मनीषा प्रियम | युवा सिर्फ नौकरी नहीं, जवाब भी मांग रहे हैं

‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने शिक्षाविद् और राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर मनीषा प्रियम के साथ भारत में जेन ज़ी के उभार, युवाओं के असंतोष, शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी और लोकतंत्र में उनकी भागीदारी पर चर्चा की.

प्रोफेसर मनीषा प्रियम के अनुसार, 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के साथ युवाओं के बीच रोजगार, उद्यमिता और विकास को लेकर नई उम्मीदें पैदा हुई थीं. ‘स्टार्टअप इंडिया’, ‘स्टैंड अप इंडिया’ और ‘न्यू इंडिया’ जैसे नारों ने युवाओं को बेहतर भविष्य का सपना दिखाया. हालांकि, समय के साथ इन उम्मीदों और युवाओं के वास्तविक अनुभवों के बीच अंतर बढ़ता गया.

प्रियम ने बताया कि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों की तैयारी में जुटे हैं. सीमित संसाधनों के बावजूद वे कोचिंग, शारीरिक प्रशिक्षण और परीक्षाओं के सहारे अपना भविष्य संवारने की कोशिश करते हैं. पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में देरी और रोजगार के सीमित अवसर उनके असंतोष को बढ़ाते हैं. अग्निवीर योजना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सेना में भर्ती की तैयारी करने वाले आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं की उम्मीदों पर भी इसका असर पड़ा है.

उनके अनुसार, युवाओं का असंतोष केवल नौकरी की मांग तक सीमित नहीं है. यह शिक्षा की गुणवत्ता, समान अवसर और सरकार की जवाबदेही से भी जुड़ा है. उन्होंने कहा कि गरीबी का अर्थ केवल धन की कमी नहीं, बल्कि अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, पौष्टिक भोजन और जीवन में आगे बढ़ने के अवसरों का अभाव भी है. ऐसे में राज्य की जिम्मेदारी है कि वह युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के अवसर उपलब्ध कराए.

प्रियम ने युवाओं के आंदोलनों को संविधान के दायरे में अपनी मांगें रखने की कोशिश के रूप में देखा. उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए शिक्षा, लोकतांत्रिक संवाद और शांतिपूर्ण आंदोलनों के महत्व पर जोर दिया. उनके अनुसार, सरकारों को युवाओं की बात सुननी चाहिए, न कि उनकी मांगों को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना चाहिए.

बातचीत में युवा महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और उनके सामने आने वाली चुनौतियों पर भी चर्चा हुई. प्रियम ने कहा कि शिक्षा और राजनीति से जुड़े सवाल उठाना महिलाओं का भी अधिकार है. उन्होंने युवाओं और महिलाओं के साथ सार्थक संवाद को लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक बताया.

पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

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