31/03/2026: पाकिस्तान कूदा तो |सोशल मीडिया टेकडाउन | नेपाल में गिरफ्तारियां |ट्रांसजेंडर बिल पास | असम भाजपा में दरारें | आईटी नियम सख्त | हॉर्मुज़ पर ट्रंप की दो टूक | ईरान में दम बाकी
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फलक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
कैसे पाकिस्तान ट्रंप का भरोसा जीतकर ईरान जंग में एक अप्रत्याशित मध्यस्थ बनकर उभरा
‘घुसपैठिया’: केंद्र कहता है डेटा राज्यों के पास, राज्य जानकारी देते नहीं; तो चुनावी मंच से बड़े दावों का आधार क्या?
एफपीआई निकासी 34 वर्षों में सबसे अधिक; 2026 में ₹1.8 ट्रिलियन की रिकॉर्ड विदेशी बिकवाली, मार्च में ₹1.18 ट्रिलियन
असम की सत्ता के केंद्र में कैसे सतह पर आईं भाजपा की आंतरिक दरारें
मोदी को ‘अशोभनीय’ रूप में चित्रित करने के कारण सरकार के आदेश पर डॉ. निमो यादव का अकाउंट ब्लॉक: ‘एक्स’ ने दिल्ली हाई कोर्ट को बताया
फेसबुक और ‘एक्स’ पर सरकार के नए ‘टेकडाउन’ आदेश; राजीव निगम, जुबैर, मोलिटिक्स और नेशनल दस्तक पर निशाना
नेपाल: ‘जेन-ज़ी’ विरोध प्रदर्शनों पर कार्रवाई; पूर्व प्रधानमंत्री ओली के बाद चार और हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारियां
2013 के दंगों का ‘चेहरा’ संजीव बालियान यूपी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए सिरदर्द बने
जयपुर का स्वाद नहीं, जाति बोलती है
विरोध प्रदर्शनों के बीच ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी
हेट स्पीच मामले में भाजपा नेता नितेश राणे के खिलाफ शिकायत दर्ज
आलोचना नहीं सहेंगे विश्वगुरु, व्यंगात्मक पोस्ट हो रहे डिलीट
आईटी नियमों में बदलाव: अब स्वतंत्र न्यूज़ क्रिएटर्स भी सरकार के निशाने पर
ईरान युद्ध का 32वां दिन: अमेरिका का दावा - ईरान की सैन्य शक्ति हुई पस्त, पर जवाबी हमले की क्षमता अब भी बाकी
मारुको रूबियो का बड़ा बयान: “हफ्तों में हासिल कर लेंगे जंग के मकसद”, तेहरान और इस्फहान धमाकों से दहले
लेबनान और ईरान में मानवीय संकट: हज़ारों की मौत और बढ़ती गरीबी का साया
ट्रंप का सहयोगियों पर तीखा हमला: ‘अपना तेल खुद बचाओ, अमेरिका अब मदद नहीं करेगा’
चीन और पाकिस्तान की मध्य-पूर्व में शांति के लिए ‘पांच-सूत्रीय पहल’
ट्रंप की ‘बेखौफ जंग’: ईरान के पानी और बिजली ठिकानों को तबाह करने की धमकी
सऊदी बेस पर अमेरिकी रडार विमान नष्ट: ईरान की बढ़ती ताकत ने उड़ाए होश
कैसे पाकिस्तान ने ट्रंप का भरोसा जीता, और ईरान जंग में मध्यस्थ बनकर उभरा
बीबीसी की रिपोर्टर कैरोलिन डेविस की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, मध्य-पूर्व के इस भीषण संघर्ष में पाकिस्तान की मध्यस्थ की भूमिका ने दुनिया के कई देशों को हैरान कर दिया है. हालांकि, बारीकी से देखने पर यह इतना भी चौंकाने वाला नहीं लगता. इसकी सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख, फील्ड मार्शल असीम मुनीर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच के निजी समीकरण हैं. ट्रंप अक्सर मुनीर को अपना “पसंदीदा” फील्ड मार्शल कहते हैं और सार्वजनिक रूप से यह मान चुके हैं कि मुनीर ईरान को “बाकी लोगों से बेहतर” समझते हैं.
पाकिस्तान और ईरान के बीच लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा होती है और दोनों देशों के बीच गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध हैं, जिसे पाकिस्तान “भाईचारे वाला” रिश्ता बताता है. गौर करने वाली बात यह भी है कि पाकिस्तान की ज़मीन पर कोई अमेरिकी एयरबेस नहीं है और खाड़ी के अन्य मध्यस्थों के विपरीत, पाकिस्तान अब तक इस युद्ध में सीधे तौर पर नहीं घसीटा गया है. अमेरिका और ईरान के बीच शांति बहाल होना पाकिस्तान के अपने हित में भी है. हालांकि, विशेषज्ञों ने इस पर सवाल भी उठाए हैं कि जो देश खुद अफगानिस्तान और भारत जैसे पड़ोसियों के साथ तनाव में उलझा हो, वह शांतिदूत की भूमिका कैसे निभा सकता है. पिछले साल ही भारत के साथ तनाव के कारण परमाणु टकराव का डर पैदा हो गया था और फिलहाल पाकिस्तान अफगानिस्तान में बमबारी कर रहा है. इसके बावजूद, पाकिस्तान इस समय एक संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है. वह दोनों पक्षों के बीच संदेश भेज रहा है, मुस्लिम देशों के विदेश मंत्रियों की मेजबानी कर रहा है और कूटनीतिक फोन कॉल्स के ज़रिए सक्रिय है.
खोने के लिए बहुत कुछ
अटलांटिक काउंसिल के सीनियर फेलो माइकल कुगेलमैन ने बीबीसी को बताया कि मध्य-पूर्व के बाहर पाकिस्तान शायद ऐसा देश है जिसका इस जंग में बहुत कुछ दांव पर लगा है. पाकिस्तान अपनी तेल ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, जिसका बड़ा हिस्सा ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ से होकर आता है. ईरान द्वारा इस रास्ते को प्रभावी ढंग से बंद किए जाने का असर पाकिस्तान पर दिखने लगा है. मार्च की शुरुआत में ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 20% की वृद्धि की गई और ईंधन बचाने के लिए सरकारी कर्मचारियों के लिए चार दिन का कार्य सप्ताह लागू कर दिया गया है. कराची के आईबीए में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर फरहान सिद्दीकी का कहना है कि यदि युद्ध जारी रहा, तो पाकिस्तान पर आर्थिक दबाव बेतहाशा बढ़ जाएगा.
इसके अलावा, सुरक्षा संबंधी चुनौतियां भी कम नहीं हैं. सितंबर 2025 में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एक रक्षा समझौता किया था, जिसके तहत किसी भी एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा. सवाल यह है कि यदि सऊदी अरब युद्ध में शामिल होता है, तो क्या पाकिस्तान को भी कूदना पड़ेगा. प्रोफेसर सिद्दीकी के अनुसार, यदि पाकिस्तान सऊदी अरब की ओर से जंग में शामिल होता है, तो उसकी पूरी पश्चिमी सीमा असुरक्षित हो जाएगी. पाकिस्तान पहले से ही अफगानिस्तान के साथ “पूर्ण युद्ध” जैसी स्थिति में है. इसके साथ ही घरेलू स्तर पर जनभावनाओं का भी दबाव है. ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत के बाद पाकिस्तान में उग्र विरोध प्रदर्शन हुए थे. अमेरिका में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी का कहना है कि पाकिस्तान की जनता का झुकाव पूरी तरह ईरान के पक्ष में है और नीति निर्माता इस बात को लेकर बेहद संवेदनशील हैं.
कूटनीतिक साख और जोखिम
मलीहा लोधी के अनुसार, यह एक “हाई-स्टेक” डिप्लोमेसी है, जिसमें जोखिम बड़े हैं तो इनाम भी बड़ा है. यदि पाकिस्तान सफल होता है, तो वह वैश्विक कूटनीति के शिखर पर पहुंच जाएगा. पाकिस्तान ने ट्रंप को खुश करने के लिए भी कई कदम उठाए हैं, जैसे 2025 के भारत-पाकिस्तान संकट के दौरान ट्रंप के हस्तक्षेप के लिए उनका नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करना. कुगेलमैन का कहना है कि पाकिस्तान ने ट्रंप की तारीफ करके वाशिंगटन में अपनी स्थिति मज़बूत की है. पाकिस्तान की सबसे बड़ी ताकत यह है कि ईरान उसे इजरायल समर्थक या कट्टर अमेरिका समर्थक के रूप में नहीं देखता.
