पिछले 4 वर्षों में राजनीतिक दलबदल से तीन दलों को सबसे अधिक लाभ हुआ, भाजपा उनमें से एक है

‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पिछले चार वर्षों में अन्य दलों के नेताओं को अपने पाले में शामिल करने के मामले में नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ), भाजपा और नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) शीर्ष पर हैं.

अर्णब गांगुली ने रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि 2022 से 2026 के बीच 26 लोकसभा सांसद, सात राज्यसभा सांसद और 78 विधायक दूसरी पार्टियों में शामिल हुए. एनपीएफ, भाजपा और एनसीपीआई को नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी), ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस की कीमत पर फायदा हुआ.

एनडीपीपी, तृणमूल और कांग्रेस ने मिलकर अपने लगभग 58 प्रतिशत चुने हुए प्रतिनिधियों को एनपीएफ, भाजपा और एनसीपीआई के हाथों खो दिया. नागालैंड में भाजपा के साथ शासन कर रही और भाजपा शासित मणिपुर में गठबंधन सहयोगी एनपीएफ को पिछले साल अक्टूबर में एनडीपीपी के इसमें विलय के बाद देश भर में सबसे अधिक विधायक मिले.

इस साल मई में चुनाव आयोग ने इस विलय को मान्यता दी थी.  विलय से पहले 60 सदस्यीय नागालैंड विधानसभा में एनपीएफ के केवल दो विधायक थे, जबकि एनडीपीपी के पास 25 विधायक थे.

दिवंगत अजीत पवार की एनसीपी के सात विधायक मई 2025 में एनडीपीपी में शामिल हुए थे. एनपीएफ के साथ एनडीपीपी के विलय के बाद नागालैंड में कोई विपक्ष नहीं बचा.

भाजपा को इन चार वर्षों में सात सांसद - ये सभी आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्य हैं जो इस साल अप्रैल में दलबदल कर आए थे - और 22 विधायक मिले हैं.

तत्कालीन तृणमूल कांग्रेस के टिकट और चुनाव चिन्ह पर चुने गए 27 सांसदों में से 20 के दलबदल ने कम चर्चित एनसीपीआई को भाजपा, कांग्रेस, सपा और डीएमके के बाद लोकसभा में पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बना दिया.

दल-बदलू सांसदों की स्थिति सवालों के घेरे में है क्योंकि अयोग्यता की याचिका लोकसभा सचिवालय और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है.

एडीआर रिपोर्ट में तृणमूल के तीन राज्यसभा सदस्यों - सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बड़ाईक - का उल्लेख नहीं है, जिन्होंने बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद इस्तीफा दे दिया था और इस साल जुलाई में भाजपा के टिकट पर फिर से चुने गए थे.

एडीआर ने "सुविधा और निजी स्वार्थ की राजनीति" को समाप्त करने के लिए कई कदमों का सुझाव दिया है. इसने संविधान की 10वीं अनुसूची में संशोधन की सिफारिश की है, जिससे क्रमशः सांसदों और विधायकों की अयोग्यता पर निर्णय लेने का अधिकार राष्ट्रपति और राज्यपाल को मिल सके.

इसने यह भी सिफारिश की है कि दल-बदलुओं को अगले चुनाव तक या विधायिका के शेष कार्यकाल के लिए सार्वजनिक पद धारण करने से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए.

एडीआर ने मांग की है कि अयोग्यता की याचिका दायर होने के छह महीने के भीतर अयोग्यता पर निर्णय लिया जाना चाहिए. एडीआर ने सुझाव दिया कि एक दल-बदलू विधायक या सांसद को एक बार अयोग्य ठहराए जाने के बाद राज्यसभा, विधान परिषद या किसी अन्य सरकारी पद पर नामांकित नहीं किया जाना चाहिए.

एडीआर ने सुझाव दिया है कि सांसदों और विधायकों के लिए पिछले वर्ष में किए गए कार्यों और अगले वर्ष की अपनी योजनाओं पर एक वार्षिक रिपोर्ट दर्ज करना अनिवार्य होना चाहिए, जो लोकसभा, राज्यसभा या चुनाव आयोग की वेबसाइटों पर उपलब्ध होनी चाहिए.

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