमति, महिला वकीलों ने चिंता जताई
सुप्रीम कोर्ट की चार वरिष्ठ महिला वकीलों - महालक्ष्मी पावनी, शोभा गुप्ता, अपर्णा भट, और कविता वाडिया - ने उस तरीके पर चिंता व्यक्त की है, जिस तरह से कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नति के संबंध में न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना की असहमति को संभाला है. यह रिपोर्ट लाइव लॉ ने दी है. पांच-न्यायाधीशों वाले कॉलेजियम की एकमात्र महिला सदस्य, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने एक लिखित नोट में न्यायमूर्ति पंचोली की पदोन्नति का कड़ा विरोध किया था. उन्होंने "गंभीर और संगीन" कारणों से 2023 में गुजरात उच्च न्यायालय से पटना उच्च न्यायालय में उनके "विवादास्पद" स्थानांतरण पर प्रकाश डाला. सेंटर फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी के एक बयान के अनुसार, उनके अनुरोध के बावजूद कॉलेजियम द्वारा उनकी असहमति को सार्वजनिक नहीं किया गया.[4]
न्यायमूर्ति नागरत्ना को संबोधित एक एकजुटता बयान में, चार वरिष्ठ महिला वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में महिला न्यायाधीशों की पदोन्नति के संबंध में कॉलेजियम के "असंगत" दृष्टिकोण पर भी सवाल उठाया. उनका कहना है कि इस घटना ने पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही के मुद्दों को फिर से उजागर कर दिया है.
दिल्ली में नेतन्याहू के पोस्टर लगाने पर बेल्जियम के राजनयिक की नौकरी गई
सारांश: बेल्जियम के एक राजनयिक कर्मचारी, गुइलौम डी बासोम्पियरे को दिल्ली के राजनयिक एन्क्लेव में इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नौ पोस्टर लगाने के बाद अपनी नौकरी गंवानी पड़ी. शिवनारायण राजपुरोहित की रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्येक पोस्टर पर लिखा था: "मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए वांछित." इस घटना के बाद उनके परिवार को भारत छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. अगले ही दिन, भारतीय सुरक्षा अधिकारियों ने उन्हें इज़राइली राजदूत के आवास के पास रोका, कथित तौर पर आक्रामक व्यवहार किया, उनके बैग की तलाशी ली और उनकी साइकिल की चाबी जब्त कर ली. इस तरह असहमति का एक साधारण कार्य एक महंगी सज़ा में बदल गया. यह घटना मई में हुई थी.
उत्तराखंड का धर्मांतरण विरोधी कानून: डिजिटल प्रचार पर नकेल, अंतर-धार्मिक जोड़ों के लिए खतरा
उत्तराखंड के धर्मांतरण विरोधी कानून में किए गए संशोधन तथाकथित 'डिजिटल प्रचार' को अपराध की श्रेणी में लाते हैं और पुलिस की शक्तियों का विस्तार करते हैं. निदा कैसर और सबा गुरमत अपने एक महत्वपूर्ण लेख में लिखती हैं कि इससे इंटरनेट अंतर-धार्मिक जोड़ों के लिए एक निगरानी जाल और धर्मनिरपेक्ष, धर्म की स्वतंत्रता-समर्थक भाषण के खिलाफ एक सेंसरशिप उपकरण में बदलने का खतरा है.
उनका तर्क है कि यह इंटरनेट पर उन निगरानी करने वालों के लिए एक पिटारा खोल सकता है, जिन्हें धार्मिक रूपांतरण के लिए "प्रचार" या "उकसावे" की अस्पष्ट परिभाषा में फिट होने वाली किसी भी चीज़ पर नकेल कसने का एक और उपकरण मिल जाएगा.
राज्यों में, धर्मांतरण विरोधी कानूनों ने पहले से ही अंतर-धार्मिक संबंधों में जोड़ों को असमान रूप से फंसाया है. उत्तराखंड का नया डिजिटल क्लॉज उस जोखिम को और बढ़ा देता है. शादी का प्रमाण पत्र ऑनलाइन साझा करना या अंतर-धार्मिक समारोह की तस्वीरें या शादी के आध्यात्मिक कारणों के बारे में कुछ पंक्तियां "दूसरे धर्म का महिमामंडन" या "प्रलोभन" के रूप में दर्ज की जा सकती हैं. इसका मतलब यह हो सकता है कि ऑनलाइन अपनी शादी का जश्न मनाने वाले अंतर-धार्मिक जोड़ों या किसी दूसरे के धर्म में ऑनलाइन रुचि दिखाने वाले लोगों को भी कानून का दुरुपयोग करने वाले निगरानी समूहों के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है.
ज़मानत सुनवाई 21 बार टालने पर सुप्रीम कोर्ट नाराज़, इलाहाबाद हाईकोर्ट को निर्देश
यह दोहराते हुए कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों का शीघ्र निपटारा होना चाहिए, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से उस आरोपी की जमानत अर्जी पर विचार करने को कहा, जिसका मामला 21 बार स्थगित हुआ और अब दो महीने बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है.
