एम राजशेखर | ईरान युद्ध के दौरान भाग्य ने हमें बचाए रखा; किस्मत से यह संकट छोटा साबित हुआ

पिछले कुछ महीनों में भारत के ऊर्जा क्षेत्र को एक अभूतपूर्व 'स्ट्रेस टेस्ट' (तनाव परीक्षण) से गुजरना पड़ा है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में पश्चिम एशिया पर निर्भर है; वह अपने तेल आयात का 40% हिस्सा 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (हॉर्मुज जलडमरूमध्य) के रास्ते प्राप्त करता था. इसके अतिरिक्त, भारत कुल तेल का 50% से अधिक, एलएनजी का 60% और एलपीजी का 80% से अधिक हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता था.

जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया, तो इस भू-राजनीतिक टकराव के कारण भारत की आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह बाधित हो गई. इसके परिणामस्वरूप वैश्विक बाजारों में कड़ाई आई, जिससे भारत को तेल, गैस और उनसे जुड़े औद्योगिक उत्पादों की भारी कमी तथा कीमतों में तीव्र उछाल का सामना करना पड़ा.

इस व्यापक व्यवधान के बावजूद, इसके वास्तविक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव बड़े स्तर पर छिपे रहे. इसके दो मुख्य कारण रहे हैं: सरकार की संकट प्रबंधन रणनीति: एनडीए सरकार ने पारंपरिक तरीका अपनाते हुए उद्योगों को दी जाने वाली ईंधन आपूर्ति में कटौती की और उसे घरेलू उपभोक्ताओं (मतदाताओं) की ओर मोड़ दिया. इससे मध्यम वर्ग तो कुछ हद तक सुरक्षित रहा, लेकिन वाणिज्यिक (कमर्शियल) और अपंजीकृत उपयोगकर्ताओं की आपूर्ति अचानक बंद कर दी गई. इस प्रकार, संकट का वास्तविक बोझ जबरन प्रतिस्थापन और मांग को दबाकर देश के गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग पर डाल दिया गया.

मीडिया की उदासीनता: समाज के सुचारू संचालन के लिए ऊर्जा की केंद्रीयता सर्वोपरि है, लेकिन भारतीय न्यूज़रूम्स ने इस संकट को वह प्राथमिकता नहीं दी जो विमुद्रीकरण (नोटबंदी), जीएसटी कार्यान्वयन या कोविड-19 महामारी के दौरान दी गई थी. मीडिया की कवरेज न तो निरंतर थी और न ही व्यापक, जिसके कारण जनता को इस संकट की भयावहता का पूरा अहसास नहीं हुआ.

युद्ध के गहराने और खाड़ी के बुनियादी ढांचे के प्रभावित होने से कतर पेट्रोलियम जैसी कंपनियों ने उत्पादन बंद कर दिया और हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही ठप हो गई. इसके प्रभाव भारत में अत्यंत तीव्र गति से दिखाई दिए. आपूर्ति में कटौती की गई. 'पेट्रोनेट एलएनजी' ने 'फोर्स मेज्योर' (अपरिहार्य परिस्थिति) घोषित किया, 'गेल' ने आपूर्ति की चेतावनी दी, 'अडानी टोटल गैस' ने दाम तीन गुना बढ़ा दिए, और 'गुजरात गैस' ने औद्योगिक आपूर्ति काट दी. सरकारी रिफाइनरियों को आंशिक रूप से बंद करना पड़ा.

सरकार ने कमर्शियल एलपीजी की कीमतें ₹115 और घरेलू एलपीजी की कीमतें ₹60 बढ़ा दीं. एलपीजी सिलेंडर बुकिंग का अनिवार्य अंतर 21 दिन से बढ़ाकर 25 दिन कर दिया गया और बाद में कमर्शियल आपूर्ति को पूरी तरह रोककर सारा स्टॉक घरेलू उपयोग के लिए सुरक्षित कर दिया गया.

