डब्ल्यूएचओ : दुनिया की 92 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में कैंसर से होगी प्रभावित
‘डाउन टू अर्थ’ की रिपोर्टर किरण पांडेय के मुताबिक, दुनिया की लगभग 92 प्रतिशत आबादी अपने जीवन में किसी न किसी रूप में कैंसर से प्रभावित होगी. इसका मतलब है कि या तो व्यक्ति स्वयं कैंसर का शिकार होगा या उसके परिवार का कोई करीबी सदस्य इस बीमारी से जूझेगा. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 8 जुलाई 2026 को जारी अपनी वैश्विक रिपोर्ट में कैंसर को तेजी से बढ़ता स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक संकट बताया है. संगठन का कहना है कि इलाज और जांच की सुविधाओं में असमानता के कारण अलग-अलग देशों में मरीजों के बचने की संभावना भी अलग-अलग है.
दुनिया में हर पांच में से एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में कैंसर का शिकार होगा. वर्ष 2024 में दुनिया भर में 2.06 करोड़ से अधिक लोगों में कैंसर का पता चला. इनमें गैर-मेलेनोमा त्वचा कैंसर को छोड़कर 1.95 करोड़ मामले शामिल हैं. पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर सबसे अधिक पाया गया, जिसके लगभग 16 लाख नए मामले दर्ज हुए. इसके बाद प्रोस्टेट कैंसर के 15 लाख मामले सामने आए. महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे आम रहा, जिसके 24 लाख नए मामले दर्ज किए गए, जबकि फेफड़ों का कैंसर दूसरे स्थान पर रहा. बड़ी आंत और मलाशय का कैंसर पुरुषों और महिलाओं दोनों में तीसरा सबसे अधिक पाया जाने वाला कैंसर रहा.
बच्चों में भी कैंसर का बोझ लगातार बढ़ रहा है. हर वर्ष 19 वर्ष तक की आयु के लगभग चार लाख बच्चों और किशोरों में कैंसर का पता चलता है. इनमें बड़ी संख्या निम्न और मध्यम आय वाले देशों की है, जहां समय पर जांच और उपचार की सुविधाएं सीमित हैं.
वर्ष 2024 में कैंसर से दुनिया भर में लगभग 97 लाख लोगों की मौत हुई. इनमें 30 से 69 वर्ष आयु वर्ग के 48 लाख से अधिक लोग शामिल थे. 75 वर्ष की आयु से पहले हर नौ में से एक पुरुष और हर 13 में से एक महिला की मृत्यु कैंसर के कारण होने की आशंका है. कुल वैश्विक मौतों में कैंसर की हिस्सेदारी 16.5 प्रतिशत है, जिससे यह हृदय संबंधी बीमारियों के बाद मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण बन चुका है.
कैंसर का असर केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता. वर्ष 2020 में माता या पिता की कैंसर से मृत्यु के कारण दुनिया भर में लगभग 24.5 लाख बच्चे अनाथ हो गए. इनमें 10.4 लाख बच्चों ने अपनी मां और 14.1 लाख बच्चों ने अपने पिता को खो दिया. स्तन कैंसर के कारण हर चार में से एक बच्चे ने अपनी मां को खोया, जबकि गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर हर पांच में से एक मामले के लिए जिम्मेदार रहा. ऐसे लगभग आधे मामले एशिया और एक-तिहाई से अधिक अफ्रीका में दर्ज किए गए. भारत, चीन, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, इथियोपिया और पाकिस्तान मिलकर दुनिया के लगभग 40 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार रहे.
बीमारी का सबसे बड़ा असर परिवारों की आर्थिक और मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है. डब्ल्यूएचओ के सर्वेक्षण में शामिल आधे से अधिक लोगों ने मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की जानकारी दी. कम से कम 45 प्रतिशत लोगों को इलाज के कारण आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. लगभग सभी देखभाल करने वालों ने तनाव, लंबे समय तक शोक और सामाजिक अलगाव का अनुभव बताया. महंगा इलाज, आय में कमी, दवाओं का खर्च, अस्पताल तक आने-जाने की लागत और बच्चों की देखभाल का अतिरिक्त बोझ लाखों परिवारों को आर्थिक संकट में धकेल रहा है. कई देशों में कैंसर चिकित्सा खर्च के कारण आर्थिक रूप से टूटने की प्रमुख वजह बन चुका है.
डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि वर्ष 2050 तक दुनिया में हर साल कैंसर के नए मामलों की संख्या 66.7 प्रतिशत बढ़कर 3.5 करोड़ तक पहुंच जाएगी. जनसंख्या वृद्धि, लोगों की बढ़ती आयु और जोखिम कारकों में बदलाव इसके प्रमुख कारण होंगे. सबसे अधिक दबाव निम्न आय वाले देशों पर पड़ेगा, जहां नए मामलों में 133 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है.
कैंसर के इलाज और जांच तक पहुंच में भी भारी असमानता है. दुनिया की लगभग 47 प्रतिशत आबादी को अब भी बुनियादी जांच सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं. अनेक देशों में रोग परीक्षण, चिकित्सीय चित्रण, शल्य चिकित्सा, विकिरण चिकित्सा और आवश्यक दवाओं की पहुंच सीमित है. उच्च आय वाले देशों में स्तन कैंसर से पीड़ित 85 प्रतिशत से अधिक महिलाएं कम से कम पांच वर्ष तक जीवित रहती हैं, जबकि निम्न आय वाले देशों में यह आंकड़ा 45 प्रतिशत से भी कम है. बच्चों में रक्त कैंसर के एक प्रमुख प्रकार से पीड़ित लगभग 93 प्रतिशत बच्चे यूरोप में पांच वर्ष तक जीवित रहते हैं, जबकि अफ्रीका के कुछ हिस्सों में यह दर केवल 19 प्रतिशत है.
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि भविष्य में कैंसर से लड़ाई केवल नई दवाओं या आधुनिक तकनीक से नहीं जीती जा सकेगी. रोकथाम, समय पर जांच, सुलभ उपचार और सभी लोगों के लिए समान स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौती होगी. यदि स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद असमानता दूर नहीं हुई, तो किसी व्यक्ति के कैंसर से बचने की संभावना उसके रहने वाले देश और वहां उपलब्ध स्वास्थ्य व्यवस्था पर ही निर्भर करती रहेगी.