सीजेआई बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, “हम बार-बार यह कह चुके हैं कि नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित मामलों की तुरंत सुनवाई और निर्णय होना चाहिए. अतः यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि कम से कम अगली तारीख पर हाईकोर्ट को मामले की सुनवाई कर जमानत याचिका पर निर्णय लेना होगा.”
व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अदालतों द्वारा त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने 25 अगस्त को एक आरोपी को सीबीआई केस में ज़मानत दे दी थी, जब उसे यह जानकारी मिली कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसकी जमानत अर्जी को 43 बार स्थगित किया. इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने एक सह-आरोपी को 22 मई, 2025 को जमानत प्रदान की थी, यह देखते हुए कि उसकी जमानत याचिका को हाईकोर्ट द्वारा 27 बार स्थगित किया गया था.
उर्जित पटेल आईएमएफ में कार्यकारी निदेशक नियुक्त
मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने पूर्व आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल की अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) में कार्यकारी निदेशक के रूप में नियुक्ति को मंज़ूरी दे दी है. इस पद पर उनका कार्यकाल तीन वर्षों का होगा. उल्लेखनीय है कि पटेल ने 2018 के अंत में “निजी कारणों” का हवाला देते हुए अचानक रिजर्व बैंक गवर्नर के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. यह तब की बात है, जब केंद्रीय बैंक और मोदी सरकार के बीच सार्वजनिक टकराव चल रहा था.
सुप्रीम कोर्ट की समिति की चेतावनी के बावजूद विवादित चारधाम बायपास परियोजना को मंजूरी
5 अगस्त को उत्तरकाशी ज़िले के धराली में हुई भूस्खलन की घटना से दो हफ़्ते पहले ही राज्य सरकार ने भागीरथी नदी के निचले इलाक़े में चारधाम राजमार्ग परियोजना के तहत प्रस्तावित एक बायपास सड़क को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी थी. इस बायपास पर सुप्रीमकोर्ट द्वारा नियुक्त उच्चस्तरीय समिति ने 2020 में आपत्ति जताई थी.
निखिल घाणेकर की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2024 में रक्षा मंत्रालय ने उस ज़मीन को "रणनीतिक महत्व" वाला घोषित किया था, जहां यह बायपास बनना प्रस्तावित है. इसके बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने उत्तराखंड सरकार को निर्देश दिया कि वह इस प्रस्ताव को वन अधिनियम की छूट श्रेणी के तहत मंजूरी दे, जिससे दिल्ली से केंद्रीय स्वीकृति लेने की ज़रूरत न हो.
सुप्रीम कोर्ट-नियुक्त समिति ने इस बायपास के खिलाफ सिफारिश की थी, क्योंकि यह क्षेत्र भागीरथी इको-सेंसिटिव ज़ोन में आता है. समिति का कहना था कि नई सड़क बनाने के बजाय मौजूदा राजमार्ग को चौड़ा किया जा सकता है.
धराली आपदा के बाद कुछ समिति सदस्यों ने चेताया है कि इस बायपास को बनाने से प्राकृतिक वन काटने पड़ेंगे और अस्थिर भू-भंडारों में सुरंग खोदनी पड़ेगी, जिससे क्षेत्र का संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र और अधिक खतरे में पड़ सकता है.
“क्या आप अमेरिका की तरह बॉर्डर पर दीवार बनाना चाहते हैं?” सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र से पूछा
जैसे ही कई भाजपा शासित राज्यों ने अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के खिलाफ अभियान शुरू किया, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केन्द्र सरकार से पूछा कि क्या वह भारत में अवैध प्रवासियों के प्रवेश को रोकने के लिए अमेरिका की तरह सीमा पर दीवार बनाना चाहती है?
सत्यप्रकाश के अनुसार, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने केन्द्र से यह जानकारी देने को कहा कि अवैध प्रवासियों, विशेषकर बांग्लादेश से आने वालों को वापस भेजने के लिए राज्य सरकारें और केंद्रशासित प्रदेश किस प्रकार की मानक कार्यप्रणालियों (एसओपी) का पालन कर रहे हैं. इस मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर के लिए तय की गई.
पश्चिम बंगाल प्रवासी मज़दूर कल्याण बोर्ड द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान बेंच ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि बंगाल और पंजाब के हिंदी-भाषी भारतीयों की "सांस्कृतिक और भाषायी विरासत" पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों से साझा है, जो वही भाषा बोलते हैं, लेकिन राजनीतिक सीमाओं ने उन्हें विभाजित कर दिया है.
बोर्ड ने याचिका में कहा कि बंगाली भाषी प्रवासी मजदूरों को अवैध तरीके से गिरफ्तार किया जा रहा है. सरकार उन पर बांग्लादेश जाने का दबाव बना रही है. सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वेस्ट बंगाल माइग्रेंट वेलफेयर बोर्ड के दावे अस्पष्ट हैं. कुछ राज्य सरकारें अवैध प्रवासियों पर निर्भर हैं. अवैध प्रवासियों की वजह से जनसंख्या में बदलाव हो रहा है. मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले की सुनवाई भी रोहिंग्या वाले मामले के साथ करने का आग्रह किया. अंत में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला अलग है. हाईकोर्ट से कहा जाएगा कि जल्दी संज्ञान लेकर उचित आदेश दें. वेस्ट बंगाल माइग्रेंट वेलफेयर बोर्ड की तरफ से पैरवी वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने की.
