सभी मनुस्मृति ग्रंथों में पक्षपात: शिक्षाविदों ने केंद्र व भाजपा के दावों को गलत बताया, ब्रिटिश काल की मिलावट के दावों को चुनौती

कई शिक्षाविदों (विशेषज्ञों) ने केंद्र सरकार और भाजपा के इस दावे का खंडन किया है कि मनुस्मृति की वे विवादित सामग्रियां, जो गहरी जातिगत और लैंगिक असमानता को बढ़ावा देती हैं, मूल पाठ (टेक्स्ट) का हिस्सा नहीं हो सकती हैं और प्रचलन में मौजूद संस्करणों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.

शिक्षाविदों ने कहा कि मनुस्मृति के सभी संस्करण—जो 'धर्मशास्त्र' नामक प्राचीन ग्रंथों के संग्रह का हिस्सा हैं और सामाजिक, कानूनी व नैतिक मानदंडों पर चर्चा करते हैं—शूद्रों और अति-शूद्रों को शैक्षिक तथा आर्थिक अधिकारों से वंचित करने के मामले में एकमत हैं, जिन्हें ग्रंथ द्वारा निर्धारित जाति व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर रखा गया है.

बसंत कुमार मोहंती की रिपोर्ट के अनुसार, मनुस्मृति पर सरकार का बचाव 30 जुलाई को राज्यसभा में परीक्षा पेपर लीक के लिए सजा बढ़ाने वाले विधेयक पर चर्चा के दौरान सामने आया था, जब विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस पुस्तक की एक प्रति का हवाला देते हुए इसे पढ़ना चाहा था.

सदन के नेता और स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा का कहना था कि यह पुस्तक मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि पर आधारित नहीं थी और खड़गे से इसकी प्रामाणिकता साबित करने को कहा. नड्डा ने कहा, "विपक्ष के नेता खड़गे द्वारा दिया गया भाषण समाज में वैमनस्य पैदा करता है. यह मूल ग्रंथ नहीं है. उन्हें इसे मूल ग्रंथ से प्रामाणिक सिद्ध करना चाहिए. मुझे मनुस्मृति का मूल ग्रंथ चाहिए, ब्रिटिश काल से पहले का मूल ग्रंथ."

भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश विलियम जोन्स ने 1790 में सबसे पहले मनुस्मृति का अनुवाद किया था. उन्होंने बाबासाहेब बी.आर. अंबेडकर की पुस्तक 'हू वर शूद्राज' का हवाला देते हुए ग्रंथ का बचाव करने की कोशिश की, जिसमें कहा गया है कि "आधुनिक काल की अनुसूचित जातियों और वैदिक कालीन शूद्रों के बीच कोई संबंध नहीं है."

त्रिवेदी ने कहा, "पुस्तका 'द अनटचेबल्स' में अंबेडकर ने लिखा है कि मनु के युग में अस्पृश्यता (छुआछूत) नहीं थी. मूल पाठ उपलब्ध नहीं है. यह (खड़गे द्वारा संदर्भित पुस्तक) अंग्रेजों द्वारा तैयार की गई है."

कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी का कहना था कि खड़गे जिस किताब को अपने साथ लाए थे, वह परिमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई थी, वह भी मौजूदा सरकार के कार्यकाल के दौरान.

22 अगस्त को, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पुणे में 'छात्रों की गूंज' सभा में कहा कि पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के लिए मनुस्मृति जिम्मेदार है.

राहुल ने कहा, "मनुस्मृति कहती है कि बचपन में स्त्री अपने पिता के अधीन होती है. युवावस्था में वह अपने पति के अधीन होती है. जब उसका 'स्वामी' मर जाता है, तो वह अपने बेटों के अधीन होती है. एक महिला को कभी स्वतंत्र नहीं होना चाहिए. यह मनुस्मृति का सीधा उद्धरण है. ये शब्द शर्मनाक हैं. क्योंकि ये शब्द कभी बोले ही नहीं जाने चाहिए थे."

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू के संकाय सदस्य प्रो. वाई.एस. अलोन, जो जाति अध्ययन और व्याख्याओं में विशेषज्ञता रखते हैं, ने कहा कि मनुस्मृति के सभी संस्करणों में महिलाओं और शूद्रों पर एक ही जैसी सामग्री है. उन्होंने कहा, "मनुस्मृति का ऐसा कोई संस्करण नहीं है जहां महिलाओं और शूद्रों को सवर्ण हिंदुओं के बराबर स्थान दिया गया हो. विलियम जोन्स ने उसी मनुस्मृति का अनुवाद किया था जो उपलब्ध थी."

