सीबीएसई और नीट से आगे: सिर्फ मंत्री नहीं, बाबुओं की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए

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‘साउथ फर्स्ट’ के मुताबिक, देश भर में छात्रों के बीच असंतोष बढ़ रहा है. सीबीएसई के परिणामों को लेकर उठे सवाल, नीट परीक्षा विवाद और अब तथाकथित “कॉकरोच जनता पार्टी” का उभार किसी एक घटना का परिणाम नहीं हैं. ये एक गहरी समस्या के संकेत हैं.

छात्र नाराज हैं, अभिभावक निराश हैं और संस्थाओं पर भरोसा कमजोर पड़ रहा है. सवाल यह है कि क्या हम इन विफलताओं के वास्तविक कारणों की पहचान कर रहे हैं या केवल उनके लक्षणों पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं.

हाल के दिनों में सीबीएसई परिणामों को लेकर छात्रों और अभिभावकों ने गंभीर चिंताएं जताई हैं. कई छात्रों ने अपेक्षा से कम अंक मिलने की शिकायत की है. डिजिटल मूल्यांकन, स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाओं, पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया और पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठे हैं.

इन चिंताओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि परीक्षाएं लाखों छात्रों के प्रवेश, छात्रवृत्ति और भविष्य का निर्धारण करती हैं.

स्वाभाविक रूप से लोग जवाबदेही की मांग कर रहे हैं. लेकिन भारत में ऐसी किसी भी समस्या के सामने आते ही सार्वजनिक बहस अक्सर एक निष्कर्ष पर पहुंच जाती है. मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए.

राजनीतिक जवाबदेही महत्वपूर्ण है. मंत्री अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते. लेकिन क्या मामला यहीं समाप्त हो जाता है?

एक संसदीय लोकतंत्र में मंत्री की भूमिका को समझना जरूरी है. मंत्री विधायिका का सदस्य होने के साथ-साथ किसी विभाग का राजनीतिक प्रमुख भी होता है. उसकी मुख्य जिम्मेदारियां नीतियां बनाना, बजट तय करना, प्राथमिकताएं निर्धारित करना और विभाग को समग्र दिशा देना होती हैं. यह न तो व्यावहारिक है और न ही व्यवस्था का उद्देश्य कि कोई मंत्री अपने अधीन आने वाले हर कार्यालय, संस्थान, बोर्ड, विद्यालय, विश्वविद्यालय या एजेंसी के रोजमर्रा के कामकाज की व्यक्तिगत निगरानी करे.

जवाबदेही केवल मंत्री स्तर पर क्यों नहीं रुक सकती

इसीलिए एक स्थायी नौकरशाही ढांचा मौजूद है जिसमें सचिव, आयुक्त, निदेशक, नियंत्रक, नियामक और अन्य अधिकारी शामिल होते हैं. नीतिगत विफलताओं के लिए मंत्रियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, लेकिन केवल मंत्री के शीर्ष पर होने से प्रशासनिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती.

जब संचालन संबंधी विफलताएं सामने आती हैं, तो जिम्मेदारी को पूरी प्रशासनिक श्रृंखला में तलाशा जाना चाहिए. नौकरशाही का उद्देश्य केवल फाइलें आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि सरकारी संस्थाओं का कुशल और जवाबदेह संचालन सुनिश्चित करना है.

वरिष्ठ अधिकारियों को व्यापक अधिकार, सेवा सुरक्षा, वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाएं इसलिए दी जाती हैं क्योंकि उनसे जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है. यदि हर विभाग का संचालन केवल मंत्रियों को ही करना होता, तो इतने बड़े प्रशासनिक ढांचे की आवश्यकता ही नहीं पड़ती.

इसलिए प्रशासनिक अधिकार के साथ प्रशासनिक जिम्मेदारी भी जुड़ी होनी चाहिए. यदि अधिकारी अपने पदों से जुड़े विशेषाधिकारों का लाभ लेते हैं, तो व्यवस्था की विफलता पर कठिन सवालों का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए. सार्वजनिक अधिकार के साथ सार्वजनिक जवाबदेही भी आवश्यक है.

सवालों की लंबी सूची

जब कोई संचालन संबंधी विफलता सामने आती है, तो कई बुनियादी सवाल पूछे जाने चाहिए.

व्यवस्था किसने तैयार की? प्रक्रिया को मंजूरी किसने दी? तकनीक का चयन किसने किया? क्रियान्वयन की निगरानी किसने की? चेतावनियों को किसने नजरअंदाज किया? समीक्षा और ऑडिट किसने किए?

जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक जवाबदेही अधूरी रहती है.

नीट विवाद में भी यही स्थिति देखने को मिली. पेपर लीक के आरोप, ग्रेस मार्क्स विवाद, अदालतों में सुनवाई और जांचों ने लोगों का भरोसा हिला दिया. लेकिन चर्चा मुख्य रूप से राजनीतिक नेतृत्व पर केंद्रित रही, जबकि व्यापक प्रशासनिक मशीनरी लगभग अदृश्य बनी रही.