सरकारी स्कूलों में लगातार तीसरे साल नामांकन गिरा, जबकि प्राइवेट में कई गुना बढ़ा
देश के सरकारी स्कूलों में लगातार तीसरे साल बच्चों के नामांकन में गिरावट दर्ज की गई है. सरकार के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार 2023-24 की तुलना में नामांकन में 11 लाख की कमी आई है. सरकारी स्कूलों के साथ-साथ यह गिरावट सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में दर्ज की गई है. जबकि, इसी एक साल की अवधि में प्राइवेट स्कूलों में नामांकन 59 लाख बढ़ा है.
शिक्षा मंत्रालय के यूडीआईएसई डेटा — जो प्री-प्राइमरी से लेकर उच्च माध्यमिक स्तर तक स्कूल शिक्षा के विभिन्न मानकों पर नज़र रखता है — के अनुसार 2024-25 में कुल नामांकन घटकर 24.69 करोड़ रह गया, जबकि 2023-24 में यह 24.80 करोड़ था और 2022-23 में 25.18 करोड़ था.
पहली बार जब यूडीआईएसई डेटा में नामांकन में गिरावट दर्ज़ हुई थी, वह वर्ष 2022-23 था — जब महामारी के कारण लगे लॉकडाउन के बाद स्कूल खुले थे. मंत्रालय के अधिकारियों ने तब नामांकन में औसत चार वर्षों की तुलना में एक करोड़ से अधिक की गिरावट का कारण डेटा संग्रह की पद्धति में बदलाव को बताया था. 2022-23 से यूडीआईएसई डेटा व्यक्तिगत छात्रों के रिकॉर्ड के रूप में एकत्र किया जा रहा है, जबकि पहले यह स्कूल स्तर पर कुल संख्याओं के रूप में होता था.
“द इंडियन एक्सप्रेस” में अभिनय हरगोविंद के अनुसार, नवीनतम यूडीआईएसई डेटा जारी करते हुए गुरुवार को शिक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने लगातार तीसरे वर्ष नामांकन डेटा में गिरावट का कारण “गिरती जन्म दर के साथ जनसंख्या में बदलाव” को बताया. हालांकि, अधिकारी ने यह भी कहा कि केवल एक नई जनगणना ही पुष्टि कर सकती है कि प्राथमिक स्कूल जाने वाली जनसंख्या में गिरावट के पीछे जनसांख्यिकीय बदलाव है या नहीं. कुल नामांकन 2024-25 में 2023-24 की तुलना में लगभग 0.5% (11.13 लाख छात्रों) की गिरावट आई है.
जहां सरकारी स्कूलों में नामांकन पिछले तीन वर्षों में लगातार घटा है, वहीं प्राइवेट स्कूलों में नामांकन बढ़ा है. सरकारी स्कूलों में नामांकन 2022-23 में 13.62 करोड़ से घटकर 2023-24 में 12.75 करोड़ और 2024-25 में 12.16 करोड़ रह गया. दूसरी ओर, प्राइवेट स्कूलों में नामांकन 2022-23 में 8.42 करोड़ से बढ़कर 2023-24 में 9 करोड़ और 2024-25 में 9.59 करोड़ हो गया है.
प्राइवेट स्कूलों में नामांकन 2024-25 में कुल नामांकन का 39% रहा, जो कि 2018-19 के बाद से सबसे अधिक है. 2018-19 से 2023-24 तक यह आंकड़ा 33% से 37% के बीच था. सरकारी स्कूलों की संख्या 2023-24 में 10.18 लाख से घटकर 2024-25 में 10.13 लाख रह गई है, वहीं प्राइवेट स्कूलों की संख्या 3.31 लाख (2023-24) से बढ़कर 3.79 लाख (2024-25) हो गई है.
2024-25 में कुल नामांकन में गिरावट मुख्य रूप से प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा 1 से 5) में देखी गई है. अन्य सभी स्तरों — पूर्व-प्राथमिक, अपर-प्राथमिक (कक्षा 6-8), सेकेंडरी (कक्षा 9-10) और हायर सेकेंडरी (कक्षा 11-12) — में नामांकन में मामूली वृद्धि हुई है.
मंत्रालय के अधिकारियों ने 2024-25 में ड्रॉप आउट दर में भी कमी की ओर इशारा किया है. सेकेंडरी स्तर पर, जहां ड्रॉप आउट दर एक चिंता रही है, 2022-23 में यह दर 13.8% थी, जो 2024-25 में घटकर 8.2% रह गई है.
