छत्तीसगढ़ में बंगाली हिरासत में: ‘मैं भारतीय और मेरा छोटा भाई बांग्लादेशी कैसे हो सकता है?’

मुस्तकीम शेख और उनके छोटे भाई साबिर को 21 अन्य लोगों के साथ छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित सिरगिट्टी थाना पुलिस ने 4 सितंबर की रात को हिरासत में लिया और राजधानी रायपुर के एक डिटेंशन सेंटर (हिरासत केंद्र) ले जाया गया.

चौदह दिनों बाद, मुस्तकीम 18 अन्य लोगों के साथ डिटेंशन सेंटर से बाहर आ गए, जबकि उनके छोटे भाई, दो चचेरे भाई और एक अन्य व्यक्ति अभी भी वहीं बंद हैं. मुस्तकीम का नाम मतदाता सूची में है; उनके भाई का नहीं है.

अर्नब गांगुली की रिपोर्ट के मुताबिक, इस गर्मी में हुए बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान बंगाल के मुस्लिम बहुल जिले मुर्शिदाबाद के रहने वाले साबिर, उनके चचेरे भाई शफीकुल और दो अन्य लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए थे.

रायपुर के डिटेंशन कैंप से लौटने के दो दिन बाद मुस्तकीम ने 'द टेलीग्राफ ऑनलाइन' को बताया, "हम छह भाई-बहन हैं. हममें से पांच के नाम मतदाता सूची में थे, लेकिन साबिर का नाम गायब था." उन्होंने सवाल किया: "मैं भारतीय और मेरा छोटा भाई बांग्लादेशी कैसे हो सकता है?"

समशेरगंज के हिरणंदपुर के निवासी मुस्तकीम ने छत्तीसगढ़ में एक दशक से अधिक समय बिताया है, पहले वे कपड़े बेचते थे और बाद में बिलासपुर के इलाकों में एल्यूमीनियम के बर्तन बेचने लगे.

उनके भाई साबिर, चचेरे भाई शफीकुल व नसीरुद्दीन और मुर्शिदाबाद के समशेरगंज, सूती और रघुनाथगंज के कई अन्य लोग बिलासपुर रेलवे स्टेशन के पास एक कॉलोनी में रह रहे थे.

दो महीने से भी अधिक समय पहले एक देर रात, सिरगिट्टी पुलिस स्टेशन के अधिकारियों ने उनके दरवाजे पर दस्तक दी. उन्हें सभी दस्तावेजों के साथ थाने आने का निर्देश दिया गया.

मुस्तकीम ने कहा, "हम थाने गए और पूरे दिन इंतजार किया. किसी ने हमसे बात नहीं की. हमें जाने के लिए कह दिया गया. 3 सितंबर को पुलिस वापस आई और हमारे नाम और फोन नंबर लिखे. अगली शाम, हमें हमारे घर से उठा लिया गया और रायपुर के डिटेंशन सेंटर ले जाया गया."

उन्होंने बताया कि बस में रायपुर ले जाते समय सभी 23 बंगाली भाषी मुस्लिम पुरुषों को आश्वासन दिया गया था कि पूछताछ के बाद उन्हें छोड़ दिया जाएगा.

मुस्तकीम ने कहा, "डिटेंशन सेंटर में जितने दिन हम बंद रहे, कोई हमसे पूछताछ करने नहीं आया. हमारे साथ कोई शारीरिक दुर्व्यवहार या टॉर्च नहीं किया गया, लेकिन कई दिनों तक अंदर बंद रहना ही अपने आप में एक सजा थी."

सूती के शहाबादा के रहने वाले रमजान शेख अपने भाई एजाजुल शेख को छुड़ाने के लिए बिलासपुर गए थे.

रमजान ने बताया, "मुझसे यह साबित करने के लिए 'फैमिली ट्री' (वंशावली) पेश करने को कहा गया कि मेरा भाई वास्तव में मेरा रिश्तेदार है." उनके भाई शुक्रवार को उनके साथ लौट आए.

18 सितंबर को हिरासत में लिए गए कुल 19 लोगों से रायपुर से ट्रेन पकड़कर छत्तीसगढ़ छोड़ने को कहा गया.

मुस्तकीम ने कहा, "हम जहाँ रहते थे, वहाँ हमारा थोड़ा-बहुत जो सामान था, वह वहीं पड़ा हुआ है. हमसे बिलासपुर न जाने को कहा गया है. लेकिन हम दिहाड़ी मजदूर हैं. हम सामान बेचने के लिए घर-घर जाते हैं. रोजी-रोटी कमाने के लिए हमें किसी न किसी राज्य में जाना ही पड़ता है. हम कब तक यहाँ बैठे रह सकते हैं?"

चूँकि एसआईआर प्रक्रिया देश के बाकी हिस्सों में भी फैल गई है, ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें एसआईआर में नाम हटाए जाने के कारण मतदाता अपने पासपोर्ट का नवीनीकरण नहीं करा सके. कम से कम एक अदालती मामले में एसआईआर से नाम हटने के कारण आईआईटी पीएचडी आवेदन लंबित होने का उल्लेख किया गया है.

फिलहाल, साबिर को बस यह साबित करने के लिए सबूत की जरूरत है कि वह भारतीय नागरिक मुस्तकीम का छोटा भाई है और वह खुद भी एक भारतीय नागरिक है.

ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य समीरुल इस्लाम ने 'द टेलीग्राफ ऑनलाइन' को बताया, "हम बिलासपुर में अधिकारियों से जवाब का इंतजार कर रहे हैं. अगर इन चार लोगों को इस सप्ताह के अंत तक रिहा नहीं किया जाता है, तो हम अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे."

उन्होंने आगे कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भाजपा शासित राज्यों में अधिकारियों द्वारा बंगाली भाषी मुसलमानों को अभी भी निशाना बनाया जा रहा है."

रिपोर्ट के अनुसार, 27 फरवरी को बंगाल में प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद, अकेले मुर्शिदाबाद जिले में 11,21,205 मतदाताओं को न्यायनिर्णयन (अदालती समीक्षा) के तहत रखा गया था, जो बंगाल में सबसे अधिक है.

बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने से पहले, मुर्शिदाबाद में 57,64,085 मतदाता थे. इनमें से 2,93,822 नामों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट के रूप में चिह्नित किया गया था और पिछले साल दिसंबर में अन्य 4,55,137 नाम हटा दिए गए थे.

चुनाव आयोग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक हलफनामे के अनुसार, अपीलीय न्यायाधिकरणों द्वारा न्यायनिर्णयन प्रक्रिया शुरू किए जाने के बाद के पांच महीनों में लगभग 1,26,194 मामलों का निपटारा किया जा चुका है.

इस बीच, साबिर अभी भी अपने घर से लगभग 1,000 किलोमीटर दूर एक डिटेंशन सेंटर में इंतजार कर रहा है.

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