सुरभि गुप्ता | मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा से क्या हासिल हुआ, और क्या उल्टा पड़ गया?

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने न्यूयॉर्क से न्यू लाइंस मैगजीन की साउथ एशिया एडिटर सुरभि गुप्ता के साथ मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा और उसके बाद पैदा हुए विवादों पर चर्चा की. बातचीत का केंद्र मेडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित वह सम्मेलन रहा, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विश्व बंधुत्व, शांति, प्रेम और वसुधैव कुटुंबकम की बातें कीं. उन्होंने यह भी कहा कि जो हिंदू मुसलमानों को भारत से बाहर करना चाहता है, वह हिंदू नहीं है.

हालांकि, इस आयोजन का घोषित उद्देश्य आरएसएस की छवि को एक समावेशी और शांतिप्रिय संगठन के रूप में प्रस्तुत करना था, लेकिन इसके बाद कई सवाल खड़े हो गए. सम्मेलन में शामिल कुछ बहुधार्मिक नेताओं ने बाद में कहा कि उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि कार्यक्रम आरएसएस से जुड़ा हुआ है. उनका कहना था कि यदि उन्हें पहले से इसकी जानकारी होती, तो वे इसमें शामिल नहीं होते. इससे आयोजन की पारदर्शिता और उसकी वास्तविक मंशा पर सवाल उठे.

सुरभि गुप्ता के मुताबिक, भागवत की यात्रा से आरएसएस को प्रचार तो मिला, लेकिन वह प्रचार पूरी तरह सकारात्मक नहीं रहा. पहले अमेरिका में आरएसएस को लेकर सीमित जानकारी थी, लेकिन इस आयोजन के बाद वहां की मीडिया और आम लोगों के बीच संगठन की विचारधारा, हिंदू राष्ट्र की अवधारणा और भाजपा के साथ उसके संबंधों को लेकर जागरूकता बढ़ी. उनके अनुसार, आरएसएस के समर्थकों ने सम्मेलन में भारत माता की जय और जय श्री राम के नारे लगाए, जिससे आयोजन का घोषित इंटरफेथ और विविधता वाला संदेश कमजोर पड़ता दिखाई दिया.

सम्मेलन के बाहर करीब 100 से अधिक प्रदर्शनकारी मौजूद थे. इनमें इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल, हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स, वामपंथी संगठनों और अन्य दक्षिण एशियाई समूहों के लोग शामिल थे. स्थानीय अमेरिकी नेताओं ने भी आरएसएस से दूरी बनाने का संकेत दिया. करीब 90 अमेरिकी राजनेताओं ने आरएसएस से जुड़े समूहों से फंडिंग नहीं लेने का संकल्प लिया. इस घटनाक्रम ने अमेरिकी राजनीति में भारतीय-अमेरिकी संगठनों के प्रभाव, फंडिंग और लॉबिंग को लेकर बहस तेज कर दी.

चर्चा में लॉबिंग फर्मों की भूमिका भी सामने आई. बताया गया कि आरएसएस ने पहले वॉशिंगटन डीसी की लॉबिंग फर्म स्क्वायर पैटर्न को नियुक्त किया था, ताकि अमेरिकी सांसदों और नीति-निर्माताओं के बीच संगठन के पक्ष में बातचीत की जा सके. हालांकि, विदेशी एजेंट के रूप में पंजीकरण और फंडिंग से जुड़े सवाल उठने के बाद यह अनुबंध समाप्त कर दिया गया.

सुरभि गुप्ता ने कहा कि आरएसएस अब अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों में अपने प्रभाव और राजनीतिक नेटवर्क को मजबूत करना चाहता है. लेकिन भागवत की यात्रा में भारत में मॉब लिंचिंग, बुलडोजर कार्रवाई, राम मंदिर के चंदे से जुड़े विवाद, संविधान और भारत-अमेरिका संबंधों जैसे सवालों पर स्पष्ट बात नहीं हुई. इसलिए यह यात्रा आरएसएस की छवि सुधारने के बजाय उसके राजनीतिक चरित्र और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को लेकर नए सवाल छोड़ गई.

पूरी बातचीत यहां ुन सकते हैं.

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‘आरएसएस एक सत्तावादी, सैन्यवादी समूह है’: अमेरिका के बाद अब ब्रिटेन में मोहन भागवत के कार्यक्रम का विरोध