विश्लेषण
जो नौजवानों का डेमोक्रेटिक डिविडेंड होना था, वह भारत के लिए टाइम बम में बदल रहा है
द हिंदू में मार्टिन व्हाइटहेड, अमर आनंद सिंह और रितु कुलश्रेष्ठ ने एक लंबा विश्लेषण लिखा है. भारत की तथाकथित जनसांख्यिकीय 'पूंजी' - इसकी विशाल युवा आबादी - एक 'देनदारी' बनने के ख़तरे में है, क्योंकि शिक्षा और वास्तविक दुनिया के कौशल के बीच की खाई और डिग्रियों तथा रोज़गार पाने की क्षमता के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है. अगर इस अंतर को दूर नहीं किया गया, तो भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश एक जनसांख्यिकीय टाइम बम में बदल सकता है. नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था, "एक बच्चे को अपने ज्ञान तक सीमित न रखें, क्योंकि वह दूसरे समय में पैदा हुआ था." भारत की शिक्षा प्रणाली के संदर्भ में यह आज विशेष रूप से प्रासंगिक है. हमारी शिक्षा प्रणाली पुरानी हो चुकी है. हम छात्रों को उन नौकरियों के लिए तैयार कर रहे हैं जो तेज़ी से गायब हो रही हैं या बदल रही हैं.
काम का भविष्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों द्वारा आकार ले रहा है. शोध बताते हैं कि दुनिया भर में 70% मौजूदा नौकरियां प्रभावित होंगी और कई नौकरियों में 30% तक कार्य पूरी तरह से स्वचालित हो जाएंगे. वहीं, हमारे स्कूलों और कॉलेजों में पाठ्यक्रम तीन साल के चक्र में अपडेट होता है, जिसके कारण कई छात्र पीछे छूट जाते हैं. भारत की 'जनसांख्यिकीय लाभांश' को लंबे समय से देश के भविष्य के विकास के प्रमुख चालक के रूप में देखा जाता रहा है. 35 वर्ष से कम आयु के 80 करोड़ से अधिक लोगों के साथ, देश दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी में से एक होने का दावा करता है.
कड़वी सच्चाई यह है कि भारत हर साल लाखों स्नातक तैयार कर रहा है, लेकिन इनमें से कई अल्प-रोज़गार वाले हैं और तेज़ी से बेरोज़गार होते जा रहे हैं. पिछले एक दशक के आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीय विश्वविद्यालयों के 40%-50% इंजीनियरिंग स्नातकों को नौकरी नहीं मिली है, जो अकादमिक शिक्षा और उद्योग की ज़रूरतों के बीच की चिंताजनक खाई को उजागर करता है. मैकिन्से के अनुसार, 2030 तक भारत की हर 10 में से लगभग सात नौकरियों पर ऑटोमेशन का ख़तरा है. इसका मतलब है कि अगले पांच वर्षों में देश में एक बड़ा और अभूतपूर्व बदलाव आ सकता है.
यह समस्या हाई स्कूल में ही शुरू हो जाती है, जहां छात्रों को मौजूद करियर के अनगिनत रास्तों के बारे में काफी हद तक जानकारी नहीं होती. एक सर्वे से पता चला कि 93% भारतीय छात्र केवल सात करियर विकल्पों के बारे में जानते हैं, जिनमें से ज़्यादातर पारंपरिक भूमिकाएं हैं जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील या शिक्षक. इसके विपरीत, आधुनिक अर्थव्यवस्था 20,000 से अधिक करियर पथ प्रदान करती है. भारत कौशल रिपोर्ट 2024 के अनुसार, 65% से अधिक हाई स्कूल स्नातक ऐसी डिग्रियां हासिल करते हैं जो उनकी रुचियों या क्षमताओं के अनुरूप नहीं होती हैं.
भारत सरकार ने कौशल अंतर को पाटने के लिए स्किल इंडिया मिशन जैसी कई पहलें शुरू की हैं, लेकिन वे अपने लक्ष्य से बहुत पीछे रह गईं. भारत को एक ऐसी ठोस रणनीति की ज़रूरत है जो शिक्षा और कौशल विकास को उद्योग की मांगों के साथ जोड़े. भारत की वैश्विक डिजिटल महाशक्ति के रूप में उभरने की महत्वाकांक्षा प्रौद्योगिकी, शिक्षा और रोज़गार को एक सुसंगत राष्ट्रीय ढांचे में एकीकृत करने की क्षमता पर टिकी हुई है. अगर भारत अभी कार्रवाई करने में विफल रहता है, तो यह एक ऐसी पीढ़ी बनाने का जोखिम उठाता है जो उच्च शिक्षित तो होगी, लेकिन बेरोज़गार होगी, जो एक टिक-टिक करते टाइम-बम में बदल सकती है.
