आकार पटेल | सत्ता को विरोध से डर लगता है
कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन को देखकर कुछ बातें ज़ेहन में आती हैं.
सोनम वांगचुक समेत कार्यकर्ताओं की भूख हड़ताल की एक ही माँग थी, शिक्षा मंत्री इस्तीफ़ा दें. क्यों? क्योंकि मंत्री अपने सबसे अहम कामों में से एक में नाकाम रहे नीट (NEET) परीक्षा को बिना भ्रष्टाचार के करा पाना. पाठकों को याद होगा कि 2024 में पेपर लीक हुआ था, फिर भी वही मंत्री पद पर बने रहे, बल्कि पद से चिपके रहे.
इस साल सरकार को मानना पड़ा कि इस मामले में भ्रष्टाचार हुआ है, और उसने परीक्षा रद्द कर दी. इससे 20 लाख छात्र-छात्राएँ मुश्किल में पड़े. उनके परिवारों को भी जोड़ लें, तो सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले क़रीब एक करोड़ भारतीय थे. सब के सब उस भारी तनाव, चिंता और असुरक्षा के शिकार हुए, जो भारतीयों को लगातार सताती रहती है.
रद्द हुई परीक्षा और दोबारा परीक्षा के बीच के 37 दिनों में बारह युवा लड़के-लड़कियों ने आत्महत्या कर ली. और ये सिर्फ़ वे हैं, जिनके बारे में हमें पता चल सका. सरकार ने मान लिया कि प्रश्नपत्रों के मामले में शिक्षा मंत्रालय पर भरोसा नहीं किया जा सकता, इसलिए उन्हें परीक्षा केंद्रों तक पहुँचाने का काम वायुसेना को सौंप दिया गया. इसे हम एक स्टंट की तरह देख सकते हैं, या फिर एक और लीक के असली डर के सबूत की तरह. दोनों ही सूरतों में सरकार की छवि अच्छी नहीं दिखती.
लेकिन यह मान लेने के बाद भी कि उनके शिक्षा मंत्री नीट में भ्रष्टाचार रोकने में नाकाम रहे, प्रधानमंत्री ने जवाबदेही के विचार को ही ख़ारिज कर दिया. उन्होंने शिक्षा मंत्री को बनाए रखना चुना, और हम अपने-अपने हिसाब से इसकी वजहें गढ़ सकते हैं. जो लोग प्रधानमंत्री को नापसंद करते हैं, वे कहेंगे कि तानाशाह अपने अहंकार के चलते ग़लती मानने से कतराते हैं, या यह कि ग़लती मानने से उनकी छवि ख़राब होती है. जो उन्हें पसंद करते हैं, वे भी धर्मेंद्र प्रधान को बनाए रखने की कोई ऐसी ही कहानी गढ़ लेंगे. कहानी कोई भी हो, फ़र्क़ नहीं पड़ता. तथ्य यह है कि घोटाले और खुली अक्षमता के बावजूद प्रधान अपनी जगह बने हुए हैं.
अब आगे यह होगा कि वे सरकार के लिए एक बोझ बने रहेंगे और उँगलियाँ उन पर उठती रहेंगी. अक्षमता और भ्रष्टाचार की भारत की समस्याएँ असली हैं, संरचनात्मक हैं और सामाजिक भी. सिर्फ़ भ्रम में जीने वाले ही मानते हैं कि प्रधानमंत्री ने 2014 में जादू की छड़ी घुमाकर उन्हें दूर कर दिया था.
दूसरी बात यह कि विरोध प्रदर्शन, चाहे वह शांतिपूर्ण हो और किसी को कोई तकलीफ़ न दे, भारत में एक तरह से वर्जित हो चुका है, क्योंकि हम सिर्फ़ आंशिक रूप से लोकतांत्रिक हैं. यही निष्कर्ष कई अंतरराष्ट्रीय सूचकांक निकाल चुके हैं, और इसका सबूत हमारे सामने रोज़ आता है. पिछले कुछ वर्षों में शांतिपूर्ण सभा अनुच्छेद 19 के तहत एक मौलिक अधिकार, जिसे राज्य के अतिक्रमण से ऊँचे दर्जे की सुरक्षा हासिल है पहले एक परेशानी में बदली, और फिर एक अपराध में. लोकतंत्र की जननी अपने बच्चों के असहमत होते ही उनके प्रति बेहद असहिष्णु हो जाती है.
