‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ चुनाव आयोग के हालिया फैसलों में हुए बदलाव, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और चुनावी प्रक्रिया में संस्थागत जवाबदेही से जुड़े सवालों पर चर्चा की. बातचीत के दौरान गर्ग ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अपनी गलतियों को सुधारने के लिए कुछ कदम तो उठा रहा है, लेकिन अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने से बच रहा है.
श्रवण गर्ग के मुताबिक, चुनाव आयोग के हालिया फैसलों में हुए बदलाव व्यापक सुधार के बजाय मौजूदा विवाद को शांत करने की कोशिश का हिस्सा दिखाई देते हैं. उन्होंने महाराष्ट्र, तेलंगाना, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, झारखंड, हरियाणा और नागालैंड में करीब 4.52 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने का जिक्र किया. आयोग ने इन नामों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरे पंजीकरण की श्रेणियों में रखा था. गर्ग ने सवाल उठाया कि इस सूची में बिहार और पश्चिम बंगाल को क्यों शामिल नहीं किया गया, जबकि इन दोनों राज्यों में भी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोप लगे हैं.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 28 अक्टूबर के आदेश का उल्लेख करते हुए बताया कि जिन लोगों के नाम किसी कारणवश मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए, उन्हें फॉर्म-6 के बजाय गणना प्रपत्र भरने की सुविधा दी गई है. उनके अनुसार, इससे उन लोगों को राहत मिल सकती है जो पहले से मतदाता थे, लेकिन किसी कारण से उनके नाम सूची से हटा दिए गए. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि इन लोगों को पुराने मतदाताओं के रूप में मान्यता दी जा रही है, तो पहले उनके नाम हटाए ही क्यों गए?
गर्ग ने चुनाव आयोग के प्रशासनिक ढांचे में किए गए बदलावों का भी जिक्र किया. उनके मुताबिक, आयोग ने बैठकों के एजेंडे और कार्यवृत्त साझा करने, आईटी मॉड्यूल और पोर्टल के संचालन पर निगरानी बढ़ाने तथा अधिकारियों के अधिकारों का विकेंद्रीकरण करने जैसे कदम उठाए हैं. हालांकि, उन्होंने सवाल किया कि इन बदलावों के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही क्यों तय नहीं की जा रही है.
बातचीत में केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के उस बयान पर भी चर्चा हुई, जिसमें पंचायती राज की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों को भुगतान के लिए मतदाता पहचान पत्र की आवश्यकता का उल्लेख किया गया था. गर्ग ने इसे मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के विवाद के संदर्भ में गंभीर सवाल बताया. हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद ललन सिंह ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि भुगतान के लिए केवल आधार ही नहीं, बल्कि मतदाता पहचान संख्या और बायोमेट्रिक विवरण का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
अंत में गर्ग ने कहा कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और नागरिकों के मतदान के अधिकारों की रक्षा लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है. उनके मुताबिक, चुनावी प्रक्रिया में हुई गड़बड़ियों को सुधारने के साथ-साथ उनकी जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए.
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