"पुलिस ने इतना मारा कि उनका डर ही ख़त्म हो गया"

राहुल भाटिया का रिपोर्ताज — जंतर मंतर के उन 30 दिनों का ब्योरा, जिन्होंने मोदी के बारह साल में पहली बार एक मंत्री से इस्तीफ़ा करवाया

पत्रकार राहुल भाटिया ने 18 अगस्त 2026 को इक्वेटर पर प्रकाशित अपनी लंबे रिपोर्ताज में जंतर मंतर के उन दिनों का ब्योरा दर्ज किया है, जिन्हें वे भारतीय राजनीति में एक दरार की तरह देखते हैं. भाटिया The New India: The Unmaking of the World's Largest Democracy (2024) के लेखक हैं और उन्होंने आंदोलन के अंतिम हफ़्तों में लगातार प्रदर्शन स्थल पर समय बिताया.

रिपोर्ताज की धुरी 25 जुलाई की दोपहर है, जब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दिया. मेडिकल कॉलेजों की प्रवेश परीक्षा नीट का पर्चा उन्हीं के कार्यकाल में लीक हुआ था. आरोप सामने आने के बाद बीस लाख छात्रों की परीक्षा रद्द कर दी गई थी. भाटिया लिखते हैं कि रद्दीकरण के बाद बीस से ज़्यादा छात्रों ने आत्महत्या कर ली.

उनका सबसे तीखा अवलोकन यही है कि मोदी के बारह साल के शासन में यह पहली बार हुआ कि कोई वरिष्ठ मंत्री जनदबाव में हटा हो. न किसी नाकामी के लिए, न भ्रष्टाचार के लिए, न किसी और वजह से — किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया था. भाटिया के मुताबिक़ भीड़ में जो भावना बह रही थी, वह यही थी कि अगर प्रधानमंत्री का हाथ एक बार मोड़ा जा सकता है, तो उनके बिना का भविष्य भी सोचा जा सकता है.

भीड़ किसकी थी

रिपोर्ताज का सबसे बारीक हिस्सा भीड़ का ब्योरा है. भाटिया लिखते हैं कि यहाँ बिहार से घर छोड़कर भागा एक लड़का था, गुजरात का एक बुज़ुर्ग दंपति था जो सामूहिक अवज्ञा का दृश्य देखकर हैरान था और पास से गुज़रने वाले हर आदमी को पानी की बोतल थमा रहा था. सफ़ाईकर्मी आए, ट्रक पर बोझा लादने वाले आए, चार्टर्ड अकाउंटेंट आए, स्कूल शिक्षक आए, बड़ी संख्या में दलित आए, वामपंथी संगठन आए, सिख निगरानी करते रहे. पुलिस से इस्तीफ़ा देकर आंदोलन में शामिल हुए लोग भी थे.

उनके लिए यह पिछले आंदोलनों से अलग था. सीएए-विरोधी प्रदर्शन और किसान आंदोलन में जीत का मतलब था किसी क़ानून को वापस कराना — यानी पहले जैसी हालत में लौटना. जंतर मंतर पर इच्छा किसी नई चीज़ की थी. भाटिया इसे एक "बौद्धिक विशेष क्षेत्र" कहते हैं — सरकार जैसे उद्योगपतियों के लिए अपने नियमों वाले विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाती है, वैसे ही यहाँ कुछ बीघा ज़मीन पर देश के नियम कुछ दिनों के लिए स्थगित थे और लोग फिर से खुलकर बोल पा रहे थे.

"तिलचट्टे" से पार्टी तक

आंदोलन का नाम कहाँ से आया, यह भी रिपोर्ताज में दर्ज है. परीक्षा रद्द होने के क़रीब दो हफ़्ते बाद प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत एक याचिका पर सुनवाई करते हुए वकील पर बिफर पड़े थे. क़ानूनी वेबसाइट लाइवलॉ की रिपोर्ट के मुताबिक़ उनकी नाराज़गी याचिकाकर्ता की बार-बार की मुक़दमेबाज़ी को लेकर थी, पर उन्होंने बेरोज़गार युवाओं की तुलना तिलचट्टों से की — जिन्हें काम नहीं मिलता, जो मीडिया या सोशल मीडिया या सूचना-अधिकार कार्यकर्ता बन जाते हैं और सब पर हमला करने लगते हैं.

