‘लव जिहाद’, ऑनर किलिंग और संविधान: भारतीय महिलाओं के प्रेम और विवाह की आजादी पर बढ़ती लड़ाई

भारत में अंतरधार्मिक विवाह 2% से भी कम हैं. फिर भी विभाजन के दौरान महिलाओं पर हुई हिंसा से लेकर आज के ‘लव जिहाद’ अभियानों, धर्मांतरण विरोधी कानूनों और ऑनर किलिंग तक, महिलाओं के प्रेम और विवाह के फैसले परिवार, समुदाय और राज्य की सत्ता के बीच संघर्ष का विषय बने हुए हैं.

'आर्टिकल-14' में हर्ष मंदर ने लिखा है कि भारत में महिलाओं को यह अधिकार कि वे किसे प्रेम करें और किससे विवाह करें, लंबे समय से परिवार और समुदाय की ‘इज्जत’ से जोड़कर देखा जाता रहा है. 1947 के विभाजन के दौरान यह सोच भयावह हिंसा में बदल गई थी. पंजाब के कई हिस्सों में महिलाओं को दूसरे समुदाय के पुरुषों के हाथों पड़ने से पहले आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया गया. कई महिलाओं की हत्या उनके अपने पिता, भाई और पति तक ने कर दी.

विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान ने अपहृत महिलाओं को उनके परिवारों और समुदायों तक वापस पहुंचाने के अभियान चलाए. लेकिन कई महिलाओं को उनके परिवारों ने ही ‘बेइज्जत’ मानकर स्वीकार नहीं किया. इससे यह सामने आया कि महिलाओं की सुरक्षा से ज्यादा महत्व सामुदायिक प्रतिष्ठा और पहचान को दिया गया.

संविधान सभा में महिलाओं के अधिकार की बहस

संविधान निर्माण के दौरान हंसा मेहता और राजकुमारी अमृत कौर ने महिला को अपने जीवनसाथी के चुनाव का अधिकार देने की कोशिश की. मिनू मसानी ने भी धर्म के आधार पर विवाह में बाधा नहीं होने का संवैधानिक प्रावधान रखने का प्रस्ताव दिया. इस प्रस्ताव को हंसा मेहता, राजकुमारी अमृत कौर और डॉ. बी.आर. आंबेडकर का समर्थन मिला, लेकिन यह केवल पांच के मुकाबले चार मतों से खारिज हो गया.

लेख के अनुसार, यदि विवाह और साथी चुनने की स्वतंत्रता को संविधान में स्पष्ट मौलिक अधिकार बनाया गया होता तो संभव है कि बाद में बने कुछ धर्मांतरण विरोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता पर अलग तरह से बहस होती.

‘लव जिहाद’ और मुस्लिम पुरुष की छवि

समय के साथ अंतरधार्मिक प्रेम को लेकर एक नया राजनीतिक विमर्श उभरा, जिसमें मुस्लिम पुरुषों पर हिंदू महिलाओं को प्रेम, विवाह और धर्मांतरण के जरिए फंसाने की साजिश चलाने का आरोप लगाया जाता है. ‘लव जिहाद’ का यह दावा महिलाओं को अपनी पसंद से निर्णय लेने में सक्षम वयस्कों के बजाय ऐसी पीड़ितों के रूप में प्रस्तुत करता है, जिन्हें परिवार, समुदाय या राज्य से ‘बचाने’ की जरूरत है.

भारत में अंतरधार्मिक विवाह 2% से भी कम हैं. 2019-20 के प्यू रिसर्च सेंटर सर्वेक्षण में 67% हिंदू महिलाओं और 65% हिंदू पुरुषों के दूसरे धर्म में विवाह को रोकने के पक्ष में थे. मुस्लिम समुदाय में ये आंकड़े क्रमशः 80% और 76% थे.

केंद्र सरकार ने 2020 में संसद में कहा था कि ‘लव जिहाद’ कानून में परिभाषित अपराध नहीं है और केंद्रीय एजेंसियों ने ऐसा कोई मामला दर्ज नहीं किया है. इसके बावजूद कई भाजपा नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इस शब्द का इस्तेमाल किया है. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और अन्य राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानूनों को विवाह से जुड़े धर्मांतरण तक विस्तारित किया गया है.

धर्मांतरण विरोधी कानून और अंतरधार्मिक विवाह

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में धर्मांतरण से जुड़े कानूनों को अधिक सख्त किया गया है. इन कानूनों में विवाह के लिए धर्मांतरण को अपराध के दायरे में लाने, पुलिस जांच और कुछ मामलों में धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति पर ही प्रमाण का भार डालने जैसे प्रावधान शामिल हैं.

वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में वयस्कों को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने के अधिकार को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा माना है. लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश, शफीन जहां बनाम अशोकन के.एम. और अन्य मामलों में अदालत ने स्पष्ट किया कि वयस्क व्यक्ति अपनी पसंद से विवाह कर सकते हैं.

फिर भी कई अंतरधार्मिक और अंतरजातीय जोड़ों को परिवार, सामाजिक संगठनों, पुलिस और राजनीतिक समूहों के दबाव का सामना करना पड़ता है. विशेष विवाह अधिनियम के तहत एक महीने की सार्वजनिक सूचना की व्यवस्था भी कई मामलों में जोड़ों की पहचान सार्वजनिक होने और उन पर दबाव बढ़ने का माध्यम बनी है.

ऑनर किलिंग की हिंसा

महिलाओं को परिवार की ‘इज्जत’ का प्रतीक मानने की सबसे हिंसक परिणति ऑनर किलिंग के रूप में सामने आती है. अंतरजातीय या अंतरधार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों को परिवार के सदस्यों की हिंसा का सामना करना पड़ता है. 2006 के लता सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वयस्क महिला को अपनी पसंद से विवाह करने का अधिकार माना और ऐसे जोड़ों की सुरक्षा का निर्देश दिया.

लेख में हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक और महाराष्ट्र में अंतरजातीय या अंतरधार्मिक रिश्तों के कारण महिलाओं और उनके साथियों की हत्या के हालिया मामलों का भी उल्लेख किया गया है.

लेख का केंद्रीय तर्क यह है कि महिला किससे प्रेम करे या विवाह करे, इसका फैसला परिवार, जाति, धार्मिक समुदाय, राजनीतिक संगठन या राज्य नहीं कर सकते. यह निर्णय संबंधित वयस्क व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है. ‘लव जिहाद’ के दावों और ऑनर किलिंग की घटनाओं के बीच साझा तत्व यही है कि महिलाओं की अपनी पसंद को गौण मानकर उनके जीवन पर दूसरों का अधिकार स्थापित करने की कोशिश की जाती है.

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