भारत का ग्रेट फायरवॉल: पोस्ट हटाना आसान, चुनौती देना मुश्किल
‘आर्टिकल-14’ की वरिष्ठ संपादक कविता अय्यर ने लिखा है कि भारत में ऑनलाइन सेंसरशिप की सरकारी व्यवस्था तेजी से ऐसी दिशा में बढ़ रही है, जहां सोशल मीडिया सामग्री हटाना बेहद आसान और उस कार्रवाई को चुनौती देना मुश्किल होता जा रहा है. प्लेटफॉर्म्स को सरकारी या अदालत के आदेश पर सामग्री हटाने के लिए मिलने वाली समय-सीमा 36 घंटे से घटाकर तीन घंटे कर दी गई है. साथ ही, स्वचालित तकनीकी प्रणालियों के बढ़ते इस्तेमाल ने मानवीय समीक्षा की भूमिका भी कम कर दी है.
8 सितंबर 2026 को इंस्टाग्राम ने ‘आर्टिकल-14’ की एक पोस्ट भारत में ब्लॉक कर दी. पोस्ट लद्दाख में सितंबर 2025 के राज्य का दर्जा मांगने वाले प्रदर्शन के दौरान पुलिस गोलीबारी में चार नागरिकों की मौत से जुड़ी रिपोर्ट पर आधारित थी. मृतकों के परिवार एक साल बाद भी यह जानने का इंतजार कर रहे हैं कि गैर-घातक तरीकों के इस्तेमाल से पहले घातक बल क्यों प्रयोग किया गया. न्यायिक जांच भी अभी अपने निष्कर्ष तक नहीं पहुंची है.
इंस्टाग्राम ने पोस्ट हटाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(बी) का हवाला दिया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि पोस्ट में ऐसा क्या गैरकानूनी था जिसके कारण उसे हटाया गया. ‘द वायर’ और ‘मकतूब मीडिया’ से जुड़े मामलों में भी सोशल मीडिया सामग्री हटाने के ऐसे उदाहरण सामने आए, जिनमें हटाने के कानूनी आधार को लेकर सवाल उठे.
36 घंटे से घटकर तीन घंटे
इस साल सरकार ने आईटी नियमों में बदलाव करते हुए प्लेटफॉर्म्स को सरकारी या अदालत के आदेश पर सामग्री हटाने का समय 36 घंटे से घटाकर तीन घंटे कर दिया. सरकार ने डीपफेक, बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री, बिना सहमति की अंतरंग तस्वीरों और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसे गंभीर खतरों से निपटने को इसका आधार बताया.
लेकिन यही व्यवस्था तब चिंता पैदा करती है जब असाधारण नुकसान से निपटने के लिए बनाई गई मशीनरी सामान्य ऑनलाइन भाषण को नियंत्रित करने का माध्यम बन जाए.
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक मार्च से जुलाई 2026 के बीच प्लेटफॉर्म्स को करीब 2.98 लाख यूआरएल हटाने के लिए भेजे गए. इनमें करीब 2.44 लाख, यानी 82 प्रतिशत, राज्य सरकारों की ओर से थे. लगभग 51,000 अनुरोध भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र यानी आई4सी ने साइबर और शेयर बाजार से जुड़े घोटालों के मामलों में भेजे.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक इसी अवधि में इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब को करीब 1.95 लाख सामग्री या खातों को ब्लॉक करने के आदेश मिले. यह औसतन हर दिन करीब 1,275 कार्रवाई और हर 68 सेकंड में एक कार्रवाई के बराबर है.
प्रेस सूचना ब्यूरो ने कहा कि भारत में करीब 60 करोड़ उपयोगकर्ता हर 68 सेकंड में 78,703 तक सामग्री पोस्ट करते हैं, इसलिए औसतन किसी एक सामग्री का गैरकानूनी होना संभव है. लेकिन असली सवाल यह है कि जब राज्य किसी सामग्री को गैरकानूनी मानकर उसे हटाने का आदेश देता है, तो प्रभावित व्यक्ति को अपनी बात रखने का मौका कब मिलता है.
हटाने की रफ्तार, कानूनी प्रक्रिया से आगे
आईटी अधिनियम की धारा 69ए सरकार को ऑनलाइन सूचना तक सार्वजनिक पहुंच रोकने की शक्ति देती है. 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने अस्पष्ट आधार पर ऑनलाइन भाषण को अपराध बनाने वाली धारा 66ए को असंवैधानिक घोषित किया था, जबकि धारा 69ए को प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के कारण बरकरार रखा.
धारा 69ए में आपातकालीन प्रावधान भी था, जिसके तहत तत्काल खतरे की स्थिति में प्रभावित व्यक्ति को पहले सुने बिना अंतरिम ब्लॉकिंग आदेश दिया जा सकता था. चिंता यह है कि आपातकाल के लिए बनाई गई व्यवस्था कहीं ऑनलाइन भाषण को नियंत्रित करने की सामान्य प्रक्रिया न बन जाए.
सह्योग पोर्टल और स्वचालन
2024 में एक्स ने केंद्र के ‘सह्योग’ पोर्टल को चुनौती देते हुए इसे ‘सेंसरशिप पोर्टल’ बताया था. 2025 में अदालत ने चुनौती खारिज करते हुए इसे नियमन की सुविधा देने वाला तंत्र बताया. अब एक्स ने गृह मंत्रालय पर उसे सह्योग से जुड़ने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया है.
सरकार के मुताबिक 2025 में मेटा ने सह्योग पोर्टल के साथ एपीआई एकीकरण का अनुरोध किया था. इसके जरिए सरकारी निर्देश सीधे मेटा की प्रणालियों तक पहुंच सकते हैं और सामग्री हटाने की प्रक्रिया स्वचालित हो सकती है.
समस्या यह है कि तकनीक संदर्भ नहीं समझती. व्यंग्य, राजनीतिक आलोचना, प्रदर्शन का वीडियो या पत्रकार की रिपोर्ट को समझने के लिए संदर्भ जरूरी है. एपीआई केवल प्रक्रिया को तेज करता है.
ऑनलाइन सेंसरशिप में सबसे बड़ा सवाल इसलिए केवल यह नहीं है कि कोई पोस्ट हटाना उचित था या नहीं. सवाल यह है कि क्या ऐसी व्यवस्था सामान्य हो रही है जिसमें पोस्ट गायब होना तत्काल है, लेकिन उसे चुनौती देना धीमा और कठिन है.
जब सामग्री हटाने से पहले सुनवाई का अवसर नहीं मिलता और बाद में भी प्रभावी चुनौती का रास्ता उपलब्ध नहीं होता, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की एक महत्वपूर्ण सुरक्षा — उचित कानूनी प्रक्रिया — कमजोर पड़ सकती है.

