शायद ग्लेशियर टूटने से नेपाल में आई घातक अचानक बाढ़, भूकंप भी कारण हो सकता है, सैकड़ों हताहत और लापता

विशेषज्ञों ने 'प्लैनेट लैब्स' के उपग्रह चित्रों (सैटेलाइट इमेजरी) का हवाला देते हुए कहा है कि बुधवार को तिब्बत के साथ नेपाल की सीमा के पास आई घातक अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) शायद तब आई, जब ग्लेशियर का निचला हिस्सा टूट गया और सैकड़ों मीटर नीचे घाटी के फर्श पर गिर गया. यह स्पष्ट नहीं है कि ग्लेशियर के टूटने का कारण क्या था, लेकिन नेपाली अधिकारियों ने कुछ मिनट पहले इस क्षेत्र में आए भूकंप को एक संभावना के रूप में दर्शाया है.

दोनों पक्षों के अधिकारियों को डर है कि हताहतों (मृतकों) की कुल संख्या अब तक बरामद किए गए लगभग 100 शवों से कहीं अधिक होगी. नेपाल सरकार ने कहा है कि 300 से अधिक यात्री लापता हैं.

रॉयटर्स द्वारा समीक्षा की गई 'प्लैनेट लैब्स' के इस क्षेत्र के पहले और बाद के उपग्रह चित्रों (सैटेलाइट इमेजरी) में देखा गया कि हरे-भरे पहाड़ अब भूरे रंग के मलबे और तलछट के नीचे दब गए हैं.

इंजीनियरिंग भूविज्ञान में विशेषज्ञता रखने वाले और भारत की सिक्किम यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले विक्रम गुप्ता ने कहा, "इस बात की पुष्टि हुई है कि इस घटना को शुरू करने के लिए उस ग्लेशियर के थूथन (स्नाउट/आगे के हिस्से) का एक बड़ा हिस्सा ढह गया था - जिसमें शायद काफी मात्रा में चट्टानें और तलछट भी शामिल थे."

‘रॉयटर्स’ के लिए सरिता छगंती सिंह और आफताब अहमद की रिपोर्ट के अनुसार, कैलगरी विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर और पृथ्वी विज्ञानी डैन शूगर ने कहा कि तस्वीरों से पता चलता है कि आपदा से 24 घंटे पहले बड़ी मात्रा में बर्फ पिघल गई थी.

उन्होंने कहा, "घाटी के कुछ ग्लेशियर कल बर्फ से ढके हुए थे और आज वे मुख्य रूप से केवल बर्फ (बेयर आइस) हैं. दूसरे शब्दों में (और मैंने अभी तक कोई मौसम स्टेशन डेटा नहीं देखा है), यह शायद गर्म रहा होगा."

संयुक्त राष्ट्र ने 2023 में कहा था कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण नेपाल के बर्फ से ढके पहाड़ों ने 30 से कुछ अधिक वर्षों में अपनी लगभग एक तिहाई बर्फ खो दी थी. एजेंसी ने उस वर्ष कहा था कि दो प्रमुख कार्बन उत्सर्जकों - भारत और चीन - के बीच स्थित नेपाल में ग्लेशियर पिछले दशक में उससे पिछले दशक की तुलना में 65% तेजी से पिघले हैं.

शूगर ने कहा, "आज सुबह प्लैनेट लैब्स की उपग्रह तस्वीरों में जो मैं देख सकता हूँ, उसके अनुसार एक ग्लेशियर का निचला हिस्सा लगभग 5,200 मीटर की ऊँचाई पर टूट गया और लगभग 1,200 मीटर नीचे घाटी के फर्श पर आ गिरा." उन्होंने कहा कि निर्माण कार्य भी एक कारक हो सकता है और "क्या जलवायु परिवर्तन ने भूमिका निभाई, यह एक ऐसी बात है जिस पर हम निसंदेह निकट भविष्य में विचार करेंगे."

'बर्फ-चट्टान का भूस्खलन'

लगभग 50,000 की आबादी वाले पहाड़ी जिले रसूवा में सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में कई पनबिजली परियोजनाएं स्थित हैं.

नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण ने कहा कि "ग्लेशियर युक्त बाढ़" ल्हेंडे नदी में नेपाल-चीन सीमा पार से लगभग 20 किलोमीटर (12 मील) उत्तर पूर्व में हुए भूस्खलन के कारण आई.

शुरुआती रिपोर्टों से यह भी पता चला है कि क्षेत्र में आए एक भूकंप के कारण हिमस्खलन हो सकता है और बाढ़ आ सकती है, लेकिन प्राधिकरण के एक भूविज्ञानी प्रकाश पोखरेल ने कहा कि यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि उसने ही इस त्रासदी को जन्म दिया या नहीं.

प्लैनेट लैब्स की छवियों की समीक्षा करने वाले पोखरेल ने कहा, "अचानक आई बाढ़ नेपाली पक्ष में बर्फ-चट्टान के हिमस्खलन (आइस-रॉक एवलांच) के कारण हुई."

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट का कहना है कि पूरे हिंदू कुश हिमालय में बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन और सूखे की आवृत्ति और भयंकरता बढ़ रही है, और इस पूरे क्षेत्र में पानी, भूमि और हवा में तेजी से हो रहे परिवर्तन लोगों के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं.

समूह ने बुधवार को कहा कि अचानक आई बाढ़ ने भोटे कोशी और त्रिशूली नदी प्रणालियों के माध्यम से पानी, तलछट और पत्थरों का एक शक्तिशाली प्रवाह भेजा. उन्होंने आगे कहा कि डाउनस्ट्रीम में गलछी क्षेत्र में नदी का जल स्तर कथित तौर पर 30 मिनट के भीतर नौ मीटर (30 फीट) तक बढ़ गया.

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