हालांकि, इस मध्यस्थता के विफल होने का खतरा भी बना हुआ है. कुगेलमैन चेतावनी देते हैं कि यदि दोनों पक्ष और अधिक ताकत के साथ युद्ध शुरू कर देते हैं, तो पाकिस्तान पर “नादान” होने के आरोप लग सकते हैं. फिलहाल पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार चीन के दौरे पर हैं, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास की गहरी खाई को देखते हुए किसी ठोस समझौते की उम्मीद फिलहाल कम ही नज़र आती है.
तो अपने दोस्त की खातिर पाकिस्तान भी इस युद्ध में कूदेगा? हालात एक नज़र...
पिछले एक महीने से जब से अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के खिलाफ अपना हवाई बमबारी अभियान शुरू किया है, तब से कम से कम नौ देशों में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं. तेज़ी से बढ़ते इस संघर्ष के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को रोज़ाना अरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है और दुनिया एक बड़े ऊर्जा संकट का सामना कर रही है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस युद्ध का पैमाना और भी ज़्यादा भयानक हो सकता है. सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने सऊदी अरब के साथ-साथ खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्यों—कुवैत, बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान—पर ड्रोन और मिसाइलों की बौछार की है. हालांकि, अब तक इनमें से किसी भी देश ने तेहरान के खिलाफ सैन्य जवाबी कार्रवाई नहीं की है.
पाकिस्तान सेना के दूसरे सबसे बड़े पूर्व अधिकारी, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद सईद ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि “सऊदी अरब ने अब तक बहुत धैर्य दिखाया है.” उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सऊदी अरब सैन्य रूप से पलटवार करता है, तो वह अकेला नहीं होगा और इससे पूरा क्षेत्र आग की चपेट में आ जाएगा. सऊदी अरब की इस युद्ध में सीधी भागीदारी के निहितार्थ खाड़ी के अरब देशों से कहीं आगे तक जाएंगे. गौरतलब है कि 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान ने एक आपसी रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. रविवार को इस्लामाबाद में सऊदी विदेश मंत्री के साथ बैठक के दौरान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने अपने सहयोगी देश को “अद्भुत संयम” के लिए धन्यवाद दिया और आश्वासन दिया कि “पाकिस्तान हमेशा सऊदी अरब के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहेगा.” इसका सीधा संकेत यह है कि यदि ईरान ने सऊदी अरब को हद से ज़्यादा उकसाया, तो पाकिस्तान को अपने मित्र देश की रक्षा के लिए इस युद्ध में कूदना पड़ सकता है.
हालांकि, पाकिस्तानी नेतृत्व फिलहाल किसी नए युद्ध के पक्ष में नहीं है. अभी एक साल भी नहीं हुआ है जब कट्टर प्रतिद्वंद्वी भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिनों तक हवाई और मिसाइल युद्ध चला था. इसके अलावा, पाकिस्तानी सेना पिछले कई महीनों से अफ़गानिस्तान सीमा पर तालिबान के साथ सीमा पार झड़पों में उलझी हुई है. ऐसे में पाकिस्तान के पास इस संघर्ष को कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास करने के बड़े कारण हैं. वाशिंगटन में ‘मिडल ईस्ट पॉलिसी काउंसिल’ के सीनियर रेजिडेंट फेलो कामरान बुखारी का कहना है कि ईरान के लिए उसके रणनीतिक परिवेश में पाकिस्तान ही एकमात्र ऐसा देश है जिसके साथ उसके संबंध सबसे कम विवादास्पद हैं.
पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने चेतावनी दी है कि मौजूदा संघर्ष केवल “मौत और विनाश” की ओर ले जाएगा. इसी चिंता के कारण रविवार को तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के शीर्ष राजनयिकों ने इस्लामाबाद में संकटकालीन वार्ता की. डार ने इन चर्चाओं के बाद कहा कि पाकिस्तान द्वारा आयोजित अमेरिका-ईरान शांति वार्ता का प्रस्ताव मेज़ पर है. उन्होंने दावा किया कि ईरान और अमेरिका दोनों ने बातचीत की सुविधा के लिए पाकिस्तान पर भरोसा जताया है. डार ने यह भी बताया कि चीन ने भी पाकिस्तान की इस पहल का पूरा समर्थन किया है. इस सिलसिले में डार मंगलवार को चीन के दौरे पर रवाना हुए, भले ही मिस्र के प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक के दौरान गिरने से उनके कंधे में मामूली फ्रैक्चर हो गया था.
लेकिन पाकिस्तान की इस कूटनीति के सामने बड़ी चुनौतियां हैं. पिछले सप्ताहांत यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने इज़राइल पर पहली बार मिसाइलें दागकर युद्ध का दायरा बढ़ा दिया है. दूसरी ओर, अमेरिका मिडिल ईस्ट में हज़ारों अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती कर रहा है, जिससे ईरान के खिलाफ ज़मीनी कार्रवाई की आशंका बढ़ गई है. सीएनएन के फ्रेड प्लीटजेन (Fred Pleitgen) से बात करते हुए एक वरिष्ठ ईरानी सुरक्षा अधिकारी ने कड़े शब्दों में कहा, “यह हमारा युद्ध है, और हम तब तक अपनी रक्षा करना बंद नहीं करेंगे जब तक हम ट्रंप और नेतन्याहू को ऐतिहासिक सबक न सिखा दें.”
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सोमवार को स्पष्ट किया कि ईरान ने पाकिस्तान द्वारा आयोजित हालिया क्षेत्रीय बैठकों में भाग नहीं लिया है. उन्होंने कहा कि ईरान की वर्तमान प्राथमिकता अपनी रक्षा करना है. बघाई के अनुसार, जब तक अमेरिका के सैन्य हमले जारी हैं, उनकी पूरी क्षमता केवल आत्मरक्षा में लगी रहेगी. फिलहाल स्थिति बेहद अनिश्चित और खतरनाक बनी हुई है. ट्रंप प्रशासन और ईरान दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं, लेकिन साथ ही एक-दूसरे पर घातक हमले भी जारी रखे हुए हैं. युद्ध के और अधिक विस्तार का खतरा अब पहले से कहीं ज़्यादा वास्तविक नज़र आ रहा है.
चीन और पाकिस्तान की मध्य-पूर्व में शांति के लिए ‘पांच-सूत्रीय पहल’
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार को बीजिंग में चीन और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की मुलाकात के बाद मध्य-पूर्व में शांति के लिए ‘पांच-सूत्रीय पहल’ जारी की गई. हालांकि इसमें विस्तृत जानकारी की कमी थी, लेकिन इसमें तत्काल युद्धविराम, शांति वार्ता की शुरुआत, गैर-सैन्य ठिकानों पर हमलों को रोकने और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही सामान्य करने का प्रस्ताव दिया गया. पांचवां बिंदु ‘संयुक्त राष्ट्र चार्टर’ की सर्वोच्चता बनाए रखने पर केंद्रित था.
पाकिस्तान इस संघर्ष में मध्यस्थ के रूप में सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने रविवार को इस्लामाबाद में सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के विदेश मंत्रियों की मेजबानी की थी. हालांकि, अब तक पाकिस्तान की इन कोशिशों के किसी बड़े परिणाम निकलने के संकेत नहीं मिले हैं.
‘घुसपैठिया’: केंद्र कहता है डेटा राज्यों के पास, राज्य जानकारी देते नहीं; फिर चुनावी मंच से बड़े दावों का आधार क्या?