अलोन ने आगे कहा, "जो लोग कहते हैं कि विलियम जोन्स तथा अन्य विद्वानों द्वारा अंग्रेजी में और भारतीय विद्वानों द्वारा भारतीय भाषाओं में किए गए मनुस्मृति के अनुवाद सच्चे संस्करण नहीं हैं, उन्हें तथाकथित मूल और सही संस्करण प्रस्तुत करने चाहिए. राजनीतिक वर्ग और सवर्ण अपने तर्कों के समर्थन में कभी कोई सबूत नहीं देते हैं."

अंबेडकरवादी विद्वान और 'डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर सोर्स मटेरियल पब्लिकेशन कमेटी' (महाराष्ट्र सरकार) के पूर्व सदस्य सचिव प्रदीप आगलावे ने आरोप लगाया कि भाजपा-आरएसएस आंबेडकर के विचारों को संदर्भ से बाहर पेश कर रहे हैं.

आगलावे ने कहा कि मनुस्मृति की प्रतियां—जिसे उन्होंने "जाति व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों द्वारा तैयार किए गए कानूनों की एक अन्यायपूर्ण और अमानवीय संहिता" के रूप में वर्णित किया—को 25 दिसंबर, 1927 को महाड़ सम्मेलन के दौरान अंबेडकर और उनके सहयोगियों द्वारा इसके असमान और जाति-आधारित नियमों के विरोध में सार्वजनिक रूप से जलाया गया था.

आगलावे ने कहा, "लोगों के एक वर्ग ने अंबेडकर के विचारों को संदर्भ से बाहर उद्धृत करना शुरू कर दिया है. अंबेडकर ने कहीं भी मनुस्मृति की प्रशंसा नहीं की. उन्होंने 1927 में इसकी एक प्रति जलाई क्योंकि उन्होंने इसे अस्पृश्यता और असमान जाति संरचना के प्राथमिक स्रोत के रूप में पहचाना था."

उन्होंने कहा कि अंबेडकर ने अपनी पुस्तक 'रिडल्स इन हिंदुइज्म' में एक अध्याय "द मैडनेस ऑफ मनु ऑर द ब्राह्मनिक एक्सप्लेनेशन ऑफ द ओरिजिन ऑफ द मिक्स्ड कास्ट्स" को समर्पित किया था, जहां उन्होंने तर्क दिया कि मनुस्मृति ने जाति पदानुक्रम के लिए एक व्यवस्थित और धार्मिक औचित्य प्रदान किया. आगलावे ने कहा, "अंबेडकर ने मनु के नियमों और न्याय, समानता तथा नैतिकता के सिद्धांतों के बीच विरोधाभासों को रेखांकित किया. उन्होंने तर्क दिया कि मनुस्मृति ने जाति-आधारित असमानता और भेदभाव को संस्थागत रूप दिया."

हालांकि, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. सदाशिव द्विवेदी ने कहा कि पांडुरंग वामन काणे ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र' में लिखा था कि विवादित सामग्रियों को मनुस्मृति की पुस्तकों में स्थान "शुरुआत में ज्ञान के संचार में त्रुटियों और बाद में अंग्रेजों द्वारा की गई मिलावट (प्रक्षेप) की त्रुटियों" के कारण मिला.

द्विवेदी ने कहा, "मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि खोजना कठिन है. प्रारंभ में, विभिन्न लिपिकारों ने पांडुलिपियों से बोलकर लिखवाई गई मनुस्मृति के पाठ लिखे थे. संचार के अभाव के कारण उनसे गलतियां हुईं. बाद में, ब्रिटिश विद्वानों ने उपलब्ध पाठों का अनुवाद किया. पी.वी. काणे ने लिखा है कि मनुस्मृति की पुस्तकों में बहुत सी विवादित सामग्रियां ब्रिटिश विद्वानों द्वारा किए गए प्रक्षेप (मिलावट) के कारण हैं."

उन्होंने आगे कहा, "भारतीयों का सभी धार्मिक ग्रंथों पर अटूट विश्वास था. मनुस्मृति ऐसा ही एक धार्मिक ग्रंथ है. अंग्रेज चाहते थे कि लोग धर्मग्रंथों पर संदेह करें. इसीलिए उन्होंने मिलावट की और ऐसी सामग्री प्रस्तुत की जिससे समाज में विभाजन पैदा हो."

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