विश्लेषण
सुभाष गर्ग: मोदी सरकार की टैक्स रियायतें और जीएसटी कटौती राजस्व को संकट में धकेल रही हैं:
द वायर में पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के अनुसार, केंद्र सरकार की कर प्राप्तियां पिछले वित्तीय वर्ष से गिर रही हैं और कई तनाव के संकेतों ने 2025-26 के कमज़ोर रहने की नींव रख दी है. द ट्रिब्यून के लिए एक विश्लेषण में, गर्ग लिखते हैं कि सरकार 2024-25 के लिए संशोधित अनुमान (आरई) के अनुमानों को हासिल नहीं कर पाई. 2025-26 की पहली तिमाही में और भी बुरी ख़बरें आईं, क्योंकि वित्त मंत्रालय ने बताया कि 11 अगस्त, 2025 तक शुद्ध आयकर संग्रह में 3.9% की गिरावट आई है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 15 अगस्त को की गई घोषणा - इस दिवाली तक "अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधारों" की शुरुआत - और ऑनलाइन रियल मनी गेमिंग पर प्रतिबंध लगाने वाले नए बिल का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा, यह देखते हुए गर्ग कहते हैं कि सरकार "कर-प्राप्ति को नष्ट करने की होड़ में लग गई है". नियंत्रक-महालेखाकार (सीजीए) की हालिया रिपोर्ट में 2024-25 के लिए सकल कर प्राप्तियों (जीटीआर) में संशोधित अनुमानों (आरई) के मुकाबले एक महत्वपूर्ण कमी दर्ज की गई.
लगभग सभी क्षेत्रों में कमी देखी गई: जीएसटी प्राप्तियों (सीजीएसटी + आईजीएसटी + मुआवजा उपकर) में 35,000 करोड़ रुपये से अधिक की कमी दर्ज की गई; उत्पाद शुल्क संग्रह संशोधित अनुमानों और पिछले वर्ष के संग्रह (2023-24) दोनों से कम था; और व्यक्तिगत आयकर (पीआईटी), जो 2021-22 से मज़बूत था, अब तनाव के संकेत दिखा रहा था और संशोधित अनुमान से कम था. गर्ग लिखते हैं, "सकल कर प्राप्तियों में इतनी महत्वपूर्ण कमी और करों में ख़राब प्रदर्शन अशुभ है. यह 2025-26 के कमज़ोर रहने की ज़मीन तैयार करता है."
2025-26 की पहली तिमाही में, जहां अप्रत्यक्ष कर का प्रदर्शन अनिश्चित था, वहीं प्रत्यक्ष कर का प्रदर्शन बेहद ख़राब रहा. गर्ग का तर्क है कि जहां जीएसटी प्राप्तियां पिछले साल की समान तिमाही की तुलना में मामूली 10% अधिक थीं, ऐसा एक चालाकी के कारण हुआ. केंद्र सरकार ने 27,312 करोड़ रुपये की एकीकृत जीएसटी (आईजीएसटी) प्राप्तियों को राज्यों में वितरित नहीं किया और इसे अपने पास रखा. प्रत्यक्ष करों के मामले में, निगम कर प्राप्तियां पिछले वर्ष की तुलना में 12% कम थीं, जबकि पीआईटी 2.86 ट्रिलियन रुपये की प्राप्तियों के साथ नकारात्मक हो गया - जो 2024-25 की समान तिमाही से 0.52% कम है.
ऐसे समय में जब भारत की अर्थव्यवस्था धीमी हो रही थी, 2025-26 के बजट में आयकर छूट (12 लाख रुपये तक की आय पर कोई कर नहीं और 25 लाख रुपये तक की आय के लिए कम टैक्स स्लैब दरें) के परिणाम दिखने लगे हैं. गर्ग के अनुसार, यह अभूतपूर्व और बहुत ही चिंताजनक था. अगस्त की घोषणाओं, जैसे जीएसटी में राहत और ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध, से राजकोषीय राजस्व का और अधिक त्याग होने की संभावना है. गर्ग ने नोट किया, "पीएम की समय से पहले की घोषणा से जीएसटी राजस्व का नुक़सान हुआ है क्योंकि लोग इन उत्पादों की खरीद को स्थगित कर रहे हैं. जीएसटी छूट से जीएसटी प्राप्तियों पर लगभग 1-1.5% का असर पड़ने की संभावना है - जो 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का नुक़सान है."
विश्लेषण
प्रताप भानु मेहता: जब देश को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, तो क्या भारतीय पूंजीपति आगे आएंगे?
द इंडियन एक्सप्रेस ने प्रताप भानु मेहता ने अपना ओपिनियन पीस लिखा है. उसके कुछ अंश.
दशकों तक, व्यवसायों ने अपनी क्षमता को दबाने के लिए राज्य को दोषी ठहराया. अब वे निवेश करने, निर्माण करने या भविष्य की कल्पना करने में अपनी स्वाभाविक अक्षमता प्रकट करते हैं. दो संभावनाएं सामने आती हैं. पहली यह कि कारोबारी माहौल वास्तव में आधिकारिक खातों की तुलना में ज़्यादा ख़राब हो गया है, और व्यापारिक नेता खुलकर बोलने से बहुत डरते हैं. दूसरी यह कि कुछ अपवादों को छोड़कर, भारतीय पूंजी में विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता का अभाव है. इस मामले में, राज्य को दोष देना आत्म-मुक्ति का एक सुविधाजनक रूप बन जाता है. किसी भी तरह से, निष्कर्ष अपरिहार्य है: भारतीय पूंजी ख़ुद समस्या का हिस्सा है.
