नेपाल त्रासदी के बावजूद ब्रह्मपुत्र पर विशाल बांध परियोजना को आगे बढ़ाने पर अड़ा चीन, भारत की चिंताएं
नेपाल-चीन सीमा पर हाल ही में हुए विनाशकारी हिमस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद, चीन तिब्बत में भारत सीमा के पास यारलुंग ज़ंगबो (ब्रह्मपुत्र नदी) के निचले प्रवाह पर अपने महत्वाकांक्षी मेगा बांध का निर्माण जारी रखने पर अड़ा हुआ है. यह क्षेत्र अत्यधिक भूकंप-संवेदनशील है, लेकिन इसके बावजूद बीजिंग की योजनाओं में कोई बदलाव नहीं आया है.
अनंत कृष्णन की रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने जुलाई 2026 में जारी अपनी 15वीं पंचवर्षीय योजना (अक्षय ऊर्जा) में 'यारलुंग ज़ंगबो लोअर रीचेस हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट' को प्राथमिकता दी है. जुलाई 2025 में चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने इसे "सदी की परियोजना" करार देते हुए इसकी शुरुआत की थी. इस पूरी परियोजना के अंतर्गत 5 पावर स्टेशन बनाए जाने हैं, जिस पर कुल 1.2 ट्रिलियन युआन (लगभग ₹14 लाख करोड़) का खर्च आएगा. इस विशाल परियोजना के संचालन के लिए राज्य-संचालित 'चीन याजियांग ग्रुप' का गठन किया गया है.
यह बांध ब्रह्मपुत्र नदी के उस हिस्से पर बनाया जा रहा है जिसे "ग्रेट बैंड" (बड़ा मोड़) कहा जाता है, जहाँ से नदी तेजी से गिरते हुए भारत की ओर मुड़ती है. विश्लेषकों के अनुसार, इसकी स्थापित क्षमता 60 गीगावाट होगी. यह प्रति वर्ष 300 अरब किलोवाट-घंटे बिजली का उत्पादन करेगा, जो विश्व प्रसिद्ध 'थ्री गॉर्जियस बांध' की तुलना में तीन गुना से भी अधिक है.
यद्यपि इसे 'रन-ऑफ-द-रिवर' परियोजना कहा जा रहा है, लेकिन इसमें न्यिंगची के ऊपरी क्षेत्र मेनलिंग में एक जलाशय का निर्माण शामिल है. नदी का पानी लगभग 40 किलोमीटर लंबी सुरंग के माध्यम से मोड़कर 12-12 गीगावाट क्षमता के पांच पावरहाउसों को संचालित करेगा, जिसके बाद पानी पुनः नदी में मिल जाएगा.
चीन पहले ही ब्रह्मपुत्र के मध्य प्रवाह पर जांगमू बांध का निर्माण कर चुका है, जिससे तिब्बत की 26% बिजली मांग पूरी होती है. इस परियोजना ने लाखों टन कोयले की खपत और कार्बन उत्सर्जन को कम किया है.
भारत की चिंताएं और कूटनीतिक पहलू : इस मेगा प्रोजेक्ट को लेकर भारत की मुख्य चिंताएं हैं: जल प्रवाह और जलाशय: जलाशय में जमा होने वाले पानी की मात्रा और सुरंग के निर्माण से निचले इलाकों (पूर्वोत्तर भारत) में पानी के प्राकृतिक प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. पारिस्थितिकी व सुरक्षा: अत्यधिक भूकंपीय क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर निर्माण से क्षेत्र का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ने और बाढ़/भूस्खलन का खतरा बढ़ने की आशंका है. डेटा साझाकरण में अनिश्चितता: भारत और चीन के बीच 'विशेषज्ञ-स्तरीय तंत्र' की बैठकें होती हैं, लेकिन तनावपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों के दौरान चीन द्वारा जल-विज्ञान (हाइड्रोलॉजिकल) डेटा साझा करना अक्सर बाधित या निलंबित रहा है.
हालाँकि, चीनी विदेश मंत्रालय का दावा है कि बीजिंग एक ज़िम्मेदार रुख अपना रहा है. उनका तर्क है कि यह परियोजना पूरी नदी घाटी में बाढ़ नियंत्रण और आपदा प्रबंधन में मददगार साबित होगी तथा इससे निचले प्रवाह वाले देशों को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा.

