पीएम मोदी की ‘एक साल के लिए पाबंदियों’ की अपील पर स्टैंड-अप कॉमेडियंस ने जमकर लिए मजे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में एक साल के लिए सोने की खरीद पर स्वैच्छिक रोक लगाने और ईंधन की खपत कम करने के आव्हान ने ऑनलाइन व्यंग्य की एक लहर पैदा कर दी है. स्टैंड-अप कॉमेडियंस इन टिप्पणियों को अपने नवीनतम कार्यक्रमों में शामिल कर रहे हैं.
सागोरिका रॉय के अनुसार, जहाँ कॉमेडियन वरुण ग्रोवर ने अपने एक हालिया सेट में सोना न खरीदने की अपील पर चर्चा की, वहीं गौरव गुप्ता ने इस स्थिति की तुलना 'टाइटेनिक' को दी गई उस आइसबर्ग की चेतावनी से कर दी जिसे नजरअंदाज कर दिया गया था. विदेशी मुद्रा बचाने का आग्रह करते हुए पीएम ने नागरिकों से सोना खरीदने पर एक साल की रोक लगाने की अपील की है.
उन्होंने ईंधन की खपत कम करने के लिए कोविड-दौर की प्रथाओं जैसे 'वर्क फ्रॉम होम', वर्चुअल मीटिंग और सार्वजनिक परिवहन के अधिक उपयोग की ओर लौटने का भी आव्हान किया. आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए मोदी ने लोगों से "मेड इन इंडिया" उत्पादों को प्राथमिकता देने का आग्रह किया है.
ग्रोवर ने अपने नवीनतम सेट में मोदी की इस मितव्ययिता की अपील को मुद्रास्फीति, असमानता और मध्यम वर्ग की चिंताओं पर एक व्यंग्यात्मक मोनोलॉग में बदल दिया. अपने सेट की शुरुआत मोदी की 'पाबंदियों' की सूची को तेजी से गिनाते हुए ग्रोवर ने मजाक में कहा कि भारतीयों को इन सबको याद रखने के लिए जल्द ही 'गजनी' के नायक की तरह टैटू बनवाने की जरूरत पड़ सकती है.
उन्होंने सार्वजनिक बलिदान के बार-बार किए जाने वाले आव्हान पर भी कटाक्ष किया और टिप्पणी की कि भारतीय पहले से ही "देश को संकट से बचाने" में सालों बिता चुके हैं. उन्होंने अंबानी परिवार और सोने की खरीद का मजाकिया संदर्भ देते हुए अपना एक्ट समाप्त किया.
इस बीच, गुप्ता ने अपने सेट में अगले साल के लिए प्रधानमंत्री की 'पाबंदियों' की लंबी सूची पर सवाल उठाए. दर्शकों में बैठे एक टैक्स अधिकारी से बातचीत करते हुए गुप्ता ने मजाक में कहा कि अगर सरकार इस अपील के पीछे का असली कारण बता दे, तो मध्यम वर्गीय परिवार सोना खरीदने के बजाय उसे बेचना पसंद करेंगे.
उन्होंने मोदी के भाषण की तुलना उन पाबंदियों से की जो भारतीय माता-पिता अपने बच्चों पर लगाते हैं, और कहा कि कम से कम उनके पिता तो उनके पीछे का कारण बताते थे. गुप्ता ने इसकी तुलना टाइटेनिक की आइसबर्ग चेतावनी से भी की, यह सुझाव देते हुए कि लोग केवल तभी सतर्क होने से डरते हैं जब स्थिति पहले से ही नियंत्रण से बाहर हो चुकी हो. कॉमेडियन पुनीत पनिया ने चुटकी लेते हुए कहा कि मितव्ययिता का यह दबाव, उनके शब्दों में, पार्टी के हितों को राष्ट्र की जरूरतों से ऊपर रखने का एक और मामला है.