यह केवल सीबीएसई या नीट का मामला नहीं है. यह भारत की शासन व्यवस्था में जवाबदेही से जुड़ा एक व्यापक प्रश्न है.

बाबूजी धीरे चलना: भारत की शक्तिशाली नौकरशाही

भारत में सफलता और विफलता का सार्वजनिक चेहरा अक्सर राजनेता बनते हैं. लेकिन अनेक महत्वपूर्ण फैसले स्थायी प्रशासनिक ढांचे के भीतर लिए जाते हैं.

फाइलें प्रशासनिक निर्णयों के कारण आगे बढ़ती हैं या रुक जाती हैं. तकनीकी मंजूरियां अधिकारी देते हैं. निविदाओं की जांच अधिकारी करते हैं. चेतावनियों का मूल्यांकन अधिकारी करते हैं. इसके बावजूद सार्वजनिक जांच शायद ही कभी पूरी जिम्मेदारी श्रृंखला तक पहुंचती है.

इसका अर्थ यह नहीं कि सभी अधिकारी अक्षम या भ्रष्ट हैं. अनेक अधिकारी ईमानदारी और समर्पण के साथ काम करते हैं. लेकिन किसी भी व्यवस्था का मूल्यांकन उसके प्रयासों से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से होना चाहिए.

नागरिक यह नहीं देखते कि कितनी बैठकें हुईं या कितनी फाइलें निपटाई गईं. वे यह देखते हैं कि व्यवस्था ने क्या परिणाम दिए. क्या सार्वजनिक धन से मूल्य पैदा हुआ? क्या सेवाओं ने लोगों का जीवन बेहतर बनाया?

चिंताजनक असंतुलन

यहीं एक और असहज सवाल सामने आता है.

सरकारी कर्मचारी और अधिकारी वेतन संशोधन, महंगाई भत्ते और अन्य सेवा लाभों की मांग करते हैं. यह उनका अधिकार है. लेकिन अधिकारों के साथ जवाबदेही भी होनी चाहिए.

यदि बेहतर प्रशासनिक दक्षता से कर संग्रह बढ़ सकता था, तो क्या संबंधित अधिकारी सार्वजनिक रूप से उसकी कमी की जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे? अधिकांश मामलों में ऐसा नहीं होता.

यही व्यापक समस्या है. नौकरशाही के कई हिस्से अपने अधिकारों और लाभों के प्रति सजग रहते हैं, लेकिन प्रदर्शन, दक्षता, राजस्व क्षति या प्रशासनिक विफलताओं पर वही गंभीरता कम दिखाई देती है.

यह समस्या अन्य विभागों में भी दिखाई देती है. यदि किसी पुल में खामी आती है, तो ध्यान तुरंत ठेकेदार या मंत्री पर जाता है. लेकिन इंजीनियर, निरीक्षक, पर्यवेक्षक और प्रशासनिक अधिकारी भी उसी जिम्मेदारी श्रृंखला का हिस्सा होते हैं.

स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में भी जनाक्रोश मुख्य रूप से मंत्रियों पर केंद्रित रहता है, जबकि स्थायी प्रशासनिक ढांचा अक्सर अप्रभावित बना रहता है. यह असंतुलन जवाबदेही को कमजोर करता है.

शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी

अंततः मुद्दा सीबीएसई, नीट या किसी एक मंत्री से बड़ा है. वास्तविक मुद्दा जवाबदेही का है.

जो लोग शक्ति का प्रयोग करते हैं, उन्हें अपने निर्णयों का जवाब देना चाहिए. जो लोग सार्वजनिक धन खर्च करते हैं, उन्हें उसके परिणामों की व्याख्या करनी चाहिए. जो लोग सार्वजनिक संस्थाओं का संचालन करते हैं, उनका मूल्यांकन प्रक्रियाओं से नहीं बल्कि प्रदर्शन के आधार पर होना चाहिए.

करदाताओं को यह पूछने का अधिकार है कि खर्च किए गए धन से क्या हासिल हुआ, नागरिकों को क्या लाभ मिला और व्यवस्था विफल होने पर जिम्मेदार कौन है.

भारत तब मजबूत होगा जब जवाबदेही सत्ता के हर स्तर तक पहुंचेगी. सार्वजनिक जांच के दायरे में केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि नौकरशाह, नियामक संस्थाएं, सार्वजनिक निकाय और सरकारी विभाग भी आएंगे.

छात्र निष्पक्ष परीक्षाओं के हकदार हैं. करदाता अपने पैसे के उचित मूल्य के हकदार हैं. नागरिक पारदर्शिता के हकदार हैं.

जब तक जवाबदेही शासन व्यवस्था के हर स्तर तक नहीं पहुंचेगी, तब तक सीबीएसई और नीट जैसे विवाद अलग-अलग रूपों में सामने आते रहेंगे, जबकि मूल समस्या बनी रहेगी.

तभी हमारी परीक्षा व्यवस्था बेहतर होगी. तभी हमारी सार्वजनिक संस्थाएं बेहतर होंगी. और तभी नागरिकों को वह शासन गुणवत्ता मिलेगी जिसके वे हकदार हैं.

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