“9 अप्रैल को असम में चुनाव होने वाले हैं. असम की जनता को अपने वोट को केवल हिमंता बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री बनाने या अपने संबंधित उम्मीदवारों को विधायक चुनने के साधन के रूप में नहीं देखना चाहिए. बल्कि, यह वोट एक ‘घुसपैठिया मुक्त’ असम बनाने के लिए है.” 29 मार्च को, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के साथ असम विधानसभा चुनाव अभियान के तहत सोनितपुर और नलबाड़ी की जनसभाओं में यह टिप्पणी की. रैलियों के दौरान, उन्होंने मतदाताओं से राज्य को “घुसपैठियों” से “मुक्त” कराने के लिए मतदान करने का आग्रह किया. विपक्षी कांग्रेस पार्टी पर सीधा हमला करते हुए शाह ने टिप्पणी की, “चाहे गौरव गोगोई और राहुल गांधी कितना भी जोर लगा लें, घुसपैठियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी और एक-एक घुसपैठिए को वापस भेजने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा.”
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि राज्य में 2015 से भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार सत्ता में है. 2019 से, अमित शाह स्वयं केंद्रीय गृह मंत्रालय की कमान संभाल रहे हैं – यह एक ऐसा विभाग है जिसके पास देश की विभिन्न सीमाओं को सुरक्षित करने की जिम्मेदारी है.
उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार देश भर में घुसपैठियों की पहचान करने, उन्हें मतदाता सूची से हटाने और कानून के अनुसार उन्हें उनके मूल स्थानों पर वापस भेजने के लिए प्रतिबद्ध है. दावा किया कि असम की भाजपा सरकार ने पिछले एक दशक में ‘घुसपैठियों’ से 1.25 लाख एकड़ जमीन वापस ली है, जिससे यह सुनिश्चित हुआ है कि अब कोई भी घुसपैठिया असम में प्रवेश नहीं कर सकता. इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा भी ‘घुसपैठियों को राज्य से बाहर निकालने’ के वादे कर रहे हैं. अंकित राज की रिपोर्ट के अनुसार, 27 मार्च को एक चुनावी रैली के दौरान, सरमा ने घोषणा की कि यदि उनकी सरकार फिर से चुनी जाती है, तो वह ‘बांग्लादेशी मियांओं’ की ‘कमर तोड़’ देंगे.
उन्होंने दावा किया कि पिछले पांच वर्षों में 1.5 लाख बीघा जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया है, और आगामी कार्यकाल के दौरान इस आंकड़े के पांच लाख बीघा तक बढ़ने की उम्मीद है. लेकिन इस पूरे कथानक का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि ‘घुसपैठ’ के मामले में – जिसे चुनावी भाषणों में व्यापक रूप से उजागर किया जा रहा है – सरकारों के पास स्वयं निश्चित आंकड़ों का अभाव है. न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकार सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत मांगी गई आधिकारिक जानकारी प्रदान करने में सक्षम रही है.
असम में कितने घुसपैठियों की पहचान की गई या उन्हें पकड़ा गया है?
23 फरवरी, 2026 को, आरटीआई कार्यकर्ता कन्हैया कुमार ने असम सरकार के मुख्यमंत्री सचिवालय में एक आवेदन दायर किया. इस आवेदन में, उन्होंने तीन महत्वपूर्ण जानकारियां मांगी थीं: (1) पिछले 10 वर्षों (या उपलब्ध अवधि) के दौरान असम में पहचाने गए या पकड़े गए ‘घुसपैठियों’ की कुल संख्या. (2) इसी अवधि के दौरान निर्वासित या वापस भेजे गए व्यक्तियों की संख्या. (3) इन ‘घुसपैठियों’ का देश-वार विवरण (राष्ट्रीयता के आधार पर).
जवाब में, असम का मुख्यमंत्री सचिवालय कोई भी जानकारी देने में असमर्थ रहा और आवेदन को ‘राजनीतिक (बी) विभाग’ को भेज दिया – जो राज्य के गृह और राजनीतिक विभाग के अंतर्गत एक प्रभाग है.
असम सरकार की क्या प्रतिक्रिया थी?
अपने जवाब में, असम सरकार के गृह और राजनीतिक विभाग ने कहा कि मांगी गई जानकारी ‘असम पुलिस बॉर्डर ऑर्गनाइजेशन’ द्वारा रखी जाती है. विभाग ने आगे स्पष्ट किया कि असम पुलिस बॉर्डर ऑर्गनाइजेशन को आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 24(4) के तहत जानकारी का खुलासा करने से छूट प्राप्त है.
धारा 24(4) क्या कहती है?
अधिनियम की धारा 24 कुछ सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को आरटीआई के दायरे से बाहर रखती है. इसी धारा की उप-धारा 4 इस छूट का विस्तार राज्य सरकारों द्वारा स्थापित खुफिया और सुरक्षा संगठनों तक करती है – विशेष रूप से वे जिन्हें राज्य सरकार, समय-समय पर, आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचनाओं के माध्यम से इस छूट में शामिल करने के लिए नामित करती है. हालाँकि, इसमें एक प्रावधान है: भ्रष्टाचार के आरोपों और मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित जानकारी को नहीं रोका जा सकता है.
क्या केंद्र सरकार भी आंकड़े देने में विफल रही?
इससे पहले, जनवरी 2026 में, एक आरटीआई पूछताछ के जवाब में, गृह मंत्रालय ने कहा था कि उसके पास देश भर में ‘घुसपैठियों’ के संबंध में कोई केंद्रीकृत डेटा नहीं है. मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि अवैध प्रवासियों की पहचान करने, उन्हें गिरफ्तार करने और निर्वासित करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है. दूसरे शब्दों में, केंद्र ने डेटा की जिम्मेदारी राज्यों पर डाल दी, लेकिन अब राज्य सरकार भी जानकारी देने से इनकार कर रही है.
इस विरोधाभास से उठने वाले सवाल
अब जबकि केंद्र सरकार का दावा है कि डेटा राज्यों के पास है, जबकि राज्य सरकारें आरटीआई के जवाब में वह जानकारी देने से इनकार कर रही हैं, तो सवाल उठता है: चुनावी मंचों से ‘घुसपैठियों’ के संबंध में दावे किस आधार पर किए जा रहे हैं? यह विरोधाभास न केवल सरकारी दावों की विश्वसनीयता को कम करता है बल्कि यह भी रेखांकित करता है कि ‘घुसपैठ’ जैसा संवेदनशील मुद्दा चुनावी राजनीति का अभिन्न अंग कैसे बन गया है. यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि राज्य की 126 विधानसभा सीटों के लिए मतदान 9 अप्रैल, 2026 को एक ही चरण में होना तय है, जबकि वोटों की गिनती 4 मई को होगी.
असम की सत्ता के केंद्र में सतह पर आईं भाजपा की आंतरिक दरारें
दो सप्ताह पहले, जब 17 मार्च की रात को पूर्व कांग्रेस नेता प्रद्योत बोरदोलोई का पार्टी से इस्तीफा सार्वजनिक हुआ, तो एक और खबर चर्चा का विषय बन गई: वह यह कि वे न केवल अगले दिन भाजपा में शामिल होंगे, बल्कि सत्ताधारी दल उन्हें राज्य की सत्ता के केंद्र, दिसपुर विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतारेगा.
जैसे ही 19 मार्च को बोरदोलोई की उम्मीदवारी की घोषणा हुई, भाजपा के भीतर खलबली मच गई. भाजपा के मौजूदा विधायक अतुल बोरा ने आक्रोशित होकर पत्रकारों से कहा कि यह फैसला स्वीकार्य नहीं है और वे या तो निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने पर विचार कर रहे हैं या फिर कांग्रेस की मीरा बोरठाकुर गोस्वामी को अपना समर्थन देने जैसा बड़ा कदम उठा सकते हैं. इसके बाद उनके और मीरा बोरठाकुर के बीच हुई एक मुलाकात ने हलचल पैदा कर दी, लेकिन मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के उनके घर जाकर मुलाकात करने के बाद बोरा शांत हो गए. मुख्यमंत्री ने कहा कि इसके बजाय वे (अतुल बोरा) गुवाहाटी से 2029 का लोकसभा चुनाव लड़ने पर अपना ध्यान केंद्रित करें. इसके बाद बोरा के तेवर नरम पड़े.