न्यायपालिका और कार्यपालिका ने मिलकर उस भौतिक जगह को सिकोड़ दिया है, जहाँ शांतिपूर्ण विरोध हो सकते हैं. मुंबई में विरोध आज़ाद मैदान तक सीमित है; बेंगलुरु में फ्रीडम पार्क तक, जहाँ प्रदर्शन दम तोड़ देते हैं; और दिल्ली में जंतर-मंतर तक. और अब भारतीयों को बता दिया गया है कि इन "निर्दिष्ट क्षेत्रों" में भी विरोध इस सरकार को मंज़ूर नहीं.
तीसरी बात जब प्रदर्शनकारियों के पास संकल्प और रणनीति दोनों हों, तो वे अक्सर जीतते हैं और सरकार को पीछे हटना पड़ता है. कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ आंदोलन में किसानों ने यह सबसे शानदार ढंग से कर दिखाया. प्रधानमंत्री ने उनके थकने का इंतज़ार किया, नाकाम रहे, और फिर न सिर्फ़ उनके आगे झुके, बल्कि माफ़ी भी माँगी.
इस नज़रिए से अक्सर सोचा नहीं जाता, लेकिन राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों की कामयाबी भी एक वजह है कि हमारे यहाँ अब तक ऐसे नज़रबंदी शिविर नहीं बने, जिनमें लाखों भारतीय बंद हों. सबसे दमनकारी और अत्याचारी राज्य में भी शांतिपूर्ण विरोध ऐसा असर छोड़ सकता है, जिसे आसानी से कुचला नहीं जा सकता. एक वजह है कि दुनिया तियानमेन स्क्वायर नाम की जगह को जानती है. जो लोग मुंडेर से ऊपर सिर उठाने का साहस दिखाते हैं, उन्हें इसकी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है, लेकिन उनकी कहानियाँ सुनी ज़रूर जाएँगी.
ज़ाहिर है, इसीलिए सरकार ने वांगचुक की भूख हड़ताल को नाकाम करने की कोशिश की. जो लोग निराश थे कि इससे कुछ हासिल नहीं हो रहा, वे यह नहीं देख पाए कि संरचनात्मक रूप से सब कुछ विरोध के पक्ष में था. उसे ध्यान मिल रहा था, और सहानुभूति भी.
तो अब आगे क्या? सरकार की दिक़्क़त यह है कि प्रदर्शनकारियों ने उसे पैंतरेबाज़ी की ज़्यादा गुंजाइश नहीं दी है. कॉकरोच जनता पार्टी की माँग छोटी और वाजिब है. ज़िम्मेदार मंत्री को हटाओ. सरकार का जवाब, जितना समझ आता है, यह है. हाँ, समस्या तो है, लेकिन नहीं, हम कुछ नहीं करेंगे. यह तर्कसंगत नहीं है, और प्रदर्शनकारी यह जानते हैं. वक़्त और रफ़्तार, दोनों उनके साथ हैं.
आख़िरी बात. हफ़्तों चलने वाले इन गहरे विरोध प्रदर्शनों में शामिल लोगों को जो शिक्षा मिलती है, वह बाहर बैठे हम लोगों को कभी नहीं मिल सकती. यह सफ़र चाहे जैसे भी ख़त्म हो, इसके अंत तक ये युवा भारत सरकार, न्यायपालिका, मीडिया, पुलिस, क़ानूनों और ख़ुद भारतीय समाज के बारे में कुछ ज़रूरी बातें जान चुके होंगे. यह समझ बाहर बैठे हम लोगों को नहीं आ सकती चाहे हम कितने ही बूढ़े, ज्ञानी या बुद्धिमान क्यों न हों.