इसी से कॉकरोच जनता पार्टी नाम का समूह सोशल मीडिया पर बना — खीझ में, व्यंग्य के तौर पर. चार दिन में उसके इंस्टाग्राम अकाउंट के बीस लाख से ज़्यादा फ़ॉलोअर हो गए. पोस्ट हटाई जाती रहीं, अकाउंट सीमित किए जाते रहे. आंदोलन धरनों और जागरूकता अभियानों से होता हुआ जंतर मंतर पहुँचा. लद्दाख के सोनम वांगचुक, जो हिंसा भड़काने के आरोप में छह महीने जेल काट चुके थे, ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े तक अन्न न लेने की घोषणा की. उनका अनशन 26 दिन चला.

आंदोलन का चेहरा बने बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र अभिजीत दीपके, जिन्होंने प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी के अगले ही दिन ट्वीट किया था कि अगर सारे तिलचट्टे एक साथ आ जाएँ तो क्या हो. भाटिया लिखते हैं कि आंदोलन उनके समझ पाने से भी तेज़ रफ़्तार से उनके इर्द-गिर्द खड़ा हो गया. उन्होंने व्यंग्य को हथियार चुना, पर उसकी सीमा भी समझी — अभिव्यक्ति की आज़ादी, जवाबदेही, युवा कुंठा और सत्ता तथा आम नागरिक के बीच बढ़ती दूरी, ये चार बिंदु उनके संवाद का ढाँचा बने.

राज्य का जवाब

सरकार ने प्रदर्शन स्थल के आसपास मोबाइल इंटरनेट टावर बंद करवाए. हिंदुत्ववादी समूहों ने हमले की धमकी दी. पीली बैरिकेडिंग के पीछे सैकड़ों पुलिसकर्मी और दंगा नियंत्रण बल तैनात रहे. मंच से लोगों ने पूछा कि कीलें जड़ी लाठियों और छर्रे वाली बंदूकों के आदेश किसने दिए. भाटिया के मुताबिक़ नारा यही था — सब याद रखा जाएगा.

एक शाम भीड़ ने दो टीवी रिपोर्टरों को घेर लिया, जिन्हें वह सरकार का मुखपत्र मानती थी. पानी की बोतलें फेंकी गईं, "गोदी मीडिया" के नारे लगे. भाटिया इस दृश्य को दो तरफ़ से देखते हैं — यह 2014 की उसी कट्टर भक्ति का उल्टा आईना है, जब मोदी समर्थक सवाल पूछने वाले पत्रकारों को गाली देते थे. पर वे यह भी दर्ज करते हैं कि "गोदी मीडिया" के नारों से लगा कि जादू शायद टूट रहा है.

और एक नारा, जो 2014 में मोदी की छप्पन इंच सीने वाली डींग से निकला था, आंदोलन का गान बन गया — छप्पन इंच का छोटा बंदर, भाग नरेंदर, भाग नरेंदर.

इस्तीफ़े के बाद

25 जुलाई की दोपहर पुलिस ने आँसू गैस छोड़ी, और उसी दिन प्रधान का इस्तीफ़ा आ गया. कारण बताया गया कि राष्ट्र-विरोधी ताक़तें हालात का फ़ायदा न उठा लें. भाटिया की टिप्पणी है कि शासन की चालू शैली के मुताबिक़ ही व्याख्या धुँधली थी, दोषी अनाम थे और अकुशलता को त्याग के लिबास में पेश किया गया.

इस्तीफ़े के कुछ दिन पहले मोदी ने अपनी पहली इंस्टाग्राम रील डाली थी. भाटिया लिखते हैं कि उसमें उनका चिर-परिचित बलशाली अंदाज़ ग़ायब था, वे ज़ूम कॉल पर बैठे किसी असहज सहकर्मी जैसे लग रहे थे. 1 अगस्त को एक और वीडियो आया, जिसमें उन्होंने गाली देने वालों को माफ़ किया — भटके हुए बच्चे बताकर, जिन्हें रास्ता दिखाना है.

