अक्षय राउत | भारतीय चुनावों की चमक को बनाए रखने की आवश्यकता
भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के आसपास हो रहे निरंतर विरोध प्रदर्शनों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या अपनी निष्पक्षता के लिए प्रसिद्ध भारतीय चुनाव प्रणाली अपनी चमक खो रही है? मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और इसके प्रबंधन पर उठे सवालों ने विवाद खड़ा किया है, लेकिन चुनावी संकट केवल यहीं तक सीमित नहीं है.
‘द हिंदू’ में अक्षय राउत लिखते हैं कि दशकों से भारत की सबसे बड़ी 'सॉफ्ट पावर' माने जाने वाले चुनावों का मूल्यह्रास चिंताजनक है. एशिया और अफ्रीका के कई देशों की तुलना में भारत में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत रही हैं. लेकिन आज चुनावी प्रणाली के प्रति गिरते विश्वास को पुनर्स्थापित करने के लिए चुनाव प्रबंधकों, कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मतदाताओं को एक साथ सुधारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है.
लोकतंत्र की नींव और मजबूत स्तंभ
पारदर्शी और विश्वसनीय चुनावों ने भारत को राजनीतिक स्थिरता, बेहतर शासन और उत्तर-औपनिवेशिक पुनर्निर्माण का मार्ग दिया है. आजादी के समय व्यापक निरक्षरता और गरीबी के बावजूद, आम भारतीयों ने अपने वोट की ताकत को समझा.
डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा बोए गए संसदीय लोकतंत्र के बीजों को 'निर्वाचन सदन' से लेकर देश के लाखों पोलिंग बूथों तक फैली चुनाव प्रणाली ने सींचा है. 2024 के राष्ट्रीय चुनावों में 98 करोड़ मतदाताओं और विशाल भूगोल के बीच चुनाव का सफल आयोजन विश्व को अचंभित करता है. ईसीआई ने विकासशील देशों के लिए एक मार्गदर्शक संस्था के रूप में पहचान बनाई और ‘आईआईआईडीईएम’ (इंडिया इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेसी एंड इलेक्शन मैनेजमेंट) के माध्यम से वैश्विक स्तर पर चुनाव प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया.
उभरती चुनौतियां और घटता विश्वास
यद्यपि यह कहना जल्दबाजी होगी कि चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह दूषित हो चुकी है, लेकिन निष्पक्षता पर उठते सवाल चिंताजनक हैं. पहले चुनावों में कड़ा मुकाबला होता था, फिर भी हार-जीत को सहजता से स्वीकार किया जाता था. आज स्थिति बदल चुकी है; चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप और नतीजों को खारिज करने की आक्रामक प्रवृत्ति बढ़ रही है.
समय के साथ चुनावी रणनीतियां भी बदली हैं. अब ज़मीनी अभियानों की जगह डिजिटल लड़ाइयों, फर्जी खबरों और 'डीप फेक्स' ने ले ली है. अतीत में बूथ कैप्चरिंग और बाहुबल कुछ क्षेत्रों तक सीमित थे, लेकिन आज मतदाता डेटाबेस में हेरफेर या नाम हटाने-जोड़ने की आशंका बड़े पैमाने पर खतरा पैदा करती है.
धनबल, दल-बदल और संस्थागत विवाद
चुनावों में धनबल का बढ़ता प्रभाव सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है. उम्मीदवारों द्वारा जमा किए गए खर्च के आंकड़े वास्तविक चुनावी खर्च की तुलना में बहुत छोटे हैं. कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर बिना शर्त सीधे नकद हस्तांतरण (कैश ट्रांसफर) की प्रथा ने निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और सार्वजनिक वित्त को प्रभावित किया है. 'आर्थिक समीक्षा 2026' के अनुसार, राज्यों पर इसका भार ₹1.7 लाख करोड़ तक पहुंच गया है.
चुनाव के बाद की जोड़-तोड़ भी जनादेश को कमजोर करती है. दल-बदल विरोधी कानून की कमियों के कारण जनप्रतिनिधियों का थोक हस्तांतरण (बल्क डिफेक्शन) आम हो गया है. विचारधारा छोड़कर आसानी से दल बदलने वाले नेताओं के सामने पुराने 'आया राम, गया राम' भी निष्पाप नजर आते हैं.
दूसरी ओर, चुनाव आयोग स्वयं संस्थागत विवादों में घिरा है. 2023 के अधिनियम के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया और मतदाता सूची सुधार (एसआईआर) जैसे मामलों पर असंतोष बना हुआ है. 1951 में देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन के सामने लॉजिस्टिक्स की चुनौतियां थीं, लेकिन विश्वास की कमी नहीं थी. आज 75 वर्षों बाद, लॉजिस्टिक्स आसान है लेकिन 'विश्वास' ही सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है.
सामूहिक प्रयास और सुधार का मार्ग
राउत के मुताबिक, चुनाव "हम, भारत के लोग" की सर्वोच्च लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति हैं. इन्हें राजनीतिक लड़ाइयों का बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता. राजनीतिक दलों को दलीय स्वार्थों से ऊपर उठकर चुनावी व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण के लिए एक साथ आना होगा. 1993 में आयोग को बहु-सदस्यीय (तीन सदस्यीय) बनाने के पीछे भी यही मंशा थी.
आज निम्नलिखित प्राथमिकताओं पर तुरंत काम करने की आवश्यकता है:
पारदर्शिता: चुनाव आयोग के कामकाज, नियुक्ति और मतदाता सूची प्रबंधन में पूर्ण पारदर्शिता.
धनबल पर रोक: राजनीतिक वित्तपोषण और मुफ्त उपहारों (फ्रीबीज) का कड़ा नियमन.
तकनीकी सुरक्षा: एआई और डीपफेक के माध्यम से फैलाए जाने वाले फर्जी आख्यानों पर नियंत्रण.
कानूनी सुधार: दल-बदल विरोधी कानून को सख्त बनाना ताकि जनमत का अनादर न हो.
चुनावी व्यवस्था में जनता का अविश्वास लोकतंत्र के लिए घातक है. यदि भारत को अपने लोकतांत्रिक ढांचे को सुरक्षित रखना है, तो चुनावी प्रणाली में 'विश्वास' को हर हाल में वापस बहाल करना होगा.
(अक्षय राउत भारत निर्वाचन आयोग के पूर्व महानिदेशक और सार्वजनिक नीति विश्लेषक हैं. यह उनके अंग्रेजी में प्रकाशित लेख का हिंदी में अनूदित और संपादित अंश है.)