इतिहास भारतीय पूंजीवाद के संदेह को पुष्ट करता है. यह काफी हद तक व्यापारिक वर्गों से उभरा, जो मोल-भाव की क्षमता में बेजोड़ थे, लेकिन निर्माण करने में कम कुशल थे. भारतीय पूंजी ने इस प्रणाली का शोषण किया. उद्यमियों ने वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी फर्मों का उत्पादन किए बिना वित्त का दुरुपयोग किया और राज्य से संसाधन निकाले. पूर्वी एशिया के साथ इसका अंतर स्पष्ट है. उनके राज्य भी भ्रष्ट थे. लेकिन उनके सब्सिडी वाले उद्यमियों ने, अपनी सभी ख़ामियों के बावजूद, वास्तव में कुछ बनाया - ऐसी फर्में जो आगे चलकर सैमसंग, हुंडई या टीएसएमसी बनीं. भारत के उद्यमियों ने ऐसा नहीं किया.
उदारीकरण को एक महत्वपूर्ण मोड़ होना चाहिए था. नए उद्यमी आए और कुछ नए क्षेत्र उभरे. लेकिन कई मायनों में भारतीय पूंजीवाद कमज़ोर हो गया. पूंजी का संकेंद्रण तेज़ हो गया है, और अंबानी और अडानी जैसे समूहों के प्रभुत्व ने इस क्षेत्र को फिर से परिभाषित किया है. उनकी निष्पादन क्षमता ज़बरदस्त है. फिर भी, उनके उदय ने प्रतिस्पर्धा को विकृत कर दिया है और भारत को भू-राजनीतिक रूप से कमज़ोर बना दिया है. अगर ये राष्ट्रीय चैंपियन भारत को तकनीकी या उत्पाद नेतृत्व की ओर बढ़ा रहे होते, तो शायद यह सौदा इसके लायक होता. लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे हैं.
वित्त की संस्कृति भी उतनी ही कमज़ोर करने वाली है. भारत के वित्तीय क्षेत्र में बातचीत से ऐसी कंपनियों का समर्थन करने की महत्वाकांक्षा में एक चौंकाने वाली कमी का पता चलता है जो भारतीय या वैश्विक बाज़ार के लिए विश्व स्तरीय उत्पाद बना सकती हैं. भारतीय पूंजी की कल्पना पर मध्यस्थता का प्रभुत्व है - शेयर बाज़ार से त्वरित लाभ, वित्तीय इंजीनियरिंग, या सट्टाबाज़ी. यह गतिशीलता का भ्रम पैदा करता है: वित्त की मीडिया कवरेज भारतीय पूंजीवाद को एक जीवंत बिजलीघर की तरह दिखाती है. वास्तव में, वैश्विक स्तर पर, यह एक फुसफुसा पटाखा है.
भारतीय पूंजीवाद के सांस्कृतिक आयाम समस्या को और बढ़ाते हैं. व्यापारिक नेता अक्सर कमज़ोर मानव पूंजी की शिकायत करते हैं. फिर भी, वे ऐतिहासिक रूप से इसे बनाने में निवेश करने के लिए तैयार नहीं थे. भारतीय व्यवसाय लोकलुभावनवाद के ख़िलाफ़ भी बोलता है. लेकिन उसने जिस पूंजी का ग़लत आवंटन किया, वह लोकलुभावन हैंडआउट्स की राजकोषीय लागत के पैमाने के बराबर है. विडंबना तीखी है. दशकों तक, भारतीय व्यापार ने अपनी क्षमता को दबाने के लिए राज्य को दोषी ठहराया. आज, जब राज्य पहले से कहीं ज़्यादा खुला है, भारतीय पूंजी जोखिम के लिए बहुत कम भूख दिखाती है, कोई साहस नहीं, नेतृत्व के लिए कोई महत्वाकांक्षा नहीं, और निर्माण करने की अपनी क्षमता में बहुत कम आत्मविश्वास दिखाती है.
बारिश से तबाह जम्मू-कश्मीर:
डिप्टी सीएम बोले- स्मार्ट सिटी के नाम पर लोगों से हुआ धोखा, होगी जांच
जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा तवी नदी पर बने चौथे पुल की तस्वीरें साझा करने के एक दिन बाद, जो 2014 और 2025 में उसी स्थान पर क्षतिग्रस्त हो गया था, उनके डिप्टी सुरिंदर चौधरी ने गुरुवार को कहा कि सरकार हाल की बाढ़ के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग पर क्षतिग्रस्त हुए सभी पुलों और पुलियों की जांच कराएगी. क्षतिग्रस्त चौथे पुल का दौरा करने के बाद उन्होंने कहा, "मैंने अपने सचिव को बताया है कि हम इस मामले को देखेंगे और हम यहां घटिया काम की अनुमति नहीं देंगे."
उन्होंने कहा कि भारी बारिश से आई बाढ़ में पीएमजीएसवाई के तहत बनी सड़कों के अलावा कई छोटे पुल और पुलिया क्षतिग्रस्त हो गए हैं या बह गए हैं. इस पुल का उद्घाटन उमर अब्दुल्ला ने 2013 में किया था, जब वह जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्य में नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे थे. हालांकि, उसके लगभग एक साल बाद, 2014 में तवी में बाढ़ आने के बाद पुल का तटबंध, जिसमें बेलिचरना क्षेत्र की ओर की सुरक्षा दीवार भी शामिल थी, बह गया. बाद में तटबंध की मरम्मत की गई, लेकिन 2016 में आई बाढ़ में यह फिर से बह गया.
