अभिजीत दिपके ने कैसे गढ़ी ऐसी राजनीति, जिसने बीजेपी को बैकफुट पर ला दिया

‘स्क्रोल’ में प्रकाशित सुमित समोस नीट-यूजी पेपर लीक के विरोध में शुरू हुआ छात्र आंदोलन केवल परीक्षा प्रणाली के खिलाफ विरोध तक सीमित नहीं रहा. इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति में एक नए चेहरे और नई शैली को सामने लाया. कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संयोजक अभिजीत दिपके ने ऐसे समय में नेतृत्व संभाला, जब विपक्ष बिखरा हुआ दिख रहा था और युवाओं में व्यवस्था को लेकर गहरी निराशा थी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दिपके की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उन्होंने आंदोलन को किसी एक जाति, वर्ग या संगठन तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक स्वर दिया. यही वजह रही कि भारतीय जनता पार्टी को इस आंदोलन के दौरान लगातार रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ा.

दिपके ने खुद को दलित और अंबेडकरवादी विचारधारा से जुड़ा बताया, लेकिन उन्होंने अपनी राजनीति को केवल दलित पहचान तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने शिक्षा, रोजगार, परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य जैसे ऐसे मुद्दे उठाए, जिनसे देशभर के छात्र और युवा खुद को जोड़ सके. उनकी भाषा भी वैचारिक जटिलताओं से दूर, आम लोगों की भाषा थी. यही कारण रहा कि छोटे शहरों, कस्बों और गांवों से आए युवाओं ने इस आंदोलन को अपना आंदोलन माना.

जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यहां केवल छात्र संगठन या राजनीतिक दल ही नहीं पहुंचे, बल्कि अलग-अलग जातियों, वर्गों, धर्मों और वैचारिक पृष्ठभूमि के लोग भी शामिल हुए. विपक्षी नेताओं, किसान संगठनों, ट्रेड यूनियनों और सामाजिक संगठनों ने भी समर्थन दिया, लेकिन आंदोलन का केंद्र किसी दल विशेष के बजाय युवाओं की साझा समस्याएं रहीं. दिपके ने नीट-यूजी विवाद को शिक्षा व्यवस्था की खामियों, बेरोजगारी, सरकारी जवाबदेही और संस्थागत पारदर्शिता जैसे बड़े सवालों से जोड़ दिया.

इस आंदोलन की एक और खास बात यह रही कि इसमें सोशल मीडिया ने बड़ी भूमिका निभाई. मीम्स, व्यंग्य, छोटे वीडियो और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए आंदोलन का संदेश तेजी से देशभर के युवाओं तक पहुंचा. पारंपरिक राजनीतिक भाषणों की जगह हास्य और व्यंग्य ने ली, जिससे बड़ी संख्या में जेन ज़ी इस आंदोलन से जुड़ती चली गई. इससे मुख्यधारा की राजनीतिक बहस और मीडिया विमर्श को भी चुनौती मिली.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि दिपके ने केवल भाषण देने वाले नेता की भूमिका नहीं निभाई. आंदोलन से जुड़े लोगों के अनुसार, वे प्रदर्शनकारियों की बातें सुनते थे, सुझाव स्वीकार करते थे और खुद को आंदोलन का हिस्सा मानते थे. विरोध प्रदर्शन के दौरान उन पर स्याही फेंकी गई, थप्पड़ मारा गया और धमकियां भी मिलीं, लेकिन उन्होंने आंदोलन जारी रखा. इसी वजह से समर्थकों के बीच उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनी, जो संवाद और सहभागिता को टकराव से अधिक महत्व देता है.

विश्लेषकों का यह भी मानना है कि दिपके ने दलित राजनीति की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ने का प्रयास किया. उन्होंने न तो केवल पहचान की राजनीति पर जोर दिया और न ही खुद को किसी एक सामाजिक समूह का नेता बताया. इसके बजाय उन्होंने युवाओं की साझा आकांक्षाओं और चुनौतियों को केंद्र में रखा. यही कारण है कि आंदोलन में ऐसे लोग भी शामिल हुए, जो सामान्य परिस्थितियों में किसी एक राजनीतिक मंच पर साथ नहीं दिखते.

फिलहाल कॉकरोच जनता पार्टी खुद को चुनावी दल नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दबाव समूह बताती है. संगठन सस्ती शिक्षा, निजी स्कूलों की फीस पर नियंत्रण, सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधार और युवाओं के लिए बेहतर अवसरों जैसे मुद्दों पर काम करने की बात कर रहा है. यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह आंदोलन लंबे समय तक कितना प्रभाव छोड़ पाएगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि अभिजीत दिपके ने भारतीय राजनीति में एक ऐसे विमर्श को जन्म दिया है, जिसमें जाति और पहचान से आगे बढ़कर शिक्षा, रोजगार और युवाओं के भविष्य को केंद्र में रखने की कोशिश दिखाई देती है. यही व्यापक राजनीति उन्हें अलग बनाती है और इसी ने बीजेपी को पहली बार युवाओं के मुद्दों पर गंभीर राजनीतिक चुनौती का सामना करने के लिए मजबूर किया.

Previous
Previous

तमिलनाडु: ऊंची जाति के व्यक्ति की जमीन पर घोड़ा चराने के विवाद में दलित युवक की धारदार हथियारों से हत्या 

Next
Next

डर और व्यक्तिगत सुरक्षा मुझे स्वदेश लौटने से नहीं रोकेंगे : शेख हसीना ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की