दिल्ली हाईकोर्ट के जज, जो बाद में मणिपुर के मुख्य न्यायाधीश बने, के पास कार्यकाल के दौरान थी एलपीजी एजेंसी, पद पर रहते हुए रिन्यू कराते रहे
न्यायाधीश, विशेष रूप से संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीश, अपनी शपथ और एक अलिखित आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो उनके लिए सरकार, निजी पक्षों, पीएसयू (सार्वजनिक उपक्रमों) या कंपनियों के साथ किसी भी प्रकार का वित्तीय, संविदात्मक, व्यावसायिक या व्यापारिक संबंध रखना अत्यधिक अनैतिक बनाता है.
हालांकि, यह नियम सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति (जस्टिस) सिद्धार्थ मृदुल को दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश और मणिपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजे) के रूप में अपने 16 साल के कार्यकाल के दौरान एक एलपीजी वितरण एजेंसी चलाने से नहीं रोक सका.
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में धनंजय महापात्रा की रिपोर्ट के अनुआर, मृदुल, जिन्होंने 1986 में दिल्ली हाईकोर्ट में एक वकील के रूप में अभ्यास शुरू किया था, मार्च 2008 में उसी अदालत में न्यायाधीश नियुक्त किए गए थे. वे अक्टूबर 2023 में मणिपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने.
'किचन फ्लेम' नामक एजेंसी के लिए बीपीसीएल और मृदुल के बीच डिस्ट्रीब्यूटरशिप समझौते को 25 अगस्त 1995; 24 अगस्त 2005; 23 अगस्त 2010; 25 अगस्त 2015; 7 मई 2025; और पिछले साल 29 सितंबर को (24 अगस्त 2030 तक की वैधता के साथ) रिन्यू किया गया था. इस अंतिम समझौते (जिसकी एक प्रति 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के पास है) के स्टांप पेपर पर मृदुल की तस्वीर है और 'किचन फ्लेम' के लिए उनके द्वारा हस्ताक्षर किए गए हैं.
सिद्धार्थ मृदुल को 1984 में एलपीजी डीलरशिप आवंटित की गई. इसके 2 साल बाद, मृदुल ने दिल्ली हाईकोर्ट में वकील के रूप में प्रैक्टिस शुरू की. 2008 में दिल्ली हाईकोर्ट के जज नियुक्त हुए. 2023 में मणिपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने. 21 नवंबर 2024 को सेवानिवृत्त हुए.
आश्चर्यजनक है कि वे इस पूरी अवधि के दौरान एलपीजी एजेंसी के मालिक बने रहे. बीपीसीएल और जस्टिस मृदुल के बीच डीलरशिप समझौते को आखिरी बार 2025 में अगले 5 वर्षों के लिए रिन्यू किया गया था.
इसी वर्ष 29 मई को बीपीसीएल ने दिसंबर 2025 में दर्ज की गई एक जन शिकायत का हवाला देते हुए पूर्व जज को नोटिस भेजा, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने 'पहले एक न्यायाधीश के रूप में कार्य किया था'. बीपीसीएल के नोटिस में कहा गया कि जस्टिस मृदुल ने अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) की शर्तों का उल्लंघन किया है. उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया कि उनकी डिस्ट्रीब्यूटरशिप को निलंबित क्यों न किया जाए.
पूर्व जज ने कथित तौर पर इन नोटिसों का कोई जवाब नहीं दिया. बीपीसीएल ने 6 जुलाई को डीलरशिप को निलंबित कर दिया.
जहाँ एक तरफ संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों को, पारदर्शिता के नियमों के तहत, हितों के टकराव से बचने के लिए कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी (शेयरहोल्डिंग) घोषित करनी होती है; वहीं 21 नवंबर 2024 को मणिपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवानिवृत्त हुए जस्टिस मृदुल ने भारत पेट्रोलियम द्वारा 1984 में उन्हें आवंटित एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटरशिप को जारी रखकर नैतिक आचार संहिता का उल्लंघन किया है.
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब न्यायपालिका दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक बंगले से भारी मात्रा में नकदी (नोटों से भरे बैग) बरामद होने के बाद, संसद द्वारा उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू किए जाने की संभावना का सामना करने की तैयारी कर रही थी.