कस्बे कटरा में, जहां मंगलवार को भूस्खलन में 34 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई, स्थानीय निवासियों ने एक जुलूस निकाला और एक विशाल प्रदर्शन किया. उन्होंने श्री माता वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड पर त्रिकुटा पहाड़ियों में स्थित वैष्णोदेवी मंदिर की तीर्थयात्रा का व्यवसायीकरण करने का आरोप लगाया. प्रदर्शनकारियों ने श्राइन बोर्ड पर मौसम की चेतावनी के बाद स्कूल और सरकारी कार्यालय बंद होने के बावजूद यात्रा की अनुमति देने का आरोप लगाते हुए, बड़े पैमाने पर भूस्खलन में तीर्थयात्रियों की मौत के लिए ज़िम्मेदारी तय करने की मांग की.
इस बीच, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान भूस्खलन से मलबा हटाने के साथ बचाव कार्य में जुटे हुए हैं. जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग उधमपुर और बनिहाल के बीच विभिन्न स्थानों पर भूस्खलन के कारण हुई रुकावटों के मद्देनज़र गुरुवार को लगातार तीसरे दिन वाहनों के आवागमन के लिए बंद रहा. अधिकारियों ने कहा कि डोडा और किश्तवाड़ के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग पर भी यातायात निलंबित रहा. हालांकि, पुंछ और शोपियां के बीच मुगल रोड गुरुवार को फिर से खुल गई, लेकिन यातायात को शाम 4.30 बजे तक ही अनुमति दी जाएगी.
विश्लेषण
सुशांत सिंह: कनाडा और भारत साथ तो आ रहे हैं पर यह शांति टिकेगी नहीं
रक्षा विशेषज्ञ और पत्रकार सुशांत सिंह ने कनाडा के प्रकाशन द वालरस में भारत कनाडा संबंधों पर विश्लेषण किया है. उसके प्रमुख अंश
आर्थिक तर्क का इस्तेमाल कर टूटे संबंधों को सुधारने की कोशिश की जा रही है. लेकिन यह गहरे राजनीतिक मतभेदों की भरपाई नहीं कर सकता. जून में अल्बर्टा के कानानस्किस में, जी7 की बैठक एक भारी एजेंडे के साथ हुई. आधिकारिक तौर पर, शिखर सम्मेलन शांति, ऊर्जा, सुरक्षा और नई साझेदारियों के तत्काल सवालों पर केंद्रित था; अनौपचारिक रूप से, सभी की निगाहें दो देशों के नेताओं के बीच एक सावधानीपूर्वक प्रबंधित मुलाकात पर थीं, जिनके संबंध महीनों पहले लगभग टूट चुके थे. मैं कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और नरेंद्र मोदी के बीच बैठक का ज़िक्र कर रहा हूं.
हरदीप सिंह निज्जर की हत्या की चल रही जांच के बावजूद, कार्नी द्वारा अपने भारतीय समकक्ष को दिया गया निमंत्रण कई लोगों को हैरान कर गया. यह निमंत्रण दोनों देशों के बीच संबंधों के गहरे संकट में जाने के महीनों बाद आया, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने 2023 में संसद में आरोप लगाया था कि कनाडाई धरती पर हुई हत्या के पीछे भारत सरकार का हाथ था. नई दिल्ली ने निमंत्रण आसानी से स्वीकार कर लिया. ओटावा ने जवाब में बैठक के रचनात्मक माहौल में किसी भी तरह की बाधा से बचने के लिए हर संभव प्रयास किया.
इस बैठक ने अपेक्षित राजनयिक औपचारिकताएं पूरी कीं, जिसमें दोनों राजधानियों में उच्चायुक्तों को बहाल करने और व्यापार वार्ता फिर से शुरू करने के समझौते शामिल थे. फिर भी कार्नी ने निज्जर की हत्या के बारे में सीधे सवालों से बचते हुए केवल इतना कहा कि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया पर टिप्पणी करने में "सावधान" रहने की ज़रूरत है. वहीं, मोदी ने लोकतांत्रिक मूल्यों और आर्थिक सहयोग के बारे में सामान्य बातें कीं, जबकि सीमा पार अपराध के बारे में कनाडा की मुख्य चिंताओं पर कोई ठोस प्रतिबद्धता नहीं जताई.
मुस्कुराहटें और मज़बूत हाथ मिलाना इस अंतर्निहित वास्तविकता को नहीं छिपा सका कि यह राजनयिक मेल-मिलाप वास्तविक सुलह पर नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक अवसरवादिता पर बना है. कार्नी का निमंत्रण ट्रूडो के सख़्त दृष्टिकोण से एक व्यावहारिक बदलाव का प्रतीक है, लेकिन इसने द्विपक्षीय संकट को जन्म देने वाले मूलभूत मुद्दों को अनसुलझा छोड़ दिया है.