आगामी राज्य चुनावों को देखते हुए घरेलू गैस की आधिकारिक कीमतें कम रखी गईं, जिससे वास्तविक और नियंत्रित कीमतों के अंतर के कारण सिलेंडरों की अवैध रीफिलिंग और कालाबाज़ारी का धंधा बढ़ गया. कमर्शियल गैस की अनुपलब्धता के कारण गुजरात के मोरबी जैसे बड़े औद्योगिक समूहों में इकाइयाँ बंद होने लगीं. ईंधन की कमी और बेरोजगारी के चक्र में फंसकर प्रवासी मजदूर पुनः पलायन को मजबूर हुए. बेलगावी में एक होटल मालिक ने अत्यधिक ऊर्जा लागत से उपजे वित्तीय संकट के कारण आत्महत्या कर ली.

पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक और पॉलिमर का उत्पादन 40% तक गिर गया, जिससे पैकेज्ड सामान महंगे हो गए (जैसे बिस्लेरी पानी की बोतल की पैकेजिंग लागत 70% तक बढ़ गई). मध्य प्रदेश में लगभग 5,600 फैक्ट्रियां बंद होने की कगार पर पहुँच गईं. इसके अलावा, फार्मा (दवा) क्षेत्र के लिए आवश्यक सॉल्वेंट का उत्पादन भी ठप हो गया.

डीजल की कमी के कारण देश के लगभग 20% ट्रक सड़कों से हट गए, जिससे आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई और खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छूने लगीं (जैसे कोरबा में टमाटर ₹15 से बढ़कर ₹50 किलो हो गया). इस मूल्य वृद्धि का लाभ किसानों को नहीं मिला, बल्कि मंडियों तक फसल न पहुँचने से उन्हें भारी नुकसान हुआ. उर्वरक और डीजल दोनों की कमी ने खरीफ और आगामी रबी की फसलों को संकट में डाल दिया.

औद्योगिक उत्पादन गिरने से निफ्टी 50 कंपनियों के शुद्ध लाभ की वृद्धि दर घटकर मात्र 4.2% (पिछली तिमाही के 10% के मुकाबले) रहने का अनुमान लगाया गया. छोटे और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) की स्थिति और गंभीर हुई, जहाँ लोन डिफॉल्ट के मामले बढ़ गए.

बार-बार बिजली कटौती और कैन में डीजल की आपूर्ति पर प्रतिबंध से पुणे जैसे शहरों में छोटे और मध्यम निजी अस्पताल संकट में आ गए, जहाँ डॉक्टरों को जीवन रक्षक सर्जरी के दौरान जनरेटर के ईंधन के लिए संघर्ष करना पड़ा. वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी न मिलने से 'लकड़ी की अर्थव्यवस्था' पुनर्जीवित हो गई, जिससे संरक्षित वनों में पेड़ों की कटाई तेज हो गई.

इतने बड़े झटके के बाद भी देश का ढांचा पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुआ, जिसके पीछे लचीलेपन के चार मुख्य स्रोत रहे हैं:

पावर ग्रिड की मजबूती: नवीकरणीय ऊर्जा और घरेलू कोयले के दम पर बिजली ग्रिड अप्रभावित रहा. आईआईटी दिल्ली के अनुसार, भारत अब 'पेट्रोस्टेट' (तेल आधारित) से 'इलेक्ट्रोस्टेट' (बिजली आधारित) बनने की ओर अग्रसर हुआ है. इंडक्शन कुकिंग, ईवी और घरेलू बिजली ने इस कमी को पूरा किया.

सरकारी तेल कंपनियों द्वारा झटका सहना: सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने डीजल पर ₹18/लीटर, पेट्रोल पर ₹14/लीटर और एलपीजी पर कुल ₹80,000 करोड़ तक का भारी नुकसान खुद झेला. रिफाइनरियों ने पेट्रोकेमिकल उत्पादन को रोककर एलपीजी उत्पादन बढ़ाया और कच्चे तेल की भौगोलिक खरीद में विविधता लाए. इसके विपरीत, निजी रिफाइनरियों (जैसे नयारा और रिलायंस) ने घाटा उठाने के बजाय संचालन सीमित कर दिया या रखरखाव के लिए इकाइयां बंद कर दीं.

उपभोक्ताओं का अनुकूलन: जब एलपीजी की कमी हुई, तो शहरी उपभोक्ता इंडक्शन पर चले गए और ग्रामीण आबादी मजबूरी में पुनः पारंपरिक ईंधन (गोबर के उपले, कोयला, लकड़ी) पर लौट आई. विशेषज्ञ इसे 'प्रतिगामी लचीलापन' कहते हैं, जो मजबूती नहीं बल्कि मजबूरी और अदृश्य ऊर्जा असुरक्षा को दर्शाता है.