मगर, सुकृता बरुआ की रिपोर्ट बताती है कि कैसे बाहर से आने वाले (कांग्रेस से आए) नेताओं को तरजीह देने के कारण भाजपा के पुराने और जमीनी कार्यकर्ताओं में असंतोष पनप रहा है. ‘घुसपैठ’ और ‘स्वदेशी’ के मुद्दों के बीच पार्टी के भीतर यह ‘बाहरी बनाम पुराने’ का संघर्ष एक बड़ी चुनौती बन गया है. उनकी रिपोर्ट दिसपुर सीट के जरिए असम भाजपा में टिकट वितरण को लेकर उपजी खींचतान और उसे सुलझाने की रणनीतियों का विश्लेषण करती है.
एफपीआई निकासी 34 वर्षों में सबसे अधिक; 2026 में ₹1.8 ट्रिलियन की रिकॉर्ड विदेशी बिकवाली
‘मिंट’ में अभिनब साहा की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय शेयरों में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों के लिए, वित्तीय वर्ष 2026 एक ऐसा साल था जिसे वे भूलना ही बेहतर समझेंगे. यह अवधि वैश्विक व्यवधानों से भरी रही, जिसकी शुरुआत अमेरिका के नेतृत्व वाली टैरिफ अनिश्चितताओं से हुई और अंत अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध के बीच हुआ. प्रत्येक बाहरी झटके ने भारतीय कंपनियों की कमाई के लिए जोखिम बढ़ा दिया और पूरे वित्त वर्ष 2026 के दौरान विदेशी पूंजी की भारी निकासी को प्रेरित किया, जिससे बाजार का प्रवाह अधिक अस्थिर और रिटर्न कम अनुमानित हो गया.
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भारत पर पिछले 34 वर्षों में सबसे अधिक मंदी की स्थिति में दिखे. वित्त वर्ष 2026 में शुद्ध निकासी साल-दर-साल 42% बढ़कर लगभग ₹1.8 ट्रिलियन तक पहुंच गई—जो 1992 में डेटा उपलब्ध होने के बाद से अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है. अकेले मार्च 2026 में यह गिरावट और तेज हो गई, जिसमें ₹1.18 ट्रिलियन की भारी बिकवाली देखी गई, क्योंकि पश्चिम एशिया युद्ध ने भारत के व्यापक आर्थिक परिदृश्य को अस्थिर कर दिया और वित्त वर्ष 2027 के लिए कमाई में कटौती का जोखिम बढ़ा दिया.
मोदी को ‘अशोभनीय’ बताने पर डॉ. निमो यादव का अकाउंट ब्लॉक: ‘एक्स’ ने सरकार के आदेश पर किया
‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत अपनी दलीलों में ‘एक्स’ ने कहा है कि व्यंग्यपूर्ण हैंडल ‘डॉ. निमो यादव’ को भारत सरकार के आदेशों पर ब्लॉक कर दिया गया है. यह कार्रवाई तब की गई जब खाते को “प्रधानमंत्री से जुड़ी झूठी कहानियाँ फैलाने” और “उन्हें अशोभनीय तरीके से चित्रित करने” का दोषी पाया गया.
‘एक्स’ द्वारा अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों में 18 मार्च को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी किया गया गोपनीय ब्लॉकिंग आदेश भी शामिल था. रिपोर्ट के अनुसार, ब्लॉकिंग आदेश में कहा गया है कि डॉ. निमो यादव के अकाउंट पर मानहानिकारक पोस्ट थे, जिनमें “सरकार पर सवाल उठाने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि खराब करने के लिए” तस्वीरों, वीडियो और एआई-जनरेटेड सामग्री का उपयोग करके विवादास्पद पोस्ट बनाए गए थे.
न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि इस तरह की गलत जानकारी फैलाने से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है, जिससे आंतरिक सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है.
न्यायमूर्ति कौरव याचिकाकर्ता प्रतीक शर्मा द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रहे हैं, जिसमें सरकार के ब्लॉकिंग आदेश को प्रस्तुत करने की मांग की गई है.
अपनी याचिका में शर्मा ने कहा है कि उनके अकाउंट के लगातार ब्लॉक रहने के कारण उनकी आय का नुकसान हुआ है और उनके पेशेवर काम बाधित हुए हैं, क्योंकि यह अकाउंट उनकी आजीविका का स्रोत है.
अदालत में पेश की गई दलीलों के अनुसार, सरकार के 18 मार्च के आदेश के परिणामस्वरूप सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत 11 अन्य हैंडल्स (अकाउंट्स) को भी ब्लॉक किया गया है.
‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील ने अदालत से यह पता लगाने के लिए कुछ समय मांगा कि क्या कोई ऐसा तंत्र मौजूद है जिसके माध्यम से याचिकाकर्ता की शिकायत पर प्रभावी ढंग से विचार किया जा सके.
फेसबुक और ‘एक्स’ पर सरकार के नए ‘टेकडाउन’ आदेश; राजीव निगम, जुबैर, मोलिटिक्स और नेशनल दस्तक पर निशाना
डिजिटल कंटेंट हटाए जाने के एक नए सिलसिले में, कम से कम तीन फेसबुक पेजों — समाचार प्लेटफॉर्म मोलिटिक्स और नेशनल दस्तक, और व्यंग्यकार राजीव निगम — ने आरोप लगाया है कि सरकारी आदेशों के बाद भारत में उनके अकाउंट्स को “प्रतिबंधित” कर दिया गया है. ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर के ‘एक्स’ पर कई पोस्ट्स को भी इसी तरह की कार्रवाई का सामना करना पड़ा, जिसके बारे में फैक्ट-चेकर ने रविवार (29 मार्च) को पोस्ट किया.
‘द वायर’ के मुताबिक, सोमवार (30 मार्च) तक, इन तीनों फेसबुक पेजों पर एक संदेश दिखाई दे रहा था: “भारत में सामग्री उपलब्ध नहीं है. ऐसा इसलिए है क्योंकि हमने इस सामग्री को प्रतिबंधित करने के कानूनी अनुरोध का पालन किया है.” यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि इन आदेशों का कारण क्या था. हालाँकि, ये अकाउंट अक्सर सरकार की आलोचना करने वाली रिपोर्टों के साथ-साथ व्यंग्य और फैक्ट-चेक को बढ़ावा देने के लिए जाने जाते हैं.
फेसबुक पर मोलिटिक्स के 4.5 लाख से अधिक और ‘एक्स’ पर 67.2 हजार से अधिक फॉलोअर्स हैं. इस ‘टेकडाउन’ नोटिस के बाद, मोलिटिक्स के संपादक नीरज झा ने ‘एक्स’ पर लिखा: “जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को सच से असहजता होने लगती है, तो पत्रकारिता का स्तंभ चरमराने लगता है. पिछले कई सालों से ऐसा ही हो रहा है. और अब, हमलों की रफ्तार बढ़ गई है. @moliticsindia, जिसका उद्देश्य जनहित के मुद्दों पर चर्चा करना, लोगों की आवाज उठाना, वैज्ञानिक जागरूकता फैलाना है, पिछले कई वर्षों से इस दिशा में काम कर रहा है. उसे इसकी सजा भी मिलती रही है. एक और सजा मिल गई है. हमारे फेसबुक पेज को हमारे ही देश में प्रतिबंधित कर दिया गया है. कोई कारण नहीं बताया गया है. हम आप सभी से आग्रह करते हैं कि इस स्थिति में हमारे साथ खड़े रहें!!!!”
फेसबुक पर 14.2 लाख फॉलोअर्स वाला नेशनल दस्तक, जो खुद को एक वैकल्पिक मीडिया बताता है और दलितों, आदिवासियों, ओबीसी, महिलाओं, किसानों और अल्पसंख्यकों के शोषण के मुद्दों पर व्यापक रिपोर्टिंग करता है, उसे भी मेटा से वही नोटिस मिला है. लेखक और व्यंग्यकार राजीव निगम, जिनके फेसबुक पर 6.6 लाख से अधिक और ‘एक्स’ पर 2.2 लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं, ने कहा कि रविवार को भारत में प्रतिबंधित किए गए पेजों में उनका फेसबुक पेज भी शामिल था.
