8,452 करोड़ रुपये के ‘पीएम केयर्स’ फंड ने सिर्फ 0.1% ही खर्च किया, ऑडिट में खुलासा होने के बाद उठे तीखे सवाल

केंद्र सरकार द्वारा जारी पीएम केयर्स फंड की नवीनतम ऑडिट रिपोर्ट ने फंड के उपयोग, पारदर्शिता और दान में आई गिरावट को लेकर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है. विपक्ष, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वित्तीय विशेषज्ञों ने रिपोर्ट के सामने आते ही सरकार की नीयत और फंड के प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक पीएम केयर्स फंड में 8,452.06 करोड़ रुपये की विशाल राशि शेष थी. इसमें से 7,846 करोड़ रुपये फिक्स्ड डिपॉजिट में और 605 करोड़ रुपये बचत बैंक खातों में जमा हैं.

हालाँकि, इतनी बड़ी रकम उपलब्ध होने के बावजूद वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान कुल राशि का केवल 0.01 प्रतिशत (मात्र 87.85 लाख रुपये) ही खर्च किया गया. यह राशि भी लगभग पूरी तरह 'पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रेन' योजना पर खर्च हुई, जो पिछले वर्ष के खर्च (15.37 करोड़ रुपये) से काफी कम है.

‘टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के मुताबिक, कांग्रेस नेताओं पवन खेड़ा और कुशाग्र सक्सेना ने आरोप लगाया कि एक तरफ जनता संकटों से जूझ रही है, वहीं सरकार हजारों करोड़ रुपये बिना खर्च किए दबाकर बैठी है. उन्होंने पूछा कि जब राष्ट्रीय आपातकाल बीत चुका है, तो इस पैसे का इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा है?

कांग्रेस की केरल इकाई ने आरोप लगाया कि टिकटॉक, हुआवेई और शाओमी जैसी चीनी कंपनियों ने इस फंड में दान दिया है. पार्टी ने सवाल उठाया कि क्या इन प्राप्तियों का असर सीमा पर चीन के प्रति सरकार के रुख पर पड़ा है.

सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने प्राप्तियों और भुगतानों के विवरण में पारदर्शिता की कमी उजागर की. उन्होंने एजेंसियों द्वारा वापस किए गए 324 करोड़ रुपये के रिफंड पर सवाल उठाया कि क्या यह खराब उपकरणों की जवाबदेही से बचने के लिए था. इसके अलावा, ऑडिट रिपोर्ट में यूडीआईएन (यूनिक डॉक्यूमेंट आइडेंटिफिकेशन नंबर) और संलग्न नोट्स का न होना भी बड़ी खामी माना जा रहा है.

सरकार का तर्क है कि पीएम केयर्स पूरी तरह से स्वैच्छिक योगदान पर आधारित एक फंड है, जिसे कोई सरकारी बजटीय सहायता नहीं मिलती.  सरकार के अनुसार, फिक्स्ड डिपॉजिट में राशि को सुरक्षित रखकर एक वित्तीय बैकअप तैयार किया गया है, ताकि भविष्य में किसी भी अचानक आए राष्ट्रीय संकट या आपातकाल के समय इसका तुरंत उपयोग किया जा सके. साथ ही, एफडी में रखी राशि पर ब्याज भी अर्जित हो रहा है.

इस बीच फंड में योगदान का ग्राफ लगातार गिर रहा है। वित्त वर्ष 2020-21 में जहाँ घरेलू दान 7,184 करोड़ रुपये था, वह 2024-25 में घटकर 479 करोड़ रुपये रह गया. इसी प्रकार, विदेशी दान 2020-21 के 495 करोड़ रुपये से घटकर 2024-25 में 92.8 लाख रुपये पर सिमट गया.

वित्तीय विशेषज्ञों और सीए समुदाय ने ऑडिट दाखिल करने में लगभग दो साल की देरी पर सवाल उठाए हैं. आलोचकों का कहना है कि आरटीआई, सीएजी और संसदीय जांच के दायरे से बाहर रखे जाने के बावजूद यह एक चैरिटेबल फंड के नियमों के अधीन है, फिर भी इसमें गोपनीयता बरती जा रही है.

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