इसके ठीक बाद भाटिया ने टीवी पर एक पंद्रह साल की छात्रा को माफ़ी माँगते देखा, जिसका चेहरा धुँधला था और माँ का चेहरा ढका हुआ. माइक सरकार के चहेते किसी चैनल का था. भाटिया का निष्कर्ष सीधा है — हम फिर उन्हीं परछाइयों में लौट आए थे, जहाँ एक बच्ची से राष्ट्रीय माफ़ी मँगवाई जा सकती है.

बदले की कार्रवाई के ब्योरे भी दर्ज हैं. ओखला में प्रदर्शन से लौट रहे मुस्लिम छात्र हिरासत में लिए गए. उत्तर प्रदेश में आंदोलन में खाना-पानी बाँटने वाले एक मुस्लिम स्वयंसेवक के परिवार से पूछताछ हुई और पहचान तथा बैंक के काग़ज़ात रख लिए गए. पुलिस ने खाने की डिलीवरी के डिब्बे खँगाले और भेजने वाले रेस्तराँओं को परेशान किया. दक्षिणपंथी समूहों ने किशोरियों की पहचान कर उनसे वीडियो पर माफ़ी मँगवाई; महिलाओं को बलात्कार की धमकियाँ मिलीं. दिल्ली पुलिस ने लोगों को दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत चौबीस घंटे से एक घंटा कम के लिए उठाया — यह ब्योरा सुप्रीम कोर्ट के वकील भारत चुघ ने भाटिया को दिया. चुघ की टिप्पणी सबसे याद रहने वाली है: पुलिस ने उन्हें इतना मारा कि उनका डर ही ख़त्म हो गया.

राजनीति विज्ञानी यामिनी अय्यर ने भाटिया से कहा कि इस बार सिर्फ़ दमन से काम नहीं चलेगा. उनके मुताबिक़ बीजेपी अब तक चुनावी प्रक्रिया पर नियंत्रण से अपनी मर्ज़ी चलाती रही है — मतदाता सूचियों से नाम हटना, चुनाव आयोग की चुप्पी, बूथ से मुसलमानों को खदेड़ना, क्षेत्रीय विपक्षी दलों का विभाजन और अवशोषण. विरोध का आकार और मिज़ाज देखने के बाद वह सत्ता को स्थायी बनाने के दूसरे रास्ते खोजेगी — जिनमें संविधान में बदलाव भी शामिल है.

भाटिया ख़ुद संतुष्ट नहीं हैं

रिपोर्ताज का अंत जश्न पर नहीं होता. भाटिया लिखते हैं कि आंदोलन का समापन शांत और असंतोषजनक था, क्योंकि इतनी ऊर्जा के बाद एक इस्तीफ़ा काफ़ी नहीं लगता. उन्होंने क्रांतिकारी युवा संगठन के तंबू में बिहार के एक दुबले नौजवान से बात की, जो भगत सिंह की तस्वीर बना रहा था और जिसने पूछा कि क्या यही जीत है. एक संपन्न महिला ने उसे अपना टूटा हुआ हाथ-पंखा दे दिया था, और उसने इसे वर्गीय अपमान माना. उसका कहना था कि आंदोलन इसीलिए जल्दी ख़त्म हुआ, क्योंकि आयोजकों का वर्ग वही है — उनका मक़सद पूरा हो गया. उसने अपनी पसीने से भीगी क़मीज़ दिखाई और कहा कि यही एक क़मीज़ उसके पास है.

पर भाटिया आख़िरी पैराग्राफ़ में जो गिनाते हैं, वह उनका असली निष्कर्ष है: माफ़ी की क्रूरता पर लोग बोले; उत्तर प्रदेश में स्कूली बच्चे पक्की सड़क की माँग लेकर ज़िलाधिकारी दफ़्तर तक मार्च कर गए; गुजरात में एक रिपोर्टर ने जर्जर स्कूल पर प्रिंसिपल को घेरा; दो विश्वविद्यालयों के छात्रों ने प्रधान न्यायाधीश को कैंपस में असहज कर दिया; और अमित शाह — जिनके अधीन दिल्ली पुलिस ने कीलदार लाठियाँ चलाईं — मानसून सत्र के अठारह दिन संसद से बाहर रहे. बाहर विपक्ष छप्पन इंच वाले छोटे बंदर का गीत गा रहा था.

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