निगम, जो विभिन्न राजनीतिक मुद्दों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित प्रमुख हस्तियों के बारे में मुखर रहते हैं, ने पहले भी बताया है कि उन्हें अपने काम के कारण विरोध और कानूनी नोटिस मिलते रहते हैं. हालांकि निगम ने प्राप्त किसी भी आधिकारिक संवाद को सार्वजनिक रूप से साझा नहीं किया है, लेकिन ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में उन्होंने चिंता व्यक्त की कि उनका फेसबुक पेज भी सरकार द्वारा हटाए गए पेजों में शामिल है. उन्होंने कहा: “मेरा फेसबुक पेज भारत में लोगों को दिखाई नहीं देगा.. यह सिर्फ मेरे साथ नहीं हो रहा है, कई अन्य लोगों के साथ भी हुआ है, बिना कोई कारण बताए.... प्रिय सरकार, आप हमें क्यों नहीं बताते कि आपकी सेवा में हमारी ओर से क्या कमी रह गई थी... आप हमें केवल बोलने से नहीं रोक रहे हैं, आप हमारे सभी रास्ते बंद कर रहे हैं. आप अपनी ‘मन की बात’ जारी रखें, किसी और को बोलने न दें. खैर, हम तो बस लाचार नागरिक हैं, हम कर ही क्या सकते हैं, लेकिन आपको निर्दोषों की पुकार को अनसुना नहीं करना चाहिए... धन्यवाद, मोदी जी.”
आलोचना नहीं सहेंगे विश्वगुरु, व्यंगात्मक पोस्ट हो रहे डिलीट
खुद को ‘विश्वगुरु’ बताने वाली सरकार आलोचना को लेकर असहज दिख रही है. हाल के दिनों में केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मज़ाक उड़ाने वाले व्यंग्यात्मक कंटेंट और ऑनलाइन पोस्ट को हटाने के लिए कई आदेश जारी किए हैं.
स्क्रोल के रिपॉर्ट के अनुसार, कॉमेडियन पुलकित मणि का एक वीडियो, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी नेताओं से मिलने-जुलने के अंदाज़ पर तंज कसा था, इंस्टाग्राम पर डेढ़ करोड़ से ज्यादा बार देखा जा चुका था. इसे मार्च के मध्य में सरकारी आदेश के बाद हटा दिया गया. वीडियो हटने के दो दिन बाद यूट्यूबर ध्रुव राठी ने इसे एक छोटे परिचय के साथ फिर से पोस्ट किया.
वीडियो में उन्होंने कहा, “अगर आप मोदी की तारीफ करेंगे, तो सरकार आपकी फिल्में बड़े पर्दे पर दिखवाएगी. लेकिन अगर आप उनकी असलियत दिखाएंगे, वो भी कॉमेडी के जरिए, तो आपके वीडियो सोशल मीडिया पर रहने नहीं दिए जाएंगे.”
हाल के दिनों में मीम्स, वीडियो और कार्टून की बाढ़ आई है, जो खासकर प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत शैली वाली विदेश नीति को निशाना बना रहे हैं. इसी दौरान सरकार ने सैकड़ों पोस्ट हटाए और कई यूज़र्स के अकाउंट भी निष्क्रिय किए, जिन्होंने व्यंग्य साझा किया था. इनमें से कुछ नोटिस आई टी एक्ट 2000 के तहत जारी किए गए हैं.
प्रधानमंत्री पर व्यंग्य अब सिर्फ कॉमेडियन, कार्टूनिस्ट या पत्रकारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विपक्ष भी इसमें शामिल हो गया है. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते भारत में गैस सिलेंडर की कमी हुई, तो विपक्ष ने इसे लेकर भी व्यंग्य का सहारा लिया.
कांग्रेस कार्यकर्ता पाइप और चूल्हे लेकर सड़कों पर उतरे और सीवर से गैस निकालने का प्रदर्शन किया. उनका कहना था कि वे मोदी के 2018 के उस भाषण से प्रेरित हैं, जिसमें उन्होंने एक चायवाले की ऐसी तकनीक की तारीफ की थी.
‘विश्वगुरु’ नैरेटिव पर सवाल
पत्रकार जी संपथ के मुताबिक, पश्चिम एशिया का युद्ध इस व्यंग्य की लहर की बड़ी वजह है. उन्होंने कहा कि मोदी की “हग डिप्लोमेसी, मेडल और फोटो-ऑप्स” वाली विदेश नीति पर अब ज्यादा ध्यान जा रहा है.
उनके अनुसार, इससे कई भारतीयों के मन में सवाल उठने लगे हैं, जो अब तक मानते थे कि मोदी के नेतृत्व में भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है.
“अगर भारत इतना प्रभावशाली है, तो क्या हमें वह मिल रहा है जो हम चाहते हैं? क्या हम अपनी वैश्विक स्थिति का फायदा उठा पा रहे हैं?” उन्होंने पूछा.
कांग्रेस का कहना है कि यह सवाल पिछले साल मई में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद उभरने लगे जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान युद्ध रोकने के दावों में मोदी को असहज स्थिति में डाल दिया. इसके बाद ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर 50% टैरिफ लगाने से भी प्रधानमंत्री की छवि को झटका लगा.
पश्चिम एशिया संकट को लेकर विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार की रणनीति कमजोर रही. प्रधानमंत्री इज़राइल के दौरे पर गए, ठीक उससे पहले जब इज़राइल ने ईरान पर हमला किया.
भाजपा प्रवक्ता आरपी सिंह ने माना कि सोशल मीडिया पर पार्टी फिलहाल दबाव में दिख रही है, लेकिन उनका कहना है कि गैस आपूर्ति सुधरने के बाद स्थिति सामान्य हो जाएगी. उन्होंने यह भी कहा कि सरकार सिर्फ वही कंटेंट हटाती है जो तथ्यात्मक रूप से गलत हो और “घबराहट फैलाने” के लिए बनाया गया हो.
नेपाल: ‘जेन-ज़ी’ विरोध प्रदर्शनों पर कार्रवाई; पूर्व प्रधानमंत्री ओली के बाद चार और हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारियां
मंगलवार को काठमांडू के पूर्व मुख्य जिला अधिकारी छबि रिजाल की गिरफ्तारी, 2025 के नेपाल विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ की गई कार्रवाई में चौथी हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारी है. इस कार्रवाई की शुरुआत शनिवार को अपदस्थ पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को हिरासत में लेने के साथ हुई थी.
‘एजेंसियों’ के अनुसार, ताज़ा गिरफ्तारी उस आंदोलन के दमन की जवाबदेही तय करने के लिए विस्तृत होती जांच का संकेत देती है, जिसने देश को हिलाकर रख दिया था और जिसमें कम से कम 76 लोगों की जान गई थी, जिनमें से अधिकतर युवा प्रदर्शनकारी थे.
पूर्व पुलिस प्रमुख चंद्र कुबेर खापुंग को 28 मार्च को ओली के साथ गिरफ्तार किया गया था. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, जांच पैनल ने उन पर “लापरवाह आचरण” और घंटों तक चलने वाली पुलिस फायरिंग को रोकने में विफल रहने का आरोप लगाया है. ओली की गिरफ्तारी के एक दिन बाद, पूर्व ऊर्जा, जल संसाधन और सिंचाई मंत्री दीपक खड़का को मुख्य रूप से मनी लॉन्ड्रिंग और वित्तीय कदाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया. स्थानीय मीडिया ने बताया कि अशांति के दौरान खड़का के आवास पर जले हुए नोटों के टुकड़े मिले थे, जिससे वित्तीय अनियमितताओं की जांच शुरू हुई. पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को शनिवार को ओली के साथ ही गिरफ्तार किया गया था. ये गिरफ्तारियां तब हुईं जब नवनिर्मित बालेंद्र शाह सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में जांच आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का निर्णय लिया.
