भंवर मेघवंशी | चाहे दलित कार सेवा में चला जाए, राम मंदिर के लिए मर जाए... फिर भी उसे बराबरी नहीं मिलेगी

हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व संघ स्वयंसेवक भंवर मेघवंशी से राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के एक विवादित मंदिर प्रकरण और गाय की राजनीति पर विस्तार से बातचीत की. चर्चा का केंद्र यह सवाल रहा कि जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समरसता, हिंदू एकता और सामाजिक सद्भाव की बात करता है, तब जमीनी स्तर पर दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और संघर्षों को कैसे समझा जाए.

भंवर मेघवंशी ने बताया कि भीलवाड़ा जिले की आसींद तहसील के बराना गांव में स्थित एक लोकदेवता मंदिर की स्थापना लगभग चार सौ वर्ष पहले दलित समुदाय के घीसाराम बलाई ने की थी. समय के साथ यह स्थान एक बड़े मंदिर के रूप में विकसित हुआ और इसकी देखरेख लगातार उसी पुजारी परिवार द्वारा की जाती रही. मंदिर में आने वाले चढ़ावे और श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के साथ पुजारी परिवार की आर्थिक स्थिति में भी सुधार आया. परिवार ने बेहतर मकान बनाए, बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ाया और सामाजिक रूप से पहले की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति हासिल की.

मेघवंशी का आरोप है कि यहीं से विवाद की शुरुआत हुई. उनके अनुसार, मंदिर के बढ़ते प्रभाव और आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर स्थानीय आरएसएस और भाजपा से जुड़े कुछ लोगों ने मंदिर प्रबंधन पर दावा करना शुरू किया. उन्होंने आरोप लगाया कि एक ट्रस्ट बनाकर मंदिर के संचालन का अधिकार पुजारी परिवार से छीनने की कोशिश की गई और विरोध करने पर दलित परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट भी हुई.

उन्होंने कहा कि पुलिस जांच में दलित पक्ष के आरोपों को सही पाए जाने के बावजूद आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई. बाद में अदालत से राहत मिलने के बाद विवाद और बढ़ा तथा "सकल हिंदू समाज" के नाम पर महापंचायत आयोजित की गई. मेघवंशी के अनुसार, इस महापंचायत में दलित पुजारी परिवार के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए गए और अंततः प्रशासन ने मंदिर के प्रबंधन के लिए रिसीवर नियुक्त कर दिया.

बातचीत का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा गाय की राजनीति पर केंद्रित रहा. मेघवंशी ने आरोप लगाया कि राजस्थान सरकार गाय के नाम पर विभिन्न माध्यमों से राजस्व एकत्र करती है, लेकिन गौशालाओं और पशु संरक्षण के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराती. उन्होंने दावा किया कि कई गौशालाओं को समय पर अनुदान नहीं मिला, जिससे पशुओं के चारे और देखभाल की गंभीर समस्याएं पैदा हुईं.

उन्होंने जैसलमेर क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि भीषण गर्मी और संसाधनों की कमी के कारण बड़ी संख्या में गायों की मौत हुई. उनके अनुसार, एक ओर गाय के नाम पर राजनीति की जाती है, जबकि दूसरी ओर जमीन पर पशुओं की वास्तविक स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. उन्होंने यह भी कहा कि आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या किसानों के लिए गंभीर समस्या बन चुकी है और कई क्षेत्रों में फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रही है.

चर्चा के दौरान पश्चिम बंगाल में गाय को लेकर दिए गए कुछ राजनीतिक बयानों का भी जिक्र हुआ. इस संदर्भ में मेघवंशी ने सवाल उठाया कि यदि गाय को धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से इतना महत्वपूर्ण माना जाता है, तो उसकी उपयोगिता या संरक्षण को उम्र जैसी शर्तों से क्यों जोड़ा जाता है. उन्होंने कहा कि गाय को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और वास्तविक नीतियों के बीच अक्सर विरोधाभास दिखाई देता है.  पूरी बातचीत यहाँ देखें.

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