तरुण तेजपाल मामला भारत के दुष्कर्म कानून को पीड़ितों के प्रति संवेदनशील बनाने की 48 साल की यात्रा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है
सुप्रीम कोर्ट में उनकी अपील का परिणाम चाहे जो भी हो, बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा पत्रकार तरुण तेजपाल की सजा के एक महत्वपूर्ण पहलू को बनाए रखने में एक बड़ा सामाजिक हित शामिल है. ‘आर्टिकल 14’ में मनोज मिट्टा ने लिखा है कि तेजपाल की सजा के एक महत्वपूर्ण पहलू को बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखा गया है. मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के बावजूद, हाईकोर्ट का यह रुख एक बहुत बड़े सामाजिक हित को रेखांकित करता है. हाईकोर्ट ने मुकदमे (ट्रायल) के दौरान पीड़िता को जिरह के नाम पर दी गई अत्यधिक मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न की कड़े शब्दों में निंदा की है. यह निंदा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में बलात्कार कानून को पीड़ितों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए लगभग आधी सदी (48 वर्षों) तक एक लंबा और कठिन संघर्ष लड़ा गया है.
मिट्टा के अनुसार, विक्टोरियन युग की नैतिकता से प्रभावित भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 (IEA) की धारा 155(4) में प्रावधान था कि बलात्कार के मुकदमों में यह दिखाया जा सकता है कि पीड़िता "सामान्यतः अनैतिक चरित्र" की थी. इस व्यापक और महिला-विरोधी व्यवस्था का अर्थ यह था कि केवल वही महिला न्याय की उम्मीद कर सकती थी जो समाज के संकीर्ण और रूढ़िवादी मानदंडों पर खरी उतरती हो. आजादी के बाद भी यह औपनिवेशिक मानसिकता तीन दशकों से अधिक समय तक लागू रही.
1978 में सुप्रीम कोर्ट ने मथुरा बलात्कार मामले में दो पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया. कोर्ट ने पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान न होने को उसकी "सहमति" माना और बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया. इससे देश भर में तीखा आक्रोश फैला. इस घटना के बाद 1980 में विधि आयोग ने पहली बार सिफारिश की कि धारा 155(4) को संशोधित किया जाए. आयोग का मानना था कि किसी महिला के तथाकथित अनैतिक चरित्र के आधार पर उसकी गवाही को झूठा मान लेना पूरी तरह गलत है. हालांकि, 1983 में तत्कालीन सरकार ने कई बदलाव किए, लेकिन जिरह के दौरान चरित्र हनन को रोकने वाले मुख्य सुधारों को छोड़ दिया.
2002 और 2013 के कानूनी सुधार
2002 का संशोधन: अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने आखिरकार धारा 155(4) को निरस्त कर दिया और साक्ष्य अधिनियम की धारा 146 में प्रावधान जोड़ा कि जिरह के दौरान पीड़िता के चरित्र पर सवाल नहीं उठाए जा सकते. फिर भी, पिछले यौन अनुभवों से जुड़े सवालों पर स्पष्ट रोक न होने के कारण कानूनी खामी बनी रही.
2013 का ऐतिहासिक बदलाव: निर्भया मामले के बाद जस्टिस जे. एस. वर्मा समिति की सिफारिशों पर मनमोहन सिंह सरकार ने कानून में दो बड़े सुधार किए. धारा 146 के तहत न केवल चरित्र, बल्कि पीड़िता के "पिछले यौन अनुभवों" पर सवाल पूछने और उससे जुड़े साक्ष्य प्रस्तुत करने को भी पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया. इसी वर्ष बलात्कार की नई और व्यापक कानूनी परिभाषा के तहत तरुण तेजपाल पर पहला हाई-प्रोफाइल मामला दर्ज हुआ था.
लेखक के मुताबिक, बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्णय यह उजागर करता है कि 2013 के सख्त कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद, धरातल पर पीड़िता की सुरक्षा करने में ट्रायल कोर्ट विफल रही. विडंबना यह रही कि 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष सुनवाई के नाम पर आरोपी को पीड़िता के मोबाइल फोन का डेटा सौंपने का निर्देश दिया था. बचाव पक्ष के वकीलों ने पीड़िता की निजता का उल्लंघन करते हुए इस व्यक्तिगत डेटा को हथियार की तरह इस्तेमाल किया.
ट्रायल कोर्ट ने बचाव पक्ष को पीड़िता के अतीत के यौन इतिहास, व्यक्तिगत संदेशों और नैतिक विचारों पर आक्रामक व अपमानजनक जिरह करने की अनुमति दी, जो साक्ष्य अधिनियम की धारा 146 का स्पष्ट उल्लंघन था. इतना ही नहीं, जिरह के दौरान पीड़िता के पति और मां का भी यह कहकर मनोबल गिराने का प्रयास किया गया कि पीड़िता "ढीले चरित्र" की है. निर्णय के अंतिम चरण में ट्रायल कोर्ट द्वारा इन अवैध साक्ष्यों को खारिज करने का औपचारिकता भरा प्रयास केवल 'डैमेज कंट्रोल' की कवायद थी.
कुलमिलाकर, लेखक का मानना है कि तेजपाल मामले के अपने अलग तकनीकी और साक्ष्य-संबंधी तथ्य हो सकते हैं, लेकिन इस मामले ने 48 वर्षों के संघर्ष के बाद हासिल किए गए वैधानिक सुरक्षा उपायों की गंभीर धज्जियां उड़ाईं. हाईकोर्ट ने "आदर्श पीड़िता" की पुरानी सोच और ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है. अंततः, यह मामला इस बात की परीक्षा है कि भारत अपने बलात्कार कानूनों को पीड़ितों के प्रति संवेदनशील बनाने की दिशा में हासिल की गई सभ्यतागत प्रगति को बनाए रख पाता है या नहीं.

