रिबॉर्न मनीष | 2012 तक भारत में लोकतंत्र था. अब तंत्र, लोक के ऊपर चढ़ा हुआ दिखाई देता है
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं रिबॉर्न मनीष ने देश में एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आए परिसीमन पर विस्तार से बातचीत की. चर्चा की शुरुआत इस सवाल से हुई कि संसद के मानसून सत्र के दौरान परिसीमन को लेकर अचानक राजनीतिक हलचल क्यों बढ़ी और क्या सरकार लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रही है. रिबॉर्न मनीष का कहना था कि यह कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं है, बल्कि इसकी तैयारी कई वर्षों से चल रही है. उन्होंने नए संसद भवन की 888 सीटों की क्षमता, 2021 की जनगणना में हुई देरी और 2026 में समाप्त होने वाले परिसीमन संबंधी प्रावधानों को इसी परिप्रेक्ष्य में जोड़कर देखा.
बातचीत का सबसे अहम हिस्सा जेरीमैंडरिंग की अवधारणा पर केंद्रित रहा. रिबॉर्न मनीष ने ग्राफिक्स और उदाहरणों के जरिए समझाया कि किस प्रकार निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव कर चुनावी परिणामों को प्रभावित किया जा सकता है. उनका दावा था कि यदि बूथ स्तर के मतदान के आंकड़ों का उपयोग सीमांकन में किया जाए, तो समर्थक और विरोधी मतदाताओं को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में इस तरह बांटा जा सकता है कि किसी एक दल को अधिक राजनीतिक लाभ मिले. इस संदर्भ में उन्होंने अमेरिका की चुनावी व्यवस्था और वहां प्रचलित जेरीमैंडरिंग का उदाहरण भी दिया.
चर्चा के दौरान उत्तर और दक्षिण भारत के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी विस्तार से बात हुई. रिबॉर्न मनीष ने कहा कि यदि भविष्य में जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण होता है, तो उत्तर भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है. इसी क्रम में उन्होंने जम्मू-कश्मीर और असम में हुए परिसीमन का उल्लेख करते हुए कहा कि सीमांकन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव वाला निर्णय भी बन सकता है.
कार्यक्रम के अंतिम हिस्से में चुनाव आयोग, मतदाता सूची, नागरिकता सत्यापन, ईवीएम, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संघीय ढांचे जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई. दोनों वक्ताओं का मत था कि परिसीमन केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, मतदाता अधिकार और भारत की राजनीतिक संरचना से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. उन्होंने इस विषय पर व्यापक सार्वजनिक बहस और पारदर्शी प्रक्रिया की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि किसी भी बड़े बदलाव को लेकर नागरिकों के बीच स्पष्टता बनी रहे.