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था: असंगठित क्षेत्र ने मांग और सीमित आपूर्ति के बीच जैसे-तैसे तालमेल बिठाया.

विशेषज्ञों, जैसे 'इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली' के संपादक टी के अरुण, का मानना है कि भारत केवल अल्पकालिक ऊर्जा कटौतियों को सहन करने में सक्षम है, लेकिन लंबे समय तक चलने वाले व्यवधानों के सामने यह व्यवस्था टिक नहीं पाएगी. तेल कंपनियों का घाटा लंबे समय में उनके मुनाफे और निवेश क्षमता को नष्ट कर देगा.

भले ही वर्तमान में तनाव कुछ कम दिख रहा हो, लेकिन खाड़ी में दोबारा भड़कती अनिश्चितताओं के कारण संकट टला नहीं है. अर्थशास्त्री जयती घोष के अनुसार, भारत अब तक अपने मौजूदा भंडारों और रिजर्व के भरोसे चल रहा था, जो अब समाप्त होने की कगार पर हैं. यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खुल भी जाए, तो भी यातायात सामान्य होने में 5-6 महीने लगेंगे. वास्तविक कमी और महंगाई का प्रभाव अब दिखना शुरू होगा. इसी को ध्यान में रखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने दिसंबर 2026 की तिमाही के लिए खुदरा मुद्रास्फीति का अनुमान बढ़ाकर 5.9% कर दिया है.

एम राजशेखर ने अपने इस लेख में एनडीए सरकार के नीतिगत कुप्रबंधन को भी रेखांकित किया है. मसलन:

आयात पर बढ़ती निर्भरता: वर्ष 2014 के बाद से भारत की ऊर्जा आयात निर्भरता कम होने के बजाय बढ़ी है. महंगी होने के बावजूद ऊर्जा मिश्रण में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को तीन गुना करने का निर्णय लिया गया, जबकि वैश्विक स्तर पर गैस की बुनियादी ढांचागत क्षमताएं (जैसे एलएनजी टैंकर और रीगैसिफिकेशन टर्मिनल) सीमित हैं.

गलत रणनीतिक निर्णय: सौर ऊर्जा के पैनलों और टैरिफ की बढ़ती कीमतें, रूस और ईरान से तेल खरीद को सीमित करना, अपर्याप्त रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, कोयला गैसीकरण में धीमी गति, और संकट के समय मांग को नियंत्रित करने के लिए सही मूल्य नीतियों का उपयोग न करना जैसी रणनीतिक गलतियों ने देश के लचीलेपन को कमजोर किया है.

वह लिखते हैं कि भविष्य के संकटों से बचने के लिए भारत को अपनी ऊर्जा योजना में आमूलचूल बदलाव करने की आवश्यकता है. जैसे: खाना पकाने के लिए आयातित हाइड्रोकार्बन (एलपीजी) पर निर्भरता को पूरी तरह त्याग कर बिजली (इंडक्शन) को अपनाना होगा. नवीकरणीय ऊर्जा का पूर्ण लाभ उठाने के लिए बड़े पैमाने पर 'पंप्ड स्टोरेज' या 'ग्रीन हाइड्रोजन' जैसी प्रौद्योगिकियों में निवेश करना होगा ताकि चीन पर बैटरी निर्भरता कम हो सके. देश के पास उपलब्ध प्रचुर कोयले का गैसीकरण करना होगा और कार्बन कैप्चर तकनीक विकसित करनी होगी. प्राकृतिक गैस को केवल उर्वरक जैसे रणनीतिक क्षेत्रों के लिए आरक्षित रखना होगा.

अंततः, ईरान युद्ध के इस दौर में भारत का टिके रहना उसकी सुदृढ़ व्यवस्था या रणनीतिक लचीलेपन के कारण नहीं, बल्कि उसके भाग्य के कारण था कि यह संकट समय रहते टल गया. यदि यह व्यवधान लंबा खींचता, तो देश की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था बड़े संकट में घिर जाती.

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