भारत-चीन संबंधों में सुधार के बीच ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग का रेड कार्पेट स्वागत
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का ब्रिक्स विकासशील देशों के शिखर सम्मेलन के लिए भारत में रेड कार्पेट पर भव्य स्वागत किया गया. यह स्वागत ऐसे समय में हुआ है जब क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी बीजिंग और दिल्ली अपने संबंधों में आए सुधार का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे हैं, हालांकि वे डांवाडोल होती अमेरिकी वैश्विक प्रभुता के दौर में नेतृत्व के लिए चुपचाप प्रतिस्पर्धा भी कर रहे हैं.
‘द गार्डियन’ में ऑलिवर होम्स की रिपोर्ट है कि जैसे ही शी विमान से नीचे उतरे, उन्हें भारतीय सैनिकों के गार्ड ऑफ ऑनर और रंग-बिरंगी पोशाक पहने पारंपरिक नर्तकों के बीच से ले जाया गया. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान का भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पहले ही स्वागत किया जा चुका था.
यह सात वर्षों में शी की पहली भारत यात्रा है. इसे विवादित हिमालयी सीमा पर 2020 की घातक सैन्य झड़प के बाद सुलह की दिशा में सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है, जिसमें 20 भारतीय और चार चीनी सैनिक मारे गए थे.
परमाणु हथियार संपन्न इन दोनों एशियाई दिग्गजों के बीच संबंधों में हाल ही में सुधार देखा गया है, जहाँ उड़ानों और उच्च स्तरीय संपर्कों को धीरे-धीरे बहाल किया जा रहा है. चीन के विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि चीन मतभेदों को ठीक से प्रबंधित करने और "अच्छे पड़ोसी व मित्र" बनने के लिए भारत के साथ काम करने के लिए "इच्छुक" है.
पश्चिमी प्रभुत्व का मुकाबला करने का प्रयास
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब यूक्रेन और मध्य पूर्व में जारी युद्ध, तथा बढ़ते अमेरिका-चीन तनाव इस गुट की आम सहमति बनाने की क्षमता का परीक्षण कर रहे हैं. 2009 में अपनी स्थापना के बाद से, प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मंच के रूप में ब्रिक्स का विस्तार हुआ है, जिसमें अब मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल हैं. यह समूह अब उन्नत अर्थव्यवस्थाओं वाले अमेरिका-प्रभुत्व वाले G7 मंच को चुनौती दे रहा है, और दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है.
लेकिन इसके विस्तार ने नई दरारें और असहमति भी पैदा की हैं—ईरान इस साल की शुरुआत में सऊदी अरब और यूएई पर बमबारी कर रहा था, और मई में दिल्ली में मिले ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्री एक संयुक्त बयान पर सहमत होने में विफल रहे थे.
'नई दिल्ली घोषणापत्र' और कूटनीतिक रुख
शनिवार को, यह गुट सर्वसम्मति से एक संयुक्त घोषणा पत्र के प्रारूप पर सहमत होने में सफल रहा, जिसने "संवाद, परामर्श और कूटनीति के माध्यम से" अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की प्रतिबद्धता दोहराई.
'नई दिल्ली घोषणापत्र' ने मध्य पूर्व में "अधिकतम संयम" का आह्वान किया, हालांकि इसे इस तरह तैयार किया गया था कि संघर्षों में सक्रिय रूप से शामिल सदस्य देशों पर सीधा सवाल न उठे.
'चाइना थिंकटैंक काउंसिल फॉर ब्रिक्स को-ऑपरेशन' (चीन) की विशेषज्ञ समिति के उपाध्यक्ष ज्यांग शिक्सू ने कहा कि 11 सदस्य "कई मुद्दों पर एक सुर में बात नहीं कर सकते." उन्होंने 'साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट' से कहा, "इसका एकमात्र समाधान राजनीतिक सहमति को लगातार मजबूत करना है."
अमेरिका और पश्चिम को लेकर भिन्न दृष्टिकोण
बीजिंग और दिल्ली का इस समूह की भूमिका को लेकर अलग-अलग नजरिया है. चीन ने डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व वाले अमेरिका के मुकाबले ब्रिक्स की ताकत बढ़ाने की कोशिश की है. ट्रम्प प्रशासन ने वैश्विक शुल्क (टैरिफ) और व्यापार युद्ध शुरू किए हैं तथा संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संस्थानों से दूरी बनाई है, जिससे अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता मिली थी.
इसके विपरीत, भारत ने अधिक सतर्क रुख अपनाया है, और ब्रिक्स को पश्चिम तथा विकासशील दुनिया के बीच एक पुल के रूप में देखता है. शनिवार की वार्ता मोदी के संबोधन के साथ शुरू हुई, जिन्होंने कहा कि ब्रिक्स "किसी के खिलाफ नहीं" है.
'चैथम हाउस' के एशिया-प्रशांत कार्यक्रम में दक्षिण एशिया के वरिष्ठ शोधकर्ता क्षितिज बाजपेयी ने कहा कि इतने उथल-पुथल भरे अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान दिल्ली के लिए अपनी "रणनीतिक हेजिंग" (संतुलन बनाने) की नीति को बनाए रखना कठिन रहा है.
उन्होंने लिखा, "एक ऐसे मंच में भारत की स्थिति बेमेल लग सकती है जिसमें चीन, रूस और ईरान जैसे अधिक स्पष्ट रूप से पश्चिम-विरोधी एजेंडे वाले देश शामिल हैं. दो अन्य ब्रिक्स देश, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील भी अमेरिका के साथ हाई-प्रोफाइल कूटनीतिक विवाद झेल चुके हैं."
"दिल्ली के सामने चुनौती यह है कि वह इस वैश्विक दृष्टिकोण को इस तरह से बढ़ावा देना चाहती है जो गैर-पश्चिमी हो, लेकिन स्पष्ट रूप से पश्चिम-विरोधी न हो."

