‘हमने पानी को बहुत हल्के में ले लिया है’: अल नीनो का भारत के मानसून, शहरों और किसानों पर क्या होगा असर

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून के महाराष्ट्र में ठहर जाने के कारण भारत में वर्तमान में 41 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है. इस वर्ष मानसून के दौरान दीर्घावधि औसत (एलपीए) की केवल 90 प्रतिशत बारिश होने का अनुमान है. मौसम वैज्ञानिकों ने इसकी मुख्य वजह प्रशांत महासागर में विकसित हो रही ‘अल नीनो’ परिस्थिति को बताया है. यह एक ऐसी जलवायु घटना है जो समुद्र के तापमान और वायुमंडलीय दबाव में बदलाव लाती है. जून में शुरू हुआ यह प्रभाव मानसून सीजन के दौरान और अधिक मजबूत होने की संभावना है, जिससे देश सूखे की कगार पर पहुँच गया है.

अहेली बनर्जी और अत्रेयी बोस के मुताबिक, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मौसम के मिजाज (देवताओं) के रहमों-करम पर निर्भर रहने से बचने के लिए देश को व्यक्तिगत जागरूकता से लेकर व्यवस्थागत बदलावों तक व्यापक प्रयास करने होंगे.

यद्यपि देश के सामने सूखे का खतरा है, लेकिन भारत सरकार के पास वर्तमान में 53.41 मिलियन मीट्रिक टन अनाज (गेहूं और चावल) का बफर स्टॉक मौजूद है, जो तय अनिवार्य कोटे से लगभग दोगुना है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी आश्वस्त किया है कि इस पर्याप्त भंडार के कारण देश में अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी, भले ही पानी की अधिक खपत वाली धान की फसल प्रभावित हो जाए.

हालाँकि, आर्थिक स्तर पर चुनौतियाँ गंभीर हैं. कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी के अनुसार, यदि कृषि जीडीपी में महज 1 प्रतिशत की भी गिरावट आती है, तो किसानों की आय में भारी कमी होगी. इसके अतिरिक्त, त्योहारी सीजन (अक्टूबर-नवंबर) के दौरान मांग बढ़ने से खाद्य मुद्रास्फीति (महंगाई) मौजूदा 4.8 प्रतिशत से बढ़कर 5 या 6 प्रतिशत तक पहुँच सकती है.

'जय किसान आंदोलन' के अवीक साहा का कहना है कि सूखा केवल कृषि को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि पूरे ग्रामीण जीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है. उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2014 से 2016 के दौरान भी देश ने गंभीर सूखा झेला था, लेकिन तब सरकार का रुख उदासीन था.  2016 के 'स्वराज अभियान बनाम भारत संघ' के ऐतिहासिक फैसले के बाद सरकार के लिए सख्त सूखा प्रबंधन प्रोटोकॉल लागू करना अनिवार्य हुआ. विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार अल नीनो का असर बहुत तीखा होगा, जिसके लिए दीर्घकालिक योजना और मैपिंग की सख्त जरूरत है.

मौसम विभाग के वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जून से सितंबर के बीच पूर्वोत्तर भारत को छोड़कर पूरे देश में मानसून सामान्य से कम रहेगा.  अल नीनो के इस बार जून में ही सक्रिय हो जाने के कारण आने वाले साल और भी अधिक कष्टप्रद हो सकते हैं. मौसम वैज्ञानिक शिवानंद पई ने चेतावनी दी है कि वर्ष 2026 और 2027 की गर्मियां इतिहास में सबसे गर्म हो सकती हैं, जहाँ तापमान 50° सेल्सियस तक पहुँचने की आशंका है.

इस संकट के बीच, भारत का जल प्रबंधन तंत्र बेहद कमजोर नजर आता है. प्रोफेसर पार्थ मुखर्जी ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बार-बार सूखा झेलने के बाद भी भारत जल संचयन में विफल रहा है. वर्तमान में मुंबई और पुणे जैसे बड़े शहरों को भी पानी की कटौती का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने पानी को हल्के में न लेने तथा व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर पानी के पुन: उपयोग व संरक्षण के उपाय अपनाने पर जोर दिया है.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चिंता व्यक्त की है कि अल नीनो देश के 10 से 12 राज्यों में खरीफ फसलों को भारी नुकसान पहुँचा सकता है. सरकार ने इसके समाधान के लिए साप्ताहिक जिला-स्तरीय समीक्षा बैठकों का सुझाव दिया है.

हालाँकि, सरकार द्वारा किसानों को कम पानी वाली फसलें उगाने की सलाह व्यावहारिक धरातल पर कम प्रभावी साबित होती है. विशेषज्ञों का मानना है कि जो किसान पारंपरिक रूप से धान उगाते आए हैं, वे कम समय के नोटिस पर अपनी फसल का ढर्रा नहीं बदल पाते. इस अल नीनो के कारण दालों, तिलहन, कपास, बाजरा, फल और सब्जियों के उत्पादन पर वैश्विक असर पड़ेगा, जिससे इंडोनेशिया और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश भी प्रभावित होंगे.

पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन के अनुसार, एक दशक पहले की तुलना में आज स्थिति थोड़ी बेहतर है क्योंकि देश का सिंचित क्षेत्र 45 प्रतिशत से बढ़कर 55 प्रतिशत हो चुका है. साथ ही, अब किसानों के पास जलवायु-प्रतिरोधी फसलों की अधिक किस्में हैं और वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से मौसम के पूर्वानुमानों को बेहतर तरीके से समझ पा रहे हैं.

विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तरी कर्नाटक जैसे अत्यधिक प्रभावित होने वाले राज्यों के किसानों को एक ही फसल दोबारा बोने के नुकसान से बचना चाहिए. उन्हें रागी, मूंग, अरहर जैसी दालों और मिश्रित खेती को अपनाना चाहिए. इसके अतिरिक्त, मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून के उत्तरार्ध में ‘पॉजिटिव इंडियन ओशन डिपोल’ (आईओडी) के सक्रिय होने की संभावना है, जो अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक कम करके मानसून को सहारा दे सकता है.

मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक के.जे. रमेश ने बताया कि भारत में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तरी कर्नाटक के अल नीनो से सबसे अधिक प्रभावित होने की संभावना है.

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