अमेरिका के साथ ट्रेड वार्ता बिना किसी समझौते के समाप्त; बेहतर शर्तों के लिए डटा हुआ है भारत

‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच हुई व्यापार वार्ता बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई है. भारत ने किसी भी तरह की जल्दबाजी में किए जाने वाले समझौते को साफ तौर पर खारिज कर दिया है. भारत का स्पष्ट मानना है कि जब तक उसे अनुकूल शर्तें नहीं मिलतीं और कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में उसकी प्राथमिकताओं (रेड लाइन्स) का सम्मान नहीं होता, तब तक वह समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा.

दोनों देशों के बीच आम सहमति न बन पाने के दो मुख्य कारण हैं. एक तो टैरिफ लाभ की मांग. भारत चाहता है कि उसे चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में अमेरिकी बाजार में टैरिफ (शुल्क) का लाभ मिले. दूसरा, भविष्य के करों से सुरक्षा. भारत की मांग है कि इस समझौते के बाद अमेरिका उस पर कोई नया अतिरिक्त कर (लेवी) न लगाए.

दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता और बंधुआ मजदूरी के आरोपों के तहत भारत सहित कई देशों पर 10% से लेकर 12.5% तक के कड़े नए टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहा है. अमेरिका का तर्क है कि यदि भारत को व्यापार में तरजीही व्यवहार चाहिए, तो उसे भी अपनी तरफ से कुछ रियायतें देनी होंगी.

एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि वाशिंगटन भारत के साथ बातचीत में लगा हुआ है और अभी भी एक समझौते की उम्मीद करता है, लेकिन उन्होंने इसकी कोई समयसीमा नहीं बताई. हालांकि, अधिकारी ने यह भी जोड़ा कि भारत वार्ताओं में कभी-कभी धीमा, नौकरशाही रवैये वाला और कठिन रहा है, जो यह संकेत देता है कि किसी त्वरित समझौते की संभावना नहीं है. इस गतिरोध के बारे में पूछे जाने पर व्हाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने कहा: "ट्रंप प्रशासन एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए भारतीय अधिकारियों के साथ जुड़ा हुआ है, जो अमेरिकियों और 'अमेरिका फर्स्ट' को प्राथमिकता देता है."

अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत के पीछे न हटने की वजह उसकी आर्थिक स्थिति है. ईरान युद्ध के व्यवधानों के बावजूद, अप्रैल-जून तिमाही में महंगे पेट्रोलियम शिपमेंट के कारण भारत का कुल वस्तु निर्यात सालाना आधार पर 15% बढ़ा है. खाड़ी देशों और अमेरिका को होने वाला निर्यात फिर से मजबूत हुआ है.

भारत केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं है; ब्रिटेन के साथ उसका मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) इसी महीने लागू होने जा रहा है और अगले साल की शुरुआत तक यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ भी समझौता होने की उम्मीद है. गोल्डमैन सैक्स ने 2026 के लिए भारत के विकास अनुमान को बढ़ाकर 6.8% कर दिया है, जबकि महंगाई और चालू खाता घाटे के अनुमान को घटाया है. इसके अलावा, कमजोर रुपये से भारतीय निर्यातकों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ी है.

भारत यह भी देख रहा है कि अमेरिका के भीतर ही ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीतियों का विरोध हो रहा है. अमेरिका के 22 डेमोक्रेटिक राज्य अटॉर्नी जनरल ने इन प्रस्तावित शुल्कों पर कानूनी आपत्तियां जताई हैं.

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