स्कूलों के मिड-डे मील से अंडे हटेंगे, पश्चिम बंगाल का हिंदुत्व एजेंडा क्या बच्चों के पोषण पर भारी पड़ेगा ?
पश्चिम बंगाल में स्कूलों के मिड-डे मील से अंडे हटाने के फैसले ने एक बार फिर भोजन, पोषण और राजनीति पर बहस छेड़ दी है. भाजपा सरकार ने जून में घोषणा की कि सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील तैयार करने की जिम्मेदारी इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (इस्कॉन) को सौंपी जाएगी. संगठन ने कहा है कि अंडों की जगह सोयाबीन, राजमा और पनीर जैसे शाकाहारी विकल्प दिए जाएंगे. सरकार और इस फैसले के समर्थकों का कहना है कि इन विकल्पों से बच्चों को पर्याप्त पोषण मिलेगा, जबकि आलोचकों का आरोप है कि यह फैसला वैज्ञानिक पोषण मानकों के बजाय वैचारिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाता है.
अशोक स्वैन की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पहला मौका नहीं है जब किसी भाजपा शासित राज्य में स्कूलों के भोजन से अंडे हटाए गए हों. 2015 में मध्य प्रदेश सरकार ने मिड-डे मील में अंडे शामिल करने से इनकार कर दिया था. 2025 में महाराष्ट्र सरकार ने भी स्कूलों में अंडे और बाजरे से बने मीठे व्यंजनों के लिए सरकारी वित्तीय सहायता वापस ले ली थी. पिछले कुछ वर्षों में बीफ प्रतिबंध, गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा, विश्वविद्यालयों में मांसाहारी भोजन को लेकर विवाद और खानपान से जुड़े राजनीतिक विवाद लगातार बढ़े हैं. पश्चिम बंगाल का मामला इसलिए अलग माना जा रहा है क्योंकि इसका सीधा असर उन बच्चों पर पड़ेगा जिनके लिए स्कूल का भोजन दिन का सबसे पौष्टिक भोजन होता है.
कुपोषण और भोजन में विविधता
भारत में कुपोषण अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश में पांच वर्ष से कम उम्र के 19 प्रतिशत बच्चे वेस्टेड यानी अपनी लंबाई के अनुपात में बेहद दुबले हैं, जबकि 29.3 प्रतिशत बच्चे स्टंटेड यानी उम्र के हिसाब से सामान्य से कम लंबाई के हैं. पश्चिम बंगाल में भी 20.3 प्रतिशत बच्चे वेस्टेड और 22.4 प्रतिशत बच्चे स्टंटेड पाए गए हैं. बचपन में पोषण की कमी का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शिक्षा, शारीरिक विकास और भविष्य की कार्यक्षमता पर भी पड़ता है.
इसी चुनौती से निपटने के लिए 1995 में मिड-डे मील योजना शुरू की गई थी, जिसे बाद में पीएम पोषण योजना का नाम दिया गया. ग्रामीण इलाकों और शहरी झुग्गियों में रहने वाले लाखों बच्चों के लिए स्कूल का भोजन अक्सर दिन का एकमात्र संतुलित भोजन होता है. ऐसे में अंडे जैसे सस्ते और आसानी से उपलब्ध प्रोटीन स्रोत को हटाने पर सवाल उठ रहे हैं.
सोयाबीन, राजमा और पनीर पौष्टिक जरूर हैं, लेकिन वे अंडों का पूरी तरह विकल्प नहीं माने जाते. उनकी कीमत अधिक होती है, उन्हें तैयार करने में ज्यादा समय लगता है और सभी बच्चे उन्हें समान रूप से पसंद भी नहीं करते. पोषण केवल प्रोटीन की मात्रा का सवाल नहीं बल्कि भोजन की उपलब्धता, लागत, नियमित आपूर्ति और बच्चों द्वारा उसे स्वीकार किए जाने से भी जुड़ा होता है. इन सभी मानकों पर अंडे सबसे प्रभावी विकल्पों में गिने जाते हैं.
कुपोषण का असर केवल बच्चों तक सीमित नहीं रहता. कमजोर पोषण वाले बच्चे आगे चलकर देश की कार्यक्षमता, आर्थिक उत्पादकता और स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी असर डालते हैं. ऐसे में आत्मनिर्भर भारत जैसे लक्ष्यों की बात करने के साथ-साथ बच्चों के लिए सबसे प्रभावी पोषण कार्यक्रमों को मजबूत बनाए रखना भी जरूरी माना जाता है.
धर्म और भोजन
पश्चिम बंगाल की लगभग 98 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में मांसाहारी भोजन करती है. मछली, मांस और अंडे लंबे समय से राज्य की खाद्य संस्कृति और सामाजिक जीवन का हिस्सा रहे हैं. ऐसे में शाकाहार को हिंदू पहचान के एकमात्र रूप के तौर पर प्रस्तुत करने पर भी सवाल उठ रहे हैं. पूर्वी, दक्षिणी और पूर्वोत्तर भारत में करोड़ों हिंदू नियमित रूप से मांस, मछली और अंडे का सेवन करते हैं और इसे अपनी धार्मिक आस्था के खिलाफ नहीं मानते.
भारतीय समाज में जाति आधारित शुद्धता और अशुद्धता की धारणाओं के कारण मांस और अंडों को कई बार "अशुद्ध" भोजन माना गया है. लेकिन दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग लंबे समय से सस्ते पशु-आधारित प्रोटीन पर निर्भर रहे हैं. सार्वजनिक कल्याण योजनाओं से ऐसे खाद्य पदार्थ हटने का सबसे अधिक असर इन्हीं आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों पर पड़ता है.
सरकारी पोषण योजनाएं करदाताओं के पैसे से चलती हैं और उनका उद्देश्य सभी बच्चों को उनकी पोषण संबंधी जरूरतों के अनुसार भोजन उपलब्ध कराना है. सार्वजनिक नीति का आधार वैज्ञानिक शोध, स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें और सामाजिक न्याय होना चाहिए, न कि किसी एक धार्मिक संगठन या वैचारिक दृष्टिकोण की भोजन संबंधी मान्यताएं. पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील से अंडे हटाने का विवाद अब केवल भोजन का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह इस बात की परीक्षा भी बन गया है कि बच्चों के पोषण को प्राथमिकता दी जाएगी या राजनीतिक और वैचारिक प्रतीकों को.