2013 के दंगों का ‘चेहरा’ संजीव बालियान यूपी चुनाव से पहले भाजपा के लिए सिरदर्द बने
पूर्व सांसद और भाजपा के मुखर नेता संजीव बालियान, जो 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में उभार का मार्ग प्रशस्त करने वाले 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के प्रमुख आरोपी थे, ने उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव से मुश्किल से एक साल पहले परोक्ष रूप से अपनी ही पार्टी को चुनौती दी है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के सबसे प्रमुख हिंदुत्व और जाट नेता, 53 वर्षीय बालियान ने रविवार को घोषणा की कि वह अपने और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली जाट समुदाय के साथ किए गए “अपमान को कभी नहीं भूलेंगे”. पीयूष श्रीवास्तव के अनुसार, उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन किसी को इस बात में कोई संदेह नहीं था कि उनका निशाना उनकी अपनी ही पार्टी और उसकी सरकार थी. एक हताश बालियान — जो 2024 में अपनी मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर हार के लिए संगीत सोम (जो जनमानस में 2013 के दंगों का दूसरा चेहरा माने जाते हैं) द्वारा की गई ‘भीतरघात’ को जिम्मेदार मानते हैं — पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने गढ़ में भाजपा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं.
पूर्व केंद्रीय मंत्री बालियान ने मेरठ जिले के एक मंच से अपनी चेतावनी जारी की, जिसे उन्होंने दो विपक्षी जाट नेताओं — पंजाब के ‘आप’ मुख्यमंत्री भगवंत मान और भाजपा छोड़ चुके हनुमान बेनीवाल के साथ साझा किया था. मान ने अपने भाषण में बालियान की मौजूदगी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक भी उड़ाया.
यह आयोजन — ‘अंतरराष्ट्रीय जाट संसद’ — 18वीं शताब्दी के राजस्थान के भरतपुर के जाट शासक सूरजमल की प्रतिमा के अनावरण के लिए था, जिनका साम्राज्य पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ था.
सकोटी टांडा गांव के हितकारी किसान इंटर कॉलेज में मौजूद जनसमूह को संबोधित करते हुए बालियान ने कहा, “कुछ लोगों ने सभा में हमारे रास्ते में बाधाएं खड़ी कीं. हम सभी उन लोगों को जानते हैं जो हमारे समुदाय का अपमान करने के लिए ऐसा कर रहे हैं. हमें इसे याद रखना होगा और समय आने पर कार्रवाई करनी होगी.”
पुलिस ने कार्यक्रम स्थल पर (भगवंत) मान के हेलीकॉप्टर को उतरने से रोक दिया था, जिसके कारण उन्हें 10 किमी दूर से कार द्वारा वहां लाना पड़ा. इसके अलावा, स्थानीय प्रशासन ने कथित तौर पर बैठक की अनुमति देने में भी देरी की.
बालियान ने कहा, “आप सभी जानते हैं कि किसके आदेश पर हमारे खिलाफ ये चीजें हो रही हैं. हम इस अपमान को ब्याज सहित लौटाएंगे... जाट समुदाय जल्द ही उन्हें सबक सिखाएगा.”
2013 के दंगा मामले के दो प्रमुख आरोपी बालियान और सोम — जिन पर हिंसा भड़काने वाले नफरती भाषण देने का आरोप था — हाल के वर्षों में एक-दूसरे के विरोधी हो गए हैं. अपने जाट प्रतिद्वंद्वी के साथ क्षेत्र के प्रमुख हिंदुत्व नेता के रूप में खुद को पेश करने की दौड़ में सोम को अपने सजातीय राजपूत, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का समर्थन प्राप्त है. आम धारणा यह है कि सोम इस दौड़ में जीत रहे हैं.
2013 में सोम की भूमिका तुलनात्मक रूप से गौण थी, जब बालियान ने मुजफ्फरनगर दंगों के बाद देश के बड़े हिस्से में मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने में भाजपा की मदद की थी. उन दंगों में लगभग 60 लोग मारे गए थे और 50,000 परिवार विस्थापित हुए थे. दंगों ने 2014 के आम चुनाव से पहले भाजपा के लिए अनुकूल राजनीतिक माहौल तैयार किया था.
बालियान ने बाद में 2014 से 2017 तक और 2019 से 2024 तक मोदी सरकार में विभिन्न विभागों के राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया.
लखनऊ में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “बालियान का गुस्सा भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है. मान और बेनीवाल के साथ मंच साझा करना एक अच्छा विचार नहीं था.”
“हमें यह पसंद नहीं आया कि जिस तरह मान ने उसी मंच से मोदी पर हमला किया और बालियान मुस्कुराते हुए देखे गए. हमने इस कार्यक्रम का एक वीडियो केंद्रीय भाजपा नेतृत्व को भेज दिया है.”
मान ने मोदी का नाम लिए बिना कहा था: “मैं चाहता हूं कि बालियान जी अपने कान बंद कर लें... वह (मोदी) विश्व गुरु बनना चाहते थे लेकिन ‘विश्व चेला’ बन गए. (अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड) ट्रंप उन्हें आदेश देते हैं कि भारत को किससे पेट्रोल खरीदना चाहिए.”
मान इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे. राजस्थान के नागौर से राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सांसद बेनीवाल ने 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान भाजपा छोड़ दी थी. उन्होंने अपने राज्य की भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार में पूरी तरह डूबे होने का आरोप लगाया था.
जयपुर का स्वाद नहीं, जाति बोलती है.
जयपुर के फूड सीन (खानपान के परिदृश्य) को अक्सर “हेरिटेज (विरासत)” और “कल्चर (संस्कृति)” के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन इस चमक के नीचे एक सख्त सच्चाई छिपी है. यहां खाना सिर्फ स्वाद नहीं, जाति का विस्तार है.
रूपाशी सेमल्टी की रिपोर्ट के अनुसार, पुराने शहर की गलियों में वेजिटेरियन (शाकाहारी) होना सिर्फ एक पसंद नहीं, बल्कि सामाजिक नियम है. त्रिपोलिया और जौहरी बाज़ार के ऊपर बने नए कैफे भले फ्यूज़न मेन्यू परोसते हों, लेकिन नॉन-वेज (मांसाहार) वहां आज भी गायब है. वजह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि वह जातिगत ढांचा है जो सदियों पहले बसाया गया था.
1727 में सवाई जय सिंह द्वितीय ने जब शहर बसाया, तो बनिया और जैन व्यापारियों को केंद्र में रखा. उनकी जीवनशैली खासतौर पर शुद्ध शाकाहार धीरे-धीरे सार्वजनिक मानक बन गई. नतीजा यह हुआ कि शहर के भीतर “क्या खाया जाएगा” यह सिर्फ मार्केट नहीं, बल्कि जाति तय करने लगी.
इतिहासकार तमघ तंवर इसे “इंजीनियर्ड फूड कल्चर (निर्मित खानपान संस्कृति)” कहते हैं. यानी यह नैचुरल नहीं, बल्कि सत्ता और सामाजिक वर्चस्व का नतीजा है.
मांसाहार पूरी तरह गायब नहीं हुआ, बल्कि हाशिए पर चला गया. मुस्लिम इलाकों और शहर के बाहर यह खुले में दिखता है, जबकि उच्च जातियों के लिए यह अक्सर निजी स्थान में छिपा हुआ है.
जैसा कि भीमराव आंबेडकर ने कहा था, साथ खाना या न खाना, जाति व्यवस्था को बनाए रखने का सबसे मजबूत औज़ार है. जयपुर इसका जीवंत उदाहरण है.
नया जयपुर, वैशाली नगर, मालवीय नगर इन सीमाओं को तोड़ता दिखता है, जहां नॉन-वेज रेस्टोरेंट ( और मिश्रित खानपान संस्कृति बढ़ रहा है. लेकिन पुराने शहर की दीवारों के भीतर यह बदलाव अब भी सीमित है.
आज “राजस्थानी हेरिटेज” के नाम पर जो परोसा जा रहा है लाल मांस या दाल-बाटी वह भी दरअसल खास जातियों की परंपरा है. दलित और मार्जिनलाइज़्ड कम्युनिटीज़ (हाशिए के समुदायों) का खानपान अब भी अदृश्य है.
जयपुर का खानपान का परिदृश्य एक सीधा सवाल छोड़ता है क्या हम खाना खा रहे हैं, या जाति व्यवस्था को दोहरा रहे हैं.
