आकार पटेल: एक कमज़ोर राष्ट्र के रूप में हमने दब्बू बने रहना चुना है
जहाँ सच्चे राष्ट्रीय हितों का सवाल उठता है, जहाँ विरोध करना मुश्किल और बात मानना आसान होता है, वहाँ हम अक्सर और शायद हमेशा घुटने टेक देते हैं. रूसी तेल मत खरीदो. जी सर. रूसी तेल खरीदो. ठीक है सर. कोई ईरानी तेल नहीं. जी सर. अब अमेरिका को हमें यह बताने की भी ज़रूरत नहीं है कि हमें क्या कहना है या क्या नहीं कहना है. हम अपने दिल में जानते हैं कि ईरान के इस बेवकूफ़ी भरे युद्ध पर सच बोलने से ट्रम्प नाराज़ हो जाएँगे और इसलिए हम दूसरी तरफ़ देखने लगते हैं, क्योंकि अगर हम उस दबंग की आँखों में आँखें डालेंगे, तो वह हमें सीधा कर देगा.
रीथ लेक्चर्स 2 : कैसे शुरू करें एक नैतिक क्रांति
इतिहास उन लोगों द्वारा नहीं बदला जाता है जिनका अपना कोई दांव नहीं लगा है, निंदकों द्वारा नहीं जो समझाते हैं कि चीज़ें कभी काम क्यों नहीं करेंगी, या चतुर आवाज़ों द्वारा जो हर ख़ामी को इंगित करते हैं, कुछ ऐसा जो मैंने विशेष रूप से अक्सर पत्रकारों के बीच देखा है. परिवर्तन उन लोगों से आता है जो शर्मिंदगी का जोख़िम उठाते हैं, जो ग़लतियाँ करते हैं, जो गिर जाते हैं और फिर से खड़े हो जाते हैं. वो वे हैं जो अपने आराम से बड़े किसी उद्देश्य के लिए ख़ुद को समर्पित करने का साहस करते हैं. कभी वो जीतते हैं. अक्सर वो असफल हो जाते हैं.
रटगर ब्रैगमैन का तीसरा भाषण : सरकार सिर्फ चेक नहीं काटती. वह सबसे बड़े, सबसे साहसी जोखिम उठा सकती है.
रटगर ब्रैगमैन ने बीबीसी रीथ लेक्चर्स का तीसरा हिस्सा स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबरा यूनिवर्सिटी में पढ़ा. यह राजधानी शहर ब्रैगमेन के लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि किसी ज़माने में यह ‘स्कॉटिश एनलाइटनमेंट’ (स्कॉटिश ज्ञानोदय) का पालना हुआ करता था. एडिनबरा यूनिवर्सिटी में 18वीं और 19वीं सदी के दौरान, सदाचार या ‘वर्च्यू’ के विचारों ने उस दौर के सबसे महान विचारकों को घेरे रखा था. अब, 21वीं सदी में, वही सदाचार का विचार रटगर ब्रैगमैन की ‘नैतिक क्रांति’ सीरीज़ के केंद्र में है. वह पूछ रहे हैं कि हम अच्छाई को फिर से फैशनेबल कैसे बना सकते हैं? अब यह सवाल सुनने में तो बहुत सरल लगता है, लेकिन क्या इसका जवाब भी उतना ही सीधा है? अपनी बात बेबाकी से रखने के लिए मशहूर, रटगर ब्रैगमैन हमारे सोचने और जीने के तरीके में पूरी तरह से बदलाव की वकालत कर रहे हैं. उनका मानना है कि आम लोगों के छोटे-छोटे समूह अगर साथ मिलकर काम करें, तो वे पूरी दुनिया को बदल सकते हैं. इस तीसरे लेक्चर का शीर्षक है, ‘अ कॉन्सपिरेसी ऑफ डीसेंसी’ यानी ‘शराफ़त की साज़िश’.
रटगर ब्रेगमन का 2025 का चौथा और अंतिम रीथ लेक्चर
यह रटगर ब्रेगमन का 2025 का चौथा और अंतिम रीथ लेक्चर है, जो स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी, सिलिकॉन वैली के केंद्र में दिया गया था. इस व्याख्यान में ब्रेगमन अपनी किशोरावस्था के दार्शनिक संकट से लेकर बर्ट्रेंड रसेल से प्रेरणा, मानव विकास की कहानी, और आज के डिजिटल युग में मानवता के सामने आने वाली चुनौतियों तक का सफ़र तय करते हैं. वे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया के खतरों पर चर्चा करते हुए यह सवाल उठाते हैं कि इस तकनीकी क्रांति के दौर में हमें क्या पवित्र मानना चाहिए और मानवता की रक्षा कैसे करनी चाहिए. यह व्याख्यान धर्म के पाँच मूलभूत सवालों - हम कौन हैं, हम कहाँ से आए हैं, हम कहाँ जा रहे हैं, हमें कैसे जीना चाहिए, और क्या पवित्र है - के इर्द-गिर्द घूमता है. मोरल रेवोल्यूशन नाम की अपनी व्याख्यान श्रृंखला में, उन्होंने पहले ही हमारे राजनीतिक अभिजात वर्ग को उनके पतन और गैर-गंभीरता के लिए फटकार लगाई है. उन्होंने कहा कि इतिहास हमें बहुत कुछ सिखाता है कि कैसे छोटे समूह संगठित होकर दुनिया को बदल सकते हैं और कैसे व्यक्ति पूरी तरह से हमारे जीवन जीने के तरीके को फिर से ढाल सकते हैं, कभी-कभी बहुत ही क्रांतिकारी तरीकों से. अब, यह भाषण बिग टेक के बारे में केंद्रित है. क्या यह नियंत्रण से बाहर है? क्या यह मानव होने का सार ही खतरे में डाल रहा है? उन्होंने इस व्याख्यान को मशीन के युग में मानवता के लिए संघर्ष नाम दिया है. पहले तीन लैक्चर हिंदी में आप यहां, यहां और यहां पढ़ सकते हैं.