दोनों देशों के बीच विवाद के अंतर्निहित कारक सीएसआईएस रिपोर्ट की जांच करते समय स्पष्ट हो जाते हैं. यह भारत को कनाडा में विदेशी हस्तक्षेप और जासूसी के "मुख्य अपराधियों" में से एक के रूप में वर्णित करता है. ख़ुफ़िया एजेंसी चेतावनी देती है कि "कनाडा को भारत सरकार द्वारा किए जा रहे निरंतर विदेशी हस्तक्षेप के बारे में सतर्क रहना चाहिए, न केवल जातीय, धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों के भीतर, बल्कि कनाडा की राजनीतिक व्यवस्था में भी."
संक्षेप में, यह मेल-मिलाप दुश्मनी में एक अस्थायी विराम से ज़्यादा कुछ नहीं दर्शाता. अगला संकट, चाहे वह एक और हत्या, एक विशेष रूप से उत्तेजक खालिस्तान समर्थक घटना, या बस किसी भी देश में चुनावी दबावों से शुरू हो, द्विपक्षीय संबंधों को एक बार फिर से नीचे की ओर ले जाने की संभावना है. जब तक दोनों देश इस वास्तविकता को स्वीकार नहीं करते और अपने मतभेदों को केवल कागज़ पर ढकने के बजाय उन्हें प्रबंधित करने में सक्षम संस्थान विकसित नहीं करते, तब तक अगला संकट केवल समय की बात है.
विश्लेषण
उस महिला की अधूरी लड़ाई, जिसने भारत को दहेज कानून फिर से लिखने पर मजबूर किया
सत्यरानी चड्ढा, जिनकी बेटी शशि 1979 में जल कर मर गई थी, ने अपने निजी दुख को सार्वजनिक विरोध में बदल दिया. उन्होंने अपनी साथी शाहजहां के साथ मिलकर दहेज, क्रूरता और दुल्हन जलाने के खिलाफ भारत के कानूनों को सख्त करने के लिए जोरदार कोशिश की. लेकिन उनकी बेटी का हत्यारा, उनका दामाद, कभी जेल की सलाखों के पीछे नहीं गया. आज भी, जब अपराध का डेटा हर साल 6,000 से अधिक दहेज हत्याओं को दर्ज करता है, तो उनकी लड़ाई भारत को असमंजस में छोड़ती है.
सत्यरानी चड्ढा की 20 वर्षीय गर्भवती बेटी शशि बाला को 1979 में दहेज की मांग पूरी न करने के कारण जिंदा जला दिया गया था. उस समय दहेज की मांग शादी के बाद की गई थी, जिसे कानून में अपराध मानने से इनकार किया जाता था. सत्यरानी ने अपने दुख को शक्तिशाली आंदोलन में बदल दिया और 34 वर्षों तक कानूनों में बदलाव के लिए लड़ती रहीं. उन्होंने शाहजहां के साथ मिलकर 1987 में शक्ति शालिनी नामक संगठन की स्थापना की, जो दहेज और लिंग आधारित हिंसा से पीड़ित महिलाओं के लिए एक शरण स्थल और अधिकारों का संगठन है.
उनकी लड़ाई की वजह से भारत ने दहेज के खिलाफ कठोर कानून बनाए जैसे कि IPC 498A (पति/रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता), 304B (दहेज हत्या की परिभाषा), और सबूत अधिनियम की धारा 113A/113B (दहेज हत्या और इसके लिए उकसाने को परिभाषित करना). इन कानूनों ने दोष साबित करने का बोझ पीड़ित पक्ष के बजाय आरोपित पक्ष पर डाला और ससुराल वालों को भी दोषी ठहराना शुरू किया.
हालांकि, सत्यरानी की बेटी के हत्यारे दामाद को वर्ष 2000 में सिर्फ आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी पाया गया, लेकिन वह अदालत के सामने कभी नहीं आया और जेल नहीं गया. आज भी भारत में हर साल लगभग 6,000 दहेज मौतें होती हैं, और इस सामाजिक बुराई के खिलाफ संघर्ष जारी है.
इस प्रकार सत्यरानी चड्ढा ने अपनी निजी त्रासदी को एक राष्ट्रीय आंदोलन में बदल दिया, जिसने दहेज प्रथा के विरुद्ध कानूनों और समाज की सोच को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनके संघर्ष की विरासत आज भी दहेज हिंसा के खिलाफ लड़ाई में प्रेरणा बनी हुई है.
दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के तहत दहेज लेना और देना दोनों अपराध हैं, लेकिन कानून के बावजूद दहेज से जुड़ी हिंसा और अत्याचार आज भी मौजूद हैं. “आर्टिकल-14” में संजॉय घोष ने अपनी इस रिपोर्ट में बताया है कि कैसे कानून अभी भी पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाया है, क्योंकि दहेज प्रथा सामाजिक रूप से गहराई से जमी हुई है और परिवार भी इसे रोकने में असफल हैं. महिला ने दहेज विरोधी कानून को मजबूत करने और दहेज के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने के लिए संघर्ष किया. उसके संघर्ष ने भारत के दहेज कानूनों को पुनर्लेखन और सुधार की दिशा में अग्रसर किया, लेकिन यह लड़ाई अभी अधूरी है.
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