विरोध प्रदर्शनों के बीच ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी
मकतूब मीडिया के अनुसार, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की मान्यता, अधिकारों और संरक्षण को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे में व्यापक बदलाव किए गए हैं, को भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की सहमति मिल गई है. यह विधेयक पिछले सप्ताह संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया था. राष्ट्रपति के मंजूरी के बाद अब यह आधिकारिक तौर पर एक अधिनियम के रूप में लागू हो चुका है.
यह अधिनियम ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 में संशोधन करता है. यह इस बात को पुनः परिभाषित करता है कि किसे “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” माना जाएगा, साथ ही जबरन पहचान परिवर्तन और शारीरिक नुकसान जैसे गंभीर अपराधों से निपटने के लिए दंडात्मक प्रावधानों को भी मजबूत करता है.
हालांकि, इस कानून को विपक्षी दलों और ट्रांसजेंडर समुदाय के संगठनों की आलोचना का सामना करना पड़ा है. उनका कहना है कि विधेयक पेश करने से पहले संबंधित पक्षों से पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक समिति, जिसकी अध्यक्षता पूर्व दिल्ली हाई कोर्ट की जज जस्टिस आशा मेनन कर रही थीं, ने भी सरकार से इस विधेयक को वापस लेने की सिफारिश की. समिति ने कई प्रावधानों पर चिंता जताई और पुनर्विचार की मांग की.
सबसे ज्यादा विवाद इस बात को लेकर है कि संशोधन में “स्व-पहचान” के अधिकार को हटा दिया गया है और उसकी जगह मेडिकल सर्टिफिकेशन अनिवार्य कर दिया गया है. आलोचकों का कहना है कि यह 2014 के सुप्रीम कोर्ट के नालसा फैसले के सिद्धांतों के खिलाफ है.
अब पहचान के लिए एक तय प्रक्रिया होगी, जिसमें मेडिकल बोर्ड का प्रमाणपत्र जरूरी होगा. इसके आधार पर जिला मजिस्ट्रेट पहचान पत्र जारी करेंगे.
संशोधन में दंड प्रावधानों को भी कड़ा किया गया है. गंभीर अपराधों के लिए सज़ा बढ़ाई गई है. किसी को जबरन ट्रांसजेंडर बनाने या गंभीर नुकसान पहुंचाने पर कम से कम 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है.
हेट स्पीच मामले में भाजपा नेता नितेश राणे के खिलाफ शिकायत दर्ज
स्क्रोल के अनुसार, महाराष्ट्र के मंत्री और भाजपा नेता नितेश राणे एक बार फिर विवादों में हैं. मुंबई के मालवणी इलाके में राम नवमी जुलूस के दौरान दिए गए उनके बयान को लेकर उनके खिलाफ शिकायत दर्ज की गई है.
स्थानीय निवासी शानुल सैयद ने मालवणी पुलिस स्टेशन में शिकायत करते हुए आरोप लगाया कि राणे का भाषण “उकसाने वाला, भड़काऊ और मुसलमानों के लिए आहत करने वाला” था. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में राणे कहते दिखते हैं कि “भगवा झंडे को बुरी नजर से देखने वालों की आंखें निकाल दी जाएंगी और उनसे “कंचे खेलेंगे”.
यह बयान ऐसे समय आया है जब इलाके में पहले से तनाव का माहौल था. एक दिन पहले मस्जिद के पास भगवा झंडा लगाने को लेकर कथित तौर पर झड़प हुई थी, जिसका वीडियो भी वायरल हुआ.
अपने भाषण में राणे ने यह भी कहा कि “कुछ लोग शायद भूल गए हैं कि यह हिंदू राष्ट्र है” और “यह किसी के बाप का पाकिस्तान नहीं है”. इन बयानों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है.
यह पहली बार नहीं है जब राणे ऐसे विवादों में घिरे हों. इससे पहले भी वे कई बार मुस्लिम समुदाय को लेकर तीखे और विवादित बयान दे चुके हैं. नासिक कुंभ में गैर-हिंदुओं को दुकान न देने की मांग से लेकर मदरसों और अजान को लेकर दिए गए बयान तक, उनके कई पुराने बयान चर्चा में रहे हैं.
शिकायत में यह भी कहा गया है कि मुंबई महानगर क्षेत्र में उनके खिलाफ कई एफआईआर पहले से दर्ज हैं, जिनमें कुछ हाल के सालों की हैं.
ईरान युद्ध का 32वां दिन:
अमेरिका का दावा - ईरान की सैन्य शक्ति हुई पस्त, पर जवाबी हमले की क्षमता अब भी बाकी
न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए पेंटागन से रिपोर्ट करते हुए बताया गया है कि अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने मंगलवार को स्वीकार किया कि एक महीने से जारी अमेरिका-इजरायली बमबारी के बावजूद ईरान के पास पलटवार करने की क्षमता सुरक्षित है. हालांकि, करीब दो हफ्तों में अपनी पहली सार्वजनिक ब्रीफिंग में उन्होंने दोहराया कि ईरान की सैन्य ताकत को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया गया है.
पेंटागन में जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल डैन केन के साथ पत्रकारों से बात करते हुए हेगसेथ ने कहा, “वे कुछ मिसाइलें छोड़ेंगे और हम उन्हें मार गिराएंगे.” उन्होंने यह भी दावा किया कि अमेरिका जीत के “अब तक के सबसे करीब” है, जबकि राष्ट्रपति ट्रंप युद्ध के उद्देश्यों को लेकर विरोधाभासी संदेश दे रहे हैं. जनरल केन ने जानकारी दी कि अमेरिकी सेना ने पहली बार ईरानी सरज़मीं के ऊपर B-52 बॉम्बर मिशन शुरू किए हैं, जो इस बात का संकेत है कि ईरान का हवाई रक्षा तंत्र काफी हद तक ध्वस्त हो चुका है. अब अमेरिकी विमानों का ध्यान ईरान की मिसाइल, ड्रोन और नौसेना निर्माण सुविधाओं की सप्लाई चेन को काटने पर है.
इसी बीच, अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत 4 डॉलर प्रति गैलन के पार पहुँच गई है, जो अगस्त 2022 के बाद का उच्चतम स्तर है. फरवरी के अंत में युद्ध शुरू होने के बाद से गैस की कीमतों में 35 फीसदी का उछाल आया है, जो ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गया है.
मारुको रूबियो का बड़ा बयान: “हफ्तों में हासिल कर लेंगे जंग के मकसद”, तेहरान और इस्फहान धमाकों से दहले
अल जज़ीरा की रिपोर्टर एलिजाबेथ मेलिमोपोलोस की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों का आज 32वां दिन है. अमेरिकी विदेश मंत्री मारुको रूबियो ने अल जज़ीरा को दिए एक विशेष इंटरव्यू में कहा कि तेहरान और वाशिंगटन के बीच मध्यस्थों के ज़रिए बातचीत जारी है. उन्होंने विश्वास जताया कि अमेरिका अपने युद्ध के लक्ष्यों को महीनों में नहीं, बल्कि “हफ्तों” में हासिल कर लेगा.
दूसरी ओर, राष्ट्रपति ट्रंप ने धमकी दी है कि यदि जल्द ही कोई समझौता नहीं हुआ, तो वे ईरान के मुख्य तेल निर्यात केंद्र ‘खार्ग द्वीप’, तेल के कुओं और बिजली संयंत्रों को तबाह कर देंगे. ज़मीनी हकीकत यह है कि तेहरान और इस्फहान जैसे शहरों में शक्तिशाली धमाकों की खबरें मिल रही हैं. वहीं, ईरान ने पलटवार करते हुए दुबई बंदरगाह पर खड़े एक कुवैती तेल टैंकर ‘अल-सलमी’ पर “सीधा और आपराधिक” हमला किया है, जिससे उसमें आग लग गई.
सऊदी अरब ने भी दावा किया है कि उसने रियाद और तेल समृद्ध पूर्वी प्रांत की ओर दागी गई कम से कम 8 बैलिस्टिक मिसाइलों को बीच में ही मार गिराया है. खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव के बीच मिस्र के राष्ट्रपति अल-सिसी ने ट्रंप से युद्ध रोकने की भावुक अपील करते हुए कहा, “कृपया हमारी मदद करें, आप इसे रोकने में सक्षम हैं.” युद्ध के वैश्विक असर के कारण बांग्लादेश ने ऊर्जा संकट से निपटने के लिए सरकारी कार्यालयों में एसी और लाइटें कम करने के आदेश दिए हैं, जबकि नॉर्वे ने तेल पर टैक्स घटा दिया है.
लेबनान और ईरान में मानवीय संकट: हज़ारों की मौत और बढ़ती गरीबी का साया
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और विभिन्न मानवाधिकार संस्थाओं की रिपोर्टों के हवाले से खबरों में बताया गया है कि युद्ध की मानवीय कीमत भयावह होती जा रही है. ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, ईरान में युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक कम से कम 1,574 नागरिक मारे गए हैं, जिनमें 236 बच्चे शामिल हैं. लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि इजरायल और हिजबुल्लाह की जंग में अब तक 1,260 से अधिक लेबनानी अपनी जान गंवा चुके हैं.
इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने स्पष्ट किया है कि उनकी योजना दक्षिणी लेबनान के सैकड़ों गांवों को नष्ट करने और लाखों लोगों को विस्थापित करने की है. इजरायली सेना ‘लितानी नदी’ तक के पूरे इलाके पर नियंत्रण बनाए रखने की तैयारी में है. इस बीच, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने एक डरावना अनुमान पेश किया है. रिपोर्ट के अनुसार, इस युद्ध का केवल एक महीना अरब दुनिया के 40 लाख और लोगों को गरीबी में धकेल सकता है और पूरे क्षेत्र की आर्थिक पैदावार में 6 फीसदी तक की कटौती कर सकता है. अमेरिकी सेना में भी आंतरिक असंतोष उभर रहा है; 200 से अधिक सैनिकों ने शिकायत की है कि उनके वरिष्ठ अधिकारी इस युद्ध को जायज़ ठहराने के लिए धार्मिक शब्दावली का इस्तेमाल कर रहे हैं.
ट्रंप की सहयोगियों को दो टूक: ‘अपना तेल खुद बचाओ, अमेरिका अब मदद नहीं करेगा’
एक्सियोस के रिपोर्टर बराक राविद की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को यूरोपीय सहयोगियों पर ज़ोरदार हमला बोला. ट्रंप ने शिकायत की कि अमेरिका-ईरान युद्ध में ये देश अमेरिका का साथ नहीं दे रहे हैं. उन्होंने साफ़ संकेत दिया कि ‘स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़’ को फिर से खोलने की जिम्मेदारी अब इन देशों की अपनी होगी.
यह पिछले कुछ दिनों में तीसरा मौका है जब ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वे हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोले बिना ही युद्ध समाप्त कर सकते हैं. इसका मतलब है कि दुनिया की तेल आपूर्ति का पांचवां हिस्सा जिस रास्ते से गुज़रता है, उसे बहाल करने के लिए अमेरिका अब अन्य देशों को उनके हाल पर छोड़ सकता है. जब रक्षा सचिव पीट हेगसेथ से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने भी इसे अमेरिका की मुख्य जिम्मेदारी मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा, “जब राष्ट्रपति बोलते हैं, तो बाकी देशों को ध्यान देना चाहिए.”
ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा, “यूनाइटेड किंगडम जैसे देश, जिन्होंने ईरान के खात्मे में हमारा साथ देने से इनकार कर दिया और अब उन्हें जेट ईंधन नहीं मिल पा रहा है, उनके लिए मेरे पास दो सुझाव हैं: पहला, अमेरिका से तेल खरीदें, हमारे पास बहुत है. दूसरा, थोड़ी हिम्मत जुटाएं, जलडमरूमध्य में जाएं और उसे खुद छीन लें.” उन्होंने आगे जोड़ा कि अमेरिका अब मदद के लिए वहां नहीं होगा और इन देशों को खुद के लिए लड़ना सीखना होगा.
ट्रंप ने फ्रांस पर भी निशाना साधा क्योंकि फ्रांस ने इजरायल को गोला-बारूद ले जा रहे अमेरिकी विमानों को अपने हवाई क्षेत्र से गुज़रने की अनुमति नहीं दी थी. गौर करने वाली बात यह है कि स्पेन और इटली ने भी अपने सैन्य ठिकानों या हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. हालांकि विदेश मंत्री मारुको रूबियो ने संकेत दिया है कि युद्ध के बाद एक अंतरराष्ट्रीय टास्क फ़ोर्स बनाई जा सकती है, लेकिन ट्रंप के ताज़ा बयानों ने सहयोगियों की चिंता बढ़ा दी है.
ट्रंप की ‘बेखौफ जंग’: ईरान के पानी और बिजली ठिकानों को तबाह करने की धमकी
एक्सियोस की एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के पानी की आपूर्ति और बिजली घरों को बम से उड़ाने की धमकी दी है. अगर ऐसा होता है, तो यह युद्ध के उन अंतरराष्ट्रीय नियमों का सबसे बड़ा उल्लंघन होगा जो नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं.
ईरान युद्ध इस बात का परीक्षण बन गया है कि ट्रंप की “पॉलिटिकली करेक्ट” न होने वाली युद्ध नीति असल में कैसी दिखती है. ट्रंप प्रशासन पहले ही राजनीतिक नेताओं की हत्याओं को मंजूरी दे चुका है और अब नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की बात कर रहा है. जेनेवा कन्वेंशन के तहत पीने के पानी की सुविधाओं और नागरिकों को सामूहिक सजा देना युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है.
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा, “ईरान के लिए सबसे अच्छा कदम समझौता करना है, वरना अमेरिका के पास ऐसी क्षमताएं हैं जिनकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते.” रक्षा सचिव पीट हेगसेथ पहले ही कह चुके हैं कि सेना को अस्सी साल पुराने नियमों से नहीं बंधना चाहिए. हेगसेथ ने पेंटागन के उस कार्यक्रम को भी खत्म कर दिया है जो नागरिक हताहतों को रोकने के लिए काम करता था. रिपोर्टों के अनुसार, युद्ध के पहले ही दिन एक प्राइमरी स्कूल पर हुए अमेरिकी हमले में 165 लोग मारे गए थे, जिनमें ज्यादातर लड़कियां थीं. विशेषज्ञ इसे “ताकत ही अधिकार है” के सिद्धांत के रूप में देख रहे हैं.
सऊदी बेस पर अमेरिकी रडार विमान नष्ट: ईरान की बढ़ती ताकत ने उड़ाए होश
द गार्जियन के रिपोर्टर पीटर ब्यूमोंट के अनुसार, सऊदी अरब के ‘प्रिंस सुल्तान एयरबेस’ पर ईरान के एक सटीक हमले में अमेरिका का एक अत्यंत महत्वपूर्ण E-3 सेंट्री (AWACS) रडार विमान नष्ट हो गया है. यह विमान अमेरिका की “आंख और कान” माना जाता था, जो 600 लक्ष्यों पर एक साथ नज़र रख सकता था.
इस हमले ने दो बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं: पहला, इतने कीमती विमान को बिना सुरक्षा के क्यों छोड़ा गया? और दूसरा, ईरान इतनी सटीकता से हमला कैसे कर पाया? यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने एक बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि यूक्रेनी खुफिया जानकारी के अनुसार, हमले से पहले एक रूसी जासूसी उपग्रह ने इस बेस की तीन बार तस्वीरें ली थीं. जेलेंस्की ने कहा, “तीसरी बार तस्वीर लेने का मतलब है कि एक-दो दिन में हमला होने वाला है.”
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान अब सीधे तौर पर अमेरिकी वायुसेना के मददगार सिस्टम जैसे रडार और सहायक विमानों को निशाना बना रहा है. इस हमले में न केवल विमान तबाह हुआ, बल्कि अमेरिकी सैनिक भी घायल हुए हैं. यह घटना दर्शाती है कि एक महीने की बमबारी के बाद भी ईरान की हमला करने की क्षमता कम नहीं हुई है.
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